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वैदिक परंपरा के ये गुरुकुल(Gurukul) …सतयुग लाने की पहल


वैदिक परंपरा के ये गुरुकुल(Gurukul) …सतयुग लाने की पहल

कर्नाटक के मंगलुरु से 40-50 कि.मी. दूर है विट्टला और विट्टला से कोई चार-पांच कि.मी. दूर है मुरकजे। इसी गांव में नारियल और सुपारी के घने उपवन के बीच परमेश्वरी अम्मा की छोटी सी कुटिया में मानो “सतयुग” वापस लौट आया है। परमेश्वरी अम्मा अब नहीं रहीं लेकिन उनके आंगन में जिस प्रकार वैदिक ऋचाएं गूंज रही हैं, वह कालचक्र के इस महान निर्णायक मोड़ को स्वत: परिभाषित कर रही हैं। अभी कुछ ही वर्ष पहले की बात है, देश में विवाद का विषय बन गया था कि स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है। यह विवाद जब उफान पर था, उसके पूर्व ही मुरकजे ग्राम ने इस रूढ़ि को धता बता दिया था। आज एक-दो नहीं सैकड़ों की संख्या में बालिकाएं परमेश्वरी अम्मा के आनन्द आंगन में वेद पाठ कर रही हैं।

परमेश्वरी अम्मा मुरकजे गांव की रहने वाली थीं। 1997 में उनका शरीरांत हुआ किन्तु इसके पूर्व अपने भतीजे वेंकटरमण भट्ट की प्रेरणा से उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, सैकड़ों एकड़ जमीन कन्याओं के गुरुकुल के लिए दान कर दी। कन्याओं को वेद शिक्षा देने वाले इस मैत्रेयी गुरुकुल की स्थापना श्री कृष्णप्पा, श्री सीताराम केदिलाय, श्री सूर्यनारायण राव प्रभृति वरिष्ठ प्रचारकों की प्रेरणा रा.स्व. संघ के स्वयंसेवकों के प्रयासों एवं 1994 में बंगलुरु में हुई। 1999 में मंगलुरु स्थित परमेश्वरी अम्मा के घर, उससे जुड़ी सैकड़ों एकड़ जमीन में मैत्रेयी गुरुकुल स्थानांतरित हो गया। आज यहां 101 कन्याएं हैं जो वेद शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों की शिक्षा भी ग्रहण कर रही हैं। छह वर्षीय पाठक्रम, किन्तु भोजन, आवास एवं शिक्षा का कोई शुल्क नहीं। योग्यता, प्रतिभा और रुचि के मूल्यांकन पर आधारित चयन प्रक्रिया और पूरे छह साल तक कठोर दिनचर्या के अन्तर्गत गुरुकुल में निवास। आधुनिक पद्धति की पांचवीं कक्षा से यहां कन्याओं का प्रवेश होता है और दसवीं श्रेणी तक की शिक्षा प्राप्त कर वे अपनी वेद और आधुनिक विषयों की शिक्षा पूर्ण कर लेती हैं। इन छह वर्षों में इन्हें कोई परीक्षा नहीं देनी होती। वार्षिक मूल्यांकन हेतु यहां वैदिक पद्धति का अनुसरण किया जाता है जिसमें कोई भी किसी विषय में कम अंक के कारण अनुत्तीर्ण नहीं किया जाता। मातृश्री मीनाक्षी इसका कारण बताते हुए स्पष्ट करती हैं- “निसर्ग में तो सभी कुछ न कुछ गुण लेकर ही आते हैं, फिर कोई उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण कैसे हो सकता है। विद्यालय प्रतिभा निखारें, बस! ईश्वर की अनमोल कृतियां अपना भविष्य स्वयं तय कर लेंगी।”

लगभग एक दर्जन मातृश्री (शिक्षिकाएं) यहां रहकर प्रमुख मातृश्री सावित्री देवी के सुयोग्य संचालन में इन कन्याओं को पंचमुखी शिक्षा पद्धति के अनुसार विविध विषयों का शिक्षण देती हैं। पांचवीं कक्षा को यहां श्रद्धा कहते हैं और दसवीं तक क्रमश: मेधा, प्रज्ञा, प्रतिभा, धृति: और धी: नाम से श्रेणी-कक्षाओं का सुन्दर नामकरण किया गया है। वेद शिक्षा के अन्तर्गत यहां ऋग्वेद के चयनित सूक्तों, तैत्तरीय उपनिषद सहित अन्य संकलित ऋचाओं, यज्ञ विधियों, शांतिपाठ, नित्य पूजा कर्म के साथ श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, महाभारत के अनेक अंशों का शिक्षण दिया जाता है। सभी कन्याएं श्रद्धा श्रेणी के स्तर पर ही स्वर-लय के साथ वेदमंत्रों का पठन करने लगती हैं। इसके अतिरिक्त गणित, इतिहास, भूगोल, अंग्रेजी, कन्नड़, संस्कृत, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, योग शिक्षा, कृषि-कर्म के साथ कम्प्यूटर, स्वरुचि के अनुसार पेंटिंग, नृत्य-कला, नाट शिक्षण, संगीत आदि का शिक्षण भी प्रत्येक श्रेणी के अनुसार यहां दिया जा रहा है। आधुनिक विज्ञान के शिक्षण के लिए यहां कणाद नामक सुन्दर प्रयोगशाला है, तो भारद्वाज नामक कम्प्यूटर रूम है, जिसका संचालन वरिष्ठ श्रेणी की कन्याएं करती हैं। जिज्ञासा नामक पुस्तकालय, निरामया नामक चिकित्सा कक्ष और कन्याओं के निवास तथा अध्ययन के लिए यहां विश्ववारा, गार्गी, आराधना, सुनैना, चुड़ाला आदि अनेक प्रकोष्ठ हैं। अन्नपूर्णा नामक भोजनालय और सुन्दर गोशाला भी यहां है। पूरे परिसर की देखभाल करने वाले 5 गृहस्थ परिवार भी यहां रहते हैं।

प्रतिदिन प्रात:काल 5 बजे से गुरुकुल की दिनचर्या प्रारंभ हो जाती है, कक्षाओं का प्रारंभ सामूहिक वेदपाठ, श्रीमद्भगवद् गीता-पाठ से होता है, उसके पूर्व योग-शिक्षण और योगाभ्यास सभी के लिए अनिवार्य है। इसके बाद पंचायतन पूजा और फिर जलपान और भोजन अवकाश के साथ शाम 4.30 बजे तक शिक्षण-कक्षाएं। परिसर के मध्य में भारत माता की अत्यंत सुन्दर प्रतिमा, नित्य भारत माता की आराधना और रा.से. समिति की शाखा भी इस गुरुकुल की दिनचर्या का हिस्सा है। शाम के समय बागवानी और कृषि कार्य में सभी कन्याएं जुटती हैं। जिसकी जैसी रुचि, वो वैसे कार्य में सक्रिय हो जाती है। कहीं फूलों की क्यारियां, कहीं सब्जी-तरकारी तो कहीं नारियल, सुपारी, वनिला, केले व अन्य फलदार वृक्षों की सेवा, गोमाता की सेवा, गोशाला की भी देखभाल और इन सभी कार्यों में वेंकटरमण सपत्नीक कन्याओं का मार्गदर्शन करते हैं। सभी मातृश्री भी अपनी-अपनी श्रेणी के साथ निरन्तर किसी न किसी युक्ति से कन्याओं का शिक्षण करती हैं।

श्रृंगेरी की आश्रिता, उडुपी की रक्षिता, बागलकोट की सहना, शिवमोगा की वत्सला, बंगलुरु की अपर्णा, हासन की स्वाती से हम मिले, ये सभी यहां की वरिष्ठ छात्राएं हैं। सभी को यहां रहने-पढ़ने का आनन्द भाता है, वेद मंत्रों का सस्वर पाठ इनके मुंह से सुनने का आनन्द ऐसा कि तुरंत ध्यान लग जाए। ग्रीष्म अवकाश में सभी कन्याओं के माता-पिता इन्हें घर ले जाते हैं लेकिन गुरुपूर्णिमा के पूर्व सभी को वापस आना होता है। बीच-बीच में अभिभावक इन बच्चों का हाल-चाल लेने आते रहते हैं।

श्रृंगेरी में रहकर संगीत साधना में जुटी आश्रिता ने हाल ही में मैत्रेयी गुरुकुल से अपनी शिक्षा पूर्ण की। उसने बताया, “मैत्रेयी गुरुकुल ने जीवन जीने की कला सिखाई है, जीवन का उद्देश्य भी बताया है। संगीत और कन्नड़ साहित्य की साधना करने की मेरी योजना है। दीक्षान्त में समाज के लिए कुछ न कुछ करने का जो वचन मैंने दिया, उसे निभाऊ‚ंगी।” कर्नाटक के बीजापुर जिले के इंडी तालुके का एक छोटा सा गांव है- गुदूवाना। यहां के लिंगायत समुदाय की कन्या ज्योति कोई दो साल पहले गुरुकुल से पढ़ाई पूरी कर अपने गांव पहुंची। गांव में उसने अपने माता-पिता को विधिपूर्वक पूजा-पाठ करना सिखाया, घर में उसके बाबा, जो उसके गुरुकुल जाने से कभी नाराज थे, घर में वेद मंत्रों का नित्य पाठ देख भावविह्वल हो उठे, परिवार में संस्कृत भाषा के साथ सुसंस्कृत वातावरण निर्मित हुआ। पूरा गांव मानो ज्योति की ज्योति से जगमगा उठा। गुरुकुल की यह प्रेरणा कि “घर में बैठने के लिए ये शिक्षा नहीं ली,” को पूर्ण करते हुए ज्योति ने आस-पास की अन्य छोटी बालिकाओं को सुशिक्षित करने के प्रयास शुरू किए हैं। कुछ ऐसा ही शुरू किया चित्रदुर्ग जिले के पास मडकालमोरु के कोंडलाहल्ली गांव की एक कृषक कन्या शकुन्तला ने। शकुन्तला वेद और आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर घर पहुंची तो लोगों को लगा कि अब ये गांव में क्या करेगी। लेकिन नहीं, शकुन्तला ने अपने पिता को खेती के कार्य में सहयोग देना प्रारंभ किया। गुरुकुल में जैविक खेती का अभ्यास जो उसने किया था, अब ये प्रयोग उसकी प्रेरणा से घर वालों ने प्रारंभ किया। घर में नित्य यज्ञ धूम्र भी उठने लगा। पास-पड़ोस की स्कूल न जाने वाली कन्याओं को नियमित पढ़ाने का काम भी शकुंतला ने प्रारंभ कर दिया।

गुरुकुल में ही पढ़ी-लिखी वैशाली का विवाह चिकमंगलूर के होरानाडु गांव के एक सुप्रसिद्ध धर्माधिकारी के पुत्र से हुआ। अन्नपूर्णा देवी शक्ति स्थल के उक्त धर्माधिकारी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि उनकी बहू वेदमंत्रों का विधिपूर्वक पाठ करती है। घर के सारे काम भी निपटाती है और अंग्रेजी समाचार पत्र पढ़कर घर के अन्य सदस्यों को देश-विदेश की जानकारी भी देती है। सुसंस्कारित वातावरण को और अधिक सुसंस्कारमय बनाने वाली बहू धर्माधिकारी परिवार को मिली, इससे बढ़कर आनन्ददायक और क्या हो सकता है।

मैसूर में एक महाविद्यालय में ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने वाली निवेदिता भी जब गुरुकुल में आई थी तब उसे कल्पना नहीं थी कि एक दिन उसकी गिनती एक विदुषी नारी के रूप में होगी। गुरुकुल से उसे जो शिक्षा मिली, उसका उपयोग करते हुए जहां उसने स्नातक स्तर पर ज्योतिष-संस्कृत- व्याकरण को अपने अध्ययन का विषय बनाया वहीं कम्प्यूटर तथा अंग्रेजी के ज्ञान को भी और निखारा।

यहां से पढ़कर निकलने वाली बालिकाएं न सिर्फ संस्कृत-ज्योतिष -वेद- धर्मशास्त्रों वरन् इंजीनियरिंग, एयरोनोटिक इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्नीक, आई.टी.आई., आयुर्वेद, शिक्षा शास्त्र, संगीत, हिन्दी, अंग्रेजी एवं कन्नड़ साहित्य में उच्च अध्ययन कर रही हैं। मैत्रेयी गुरुकुल द्वारा आस-पास के ग्रामों में बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार देने के लिए बाल-गोकुलम के आयोजन बहुत लोकप्रिय हुए हैं। गुरुकुल ने अपनी स्थापना के 12 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य उत्सव का आयोजन किया जिसमें हजारों की संख्या में स्थानीय महिलाओं ने हिस्सा लिया।

आज कर्नाटक में इस गुरुकुल की इतनी ख्याति हो चली है कि लोग दूर-दूर से अपनी कन्याओं को गुरुकुल में दाखिल कराने के लिए सहज चले आते हैं किन्तु गुरुकुल की सीमित क्षमता के कारण सभी को स्थान मिल पाना संभव नहीं होता। ऐसे कितने ही अभिभावक अपने गांवों-क्षेत्र में भूमि-आवास भी उपलब्ध कराने को तैयार हैं लेकिन सवाल यही उठता है कि कौन संभालेगा इतनी बड़ी जिम्मेदारी। सुश्री पद्मा, नेत्रवती, गिरिजा, राजेश्वरी, सुमति मालती, चंपकावती और सुश्री नागरत्ना सहित जो मातृश्री (पूर्णकालिक शिक्षिकाएं) यहां 365 दिन, 24 घंटे रहकर अद्भुत परिश्रम और सेवा-साधना कर रही हैं, ऐसे समर्पण के बिना सिर्फ भूमि-भवन से क्या गुरुकुल चलाए जा सकते हैं?

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“भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा देश के अनेक हिस्सों में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं। वह परंपरा जहां शिक्षा और संस्कार साधना के लिए कोई आर्थिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती। यूरोपीय शिक्षा पद्धति की नकल करते हुए वैदिक शिक्षा प्रणाली के अनमोल सर्वांगसुन्दर वृक्ष को जिस प्रकार षडंत्र पूर्वक ध्वस्त किया गया, उसी के दुष्परिणाम हम निठारी काण्ड, किडनी काण्ड, पाटण में छात्राओं के शोषण, दिल्ली के महाविद्यालयों में अध्यापिकाओं से छेड़छाड़, स्कूलों- अस्पतालों तक में बच्चियों से बलात्कार, किशोरवय उम्र में हिंसक मनोवृत्ति प्रकट करने वाली भीषण वारदातों के रूप में घटित होते देखते हैं। वर्तमान विकृत शिक्षा प्रणाली का विकल्प भारत की श्रेष्ठ गुरुकुल परंपरा है, इसके पुनरुज्जीवन में देश का पुनरुज्जीवन है।” यह कहना है वेद विज्ञान गुरुकुल, चेननहल्ली के प्रमुख मार्गदर्शक आचार्य पं. रामचन्द्र भट्ट का। श्री भट्ट से हम चेननहल्ली वेद विज्ञान गुरुकुल में मिले थे। चेन्ननहल्ली गुरुकुल में छात्रों के लिए 11वीं श्रेणी से परास्नातक श्रेणी तक की वेद-विज्ञान शिक्षा नि:शुल्क दी जाती है। यहां सिर्फ शिक्षा ही नहीं दी जाती है वरन् सामाजिक परिवर्तन का महान संदेश भी यहां से निकलकर सर्वत्र सुगन्धि फैला रहा है। आस-पास के ग्रामों में ग्राम-सेवा के अनेक कार्य ये गुरुकुल संचालित कर रहा है। शिक्षा की गुणवत्ता ऐसी कि यहां के छात्र स्नातक-परास्नातक की उपाधि के लिए तिरुपति विश्वविद्यालय, स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान (डीम्ड यूनिवर्सिटी) से योग, वेदान्त, मनोचिकित्सा और योग, वेद-विज्ञान आदि विषयों में बी.एससी., एम.एससी. की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करते हैं। यद्यपि वे पढ़ते गुरुकुल में हैं किन्तु निजी परीक्षार्थी के रूप में इन परीक्षाओं में शामिल होते हैं। आज दर्जनों छात्र वेद, वेदांत, योग और मनोविज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों में यहां रहकर विभिन्न विद्वानों के मार्गदर्शन में अनेक विश्वविद्यालयों से पीएच.डी. कर रहे हैं। इसी गुरुकुल की पूर्व श्रेणी श्रृंगेरी के पास हरिहरपुर ग्राम में स्थापित है, जिसे प्रबोधिनी गुरुकुल कहा जाता है। यहां छात्रों को 5वीं श्रेणी से 10वीं श्रेणी तक की शिक्षा नि:शुल्क दी जाती है।

चेननहल्ली बंगलुरु शहर सीमा के करीब बसा गांव है जबकि हरिहरपुर जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य के पाद स्पर्श से पवित्र पुण्य क्षेत्र है जो शारदा पीठ, श्रृंगेरी से 60 कि.मी. दूर पड़ता है। ये सभी गुरुकुल अपने पूरे रूप में समाज आश्रित हैं, ग्राम-आश्रित हैं। यहां अध्ययनरत सभी छात्रों को शिक्षा-भोजन-आवास नि:शुल्क मिलता है। यदि उनकी वेद विद्या में, इसके अध्ययन और प्रसार में रुचि है तो बिना किसी जाति-बंधन और पूर्व की औपचारिक शिक्षा के वे इनमें एक निश्चित वय और चरण में प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं। हरिहरपुर में 9-10 वर्ष की उम्र के बालक प्रवेश पाते हैं। उन्हें आधुनिक शिक्षा पद्धति की पांचवी कक्षा में प्रवेश मिलता है और इस प्रकार से छह वर्ष तक उन्हें गुरुकुल में अपना कठोरता पूर्वक रहकर शिक्षाभ्यास करना होता है। तीनों ही विद्यालयों में पंचायतन पूजा भी शिक्षा का एक अंग है, जहां वे एक साथ सस्वर मंत्रों से शिव, विष्णु, गणपति, देवी दुर्गा और भगवान सूर्य की आराधना-उपासना नित्य करते हैं। अति प्रात: से जो शिक्षा सत्र प्रारंभ होता है रात्रि 9 बजे तक लगातार चलता है। विविध श्रेणियों में विद्यार्थी अपने आचार्यों और हरी-भरी प्रकृति के स्नेहिल सान्निध्य में परीक्षा प्रणाली के भूत से मुक्त होकर वेद मंत्रों, मंत्र रहस्यों का अनुसंधान करते हुए आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। चेननहल्ली में विद्यार्थियों के ध्यान के लिए एक विशेष ध्यान कक्ष “सरस्वती शिखिरणी” बनाया गया है। इस कक्ष की छत पिरामिड जैसी है, इस छत के नीचे कई सप्ताह तक फल आदि रखे रहने पर भी खराब नहीं होते। इसमें बैठते ही छात्र ध्यान की अनन्त गहराई और आनन्द से सराबोर हो उठते हैं। यहां वेद मंत्रों का चमत्कार प्रत्यक्ष दिख रहा है। अनेक ऐसे वृक्ष जिन्हें लोगों ने कितने ही वर्षों से “निष्फल” घोषित कर रखा था, वेदमंत्रों के स्वर गुंजायमान होने के बाद वे फलदार हो गए।

तीनों ही गुरुकुलों के पास कृषि कार्य के लिए पर्याप्त भूमि है। प्रबोधिनी गुरुकुल, हरिहरपुर के पास 10 एकड़ से अधिक कृषियोग्य भूमि है, जहां जैविक कृषि के सुन्दर प्रयोग सफलतापूर्वक चल रहे हैं। चिक- मंगलूर जिले के सुप्रसिद्ध जैव कृषि विशेषज्ञ के.टी. नागेन्द्र राव की गुरुकुल में सक्रियता उल्लेखनीय है। वे इस गुरुकुल के ट्रस्ट में भी शामिल हैं। गुरुकुल में प्रत्यक्ष खेती का काम सिद्धप्पा करते हैं और वे इस कार्य के लिए सपरिवार यहां रहते हैं। गुरुकुल में जैव कृषि के सफल प्रयोगों ने आस-पास के ग्रामों के कृषकों को भी जैव कृषि के लिए प्रेरित किया। शिवण्णाचार्य ने इस लोक जागरण की कमान संभाली। गुरुकुल के प्रयासों से पास के दो ग्रामों में पूरी तरह से जैविक कृषि होने लगी है। इन गांवों में उत्पादन भी जबर्दस्त बढ़ा। कर्नाटक सरकार ने इन दोनों ग्रामों को आदर्श कृषि ग्राम के रूप में मान्यता दी है।

आस-पास के सैंकड़ों ग्रामों के निवासी गुरुकुल के पवित्र कार्य में सहयोग कर रहे हैं। कुछ कार्यकर्ता जो पूर्णकालिक हैं, दिन-रात इन ग्रामों में प्रवास कर एक तो लोक जागरण की अलख जगाते हैं, दूसरे गुरुकुल के लिए ग्रामों से अन्न और धन का संग्रह भी करते हैं। गुरुकुल की इस कार्यप्रणाली को देखकर अनेक धनाढ लोगों का भी सहज-सहयोग प्राप्त होता है, उन लोगों का सहयोग, जो चाहते हैं कि गुरुकुल प्रणाली चलती रहे ताकि “भारत” जिन्दा रहे। हरिहरपुर गुरुकुल में हमें उडुपी के कुन्दापुर तालुका के कोटेश्वर गांव निवासी सुदर्शन पई परिवार सहित मिले। सुदर्शन पई उडुपी में ही रहते हैं, प्रतिष्ठित चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं। हमने पूछा- यहां क्यों आए? उनका जो उत्तर मिला, वह आश्चर्यकारी था- मेरा बेटा सुहास पई यहीं गुरुकुल में पढ़ता है। मैंने पूछा- आप सी.ए. हैं, गुरुकुल में बेटे को पढ़ाने का कारण? उनका उत्तर था, “मुझे अपने बेटे को अपनी मिट्टी से जोड़े रखना है। इसे तो मैं कितने ही महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा दूं पर जो संस्कार यहां मिल रहे हैं वे अनमोल हैं। यह घर जाता है तो सुबह उठकर वेदमंत्र बोलता है। कहां मिलेंगे ये संस्कार? बड़ा होगा तो जिस विषय में उच्च शिक्षा लेना चाहेगा, ये उसकी इच्छा, पर मैं चाहता हूं कि आज के दूषित वातावरण की आंधी से बचा रहे और युवावस्था में इसका ठीक प्रकार से सामना करे। इसकी शिक्षा समाज के खर्च से पूरी होगी, इससे समाज के प्रति इसके मन में हमेशा ऋण-भाव बना रहेगा। गुरुकुल मुझसे एक पैसा नहीं लेता, इसलिए ऐसे गुरुकुल बिना किसी बाधा के चलते रहें, ये देखना सहज मेरी भी जिम्मेदारी बनती है।” चेननहल्ली में गुरुकुल के प्रबंधन से जुड़े आचार्य लक्ष्मी नरसिंह ने बताया- “यहां ब्राहृण और अनुसूचित जाति के बालक, कृष्ण और सुदामा एक साथ रहकर पढ़ते-खेलते-सोते हैं। समाज इस गुरुकुल प्रणाली के संचालन के लिए आगे बढ़कर सहयोग दे रहा है। जो जिस रूप में देता है, हम स्वीकार करते हैं पर यहां पढ़ने वाले बच्चों के अविभावकों से हम कभी कोई शुल्क नहीं लेते। हां, इन बच्चों से दीक्षांत के समय एक वचन जरूर लेते हैं- जिस भावना से समाज ने तुम्हारी चिंता की, उन संस्कारों- उस भावना को समाजहित में तुम भी जीवन भर धारण रखना। जैसे भी हो सके- समाज की सेवा करना, भारत जननी का मान बढ़ाना।”वैदिक परंपरा के ये गुरुकुल …सतयुग लाने की पहल

कर्नाटक के मंगलुरु से 40-50 कि.मी. दूर है विट्टला और विट्टला से कोई चार-पांच कि.मी. दूर है मुरकजे। इसी गांव में नारियल और सुपारी के घने उपवन के बीच परमेश्वरी अम्मा की छोटी सी कुटिया में मानो “सतयुग” वापस लौट आया है। परमेश्वरी अम्मा अब नहीं रहीं लेकिन उनके आंगन में जिस प्रकार वैदिक ऋचाएं गूंज रही हैं, वह कालचक्र के इस महान निर्णायक मोड़ को स्वत: परिभाषित कर रही हैं। अभी कुछ ही वर्ष पहले की बात है, देश में विवाद का विषय बन गया था कि स्त्रियों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं है। यह विवाद जब उफान पर था, उसके पूर्व ही मुरकजे ग्राम ने इस रूढ़ि को धता बता दिया था। आज एक-दो नहीं सैकड़ों की संख्या में बालिकाएं परमेश्वरी अम्मा के आनन्द आंगन में वेद पाठ कर रही हैं।

परमेश्वरी अम्मा मुरकजे गांव की रहने वाली थीं। 1997 में उनका शरीरांत हुआ किन्तु इसके पूर्व अपने भतीजे वेंकटरमण भट्ट की प्रेरणा से उन्होंने अपनी सारी संपत्ति, सैकड़ों एकड़ जमीन कन्याओं के गुरुकुल के लिए दान कर दी। कन्याओं को वेद शिक्षा देने वाले इस मैत्रेयी गुरुकुल की स्थापना श्री कृष्णप्पा, श्री सीताराम केदिलाय, श्री सूर्यनारायण राव प्रभृति वरिष्ठ प्रचारकों की प्रेरणा रा.स्व. संघ के स्वयंसेवकों के प्रयासों एवं 1994 में बंगलुरु में हुई। 1999 में मंगलुरु स्थित परमेश्वरी अम्मा के घर, उससे जुड़ी सैकड़ों एकड़ जमीन में मैत्रेयी गुरुकुल स्थानांतरित हो गया। आज यहां 101 कन्याएं हैं जो वेद शिक्षा के साथ आधुनिक विषयों की शिक्षा भी ग्रहण कर रही हैं। छह वर्षीय पाठक्रम, किन्तु भोजन, आवास एवं शिक्षा का कोई शुल्क नहीं। योग्यता, प्रतिभा और रुचि के मूल्यांकन पर आधारित चयन प्रक्रिया और पूरे छह साल तक कठोर दिनचर्या के अन्तर्गत गुरुकुल में निवास। आधुनिक पद्धति की पांचवीं कक्षा से यहां कन्याओं का प्रवेश होता है और दसवीं श्रेणी तक की शिक्षा प्राप्त कर वे अपनी वेद और आधुनिक विषयों की शिक्षा पूर्ण कर लेती हैं। इन छह वर्षों में इन्हें कोई परीक्षा नहीं देनी होती। वार्षिक मूल्यांकन हेतु यहां वैदिक पद्धति का अनुसरण किया जाता है जिसमें कोई भी किसी विषय में कम अंक के कारण अनुत्तीर्ण नहीं किया जाता। मातृश्री मीनाक्षी इसका कारण बताते हुए स्पष्ट करती हैं- “निसर्ग में तो सभी कुछ न कुछ गुण लेकर ही आते हैं, फिर कोई उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण कैसे हो सकता है। विद्यालय प्रतिभा निखारें, बस! ईश्वर की अनमोल कृतियां अपना भविष्य स्वयं तय कर लेंगी।”

लगभग एक दर्जन मातृश्री (शिक्षिकाएं) यहां रहकर प्रमुख मातृश्री सावित्री देवी के सुयोग्य संचालन में इन कन्याओं को पंचमुखी शिक्षा पद्धति के अनुसार विविध विषयों का शिक्षण देती हैं। पांचवीं कक्षा को यहां श्रद्धा कहते हैं और दसवीं तक क्रमश: मेधा, प्रज्ञा, प्रतिभा, धृति: और धी: नाम से श्रेणी-कक्षाओं का सुन्दर नामकरण किया गया है। वेद शिक्षा के अन्तर्गत यहां ऋग्वेद के चयनित सूक्तों, तैत्तरीय उपनिषद सहित अन्य संकलित ऋचाओं, यज्ञ विधियों, शांतिपाठ, नित्य पूजा कर्म के साथ श्रीमद्भगवद्गीता, रामायण, महाभारत के अनेक अंशों का शिक्षण दिया जाता है। सभी कन्याएं श्रद्धा श्रेणी के स्तर पर ही स्वर-लय के साथ वेदमंत्रों का पठन करने लगती हैं। इसके अतिरिक्त गणित, इतिहास, भूगोल, अंग्रेजी, कन्नड़, संस्कृत, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, योग शिक्षा, कृषि-कर्म के साथ कम्प्यूटर, स्वरुचि के अनुसार पेंटिंग, नृत्य-कला, नाट शिक्षण, संगीत आदि का शिक्षण भी प्रत्येक श्रेणी के अनुसार यहां दिया जा रहा है। आधुनिक विज्ञान के शिक्षण के लिए यहां कणाद नामक सुन्दर प्रयोगशाला है, तो भारद्वाज नामक कम्प्यूटर रूम है, जिसका संचालन वरिष्ठ श्रेणी की कन्याएं करती हैं। जिज्ञासा नामक पुस्तकालय, निरामया नामक चिकित्सा कक्ष और कन्याओं के निवास तथा अध्ययन के लिए यहां विश्ववारा, गार्गी, आराधना, सुनैना, चुड़ाला आदि अनेक प्रकोष्ठ हैं। अन्नपूर्णा नामक भोजनालय और सुन्दर गोशाला भी यहां है। पूरे परिसर की देखभाल करने वाले 5 गृहस्थ परिवार भी यहां रहते हैं।

प्रतिदिन प्रात:काल 5 बजे से गुरुकुल की दिनचर्या प्रारंभ हो जाती है, कक्षाओं का प्रारंभ सामूहिक वेदपाठ, श्रीमद्भगवद् गीता-पाठ से होता है, उसके पूर्व योग-शिक्षण और योगाभ्यास सभी के लिए अनिवार्य है। इसके बाद पंचायतन पूजा और फिर जलपान और भोजन अवकाश के साथ शाम 4.30 बजे तक शिक्षण-कक्षाएं। परिसर के मध्य में भारत माता की अत्यंत सुन्दर प्रतिमा, नित्य भारत माता की आराधना और रा.से. समिति की शाखा भी इस गुरुकुल की दिनचर्या का हिस्सा है। शाम के समय बागवानी और कृषि कार्य में सभी कन्याएं जुटती हैं। जिसकी जैसी रुचि, वो वैसे कार्य में सक्रिय हो जाती है। कहीं फूलों की क्यारियां, कहीं सब्जी-तरकारी तो कहीं नारियल, सुपारी, वनिला, केले व अन्य फलदार वृक्षों की सेवा, गोमाता की सेवा, गोशाला की भी देखभाल और इन सभी कार्यों में वेंकटरमण सपत्नीक कन्याओं का मार्गदर्शन करते हैं। सभी मातृश्री भी अपनी-अपनी श्रेणी के साथ निरन्तर किसी न किसी युक्ति से कन्याओं का शिक्षण करती हैं।

श्रृंगेरी की आश्रिता, उडुपी की रक्षिता, बागलकोट की सहना, शिवमोगा की वत्सला, बंगलुरु की अपर्णा, हासन की स्वाती से हम मिले, ये सभी यहां की वरिष्ठ छात्राएं हैं। सभी को यहां रहने-पढ़ने का आनन्द भाता है, वेद मंत्रों का सस्वर पाठ इनके मुंह से सुनने का आनन्द ऐसा कि तुरंत ध्यान लग जाए। ग्रीष्म अवकाश में सभी कन्याओं के माता-पिता इन्हें घर ले जाते हैं लेकिन गुरुपूर्णिमा के पूर्व सभी को वापस आना होता है। बीच-बीच में अभिभावक इन बच्चों का हाल-चाल लेने आते रहते हैं।

श्रृंगेरी में रहकर संगीत साधना में जुटी आश्रिता ने हाल ही में मैत्रेयी गुरुकुल से अपनी शिक्षा पूर्ण की। उसने बताया, “मैत्रेयी गुरुकुल ने जीवन जीने की कला सिखाई है, जीवन का उद्देश्य भी बताया है। संगीत और कन्नड़ साहित्य की साधना करने की मेरी योजना है। दीक्षान्त में समाज के लिए कुछ न कुछ करने का जो वचन मैंने दिया, उसे निभाऊ‚ंगी।” कर्नाटक के बीजापुर जिले के इंडी तालुके का एक छोटा सा गांव है- गुदूवाना। यहां के लिंगायत समुदाय की कन्या ज्योति कोई दो साल पहले गुरुकुल से पढ़ाई पूरी कर अपने गांव पहुंची। गांव में उसने अपने माता-पिता को विधिपूर्वक पूजा-पाठ करना सिखाया, घर में उसके बाबा, जो उसके गुरुकुल जाने से कभी नाराज थे, घर में वेद मंत्रों का नित्य पाठ देख भावविह्वल हो उठे, परिवार में संस्कृत भाषा के साथ सुसंस्कृत वातावरण निर्मित हुआ। पूरा गांव मानो ज्योति की ज्योति से जगमगा उठा। गुरुकुल की यह प्रेरणा कि “घर में बैठने के लिए ये शिक्षा नहीं ली,” को पूर्ण करते हुए ज्योति ने आस-पास की अन्य छोटी बालिकाओं को सुशिक्षित करने के प्रयास शुरू किए हैं। कुछ ऐसा ही शुरू किया चित्रदुर्ग जिले के पास मडकालमोरु के कोंडलाहल्ली गांव की एक कृषक कन्या शकुन्तला ने। शकुन्तला वेद और आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर घर पहुंची तो लोगों को लगा कि अब ये गांव में क्या करेगी। लेकिन नहीं, शकुन्तला ने अपने पिता को खेती के कार्य में सहयोग देना प्रारंभ किया। गुरुकुल में जैविक खेती का अभ्यास जो उसने किया था, अब ये प्रयोग उसकी प्रेरणा से घर वालों ने प्रारंभ किया। घर में नित्य यज्ञ धूम्र भी उठने लगा। पास-पड़ोस की स्कूल न जाने वाली कन्याओं को नियमित पढ़ाने का काम भी शकुंतला ने प्रारंभ कर दिया।

गुरुकुल में ही पढ़ी-लिखी वैशाली का विवाह चिकमंगलूर के होरानाडु गांव के एक सुप्रसिद्ध धर्माधिकारी के पुत्र से हुआ। अन्नपूर्णा देवी शक्ति स्थल के उक्त धर्माधिकारी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब उन्होंने देखा कि उनकी बहू वेदमंत्रों का विधिपूर्वक पाठ करती है। घर के सारे काम भी निपटाती है और अंग्रेजी समाचार पत्र पढ़कर घर के अन्य सदस्यों को देश-विदेश की जानकारी भी देती है। सुसंस्कारित वातावरण को और अधिक सुसंस्कारमय बनाने वाली बहू धर्माधिकारी परिवार को मिली, इससे बढ़कर आनन्ददायक और क्या हो सकता है।

मैसूर में एक महाविद्यालय में ज्योतिष शास्त्र पढ़ाने वाली निवेदिता भी जब गुरुकुल में आई थी तब उसे कल्पना नहीं थी कि एक दिन उसकी गिनती एक विदुषी नारी के रूप में होगी। गुरुकुल से उसे जो शिक्षा मिली, उसका उपयोग करते हुए जहां उसने स्नातक स्तर पर ज्योतिष-संस्कृत- व्याकरण को अपने अध्ययन का विषय बनाया वहीं कम्प्यूटर तथा अंग्रेजी के ज्ञान को भी और निखारा।

यहां से पढ़कर निकलने वाली बालिकाएं न सिर्फ संस्कृत-ज्योतिष -वेद- धर्मशास्त्रों वरन् इंजीनियरिंग, एयरोनोटिक इंजीनियरिंग, पॉलिटेक्नीक, आई.टी.आई., आयुर्वेद, शिक्षा शास्त्र, संगीत, हिन्दी, अंग्रेजी एवं कन्नड़ साहित्य में उच्च अध्ययन कर रही हैं। मैत्रेयी गुरुकुल द्वारा आस-पास के ग्रामों में बच्चों को शिक्षा एवं संस्कार देने के लिए बाल-गोकुलम के आयोजन बहुत लोकप्रिय हुए हैं। गुरुकुल ने अपनी स्थापना के 12 वर्ष पूर्ण होने पर भव्य उत्सव का आयोजन किया जिसमें हजारों की संख्या में स्थानीय महिलाओं ने हिस्सा लिया।

आज कर्नाटक में इस गुरुकुल की इतनी ख्याति हो चली है कि लोग दूर-दूर से अपनी कन्याओं को गुरुकुल में दाखिल कराने के लिए सहज चले आते हैं किन्तु गुरुकुल की सीमित क्षमता के कारण सभी को स्थान मिल पाना संभव नहीं होता। ऐसे कितने ही अभिभावक अपने गांवों-क्षेत्र में भूमि-आवास भी उपलब्ध कराने को तैयार हैं लेकिन सवाल यही उठता है कि कौन संभालेगा इतनी बड़ी जिम्मेदारी। सुश्री पद्मा, नेत्रवती, गिरिजा, राजेश्वरी, सुमति मालती, चंपकावती और सुश्री नागरत्ना सहित जो मातृश्री (पूर्णकालिक शिक्षिकाएं) यहां 365 दिन, 24 घंटे रहकर अद्भुत परिश्रम और सेवा-साधना कर रही हैं, ऐसे समर्पण के बिना सिर्फ भूमि-भवन से क्या गुरुकुल चलाए जा सकते हैं?

“भारत की प्राचीन गुरुकुल परंपरा देश के अनेक हिस्सों में आज भी जीवंत रूप में विद्यमान हैं। वह परंपरा जहां शिक्षा और संस्कार साधना के लिए कोई आर्थिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती। यूरोपीय शिक्षा पद्धति की नकल करते हुए वैदिक शिक्षा प्रणाली के अनमोल सर्वांगसुन्दर वृक्ष को जिस प्रकार षडंत्र पूर्वक ध्वस्त किया गया, उसी के दुष्परिणाम हम निठारी काण्ड, किडनी काण्ड, पाटण में छात्राओं के शोषण, दिल्ली के महाविद्यालयों में अध्यापिकाओं से छेड़छाड़, स्कूलों- अस्पतालों तक में बच्चियों से बलात्कार, किशोरवय उम्र में हिंसक मनोवृत्ति प्रकट करने वाली भीषण वारदातों के रूप में घटित होते देखते हैं। वर्तमान विकृत शिक्षा प्रणाली का विकल्प भारत की श्रेष्ठ गुरुकुल परंपरा है, इसके पुनरुज्जीवन में देश का पुनरुज्जीवन है।” यह कहना है वेद विज्ञान गुरुकुल, चेननहल्ली के प्रमुख मार्गदर्शक आचार्य पं. रामचन्द्र भट्ट का। श्री भट्ट से हम चेननहल्ली वेद विज्ञान गुरुकुल में मिले थे। चेन्ननहल्ली गुरुकुल में छात्रों के लिए 11वीं श्रेणी से परास्नातक श्रेणी तक की वेद-विज्ञान शिक्षा नि:शुल्क दी जाती है। यहां सिर्फ शिक्षा ही नहीं दी जाती है वरन् सामाजिक परिवर्तन का महान संदेश भी यहां से निकलकर सर्वत्र सुगन्धि फैला रहा है। आस-पास के ग्रामों में ग्राम-सेवा के अनेक कार्य ये गुरुकुल संचालित कर रहा है। शिक्षा की गुणवत्ता ऐसी कि यहां के छात्र स्नातक-परास्नातक की उपाधि के लिए तिरुपति विश्वविद्यालय, स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान (डीम्ड यूनिवर्सिटी) से योग, वेदान्त, मनोचिकित्सा और योग, वेद-विज्ञान आदि विषयों में बी.एससी., एम.एससी. की उपाधि प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करते हैं। यद्यपि वे पढ़ते गुरुकुल में हैं किन्तु निजी परीक्षार्थी के रूप में इन परीक्षाओं में शामिल होते हैं। आज दर्जनों छात्र वेद, वेदांत, योग और मनोविज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों में यहां रहकर विभिन्न विद्वानों के मार्गदर्शन में अनेक विश्वविद्यालयों से पीएच.डी. कर रहे हैं। इसी गुरुकुल की पूर्व श्रेणी श्रृंगेरी के पास हरिहरपुर ग्राम में स्थापित है, जिसे प्रबोधिनी गुरुकुल कहा जाता है। यहां छात्रों को 5वीं श्रेणी से 10वीं श्रेणी तक की शिक्षा नि:शुल्क दी जाती है।

चेननहल्ली बंगलुरु शहर सीमा के करीब बसा गांव है जबकि हरिहरपुर जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य के पाद स्पर्श से पवित्र पुण्य क्षेत्र है जो शारदा पीठ, श्रृंगेरी से 60 कि.मी. दूर पड़ता है। ये सभी गुरुकुल अपने पूरे रूप में समाज आश्रित हैं, ग्राम-आश्रित हैं। यहां अध्ययनरत सभी छात्रों को शिक्षा-भोजन-आवास नि:शुल्क मिलता है। यदि उनकी वेद विद्या में, इसके अध्ययन और प्रसार में रुचि है तो बिना किसी जाति-बंधन और पूर्व की औपचारिक शिक्षा के वे इनमें एक निश्चित वय और चरण में प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं। हरिहरपुर में 9-10 वर्ष की उम्र के बालक प्रवेश पाते हैं। उन्हें आधुनिक शिक्षा पद्धति की पांचवी कक्षा में प्रवेश मिलता है और इस प्रकार से छह वर्ष तक उन्हें गुरुकुल में अपना कठोरता पूर्वक रहकर शिक्षाभ्यास करना होता है। तीनों ही विद्यालयों में पंचायतन पूजा भी शिक्षा का एक अंग है, जहां वे एक साथ सस्वर मंत्रों से शिव, विष्णु, गणपति, देवी दुर्गा और भगवान सूर्य की आराधना-उपासना नित्य करते हैं। अति प्रात: से जो शिक्षा सत्र प्रारंभ होता है रात्रि 9 बजे तक लगातार चलता है। विविध श्रेणियों में विद्यार्थी अपने आचार्यों और हरी-भरी प्रकृति के स्नेहिल सान्निध्य में परीक्षा प्रणाली के भूत से मुक्त होकर वेद मंत्रों, मंत्र रहस्यों का अनुसंधान करते हुए आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। चेननहल्ली में विद्यार्थियों के ध्यान के लिए एक विशेष ध्यान कक्ष “सरस्वती शिखिरणी” बनाया गया है। इस कक्ष की छत पिरामिड जैसी है, इस छत के नीचे कई सप्ताह तक फल आदि रखे रहने पर भी खराब नहीं होते। इसमें बैठते ही छात्र ध्यान की अनन्त गहराई और आनन्द से सराबोर हो उठते हैं। यहां वेद मंत्रों का चमत्कार प्रत्यक्ष दिख रहा है। अनेक ऐसे वृक्ष जिन्हें लोगों ने कितने ही वर्षों से “निष्फल” घोषित कर रखा था, वेदमंत्रों के स्वर गुंजायमान होने के बाद वे फलदार हो गए।

तीनों ही गुरुकुलों के पास कृषि कार्य के लिए पर्याप्त भूमि है। प्रबोधिनी गुरुकुल, हरिहरपुर के पास 10 एकड़ से अधिक कृषियोग्य भूमि है, जहां जैविक कृषि के सुन्दर प्रयोग सफलतापूर्वक चल रहे हैं। चिक- मंगलूर जिले के सुप्रसिद्ध जैव कृषि विशेषज्ञ के.टी. नागेन्द्र राव की गुरुकुल में सक्रियता उल्लेखनीय है। वे इस गुरुकुल के ट्रस्ट में भी शामिल हैं। गुरुकुल में प्रत्यक्ष खेती का काम सिद्धप्पा करते हैं और वे इस कार्य के लिए सपरिवार यहां रहते हैं। गुरुकुल में जैव कृषि के सफल प्रयोगों ने आस-पास के ग्रामों के कृषकों को भी जैव कृषि के लिए प्रेरित किया। शिवण्णाचार्य ने इस लोक जागरण की कमान संभाली। गुरुकुल के प्रयासों से पास के दो ग्रामों में पूरी तरह से जैविक कृषि होने लगी है। इन गांवों में उत्पादन भी जबर्दस्त बढ़ा। कर्नाटक सरकार ने इन दोनों ग्रामों को आदर्श कृषि ग्राम के रूप में मान्यता दी है।

आस-पास के सैंकड़ों ग्रामों के निवासी गुरुकुल के पवित्र कार्य में सहयोग कर रहे हैं। कुछ कार्यकर्ता जो पूर्णकालिक हैं, दिन-रात इन ग्रामों में प्रवास कर एक तो लोक जागरण की अलख जगाते हैं, दूसरे गुरुकुल के लिए ग्रामों से अन्न और धन का संग्रह भी करते हैं। गुरुकुल की इस कार्यप्रणाली को देखकर अनेक धनाढ लोगों का भी सहज-सहयोग प्राप्त होता है, उन लोगों का सहयोग, जो चाहते हैं कि गुरुकुल प्रणाली चलती रहे ताकि “भारत” जिन्दा रहे। हरिहरपुर गुरुकुल में हमें उडुपी के कुन्दापुर तालुका के कोटेश्वर गांव निवासी सुदर्शन पई परिवार सहित मिले। सुदर्शन पई उडुपी में ही रहते हैं, प्रतिष्ठित चार्टर्ड एकाउंटेंट हैं। हमने पूछा- यहां क्यों आए? उनका जो उत्तर मिला, वह आश्चर्यकारी था- मेरा बेटा सुहास पई यहीं गुरुकुल में पढ़ता है। मैंने पूछा- आप सी.ए. हैं, गुरुकुल में बेटे को पढ़ाने का कारण? उनका उत्तर था, “मुझे अपने बेटे को अपनी मिट्टी से जोड़े रखना है। इसे तो मैं कितने ही महंगे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा दूं पर जो संस्कार यहां मिल रहे हैं वे अनमोल हैं। यह घर जाता है तो सुबह उठकर वेदमंत्र बोलता है। कहां मिलेंगे ये संस्कार? बड़ा होगा तो जिस विषय में उच्च शिक्षा लेना चाहेगा, ये उसकी इच्छा, पर मैं चाहता हूं कि आज के दूषित वातावरण की आंधी से बचा रहे और युवावस्था में इसका ठीक प्रकार से सामना करे। इसकी शिक्षा समाज के खर्च से पूरी होगी, इससे समाज के प्रति इसके मन में हमेशा ऋण-भाव बना रहेगा। गुरुकुल मुझसे एक पैसा नहीं लेता, इसलिए ऐसे गुरुकुल बिना किसी बाधा के चलते रहें, ये देखना सहज मेरी भी जिम्मेदारी बनती है।” चेननहल्ली में गुरुकुल के प्रबंधन से जुड़े आचार्य लक्ष्मी नरसिंह ने बताया- “यहां ब्राहृण और अनुसूचित जाति के बालक, कृष्ण और सुदामा एक साथ रहकर पढ़ते-खेलते-सोते हैं। समाज इस गुरुकुल प्रणाली के संचालन के लिए आगे बढ़कर सहयोग दे रहा है। जो जिस रूप में देता है, हम स्वीकार करते हैं पर यहां पढ़ने वाले बच्चों के अविभावकों से हम कभी कोई शुल्क नहीं लेते। हां, इन बच्चों से दीक्षांत के समय एक वचन जरूर लेते हैं- जिस भावना से समाज ने तुम्हारी चिंता की, उन संस्कारों- उस भावना को समाजहित में तुम भी जीवन भर धारण रखना। जैसे भी हो सके- समाज की सेवा करना, भारत जननी का मान बढ़ाना।”

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