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मण्डन मिश्र


मण्डन मिश्र

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श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ के संस्थापक डॉ मंडन मिश्र के बारे में अन्यत्र देखें।


मंडन मिश्र, पूर्व मीमांसा दर्शन के बड़े प्रसिद्ध आचार्य थे। कुमारिल भट्ट के बाद इन्हीं को प्रमाण माना जाता है। अद्वैत वेदांत दर्शन में भी इनके मत का आदर है। ये भर्तृहरि के बाद कुमारिल के अंतिम समय में तथा आदि शंकराचार्य के समकालीन थे।

मीमांसा और वेदांत दोनों दर्शनों पर इन्होंने मौलिक ग्रंथ लिखे। मीमांसानुक्रमाणिका, भावनाविवेक और विधिविवेक – ये तीन ग्रंथ मीमांसा पर; शब्द दर्शन पर स्फोटसिद्धि, प्रमाणाशास्त्र पर विवेक तथा अद्वैत वेदांत पर ब्रह्मसिद्धि – ये इनके ग्रंथ हैं। शालिकनाथ तथा जयंत भट्ट ने वेदांत का खंडन करते समय मंडन का ही उल्लेख किया। शांकर भाष्य के सुप्रसिद्ध व्याख्याता, भामती के निर्मातावाचस्पति मिश्र ने मंडन की ब्रह्मसिद्धि को ध्यान में रखकर अपनी कृति लिखी।

मंडन और सुरेश्वर[संपादित करें]

एक परंपरा के अनुसार मंडन कुमारिल भट्ट के शिष्य थे। यही बाद में शंकराचार्य द्वारा शास्त्रार्थ में पराजित होकर संन्यासी हो गए और उनका नाम सुरेश्वराचार्य पड़ा। मंडन और सुरेश्वर एक ही हैं या अलग-अलग – इसको लेकर बड़ा विवाद हुआ है। अधिकांश प्रमाण दोनों की भिन्नता के पक्ष में ही मिलते हैं। मंडन ने शब्दाद्वैत का समर्थन किया है, पर सुरेश्वर इसके बारे में मौन हैं। मंडन ने अद्वैतप्रस्थान में अन्यथाख्यातिवाद का बहुत हद तक समर्थन किया, पर सुरेश्वर इसका खंडन करते हैं। मंडनके अनुसार जीव अविद्या का आश्रय है, सुरेश्वर ब्रह्म को ही अविद्या का आश्रय और विष मानते हैं। इसी मतभेद के आधार पर अद्वैत वेदांत के दो प्रस्थान चल पड़े। भामती प्रस्थान मंडन का अनुयायी बना, विवरण प्रस्थान सुरेश्वर के सिद्धांतों पर चला। सुरेश्वर शुद्धज्ञान को मोक्ष का मार्ग मानते हैं पर मंडन के अनुसार वेदांत के श्रवणमात्र से मोक्ष नहीं मिलता, जब तक अग्निहोत्र आदि कर्म ज्ञान के सहकारी न हो यही नहीं, किसी प्राचीन प्रामाणिक ग्रंथ में मंडन और सुरेश्वर को एक नहीं माना गया है। मंडन मिश्र कुमारिल भट्ट के शिष्य थे, इस बात का कोई अकाट्य प्रमाण नहीँ मिलता। यह बात केवल ‘शंकर-दिग्विजय’ के आधार पर कही जाती है, जो कि एक नितान्त अप्रामाणिक कथा-पुस्तक है। मंडन और सुरेश्वर की भिन्नता के ही जब अधिकांश प्रमाण मिलते हैं तो यह कहा जाना किसी भी तरह से उचित नहीँ है कि मंडन ही शास्त्रार्थ में पराजित होकर सुरेश्वर बने थे। दरअसल इन दोनों महापुरुषों (मंडन और शंकर) के बीच शास्त्रार्थ होने की बात ही पूरी तरह काल्पनिक और रणनीतिक है, जो मध्यकाल में शंकर के मठ द्वारा प्रचारित किया गया। शब्दाद्वैत, अन्यथाख्यातिवाद, अविद्या, जीव, ब्रह्म आदि के बारे में सुरेश्वर के जो भी विचार हैं, वे शत-प्रतिशत शंकराचार्य के अनुगामी हैं। गुरु के चरणों की प्रीति ही उनका परम लक्ष्य है। वे असहिष्णुता की हद तक मंडन का विरोध करते हैं और उन्हें अलग प्रस्थान का अद्वैतवेदान्ती बताते हैं। फिर, वही सुरेश्वर स्वयं मंडन कैसे हो सकते हैं?’विवरण-प्रस्थान’ के प्रवर्तक सुरेश्वर नहीं, ‘विवरण-कार’ हैं, जबकि ‘भामती-प्रस्थान’पूरी तरह मंडन का अनुगमन करता है। जब किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में मंडन और सुरेश्वर को एक नही माना गया है, तब हमारे विद्वान-गण क्यों शास्त्रार्थ के मिथक का बोझ सर पर उठाए युग-युग से परेशान हो रहे हैं। अब भी तो सच को स्वीकार किया जाए.

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नेत्र-ज्योतिवर्द्धक व्यायाम और प्राकृतिक उपाय


नेत्र-ज्योतिवर्द्धक व्यायाम और प्राकृतिक उपाय

आँखों का स्वास्थ्य असंयमित और अनियमित जीवनशैली के कारण बिगड़ता है। आँखों की बनावट सूक्ष्म तथा पूर्ण हैं। आँखें उसी समय तक ठीक काम कर सकती हैं जब तक कनीनिका, जलीय द्रव, ताल और  ताल के पीछे रहने वाले द्रव स्वच्छ रहते हैं। इनमें से किसी के भी अस्वच्छ होने पर दृष्टि में दोष उत्पन्न हो जाता है। दृष्टिपटल, मध्य पटल, दृष्टि नाड़ी तथा दृष्टि केन्द्रों के रोगों से भी दृष्टि खराब हो जाती है।

छोटे अक्षरों को पढ़ने, सीने-पिरोने,चित्रकारी करने, स्वर्णकारी करने, घड़ीसाजी करने आदि से आँखों  पर  दबाव पड़ता है। कम प्रकाश में पढ़ने या कोर्इ अन्य कार्य करने से भी आँखों को हानि पहुँचती है। अधिक  प्रकाश जैसे सूर्य या आग की ओर बहुत देर तक देखना भी हानिकारक है। झुककर या लेटकर पढ़ने से भी आँखों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सामने से आता प्रकाश भी आँखों के लिए अच्छा नहीं होता है। पढ़ते या लिखते समय प्रकाश हमेशा बार्इ ओर से या पीछे से आना आँखों के लिए सर्वोत्तम होता है।

आँखों की भीतरी बनावट और व्यवस्था इस प्रकार से है कि पूरी आयु तक हमारी आँखें स्वस्थ रह सकती हैं, लेकिन आधुनिक जीवन में पर्यावरण, गलत खान-पान, विटामिन ‘ए’की कमी, दूरदर्शन तथा फिल्म अधिक देखने से लोगों, विशेषकर बच्चों की आँखें खराब रहने, दृष्टि कमजोर हो जाने, जल्दी चश्मा लग जाने की शिकायत हो जाती है। थोड़ी-सी सावधानी से आँखों के रोगों से बचा जा सकता है और आँखों को स्वस्थ रखा जा सकता है।

नींद कम लेने, लगातार नजला-जुकाम रहने, धुआं और धूल वाले स्थान पर रहने, आँखों की अच्छी तरह सफार्इ न करने आदि से भी आँखों की दृष्टि पर बुरा प्रभाव पड़ता है। आँखों के कुछ ऐसे व्यायाम हैं जिनका प्रतिदिन अभ्यास करने से नेत्र ज्योति सदा ही बनी रहती है और नेत्रों का आकर्षण एंव स्वास्थ्य भी सही रहता है। दृष्टि के सभी प्रकार के रोगों का मूल कारण आँखों की बाहरी पेशियों पर तनाव पड़ना है, जो धीरे-धीरे आँखों का आकार ही बदल देता है। पास की दृष्टि में नेत्र गोलक की लम्बार्इ बढ़ जाती है, जिससे दूर के पदार्थों को देखने में असुविधा रहती हैं दूर की दृष्टि तथा वृद्धावस्था की अल्प दृष्टि में नेत्र-गोलक संकुचित अवस्था में रहते है, जिससे पास की वस्तु को देखना कठिन हो जाता है।

आँखों के व्यायाम नेत्र संबंधी दोषो से मुक्ति पाने में व्यक्ति की पूरी मदद करते हैं। यहां कुछ नेत्र व्यायाम दिए जा रहे हैं, जिनके अभ्यास से आप नेत्र समस्याओं से मुक्ति पा सकते हैं।

करतल विश्राम :

आँखे ढीली बंद करें। दोनों हाथों की हथेलियां प्याली की तरह बनाकर गाल की हड्डियों पर रखते हुए उनसे अपनी बंद आँखों को इस प्रकार ढकें कि हथेलियां आँखों को न छुएं। हथेलियों से आँखे ढकते समय ध्यान रखें कि न तो  आँखों पर कोर्इ दबाव ही पड़े और न ही कहीं से प्रकाश आ सके। हाथ और आँखें तनाव रहित रखें। मस्तिष्क को तनावमुक्त रखने के लिए बिल्कुल कालापन का अनुभव करें। सही रीति के करतल-विश्राम में कालापन देखने के लिए कोर्इ प्रयास न करें बल्कि बिना किसी प्रयास के सहज ही बिल्कुल कालापन का अनुभव होना चाहिए क्योंकि तभी आँखें और मस्तिष्क विश्राम की अवस्था में हो सकते हैं।

कुछ समय तक इसी अवस्था में रहने के बाद आप हाथ हटाकर तेजी से आँखें मिचकाइए और आँखें खोलिए। अब आप देखेंगे कि आपकी आँखें अधिक ताजगीपूर्ण और शक्तिशाली हो गर्इ है।

करतल-विश्राम का अभ्यास दिन में चार-पाँच बार, दो से दस मिनट तक कर सकते हैं। आँखों पर अनावश्यक दबाव से उत्पन्न रोगों तथा मोतियाबिंद की शांति के लिए करतल-विश्राम बहुत लाभदायक है और इसे प्रतिघंटे कुछ मिनट तक अवश्य करना चाहिए।

करतल-विश्राम में काले रंग का ध्यान के साथ-2 मस्तिष्क को आरामदेह स्थिति में रखना भी आवश्यक है। सोचना बिल्कुल बंद कर दें। यदि ऐसा न कर सकें तो कम से कम मस्तिष्क को अशांत करने वाले विचार जैसे खराब स्वास्थ्य, मन की सुस्ती, चिंता,क्रोध, आदि से मुक्त रखें और इनके स्थान पर अच्छे स्वास्थ्य एवं सुखद विचार में महत्व दें।

पुतली घुमाने की क्रियाएं :

आँखों की मांसपेशियों और आँखों से संबंधित स्नायु को ताकतवर व तनाव रहित बनाने के लिए करतल-विश्राम के अलावा इन व्यायामों को भी करना चाहिए।

पुतलियों को उपर-नीचे घुमाएं। इसके लिए रीढ़ सीधी और गर्दन को स्थिर रखकर बिना सिर घुमाएं दोनों पुतलियों को उपर – नीचे घुमाए अथार्त दोनों पुतलियों को पहले उपर की ओर ले जाते हुए आकाश देखें और फिर नीचे लाते हुए धरती देखें। इस तरह सहजता से क्रमष: उपर नीचे छ: बार देखें।

पुतलियों को बाएं-दाएं घुमाएं, मानों पुतलियां क्रमश: बाएं-दाएं कान को देख रही हों। सहजता से ऐसा छ: बार करे।

पुतलियों को चक्राकार घुमाएं अर्थात पहले बाएं से दाऐ बड़ा से बड़ा गोला बनाते हुए गोलकार घुमाएं और फिर दाएं से बाएं घुमाएं। ऐसा चार बार सहजता से करें।

इस प्रकार ( उपर-नीचे, बाएं-दाएं और गोलाकार घुमाने की ) तीनों क्रियाएं पहले धीरे-धीरे और बाद में जल्दी-जल्दी करें। प्रत्येक क्रिया चार-छ: बार करने के बाद कोमलता से पलक झपकाकर आँखें बंद करके कुछ क्षण विश्राम कर लें।

इन्हें दो-तीन बार, बीच-बीच में विश्राम देकर दोहराया जा सकता है। पुतली घुमाने से नेत्र-पेशियों का तनाव हटकर बहुत आराम मिलता है और दृष्टि शक्ति बढ़ती है।

दृष्टि को बार-2 बदलने का अभ्यास करना चाहिए। दृष्टि को एक स्थान से हटाकर दूसरे स्थान पर ले जाने या एक बिंदु को देखकर दूसरे बिंदु पर दृष्टि ले जाने को ‘दृष्टि – ध्यान’ कहते हैं। अंगुठे के पास वाली तर्जनी उंगली अपनी आँखों के सामने 10 इंच की दूरी पर रखें। अब उंगली के उपरी सिरे पर दृष्टि जमाएं और उसे साफ-2 देखें। फिर उंगली को सीध में 20 फीट दूर कोर्इ बड़ी वस्तु जैसे खिड़की को देखें। दृष्टि को पास और दूर केंद्रित करें अर्थात बारी-बारी से दूर-पास देखें। यह क्रिया दस बार करने के बाद एक क्षण के लिए पलक झपकाकर विश्राम करें तथा दोहराएं। यह दृष्टि अनुसरण(Accommodation ) सुधारने के लिए विषेश गुणकारी है। स्वस्थ दृष्टि किसी एक बिंदु पर अधिक देर तक स्थिर नहीं रहती है बल्कि एक स्थान से दूसरे स्थान पर चलती रहती है।

पलक झपकाएं। पलक झपकाना अर्थात् पलकों को जल्दी-जल्दी बंद करने और खोलने की क्रिया से आँखों को आराम मिलता है, जिससे नजर तेज होती है। पलकें न झपका सकने का अर्थ है आँखों में तनाव और गड़बड़ी। इसलिए एकटक देखने की आदत पड़ने पर दिन में कर्इ बार पलकें झपकाने का अभ्यास करना शुरू करना चाहिए। जैसे एक बार में लगातार दस बाद पलक झपकना। पढ़ते समय भी प्रत्येक दस सेंकड़ में एक या दो बार पलक झपकनी चाहिए। पलक झपकने से आँखों की थकान मिटती है, आँख की पेशियां सिकुड़ने और फैलने से रक्त संचार सुधरता है। और अश्रु ग्रंथि से पर्याप्त तरल निकलते रहने से आँख साफ गीली और चमकदार रहती है।

हंसने और मुस्कराने का आँखों पर हितकारी प्रभाव पड़ता है और आँखों में एक मुग्ध कर देने वाली चमक आ जाती है। हंसने से दिल हल्का होता है, तनाव घटता है, और मानसिक तनावजन्य रोग जैसे थकान, चिंता, विषाद, चिड़चिड़ापन आदि मिटते हैं। प्रतिदिन चार-पांच किलोमीटर दौड़ने से जो व्यायाम होता है और उससे जो शारीरिक क्षमता बढ़ती है, उतनी ही पांच मिनट हंसने से बढ़ती है। कम से कम दिन में तीन बार खिलखिलाकर हंसना चाहिए। उन्मुक्त हंसी से मस्तिष्क से लेकर संपूर्ण नाड़ी-मंडल स्पंदित हो उठता है और फेफड़ों की अशुद्ध वायु शरीर से बाहर निकल जाती है। हंसने से न केवल मानसिक तनाव घटता है बल्कि रक्त संचालन और पाचन भी सुधरता है।

आँखों के लिए योगासन :

आँखों के सौंदर्य और अच्छे स्वास्थ्य के लिए अर्द्धमत्स्येंद्रासन उष्ट्रासन, धनुरासन,हस्तपादोत्तानासन, हलासन, सर्वांगासन, शीर्षासन आदि का नियमित अभ्यास होना चाहिए। इनमें से उष्ट्रासन की विधि यहाँ प्रस्तुत है-

उष्ट्रासन :

वज्रासन में बैठिए। अब एड़ियों को खड़ा करके उन पर दोनों हाथों को रखें। हाथों को इस प्रकार रखें कि अंगुलियाँ अंदर की तरफ अंगुश्ठ बाहर को हों।

श्वास अंदर भरकर सिर एवं ग्रीवा को पीछे मोड़ते हुए कमर को उपर उठाएं। शवास छोड़़ते हुए एड़ियों पर बैठ जाएं। इस प्रकार तीन-चार आवर्त्ति करें।

योगासनों से साथ-साथ प्रतिदिन सूत्र तथा जलनेति का भी अभ्यास करें। सप्ताह में तीन बार कुंजल करें। खुली हवा में सैर करे।
प्राकृतिक प्रयोग-

आँखों को प्रतिदिन ताजा शीतल पानी या त्रिफला के पानी से धोएं।

पढ़ते समय या टी वी देखते समय आँखों को झपकाते रहें।

कान में तेल, नाक में शुद्ध घी और आँख में मधु डालने से आँखे स्वस्थ रहती है।

आँखों के चारों ओर हाथों की उंगलियों से अच्छी तरह मालिश इस प्रकार करें कि आँखों पर दबाव न पड़े। इसके बाद ठंड़े पानी से आँखों को धोएं या ठंडे पानी की पट्टी रखें। ऐसा दिन में दो-तीन बार करे।

अपने भोजन में पर्याप्त मात्रा में विटामिन ‘ए’ युक्त आहार का प्रयोग करें। हल्का तथा सुपाच्य भोजन करें। रोगी का 50 प्रतिशत भोजन कच्चा फल, सब्जी, रस, सलाद आदि  और 50 प्रतिशत पका सुपाच्य भोजन होना चाहिए।

नेत्र-ज्योति बढ़ाने और चश्मा छुड़ाने के लिए-बदाम-गिरी, सौंफ (बड़ी), मिश्री कूंजा-तीनों को बराबर मात्रा में लेकर कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बना लें और किसी कांच के बर्तन में रख दें। प्रतिदिन रात में सोते समय 10 ग्राम की मात्रा 250 ग्राम दूध के साथ चालीस दिन तक निंरतर लें। इससे दृष्टि इतनी तेज हो जाती है कि चश्मे की जरूरत ही नहीं रहती है। इसके अतिरिक्त इससे दिमागी कमजोरी, दिमाग की गर्मी, दिमागी तनाव और बातों को भूल जाने की बीमारी भी दूर हो जाती है।

बच्चों को उपरोक्त नुस्खा आधी मात्रा में दें। पूर्ण लाभ के लिए औषधि के सेवन के दो घंटे तक पानी न पीएं। नेत्र ज्योति के साथ-साथ याद्दाश्त भी बढ़ती है। कूंजा मिश्री न मिले तो साधारण मिश्री का प्रयोग करे।

सुबह उठते मुँह में पानी भरकर मुँह फुलाकर ठड़े जल से आँखों पर छींटे मारें। ऐसा दिन में तीन बार करें।

आंवला, हरड़, बहेड़ा ( गुठली रहित ) समान मात्रा में लेकर उन्हें कूटकर चूर्ण बना लें। प्रतिदिन शाम को इसमें से 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण को कोरे मिट्टी या शीशे के बर्तन में एक गिलास पानी डालकर भिगो दें। सुबह इसको मसलकर छान लें। फिर इसके निथरे हुए पानी से हल्के हाथ से नेत्रों को खूब छींटे लगाकर धो लिया करें। इससे आँखों की ज्योति की रक्षा होती है और नजर तेज होती है। आँखों की अनेक बीमारियाँ भी ठीक हो जाती हैं। इस त्रिफला जल से निंरतर महीने दो महीने से कम नजर आना, आँखों के आगे अधेंरा छा जाना, सिर घूमना, आँखों में उष्णता, रोहें, खुजली, दर्द, लाली, जाला,मोतियाबिंद आदि सब नेत्र रोगों  का नाश होता है।

नेत्र रोगी उपचार के दौरान मैदा, चीनी, धुले हुए चावल, खीर, उबले हुए आलू, हलवा भारी तथा चिकनार्इ वाले भोजन, चाय, काफी शराब, अचार, मुरब्बे, टॉफियों, चॉकलेट आदि का सेवन न करें।

कद्दूकस किया हुआ आंवला या आंवला का मुरब्बा, पपीता, पका आम, दूध, घी, मक्खन,मधु, काली मिर्च, घी-बूरा, सौंफ-मिश्री, गुड़, सूखा धनिया, चौलार्इ, पालक, पत्तागोभी, मेथी पत्ती, कढ़ी पत्ती आदि कैरोटीन प्रधान प​त्तियों वाली वनस्पतियां, पालक या कढ़ी पत्ती युक्त दाल, अंकुरित मूंग, गाजर, बादाम, मधु आदि का सेवन आँखों के लिए हितकारी है।

इलायची के दानों का चूर्ण और शक्कर समभाग में लेकर उसमें एंरड का तेल मिलाकर चार ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन सुबह खाने से 40 दिनों में ही नजर की कमजोरी दूर हो जाती है। इससे आँखों में ठंड़क आती है और नेत्र ज्योति बढ़ती है।

हरा धनिया पीसकर उसका रस निकालकर दो-दो बूंद आँखों में प्रतिदिन डालने से भी आँखों की ज्योति में वृद्धि हो जाती है।

यह लेख पुस्तक योग संदेश से लिया गया है।

http://vishwamitra-spiritualrevolution.blogspot.com/2013/02/blog-post_13.html

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भामती की अदभुत साधना


भामती की अदभुत साधना

वेदान्त दर्शन (ब्रह्मसूत्र) आध्यात्म विद्या का अत्यन्त सरस विषय है पर उतना ही क्लिष्टभी। पंडित वाचस्पति मिश्र (कैयट) ने उसके भाष्य का संकल्प किया। उन्हीं दिनों उनकाविवाह संस्कार भी हुआ जब उनके मस्तिष्क में इस भाष्य की कल्पना चल रही थी। इधर घरमें धर्मपत्नी ने प्रवेश किया उधर पंडित जी ने भाष्य प्रारम्भ किया। विषय है ही ऐसा किउसकी गहरार्इ में जितना डूबों उतनी ही अधिक गहरार्इ दिखार्इ देती चली जाये। पंडित जी कोभाष्य पूरा करने में प्राय: 80 वर्ष लगे।

ग्रन्थ पूरा होते ही उन्हें स्मरण आया-वे विवाह कर धर्मपत्नी को घर लाये थे किन्तु अपनीसाहित्य साधना में वे उन्हें बिल्कुल ही भूल गये। अपराध बोध के कारण बाचस्पति सीधाभामती के पास गये और इतने दिनों तक विस्मृत किए जाने का पश्चाताप करते हुए क्षमायाचना की। पति का स्नेह पाकर भामती भाव-विभोर हो गर्इ। पंडित जी ने पूछा-मैंने इतनेदिनों तक आपका कोर्इ ध्यान नहीं दिया फिर भी दिनचर्या में कोर्इ व्यतिरेक नहीं आयाजीवन निर्वाह की सारी व्यवस्था कैसे हुर्इ?

भामती ने बताया-स्वामी! हम जंगल से मूँज काट लाते थे। उसकी रस्सी बट कर बाजार मेंबेच आते थे। इससे इतनी आजीविका मिल जाती थी कि हम दोनों का जीवन निर्वाहभलीभाँति हो जाता था। इसी तरह हम दोनों के भोजन तेल, लेखन सामग्री आदि की सभीआवश्यक व्यवस्थायें होती चलीं आर्इ। आप इस देश, जाति, धर्म और संस्कृति के लिएब्रह्मसूत्र के भाष्य जैसा कठिन तप कर रहे थे उसमें मेरा आपकी सहधर्मिणी का भी तोयोगदान आवश्यक था? इस अभूतपूर्व कर्त्तव्य परायणता से विभोर वाचस्पति मिश्र ने अपनाग्रन्थ उठाया और उसके ऊपर ‘‘भामती’’ लिखकर गर्न्थ का नामकरण कर दिया। वाचस्पतिमिश्र की अपेक्षा अपने नाम के कारण ‘‘भामती’’ ब्रह्मसूत्र की आज कहीं अधिक ख्याति है।

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भारत के 10 प्रसिद्ध और सुन्दर बगीचेभारत के 10 प्रसिद्ध और सुन्दर बगीचेभारत के 10 प्रसिद्ध और सुन्दर बगीचे


भारत के 10 प्रसिद्ध और सुन्दर बगीचे (10 Famous and Beautiful Gardens of India)

आइए जानते है भारत के 10 फेमस और ब्यूटीफुल गार्डन्स के बारे में –

1- पिंजौर गार्डन,चंडीगढ़  (Pinjore Garden, Chandigarh) :-

पिंजौर गार्डन,चंडीगढ़  (Pinjore Garden, Chandigarh)

अगर आप चंडीगढ़ जाते हैं, तो आपको पिंजौर गार्डन घूमना बेहद पसंद आएगा। इस गार्डन को स्थानीय लोग यादविन्द्रा गार्डन के नाम से भी जानते हैं। पिंजौर गार्डन में आपको पौराणिक महत्व की कुछ चीजें देखने को मिलेंगी। पौराणिक कथा के अनुसार, अज्ञातवास के दौरान पांडव इस गार्डन में घूमने के लिए आए थे। यह शहर का फेमस पिकनिक स्पॉट है। साथ ही, यहां पर जापानी गार्डन भी देखने लायक है। इस गार्डन में छोटा-सा चिड़ियाघर, नर्सरी और एक सुंदर-सा लॉन है। पिंजौरा गार्डन को रात के समय में कलरफुल लाइट से सजाया जाता है। यहां फाउंटेन भी है। यहां पर टूरिस्ट्स ज़्यादातर रात के समय घूमने के लिए आते हैं। इस गार्डन में घूमने के लिए सबसे अच्छा समय अप्रैल से लेकर जून है, क्योंकि इन दिनों यहां पर बैसाखी का त्योहार बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। इसके अलावा, यहां पर मैंगो फेस्टिवल भी बेहद ही फेमस है।

2- बोटेनिकल गार्डन, ऊटी (Botanical Garden, Ooty) :-

 बोटेनिकल गार्डन, ऊटी (Botanical Garden, Ooty)

इस  गार्डन को 1847 में ऊटी में बनवाया था। यह 55 एकड़ एरिया में फैला हुआ है। इस गार्डन में 2000 से भी अधिक विदेशी प्रजाति के पेड़-पौधे हैं। इस गार्डन की देखरेख तमिलनाडु सरकार का हॉर्टिकल्चर डिपार्टमेंट करता है। इस गार्डन में अलग-अलग तरह के पेड़-पौधे टूरिस्ट्स के आकर्षण का केंद्र हैं। हर साल मई के महीने में यहां ‘समर फेस्टिवल’ मनाया जाता है, जो टूरिस्ट्स को बहुत ही पसंद आता है। इस गार्डन का खास आकर्षण फ्लॉवर शो है। इसके अलावा, लिली पाउंड और एक कॉर्क पेड़ भी है, जो कहा जाता है कि हज़ारों साल पुराना है।

3- गुलाब बाग, उदयपुर (Gulab Bagh, Udaipur) :-

 गुलाब बाग, उदयपुर (Gulab Bagh, Udaipur)
Image Credit udaipur.nic.in

गुलाब बाग को सज्जन निवास के नाम से भी जाना जाता है। यह उदयपुर का सबसे सुंदर और बड़ा गार्डन है। इसे महाराणा सज्जन सिंह ने 100 एकड़ जमीन पर बनवाया था। यह राजस्थान का सबसे बड़ा गुलाब के फूलों का गार्डन है। गुलाब के फूलों की वजह से इस गार्डन का नाम गुलाब गार्डन रखा गया। यह गार्डन पिछोला लेक की दाईं तरफ स्थित है। इस गार्डन में आपको गुलाब के फूल की ऐसी वेरायटी मिल जाएगी जो कहीं और देखने को नहीं मिलेगी। इस गार्डन की गिनती विश्व के खूबसूरत गार्डन्स में होती है। अगर आपको प्राकृतिक सुंदरता पसंद है, तो आप गुलाब गार्डन जा सकते हैं। इस गार्डन में सरस्वती भवन नाम से एक पब्लिक लाइब्रेरी भी है। इस गार्डन में घूमने के साथ आप ट्वॉय ट्रेन से सैर कर सकते हैं और जानवरों को भी देख सकते हैं।

4- निशात बाग, श्रीनगर (Nishat Bagh, Srinagar) :-

निशात बाग, श्रीनगर (Nishat Bagh, Srinagar)

इस गार्डन को मुगल शासकों ने 1633-34 ई. में बनवाया था। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा गार्डन है। यह श्रीनगर से 11 किलोमीटर दूर डल झील के पास पूर्वी हिस्से पर बना हुआ है। इस गार्डन में आपको आनंद का एहसास होगा। साथ ही, इस गार्डन से आप डल झील की खूबसूरती को निहार सकते हैं। इस सीढ़ीदार गार्डन के एक तरफ झील और दूसरी तरफ हिमालय की चोटी दिखाई पड़ती है। इस गार्डन में भव्य पहाड़ और मुगल मंडप की कलाकारी देखते बनती है।

5- हैंगिंग गार्डन, मुंबई  (Hanging Gardens, Mumbai) :-

 हैंगिंग गार्डन, मुंबई  (Hanging Gardens, Mumbai)
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मुंबई के मालाबार हिल्स के सबसे ऊपर बना हैंगिंग गार्डन बेहद ही आकर्षक है। यह गार्डन कमला नेहरू पार्क के सामने ही है। इस गार्डन के अलावा फिरोजशाह मेहता गार्डन भी अरब सागर में छिपते सूरज के अनोखे नज़ारे के लिए प्रसिद्ध है। इस गार्डन में सन् 1880 से भी पहले का जलाशय है। यह पार्क मुंबई के लोगों के लिए खास जगह है और यहां से आप मुंबई की तेज रफ्तार लाइफ का अंदाज़ा लगा सकते हैं। यह गार्डन बच्चों के लिए आकर्षण का खास केंद्र है। यहां पर अलग-अलग तरह के फूल और पौधे लगाए गए हैं।

6- वृन्दावन गार्डन, मैसूर (Vrindavan Garden, Mysore) :-

वृन्दावन गार्डन, मैसूर (Vrindavan Garden, Mysore) :-

यह गार्डन इतना बड़ा है कि इसमें 2 मिलियन यानी 20 लाख से भी ज़्यादा लोग एक साथ आ सकते हैं। यह मैसूर से 20 कि.मी. दूर कृष्णराज सागर बांध के नीचे बनाया गया है। यह भारत का सबसे आकर्षक और कर्नाटक का सबसे सुंदर टूरिस्ट प्लेस है। इस गार्डन को कश्मीर के शालीमार गार्डन की तरह मुगल स्टाइल में बनाया गया है। फाउंटेन, फूलों की क्यारी, ग्रीन लॉन और हरी घास के चलते यह बगीचा बेहद खूबसूरत लगता है। इस गार्डन को देख कर आपका मन मुग्ध हो जाएगा। इस गार्डन का खास आकर्षण म्यूजिकल और डांसिंग फाउंटेन है। यह लोगों के लिए सुबह और शाम में खुलता है। आज के समय में यह गार्डन पूरी दुनिया में अपनी सुंदरता के लिए फेमस है।

7- लोधी गार्डन,दिल्ली (lodi gardens delhi) :-

लोधी गार्डन,दिल्ली (lodi gardens delhi)
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यह दिल्ली का सबसे बड़ा और फेमस पार्क है। इस गार्डन को सैय्यद और लोधी ने 16वीं शताब्दी में बनवाया था। इस गार्डन में गुज़रे दौर की कई सारी कब्रें हैं। इस पार्क में मोहम्मद शाह की कब्र, सिकंदर लोधी की कब्र, शीश गुंबद और बारा गुंबद है। साथ ही, यहां 15वीं शताब्दी की वास्तुकला भी देखते बनती है। फिलहाल, इस पार्क की देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के हाथों में है। नेशनल पार्क और ग्लास हाउस हेल्थ क्रेजी लोगों स्पाइरल शेप झील के लिए फेमस है। दिल्ली की कुछ खास ही जगहों में से यह एक है।

8- सिम पार्क, कुन्नूर (Sim’s Park Coonoor) :-

 सिम पार्क, कुन्नूर (Sim's Park Coonoor)
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सिम पार्क तमिलनाडु के हिल स्टेशन कुन्नूर का सबसे बड़ा लैंडमार्क है। यह पार्क 12 हेक्टेयर में बना है। इसे एक अंग्रेज़ मेजर मर्रे और मि.जे.डी. मर्रे सिम ने सन् 1874 में बनवाया था। सिम पार्क में 1000 विदेशी पेड़-पौधे हैं। फर्न्स, पाइन्स, मंगोलिया और कामेलिया जैसे पुराने और कम पाए जाने वाले पेड़ आपको यहां दिखेंगे।
कुन्नूर का यह प्राकृतिक गार्डन है, जहां पर हर साल फ्रूट शो होता है। सुबह की सैर करने के लिए यह बेहद अच्छा और प्राकृतिक परिवेश वाला गार्डन है।

9-इंडियन बोटेनिकल गार्डन, कोलकाता  (Indian Botanical Garden, Kolkata) :-

इंडियन बोटेनिकल गार्डन, कोलकाता  (Indian Botanical Garden, Kolkata)
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यह गार्डन कोलकाता के हावड़ा जिले के शिबपुर में है। यह ऑर्चिड पाम, बैम्बूज़ एंड प्लांट्स ऑफ द पाइन जीनस के लिए फेमस है। यह गार्डन हुगली नदी के किनारे 270 एकड़ में बना हुआ है, जहां 1700 अलग-अलग तरह के पेड़-पौधे लगाए गए हैं। बोटेनिकल गार्डन ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 1787 में बढ़ती कमर्शियल एक्टिविटीज और बाजार को देखते हुए बनाया गया था। इसके अलावा, यहां का बर्ड हाउस आकर्षण का केंद्र है। इस गार्डन की सबसे बड़ी विशेषता यह है की यहाँ पर विशव का सबसे चौड़ा बरगद का पेड़ है 144400 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। (अधिक जानकारी के लिए यह पढ़े – यह जंगल नहीं एक पेड़ है)

10-जवाहरलाल नेहरू बोटेनिकल गार्डन, सिक्किम  (Jawaharlal Nehru Botanical Garden, Sikkim) :-

जवाहरलाल नेहरू बोटेनिकल गार्डन, सिक्किम  (Jawaharlal Nehru Botanical Garden, Sikkim)
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सिक्किम के गंगटोक शहर से 24 किलोमीटर दूर जवाहरलाल नेहरू गार्डन टूरिस्ट्स के लिए बेहद ही फेमस है। इस गार्डन को 1987 में बनाया गया था, जिसकी देखरेख फॉरेस्ट डिपार्टमेंट करता है। प्राकृतिक सुंदरता और लुप्त होते पेड़ों को देखने के लिए यह जगह अच्छी है। यहां पर आपको वैसे पेड़ों की कई प्रजातियां देखने को मिल सकती हैं, जो अब लुप्त होती जा रही हैं। हिमालय की पर्वत श्रृंखला से पौधों की कई प्रजातियां यहां पर लाकर लगाई गई हैं। यहां पर आपको 50 से भी अधिक अलग तरह के पेड़ मिल सकते हैं। यह पार्क बच्चों के मनोरंजन और पिकनिक स्पॉट के रूप में बेस्ट है।

Posted in जीवन चरित्र

मेजर ध्यान चंद


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===========================
* एक बार एक मैच के दौरान मेजर साब
एक भी गोल नहीं कर पा रहे थे। बार-
बार कोशिश करने पर भी उनका शॉट
गोल-पोस्ट के अंदर नहीं जा रहा था। इस
पर उन्होनें रैफ़री से कहा कि गोल-पोस्ट
की चौड़ाई मानकों के मुताबिक नहीं है।
जब गोल-पोस्ट को मापा गया तो वाकई
मेजर साब की बात ठीक निकली। गोल-
पोस्ट मानक चौड़ाई से थोड़ा-
सा छोटा था!
* 1936 के बर्लिन ओलंपिक खेलों में लोग
बाकी सारे खेल छोड़कर हॉकी खेलते हुए
मेजर साब को देखने के लिए आते थे। उस
समय एक जर्मन अखबार ने लिखा कि इस
बार ओलंपिक में जादू का खेल
भी दिखाया जा रहा है (मेजर ध्यान चंद
को हॉकी का जादूगर कहा जाता है)।
पहले मैच के बाद ही पूरे बर्लिन में पोस्टर
लग गए थे कि आइए और भारत से आए
जादूगर को हॉकी स्टेडियम में देखिए।
* एक बार के वृद्ध महिला ने मेजर साब से
कहा कि हॉकी की जगह मेरी बेंत से खेलकर
दिखाओ तो जाने! मेजर साब ने न केवल उस
महिला की बेंत से हॉकी मैच
खेला बल्कि कई गोल भी किए।
* यह भी कहा जाता है कि बर्लिन में
मेजर साब के खेल से तानाशाह हिटलर
इतना प्रभावित हुआ कि उसने मेजर साब
को जर्मनी आकर रहने की पेशकश की।
हिटलर ने कहा कि भारत में आप मेजर हैं
लेकिन हम आपको कर्नल का पद देंगे।
भारत के सपूत मेजर साब ने इस पेशकश
को ठुकरा दिया (हिटलर की पेशकश
को जर्मनी में ही खड़े होकर
ठुकराना आसान बात नहीं थी!) हिटलर के
साथ मेजर ध्यान चंद की मुलाकात बर्लिन
ओलंपिक में हॉकी फ़ाइनल के बाद हुई। इस
मैच में भारत ने जर्मनी को 8-1 से रौंद
डाला था (आठ में से तीन गोल मेजर साब के
थे)… आप समझ सकते हैं कि हिटलर
जैसा व्यक्ति मन-ही-मन मेजर साब से
कितना नाराज़ रहा होगा कि इस
“निचले स्तर के काले इंसान” ने हम उच्च
वर्ण जर्मनों को इस तरह धो डालने
की हिम्मत कैसे की!
* इसी मुलाकात के दौरान हिटलर ने मेजर
साब की हॉकी-स्टिक खरीदने की पेशकश
भी की थी। हिटलर के इस आग्रह
को भी मेजर साब ने ठुकरा दिया था।
* बर्लिन ओलंपिक में ही एक मैच के दौरान
मेजर साब बिना जूते और जुराब पहने खेले थे
–और नंगे पांव खेलने के बावज़ूद उन्होनें इस
मैच में तीन गोल किए।
* बर्लिन ओलंपिक के दौरान जर्मन गोल-
कीपर ने खूब खतरनाक खेल खेला। वह
दूसरी टीम के खिलाड़ियों से टकरा कर
उन्हें गिरा देता था। उसने यही मेजर साब
के साथ किया और टकरा कर उनका एक
दांत तोड़ दिया। इस पर मेजर साब ने
अपनी टीम के खिलाड़ियों से कहा कि हम
जर्मन टीम को सबक सिखाएँगे। मेजर साब
के साथ भारत की टीम इतनी अधिक
सशक्त थी कि भारत के खिलाड़ी बार-
बार गेंद को जर्मन पाले में ले जाते थे और
आसानी से गोल करने की स्थिति में आकर
भी बिना गोल किए गेंद लेकर अपने पाले में
लौट आते थे। उस मैच में ऐसा लग
रहा था जैसे भारत की ग्यारह
बिल्लियाँ जर्मन चूहों को खाने से पहले
उनके साथ खिलवाड़ कर रही हों! इससे
बड़ा अपमान जर्मन टीम का शायद
ही कभी हुआ हो।
* क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी डॉन
बैडमैन ने कहा था कि मेजर ध्यान चंद
तो गोल ऐसे करते हैं जैसे हम क्रिकेट में रन
बनाते हैं!
* ऑस्ट्रिया के वियेना में रहने वालों ने
शहर में मेजर साब का एक बुत
लगाया था जिसमें मेजर साब के चार हाथ
दिखाए गए थे और सभी में हॉकी-स्टिक
थी। गेंद पर मेजर साब के अद्भुत नियत्रंण
के प्रति यह एक अद्भुत सम्मान-प्रदर्शन
था।
* मेजर ध्यान चंद ने 1000 से भी अधिक
गोल किए जिसमें से 400 से अधिक गोल
अंतर्राष्ट्रीय मैचों में किए गए। उन्होनें
लगातार तीन ओलंपिक खेलों में भारत
को स्वर्ण पदक दिलाया –इन तीन
आयोजनों में हुए भारत 12 मैचों के दौरान
मेजर साब ने 33 गोल किए।
* मेजर साब की आत्मकथा तक का नाम
“गोल” है!
* हॉलैंड में मेजर ध्यान चंद की हॉकी-
स्टिक को केवल इसलिए तोड़कर
देखा गया था क्योंकि लोगों को शक
था कि उनकी हॉकी में चुम्बक जैसी कोई
चीज़ है जो गेंद को चिपकाए रखती है।
* मेजर ध्यान चंद 1948 में हॉकी से
रिटायर हुए। उनका जन्मदिन, 29 अगस्त,
भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में
मनाया जाता है –इसी दिन अर्जुन
पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार और
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिए
जाते हैं। खेलों में भारत के सर्वोच्च
लाइफ़टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
को भी ध्यान चंद पुरस्कार
कहा जाता है।
हॉकी में मेजर ध्यान चंद
की तुलना किसी से नहीं की जाती –ठीक
उसी तरह जैसे फ़ुटबॉल में पेले
की तुलना किसी से नहीं की जाती।
लेकिन भारत के लोगों में स्मरण शक्ति और
कृतज्ञता का भाव काफ़ी कमज़ोर है। आज
विराट कोहली और रोहित शर्मा रन
बना रहे हैं तो आज उन्हें क्रिकेट
का अगला भगवान कहा जा रहा है।
लेकिन भारत की जनता अच्छे
खिलाड़ियों का क्या हश्र करती है
इसका एक ताज़ा उदाहरण तो वीरेन्द्र
सहवाग ही है। आज किसी को सहवाग
की याद नहीं आती जबकि कुछ समय पहले
तक स्टेडियम “सहवाग सहवाग सहवाग” के
नारों से गूंजता था। जब क्रिकेट
खिलाड़ियों का ही ऐसा हश्र होता है
तो हॉकी के जादूगर को कौन याद रखेगा?
मेजर साब के संदर्भ में
महादेवी की लिखी पंक्तियाँ मन में आ
रही हैं:
विश्व में, हे पुष्प!, तू सबके हृदय
भाता रहा
दान कर सर्वस्व फिर भी हाय
हर्षाता रहा
जब न तेरी ही दशा पर दुःख हुआ संसार
को
कौन रोएगा सुमन हमसे मनुज निस्सार को
_______________________________
दो शब्द जरुर बोले मेजर ध्यानचंद के लिए कृपया

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* एक बार एक मैच के दौरान मेजर साब
एक भी गोल नहीं कर पा रहे थे। बार-
बार कोशिश करने पर भी उनका शॉट
गोल-पोस्ट के अंदर नहीं जा रहा था। इस
पर उन्होनें रैफ़री से कहा कि गोल-पोस्ट
की चौड़ाई मानकों के मुताबिक नहीं है।
जब गोल-पोस्ट को मापा गया तो वाकई
मेजर साब की बात ठीक निकली। गोल-
पोस्ट मानक चौड़ाई से थोड़ा-
सा छोटा था!
* 1936 के बर्लिन ओलंपिक खेलों में लोग
बाकी सारे खेल छोड़कर हॉकी खेलते हुए
मेजर साब को देखने के लिए आते थे। उस
समय एक जर्मन अखबार ने लिखा कि इस
बार ओलंपिक में जादू का खेल
भी दिखाया जा रहा है (मेजर ध्यान चंद
को हॉकी का जादूगर कहा जाता है)।
पहले मैच के बाद ही पूरे बर्लिन में पोस्टर
लग गए थे कि आइए और भारत से आए
जादूगर को हॉकी स्टेडियम में देखिए।
* एक बार के वृद्ध महिला ने मेजर साब से
कहा कि हॉकी की जगह मेरी बेंत से खेलकर
दिखाओ तो जाने! मेजर साब ने न केवल उस
महिला की बेंत से हॉकी मैच
खेला बल्कि कई गोल भी किए।
* यह भी कहा जाता है कि बर्लिन में
मेजर साब के खेल से तानाशाह हिटलर
इतना प्रभावित हुआ कि उसने मेजर साब
को जर्मनी आकर रहने की पेशकश की।
हिटलर ने कहा कि भारत में आप मेजर हैं
लेकिन हम आपको कर्नल का पद देंगे।
भारत के सपूत मेजर साब ने इस पेशकश
को ठुकरा दिया (हिटलर की पेशकश
को जर्मनी में ही खड़े होकर
ठुकराना आसान बात नहीं थी!) हिटलर के
साथ मेजर ध्यान चंद की मुलाकात बर्लिन
ओलंपिक में हॉकी फ़ाइनल के बाद हुई। इस
मैच में भारत ने जर्मनी को 8-1 से रौंद
डाला था (आठ में से तीन गोल मेजर साब के
थे)… आप समझ सकते हैं कि हिटलर
जैसा व्यक्ति मन-ही-मन मेजर साब से
कितना नाराज़ रहा होगा कि इस
“निचले स्तर के काले इंसान” ने हम उच्च
वर्ण जर्मनों को इस तरह धो डालने
की हिम्मत कैसे की!
* इसी मुलाकात के दौरान हिटलर ने मेजर
साब की हॉकी-स्टिक खरीदने की पेशकश
भी की थी। हिटलर के इस आग्रह
को भी मेजर साब ने ठुकरा दिया था।
* बर्लिन ओलंपिक में ही एक मैच के दौरान
मेजर साब बिना जूते और जुराब पहने खेले थे
–और नंगे पांव खेलने के बावज़ूद उन्होनें इस
मैच में तीन गोल किए।
* बर्लिन ओलंपिक के दौरान जर्मन गोल-
कीपर ने खूब खतरनाक खेल खेला। वह
दूसरी टीम के खिलाड़ियों से टकरा कर
उन्हें गिरा देता था। उसने यही मेजर साब
के साथ किया और टकरा कर उनका एक
दांत तोड़ दिया। इस पर मेजर साब ने
अपनी टीम के खिलाड़ियों से कहा कि हम
जर्मन टीम को सबक सिखाएँगे। मेजर साब
के साथ भारत की टीम इतनी अधिक
सशक्त थी कि भारत के खिलाड़ी बार-
बार गेंद को जर्मन पाले में ले जाते थे और
आसानी से गोल करने की स्थिति में आकर
भी बिना गोल किए गेंद लेकर अपने पाले में
लौट आते थे। उस मैच में ऐसा लग
रहा था जैसे भारत की ग्यारह
बिल्लियाँ जर्मन चूहों को खाने से पहले
उनके साथ खिलवाड़ कर रही हों! इससे
बड़ा अपमान जर्मन टीम का शायद
ही कभी हुआ हो।
* क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी डॉन
बैडमैन ने कहा था कि मेजर ध्यान चंद
तो गोल ऐसे करते हैं जैसे हम क्रिकेट में रन
बनाते हैं!
* ऑस्ट्रिया के वियेना में रहने वालों ने
शहर में मेजर साब का एक बुत
लगाया था जिसमें मेजर साब के चार हाथ
दिखाए गए थे और सभी में हॉकी-स्टिक
थी। गेंद पर मेजर साब के अद्भुत नियत्रंण
के प्रति यह एक अद्भुत सम्मान-प्रदर्शन
था।
* मेजर ध्यान चंद ने 1000 से भी अधिक
गोल किए जिसमें से 400 से अधिक गोल
अंतर्राष्ट्रीय मैचों में किए गए। उन्होनें
लगातार तीन ओलंपिक खेलों में भारत
को स्वर्ण पदक दिलाया –इन तीन
आयोजनों में हुए भारत 12 मैचों के दौरान
मेजर साब ने 33 गोल किए।
* मेजर साब की आत्मकथा तक का नाम
“गोल” है!
* हॉलैंड में मेजर ध्यान चंद की हॉकी-
स्टिक को केवल इसलिए तोड़कर
देखा गया था क्योंकि लोगों को शक
था कि उनकी हॉकी में चुम्बक जैसी कोई
चीज़ है जो गेंद को चिपकाए रखती है।
* मेजर ध्यान चंद 1948 में हॉकी से
रिटायर हुए। उनका जन्मदिन, 29 अगस्त,
भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में
मनाया जाता है –इसी दिन अर्जुन
पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार और
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार दिए
जाते हैं। खेलों में भारत के सर्वोच्च
लाइफ़टाइम अचीवमेंट पुरस्कार
को भी ध्यान चंद पुरस्कार
कहा जाता है।
हॉकी में मेजर ध्यान चंद
की तुलना किसी से नहीं की जाती –ठीक
उसी तरह जैसे फ़ुटबॉल में पेले
की तुलना किसी से नहीं की जाती।
लेकिन भारत के लोगों में स्मरण शक्ति और
कृतज्ञता का भाव काफ़ी कमज़ोर है। आज
विराट कोहली और रोहित शर्मा रन
बना रहे हैं तो आज उन्हें क्रिकेट
का अगला भगवान कहा जा रहा है।
लेकिन भारत की जनता अच्छे
खिलाड़ियों का क्या हश्र करती है
इसका एक ताज़ा उदाहरण तो वीरेन्द्र
सहवाग ही है। आज किसी को सहवाग
की याद नहीं आती जबकि कुछ समय पहले
तक स्टेडियम “सहवाग सहवाग सहवाग” के
नारों से गूंजता था। जब क्रिकेट
खिलाड़ियों का ही ऐसा हश्र होता है
तो हॉकी के जादूगर को कौन याद रखेगा?
मेजर साब के संदर्भ में
महादेवी की लिखी पंक्तियाँ मन में आ
रही हैं:
विश्व में, हे पुष्प!, तू सबके हृदय
भाता रहा
दान कर सर्वस्व फिर भी हाय
हर्षाता रहा
जब न तेरी ही दशा पर दुःख हुआ संसार
को
कौन रोएगा सुमन हमसे मनुज निस्सार को
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दो शब्द जरुर बोले मेजर ध्यानचंद के लिए कृपया
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पाकिस्तान के कराची शहर में एक मंदिर है।


‪#‎सनातन_धर्म_सर्वश्रेष्ठ_था_और_सदा_रहेगा‬
पाकिस्तान के कराची शहर में एक मंदिर है। जिसका रहस्य काफी पुराना और पाताल लोक से है। शास्त्रों के मुताबिक उस मंदिर में भगवान राम भी पहुंच चुके हैं। मंदिर का निर्माण 1882 में हुआ था।

मंदिर में डेढ़ हजार साल पुरानी एक पंचमुखी हनुमानजी की मूर्ति है। लेकिन मूर्ति की कहानी 17 लाख साल पुरानी है। क्योंकि उस मूर्ति का संबंध त्रेता युग से है।

शास्त्रों के मुताबिक पंचमुखी हनुमान समुद्र निवासी थे। लेकिन कुछ साल पहले उस जगह पर एक विचित्र घटना घटी थी। जब कोई मंदिर नहीं था। मंदिर के स्थान पर एक तपस्वी तपस्या किया करते थे। सालों तक तपस्या करने के बाद उन्हें एक दिन सपने में पंचमुखी हनुमान का दर्शन हुआ। सपने में हनुमान जी ने उनसे कहा कि मैं इस जगह के नीचे पाताल लोक में निवास कर रहा हूं। लेकिन तुम मुझे यहां स्थापित करो।

मान्यता है कि सपने में कहे अनुसार पंचमुखी मूर्ति जमीन के अंदर से निकालने लगे। जिस जगह पर स्थित है उस जगह से ठीक 11 मुट्ठी मिट्टी हटाई गई थी और हनुमान जी मूर्ति प्रकट हुई।

मंदिर के पुजारी के मुताबिक मंदिर में सिर्फ 11 या 21 परिक्रमा लगाने से सारी मनोकामना पूरी हो जाती है। अब तक लाखों लोग अपने दुखों से निजात पा चुके हैं।

कराची के उस मंदिर में हिंदू परंपरा के तमाम देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। लेकिन उस मंदिर में हर समुदाय के लोग जाते हैं।

#सनातन_धर्म_सर्वश्रेष्ठ_था_और_सदा_रहेगा
पाकिस्तान के कराची शहर में एक मंदिर है। जिसका रहस्य काफी पुराना और पाताल लोक से है। शास्त्रों के मुताबिक उस मंदिर में भगवान राम भी पहुंच चुके हैं। मंदिर का निर्माण 1882 में हुआ था।

मंदिर में डेढ़ हजार साल पुरानी एक पंचमुखी हनुमानजी की मूर्ति है। लेकिन मूर्ति की कहानी 17 लाख साल पुरानी है। क्योंकि उस मूर्ति का संबंध त्रेता युग से है।

शास्त्रों के मुताबिक पंचमुखी हनुमान समुद्र निवासी थे। लेकिन कुछ साल पहले उस जगह पर एक विचित्र घटना घटी थी। जब कोई मंदिर नहीं था। मंदिर के स्थान पर एक तपस्वी तपस्या किया करते थे। सालों तक तपस्या करने के बाद उन्हें एक दिन सपने में पंचमुखी हनुमान का दर्शन हुआ। सपने में हनुमान जी ने उनसे कहा कि मैं इस जगह के नीचे पाताल लोक में निवास कर रहा हूं। लेकिन तुम मुझे यहां स्थापित करो।

मान्यता है कि सपने में कहे अनुसार पंचमुखी मूर्ति जमीन के अंदर से निकालने लगे। जिस जगह पर स्थित है उस जगह से ठीक 11 मुट्ठी मिट्टी हटाई गई थी और हनुमान जी मूर्ति प्रकट हुई।

मंदिर के पुजारी के मुताबिक मंदिर में सिर्फ 11 या 21 परिक्रमा लगाने से सारी मनोकामना पूरी हो जाती है। अब तक लाखों लोग अपने दुखों से निजात पा चुके हैं।

कराची के उस मंदिर में हिंदू परंपरा के तमाम देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। लेकिन उस मंदिर में हर समुदाय के लोग जाते हैं।
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Temple


http://greatindiantemples.blogspot.in/2008/01/temples-of-prathihara-age.html

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

सिंधु सभ्यता मे मापन पध्दति


सिंधु सभ्यता मे मापन पध्दति

सिंधु घाटी सभ्यता मे मापन पध्दति
हरप्पा  ओर मोहन जो दडो ये दोनो ही सिंधु घाटी के स्थान है| हडप्पा पंजाब प्रदेश के उस भाग मे है जो आजकल पाकिस्तान मे है,ओर मोहन जो दडो सिन्ध मे सिन्धु नदी के किनारे कराची से २०० मील के उत्तर मे है|
इनही हडप्पा ओर मोहनजोदडो स्थानो पर कुछ ऐसे छोटे छोटे आयताकार पिण्ड मिले है,जो स्पष्टतया तौलने के बाट थे
चित्र क्रमांक १ मे सिंधु सभ्यता के तौलने को बाट देखे!
इनमे कुछ चिकने पत्थर के भी थे|इनमे से कुछ बाट बैलनाकार भी थे परन्तु अधिकाश चौकोर घनाकृति के थे| किसी बाट पर कुछ अंकित न था| हेमी(hemmy) ने इन बाटो पर सर्वप्रथम कार्य आरम्भ किया ओर इनहे तौला | मोहनजोदडो की बाटे की तौले तुलना सारणी के चित्र क्रमांक २ मे देखे
इस सारणी से यह स्पष्ट है कि यदि “ग”(c) वर्ग छोड दिया जाय तो सब १,२,४,८,१६,३२,६४,१६०,२००,३२०,६४० ओर१६०० के अनुपात मे है| हमारा आज कल का सैर लगभग २ पौड या ९३३ ग्राम का है|इस प्रकरण मे N बाट का तौल लगभग ३/२ सेर या ३ पौंड की ठहरती है| मोहनजोदडो मे कुछ बांट ०.९८,२.०७,३.०३,३.९२,२४.५०,ओर ४७.३० ग्राम भी पाए गए है जो आपस मे १,२,३,४,२४ ओर ४८ के अनुपात मे थे इनके संकेताक्षर P,Q,R,S,T,U है| इसी तरह के बाट बैबिलोनिया,सूसा,हिला आदि जगह पाए गए है इससे ये भी साबित होता है कि प्राचीन भारत के अन्य सभ्यताओ से भी व्यापारिक सम्बन्ध थे|
मोहन जोदडो का मापदंड- मोहनजोदडो मे १९३१ मे शंख के एक टुकडे पर कुछ निशान लगे मिले| यह टुकडा ६.६२*०.६२ सेंटीमीटर माप का था| इसमे नौ समान्तर रेखाए खिची हुई थी| जिनके बीच की दूरी ०.२६४ इंच की दूरी थी| एक रेखा पर एक वृत भी खिचा है| पांच रेखाओ के बाद एक बडा बिन्दु भी है| वृत ओर बिन्दु का अन्तर आजकल के माप के हिसाब से १.३२ इंच का है| यह अनुमान लगाया जाता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के समय इंच इतना बडा रहा होगा|
चित्र३ मे देखे
इन सब बातो से स्पष्ट है कि प्राचीन भारत मे मापन की उन्नत तकनीके भारत मे प्रचलित थी | यही पध्दितया धीरे धीरे अन्य देशो मे भी पहुची|
वन्दे मातरम्

Posted in वेद और उपनिषद् - Ved & Upanishad

यम यमी संवाद पर एक नजर


यम यमी संवाद पर एक नजर

ऋग्वेद के दशवे मंडल के दशवे सूक्त १०|१० में यम
यमी शब्द आये हैं | जिसके मुर्ख मनुष्य अनर्गल
व्याख्या करते हैं | उसके अनुसार यम
तथा यमी विवस्वान् के पुत्र-पुत्री हैं
और वे एकांत में होते हैं, वहा यमी यम से
सहवास कि इच्छा प्रकट करती हैं |
यमी अनेक तर्क देती किन्तु यम उसके
प्रस्ताव को निषेध कर देता |
तो यमी कहती मेरे साथ तो तु ना कहे
रहा पर किसी अन्य तेरे साथ ऐसे
लिपटेगी जैसे वृक्ष से बेल, इत्यादि |
इस प्रकार के अर्थ दिखा के वेद निंदक नास्तिक वेद को व
आर्यो के प्रति दुष्प्रचार करते हैं | आर्यो का जीवन
सदैव मर्यादित रहा हैं, क्यों के वे वेद में वर्णित ईश्वर
कि आज्ञा का सदैव पालन करते रहे हैं | यहाँ तो यह
मिथ्या प्रचार किया जा रहा अल्पबुद्धि अनार्यों द्वारा के वेद पिता-
पुत्री, भाई-बहन के अवैध संबंधो कि शिक्षा देते
और वैदिक काल में इसका पालन होता रहा है |
वेदों के भाष्य के लिए वेदांगों का पालन करना होता हैं, निरुक्त ६
वेदांगों में से एक हैं | निघंटु के भाष्य निरुक्त में यस्कराचार्य
क्या कहते हैं यह देखना अति आवश्यक होता हैं व्याकरण
के नियमों के पालन के साथ-२ ही | व्याकरण
भी ६ वेदांगों में से एक हैं |* राथ यम-
यमी को भाई बहन मानते और
मनावजाती का आदि युगल किन्तु मोक्ष मुलर (प्रचलित
नाम मैक्स मुलर) तक ने इसका खंडन किया क्यों के उन्हें
भी वेद में इसका प्रमाण नहीं मिल पाया |
हिब्रू विचार में आदम और ईव मानव जाती में के
आदि माता-पिता माने जाते हैं | ये विचार ईसाईयों और मुसलमानों में
यथावत मान्य हैं | उनकी सर्वमान्य मान्यता के
अनुसार दुनिया भाई बहन के जोड़े से हि शुरू हुई | अल्लाह
(या जो भी वे नाम या चरित्र मानते हैं) उसने
दुनिया को प्रारंभ करने के लिए भाई को बहन पर चढ़ाया और
वो सही भी माना जाता और फिर उसने
आगे सगे भाई-बहनो का निषेध
किया वहा वो सही हैं | ये वे मतांध लोग हैं
जो अपने मत में प्रचलित हर मान्यता को सत्य मानते हैं और
दूसरे में अमान्य असत्य बात को सत्य सिद्ध करने पर लगे रहते
हैं | ये लोग वेदों के अनर्गल अर्थो का प्रचार करने में लगे
रहते हैं |
स्कन्द स्वामी निरुक्त भाष्य में यम
यमी कि २ प्रकार व्याख्या करते हैं |
१.नित्यपक्षे तु यम आदित्यो यम्यपि रात्रिः |५|२|
२.यदा नैरुक्तपक्षे
मध्यमस्थाना यमी तदा मध्यमस्थानों यमो वायुवैघुतो वा वर्षाकाले
व्यतीते तामाह | प्रागस्माद् वर्षकाले अष्टौ मासान्-
अन्यमुषू त्वमित्यादी | |११|५
आपने आदित्य को यम
तथा रात्री को यमी माना हैं
अथवा माध्यमिक
मेघवाणी यमी तथा माध्यमस्थानीय
वायु या वैधुताग्नी यम हैं | शतपथ ब्राहमण में
अग्नि तथा पृथ्वी को यम-यमी कहा हैं
|
सत्यव्रत राजेश अपनी पुस्तक “यम-
यमी सूक्त कि अध्यात्मिक व्याख्या” कि भूमिका में
स्पष्ट लिखते हैं के यम-यमी का परस्पर सम्बन्ध
पति-पत्नी हो सकता हैं भाई बहन
कदापि नहीं क्यों के यम पद “पुंयोगदाख्यायाम्” सूत्र
से स्त्रीवाचक डिष~ प्रत्यय पति-
पत्नी भाव में ही लगेगा | सिद्धांत
कौमुदी कि बाल्मानोरमा टिका में “पुंयोग” पद
कि व्याख्या करते हुए लिखा हैं –
“अकुर्वतीमपि भर्तकृतान्** वधबंधादीन्
यथा लभते एवं तच्छब्दमपि, इति भाष्यस्वारस्येन जायापत्यात्मकस्
यैव पुंयोगस्य विवाक्षित्वात् |”
यहा टिकाकर ने भी महाभाष्य के आधार पर
पति पत्नी भाव में डिष~ प्रत्यय माना हैं | और
स्वयं सायणाचार्य ने ताण्डय्-महाब्राहमण के भाष्य में
यमी यमस्य पत्नी, लिखा हैं ,
अतः जहा पत्नी भाव विवक्षित
नहीं होगा वहा – “अजाघतष्टाप्” से टाप् प्रत्यय
लगकर यमा पद बनेगा और अर्थ होगा यम कि बहन | जैसे गोप
कि पत्नी गोपी तथा बहन
गोपा कहलाएगी.,अतः यम-यमी पति-
पत्नी हो सकते हैं, भाई बहन
कदापि नहीं | सत्यव्रत राजेश जी ने
अपनी पुस्तक में यम को पुरुष-
जीवात्मा तथा यमी को प्रकृति मान कर
इस सूक्त कि व्याख्या कि हैं |
स्वामी ब्रह्मुनी तथा चंद्रमणि पालिरात्न
ने निरुक्तभाष्य ने यम-यमी को पति-
पत्नी ही माना हैं | सत्यार्थ प्रकाश में
महर्षि दयानंद कि भी यही मान्यता हैं
|
डा० रामनाथ वेदालंकार के अनुसार – आध्यात्मिक के यम-
यमी प्राण तथा तनु (काया) होने असंभव हैं |
जो तेजस् रूप विवस्वान् तथा पृथ्वी एवं आपः रूप
सरण्यु से उत्पन्न होते हैं | ये दोनों शरीरस्थ
आत्मा के सहायक एवं पोषक होते हैं | मनुष्य कि तनु
या पार्थिव चेतना ये चाहती हैं कि प्राण मुझ से
विवाह कर ले तथा मेरे ही पोषण में तत्पर रहे |
यदि ऐसा हो जाए तो मनुष्य कि सारी आतंरिक
प्रगति अवरुद्ध हो जाये तथा वह पशुता प्रधान
ही रह जाये | मनुष्य का लक्ष्य हैं पार्थिक
चेतना से ऊपर उठकर आत्मलोक तक पहुचना हैं |
श्री शिव शंकर काव्यतीर्थ ने यम-
यमी को सूर्य के पुत्र-पुत्री दिन रात
माना हैं तथा कहा हैं कि जैसे रात और दिन
इकठ्ठा नहीं हो सकते ऐसे ही भाई-
बहन का परस्पर विवाह भी निषिद्ध हैं |
पुरुष तथा प्रकृति का आलंकारिक वर्णन मानने पर,
प्रकृति जीव को हर प्रकार से
अपनी ओर अकार्षित करना चाहती हैं,
किन्तु जीव कि सार्थकता प्रकृति के प्रलोभन में न
फसकर पद्मपत्र कि भाति संयमित जीवन बिताने में हैं
|
इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में वेद और लोक व्यहवार –विरुद्ध भाई
बहिन के सहवास सम्बन्धी अर्थ को करना युक्त
नहीं हैं | इसी सूक्त में
कहा हैं-“पापमाहुर्यः सवसारं निगच्छात्” बहिन भाई का अनुचित
सम्बन्ध पाप हैं | इसे पाप बताने वा वेद स्वयं इसके
विपरीत बात
कि शिक्षा कभी नहीं देता हैं |
सन्दर्भ ग्रन्थ – आर्य विद्वान वेद रत्न सत्यव्रत राजेश के
व्याख्यानों के संकलन “वेदों में इतिहास नहीं” नामक
पुस्तिका से व्याकरण प्रमाण सभारित |

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क्या चार्वाक दलित क्रांतिकारी थे …


क्या चार्वाक दलित क्रांतिकारी थे …

चार्वाक जिन्हें देख हम सब नास्तिक की छवि बना लेते है ,खेर चार्वाक नास्तिक अनीश्वर वादी थे ,,,लेकिन वो पहले से ही ऐसे थे या बाद मे ऐसे हुए कुछ कहा नहीं जा सकता है ,,,लेकिन आज कल एक हवा उड़ाई जा रही है कि चार्वाक मूलनिवासी आन्दोलन कारी थे ,,,इसका कारण है की दलितों ने जो भी वेदविरोधी देखा उसे मूलनिवासी क्रांतिकारी बना दिया चाहे कोई भी हो ,,,
अब हम चार्वाक के बारे मे कुछ जानेंगे …चार्वाक असल मे ब्राह्मण वाद का विरोधी था लेकिन उनके दर्शन मे छुआछूत या वर्ण व्यवस्था के विरोध मे कुछ नही मिलता है तो चार्वाक को मूलनिवासी क्रांतिकारी नही कह सकते है …हाँ पाखंड विरोधी कहा जा सकता है लेकिन चार्वाक की कुछ शिक्षाए पर नजर डालते है …

चार्वाक का अनीश्वरवाद :-

जैसा की बताया है की चार्वाक ब्राह्मण विरोधी थे तो ब्राह्मणों के ईश्वर वाद का उन्होंने खंडन किया ओर राजा को ही ईश्वर कहा :-
“लोक सिध्दो राजा परमेश्वर:”
राजा ही परमैश्वर है|

चार्वाक का अनात्मवाद :-

चार्वाक ने ब्राह्मणओ के द्वारा आत्मा की सत्ता के सिधान्त का खंडन किया अर्थात ब्राह्मण आत्मा को मानते है तो चार्वाक ने मानने से इंकार कर दिया :-
“तत् चैतन्यविशिष्टदेह एवात्म् देहातिरिक्त आत्मानि प्रमाणाभावात् प्रत्यक्षैकप्रमाणवादितया अनुमानदेरनड्गीकारेण प्रामाण्याभावात्||
चैतेन्यविशिष्ट देह ही आत्मा है,देह के अतिरिक्त आत्मा के होने मे कोई प्रमाण नही जिनलोगो के मत मे केवल एकमात्र प्रत्यक्ष ही प्रमाणरूप मे परिणत होता है अनुमानादि प्रमाण मे परिमाणित नही होता उ लोगो के मत मे देह के अतिरिक्त आत्मा मानने मे दुसरा कोई प्रमाण नही है|

चार्वाक द्वारा 4 भूतो को ही मानना :-

ब्राह्मण आदि 5 महाभूतो को मानते थे लेकिन चार्वाक ने इससे इंकार किया ओर केवल 4 भूत माने :-
तदेतत् सर्व्व समग्राहि” अत्र चत्वारि भूतानि स्यापवलानिला:||
इस जगत मे भूमि ,जल,अग्नि,वायु चार ही भूत है|

चार्वाक द्वारा पुनर्जनम को अमान्य बताना:-

ब्राहमणओ के पुनर्जनम के सिधान्त को चार्वाक ने गलत बताया :-
  भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:इति||

देह जलने पर किसी प्रकार का पुनरागमन नही हो सकता है|

चार्वाक द्वारा वेदों का विरोध :-

चार्वाक ने अपने ब्राह्मण विरोध के चलते वेदों का भी विरोध किया :-
“त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डधूर्तनिशाचरा:| जर्फरीतुर्फरीत्यादि पण्डितानां वच: स्मृतम्||
भंड,धूर्त,निशाचर ये लोग वेद के कर्ता है| जर्फरी तुर्फरी इत्यादि वाक्यो से वेद भरा है|
अब ये पता नही की चार्वाक को जाफरी तुर्फरी शब्द कोनसे वेद मे दिखे ,,खेर ब्राह्मण विरोध के चलते सब कुछ का विरोध करना शुरू कर दिया था …

चार्वाक द्वारा पशु बलि ,श्राद्ध आदि का विरोध :-

चार्वाक ने पशु बलि ओर पाखंड का विरोध किया जिसे हम सही कहते है लेकिन इसका कारण ब्राह्मण वाद के विरोध की वजह से हुआ ,,जिसे आगे बताया जायेगा :-
पशुश्र्चेत्रित: स्वर्ग ज्योतिष्टोमे गमिष्यति| स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते||
तुम लोग कहते हो जो ज्योतिष्टोमादि यज्ञ मे जिस पशु का वध किया जाता है वह स्वर्ग मे जाता है,तो तुम अपने पिता की बलि क्यु नही देते ऐसा करने से वह भी स्वर्ग मे जा सकता है|
“अग्निहोत्र त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुंठनम्| बुध्दिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पति:”||
त्रिवेद,यज्ञोपवीत्,भस्मलेपन ये सब बुध्दि ओर पौरूषहीन व्यक्तियो की जीविकामात्र है|

चार्वाक द्वारा संयम का विरोध ओर इन्द्रिय सुख को महत्व देना :-

चार्वाक जैसा की बताया ब्राह्मण विरोधी थे तो उन्होंने ब्राह्मणों के साथ साथ वैदिक सिधान्तो का भी विरोध किया जहा वेदों मे ब्रह्मचर्य का उपदेश है ओर इन्द्रिय सुख को दुःख का कारण बताया है ..लेकिन अपने ब्राह्मणवाद मे अंधे हुए चार्वाक ने इनका भी विरोध किया :-
अंगनालिकानादिजन्यं सुखमेव पुरूषार्थ:| न चास्य दुखसंभित्रतया पुरूषार्थत्वमेव नास्तीति मन्तव्यम्|अवर्ज्जनीयतया प्राप्तस्य दुखस्य परिहारेण सुखमात्रस्यैव भौक्तव्यत्वात् | तद्यथा मत्स्यार्थी सशल्कान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते स यावदादेयं तावदादाय निवर्तते| यथा वा धान्यार्थी सपलालानि धन्यान्याहरित सयावदादेंय तावदादाय निवर्तेते|नहि मृगा: सन्तीति शालयो नोप्यन्ते नहि भिक्षुका: सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्रीयन्ते यदि कश्चिद् भीरूदृष्टं सुखम् त्यजेत् तर्हि स पशुवन्मूर्खो भवेत्||”
कामिनीसंगजनित सुखही पुरूषार्थ है| स्त्रीसंगजनित सुखमे दु:खसम्पर्क है (यदि ऐसा) कहकर इसको पुरूषार्थ न कहे तो इसको नही मान सकते चाहे युवती के संसर्ग मे दुख हो तथापि उस दुख को छोड कर केवल सुख ही का भोग करना चाहिए|जिस प्रकार मछलीखाने वाले लोग छिलका ओर काटा निकली हुई मछली के छिलका ओर कांटे का परित्याग कर मास भाग ही ग्रहण करते है| तृणयुक्त धान्य मे से तृण परित्यागकर केवल सारभाग धान्य ग्रहण करते है,उसी प्रकार स्त्री संग मे दुख होने पर उस दुख का परित्यागकर सुख भौगा जा सकता है|इस लिए दुख के भय से सुख का परित्याग नही करना चाहिए| जिस देश मे मृग होते है क्या वहा धान नही बोए जाते है| एवं भिक्षुकभय से चूल्हे पर हांडी नही चढाई जाती?यदि कोई भीरू व्यक्ति इसप्रकार दुष्टमुख छोडे तो उसको पशुतुल्य मूर्खभिन्न ओर क्या कहा जाएगा
” यावज्जीवेत सुखं जीवेद्दणं कृत्वा घृतं पिवेत्| ” भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत:||
जब तक जियो सुख से जियो कर्जा लेकर भी घी पियो क्यु की मृत्यु के बाद पुनर्जन्म किसने देखा है
यदि उपरोक्त कथन देखे तो चार्वाक ब्राह्मणवाद के विरोधी थे ,,लेकिन उन्हें दलित क्रांतिकारी नही कह सकते है ,,क्यूँ की ब्राह्मण क्षत्रिय ,ब्राहमण वेश्यो मे भी विरोध चलता रहा है ,,शायद चार्वाक क्षत्रिय हो क्यूँ की उन्होंने अश्वमेध की गलत परम्परा का भी विरोध किया था देखे :-
“अश्वस्यात्र हि शिश्नं तु पत्नीग्राह्मं प्रकीर्त्तितम्| भण्डेस्तद्वत्परं चैव ग्राहजातं प्रकीर्त्तितम्|
अश्वमेध यज्ञ मे यचमान की पत्नि घोडे का शिश्न ग्रहण करे इत्यादि भंड रचित है|
अब यहाँ हम स्पष्ट नही कह सकते की चार्वाक कोन थे लेकिन वो ब्राह्मणवाद के विरोधी थे ये कह सकते है ..लेकिन दलित क्रांतिकारी कहना गलत है …क्यूँ की चार्वाक दर्शन मे छुआछूत का विरोध नही दीखता है …इसके अलावा चार्वाक ने राजा को ईश्वर बताया है मतलब जैसे ईश्वर को मानते है वेसे राजा को मानो अब यहाँ सोचने वाली बात है की क्या राजा लोग दलितों पर अत्याचार नही करते थे …यदि चार्वाक दलित क्रांतिकारी होते तो राजा आदि का भी विरोध करते ,,,लेकिन ऐसा नही है जबकि क्षत्रिय तो सुवर्ण मे ही आते है ,,जिन्हें चार्वाक ने ईश्वर ही बताया ……..

संधर्भित पुस्तके :- (१) चार्वाक दर्शन