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स्वास्थ्य के स्वर्णिम 40 सूत्र


स्वास्थ्य के स्वर्णिम 40 सूत्र

  1. भूख व भोजन 

अच्छे स्वास्थ्य के लिए यह आवश्यक है कि उचित भूख लगने पर ही भोजन किया जाए। ऐसा क्यों करें? कारण यह है कि जो भोजन हम करते हैं उसका परिपाक आमाश्य में होता है। यदि भूख ठीक न हो तो आमाशय के द्वारा भोजन ठीक से नहीं पकता अथवा पचता। इस कारण भोजन से जो रस उत्पन्न होते है वो दूषित रहते हैं। ये रस व्यक्ति में रोग उत्पन्न करते हैं व स्वास्थ्य खराब करते हैं। इस समस्या के आयुर्वेद में आमवात कहा जाता है। किसी ने सत्य ही कहा है-

‘‘आम कर दे काम तमाम’’
“AMA” is the term used in Ayurveda for endotoxins. The “Ama” are endotoxins formed in the intestines due to faulty digestion. The low digestive fire leads to formation of fermentation inside the intestines and that in turn can increase the formation of pus and mucus. The formation of “Ama” is increased if the food is rich in fast foods, packaged food, burgers, pizzas, non-veg diet and other heavy greasy items. Cheese is also not good in this case. Milk and dairy products should also be avoided.- (Dr. Vikram Chauhan)

यह आमवात ही सन्धिवात का मूल कारण होता है।

परन्तु आज विडम्बना यह है कि व्यक्ति को खुलकर भूख लगना ही भूख लगना ही बंद हो गया है प्राकृतिक भूख व्यक्ति को लग नहीं पा रही है। बस दो या तीन समय भोजन सामने देख व्यक्ति भोजन कर डालता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति भूख से कम खाए। बहुत से व्यक्ति डायबिटिज व अन्य घातक रोगों के चंगुल में फंस कर बहुत कमजोर हो गए है। ऐसे लोगों को यह सुझाव दिया जाता है कि हर दो तीन घण्टें में कुछ न कुछ खाते रहें अन्यथा बहुत दुर्बलता अथवा अम्लता (Acidity) बनने लगेगी।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि व्यक्ति किसी जटिल रोग के चंगुल में फंस गया है तो उसी अनुसार उसे अपने जीवनक्रम को ढालना पड़ेगा जब तक वह उससे मुक्त न हो जाए अन्यथा यह उसके लिए गणघातक हो सकता है।

स्वस्थ व्यक्ति के लिए यह अच्छा होगा कि हफते दस दिन में एक बार उपवास अवश्य करें। उपवास उचित रीति से करें इसके लिए पुस्तक सनातन धर्म का प्रसाद पढ़ें।

पहले लोग खूब मेहनत करते थे व डटकर खाना खाते थे उनको सबकुछ हजम होता था व स्वास्थ्य बढि़या रहता था, क्योंकि उचित शारीरिक श्रम से खूब बढि़या भूख लगती थी।

  1. शारीरिक श्रम व व्यायाम

हमारा सम्पूर्ण शरीर माॅंसपेशियों का बना है। माॅंसपेशियों की ताकत बनाए रखने के लिए उचित शारीरिक श्रम अथवा व्यायाम अनिवार्य है। स्वस्थ व्यक्ति प्रतिदिन इतना श्रम अवश्य करें कि उसके शरीर से पसीना निकलते रहे। जो व्यक्ति पर्याप्त मेहनत नहीं करता उसको व्यायाम, योगासन अथवा प्रातः साॅंय तीन चार कि.मी. पैदल चलना चाहिए।

पहले महिलाएॅं घर का कार्य स्वयं करती थी इससे बहुत स्वस्थ रहती थी,परन्तु आज के मशीनी युग ने हमारी माता-बहनों का स्वास्थ्य चौपट कर दिया है। यह हमारे सामने प्रत्यक्ष है कि बागडि़यों व पहाड़ी महिलाओं को प्रसव में बहुत कम कष्ट होता है। उनके यहाॅं आराम से घर पर ही बच्चे पैदा हो जाते हैं क्योंकि वो मेहनत बहुत करती हैं।

चीन के लोग स्वस्थ व ताकतवर होते हैं क्योंकि वो साइकिलों का प्रयोग खूब करते हैं।

शारीरिक श्रम व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार करें। यदि रोगी व दुर्बल व्यक्ति अधिक मेहनत कर लेगा तो उसे लाभ के स्थान पर हानि भी हो सकती है। इस स्थिति में पैदल चलना बहुत लाभप्रद रहता है।

समाज में कुछ अच्छी परिपाटियाॅं अवश्य चलें। जैसे प्रातः अथवा सायं पूरा परिवार मिलकर स्वयं लघु वाटिका चलाए कुछ फल, फूल, सब्जियाॅं उगाए। इससे परिवार को अच्छी सब्जियाॅं मिलेंगी व शारीरिक श्रम भी होगा।

  1. उचित दिनचर्या

प्रातःकाल ब्रह्म मुहुर्त में उठना व रात्रि में सही समय पर सोना दीर्ध जीवन के लिए अनिवार्य है। रात्रि 9 बजे के उपरान्त कफ का समय प्रारम्भ होता है उस समय जो शयन करते हैं उनके शरीर की टूट-फूट की मरम्मत अच्छी हो जाती है व शरीर मजबूत बनता है। प्रातः चार बजे के उपरान्त वात का समय होता है। उस समय जो सोता है वायु विकारों की चपेट में आने की सम्भावना बढ़ जाती है। युवाओं के लिए छः से आठ घण्टे की नींद व बच्चों के लिए आठ से दस घण्टे की नींद लेना अच्छा रहता है।

सूर्योदय से पूर्व शीतल जल से स्नान करने का प्रयास करें। यदि शरीर कमजोर है तो हल्का कुनकुना (Luke Warm) अथवा गर्म पानी में स्नान करें। शीतल जल का स्नान उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है। रात्रि में पेट में जो गर्मी बनती है वह इस स्नान से दूर हो जाती है। अन्यथा सूर्य निकलने पर वह गर्मी बढ़कर पाचन सम्बन्धित विकारों को जन्म देती हैं।

इसी प्रकार दो समय भोजन अच्छा होता है। प्रातः दस ग्यारह बजे व सायं छः सात बजे। परन्तु आवश्यकतानुसार तीन बार भी भोजन किया जा सकता है।

उचित समय पर उचित काम अर्थात् नियमित व संयमित दिनचर्या अच्छे स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक हैं।

  1. भोजन की प्रकृति व आपूर्ति

बच्चों के लिए भोजन में कई नियम नहीं रखने चाहिए। जब इच्छा हो खाएॅं। युवाओं के पौष्टिक भोजन नियमानुसार करना चाहिए व प्रौढ़ भोजन सन्तुलित करें।

  1. भोजन का जरूरत से ज्यादा पकाएॅं नहीं।
  2. रोटी के लिए मोटा प्रयोग करें यह आॅंतों में नहीं चिपकेगा। मैदा अथवा         बारीक आटा आॅंतों में चिपक कर सड़ता है जिससे आॅंतों के संक्रमण          (इन्फेक्शन) का खतरा बढ़ जाता है।
  3. भोजन में अम्लीय पदार्थों की मात्रा कम रखें
  4. साबूत दालें भिगोकर अंकुरित कर खाएॅं
  5. भोजन शान्त मन से चबचबा कर करें
  6. भोजन के समय कोई अन्य काम जैसे पुस्तक पढ़ना, टीवी देखना न करें।
  7. भोजन के साथ जल का सेवन न करें।
  8. प्रातःकाल थोड़ा भारी भोजन कर सकते हैं परन्तु सायंकाल भोजन हल्का करें। भोजन का पाचन सूर्य पर निर्भर करता है। सूर्य की ऊष्मा से नाभिचक्र अधिक सक्रिय होता है। भोजन पचाने में लगी अग्नि को जठराग्नि कहा जाता है जिसका नियंत्रण नाभि चक्र से होता है। जिनका नाभि चक्र सुस्त हो जाता है, कितना भी चूर्ण चटनी खा लें भोजन ठीक से नहीं पच पाता। गायत्री का देवता सविता (सूर्य) है अतः नाभि चक्र को मजबूती के लिए गायत्री मंत्र का आधा घण्टा जप अवश्य करें।
  9. भोजन के विषय में कहा जाता है – हितभुक, ऋतुभुक मितभुक अर्थात वह        भोजन करें तो हितकारी हो।

जैसे दूध के साथ मूली व दही के साथ खीर लेना अहितकारी है परन्तु केले के साथ छोटी इलाइची एवं चावल के साथ नारियल की गिरी लाभप्रद है इसी प्रकार भोजन ऋतु के अनुकूल हो (ऋतुभुक) उदाहरण के लिए ग्रीष्म ऋतु में गेहूॅं के साथ जौ लाभप्रद रहता है क्योंकि जौ की प्रकृति शीतल होती है परन्तु वर्षा ऋतु में गेहूॅं के साथ चना पिसवाना आवश्यक है वर्षा ऋतु में वात कुपित होता है जिसको रोकने के लिए चना बहुत लाभप्रद रहता है।

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