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बुध्द ओर वैदिक वर्णव्यवस्था

बुध्द ओर वैदिक वर्णव्यवस्था

मित्रो, विधाता ने जीवोँ के कल्याण के लिए
सृष्टि को बनाया है। जीवोँ के कल्याणार्थ सब भोग पदार्थ
दिये गए हैँ। परमात्मा ने अपना नित्य अनादि ज्ञान(वेद)
भी सृष्टि के आदि मेँ दिया है। जैसे सृष्टि के अन्य-अन्य
नियम(Laws) अनादि व नित्य(Eternal) हैँ। इसी प्रकार
से परमात्मा का वेदज्ञान भी अनादि व सार्वभौमिक है।
जीव कर्म करने मेँ स्वतन्त्र है। यह बात मनोविज्ञान
को भी मान्य है। यही वैदिक सिद्धान्त है।
मानव इस कारण से अपने स्वार्थ, हठ, दुराग्रह व अज्ञानवश
परमात्मा के नियम तोड़ देता है। संसार मेँ कभी एक वैदिक
धर्म सबको मान्य था। इस बात के प्रमाण बाईबल व कुरान मेँ
भी मिलते हैँ। फिर ऐसा समय
भी आया कि वेद विरूद्ध मत फैलने लगे। भारत मेँ
ही वेदोँ के नाम पर पशु हिँसा होने लगे। जन्म
की जाति-पाति, अस्पृश्यता के कारण गुण कर्म का महत्व
घटता गया। स्त्रियोँ का भी तिरस्कार होने लगा।
स्वार्थी लोगोँ ने जो केवल नाममात्र के ब्राह्मण थे,
भारतवर्ष मेँ प्रचलित वैदिक कर्मणा वर्णव्यवस्था के स्थान पर
जन्मना जाति व्यवस्था को खड़ा कर दिया। ऐसी वेला मेँ
महात्मा बुद्ध इन सबके विरूद्ध अभियान छेड़ा। बुद्ध करूणामूर्ति थे।
उनकी वाणी मेँ बल था। उन्होनेँ जन्म
की जाति पाँति, आडम्बरोँ व अन्धविश्वासोँ के विरूद्ध आवाज
उठाई। उनकी वाणी मेँ सत्य था और आत्मा मेँ
सत्य कहने का साहस। उन्होनेँ मुख्य रूप से जो पाँच यम है
उनका ही उपदेश किया। जो कुछ
भी कहा उसमेँ अधिकांश वैदिक शिक्षायेँ
ही मिलती हैँ।
महात्मा बुद्ध ने कोई ग्रन्थ नही रचा। उनके मुख्य-2
उपदेशोँ को संग्रहीत करके धम्मपद पुस्तक का संकलन
किया गया। इसमे छोटे-छोटे 26 अध्याय हैँ। इनमेँ कुल 423 उपदेश
हैँ। महात्मा बुद्ध के इन उपदेशोँ को हम एक आर्य सुधारक
की वाणी कह सकते हैँ। इस पुस्तक मेँ
मानव-कल्याण की और विश्व-शान्ति का उपदेश
देनेवाली एक भी तो ऐसी बात
नहीँ जिसे नया कहा जा सके या जो वेद
आदि प्राचीन शास्त्रोँ मेँ न हो। न जाने
राजनीति से प्रेरित होकर कुछ लोग दिन रात यह दुष्प्रचार
क्योँ करते है कि महात्मा बुद्ध ने एक नया मत चलाया था।
आश्चर्य की बात तो यह है कि बुद्ध के उपदेशोँ मेँ
‘आर्य’ कौन है और ब्राह्मण कौन है- इस विषय के कई उपदेश
हैँ और समस्त उपदेश वेदोक्त हैँ। इस युग मेँ ऋषि दयानन्द ने
भी तो यही कुछ कहा। दोनो मेँ अन्तर है
तो केवल यह कि महात्मा बुद्ध के कथन
की वेदादि प्रमाणोँ से
पुष्टि नही की गई और ऋषि दयानन्द ने
बिना प्रमाण कुछा कहा ही नहीँ।
कर्मणा वर्ण विचार पर वेद का मन्तव्य– मित्रो, वेदोँ मेँ ब्राह्मण,
क्षत्रियादि शब्द यौगिक और गुणवाचक हैँ। जो ब्रह्मा अर्थात्
परमेश्वर और वेद को जानता और उनका प्रचार करता है, वह
ब्राह्मण है। क्षत व आपत्ति से समाज और देश
की रक्षा करने वाले क्षत्रिय, व्यापारादि के लिये एक देश
से दूसरे मेँ प्रवेश करने वाले वैश्य और उच्च ज्ञानरहित होने के
कारण सेवार्थ लगने वाले शूद्र हैँ। इस प्रकार समस्त वर्ण
व्यवस्था कर्मानुसार संचालित है न कि जन्मानुसार।
च गिरीणां, सग्ड़मे च नदिनाम्। धिया विप्रो अजायत।।(यजु॰
26/15)
वेद मन्त्र यही बतलाता है
कि पर्वतोँ की उपत्यकाओँ, नदियोँ के
संगमो इत्यादि रमरीण प्रदेशोँ मेँ रहकर विद्याध्ययन करने
और उत्तम बुद्धि तथा अति श्रेष्ठ कर्म से मनुष्य ब्राह्मण बन
जाते हैँ।
कर्मणा वर्ण व्यवस्था पर बुद्ध विचार– मित्रो, महात्मा बुद्ध ने
जन्मानुसार वर्ण मानने का खण्डन किया है किन्तु गुण-कर्मानुसार
ब्राह्मण आदि मानने का उन्होनेँ स्पष्ट प्रतिपादन किया है।
सुत्त निपात वसिठ्ठ सुत्त मेँ वर्णन है कि एक वसिठ्ठ और भारद्वाज
नामके दे ब्राह्मणोँ का वर्ण भेद के विषय मेँ विवाद हुआ। वसिठ्ठ
कर्मणा वर्ण के पक्ष मेँ था और भारद्वाज जन्मना। तब उन्होनेँ इस
पर महात्मा बुद्ध से व्यवस्था माँगी। महात्मा बुद्ध ने
जो कुछ कहा उसका सार मैँ लिखता हूं।
“जो व्यापार करता है वह
व्यापारी ही कहलायेगा और शिल्पकार हम
शिल्पी ही कहेँगे ब्राह्मण
नहीँ। अस्त्र-शस्त्रोँ से अपना निर्वाह
करनेवाला मनुष्य सैनिक कहा जायेगा ब्राह्मण नही।
अपने कर्म से कोई किसान है तो कोई शिल्पकार कोई
व्यापारी है तो कोई अनुचर। कर्म पर
ही जगत् स्थित है।” (समस्त प्रकरण देखेँ सुत्त
निपात श्लोक 596 से 610 तक) मित्रोँ, महात्मा बुद्ध ने श्लोक 650
मेँ जो कहा वो मैँ लिखता हूं।
“न जच्चा ब्राह्मणो होति, न जज्चा होति अब्राह्मणो।
कम्मना ब्राह्मणो होति, कम्मना होति अब्राह्मणोँ।। मुझे
नही लगता कि इसका अर्थ मैँ लिखू
धम्मपद के ब्राह्मण वग्ग मेँ महात्मा बुद्ध ने जो उपदेश ब्राह्मण
विषयक दिये हैँ वे भी देखे-
“न जटाहि न गोत्तेहि, न जच्चा होति ब्राह्मणो। यम्हि सच्चं च
धम्मो च, सो सुची सो च ब्राह्मणो।। (धम्मपद ब्राह्मण
वग्ग 11)
अर्थात् न जटा से, न गोत्र से, न जन्म से ब्राह्मण होता है, जिसमेँ
सत्य और धर्म है वही शुचि है और
वही ब्राह्मण है। ऋषि दयानन्द और महात्मा बुद्ध–
महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशोँ की पुष्टि मेँ
आश्चर्यजनक रूप से चाण्डाल पुत्र मातंग नामक व्यक्ति का उदाहरण
दिया है जो बाद कर्मानुसार ब्राह्मण हो गये थे। (देखेँ सुत्त निपात
हिन्दी अनुवाद पृ॰51) और अब देखिए ऋषि दयानन्द ने
भी अपने अमर ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश” मेँ एक प्रश्न
के उत्तर मेँ लिखा है कि “अन्य वर्णस्थ बहुत से लोग ब्राह्मण
हो गये हैँ जैसे जाबाल ऋषि अज्ञात कुल, विश्वामित्र क्षत्रिय वर्ण
से, और मांतग ऋषि चाण्डाल कुल से ब्राह्मण हो गये थे। अब
भी जो उत्तम विद्या स्वभाव वाला है
वही ब्राह्मण के योग्य और मूर्ख शूद्र के योग्य
होता है।(मातंग ऋषि महातपस्वी शबरी के
गुरू थे)
नोट- मित्रो, इस प्रकार हमने देखा कि महात्मा बुद्ध वैदिक
कर्मणा वर्णव्यवस्था के पोषक थे। उन्होनेँ केवल आडम्बरोँ का विरोध
किया था जो करना भी चाहिए था। इसलिए हम
श्री रमेशचन्द्रजी दत्त के परिणाम से
सर्वथा सहमत हैँ कि- “ऐतिहासिक दृष्टि से यह कथन अशुद्ध
है कि गौतम बुद्ध ने जान-बूझकर कोई नया मत चलाने का प्रयत्न
किया। उनका अन्त तक यही विश्वास
था कि ब्राह्मणोँ श्रमणोँ तथा अन्योँ मेँ प्रचलित धर्म
का प्राचीन और शुद्ध रूप मेँ प्रचार कर रहे है
जो पीछे से बिगड़ गया था।(Ancient india by R.C
Dutt Vol. II P.226)
स्वामी धर्मानन्द जी की पुस्तक
बोद्धमत और वैदिक धर्म से साभार।

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