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नाड़ी तंत्र एवं सात चक्र


नाड़ी तंत्र एवं सात चक्र

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सूर्य व चद्र नाड़ी-

 

इच्छाओं की पूर्ति के लिए कोई  क्षमता अवश्य होनी चाहिए। इच्छा तृप्ति के लिए यह शक्ति शरीर के दायीं ओर पिंगला नाड़ी पर कार्यवृति धारण करती है। यह कार्य स्रोत शारीरिक तथा बौद्धिक गतिविधियों का स्रोत है। अपनी गतिविधि के उप-फल के रूप में यह मस्तिष्क के दायीं ओर अंह को विकसित करता है। बायें और दायें दोनों सूक्ष्म-मार्ग स्थूल रूप से मेरूरज्जू के बाहर नाड़ी-प्रणाली को व्यक्त करते है।

सूर्य स्रोत में पुरूषत्व गुण जैसे विश्लेषण, स्पार्धा, सहनशीलता आदि निहित है। चन्द्र स्रोत में सोम्यता, प्रतिसम्वेदना, सहयोग तथा अतर्बोध आदि मादा गुण सम्मिलित है। मस्तिष्क के दो गोलार्ध विरोधी परन्तु सम्पूरक कार्य करते है। शरीर के दायें भाग पर नजर रखने वाले बायें गोलर्ध की विशेषता विचार करना, योजना बनाना तथा विश्लेषण करने जैसे रैखिक प्रक्रम है। शरीर के बायें भाग का ध्यान रखने वाला दायां गोलार्ध भावना, स्मृति और इच्छाऔं आदि में कार्यरत है।

सात चक्र

1- मूलाधार चक्र-

रीढ़ की हड्ड़ी के निचले छोर से थोड़ा सा बाहर की ओर मूलाधार नामक पहला चक्र स्थित है। मूलाधार चक्र का स्थान रीढ़ की हड्डी के एकदम निचले हिस्से में होता है। यानि यह जननेन्द्रिय और गुदा के मध्य में होता है। इस चक्र के बिलकुल उपर कुंडलिनी शक्ति होती है। मूलाधार चक्र को जागृत किए बिना कुंडलिनी शक्ति को जगृत नहीं किया जा सकता। मूलाधार चक्र को अधार चक्र, प्रथम चक्र, बेस चक्र या रूट चक्र भी कहते हैं। यह चक्र निष्कपटता तथा विवेक देवता द्वारा शासित है। यह देवता रीढ़ की हड्ड़ी में स्थित पवित्र अस्थि में विश्राम करती हुर्इ कुंडलिनी की अपवित्र इरादों के अनुचित प्रवेश से रक्षा करता है। मुलाधार चक्र से उपर की ओर पवित्र त्रिकोणकार अस्थि में स्थित ‘मूलाधार’ कहलाता है।

1-मूलाधार चक्र यदि दुर्बल हो तो कुंडलिनी अपने स्थान से नहीं उठती और यदि यह चक्र अपवित्रता ग्रसित हो तो कुंडलिनी उठने के बाद भी खिंच कर वापस अपने स्थान पर आ जाती है। कुंडलिनी का उत्थान मूलाधार से सातवें चक्र तक होता है जहां यह सामूहिक चेतना को व्यक्त करने वाली आत्मा से एकाकार कर लेती है। शरीर के अन्दर मूलाधार चक्र को शारीरिक क्रियाओं, अवरोधन और मल-त्याग को संभालना है। अमर्यादित यौन संबंध, अवांछित नैतिकता, निष्कासन अंगों पर दबाव ( जैसे कब्ज तथा पेचिश ) इस चक्र में तनाव के कारण बनते है। प्रजनन को भी कई  प्रकार से यह चक्र नियंत्रित करता है। नशीले पदार्थ तथा तांत्रिक क्रियाएं इस चक्र को अत्यंत हानि पहुंचाते है। जागृत मूलाधारचक्र साहस, निष्कपटता तथा निर्देशन बुधि  प्रदान करता है। इस प्रकार का व्यक्ति अत्यंत शुभकर तथा पास-पड़ोस के लिए सौभागय और र्इश्वरीय आंनद को लाने वाला होता है। इस चक्र के देवता श्री गणेश है। यदि आपने अपने मूलाधार चक्र को जागृत कर लिया तो सच मानिएं आपने श्रीगणेश को प्राप्त कर लिया। यानि आपकी आध्यात्मिक उन्नति की शुरुआत हो जाएगी।

मूलाधार चक्र की विकृति से बीमारियां

जो व्यक्ति अधिक कामुक, छल, कपट, प्रपंच और अहंकार को पालने वाला होता है, उसके मूलाधार चक्र में विकृतियां आने लगती है। इससे रीढ़ की हड्डी की बीमारियां,जोड़ों का दर्द, रक्त विकार, शरीर विकास की समस्या, कैंसर, कब्ज, गैस, सिर दर्द,जोडों की समस्या, गुदा संबंधी बीमारियां, यौन रोग, संतान प्राप्ति में समस्याएं,मानसिक कमजोरी आ सकती है। इन सभी समस्याओं से बचने के लिए जरूरी है कि हम शुद्ध आचरण करें, शुद्ध विचार रखें, कामवासना की शुद्धता का पालन करें, अहंकार त्यागें और अपने आप में मासूमियत विकसित करें। यदि  इन आप इन बातों का पालन कर लेते है तो निश्चित ही अपने आप में श्रीगणेश को जागृत कर लेंगे।

2-स्वाधिष्ठान चक्र-

भौतिक शरीर में दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान चक्र के नाम से जाना जाता है। यह गुर्दे, जिगर के नीचे का हिस्सा, अग्नाश्य (पेनक्रियांस) प्लीहा (स्पलीन) और आंत्र (इन्टैस्टाइन) को चलाने का कार्य करता है। मस्तिष्क के भूरे तथा सफेद कणों की कमी को पूरा करने के लिए यह चक्र पेट की चर्बी के कणों को तोड़ कर मस्तिष्क को उर्जा प्रदान करता है। तथा इस प्रकार मस्तिष्क की विचार शक्ति को नव जीवन प्रदान करता है। फिर भी अत्याधिक सोच विचार, हीन भावना सूर्य स्रोत को नि:शक्त कर देती है। चिंता इसी स्रोत का अपव्यय करके इसे दुर्बल बनाती है। यह चक्र र्सोदर्य बोध तथा कलात्मक दृष्टि कोण उत्पन्न करता है। दैवी सरस्वती इसकी शासक है।

3-नाभि चक्र-

भौतिक रूप में नाभि-चक्र नाम का तीसरा चक्र पेट और जिगर के उपरी भाग की देखभाल करता है। अव्यवस्थित जीवन शैली, उतेजनापूर्ण  चिन्तन, धन लोलुपता इस चक्र के विकास में बाधा उत्पन्न करता है।

4-हृदय चक्र-

करूणा सभी पैगम्बरों और अवतरणों का सार-तत्व है। एक स्वस्थ हृदय चक्र ही इसका स्रोत है। केवल हृदय चक्र द्वारा ही निर्मल प्रेम के सुखद उल्लास का अनुभव हो पाता है। पति-पत्नी में से किसी का एक दूसरे पर प्रभुत्व जमाना या स्वामित्व भाव-ग्रस्त होना वास्तविक प्रेम का गला घोंट देता है। तथा संबंधों के विकास में बाधा डालता है। तिरस्कृति की अवस्था में नारी हतोत्साहित हो जाती है और उसमें दबा-दबा क्रोध विकसित हो जाता है। यह क्रोध प्राय: बच्चों पर या चरित्रहीनता के रूप में प्रकट होता है। तथा पुरानी बीमारियों की स्थिती में नारियों में स्तन संबंधी रोग उत्पन्न हो जाते है। असंतुलित जीवन, तीव्र अनुशासन, कठोर व्यवहार एवं हठ योग इस चक्र को दूषित करते है। दैवी नियमों की अवहेलना, र्इश्वर का अपमान, आत्मतत्व की और उदासीनता,दास्ता, चापलूसी तथा झूठी नम्रता इस चक्र के लिए हानिकारक है।

मध्य हृदय-मध्य हृदय की अधिष्ठात्री श्री जगदम्बा जी है। यह शक्तिप्रदायनी है। असुरक्षा भावना, भय, आशंका आदि से यह चक्र व्यथित हो जाता है। जगदम्बा रूप में श्री माता जी से हृदय-पूर्वक प्रार्थना करने से यह चक्र ठीक हो जाता है।

दायां हृदय- दायां हृदय के अधिष्ठाता श्री सीता राम जी है। मर्यादा इनका गुण है। मर्यादा विहिनता इस चक्र को हानि पहुंचाती है। यह पिता का चक्र हैं। जो पिता अपने बच्चों को अधार्मिकता में उतारता है या जिसकें संबंध अपने बच्चों से ठीक नहीं उसका यह चक्र विकृत हो जाता है। तथा उसे श्वास रोग हो सकता है। श्री राम तथा सीता के गुणों को अपने अंदर स्थापित करने तथा प्रार्थना करने से यह चक्र ठीक हो जाता है।

5-विशुद्धि चक्र-

विशुद्धि चक्र शरीर का प्रथम छन्ना (फिल्टर) है। अत: यह अति संवेदनशील चक्र है। तथा बाहरी जीवाणुओं से रक्षा करता है। दूषित वायु में श्वास लेना, तथा ध्रुमपान से यह चक्र रूद्ध हो जाता है। झूठे अंधाधुध मंत्रोच्चारण से भी इस चक्र की संवेदनशीलता भंग हो जाती है। झूठे गुरूओं द्वारा दिये गए मंत्र इसकी संवेदनशीलता के लिए अति हानिकारक है।

इस चक्र के देवता राधा कृष्ण व्यवहार में कुशलता का उपदेश देते है। जिससे कि मनुष्य चतुराई  से विपत्ति का सामना कर सकें। जब यह चक्र खुलता है। तो मानवीय लघु-ब्रह्मंड़ अंतरिक्षीय ब्रहमांड  के प्रति जागरूक हो उठता है।

(अर्थात मानाव विराट के प्रति जागरूक हो जाता है।)

6-आज्ञा चक्र-

विकास के छठे चरण पर कुंड़लिनी इस चक्र का छेदन करके पूर्ण गौरव के साथ सातवें चक्र पर आरोहित हो पाती है। अंह से मुक्ति प्राप्त करने के लिए मनुष्य को सबको क्षमा करना पड़ता है।

दूसरों को क्षमा करने से हमारा अंह कम होता है।  परमात्मा के विषय में अनुचित विचार भी इस चक्र में बाधा उत्पन्न करते है। धार्मिक लोग मतांध हो जाते है। वे शास्त्रों के शब्द-जाल में उलझ कर पैगम्बरों द्वारा बताया सार-तत्व खो देते है। मनुष्य को कट्टर नहीं बनना है।

येशु मानव मात्र को सब दोषों से मुक्त करने के लिए आये। उन्होने सब को क्षमा कर दिया तथा सब दोषों को स्वय  पर ले लिया। स्वय को क्रूसारोपित करवा कर मानव को स्वनिहित अंह (अभिमान) का स्पष्ट अनुभव करने में सहायता की। मानव  के महान पश्चाताप का उद्य हुआ जिसने उसे अपने अंह की दुष्टता को देखने के योग्य बनाया। परिणामत: मानव में नम्रता जाग्रत हुर्इ।

(From a book of Mata Nirmla Devi Sahaj Yoga with thanks)

अवधू सहस दल अब देख।
श्वेत रंग जहाँ पैंखरी छवि, अग्र डोर विशेख।।
अमृत वरषा होत अति झरि, तेज पुंज प्रकाश।
नाद अनहद बजत अद्भुत, महा ब्रह्मविलास।।
-सन्त चरण दास

उस सहस्त्रार चक्र में हज़ार पंखुडि़यों वाला कमल है, जो जल के बिना ही विकसित होता है। जानते हो, उससे निरन्तर अमृत की वर्षा होती है। वह अमृत जिसका पान कर जीवात्मा के दुःख, पाप, व्याधि आदि समाप्त हो जाते हैं। उस नगर में अद्भुत संगीत भी बज रहा है। ऐसी मधुर ध्वनि, जिसकी कोई हद नहीं- अनहद बाजे बाजन लागे, चोर नगरिया तजि-तजि भागे। उन बाजों-ध्वनियों को सुनकर काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार रूपी चोर, जो हमारी पुण्य पूँजी को लूट रहे थे, डर कर भाग जाते है। कितना विलक्षण है यह नगर, जहाँ कोई भय, दुःख क्लेश नहीं!! यदि है, तो मात्र आनंद ही आनंद, मात्र दर्शन ही दर्शन!

(to be continued)

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