Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

कैलाश मंदिर जिसे औरंगज़ेब भी नष्ट नहीं करवा पाया


कैलाश मंदिर जिसे औरंगज़ेब भी नष्ट नहीं करवा पाया

१६८२ में औरंगजेब ने एल्लोरा गुफाओ में स्तिथ कैलाश मंदिर को नष्ट करने का आदेश दिया और १००० लोगो को इस काम में लगाया जिन्होने ३ साल तक लगातार प्रयास किया परन्तु वह इस मंदिर का नुकसान नहीं कर पाया वह केवल कुछ मूर्तिया ही तोड़ पाए
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In 1682, Aurangzeb ordered that that the Kailash temple be destroyed, so that there would be no trace of it. Records show that a 1000 people worked for 3 years, and they could only do a very minimal damage. They could break and disfigure a few statues here and there, but they realized it is just not possible to completely destroy this temple. Aurangzeb finally gave up on this impossible task.

कैलाश मंदिर जिसे औरंगज़ेब भी नष्ट नहीं करवा पाया

१६८२ में औरंगजेब ने एल्लोरा गुफाओ में स्तिथ कैलाश मंदिर को नष्ट करने का आदेश दिया और १००० लोगो को इस काम में लगाया जिन्होने ३ साल तक लगातार प्रयास किया परन्तु वह इस मंदिर का नुकसान नहीं कर पाया वह केवल कुछ मूर्तिया ही तोड़ पाए 
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In 1682, Aurangzeb ordered that that the Kailash temple be destroyed, so that there would be no trace of it. Records show that a 1000 people worked for 3 years, and they could only do a very minimal damage. They could break and disfigure a few statues here and there, but they realized it is just not possible to completely destroy this temple. Aurangzeb finally gave up on this impossible task.
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Tajmahal


Mahesh Dhankhad ताजमहल को प्यार की निशानी कहने वालो, मुमताज का मकबरा कहने वालों ध्यान से पढो ताजमहल किसी शाहजहाँ ने नही बनवाया था। साडी दुनिया अभी तक इस धोखे में थी की ताजमहल शाहजहाँ ने मुमताज के लिए बनवाया था। पर professior ओक ने अपनी खोज में पाया की ये ईमारत कोई मकबरा नही है बल्कि एक प्राचीन शिव मंदिर है। जिसका नाम तेजो महालय था। जिसको शाहजहाँ ने महाराजा जय सिंह जी से अवैध रूप से छिन् लिया था। और उसके बाद इससे तमाम ऐसी चीजे मिटा दी जिससे की भविष्य में किसी को पता ना चले की ये एक। शिव मंदिर था। और फिर शुरू की झूठी अफवाह की शाहजहाँ ने कारीगरों के हाथ कटवा दिए। लेकिन सच छुपता नही छुपाने से। शाजहाँ सभी सबूत नष्ट नही कर पाया और अब धीरे धीरे इस झूठ से पर्दा उठ रहा है। डॉ सुब्रमण्यम स्वामी जी ने ताजमहल को लेकर कोर्ट में केस भी फ़ाइल् कियाहै। और अभी तक केस हम हिन्दुओ के पक्ष में है। क्योकि सबूत बोलते है की ये तज्मह्ल्न्हि तेजो महालय था। और जल्द ही पूरी दुनिया के सामने होगा सच की दुनिया की सबसे खुबसुरत ईमारत मकबरा नही एक शिव मंदिर है। वहा पर गिरने वाली पानी की बुन्द मुमताज का आसु नही नही शिवलिंग पर गिरनेवाला कुदरती जलाभीषेक है भारत के इतिहास को बदला गया है . ( जिसे भी ये जानकारी अच्छी लगे शेयर करे।) जय महादेव एक बार इसे भी पढ़े … १) मुमताज शहाजहानकी चौथी बीवी थी.. २) शहाजहानने मुमताज से शादी करने के लिए उसके पति का खून किया था ३) १४ वे बच्चे को जन्म देते हुए मुमताज़ की मौत हुई थी ४) मुमताज के मरने के बाद शहाजहानने उसकी बहन से शादी कर ली . इसमें प्रेम कहा है..? plzz share to all एक बात बोलू इंकार मत करना आपको आप जिसे चाहते हे उनकी कसम हे। शिव जी 5 नाम 1″शिव शंकर 2″भोले नाथ 3″नील कंठ 4″महारुद्र 5″मृत्युंजय 10 लोगोको सेंड करो पर मुझे नहीं ।आज आपको गुड न्यूज़ मिलेगी,अगर पढ़कर अन्जान बने रहे तो शानिवार तक कुछ ऐसा होगा जो कभी सोचा भी नहीं

Posted in हिन्दू पतन

हिन्दू मुस्लिम एकता


हिन्दू मुस्लिम एकता एक अंसभव कार्य है..
भारत से समस्त मुसलमानों को पाकिस्तान भेजना और हिन्दुओं को वहां से बुलाना ही एक हल है । यदि यूनान तुर्की और बुल्गारिया जैसे कम साधनों वाले छोटे छोटे देश यह कर सकते हैं
तो हमारे लिए कोई कठिनाई नहीं ।
साम्प्रदायिक शांति हेतु अदला बदली के इस महत्वपूर्ण कार्य को न अपनाना अत्यंत उपहासास्पद होगा ।
विभाजन के बाद भी भारत में साम्प्रदायिक समस्या बनी रहेगी ।
पाकिस्तान में रुके हुए अल्पसंख्यक हिन्दुओं की सुरक्षा कैसे होगी ? मुसलमानों के लिए हिन्दू काफिर सम्मान के योग्य नहीं है ।
मुसलमान की भातृ भावना केवल मुसमलमानों
के लिए है । कुरान गैर मुसलमानों को मित्र बनाने का
विरोधी है , इसीलिए हिन्दू सिर्फ घृणा और
शत्रुता के योग्य है । मुसलामनों की निष्ठा भी केवल मुस्लिम देश
के प्रति होती है । इस्लाम सच्चे मुसलमानो हेतु भारत को अपनी
मातृभूमि और हिन्दुओं को अपना निकट
संबधी मानने की आज्ञा नहीं देता ।
संभवतः यही कारण था कि “मौलाना मौहम्मद अली” जैसे भारतीय मुसलमान भी अपने शरीर को भारत की अपेक्षा ‘येरूसलम” में दफनाना’ अधिक पसन्द किया । ”
कांग्रेस में मुसलमानों की स्थिति एक
साम्प्रदायिक चौकी जैसी है ।
गुण्डागर्दी मुस्लिम राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है ।
इस्लामी कानून समान सुधार के विरोधी हैं । धर्म निरपेक्षता को नहीं मानते । मुस्लिम कानूनों के अनुसार भारत हिन्दुओं
और मुसलमानों की समान मातृभूमि नहीं हो
सकती । वे भारत जैसे गैर मुस्लिम देश को
इस्लामिक देश बनाने में जिहाद आतंकवाद
का संकोच नहीं करते ।
प्रमाण सार डा अंबेडकर सम्पूर्ण वाग्मय ,
खण्ड १५१

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इस पोस्ट के जरिये इमाम बुखारी की सारी असलियत ( कच्चा चिठ्ठा ) बताया गया हैं


Rampal..Asaram ki baat ho rahi hai..
Sab ka dhyaan rakho…
Iss k baare me bhi padho…
Jis k liye..Porkistan ka PM ….Hindustan k PM se jyada important hai…!!!

इस पोस्ट के जरिये इमाम बुखारी की सारी असलियत
( कच्चा चिठ्ठा ) बताया गया हैं…. मेरा आप लोगो से व्यक्तिगत
निवेदन हैं की पूरी पोस्ट को पड़े और शेयर जरूर करे जिससे अधिक से
अधिक लोग इस बुखारी की असलियत जान सके…….
दिल्ली के चावड़ी बाजार में स्थित जामा मस्जिद हिंदुस्तान
की सबसे बड़ी औ सुंदर मस्जिद है. सन 1656 में जब यह बनकर तैयार
हुई तो कहा जाता है कि मुगल बादशाह शाहजहां प्रसन्न होने के
साथ-साथ चिंतित भी थे. उन्हें समझ में नहीं आता था कि इस भव्य
मस्जिद का इमाम किसे बनाया जाए.
शाहजहां की इच्छा थी कि इस विशेष मस्जिद का इमाम भी विशेष
हो. एक ऐसा इंसान जो पवित्र, ज्ञानी, और हर लिहाज़ से श्रेष्ठ
हो. उज्बेकिस्तान के बुखारा शाह ने शाहजहां को एक ऐसे
ही व्यक्ति के बारे में बताया. इसके बाद शाहजहां के बुलावे पर
उज्बेकिस्तान के बुखारा से आए सैयद अब्दुल गफ्फूर शाह
बुखारी जामा मस्जिद के पहले इमाम बने. उन्हें उस वक्त इमाम-
उल-सल्तनत की उपाधि दी गई. आज उसी परिवार के सैयद अहमद
बुखारी जामा मस्जिद के 13वें इमाम हैं.
सैयद अब्दुल गफ्फूर शाह बुखारी को जामा मस्जिद
का पहला इमाम बनाते वक्त शाहजहां को जरा भी इल्म
नहीं होगा कि उस पवित्र व्यक्ति की आने वाली किसी पीढ़ी और
जामा मस्जिद के भावी इमाम पर इमामत छोड़कर सियासत करने,
जामा मस्जिद का दुरुपयोग करने, इसके आस-पास के इलाके में
लगभग समानांतर सरकार चलाने की कोशिश करने और कानून
को अपनी जेब में रखकर घूमने जैसे आरोप लगाए जाएंगे.
18 मई, 2013 को दिल्ली की एक अदालत ने सन 2004 में
सामाजिक कार्यकर्ता अरशद अली फहमी के घर पर
जानलेवा हमला कराने के आरोप में इमाम अहमद
बुखारी को गिरफ्तार करके पेश करने का आदेश जारी किया.
हालांकि इमाम अहमद बुखारी के लिए यह कोई नई बात नहीं है.
इससे पहले भी कई मौकों पर अदालतें उन्हें गिरफ्तार करने का आदेश
दे चुकी हैं. मगर वे कभी अदालत में पेश नहीं हुए.
इससे जरा ही पहले जामा मस्जिद के बिजली बिल का विवाद
भी सामने आया था. जामा मस्जिद पर चार करोड़ रुपये के करीब
बिजली बिल बकाया है. इमाम का कहना है कि इस बिल
को भरना वक्फ बोर्ड की जिम्मेदारी है. जबकि वक्फ बोर्ड
का कहना था कि चूंकि मस्जिद और उसके सभी संसाधनों पर इमाम
बुखारी का नियंत्रण है और इससे उन्हें जबरदस्त आमदनी होती है
इसलिए बिजली बिल भी उन्हें ही भरना चाहिए.
बिल्कुल हाल ही की बात करें तो इमाम बुखारी उत्तर प्रदेश के
पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और पिछले से पिछले
लोकसभा चुनाव में भाजपा का साथ देने के बाद अब राष्ट्रीय
लोक दल के शीर्ष नेताओं के साथ बैठकें कर रहे हैं. जानकारों के
मुताबिक समाजवादी पार्टी से उनकी नाराजगी की वजह उनके
निकट रिश्तेदारों को प्रदेश सरकार में महत्वपूर्ण ओहदे
नहीं दिया जाना है.
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि बुखारी परिवार
की यात्रा आज से करीब साढे़ तीन दशक पहले तक
बिना किसी विवाद के चली आ रही थी. सैकड़ों सालों से. इस पवित्र
परिवार के राजनीति में हस्तक्षेप करने की शुरुआत वर्तमान इमाम के
पिता अब्दुल्ला बुखारी के कार्यकाल में हुई जिसने अहमद
बुखारी तक आते-आते हर तरह की सीमाओं को लांघ दिया. आज
हालत यह है कि इमाम अहमद बुखारी राजनीति में
अवसरवादिता की हद तक जाने के अलावा और भी तमाम तरह के
गंभीर आरोपों के दायरे में हैं.
बुखारी परिवार के वर्तमान को समझने के लिए करीब 36 साल पहले
के उसके अतीत में चलते हैं. सन 1977 के लोकसभा चुनावों में
कांग्रेस के खिलाफ फतवा देकर मुसलमानों से
जनता पार्टी को समर्थन देने की अपील वह
पहली घटना थी जिसने जामा मस्जिद के इमाम का एक दूसरा पक्ष
लोगों के सामने रखा. धार्मिक गुरु के इस राजनीतिक फतवे से
भारतीय राजनीति में जो हलचल पैदा हुई वह आगे जाकर और बढ़ने
वाली थी. इससे पहले तक इमाम और राजनीति के बीच सिर्फ दुआ-
सलाम का ही रिश्ता हुआ करता था. सन 1977 की इस घटना के
बाद जामा मस्जिद राजनीति का एक प्रमुख केंद्र बन गया. अब
यहां राजनेता तत्कालीन इमाम से राजनीति के दांव-पेंचों पर
चर्चा करते देखे जा सकते थे. जैसे-जैसे मस्जिद में राजनीतिक
चर्चा के लिए आनेवाले नेताओं की संख्या बढ़ती गई वैसे-वैसे
यहां शुक्रवार को होने वाले इमाम के संबोधनों का राजनीतिक रंग
भी गाढ़ा होता गया. ‘कांग्रेस लाई फिल्मी मदारी, हम लाए इमाम
बुखारी’ जैसे नारे 1977 की उस चुनावी फिजा में खूब गूंजे
जो बुखारी की भूमिका और प्रभाव को स्पष्ट करने के लिए
काफी थे.
कई मौकों पर अदालतें बुखारी को गिरफ्तार करने का आदेश दे
चुकी हैं. लेकिन पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने की कभी हिम्मत नहीं कर
पाई चुनाव में इंदिरा गांधी हार गईं और जनता पार्टी की सरकार
बनी. इंदिरा की हार का कारण चाहे जो रहा हो लेकिन इसने इमाम
को अपनी मजबूत राजनीतिक हैसियत के भाव से सराबोर कर दिया.
1977 के बाद अगले आम चुनावों में इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने
जनता पार्टी के बजाय इंदिरा के लिए समर्थन
का फतवा जारी किया. उन्होंने कहा कि इंदिरा ने जामा मस्जिद से
अपने किए की माफी मांग ली है इसलिए हम उनका समर्थन कर रहे
हैं.
खैर चुनाव हुआ और उसमें इंदिरा विजयी रहीं. जानकार बताते हैं
कि इन दो चुनावों के कारण इमाम
अब्दुल्ला बुखारी की ऐसी छवि बन गई कि वे जिसे चाहें उसे
जितवा सकते हैं. उस दौर के गवाह रहे लोग बताते हैं कि यहीं से
मुसलमानों को रिझाने के लिए बड़े-बड़े राजनेता जामा मस्जिद शीश
नवाने पहुंचने लगे.
जानकारों का एक वर्ग मानता है कि इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने
अधिकांश मौकों पर हवा का रुख देखकर फतवा जारी किया.
मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार सलीम अख़्तर
सिद्दीकी कहते हैं, ’77 में आपातकाल में हुईं ज्यादतियों को लेकर
कांग्रेस के प्रति लोगों में जबरदस्त रोष था. खासकर मुसलमान
जबरन नसबंदी को लेकर बहुत ज्यादा नाराज थे. ऐसे में
यदि अब्दुल्ला बुखारी कांग्रेस को वोट देने की अपील करते
तो मुसलमान उनकी बात नहीं सुनते. ऐसा ही 1980 के चुनाव में
भी हुआ. इस चुनाव में अब्दुल्ला बुखारी ने देखा कि आपातकाल
की जांच के लिए गठित शाह आयोग द्वारा इंदिरा गांधी से
घंटों पूछताछ की वजह से इंदिरा गांधी के प्रति देश की जनता में
हमदर्दी पैदा हो रही है. उन्होंने मुसलमानों से कांग्रेस को वोट देने
की अपील कर दी. यही बात 1989 के लोकसभा चुनावों में
भी दोहराई गई.’
खैर, पार्टियों की जीत का कारण चाहे जो रहा हो लेकिन इन
चुनाव परिणामों ने धीरे-धीरे इमाम के राजनीतिक प्रभुत्व
को स्थापित किया और छोटे-बड़े राजनेता और राजनीतिक दल
जामा मस्जिद के सामने कतारबंद होते चले गए. यहां यह
भी उल्लेखनीय है कि इमाम बनने के बाद एक लंबे समय तक सैय्यद
अब्दुल्ला बुखारी राजनीति से जुड़ी हर चीज से दूर रहे थे. लंबे समय
से बुखारी परिवार को देखने वाले और अब्दुल्ला बुखारी के बेहद
नजदीक रहे उर्दू अखबार सेक्यूलर कयादत के संपादक कारी मुहम्मद
मियां मजहरी कहते हैं, ‘अब्दुल्ला बुखारी राजनीतिक तबीयत वाले
व्यक्ति हैं लेकिन उनके अब्बा सियासी आदमी नहीं थे. यही कारण
है कि जब तक वे जिंदा रहे तब तक अब्दुल्ला बुखारी राजनीति से दूर
रहे. लेकिन अब्बा के इंतकाल के बाद उन्होंने इमामत के साथ
ही सियासत में भी हाथ आजमाना शुरू कर दिया.’
ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशावरत के पूर्व अध्यक्ष एवं पूर्व
सांसद सैयद शहाबुद्दीन कहते हैं, ‘यहीं से जामा मस्जिद
का राजनीतिक स्वार्थ के लिए प्रयोग शुरू हुआ.
अब्दुल्ला बुखारी के बाद उनके बेटे अहमद बुखारी ने इस
नकारात्मक परंपरा को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि और मजबूत
किया.’ अब्दुल्ला बुखारी द्वारा जामा मस्जिद के राजनीतिक
दुरुपयोग का एक उदाहरण देते हुए शहाबुद्दीन कहते हैं,
‘इंदिरा गांधी के जमाने में जब वे बतौर प्रधानमंत्री 15 अगस्त
को लालकिले से भाषण दिया करती थीं तो उसको कांउटर करते हुए
जामा मस्जिद से अब्दुल्ला बुखारी ने भाषण देना शुरू कर दिया था.
ये पहली बार था. जब लालकिले से पीएम के भाषण के खिलाफ
कोई उसके सामने स्थित जामा मस्जिद से हुंकार भर रहा था.’
बुखारी परिवार के राजनीति में हस्तक्षेप करने की शुरुआत वर्तमान
इमाम के पिता अब्दुल्ला बुखारी के कार्यकाल में हुई पिता के
सामने राजनेताओं को रेंगते और हाथ जोड़कर आशीर्वाद देने
की अपील करते नेताओं को देखकर अहमद बुखारी को भी धीरे-धीरे
जामा मस्जिद और उसके इमाम की धार्मिक और राजनीतिक
हैसियत का अहसास होता चला गया. ऐसे में अहमद
बुखारी भी पिता की छत्रछाया में राजनीति को नियंत्रित करने
की अपनी महत्वाकांक्षा के साथ सियासी मैदान में कूद पड़े. 1980
में अहमद बुखारी ने आदम सेना नामक एक संगठन बनाया.
इसका प्रचार एक ऐसे संगठन के रूप में
किया गया जो मुसलमानों की अपनी सेना थी और हर मुश्किल में,
खासकर सांप्रदायिक शक्तियों के हमले की स्थिति में,
उनकी रक्षा करेगी. लेकिन बुखारी के तमाम प्रयासों के बाद
भी इस संगठन को आम मुसलमानों का समर्थन नहीं मिला. वरिष्ठ
पत्रकार वदूद साजिद कहते हैं, ‘मुस्लिम समाज की तरफ से इस
सेना को ना में जवाब मिला. समर्थन न मिलता देख अहमद
बुखारी ने इस योजना को वहीं दफन कर दिया.’
जानकार बताते हैं कि बुखारी की यह सेना भले ही समर्थन के
ऑक्सीजन के अभाव में चल बसी लेकिन उसने अन्य सांप्रदायिक
शक्तियों के लिए खाद-पानी का काम जरूर किया. उस समय संघ
परिवार के लोग यह कहते पाए गए कि देखिए, भारतीय मुसलमान
अपनी अलग सेना बना रहा है. हिंदू धर्म और हिंदुओं पर खतरे
की बात चारों तरफ प्रचारित की गई. ऐसा कहते हैं कि बजरंग दल
के गठन के पीछे की एक बड़ी वजह आदम सेना भी थी.
सन 2000 में अहमद बुखारी जामा मस्जिद के इमाम बने. एक भव्य
समारोह में उनकी दस्तारबंदी की गई. तब अहमद बुखारी पर इस
बात का भी आरोप लगा कि उन्होंने अपने पिता से जबरन
अपनी दस्तारबंदी करवाई है. नाम न छापने की शर्त पर परिवार के
एक करीबी व्यक्ति कहते हैं, ‘उन्हें अपनी दस्तारबंदी कराने
की हड़बड़ी इसलिए थी कि उन्हें लगता था कि यदि इससे पहले उनके
वालिद का इंतकाल हो जाता है तो कहीं उनके भाई भी इमाम बनने
का सपना ना देखने लगें.’ दस्तारबंदी के कार्यक्रम में मौजूद लोग
भी बताते हैं कि कैसे उस कार्यक्रम में बड़े इमाम अर्थात
अब्दुल्ला बुखारी को जामा मस्जिद तक एंबुलेंस में लाया गया था.
उन्हें स्ट्रेचर पर मस्जिद के अंदर ले जाया गया था.
खैर, अहमद बुखारी जामा मस्जिद के इमाम बन गए. इमाम बनने के
बाद बुखारी ने पहली घोषणा एक राजनीतिक दल बनाने की की.
बुखारी का उस समय बयान था, ‘हम इस देश में सिर्फ वोट देने के
लिए नहीं हैं, कि वोट दें और अगले पांच साल तक प्रताड़ित होते रहें.
हम मुसलमानों की एक अलग राजनीतिक पार्टी बनाएंगे.’ एक
राजनेता कहते हैं, ‘बड़े इमाम साहब के समय में भी नेता उनके पास
वोट मांगने जाते थे लेकिन वो वोट के बदले कौम की भलाई करने
की बात करते थे. लेकिन इन इमाम साहब के समय में ये हुआ है
कि नेता वोट के बदले क्या और कितना लोगे जैसी बातें करने लगे.’
बुखारी परिवार को बेहद करीब से जानने वाले वरिष्ठ स्तंभकार
फिरोज बख्त अहमद कहते हैं, ‘वर्तमान इमाम के पिता बेहद निडर
और ईमानदार आदमी हुआ करते थे. समाज में उनका प्रभाव था,
स्वीकार्यता थी, विश्वसनीयता थी लेकिन इनके साथ
ऐसा नहीं रहा.’
खैर, समय बढ़ने के साथ ही अहमद बुखारी के राजनीतिक हस्तक्षेप
की कहानी और गहरी व विवादित होती गई. उन पर यह आरोप लगने
लगा कि वे व्यक्तिगत फायदे के लिए किसी भी राजनीतिक दल
का समर्थन कर सकते हैं. राजनीतिक-सामाजिक गलियारों में यह
बात बहुत तेजी से फैल गई कि बुखारी के समर्थन की एक ‘कीमत’ है
जिसे चुकाकर बेहद आराम से कोई भी उनका फतवा अपने पक्ष में
जारी करा सकता है.
इसे समझने के लिए 2012 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में
बुखारी की भूमिका को देखा जा सकता है. चुनाव में अहमद
बुखारी ने समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की बात की. यह
भी उल्लेखनीय है कि प्रदेश में 2007 के विधानसभा चुनावों और
2009 के लोकसभा चुनावों में बुखारी ने सपा का विरोध किया था.
कुछ समय पहले तक सपा को सांप्रदायिक पार्टी बताने वाले इमाम
साहब ने जब मुलायम को समर्थन का एलान किया तभी इस बात
की चर्चा चारों ओर शुरू हो गई थी कि इसके बदले इमाम साहब
क्या चाहते हैं? अभी लोग कयास लगा ही रहे थे
कि पता चला कि इमाम साहब के दामाद उमर अली खान
को सहारनपुर की बेहट विधानसभा सीट से सपा ने
अपना उम्मीदवार बना दिया है.
लेकिन चुनाव के बाद जो परिणाम आया वह बेहद भयानक था.
सपा ने जिन इमाम साहब से यह सोचकर समर्थन मांगा था कि इससे
उप्र के मुसलमान पार्टी से जुड़ेंगे उन्हीं के दामाद चुनाव हार गए.
और वह भी एक ऐसी सीट से जहां कुल वोटरों में से 80
फीसदी मुसलमान थे. और उस सीट से लड़ने वाले प्रत्याशियों में
एकमात्र उमर ही मुसलमान थे. दामाद के हार जाने के बाद
भी अहमद बुखारी ने हार नहीं मानी. उन्होंने उमर को विधान
परिषद का सदस्य बनवा दिया. बाद में जब उन्होंने दामाद
को मंत्री और भाई को राज्य सभा सीट देने की मांग की तो उसे
मुलायम ने मानने से इनकार कर दिया. बस फिर क्या था. अहमद
बुखारी और सपा का एक साल पुराना संबंध खत्म हो गया.
बुखारी के दामाद ने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे
दिया. मीडिया और आम लोगों ने जब इमाम साहब से इस संबंध
विच्छेद का कारण पूछा तो वे यह कहते पाए गए कि यूपी में
सपा सरकार मुसलमानों के साथ धोखा कर रही है. सरकार का एक
साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है लेकिन अभी तक उसने
मुसलमानों के कल्याण के लिए कुछ नहीं किया. उल्टे मुसलमान
सपा सरकार में और अधिक प्रताड़ित हो रहे हैं.
खैर, इधर इमाम साहब मुस्लिमों के साथ अन्याय करने का सपा पर
आरोप लगा रहे थे तो दूसरी तरफ सपा के लोग उन्हें
भाजपा का दलाल तथा सरकार को ब्लैकमेल करने वाला करार दे
रहे थे. मुसलमानों के साथ अन्याय के आरोप पर सपा के वरिष्ठ
नेता आजम खान का तंज भरा बयान यह आया कि मुलायम सिंह
यादव को अहमद बुखारी की बात मान लेनी चाहिए
थी क्योंकि ‘भाई को राज्य सभा और दामाद को लाल बत्ती मिल
जाती तो मुसलमानों की सारी परेशानियां दूर हो जातीं.’
सपा से अलग होने के कुछ समय बाद ही बुखारी ने मुलायम सिंह
यादव के गृह जनपद इटावा में ‘अधिकार दो रैली’ की. उस रैली में
इमाम साहब बहुजन समाजवादी पार्टी पर डोरे डालते नज़र आए.
जिन मायावती में कुछ समय पहले तक उन्हें तमाम कमियां दिखाई
देती थीं उनकी शान में कसीदे पढ़ते हुए उन्होंने कहा कि मुल्क में
अगर कोई हुकूमत करना जानता है तो वह मायावती ही हैं.
सपा सरकार ने राज्य के मुसलमानों को न सिर्फ छला है बल्कि उन्हें
असुरक्षा की भावना का शिकार भी बना दिया है. हम उम्मीद करते
हैं कि उन्होंने (मायावती ने) जिस तरह से दलितों का वोट हासिल
करके दलितों का उद्धार किया है उसी तरह अब
मुसलमानों का भी भला करेंगी.’
यह कहानी हमें बताती है कि बुखारी किस तरह से क्षण में समर्थन
और दूसरे ही पल में विरोध की राजनीति में पारंगत रहे हैं और यह सब
मुस्लिम समाज के हितों के नाम पर किया जाता रहा है. अहमद
बुखारी की इमामत का दौर ऐसे ढेरों उदाहरणों से भरा पड़ा है.
इमाम अहमद बुखारी की इमामत और सियासत के बीच
आवाजाही उनके साथ बाकी लोगों के लिए भी काफी पहले
ही एक सामान्य बात हो चुकी थी. लेकिन आम मुसलमानों के साथ
ही बाकी लोगों में उस समय हड़कंप मच गया जब 2004 के
लोकसभा चुनावों में इमाम साहब ने मुसलमानों से भाजपा को वोट
देने की अपील कर डाली.
लोगों को वह समय याद आ रहा था जब 2002 में गुजरात दंगों के
बाद बुखारी भाजपा के खिलाफ हुंकार भर रहे थे. तब तक के अपने
तमाम भाषणों में वे बाबरी मस्जिद के टूटने और मुसलमानों के मन में
समाए डर के लिए भाजपा और संघ को जिम्मेदार बताते रहते थे. वे
बताते थे कि कैसे भाजपा और संघ परिवार भारत में मुसलमानों के
अस्तित्व के ही खिलाफ हैं.
बुखारी से जब भाजपा को समर्थन देने का कारण
पूछा गया था तो उनका कहना था, ‘भाजपा की नई सोच
को हमारा समर्थन है. बाबरी मस्जिद की शहादत कांग्रेस के
शासनकाल में हुई लेकिन क्या कांंग्रेस ने इसके लिए
कभी माफी मांगी? गुजरात दंगों के मामले में भी क्या कांग्रेस ने
दंगा प्रभावित मुसलमानों के पुनर्वास के लिए कुछ किया है?
भाजपा ने तो कम से कम गुजरात दंगों के लिए दुख व्यक्त किया है
और वो अयोध्या मामले में भी कानून का सामना कर रही है.’ उस
समय इमाम बुखारी यह कहते भी पाए गए थे, ‘हर गुजरात के लिए
कांग्रेस के पास एक मुरादाबाद है, जहां ईद के दिन
मुसलमानों को मारा गया और अगर उन्होंने भाजपा की तरफ से
की गई इस शुरुआत का जवाब नहीं दिया होता तो बातचीत
का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो जाता. मुसलमानों को जेहाद,
हिजरत (पलायन) और सुलह के बीच चुनाव करना है. मुझे लगता है
कि इस वक्त सुलह सबसे अच्छा विकल्प है.’
परिवार को करीब से जानने वाले बताते हैं कि इस 360 डिग्री वाले
हृदय परिवर्तन के पीछे मुस्लिम समाज की चिंता और बेहतरी के
बजाय परिवार का दबाव था. परिवार के एक सदस्य ने अहमद
बुखारी के ऊपर चुनावों में भाजपा को समर्थन देने का दबाव
बनाया था. इस शख्स का नाम है याह्या बुखारी.
याह्या अहमद बुखारी के छोटे भाई है. यहां यह उल्लेखनीय है
कि जब इमाम अब्दुल्ला बुखारी ने अहमद
बुखारी की दस्तारबंदी की उस समय याह्या चाहते थे कि नायब
इमाम का जो पद अहमद बुखारी संभालते थे वह उन्हें दे दिया जाए.
लेकिन ऐसा हुआ नहीं. अहमद बुखारी ने इसके लिए मुगल
परंपरा का हवाला दिया जिसके मुताबिक अभी तक इमाम के बेटे
को ही नायब इमाम बनाने की पंरपरा चली आ रही थी. उस समय
की अखबारी रिपोर्टों और परिवार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक इस पर
याह्या का कहना था कि उनके बड़े भाई ने दो शादियां की हैं.
दूसरी शादी से जो बेटा है वह इस पद के योग्य नहीं है. ऐसे में नायब
का पद उन्हें दिया जाना चाहिए.
खैर, याह्या नायब नहीं बन पाए. दोनों भाइयों के बीच तनाव
बढ़ता गया. तनाव कम करने और भाई को मनाने के लिए अहमद
बुखारी ने पारिवारिक संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा याह्या को देने
की पेशकश की और मस्जिद के अंदर और अधिक सक्रिय
भूमिका की उनकी मांग को भी मान लिया. भाई को मनाने के लिए
अहमद हर तरह से लगे हुए थे कि एकाएक याह्या ने उनसे 2004 के
चुनाव में भाजपा का समर्थन करने की मांग कर दी.
याह्या की इस मांग पर इमाम बुखारी बेहद चिंतित हुए. उन्हें समझ में
नहीं आ रहा था कि इससे वे कैसे निपटें. खैर तमाम सोचने विचारने के
बाद वे इसके लिए मान गए. इसके बाद अटल
बिहारी वाजपेयी हिमायत समिति बनाई गई और हिमायत
कारवां नाम से यात्रा निकालकर मुसलमानों से
भाजपा का समर्थन करने की अपील की गई.
मगर याह्या बुखारी ने अपने बड़े भाई को भाजपा का समर्थन करने
लिए क्यों मजबूर किया? परिवार से जुड़े सूत्र बताते हैं
कि याह्या 2004 से एक दशक पहले से ही भाजपा से जुड़े हुए थे.
नब्बे के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में धीरे-धीरे
भाजपा ने अल्पसंख्यकों को जोड़ने के लिए मन बनाना शुरू किया.
उसी समय प्रमोद महाजन का संपर्क याह्या बुखारी से हुआ.
प्रमोद ने याह्या से भाजपा की योजना के बारे में बताया और
पार्टी को सपोर्ट करने का प्रस्ताव रखा. 1998 के
लोकसभा चुनावों में खुद याह्या बुखारी मुंबई में प्रमोद महाजन के
लिए प्रचार करने पहुंचे थे. उस चुनाव में भाजपा के लिए प्रचार करने
गए एक मुस्लिम नेता कहते हैं, ‘याह्या को मैंने वहां देखा था.
वो भाजपा के लिए वहां प्रचार करने आए थे. हम लोग एक
ही होटल में रुके हुए थे.’
2004 में प्रमोद महाजन के कहने पर ही याह्या ने अपने भाई अहमद
बुखारी को भाजपा का समर्थन करने के लिए बाध्य किया. अपने
राजनीतिक व्यवहार के कारण विवादित रहे बुखारी पर सबसे
बड़ा आरोप उस जामा मस्जिद के दुरुपयोग का लग रहा है जिसके वे
इमाम हैं. आरोप लगाने वालों का कहना है कि बुखारी परिवार ने
इमाम अहमद बुखारी के नेतृत्व में पूरी मस्जिद पर कब्जा कर
लिया है और इसे अपनी निजी संपत्ति की तरह प्रयोग कर रहे हैं. वैसे
तो कानूनी तौर पर जामा मस्जिद वक्फ की संपत्ति है लेकिन शायद
सिर्फ कागजों पर. मस्जिद का पूरा प्रशासन आज सिर्फ
बुखारी परिवार के हाथों में ही है.
मस्जिद पर बुखारी परिवार के कब्जे के विरोध में लंबे समय से संघर्ष
कर रहे अरशद अली फहमी कहते हैं, ‘पूरी मस्जिद पर बुखारी और
उनके भाइयों ने अंदर और बाहर चारों तरफ से कब्जा कर रखा है.
मस्जिद का प्रयोग ये अपनी निजी संपत्ति के तौर पर कर रहे हैं.
बुखारी जामा मस्जिद के इमाम हैं, जिनका काम नमाज पढ़ाना भर
है लेकिन वो मस्जिद के मालिक बन बैठे हैं.’
बुखारी पर इन आरोपों की शुरुआत उस समय हुई जब मस्जिद के एक
हिस्से में यात्रियों के लिए बने विश्रामगृह पर इमाम बुखारी ने
कब्जा जमा लिया. बुखारी के खिलाफ कई मामलों में कोर्ट
का दरवाजा खटखटा चुके सुहैल अहमद खान कहते हैं,
‘जामा मस्जिद में आने वाले यात्रियों के लिए सरकारी पैसे से
जो विश्रामगृह बना था उस पर अहमद बुखारी ने अपना कब्जा कर
उसे अपना विश्रामगृह बना डाला है. उस विश्रामगृह पर कब्जा करने
के साथ ही बगल में उन्होंने अपने बेटे के लिए एक बड़ा घर
भी बनवा लिया. बाद में जब मामले ने तूल पकड़ा तो उन्होंने उसे
बाथरूम दिखा दिया.’
आरोपों की लिस्ट में सिर्फ ये दो मामले नहीं हैं. सुहैल बताते हैं,
‘डीडीए ने मस्जिद कैंपस में पांच नंबर गेट के पास जन्नतनिशां नाम
से एक बड़ा मीटिंग हॉल बनाया था, जो आम लोगों के प्रयोग के
लिए था. कुछ समय बाद अहमद बुखारी के छोटे भाई याह्या ने उस
पर अपना कब्जा जमा लिया. आज भी उनका उस पर कब्जा है.
इसके साथ ही गेट नंबर नौ पर स्थित सरकारी डिस्पेंसरी पर
बुखारी के छोटे भाई हसन बुखारी ने कब्जा कर रखा है.
जिस जन्नतनिशां पर याह्या बुखारी के कब्जे की बात सुहैल कर रहे
हैं उसी जन्नतनिशां में कुछ समय पहले दुर्लभ वन्य जीवों ब्लैक बक
और हॉग डियर के मौजूद होने की खबर और तस्वीरें सामने आईं थी.
2012 में जामा मस्जिद के ऐतिहासिक स्वरूप को कथित अवैध
निर्माण से बिगाड़ने संबंधी आरोपों को लेकर अहमद बुखारी के
खिलाफ सुहैल कोर्ट गए थे. उन्होंने अपनी याचिका में यह आरोप
लगाया कि इमाम व उनके दोनों भाइयों ने जामा मस्जिद में अवैध
निर्माण कराया है और वे आसपास अवैध कब्जों के लिए
भी जिम्मेदार हैं. आरोपों की जांच के लिए हाई कोर्ट ने एक टीम
का गठन किया. बाद में उस टीम ने कोर्ट के समक्ष पेश की गई
अपनी रिपोर्ट में इस बात को स्वीकार किया कि हां, मस्जिद में
अवैध निर्माण कराया गया है.
‘जामा मस्जिद प्रांगण में तो इस परिवार ने
अपना कब्जा जमाया ही है, इसके बाहर भी इस परिवार ने
कब्जा कर रखा है. ‘मस्जिद के बाहर उससे सटे हुए
सरकारी पार्कों के बारे में बताते हुए अरशद कहते हैं, ‘मस्जिद के
चारों तरफ स्थित इन पार्कों पर बुखारी परिवार ने कब्जा कर
रखा है. किसी को उन्होंने अपनी पर्सनल पार्किंग बना रखा है
तो किसी को उन्होंने यात्रियों के लिए पार्किंग बना रखा है. इससे
होने वाली आमदमी सरकारी खाते में नहीं बल्कि बुखारी परिवार के
खाते में जाती है.’
2000 में जामा मस्जिद के इमाम बने अहमद बुखारी पर आरोप
लगा कि उन्होंने अपने पिता से जबरन अपनी दस्तारबंदी करवाई
अवैध कब्जे की ऐसी ही एक कहानी बताते हुए जामा मस्जिद के
बाहर मोटर मार्केट में दुकान लगाने वाले तनवीर अख्तर कहते हैं,
‘मस्जिद के गेट नंबर एक के पास कॉर्पोरेशन का एक ग्राउंड है.
वो शादी-ब्याह के लिए लंबे समय से इस्तेमाल होता था. लेकिन
आज उस पर अहमद बुखारी के भाइयों का कब्जा है.
किसी को अगर उस पार्क को शादी आदि के लिए बुक कराना है
तो उसे बुखारी परिवार के आदमी को मोटी रकम देनी पड़ती है.’
नाम न छापने की सर्त पर

 

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Hutatma NATHURAM GODSE ji ko koti koti pranaam ….


Hutatma NATHURAM GODSE ji ko koti koti pranaam ……

विभाजन की पीड़ा.. गाँधी वध की वास्तविकता और … हुतात्मा गोडसे … कैसे उतरेगा भारतीय जनमानस से गोडसे जी का कर्ज

सभी मित्रों से अनुरोध शेयर अथवा कॉपी पेस्ट अवस्य करे ताकी ज्यादा से ज्याद लोगो तक बात जाए……….

क्या थी विभाजन की पीड़ा ?

विभाजन के समय हुआ क्या क्या ?

विभाजन के लिए क्या था विभिन्न राजनैतिक पार्टियों का दृष्टिकोण ?

क्या थी पीड़ा पाकिस्तान से आये हिन्दू शरणार्थियों की … मदन लाल पाहवा और विष्णु करकरे की?

क्या थी गोडसे की विवशता ?

क्या गोडसे नही जानते थे की आम आदमी को मरने में और एक कथित राष्ट्रपिता को मरने में क्या अंतर है ?

क्या होगा परिवार का ?

कैसे कैसे कष्ट सहने पड़ेंगे परिवार और सम्बन्धियों को और मित्रों को ?

क्या था गांधी वध का वास्तविक कारण ?

क्या हुआ 30 जनवरी की रात्री को … पुणे के ब्राह्मणों के साथ ?

क्या था सावरकर और हिन्दू महासभा का चिन्तन ?

क्या हुआ गोडसे के बाद नारायण राव आप्टे का .. कैसी नृशंस फांसी दी गयी उन्हें ?

यह लेख पढने के बाद कृपया बताएं कैसे उतारेगा भारतीय जनमानस हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे जी का कर्ज….

आइये इन सब सवालों के उत्तर खोजें ….

पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी, उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं.अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे, गला कटे हुए रेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे, डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थी बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे, रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था,,” आज़ादी का तोहफा ” रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई।

थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था, दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ा ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर, उन पर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की… भयानक बदबू……।

सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं, उनके घर, उनकी खेती, पैसा-अडका, सोना-चाँदी, बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थे मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी. किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं- बच्चियों को भगाया गया.बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी … बलात्कार किये बिना…..?

जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी….

डॉक्टर ने पूछा क्यों ???

उन महिलाओं ने जवाब दिया… हम आपको क्या बताये हमें क्या हुआ हैं ?

हमपर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं…उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे.

“आज़ादी का तोहफा”

जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया, उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की नग्न यात्राएं (धिंड) निकाली गयीं, बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं और उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गया।

1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये, और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था, उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा एक रंडी की ओउलाद हराम का जना मोहनदास करमचंद गाँधी का आग्रह था..।

विधि मंडल ने विरोध किया, पैसा नहीं देगे….और फिर बिरला भवन के पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए…..पैसे दो, नहीं तो मैं मर जाउगा….एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले तथाकथित महात्मा जी, हिंसा उनको पसंद नहीं हैं दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए… क्या यह हिंसा नहीं थी .. अहिंसक आतंकवाद की आड़ में।

दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई ताबा नहीं रहना चाहिए । निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे..क्योंकि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं..।

अब सवाल तो सबसे बड़ा ये है की दिल्ली पुलिस को आदेश देने वाला ये कुत्ते की औलाद सरकार में था क्या ? असल में नेहरु इसका सिर्फ मोहरा था सरकार पर कब्ज़ा इस कुत्ते का ही था।

जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला, गटर के किनारे रहो लेकिन छत के निचे नहीं क्योकि… तुम हिन्दू हो….।

4000000 हिन्दू भारत में आये थे, ये सोचकर की ये भारत हमारा हैं. हिन्दू भोले होते ये सब जानते है दुश्मन और दोस्त में फर्क नहीं पहचानते इसलिए ये सब निर्वासित गांधी उर्फ सूवर जो हिन्दुओ का सबसे बड़ा दुश्मन था से मिलने बिरला भवन जाते थे तबसूवर की ओउलाद माइक पर से कहता था क्यों आये यहाँ अपने घर जायदाद बेचकर, वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके मर जना चाहिए था ??

यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ..और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे ?

कैसा होगा वो मोहनदास करमचन्द गाजी उर्फ़ गंधासुर … कितना महान …

जिसने बिना तलवार उठाये … 35 लाख हिन्दुओं का नरसंहार करवाया।

2 करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं का इस्लाम में धर्मांतरण हुआऔर उसके बाद यह संख्या 10 करोड़ भी पहुंची।

10 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को खरीदा बेचा गया।

20 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को जबरन मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया, तरह तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाओं के बाद।

ऐसे बहुत से प्रश्न, वास्तविकताएं और सत्य तथा तथ्य हैं जो की 1947 के समकालीन लोगों ने अपनी आने वाली पीढ़ियों से छुपाये, हिन्दू कहते हैं की जो हो गया उसे भूल जाओ, नए कल की शुरुआत करो ..

परन्तु इस्लाम के लिए तो कोई कल नहीं .. कोई आज नहीं …वहां तो दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदलने का ही लक्ष्य है पल.. प्रति पल।

विभाजन के बाद एक और विभाजन का षड्यंत्र …
—————————-

आपने बहुत से देशों में से नए देशों का निर्माण देखा होगा, U S S R टूटने के बाद बहुत से नए देश बने, जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान आदि … परन्तु यह सब देश जो बने वो एक परिभाषित अविभाजित सीमा के अंदर बने।

और जब भारत का विभाजन हुआ .. तो क्या कारण थे की पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान बनाए गए… क्यों नही एक ही पाकिस्तान बनाया गया… या तो पश्चिम में बना लेते या फिर पूर्व में।

परन्तु ऐसा नही हुआ …. यहाँ पर उल्लेखनीय है की मोहनदास करमचन्द ने तो यहाँ तक कहा था की पूरा पंजाब पाकिस्तान में जाना चाहिए, बहुत कम लोगों को ज्ञात है की 1947 के समय में पंजाब की सीमा दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र तक होती थी ..

यानी की पाकिस्तान का बोर्डर दिल्ली के साथ होना तय था … मोहनदास करमचन्द के अनुसार।

नवम्बर 1968 में पंजाब में से दो नये राज्यों का उदय हुआ .. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा।

पाकिस्तान जैसा मुस्लिम राष्ट्र पाने के बाद भी जिन्ना और मुस्लिम लीग चैन से नहीं बैठे ..

उन्होंने फिर से मांग की … की हमको पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।

1. पानी के रास्ते बहुत लम्बा सफर हो जाता है क्योंकि श्री लंका के रस्ते से घूम कर जाना पड़ता है।

2. और हवाई जहाज से यात्राएं करने में अभी पाकिस्तान के मुसलमान सक्षम नही हैं इसलिए …. कुछ मांगें रखी गयीं इसलिए हमको भारत के बीचो बीच एक Corridor बना कर दिया जाए….

2. जो लाहोर से ढाका तक जाता हो … (NH – 1)

3. जो दिल्ली के पास से जाता हो ..

4. जिसकी चौड़ाई कम से कम 10 मील की हो … (10 Miles = 16 KM)

5. इस पूरे Corridor में केवल मुस्लिम लोग ही रहेंगे।

30 जनवरी को गांधी वध यदि न होता, तो तत्कालीन परिस्थितियों में बच्चा बच्चा यह जानता था की यदि मोहनदास करमचन्द 3 फरवरी, 1948 को पाकिस्तान पहुँच गया तो इस मांग को भी …मान लिया जायेगा।

तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार तो मोहनदास करमचन्द किसी की बात सुनने की स्थिति में था न ही समझने में …और समय भी नहीं था जिसके कारण हुतात्मा नाथूराम गोडसे जी को गांधी वध जैसा अत्यधिक साहसी और शौर्यतापूर्ण निर्णय लेना पडा।

हुतात्मा का अर्थ होता है जिस आत्मा ने अपने प्राणों की आहुति दी हो …. जिसको की वीरगति को प्राप्त होना भी कहा जाता है।

यहाँ यह सार्थक चर्चा का विषय होना चाहिए की हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे जी ने क्या एक बार भी नहीं सोचा होगा की वो क्या करने जा रहे हैं ?

किसके लिए ये सब कुछ कर रहे हैं ?

उनके इस निर्णय से उनके घर, परिवार, सम्बन्धियों, उनकी जाती और उनसे जुड़े संगठनो पर क्या असर पड़ेगा ?

घर परिवार का तो जो हुआ सो हुआ …. जाने कितने जघन्य प्रकारों से समस्त परिवार और सम्बन्धियों को प्रताड़ित किया गया।

परन्तु ….. अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले मोहनदास करमचन्द के कुछ अहिंसक आतंकवादियों ने 30 जनवरी, 1948 की रात को ही पुणे में 6000 ब्राह्मणों को चुन चुन कर घर से निकाल निकाल कर जिन्दा जलाया।

10000 से ज्यादा ब्राह्मणों के घर और दुकानें जलाए गए।

सोचने का विषय यह है की उस समय संचार माध्यम इतने उच्च कोटि के नहीं थे, विकसित नही थे … फिर कैसे 3 घंटे के अंदर अंदर इतना सुनियोजित तरीके से इतना बड़ा नरसंहार कर दिया गया ….

सवाल उठता है की … क्या उन अहिंसक आतंकवादियों को पहले से यह ज्ञात था की गांधी वध होने वाला है ?

जस्टिस खोसला जिन्होंने गांधी वध से सम्बन्धित केस की पूरी सुनवाई की… 35 तारीखें पडीं।

अदालत ने निरीक्षण करवाया और पाया हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे जी की मानसिक दशा को तत्कालीन चिकित्सकों ने एक दम सामान्य घोषित किया पंडित जी ने अपना अपराध स्वीकार किया पहली ही सुनवाई में और अगली 34 सुनवाइयों में कुछ नहीं बोले … सबसे आखिरी सुनवाई में पंडित जी ने अपने शब्द कहे “”

गाँधी वध के समय न्यायमूर्ति खोसला से नाथूराम ने अपना वक्तव्य स्वयं पढ़ कर सुनाने की अनुमति मांगी थी और उसे यह अनुमति मिली थी नाथूराम गोडसे का यह न्यायालयीन वक्तव्य भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया था इस प्रतिबन्ध के विरुद्ध नाथूराम गोडसे के भाई तथा गाँधी वध के सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने ६० वर्षों तक वैधानिक लडाई लड़ी और उसके फलस्वरूप सर्वोच्च न्यायलय ने इस प्रतिबन्ध को हटा लिया तथा उस वक्तव्य के प्रकाशन की अनुमति दे दी। नाथूराम गोडसे ने न्यायलय के समक्ष गाँधी वध के जो १५० कारण बताये थे उनमें से प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं –

1. अमृतसर के जलियाँवाला बाग़ गोली काण्ड (1919) से समस्त देशवासी आक्रोश में थे तथा चाहते थे कि इस नरसंहार के खलनायक जनरल डायर पर अभियोग चलाया जाए। गाँधी ने भारतवासियों के इस आग्रह को समर्थन देने से मना कर दिया।

2. भगत सिंह व उसके साथियों के मृत्युदण्ड के निर्णय से सारा देश क्षुब्ध था व गाँधी की ओर देख रहा था कि वह हस्तक्षेप कर इन देशभक्तों को मृत्यु से बचाएं, किन्तु गान्धी ने भगत सिंह की हिंसा को अनुचित ठहराते हुए जनसामान्य की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। क्या आश्चर्य कि आज भी भगत सिंह वे अन्य क्रान्तिकारियों को आतंकवादी कहा जाता है।

3. 6 मई 1946 को समाजवादी कार्यकर्ताओं को अपने सम्बोधन में गाँधी ने मुस्लिम लीग की हिंसा के समक्ष अपनी आहुति देने की प्रेरणा दी।

4.मोहम्मद अली जिन्ना आदि राष्ट्रवादी मुस्लिम नेताओं के विरोध को अनदेखा करते हुए 1921 में गाँधी ने खिलाफ़त आन्दोलन को समर्थन देने की घोषणा की। तो भी केरल के मोपला में मुसलमानों द्वारा वहाँ के हिन्दुओं की मारकाट की जिसमें लगभग 1500 हिन्दु मारे गए व 2000 से अधिक को मुसलमान बना लिया गया। गाँधी ने इस हिंसा का विरोध नहीं किया, वरन् खुदा के बहादुर बन्दों की बहादुरी के रूप में वर्णन किया।

5.1926 में आर्य समाज द्वारा चलाए गए शुद्धि आन्दोलन में लगे स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या अब्दुल रशीद नामक एक मुस्लिम युवक ने कर दी, इसकी प्रतिक्रियास्वरूप गाँधी ने अब्दुल रशीद को अपना भाई कह कर उसके इस कृत्य को उचित ठहराया व शुद्धि आन्दोलन को अनर्गल राष्ट्र-विरोधी तथा हिन्दु-मुस्लिम एकता के लिए अहितकारी घोषित किया।

6.गाँधी ने अनेक अवसरों पर छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप व गुरू गोविन्द सिंह जी को पथभ्रष्ट देशभक्त कहा।

7.गाँधी ने जहाँ एक ओर काश्मीर के हिन्दु राजा हरि सिंह को काश्मीर मुस्लिम बहुल होने से शासन छोड़ने व काशी जाकर प्रायश्चित करने का परामर्श दिया, वहीं दूसरी ओर हैदराबाद के निज़ाम के शासन का हिन्दु बहुल हैदराबाद में समर्थन किया।

8. यह गाँधी ही था जिसने मोहम्मद अली जिन्ना को कायदे-आज़म की उपाधि दी।

9. कॉंग्रेस के ध्वज निर्धारण के लिए बनी समिति (1931) ने सर्वसम्मति से चरखा अंकित भगवा वस्त्र पर निर्णय लिया किन्तु गाँधी कि जिद के कारण उसे तिरंगा कर दिया गया।

10. कॉंग्रेस के त्रिपुरा अधिवेशन में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को बहुमत से कॉंग्रेस अध्यक्ष चुन लिया गया किन्तु गाँधी पट्टभि सीतारमय्या का समर्थन कर रहा था, अत: सुभाष बाबू ने निरन्तर विरोध व असहयोग के कारण पदत्याग कर दिया।

11. लाहोर कॉंग्रेस में वल्लभभाई पटेल का बहुमत से चुनाव सम्पन्न हुआ किन्तु गाँधी की जिद के कारण यह पद जवाहरलाल नेहरु को दिया गया।

12. 14-15 जून, 1947 को दिल्ली में आयोजित अखिल भारतीय कॉंग्रेस समिति की बैठक में भारत विभाजन का प्रस्ताव अस्वीकृत होने वाला था, किन्तु गाँधी ने वहाँ पहुंच प्रस्ताव का समर्थन करवाया। यह भी तब जबकि उन्होंने स्वयं ही यह कहा था कि देश का विभाजन उनकी लाश पर होगा।

13. मोहम्मद अली जिन्ना ने गाँधी से विभाजन के समय हिन्दु मुस्लिम जनसँख्या की सम्पूर्ण अदला बदली का आग्रह किया था जिसे गाँधी ने अस्वीकार कर दिया।

14. जवाहरलाल की अध्यक्षता में मन्त्रीमण्डल ने सोमनाथ मन्दिर का सरकारी व्यय पर पुनर्निर्माण का प्रस्ताव पारित किया, किन्तु गाँधी जो कि मन्त्रीमण्डल के सदस्य भी नहीं थे ने सोमनाथ मन्दिर पर सरकारी व्यय के प्रस्ताव को निरस्त करवाया और 13 जनवरी 1948 को आमरण अनशन के माध्यम से सरकार पर दिल्ली की मस्जिदों का सरकारी खर्चे से पुनर्निर्माण कराने के लिए दबाव डाला।

15. पाकिस्तान से आए विस्थापित हिन्दुओं ने दिल्ली की खाली मस्जिदों में जब अस्थाई शरण ली तो गाँधी ने उन उजड़े हिन्दुओं को जिनमें वृद्ध, स्त्रियाँ व बालक अधिक थे मस्जिदों से से खदेड़ बाहर ठिठुरते शीत में रात बिताने पर मजबूर किया गया।

16. 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तान ने काश्मीर पर आक्रमण कर दिया, उससे पूर्व माउँटबैटन ने भारत सरकार से पाकिस्तान सरकार को 55 करोड़ रुपए की राशि देने का परामर्श दिया था। केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल ने आक्रमण के दृष्टिगत यह राशि देने को टालने का निर्णय लिया किन्तु गाँधी ने उसी समय यह राशि तुरन्त दिलवाने के लिए आमरण अनशन किया- फलस्वरूप यह राशि पाकिस्तान को भारत के हितों के विपरीत दे दी गयी।

उपरोक्त परिस्थितियों में नथूराम गोडसे नामक एक देशभक्त सच्चे भारतीय युवक ने गाँधी का वध कर दिया।

न्य़यालय में चले अभियोग के परिणामस्वरूप गोडसे को मृत्युदण्ड मिला किन्तु गोडसे ने न्यायालय में अपने कृत्य का जो स्पष्टीकरण दिया उससे प्रभावित होकर उस अभियोग के न्यायधीश श्री जे. डी. खोसला ने अपनी एक पुस्तक में लिखा-

“नथूराम का अभिभाषण दर्शकों के लिए एक आकर्षक दृश्य था। खचाखच भरा न्यायालय इतना भावाकुल हुआ कि लोगों की आहें और सिसकियाँ सुनने में आती थीं और उनके गीले नेत्र और गिरने वाले आँसू दृष्टिगोचर होते थे। न्यायालय में उपस्थित उन प्रेक्षकों को यदि न्यायदान का कार्य सौंपा जाता तो मुझे तनिक भी संदेह नहीं कि उन्होंने अधिकाधिक सँख्या में यह घोषित किया होता कि नथूराम निर्दोष है।”

तो भी नथूराम ने भारतीय न्यायव्यवस्था के अनुसार एक व्यक्ति की हत्या के अपराध का दण्ड मृत्युदण्ड के रूप में सहज ही स्वीकार किया। परन्तु भारतमाता के विरुद्ध जो अपराध गाँधी ने किए, उनका दण्ड भारतमाता व उसकी सन्तानों को भुगतना पड़ रहा है। यह स्थिति कब बदलेगी?

प्रश्न यह भी उठता है की पंडित नाथूराम गोडसे जी ने तो गाँधी वध किया उन्हें पैशाचिक कानूनों के द्वारा मृत्यु दंड दिया गया परन्तु नाना जी आप्टे ने तो गोली नहीं मारी थी … उन्हें क्यों मृत्युदंड दिया गया ?

नाथूराम गोडसे को सह अभियुक्त नाना आप्टे के साथ १५ नवम्बर १९४९ को पंजाब के अम्बाला की जेल में मृत्यु दंड दे दिया गया। उन्होंने अपने अंतिम शब्दों में कहा था…

यदि अपने देश के प्रति भक्तिभाव रखना कोई पाप है तो मैंने वो पाप किया है और यदि यह पुन्य है तो उसके द्वारा अर्जित पुन्य पद पर मैं अपना नम्र अधिकार व्यक्त करता हूँ

– हुतात्मा पंडित नाथूराम गोडसे अमर रहें।

हे आर्यावर्त के वीर सपूतों मैं मरा नहीं,आप में ही तो हूँ मैं,पहचानो आप..मेरा शरीर नष्ट हुआ है,मेरी आत्मा नहीं।

Posted in हिन्दू पतन

हिन्दु पानी पी पी कर मुस्लिमो को कोसते रहते है।


हिन्दु पानी पी पी कर मुस्लिमो को कोसते रहते है।

ये कमी है वो कमी है।मौहमद साहब ने फातिमा के साथ ये कर दिया वो कर दिया।

अब वक्त आ गया है कि हम एक चुगलबाज औरत की तरह करने वाले इस काम को छोडे, और अपनी कमियो को मिटा खुद को मजबूत बनाये।

आइये आपको बताओ आज मुस्लिम धर्म को बढने का मुख्य कारण क्या है। और हिन्दु धर्म के सिकुडने का कारण क्या है=सबसे बड़ा विशवास और कट्टरता का !!!!!

1 .हर मुसलमान अपनी मासिक आय मे से 2% जकात के नाम पर मस्जिद/मदरसे मे देता है । चाहे वो कितना ही गरीब हो । जबकि हिन्दु अमीर हो तो मुश्किल ही दे। और गरीब ठेके पर जाकर दारु पीना बेहतर मानेगा।

2.हर मुस्लिम बच्चा अपने धर्म की तालीम जरुर लेगा चाहे वो स्कूल से आने के बाद ही जायेँ । जबकि हिन्दुओ मे ऐसी कोई सँस्था ही नही हे जँहा बच्चो को धार्मिक शिक्षा के लिये भेजा जाये गुरुकुल व्यवस्था हमने खत्म कर दी । बल्कि हिन्दुओ तो अपने धार्मिक कर्म काण्ड करने में अपनी बेइज्जती समझते है।

3.इस्लाम मे सब धर्म के नाम पर एक हो जाते है । चाहे शिया हो वहाबी हो अहमदिया या सुन्नी जबकि हिन्दु आज भी अपनी जाति की श्रेष्ठता जताने पर तुला है जिसके कारण वो हजारो वर्ष गुलाम बना। कोई राजपूत तो कोई जाट तो कोई कुछ कोई कुछ के नाम पर बटेँ पडे है।

4. मुसलमानो को अपने अल्लाह पर विश्ळास है ।जबकि हिन्दुओ को अपने भगवान पर विशवास नही तभी वो कभी गद्दारो की मजारो पर सर पटकता है तो कभी प्रत्येक वर्ष नये देवी देवता बनाता है ।

5.हिन्दु जितना पढेगा सेक्युलर बनेगा जबकि मुसलमान औसामा हफीज की तरह कट्टर बनेगा

6.मुसलमानो मे धार्मिक शिक्षा के लिए उचित सँसाधन मदरसो में मौजूद है जबकि हिन्दु केवल मदिँर बनाने मेँ व्यस्त है.

7 .गाय को कसाई को हिँदु बेचता है और गाली मुसलामानो को देता हे

8.लडकियो को अपनी संस्कृति की शिक्षा नही देते उस पर नियंत्रण नहीं रखते और लवजेहाद का ठीकरा मुसलमानो के सर पर फोड़ते है

ये सब हो सकता है बस अपना विशवास बनाओ हम खुद ये कर सकते हो और भी कोई है जोये सब हमारे लिए संसाधन उपलब्ध करा सकता है. बस जरूरत है । थोडा संयम की और सनातन धार्मिक दृढ़ विश्वास की ।

भाई लोगो सोचो समझो और एक कदम हिन्दुत्व की तरफ बढाओ गुरुकुल बनवाओ शिक्षा मत लो विद्या ग्रहण करो।

केवल खुखार or कट्टर हिन्दू लोग ही Is Link Par Click Karke Group Join करें…….

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Posted in संस्कृत साहित्य

Shiva and Gajasura


Toshi Dogra shared her photo.

Shiva and Gajasura

There are many mythological anecdotes of Ganesha. Ganesha’s elephant head makes him easy to identify. He is worshipped as the lord of beginnings and as the lord of removing obstacles, the patron of arts and sciences, and the god of intellect and wisdom. In his survey of Ganesha’s rise to prominence in Sanskrit literature, Ludo Rocher notes that:

Above all, one cannot help being struck by the fact that the numerous stories surrounding Gaṇeśa concentrate on an unexpectedly limited number of incidents. These incidents are mainly three: his birth and parenthood, his elephant head, and his single tusk. Other incidents are touched on in the texts, but to a far lesser extent.

Puranic myths about the birth of Ganesha are found in the later Puranas, composed from about 600 CE onwards. References to Ganesha in the earlier Puranas, such as the Vayu and Brahmanda Purnasa are considered to be later interpolations made during the 7th to 10th centuries.
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Shiva and Gajasura

Another story regarding the origins of Ganesha and his elephant head narrates that, once, there existed an Asura (demon) with all the characteristics of an elephant, called Gajasura, who was undergoing a penitence (tapas). Shiva, satisfied by this austerity, decided to grant him, as a reward, whatever gift he desired. The demon wished that he could emanate fire continually from his own body so that no one could ever dare to approach him. The Lord granted him his request. Gajasura continued his penitence and Shiva, who appeared in front of him from time to time, asked him once again what he desired. The demon responded: “I desire that You inhabit my stomach.” Shiva agreed.

Parvati sought him everywhere without results. As a last recourse, she went to her brother Vishnu, asking him to find her husband. He, who knows everything, reassured her: “Don’t worry, dear sister, your husband is Bhola Shankara and promptly grants to his devotees whatever they ask of him, without regard for the consequences; for this reason, I think he has gotten himself into some trouble. I will find out what has happened.”

Then Vishnu, the omniscient director of the cosmic game, staged a small comedy. He transformed Nandi (the bull of Shiva) into a dancing bull and conducted him in front of Gajasura, assuming, at the same time, the appearance of a flutist. The enchanting performance of the bull sent the demon into ecstasies, and he asked the flutist to tell him what he desired. The musical Vishnu responded: “Can you give me that which I ask?” Gajasura replied: “Who do you take me for? I can immediately give you whatever you ask.” The flutist then said: “If that’s so, liberate Shiva from your stomach.” Gajasura understood then that this must have been no other than Vishnu himself, the only one who could have known that secret and he threw himself at his feet. Having liberated Shiva, he asked him for one last gift: “I have been blessed by you with many gifts; my last request is that everyone remember me adoring my head when I am dead.” Shiva then brought his own son there and substituted his head with that of Gajasura. From then on, in India, the tradition is that any action, in order to prosper, must begin with the adoration of Ganesha. This is the result of the gift of Shiva to Gajasura.

Credit: http://en.wikipedia.org/…/Mythological_anecdotes_of_Ganesha_

|| Aum Shiv Lambodrayanam Namha ||

There are many mythological anecdotes of Ganesha. Ganesha's elephant head makes him easy to identify. He is worshipped as the lord of beginnings and as the lord of removing obstacles, the patron of arts and sciences, and the god of intellect and wisdom. In his survey of Ganesha's rise to prominence in Sanskrit literature, Ludo Rocher notes that:

    Above all, one cannot help being struck by the fact that the numerous stories surrounding Gaṇeśa concentrate on an unexpectedly limited number of incidents. These incidents are mainly three: his birth and parenthood, his elephant head, and his single tusk. Other incidents are touched on in the texts, but to a far lesser extent.

Puranic myths about the birth of Ganesha are found in the later Puranas, composed from about 600 CE onwards. References to Ganesha in the earlier Puranas, such as the Vayu and Brahmanda Purnasa are considered to be later interpolations made during the 7th to 10th centuries.
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Shiva and Gajasura

Another story regarding the origins of Ganesha and his elephant head narrates that, once, there existed an Asura (demon) with all the characteristics of an elephant, called Gajasura, who was undergoing a penitence (tapas). Shiva, satisfied by this austerity, decided to grant him, as a reward, whatever gift he desired. The demon wished that he could emanate fire continually from his own body so that no one could ever dare to approach him. The Lord granted him his request. Gajasura continued his penitence and Shiva, who appeared in front of him from time to time, asked him once again what he desired. The demon responded: "I desire that You inhabit my stomach." Shiva agreed.

Parvati sought him everywhere without results. As a last recourse, she went to her brother Vishnu, asking him to find her husband. He, who knows everything, reassured her: "Don't worry, dear sister, your husband is Bhola Shankara and promptly grants to his devotees whatever they ask of him, without regard for the consequences; for this reason, I think he has gotten himself into some trouble. I will find out what has happened."

Then Vishnu, the omniscient director of the cosmic game, staged a small comedy. He transformed Nandi (the bull of Shiva) into a dancing bull and conducted him in front of Gajasura, assuming, at the same time, the appearance of a flutist. The enchanting performance of the bull sent the demon into ecstasies, and he asked the flutist to tell him what he desired. The musical Vishnu responded: "Can you give me that which I ask?" Gajasura replied: "Who do you take me for? I can immediately give you whatever you ask." The flutist then said: "If that's so, liberate Shiva from your stomach." Gajasura understood then that this must have been no other than Vishnu himself, the only one who could have known that secret and he threw himself at his feet. Having liberated Shiva, he asked him for one last gift: "I have been blessed by you with many gifts; my last request is that everyone remember me adoring my head when I am dead." Shiva then brought his own son there and substituted his head with that of Gajasura. From then on, in India, the tradition is that any action, in order to prosper, must begin with the adoration of Ganesha. This is the result of the gift of Shiva to Gajasura.

Credit: http://en.wikipedia.org/wiki/Mythological_anecdotes_of_Ganesha_

|| Aum Shiv Lambodrayanam Namha ||

There are many mythological anecdotes of Ganesha. Ganesha’s elephant head makes him easy to identify. He is worshipped as the lord of beginnings and as the lord of removing obstacles, the patron of arts and sciences, and the god of intellect and wisdom. In his survey of Ganesha’s rise to prominence in Sanskrit literature, Ludo Rocher notes that:

Above all, one cannot help being struck by the fact that the numerous stories surrounding Gaṇeśa concentrate on an unexpectedly limited number of incidents. These incidents are mainly three: his birth and parenthood, his elephant head, and his single tusk. Other incidents are touched on in the texts, but to a far lesser extent.

Puranic myths about the birth of Ganesha are found in the later Puranas, composed from about 600 CE onwards. References to Ganesha in the earlier Puranas, such as the Vayu and Brahmanda Purnasa are considered to be later interpolations made during the 7th to 10th centuries.
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Shiva and Gajasura

Another story regarding the origins of Ganesha and his elephant head narrates that, once, there existed an Asura (demon) with all the characteristics of an elephant, called Gajasura, who was undergoing a penitence (tapas). Shiva, satisfied by this austerity, decided to grant him, as a reward, whatever gift he desired. The demon wished that he could emanate fire continually from his own body so that no one could ever dare to approach him. The Lord granted him his request. Gajasura continued his penitence and Shiva, who appeared in front of him from time to time, asked him once again what he desired. The demon responded: “I desire that You inhabit my stomach.” Shiva agreed.

Parvati sought him everywhere without results. As a last recourse, she went to her brother Vishnu, asking him to find her husband. He, who knows everything, reassured her: “Don’t worry, dear sister, your husband is Bhola Shankara and promptly grants to his devotees whatever they ask of him, without regard for the consequences; for this reason, I think he has gotten himself into some trouble. I will find out what has happened.”

Then Vishnu, the omniscient director of the cosmic game, staged a small comedy. He transformed Nandi (the bull of Shiva) into a dancing bull and conducted him in front of Gajasura, assuming, at the same time, the appearance of a flutist. The enchanting performance of the bull sent the demon into ecstasies, and he asked the flutist to tell him what he desired. The musical Vishnu responded: “Can you give me that which I ask?” Gajasura replied: “Who do you take me for? I can immediately give you whatever you ask.” The flutist then said: “If that’s so, liberate Shiva from your stomach.” Gajasura understood then that this must have been no other than Vishnu himself, the only one who could have known that secret and he threw himself at his feet. Having liberated Shiva, he asked him for one last gift: “I have been blessed by you with many gifts; my last request is that everyone remember me adoring my head when I am dead.” Shiva then brought his own son there and substituted his head with that of Gajasura. From then on, in India, the tradition is that any action, in order to prosper, must begin with the adoration of Ganesha. This is the result of the gift of Shiva to Gajasura.

Credit: http://en.wikipedia.org/…/Mythological_anecdotes_of_Ganesha_

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

TIPPU SULTAN MASS MURDERED HINDUS IN KERALA AND COASTAL KARNATAKA. WORST HIT RECEIVED BY KERALA (God’s own country) He even undertook ISLAMIFICATION of city names.


i prefer `pedosadomasochistmaniac’!

TIPPU SULTAN MASS MURDERED HINDUS IN KERALA AND COASTAL KARNATAKA. WORST HIT RECEIVED BY KERALA (God’s own country) He even undertook ISLAMIFICATION of city names.

Tipu Sultan lived in an era when the British Crown wasn’t ruling India. India was on its way to reviving and restoring its ancient ideals and way of life after the prolonged darkness of the Islamic era ended with Aurangzeb’s death in 1707. The Marathas had emerged as the most powerful and the largest political force then. It’s therefore both a misleading and a fraudulent claim that Tipu fought the British in the sense of the then British Government. Tipu waged war against the British East India Company. He waged the war purely for territorial and imperial purposes and not because he was spurred by patriotism towards India as a nation. He was primarily an immensely cruel Muslim zealot motivated by the goal of establishing Islam in India. Indeed, the notion of India as—roughly speaking—a nation state took root in the minds of the early crop of Indian freedom fighters after the British Crown took over the country and declared it as one of their colonies. This fact is intentionally blanked out by our clever-by-half historical frauds of the Marxist school in their vile endeavour to project Tipu as some kind of a valiant saviour. If Tipu is indeed this heroic freedom fighter who fought against British tyranny, why don’t our secular scum extend the same logic to the Marathas as well?

Another popular myth is in wide currency as far as Karnataka is concerned. Girish Karnad among others has played a huge part in recent times to perpetuate this myth that Tipu Sultan was an unsullied patron and promoter of the Kannada language. About 4 years ago, he frothed at the mouth in a Kannada daily when the then Education Minister D.H. Shankara Murthy correctly claimed that Tipu was an opponent of Kannada.

Dr. S L Bhyrappa then tore into Girish Karnad’s perverted history concerning Tipu’s life and deeds. Here are some excerpts from that piece by Dr. S.L Bhyrappa (translation mine):

Kannada was the official language of the Mysore state when the Wodeyar dynasty ruled over the Mysore kingdom…When Tipu took over, he changed the administrative language from Kannada to Farsi(Persian). We can witness this till date. Karnataka Government’s land and revenue records use Farsi terminology. For instance, a usage like “Ramesh’s son Suresh” is written as “Suresh bin Ramesh.” Our state has retained terms like “Khata,” “Khirdi,” “Pahani,” “Khanesuvari,” “Gudasta,” and “Baranamoona,” a direct holdover from Tipu’s times. Not just that—Tipu changed the names of entire cities and towns:

EVEN THE PLACE-NAMES WERE CHANGED

Gopal Rao had written all these on the basis of the writings of Tipu’s own son, Ghulam Muhammad, and Muslim historians like Kirmani. Even the Hindu names of places, the Sultan could not tolerate. Therefore, Mangalapuri (Mangalore) was changed to Jalalabad, Cannanore (Kanwapuram) to Kusanabad, Bepur (Vaippura) to Sultanpatanam or Faruqui, Mysore to Nazarabad, Dharwar to Quarshed-Sawad, Gutti to Faiz-Hissar, Ratnagiri to Mustafabad, Dindigul to Khaliqabad, Calicut (Kozhikode) to Islamabad,Brahmapuri to Sultanpet,Coorg to Zafarabad, Devanahalli to Yusufabad,Krishnagiri to Phalk-il-azam,Penukonda to Fakrabad,Sira to Rustumabad. Sankridurga to Muzaffarabad,Sakleshpur to Manjarabad and Chitradurga to Farook yab Hissar.It was after the death of Tipu Sultan that the local people reverted to old names.

Though Muslims in Malabar speak, read and write Malayalam even today just as Tamil Muslims in Tamil Nadu read, write and speak in Tamil. Thanks to Tipu, Muslims in Karnataka speak only Urdu. This is the direct result of Tipu’s insistence that Farsi and Urdu were the only permitted mediums of instruction.

This linguistic assault apart, we need to examine the full extent of the unfettered barbarism Tipu Sultan unleashed in serving the cause of Islam. Here’s what comes out of the mouth of this Islamic zealot par excellence, someone who belongs in the same Hall of Islamic Savagery that Aurangzeb occupies.

We can turn to S L Bhyrappa again:
A collection of papers entitled Tipu Sultan’s Dreams was recovered by the British Colonel William Kirkpatrick from the Srirangapatanam palace after Tipu was killed in the Fourth Anglo-Mysore War in 1799. These are written in Tipu’s own hand in Farsi. Kirkpatrick himself translated several of these from Farsi to English. The India Office in London still retains the original and some translations. Tipu himself speaks in these papers, the strongest and firsthand evidence of his fanaticism. He always refers to Hindus as Kaffirs and the British as Christians. In some of these papers, he recounts a recurring dream in which a a long-bearded Maulvi frequently appears. Tipu goes to Mecca on a pilgrimage; Prophet Mohammad tells a long-bearded Arab, “Tell Tipu that I shall not enter Heaven without Tipu.” Tipu then embarks on a mission to convert all non-Muslims to Islam and then Islamizes all non-Islamic nations…. He talks nothing about modernizing India and fumes that the Christians (British) are the biggest obstacle that he must urgently remove.
The most glaring instance where Tipu’s Islam-inspired savagery played out in all its cruel glory is his brutal Malabar campaign. He managed to do in a very brief span what centuries of Islamic incursions had failed to do to large parts of Kerala.

The account of his savage raid of the Malabar region makes your stomach churn. Here is how he gloats about it in a letter to the Governor of Bekal written in January 1790:
Don’t you know I have achieved a great victory recently in Malabar and over four lakh Hindus were converted to Islam? I am determined to march against that cursed Raman Nair (Rajah of Travancore) very soon. Since I am overjoyed at the prospect of converting him and his subjects to Islam, I have happily abandoned the idea of going back to Srirangapatanam now.

Equally, the Malabar Manual written by William Logan, the Collector of Malabar makes for painful reading. A horrified Logan describes in detail the kind of barbarism Tipu’s hordes inflicted on the Hindus of Kerala. To read a sample, head here. In fact, the extent and scope of Tipu’s cruelty appalled even the British who had by then developed imperial ambitions in India.

Here is how the Preface of G.A. Henty’s The Tiger of Mysore describes Tipu:
…our struggle with Tippoo Saib was…marked by a long endurance of wrong, and a toleration of abominable cruelties perpetrated upon Englishmen and our native allies….Tippoo…revelled in acts of the most abominable cruelty. It would seem that he massacred for the very pleasure of massacring, and hundreds…were killed by famine, poison, or torture, simply to gratify his lust for murder. Patience was shown towards this monster until patience became a fault, and our inaction was naturally ascribed by him to fear.

He wanted to become an Emperor after defeating the British. He wanted to achieve his ambition after consulting the astrologers. There were a few Brahmin astrologers in Sree Ranganatha Swami Temple. They predicted that if some of the suggested remedial rituals were performed, Tipu would achieve his cherished ambition. Believing that he could become the undisputed ruler of the whole of South India, after defeating the British, he performed all the suggested rituals in the Sree Ranaganatha Swami Temple, besides giving costly presents to the astrologers. This act is being widely interpreted by secularist historians as love and respect for Hindu religion and traditions! They also doubt if there were any Hindu temples which were desecrated or destroyed by Tipu Sultan and his Islamic army in Malabar.

M.A. Gopal Rao, stated a few years ago in one of his articles: ‘In a deliberately designed taxation scheme, the religious prejudice of Tipu Sultan became quite clear. His co-religionists, Muslims, were exempted from house tax, commodity tax and also the levy on other items of household use. Those who were converted to Muhammadanism, were also given similar tax exemptions. He had even made provisions for the education of their children. Tipu Sultan discontinued the practice of appointing Hindus in different administrative and military jobs as practised by his father, Hyder Ali Khan, in the past. He had deep hatred towards all non-Muslims. During the entire period of sixteen years of his regime, Purnaiyya was the only Hindu who had adorned the post of Dewan or minister under Tipu Sultan. In 1797 (two years before his death) among the 65 senior Government posts, not even a single Hindu was retained. All the Mustadirs were also Muslims. Among the 26 civil and military officers captured by the British in 1792 there were only 6 non-Muslims.

In 1789, when the Nizam of Hyderabad and other Muslim rulers decided that only Muslims would be appointed henceforth in all Government posts, Tipu Sultan also adopted the same policy in his Mysore State. Just because they were Muslims, even those who were illiterate and inefficient, were also appointed to important Government posts. Even for getting promotions, one still had to be a Muslim under Tipu Sultan’s regime. Considering the interest and convenience of only Muslim officers, all the records relating to tax revenue, were ordered to be written in Persian rather than in Marathi and Kannada as followed earlier. He even tried to make Persian the State language in place of Kannada.

The Muslim officers, occupying important posts at all levels, were all dishonest and unreliable persons. Even when people complained to him with evidences against those officers, Tipu Sultan did not care to inquire about the complaints lodged.”

ISLAMIC ATROCITIES IN COORG, BEDNUR, AND MANGALORE

The cruelties which Tipu Sultan committed in Coorg, has no parallel in history. On one occasion, he forcibly converted over ten thousand Hindus to Muhammadanism. On another occasion, he captured and converted to Islam more than one thousand Hindu Coorgis before imprisoning them in the Sreerangapatanam fortress. In the period of confusion and anarchy prevailing in Sreerangapatanam during the last war of Tipu Sultan against the British, all the Coorgi prisoners escaped from the prison and became Hindus again after reaching their native kingdom. Against the solemn oath given to the Raja of Coorg, Tipu Sultan forcibly abducted a young princess from the Coorg royal family and made her his wife against her will.

The atrocities committed by Tipu Sultan in Bidnur in North Karnataka during and after its capture by him, were most barbarous and beyond description. Ayaz Khan who was Kammaran Nambiar from Chirackal Kingdom before his forcible conversion to Islam by Hyder Ali Khan, had been appointed as Governor of Bidnur. Tipu Sultan was jealous of and opposed to Ayaz Khan from the very beginning because Hyder Ali Khan had considered the latter more intelligent and smart. When Ayaz Khan learnt that Tipu Sultan was scheming to kill him secretly, he escaped to Bombay with plenty of gold. Tipu Sultan came to Bednur and forcibly converted its entire population to Islam. The people accepted Islam for the sake of their lives.

After the capture of Mangalore, thousands of Christians were also forcibly sent to Sreerangapatanam where all of them were circumcised and converted to Islam. Tipu Sultan’s justification was that during the Portuguese domination, prior to the arrival of the British, many Muslims had been converted to Christianity by their Missionaries. He proudly proclaimed his action as a sort of punishment for the conversion of many Muslims by the Portuguese.

Then he marched upto Kumbla on the northern borders of Kerala, forcibly converting to Islam every Hindu on the way. This time, his argument (repeated by the Muslim and secularist historians of today) was that if all belonged to one religion – Muhammadanism – there would be unity and consequently it would be easy to defeat the British!

INSIDE MALABAR

In Malabar, the main target of Tipu Sultan’s atrocities were Hindus and Hindu temples. According to Lewis B. Boury, the atrocities committed by Tipu Sultan against Hindus in Malabar were worse and more barbarous than those committed against the Hindus in Hindustan by the notorious Mahmud of Ghazni, Alauddin Khalji, and Nadir Shah. He disputes in his book Mukherjee’s version that Tipu Sultan had converted only his opponents. Normally even a cruel person kills or tortures only his enemies. But that argument does not justify the cruelties committed by him against innocent women and children.
DANCE OF THE ISLAMIC SATAN

According to the Malabar Manual of William Logan who was the District Collector for some time, Thrichambaram and Thalipparampu temples in Chirackal Taluqa, Thiruvangatu Temple (Brass Pagoda) in Tellicherry, and Ponmeri Temple near Badakara were all destroyed by Tipu Sultan. The Malabar Manual mention that the Maniyoor mosque was once a Hindu temple. The local belief is that it was converted to a mosque during the days of Tipu Sultan.

Vatakkankoor Raja Raja Varma in his famous literary work, History of Sanskrit Literature in Kerala, has written the following about the loss and destruction faced by the Hindu temples in Kerala during the military regime (Padayottam) of Tipu Sultan: “There was no limit as to the loss the Hindu temples suffered due to the military operations of Tipu Sultan. Burning down the temples, destruction of the idols installed therein and also cutting the heads of cattle over the temple deities were the cruel entertainments of Tipu Sultan and his equally cruel army. It was heartrending even to imagine the destruction caused by Tipu Sultan in the famous ancient temples of Thalipparampu and Thrichambaram. The devastation caused by this new Ravana’s barbarous activities have not yet been fully rectified.”

KOZHIKODE MADE A GRAVEYARD

As per the provisions of the Treaty of Mangalore of 1784, the British had allowed Tipu Sultan to have his suzerainty over Malabar. ‘In consequence, the Hindus of Malabar had to suffer the most severe enormities the world had ever known in history,’ observes K.V. Krishna Iyer, in his famous book, Zamorins of Calicut, based on historical records available from the royal house of Zamorins in Calicut. “When the second-in-line of Zamorins, Eralppad, refused to cooperate with Tipu Sultan in his military operations against Travancore because of Tipu’s crude methods of forcible circumcision and conversion of Hindus to Islam, the enraged Tipu Sultan took a solemn oath to circumcise and convert the Zamorin and his chieftains and Hindu soldiers to Islamic faith,” he adds.

L.B. Boury writes: “To show his ardent devotion and steadfast faith in Muhammaddan religion, Tipu Sultan found Kozhikode to be the most suitable place. It was because the Hindus of Malabar refused to reject the matriarchal system, polyandry and half-nakedness of women that the ‘great reformer’ Tipu Sultan tried to honour the entire population with Islam.” To the Malabar people, the Muslim harem, Muslim polygamy and the Islamic ritual of circumcision were equally repulsive and opposed to the ancient culture and tradition in Kerala. Tipu Sultan sought a marriage alliance with the matriarchal Muslim family of Arackal Bibi in Cannanore. Kozhikode was then a centre of Brahmins and had over 7000 Brahmin families living there. Over 2000 Brahmin families perished as a result of Tipu Sultan’s Islamic cruelties. He did not spare even women and children. Most of the men escaped to forests and foreign lands.

Elamkulam Kunjan Pillai wrote in the Mathrubhoomi Weekly of December 25, 1955: “Muhammadans greatly increased in number. Hindus were forcibly circumcised in thousands. As a result of Tipu’s atrocities, strength of Nairs and Chamars (Scheduled Castes) significantly diminished in number. Namboodiris also substantially decreased in number.”

The German missionary Guntest has recorded: ‘Accompanied by an army of 60,000, Tipu Sultan came to Kozhikode in 1788 and razed it to the ground. It is not possible even to describe the brutalities committed by that Islamic barbarian from Mysore.” C.A. Parkhurst also noted that ‘Almost the entire Kozhikode was razed to the ground.”