Posted in हिन्दू पतन

ऑस्ट्रेलियन प्राइम मिनिस्टर जूलिया गिलार्ड


ऑस्ट्रेलियन प्राइम मिनिस्टर
जूलिया गिलार्ड
को दुनिया की रानी बना देना चाहिए !!
इस महिला प्राइम मिनिस्टर ने
जो कहा है , उस बात को कहने के लिए बड़ा साहस और आत्मविश्वास चाहिए !
पूरी दुनिया के सब देशों में ऐसे ही लीडर होने चाहिए !!
वो कहती हैं :
“मुस्लिम , जो इस्लामिक शरिया क़ानून चाहते हैं उन्हें बुधवार तक ऑस्ट्रेलिया से
बाहर जाने के लिए कहा है
क्योंकि ऑस्ट्रेलिया देश के कट्टर
मुसलमानो को आतंकवादी समझता है ।
ऑस्ट्रेलिया के हर एक मस्जिद की जाँच होगी और मुस्लिम इस जाँच में हमे सहयोग दें ।
जो बाहर से उनके देश मे आए हैं, उन्हें ऑस्ट्रेलिया में रहने के लिए अपने आप को बदलना होगा और ना कि ऑस्ट्रेलियन
लोगो को .. अगर नहीं होता है
तो मुसलमान मुल्क छोड़ सकते हैं
कुछ ऑस्ट्रेलियन चिंतित है ये सोच के की क्या हम किसी धर्म का अपमान
तो नहीं कर रहे .. पर मैं ऑस्ट्रेलियन लोगों को विश्वास देती हूँ की हम जो भी कर रहे है वो सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया के
लोगों के हित में कर रहे हैं
हम यहा इंग्लिश बोलते है ना की अरब ..
इसलिए अगर इस देश में
रहना होगा तो आपको इंग्लिश
सीखनी ही होगी
ऑस्ट्रेलिया में हम JESUS को भगवान मानते हैं , हम भगवान को मानते है ! हम
सिर्फ़ हमारे CHRISTIAN RELIGION
को मानते है और किसी धर्म
को नहीं इसका यह मतलब नहीं कि हम
सांप्रदायिक है ! इसलिए हमारे
यहां भगवान की तस्वीर और धर्म ग्रंथ सब
जगह होते है ! अगर आपको इस बात से
आपत्ति है तो दुनिया में आप
कहीं भी जा सकते हैं ऑस्ट्रेलिया छोड़ कर ।
ऑस्ट्रेलिया हमारा मुल्क है ,
हमारी धरती है , और हमारी सभ्यता है ।
हम आपके धर्म को नहीं मानते पर
आपकी भावना को मानते हैं ! इसलिए अगर
आपको नमाज़ पढ़नी है तो ध्वनि प्रदूषण
ना करें .. हमारे ऑफिस , स्कूल
या सार्वजनिक जगहों में नमाज़ बिल्कुल ना पढ़ें ! अपने घरों में या मस्जिद में शांति से नमाज़ पढ़ें । जिस से हमें कोई तकलीफ़ ना हो ।
अगर आपको हमारे ध्वज से , राष्ट्रीय गीत
से , हमारे धर्म से या फिर हमारे रहन-सहन से कोई भी शिकायत है तो आप अभी इसी वक़्त ऑस्ट्रेलिया छोड़ दें ” ।
– ऑस्ट्रेलिया प्राइम मिनिस्टर
जूलिया गिलार्ड

सीखो भारत के नेताओं ..
कुछ सीखो इनसे….

(सच्चे हिन्दू हो तो कम से कम एक को इस मैसेज को Forward करना)।
भारत माता की जय ।

Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

नेहरू और एडविना माउंटबैटन के बीच भेजी गई चिट्ठियां भी लोगों की पहुंच से बाहर रहेंगी,,


नेहरू और एडविना माउंटबैटन के बीच भेजी गई चिट्ठियां भी लोगों की पहुंच से बाहर रहेंगी,,
=================================================
सोनिया गांधी द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू के कागजात नेहरू मेमोरियल म्यूजियम ऐंड लाइब्रेरी(NMML) को दिए जाने से शुरू में उत्साहित दिख रहे स्कॉलर्स को निराशा हाथ लगी है। सोनिया ने पंडित नेहरू के निजी कागजातों को उपलब्ध करवाने से इनकार कर दिया है। ये वे पेपर है, जिनसे नेहरू के उनके परिजनों और अन्य लोगों से रिश्तों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
साल 1947 से लेकर मई 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु तक के उनके ऑफिशल पेपर्स, चिट्ठियां, भाषण और दूसरी चीज़ें ही लाइब्रेरी को दी गई हैं। स्कॉलर्स और स्टूडेट्स चाहते हैं कि उनके निजी कागजात भी छापे जाएं, ताकि उन्हें और अच्छी तरह समझा जा सके।
इसके अलावा नेहरू और एडविना माउंटबैटन के बीच भेजी गई चिट्ठियां भी लोगों की पहुंच से बाहर रहेंगी। पद्मजा के घर पर नेहरू की फाइलें, कमला नेहरू और सैयद महमूद के बीच का पत्राचार भी पर्सनल पेपर्स की कैटिगरी में आएगा।

नेहरू और एडविना माउंटबैटन के बीच भेजी गई चिट्ठियां भी लोगों की पहुंच से बाहर रहेंगी,,
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सोनिया गांधी द्वारा पंडित जवाहरलाल नेहरू के कागजात नेहरू मेमोरियल म्यूजियम ऐंड लाइब्रेरी(NMML) को दिए जाने से शुरू में उत्साहित दिख रहे स्कॉलर्स को निराशा हाथ लगी है। सोनिया ने पंडित नेहरू के निजी कागजातों को उपलब्ध करवाने से इनकार कर दिया है। ये वे पेपर है, जिनसे नेहरू के उनके परिजनों और अन्य लोगों से रिश्तों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
साल 1947 से लेकर मई 1964 में जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु तक के उनके ऑफिशल पेपर्स, चिट्ठियां, भाषण और दूसरी चीज़ें ही लाइब्रेरी को दी गई हैं। स्कॉलर्स और स्टूडेट्स चाहते हैं कि उनके निजी कागजात भी छापे जाएं, ताकि उन्हें और अच्छी तरह समझा जा सके।
इसके अलावा नेहरू और एडविना माउंटबैटन के बीच भेजी गई चिट्ठियां भी लोगों की पहुंच से बाहर रहेंगी। पद्मजा के घर पर नेहरू की फाइलें, कमला नेहरू और सैयद महमूद के बीच का पत्राचार भी पर्सनल पेपर्स की कैटिगरी में आएगा।
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बहुत बड़ा सरोवर था। उसके तट पर मोर रहता था, और वहीं पास एक मोरनी भी रहती थी।


एक बहुत बड़ा सरोवर था। उसके तट पर मोर रहता था, और वहीं पास एक
मोरनी भी रहती थी।
एक दिन मोर ने मोरनी से प्रस्ताव रखा कि- “हम तुम विवाह कर लें, तो कैसा अच्छा रहे?”
मोरनी ने पूछा- “तुम्हारे मित्र कितने है ?”
मोर ने कहा उसका कोई मित्र
नहीं है। तो मोरनी ने विवाह से इनकार कर दिया।
मोर सोचने लगा सुखपूर्वक रहने के
लिए मित्र बनाना भी आवश्यक है।
उसने एक सिंह से.., एक कछुए से.., और सिंह के लिए शिकार का पता लगाने वाली टिटहरी से.., दोस्ती कर लीं।
जब उसने यह समाचार मोरनी को सुनाया, तो वह तुरंत विवाह के लिए तैयार हो गई। पेड़ पर घोंसला बनाया और उसमें अंडे दिए, और भी कितने
ही पक्षी उस पेड़ पर रहते थे।
एक दिन शिकारी आए। दिन भर कहीं शिकार न मिला तो वे उसी पेड़ की छाया में ठहर गए और सोचने लगे, पेड़ पर चढ़कर अंडे- बच्चों से भूख बुझाई जाए।
मोर दंपत्ति को भारी चिंता हुई, मोर मित्रों के पास सहायता के लिए दौड़ा। बस फिर क्या था.., टिटहरी ने जोर- जोर से चिल्लाना शुरू किया। सिंह समझ गया, कोई शिकार है। वह उसी पेड़ के नीचे चला.., जहाँ शिकारी बैठे थे। इतने में कछुआ भी पानी से निकलकर बाहर आ गया। सिंह से डरकर भागते हुए शिकारियों ने कछुए को ले चलने की बात सोची। जैसे ही हाथ बढ़ाया कछुआ पानी में खिसक गया। शिकारियों के पैर दलदल में फँस गए। इतने में सिंह आ पहुँचा और उन्हें ठिकाने लगा दिया।
मोरनी ने कहा- “मैंने विवाह से पूर्व
मित्रों की संख्या पूछी थी, सो बात
काम की निकली न, यदि मित्र न होते, तो आज हम सबकी खैर न थी।”

मित्रता सभी रिश्तों में अनोखा और आदर्श रिश्ता होता है और मित्र किसी भी व्यक्ति की अनमोल पूँजी होते है।
अगर गिलास दूध से भरा हुआ है तो आप उसमे और दूध नहीं डाल
सकते, लेकिन आप उसमे शक्कर डाल सकते हें । शक्कर अपनी जगह बना लेती है और अपना होने का अहसास दिलाती है।

जीवन में किसी के दोस्त बनो तो शक्कर की तरह बनो।।..

Posted in काश्मीर - Kashmir

नेहरू क्यों नहीं कर पाया सिर्फ एक रियाशत काश्मीर का भारत मैं पूरा विलय ?


नेहरू क्यों नहीं कर पाया सिर्फ एक रियाशत काश्मीर का भारत मैं पूरा विलय ?
काश्मीर रियाशत के महाराजा हरीसिंघ ने कश्मीर के भारत मैं पूरी तरह विलय के लिए हस्ताक्षर कर दिए थे, पर नेहरू ने ये रियाशत अपने पास हल के लिए रखी थी
पर नेहरू काश्मीर को स्विट्जरलेंड की तरह एक अलग देश बनाना चाहता था , पाकिस्तान को इस बात की भनक लगते ही पाकिस्तानी काबाइलियों ने काश्मीर पर हमला कर दिया , महाराज हरीसिंघ ने इसके लिए नेहरू से सैनिक मदद मागी ,पर जब नेहरू ने मदद नहीं की
तो बात सरदार के पास गई उन्होने तुरत कार्यवाही करते हुए सेना को भेजा पर जब नेहरू ने देखा की भारतीय सेना पाकिस्तानी काबाइलिओ को वापस खदेड़ रही है और अगर कुछ समय और मिला तो सेना काबाइलिओ को खदेड़ कर पूरे काश्मीर पर वापस कब्जा कर लेगी तो नेहरू ने सेना को वही रुक जाने और लड़ाई नहीं करने का कहा और कहा की हम ये मशला शांति से निपटा लेंगे
फिर नेहरू इस मशले को यू एन मैं ले गया और इस तरह उस समय काश्मीर का जो भाग काबाइलिओ के कब्जे मैं रह गया वो अब पाक अधिकृत कश्मीर कहलाता है , सिर्फ २४ घंटे का और समय दिया जाता तो भी हमारी सेना पूरा कश्मीर काबाइलिओ से खाली करा लेती और आज काश्मीर की कोई समश्या ही नहीं होती

नेहरू क्यों नहीं कर पाया सिर्फ एक रियाशत काश्मीर का भारत मैं पूरा विलय ?
काश्मीर रियाशत के महाराजा हरीसिंघ ने कश्मीर के भारत मैं पूरी तरह विलय के लिए हस्ताक्षर कर दिए थे, पर नेहरू ने ये रियाशत अपने पास हल के लिए रखी थी
पर नेहरू काश्मीर को स्विट्जरलेंड की तरह एक अलग देश बनाना चाहता था , पाकिस्तान को इस बात की भनक लगते ही पाकिस्तानी काबाइलियों ने काश्मीर पर हमला कर दिया , महाराज हरीसिंघ ने इसके लिए नेहरू से सैनिक मदद मागी ,पर जब नेहरू ने मदद नहीं की
तो बात सरदार के पास गई उन्होने तुरत कार्यवाही करते हुए सेना को भेजा पर जब नेहरू ने देखा की भारतीय सेना पाकिस्तानी काबाइलिओ को वापस खदेड़ रही है और अगर कुछ समय और मिला तो सेना काबाइलिओ को खदेड़ कर पूरे काश्मीर पर वापस कब्जा कर लेगी तो नेहरू ने सेना को वही रुक जाने और लड़ाई नहीं करने का कहा और कहा की हम ये मशला शांति से निपटा लेंगे
फिर नेहरू इस मशले को यू एन मैं ले गया और इस तरह उस समय काश्मीर का जो भाग काबाइलिओ के कब्जे मैं रह गया वो अब पाक अधिकृत कश्मीर कहलाता है , सिर्फ २४ घंटे का और समय दिया जाता तो भी हमारी सेना पूरा कश्मीर काबाइलिओ से खाली करा लेती और आज काश्मीर की कोई समश्या ही नहीं होती
Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

झारखंडी शिव-


*—झारखंडी शिव—*

+–गोरखपुर से 25 किमी दूर खजनी कस्बे के
सरया तिवारी गाव में झारखंडी शिव नामक शिवलिंग है
+–महमूद गजनवी ने इसे तोड़ने की कोशिश की थी, मगर
वह सफल नहीं हो पाया
+–इसके बाद उसने इस पर उर्दू में ‘लाइलाहाइल्लललाह
मोहम्मदमदुर्र् रसूलुल्लाह’ लिखवा दिया ताकि हिंदू
इसकी पूजा नहीं करे

+–मगर हिन्दुओ ने अपनी आस्था से अपने आराध्य
की अर्चना पूजा नहीं छोड़ी
+–हिन्दू तो हिन्दू समय जाते खुद मुसलमान रमजान के
महीने में शिव के सामने सजदे करते है
+–गजनवी फ़ैल हो गया

+–यहां के शिव खुले आसमान के नीचे रहते हैं
+–इस मंदिर पर कई कोशिशों के बाद भी कभी छत
नही लग पाया है

+–मंदिर के बगल में ही एक पोखर है जिसके लिए
मान्यता है कि उसमें नहाने से चर्म रोगों से
मुक्ति मिलती है।

+–यहां पर लोग अपने विभिन्न प्रकार के चर्म रोगों के
निजात पाने के लिए पांच मंगलवार और रविवार स्नान
भी करते हैं।
हर हर महादेव
ं●
‪#‎ॐ_राजा_हिंदुस्तानी_ॐ‬

*---झारखंडी शिव---*

+--गोरखपुर से 25 किमी दूर खजनी कस्बे के
सरया तिवारी गाव में झारखंडी शिव नामक शिवलिंग है
+--महमूद गजनवी ने इसे तोड़ने की कोशिश की थी, मगर
वह सफल नहीं हो पाया
+--इसके बाद उसने इस पर उर्दू में 'लाइलाहाइल्लललाह
मोहम्मदमदुर्र् रसूलुल्लाह' लिखवा दिया ताकि हिंदू
इसकी पूजा नहीं करे

+--मगर हिन्दुओ ने अपनी आस्था से अपने आराध्य
की अर्चना पूजा नहीं छोड़ी
+--हिन्दू तो हिन्दू समय जाते खुद मुसलमान रमजान के
महीने में शिव के सामने सजदे करते है
+--गजनवी फ़ैल हो गया 

+--यहां के शिव खुले आसमान के नीचे रहते हैं
+--इस मंदिर पर कई कोशिशों के बाद भी कभी छत
नही लग पाया है 

+--मंदिर के बगल में ही एक पोखर है जिसके लिए
मान्यता है कि उसमें नहाने से चर्म रोगों से
मुक्ति मिलती है।

+--यहां पर लोग अपने विभिन्न प्रकार के चर्म रोगों के
निजात पाने के लिए पांच मंगलवार और रविवार स्नान
भी करते हैं। 
हर  हर महादेव 
ं●
#ॐ_राजा_हिंदुस्तानी_ॐ
Posted in रामायण - Ramayan

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी।


सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था। अपने पती की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।

मेघनाद का वध

रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- “लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोर्इ संदह नहीं है। परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।

कटी भुजा द्वारा सुलोचना को प्रमाण
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुर्इ उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यकित की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- “यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृतान्त लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- “प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्ध भूमि में श्रीराम के भार्इ लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कर्इ वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।[1]

सुलोचना की रावण से प्रार्थना

पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- ‘शोक न कर पुत्री। प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुर्इ सुलोचना बोली- “पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे।[1] सुलोचना ने निश्चय किया कि ‘मुझे अब सती हो जाना चाहिए।’ किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- “देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।”[2]

पति के शीश की प्राप्ति

सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- “देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी। श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- “देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- “राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आर्इ हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।

पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- “सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।[1]

सुग्रीव की जिज्ञासा

सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुर्इ कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- “मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुर्इ मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया। व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- “निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- “व्यर्थ बातें मन करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।

महान पतिव्रता स्त्री

श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- “यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुर्इ थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- “भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गर्इ। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।

सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था। अपने पती की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।

मेघनाद का वध

रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोर्इ संदह नहीं है। परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सैना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।

कटी भुजा द्वारा सुलोचना को प्रमाण
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुर्इ उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यकित की हो। ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृतान्त लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है। युद्ध भूमि में श्रीराम के भार्इ लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कर्इ वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।[1]

सुलोचना की रावण से प्रार्थना

पति की भुजा-लिखित पंकितयां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री। प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुर्इ सुलोचना बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे।[1] सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।' किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"[2]

पति के शीश की प्राप्ति

सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- "देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी। श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आर्इ हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।

पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।[1]

सुग्रीव की जिज्ञासा

सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुर्इ कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुर्इ मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया। व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मन करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।

महान पतिव्रता स्त्री

श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुर्इ थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गर्इ। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।
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