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गुरु पूर्णिमा: मैं और मेरे गुरु


गुरु पूर्णिमा: मैं और मेरे गुरु

संदीप देव। आज गुरु पूर्णिमा है! आज मैं जो कुछ भी हूं अपनी प्रथम गुरू मेरी नानी और मेरे अध्‍यात्मिक गुरु ओशो के कारण हूं। नानी ने मेरे जीवन को गढ़ा और भटकने की उम्र युवावस्‍था में ओशो की शिक्षाओं ने उस जीवन को सही दिशा प्रदान कर दिया। ओशो के साक्षीभाव ध्‍यान ने मुझे होशपूर्ण रहना सिखाया। मेरे चलने से लेकर मेरे खाने तक और मेरे एक एक शब्‍द के चयन तक में साक्षीभाव की दशा आ गई, जिस कारण कई बार मेरा ईश्‍वर से सीधा साक्षात्‍कार हुआ।

कई लोग इसे नहीं समझेंगे या नहीं मानेंगे, लेकिन यह सच है और यह मेरी अनुभूति है। इसी साक्षीभाव दशा के कारण मैं जान सका कि मैं कुछ भी नहीं हूं, न ही मैं कुछ करता हूं, बल्कि जो करता है वह परम पिता परमात्‍मा करता है और वह बस मुझ जैसे लाखों लोगों को किसी न किसी कार्य के लिए अपना निमित्‍त बना लेता है। मैं खुद से एक कदम भी नहीं उठाता और यह मेरा अंतर्मन जानता है।

मेरी विकास यात्रा में मेरे माता-पिता, पत्‍नी और बेटे ने भी गुरू की भूमिका निभाई है। मेरे अंदर प्रेम और करुणा की धारा इनके सान्निध्‍य में बही है। इधर बाबा रामदेव के सान्निध्‍य में आया और भ्रामरी योग के दौरान अंदर एक प्रकाश का विस्‍फोट हुआ और ऐसा लगा कि तीसरे नेत्र पर चोट पहुंच रही है। तीसरे नेत्र को सजग करने वाले बाबा रामदेव भी मेरे गुरू ही हुए। इन सभी की शिक्षाओं और उससे उत्‍पन्‍न अनुभूतियों से ही मेरा व्‍यक्तित्‍व निर्मित हुआ है। मैं अपने इन सभी गुरुओं को सादर प्रणाम करता हूं।

गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर!!
गुरु साक्षात् परमं ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नम:!!

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पिछले 10 साल में कांग्रेस ने किस तरह किया न्‍यायपालिका को भ्रष्‍ट, जानिए एक-एक जज की हकीकत!


पिछले 10 साल में कांग्रेस ने किस तरह किया न्‍यायपालिका को भ्रष्‍ट, जानिए एक-एक जज की हकीकत!

संदीप देव, नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट के जज और मद्रास हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रहे मार्कंडेय काटजू के एक बयान के कारण सोमवार, 21 जुलाई 2014 को राज्‍यसभा को कुछ समय के लिए स्‍थगित करना पड़ा था। वर्तमान में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन मार्कंडेय काटजू  ने आरोप लगाया है कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के कार्यकाल में एक जज को भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद पदोन्‍नति दी गई। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मार्कंडेय काटजू का आरोप है कि तमिलनाडु के एक डिस्ट्रिक्ट जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप होने के बावजूद यूपीए सरकार की एक सहयोगी पार्टी के दबाव के कारण उन्‍हें मद्रास हाई कोर्ट में अडिशनल जज के रूप में प्रमोट किया गया था। इंटेलिजेंस ब्यूरो की तरफ से प्रतिकूल रिपोर्ट दिए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के दो-दो मुख्य न्यायधीशों ने उस आरोपी जज को बचाया, जबकि तीसरे चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने उन्हें स्‍थाई करते हुए दूसरे हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया।

कांग्रेस ने न्‍यायपालिका का दुरुपयोग सबसे अधिक नरेंद्र मोदी को कुचलने के लिए किया!
कांग्रेस से नजदीकी के कारण ही सेवानिवृत्‍त होते ही जस्टिस रहे मार्कंडेय काटजू को प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया का पद मिला था। इस पर नियुक्‍त होते ही जस्टिस रहे मार्कंडेय काटजू  ने कांग्रेस के सबसे बड़े विरोधी नरेंद्र मोदी को चुना और उन पर लगातार हमला बोल दिया था। भारत से लेकर पाकिस्‍तान तक के अंग्रेजी अखबारों में वह नरेंद्र मोदी के खिलाफ लेख लिख रहे थे। देश की जनता से वह अपील जारी कर रहे थे कि वह नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री न बनाएं। आज जब नरेंद्र मोदी की सरकार पूर्ण बहुमत से बन गई है तो जस्टिस रहे मार्कंडेय काटजू कांग्रेस पर हमलावर हैं।

कांग्रेस प्रवक्‍ता राशिद अल्‍वी का कहना है कि जस्टिस रहे मार्कंडेय काटजू ‘मोदी सरकार’ से नजदीकी बढ़ाना चाहते हैं। हो सकता है कि यह संभव हो, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि इन्‍हीं नरेंद्र मोदी को नेस्‍तनाबूत करने और जमीन चटाने के लिए कांग्रेस ने न केवल जस्टिस रहे मार्कंडेय काटजू, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश तक को उपकृत किया था। सीबीआई जांच में घिरे सुप्रीम कोर्ट के जज तक से मोदी पर हमला कराया जा रहा था और इसके एवज में उन जजों को लाभान्वित किया जा रहा था। आइए आपको बताते हैं कि आज मार्कंडेय काटजू को झूठ बताने वाली कांग्रेस पार्टी ने सत्‍ता में रहते हुए किस से नरेंद्र मोदी को नेस्‍तनाबूत करने के लिए न्‍यायपालिका को भ्रष्‍ट किया और किस तरह हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट में बैठे जजों ने कानून को ताक पर रखकर नरेंद्र मोदी को देश की जनता द्वारा चुना हुआ मुख्‍यमंत्री नहीं, बल्कि अपना दुश्‍मन समझ कर बर्ताव किया!

जस्टिस आफताब आलमः
गुजरात पर निर्णय देने वाली सुप्रीम कोर्ट के दो खंडपीठ वाली जजों के बेंच में शामिल रहे पूर्व जज जस्टिस आफताब आलम पर ‘सांप्रदायिक सोच’ का आरोप लग चुका है। यही नहीं, उनकी बेटी का मोदी को बदनाम करने में जुटे एनजीओ गिरोह के साथ आर्थिक गठबंधन भी सामने आ चुका है। जस्टिस आफताब आलम की सांप्रदायिक मनोवृत्ति का खुलासा गुजरात हाईकोर्ट के पूर्व जज व गुजरात के पूर्व लोकायुक्त एस.एम.सोनी ने किया। जस्टिस एस.एम.सोनी ने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.एच. कपाडि़या को एक कड़ा पत्र लिखा जिसमें कहा गया था कि ‘‘सांप्रदायिक सोच वाले न्यायधीश आफताब आलम को गुजरात दंगे से जुड़े सभी मुकदमों से अलग किया जाए।’’

अपने 10 पन्नों की चिट्ठी में न्यायमूर्ति सोनी ने अनेक प्रमाणों और तथ्यों का हवाला देते हुए लिखा है कि ‘‘मैंने गुजरात दंगो और गुजरात के कई मामलों से जुड़े उन फैसलों का अध्ययन किया है जिसमें जस्टिस आफताब आलम की खण्डपीठ ने फैसला दिया है। अधिकांश फैसले एक खास समुदाय का होने की वजह से पूर्वग्रह से प्रेरित प्रतीत होते हैं।’’ जस्टिस सोनी ने लिखा है कि ‘‘उनके पत्र को सिर्फ पत्र नहीं, बल्कि एक जनहित याचिका (पीआईएल) समझकर देखा जाये।’’ पूर्व जस्टिस सोनी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को जस्टिस आफताब आलम के द्वारा लन्दन में वल्र्ड इस्मालिक फोरम में दिये गए घोर सांप्रदायिक व आपत्तिजनक भाषण की सीडी भी भेजी थी।

जस्टिस आफताब आलम के कारण सुप्रीम कोर्ट को मांगनी पड़ी थी माफीः जस्टिस आलम के कारण एक बार तो सुप्रीम कोर्ट को भी माफी मांगनी पड़ी थी। तीस्ता जावेद सीतलवाड़, शबनम हाशमी और मुकुल सिन्हा की अगुवाई वाली ‘जनसंघर्ष मंच’ ने सुप्रीम कोर्ट में एक अर्जी लगाकर मांग की थी कि नानावती कमीशन से कहा जाए कि वह नरेंद्र मोदी को पूछताछ के लिए बुलाएं। सुप्रीम कोर्ट ने इस अर्जी को खारिज करते हुए इस मंच के वकील मुकुल सिन्हा को कड़ी फटकार लगाई थी।

लेकिन इस अर्जी से पहले सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आफताब आलम की खण्डपीठ ने गुजरात सरकार और नानावती कमीशन को नोटिस जारी कर दिया था। इसे बाद में सुप्रीम कोर्ट ने वापस ले लिया और कहा था कि ‘‘किसी भी जज को कोई भी फैसला सुनाते समय भारत के कानून और संविधान का पालन करना चाहिए। कोई भी न्यायिक आयोग (इस मामले में नानावती कमीशन) पूरी तरह से स्वत्रंत होता है। किसी भी आयोग को नोटिस भेजने की सत्ता सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। सुप्रीम कोर्ट अपनी गलती सुधारते हुए नोटिस वापस लेता है और सभी पक्षों से इस गलती के लिए खेद प्रकट करता है।’’

जस्टिस आलम, उनकी बेटी शाहरुख, तीस्ता एवं अन्य एनजीओ के आर्थिक संबंधः यह एक जाना हुआ तथ्य है कि इन्हीं जस्टिस आफताब आलम की बेटी शाहरुख आलम एंटी मोदी कैंप में शामिल एक एटिविस्ट हैं और एनजीओ चलाती हैं। और यह भी एक बड़ा तथ्य है कि मोदी विरोधी अभियान चलाने वाली तीस्ता सीतलवाड़ आदि हर बार आफताब आलम की खण्डपीठ में ही याचिका दायर करती रही हैं।

तीस्ता सीतलवाड़ के पूर्व सहयोगी रईस खान पठान ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर तीस्ता जावेद सीतलवाड़ एवं जस्टिस आफताब आलम की बेटी शाहरुख आलम के बीच के आर्थिक संबंधों को उजागर किया था। रईस खान ने दायर अपनी याचिका में लिखा था कि ‘‘गुजरात दंगों से सम्बंधित सभी मामलों को जस्टिस आफताब आलम की पीठ से हटाया जाए। जस्टिस आलम की बेटी शाहरुख आलम के आर्थिक हित तीस्ता व अन्य कई एनजीओ से जुड़े हुए हैं।’’

रईस खान के पत्र के मुताबिक, जस्टिस आफताब आलम की बेटी शाहरुख आलम ‘पटना कलेक्टिव’ नामक एनजीओ चलाती है। इस एनजीओ को नीदरलैंड्स की संस्था ‘हिवोस‘ से बड़ी मात्रा में धनराशि अनुदान के रूप में मिलती है। यही संस्था तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ ‘सिटीजन फॉर जस्टिस एंड पीस’(सीजेपी) को भी भारी अनुदान देती है। ‘हिवोस’ ने नीदरलैंड की एक और संस्था ‘कोस्मोपोलिस इंस्टीट्यूट’ के साथ मिलकर ‘प्रमोटिंग प्लूरिज्म नॉलेज प्रोग्राम’ नाम से शोध पत्रों की एक श्रृंखला को प्रकाशित किया था। इसमें स्वयं जस्टिस आफताब आलम ने लंदन में ‘द आइडिया ऑफ सेक्यूलरिज्म एंड सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया’ शीर्षक से एक पेपर प्रस्तुत किया था।

जस्टिस आफताब आलम के कई फैसलों पर कानून के जानकारों ने उठाई उंगली!
कानून के जानकारों व याचिका कर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस आफताब आलम द्वारा गुजरात दंगे और पुलिस मुठभेड़ मामले पर दिए गए कई निर्णयों पर सवाल उठाया था? पीछे आप पढ़ ही चुके हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एक याचिका पर गलत निर्णय देने के कारण खुद सुप्रीम कोर्ट को भी जस्टिस आफताब आलम के कारण माफी मांगनी पड़ गई थी। मोदी विरोधी गिरोह की अगुवाई करने वाली तीस्ता सीतलवाड़ व निलंबित आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट आदि अकसर जस्टिस आफताब आलम की कोर्ट में ही याचिका दायर करते थे। यहां संक्षेप में जस्टिस आफताब आलम की खंडपीठ द्वारा दिए गए कुछ ऐसे निर्णयों को रख रहा हूं, जिस पर कानूनी के जानकारों ने उंगली उठाईः-

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर में सीबीआई जांच का आदेशः गैंगस्टर सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में गुजरात पुलिस पहले से ही जांच कर रही थी। जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस तरुण चटर्जी की बेंच ने इसकी जांच सीबीआई को सौंप दी। अदालत में गुजरात सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि जब पहले से ही किसी मामले में एक जांच एजेंसी जांच कर रही हो तो उसे इस तरह से बीच में किसी अन्य जांच एजेंसी के हवाले नहीं किया जा सकता है, लेकिन खंडपीठ ने इसे नहीं माना।

सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले की जांच गुजरात स्पेशल टास्क फोर्स कर रही थी, लेकिन जांच के बीच से जस्टिस आफताब आलम की बेंच ने उसे केंद्र सरकार की एजेंसी सीबीआई के हवाले कर दिया। इसी मामले में सीबीआई ने गुजरात के पूर्व गृहमंत्री अमित शाह को गिरफ्तार किया था। कई महीने जेल में रहने के बाद अमित शाह को इस शर्त पर जमानत मिली थी कि वो गुजरात में प्रवेश नहीं करेंगे।

जांच समिति में जज के नाम की संस्तुतिः जस्टिस आफताब आलम ने गुजरात एनकाउंटर की जांच के लिए गठित समिति के अध्यक्ष के रूप में अपनी पंसद के सेवानिवृत्त जज को बैठाना चाहा था। फरवरी 2012 में जस्टिस आलम ने वर्ष 2002-2006 के बीच हुए एनकाउंटर मामले की जांच के लिए बनाई गई निगरानी समिति के अध्यक्ष पद के लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज का नाम लेते हुए उन्हें नियुक्त करने का मौखिक आदेश दे दिया था।

दरअसल इस मामले की जांच जस्टिस शाह कमेटी कर रही थी, लेकिन निजी कारण का हवाला देते हुए जस्टिस शाह ने इस समिति के प्रमुख पद से खुद को हटा लिया, जिसके बाद गुजरात सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस के आर व्यास को इस समिति का चेयरमैन नियुक्त किया था। इस पर जस्टिस आफताब आलम की खंडपीठ ने अपनी पसंद के जज का नाम सुझा दिया।

बाद में जस्टिस आलम ने अदालत में मौजूद पत्रकारों को यह कहा कि जिस जज का नाम मैंने सुझाया है उसका नाम वह अदालत के बाहर न ले जाएं और अपने अखबार में प्रकाशित न करें। यह कोई औपचारिक आदेश नहीं था। उन्होंने मीडिया को जोर देकर कहा कि मेरे द्वारा सुझाए गए जज का नाम आदेश का हिस्सा नहीं है इसलिए किसी भी हाल में उनके नाम का उल्लेख समाचार पत्रों में नहीं होना चाहिए, अन्यथा उस जज को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ेगा। गुजरात सरकार के एडिशनल एडवोकेट जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि किसी कमेटी या कमीशन के गठन और उसके अध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार सरकार में निहित होता है।

जस्टिस आलम ने तीस्ता को जांच से बचायाः दंगे में मारे गए लोगों की कब्र अवैध तरीके से खुदवा कर उनकी लाश निकालने और सबूतों से छेड़छाड़ के मामले में गुजरात सरकार ने जब जांच का आदेश दिया तो सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस आफताब आलम ने सरकार पर ही सवाल उठा दिया। फरवरी 2012 में अपने एक आदेश में जस्टिस आलम की खंडपीठ ने कहा कि यह शत-प्रतिशत सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ को सरकार द्वारा परेशान करने का प्रयास है। इस तरह की जांच गुजरात सरकार पर संदेह उत्पन्न करता है। गुजरात सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील प्रदीप घोष को जस्टिस आलम की खंडपीठ ने कहा कि आपको मेरी सलाह है कि आप सरकार से कहें कि इस तरह के मुकदमे न दर्ज करें।  ज्ञात हो कि तीस्ता सीतलवाड़ पर आरोप था कि उसने बिना पुलिस को सूचित किए ही 2002 के दंगे में पंडरवारा व खानपुर तालुका के आसपास के गांव के मारे गए 28 लोगों के शवों को न केवल कब्र खोदकर निकाला, बल्कि सबूतों से भी छेड़छाड़ की।

संजीव भट्ट के खिलाफ ई-मेल हैकिंग की जांच रुकवाईः जस्टिस आफताब आलम व जस्टिस रंजना देसाई की खंडपीठ ने वर्ष 2012 में निलंबित आईपीएस संजीव भट्ट के खिलाफ अवैध रूप से ई-मेल हैकिंग की जांच रुकवा दी थी। संजीव भट्ट पर आरोप था कि उसने राज्य सरकार के एडिशनल एडवोकेट जनरल तुषार मेहता के ई-मेल की हैकिंग की और उसके जरिए महत्वपूर्ण सूचनाओं को सरकार विरोधी लोगों तक पहुंचाया। तुषार मेहता की शिकायत पर अगस्त 2011 में संजीव भट्ट के खिलाफ वस्तारपुर पुलिस स्टेशन में मुकदमा दर्ज किया गया था।

संजीव भट्ट के खिलाफ ट्रायल चलने से रोकाः अप्रैल 2012 में जस्टिस आफताब आलम व जस्टिस रंजना देसाई की खंडपीठ ने निलंबित आईपीएस संजीव भट्ट के खिलाफ ट्रायल पर रोक लगा दिया। उन पर आरोप था कि दंगे में नरेंद्र मोदी को फंसाने के लिए उन्होंने अपने सरकारी ड्राइवर के.डी पंत पर झूठी गवाही देने के लिए दबाव डाला है। आरोप के मुताबिक संजीव भट्ट ने के.डी पंत से कहा था कि वह अदालत में यह कहे कि वह 27 फरवरी 2002 को उसे नरेंद्र मोदी के आवास पर ले गया था, जहां मोदी ने गुजरात पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक की थी।  ड्राइवर के.डी पंत ने संजीव भट्ट की झूठ में साथ देने से मना कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी की जांच में यह साबित हो गया है कि गोधरा दंगे के बाद राज्य की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर मुख्यमंत्री द्वारा बुलाई गई बैठक में संजीव भट्ट शामिल ही नहीं हुआ था।

जस्टिस तरुण चटर्जीः
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस तरुण चटर्जी की खंडपीठ ने ही महाराष्ट्र सरकार द्वारा भगोड़ा घोषित अपराधी सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस की जांच को जनवरी 2012 में सीबीआई के हवाले किया था। अपने सेवानिवृत्त होने से ठीक एक दिन पहले जस्टिस तरुण चटर्जी ने सोहराबुद्दीन शेख मामले की जांच सीबीआई को सौंपी थी, लेकिन ताज्जुब की बात तो यह है कि वही सीबीआई जस्टिस तरुण चटर्जी के खिलाफ उत्तरप्रदेश प्रोविडेंट फंड घोटाले में जांच कर रही थी। करोड़ों रुपए के गाजियाबाद प्रोविडंट फंड घोटाले में जस्टिस चटर्जी भी एक आरोपी थे।

गुजरात के पूर्व गृहमंत्री व सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में अभियुक्त बनाए गए अमित शाह के वकील राम जेठमलानी ने नवंबर 2011 में सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाते हुए कहा था कि ‘‘खुद घोटाले में घिरे एक जज की जांच जब सीबीआई कर रही हो तो वह किसी अन्य मामले की जांच उसी एजेंसी सीबीआई को कैसे हस्तांतरित कर सकते हैं? यही कारण है कि न्यायपालिका संदेह के घेरे में है और अब तो लगता है कि न्यायपालिका को भी लोकपाल के दायरे में ले आना चाहिए?’’

राम जेठमलानी की जिरह के अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की यूपीए सरकार से इस बारे में जवाब तलब किया था। सुप्रीम कोर्ट का सवाल ही अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है? सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया था कि ‘‘सोहराबुद्दीन शेख फेक एनकाउंटर मामले को सीबीआई को हस्तांतरित करने के लिए केंद्र सरकार और जस्टिस तरुण चटर्जी के बीच क्या किसी तरह का गुप्त समझौता हुआ था?’’

जानकारी के लिए बता दूं कि उत्तरप्रदेश के गाजियाबाद जिला जज प्रोविडेंट फंड (पी.एफ) घोटाले में फंसे जस्टिस तरुण चटर्जी सहित 23 जजों के खिलाफ सबूत जुटाने के बाद सीबीआई ने कहा था कि इन सभी के खिलाफ पी.एफ घोटाले में संलिप्तता के पुख्ता सबूत हैं, जिसके लिए इनके खिलाफ जांच का आदेश दिया जाए। जांच शुरू होने के दौरान इस घोटाले के सबसे बड़े गवाह आशुतोष अस्थाना का गाजियाबाद के डासना जेल में संदिग्ध परिस्थिति में मौत हो गई थी। उसके परिवार वालों ने आरोप लगाया था कि चूंकि इस घोटाले में जजों सहित कई बड़े लोगों का नाम शामिल था, इसलिए आशुतोष की जेल में ही जहर देकर हत्या करवा दी गई!

उस दौरान इंडिया टूडे ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें सीबीआई सूत्रों के हवाले से यह खबर प्रकाशित की गई थी कि वर्ष 2008 के आखिर में सीबीआई ने जस्टिस चटर्जी के घर पर जाकर पूछताछ की थी। उस समय जस्टिस चटर्जी सुप्रीम कोर्ट के जज नियुक्त हो चुके थे। उनसे पूछताछ के लिए सुप्रीम कोर्ट आॅफ इंडिया के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन से बकायदा इजाजत ली गई थी। जस्टिस चटर्जी से आशुतोष अस्थाना द्वारा दिए गए बयान के आधार पर पूछताछ की गई थी, जिसमें उसने उनका नाम लिया था।

अस्थाना के आरोप के मुताबिक उसने जस्टिस तरुण चटर्जी को घरेलू उपयोग की बहुत सारी सामग्री रिश्वत में दी थी, जिसे गाजियाबाद से कोलकाता स्थित उनके घर में पहुंचाया गया था। सीबीआई ने जस्टिस तरुण चटर्जी के बेटे अनिरुद्ध चटर्जी से भी कोलकाता में पूछताछ की थी। अस्थाना के आरोप के मुताबिक उसने अनिरुद्ध को लैपटॉप और मोबाइल फोन दिया था। हालांकि जस्टिस चटर्जी ने इन सभी आरोपों को नकार दिया था, लेकिन सीबीआई का कहना था कि उनके पास जस्टिस तरुण चटर्जी के खिलाफ पर्याप्त संख्या में दस्तावेजी सबूत हैं।

अमित शाह के वकील राम जेठमलानी ने सुप्रीम कोर्ट के अंदर सुनवाई के दौरान कहा था कि ‘‘दुनिया के आपराधिक मुकदमों के इतिहास में कभी भी किसी न्यायाधीश ने ऐसा निर्णय नहीं दिया है जिसमें वह उसी एजेंसी को एक मामले की जांच सौंपते हैं, जो एजेंसी खुद उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही हो?’’

लोकायुक्त विवाद व जस्टिस आरए मेहताः गुजरात लोकायुक्त नियुक्त की लड़ाई का पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब गुजरात की राज्यपाल डॉ कमला बेनीवाल ने 25 अगस्त 2011 को गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी व उनके मंत्रीमंडल की पूरी तरह से अनदेखी करते हुए सेवानिवृत्त जज आर.ए. मेहता को लोकायुक्त नियुक्त कर दिया था। राजनीतिक पंडितों ने इसे गुजरात सरकार के विरुद्ध कांग्रेसी राज्यपाल कमला बेनीवाल के जरिए कांग्रेस आलाकमान द्वारा खेली गई चाल करार दिया था। कांग्रेस लोकायुक्त के जरिए नरेंद्र मोदी की गुजरात सरकार को अस्थिर करना चाहती थी।

जस्टिस मेहता के नाम पर असली विवाद की वजहः अवकाश प्राप्त जस्टिस रमेश अमृतलाल मेहता यानी आर.ए मेहता की खिलाफत मोदी सरकार ने क्यों की? दरअसल गुजरात दंगे के बाद पूर्व जज आर.ए. मेहता विभिन्न एनजीओ के मंच से नरेंद्र मोदी पर लगातार हमला कर रहे थे। गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा था कि जस्टिस मेहता मौजूदा शासन के प्रति पूर्वग्रह से ग्रस्त हैं। अपने पूर्वग्रह के कारण वह निष्पक्षता से अपना दायित्व नहीं निभा सकेंगे। राज्य सरकार ने गुजरात दंगों को लेकर जस्टिस मेहता द्वारा दिए गए वक्तव्यों को अदालत में प्रमुखता से रखा था। पूर्व न्यायाधीश मेहता अपनी नियुक्ति के पहले मोदी विरोधी विभिन्न एनजीओ के मंच से गुजरात सरकार को घेरते रहे थे। यही नहीं, वह एक एनजीओ के ट्रस्टी भी हैं।

वर्ष 2002 में हुए दंगों के बाद जस्टिस मेहता ने गुजरात सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष से मिलकर शिकायत की थी और विभिन्न एनजीओ के मंच से अन्य बुद्धिजीवियों की ही तरह उन्होंने भी नरेंद्र मोदी को इसके लिए जिम्मेवार ठहराया था। वह एनजीओ के लिए कितने चहेते थे इसका पता इसी से चलता है कि जस्टिस शाह के निधन के बाद गुजरात दंगों की जांच के लिए बने आयोग के अध्यक्ष पद के लिए एनजीओ ‘जनसंघर्ष मंच’ ने जस्टिस मेहता का नाम सुझाया था। बाद में इस आयोग के मुखिया जस्टिस नानावती बने और यह ‘नानावती आयोग’ या ‘नानावती शाह कमीशन’ कहलाया।

गुजरात सरकार का कहना था कि जस्टिस मेहता शुरू से ही राज्य सरकार की निंदा करने वाले एनजीओ के लिए चहेते रहे हैं। ऐसे में न्यायमूर्ति मेहता लोकायुक्त के रूप में निष्पक्षता पूर्वक अपनी जिम्मेवारियों का निर्वहन नहीं कर पाएंगे।’’

गुजरात मामले की सुनवाई करने वाले सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को सेवानिवृत्त होते ही केंद्र सरकार करती रही है उपकृत:
वर्तमान वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने फरवरी 2013 में सेवानिवृत्त होने के तुरंत बाद विभिन्न आयोगों में जजों की नियुक्ति पर नई बहस छेड़ दी थी। इससे पूर्व वर्ष 2010 में पायनियर अखबार में टिप्पणीकार अब्राहम थॉमस ने एक लेख लिखा था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश व कई अन्य न्यायाधीशों का जिक्र करते हुए कहा गया था कि जिन भी जजों ने नरेंद्र मोदी पर शिकंजा कसा, केंद्र की यूपीए सरकार ने उन्हें तुरंत पद व पुरस्कार देकर सम्मानित व उपकृत किया। उस लेख का शीर्षक था,‘‘इट्स ऑफिशियल: बैट मोदी गेट रिवार्ड।’’

जस्टिस आफताब आलम अप्रैल 2013 में सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए। उन्हें सेवानिवृत्त हुए दो महीने भी नहीं हुए थे कि कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए की केंद्र सरकार ने उन्हें टेलिकॉम डिस्प्यूट सेटलमेंट एंड एपेलेट ट्रिब्यूनल (टीडीसेट) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया।

पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया वीएन खरे को कौन भूल सकता है? गुजरात दंगे की सुनवाई के दौरान मोदी सरकार के खिलाफ उन्होंने बेहद कठोर टिप्पणी करते हुए कहा था कि गुजरात सरकार ‘राजधर्म’ को निभाने में असफल रही थी। जस्टिस वीएन खरे के आदेश पर ही दंगों की अदालती सुनवाई की निगरानी शुरू हुई थी। बेस्ट बेकरी केस में 21 अभियुक्तों को बेगुनाह मानते हुए बरी कर दिया गया था, लेकिन जस्टिस खरे ने बेस्ट बेकरी की फाइल दोबारा से खुलवाई थी। जस्टिस खरे वर्ष 2004 में सेवानिवृत्त हुए थे और वर्ष 2006 में केंद्र सरकार ने उन्हें भारत रत्न के बाद देश के दूसरे नंबर के सर्वोच्च नागरिकता सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया था।

इसी प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया के जस्टिस अरिजीत पसायत का वह वाक्य सभी को याद है, जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी को ‘आधुनिक नीरो’ की संज्ञा दे डाली थी। जस्टिस अरिजीत पसायत ने ही बेस्ट बेकरी केस की सुनवाई को गुजरात से बाहर महाराष्ट्र में चलाने का आदेश पारित किया था। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले और अपने कार्यकाल के आखिरी दिन उन्होंने दंगे में नरेंद्र मोदी व उनके मंत्रीमंडल के खिलाफ एसआईटी जांच का आदेश पारित कर दिया था। चुनाव में कांग्रेस ने इसका भरपूर फायदा उठाया।

9 मई 2009 को जस्टिस अरिजीत पसायत सेवानिवृत्त हुए और दो सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार ने उन्हें कम्पीटीशन एपिलेट ट्रिब्यूनल (कैट) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया था। 20 मई 2009 को उन्होंने पदभार संभाला था। ‘कैट’ के बाद वर्ष 2012 में जस्टिस पसायत को यूपीए सरकार ने आॅथरिटी फॉर एडवांस रूलिंग सेंट्रल एक्साइज, कस्टम एंड सर्विस टैक्स का अध्यक्ष नियुक्त कर किया था।

कुछ इसी तरह का मसला जस्टिस तरुण चटर्जी का भी है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस तरुण चटर्जी की खंडपीठ ने ही महाराष्ट्र सरकार द्वारा भगोड़ा घोषित अपराधी सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस की जांच को सीबीआई के हवाले किया था। अपने सेवानिवृत्त होने से ठीक एक दिन पहले जस्टिस तरुण चटर्जी ने सोहराबुद्दीन मामले की जांच सीबीआई को सौंपा था। सेवानिवृत्त होते ही कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जस्टिस तरुण चटर्जी को आसाम और अरुणाचल प्रदेश सीमा विवाद मामले में मध्यथ के रूप में नियुक्त कर उन्हें उनके पूर्व के कार्य के लिए उपकृत करने का प्रयास किया।

मशहूर वकील रामजेठमलानी ने सुप्रीम कोर्ट में जिरह के दौरान कहा था कि  ‘‘साफ दिखता है कि जस्टिस तरुण चटर्जी ने निजी हित में पूर्वग्रह से ग्रस्त होकर निर्णय लिया है। केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त होने के तत्काल बाद उन्हें नौकरी देकर उपकृत किया है, जो उनके निर्णय में निहित आर्थिक हित को दर्शाता है।’’

और अंत में…आखिर क्‍या कहा मार्केंडेय काटजू ने?
मार्केडेय काटजू ने एक अखबार से बातचीत में कहा, मद्रास हाई कोर्ट के एक जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे। उन्हें सीधे तौर पर तमिलनाडु में डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर नियुक्त कर दिया गया था। डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर इस जज के कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट के विभिन्न पोर्टफोलियो वाले जजों ने कम-से-कम आठ प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं। लेकिन मद्रास हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने अपनी कलम की ताकत से एक ही झटके में सारी प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया और यह जज हाई कोर्ट में अडिशनल जज बन गए। वह तब तक इसी पद पर थे, जब नवंबर 2004 में मैं मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनकर आया।

काटजू के मुताबिक, इस जज को तमिलनाडु के एक बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता का समर्थन प्राप्त था। मुझे बताया गया कि ऐसा इसलिए था क्योंकि डिस्ट्रिक्ट जज रहते हुए इस नेता को जमानत दी थी। इस जज के बारे में भ्रष्टाचार की कई रिपोर्ट्स मिलने के बाद मैंने भारत के चीफ जस्टिस आरसी लाहोटी को इस जज के खिलाफ एक गुप्त आईबी जांच कराने की गुजारिश की। कुछ हफ्ते बाद जब मैं चेन्नै में था तो चीफ जस्टिस के सेक्रेटरी ने मुझे फोन किया और बताया कि जस्टिस लोहाटी मुझसे बात करना चाहते हैं। चीफ जस्टिस लाहोटी ने कहा कि मैंने जो शिकायत की थी वह सही पाई गई है। आईबी को इस जज के भष्टाचार में शामिल होने के बारे में पर्याप्त सबूत मिले हैं।

अडिशनल जज के तौर पर उस जज का दो साल का कार्यकाल खत्म होने वाला था। मुझे लगा कि आईबी रिपोर्ट के आधार पर अब हाई कोर्ट के जज के तौर पर काम करने से रोक दिया जाएगा। लेकिन असल में हुआ यह कि इस जज को अडिशनल जज के तौर पर एक और साल की नियुक्ति मिल गई, जबकि इस जज के साथ नियुक्त किए गए छह और अडिशनल जजों को स्थायी कर दिया गया।

मैंने बाद में इस बात को समझा कि यह आखिर हुआ कैसे। सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए एक कॉलेजियम प्रणाली होती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पांच सबसे सीनियर जज होते हैं जबकि हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए तीन सबसे सीनियर जजों की कॉलेजियम होती है।

उस समय सुप्रीम कोर्ट के तीन सबसे सीनियर जज थे, देश के चीफ जस्टिस लाहोटी, जस्टिस वाईके सभरवाल और जस्टिस रूमा पाल। सुप्रीम कोर्ट की इस कॉलेजियम ने आईबी की प्रतिकूल रिपोर्ट के आधार पर उस जज का दो साल का कार्यकाल खत्म होने के बाद जज के तौर आगे न नियु्क्त किए जाने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी।

उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी। कांग्रेस इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन उसके पास लोकसभा में पर्याप्त बहुमत नहीं था और इसके लिए वह अपनी सहयोगी पार्टियों के समर्थन पर निर्भर थी। कांग्रेस को समर्थन देने वाली पार्टियों में से एक पार्टी तमिलनाडु से थी जो इस भ्रष्ट जज को समर्थन कर रही थी। तीन सदस्यीय जजों की कॉलेजियम के फैसले का इस पार्टी ने जोरदार विरोध किया।

मुझे मिली जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस समय संयुक्त राष्ट्र आमसभा की बैठक में भाग लेने के लिए न्यू यॉर्क जा रहे थे। दिल्ली एयरपोर्ट पर मनमोहन सिंह को तमिलनाडु की पार्टी के मंत्रियों ने कहा कि जब तक आप न्यू यॉर्क से वापस लौटेंगे उनकी सरकार गिर चुकी होगी क्योंकि उनकी पार्टी अपना समर्थन वापस ले लेगी। (उस जज को अडिशनल जज के तौर पर काम जारी न रखने देने के लिए)

यह सुनकर मनमोहन परेशान हो गए लेकिन एक सीनियर कांग्रेसी मंत्री ने कहा कि चिंता मत करिए वह सब संभाल लेंगे। वह कांग्रेसी मंत्री इसके बाद चीफ जस्टिस लाहोटी के पास गए और उनसे कहा कि अगर उस जज को अडिशन जज के पद से हटाया गया तो केंद्र सरकार के लिए संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी। यह सुनकर जस्टिस लाहोटी ने उस भ्रष्ट जज को अडिशनल जज के तौर पर एक साल का एक और कार्यकाल देने के लिए भारत सरकार को पत्र लिखा। (मुझे इस बात का आश्चर्य है कि क्या उन्होंने इसके लिए कॉलेजियम के बाकी दो सदस्यों से भी राय ली) इस तरह की परिस्थितयों में उस जज को अडिशनल जज के तौर पर और एक साल का कार्यकाल मिल गया।

उसके बाद चीफ जस्टिस बने वाईके सभरवाल ने उस जज को एक कार्यकाल और दे दिया। उनके उत्तराधिकारी चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने उस जज को स्थायी जज के तौर पर नियुक्त करते हुए किसी और हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया।

मैंने इन सब बातों का एक साथ उल्लेख करके यह दिखाने की कोशिश की सिद्धांत के उलट सिस्टम कैसे काम करता है। सच तो यह है कि आईबी की प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद इस जज को अडिशनल जज के रूप में काम करने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए थी।

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क‍लयुग में एक समृद्ध समाज की रचना है तिरुपति बालाजी का ध्‍येय!


क‍लयुग में एक समृद्ध समाज की रचना है तिरुपति बालाजी का ध्‍येय!

संदीप देव, तिरुमला। तिरुपति बाला जी का रोम-रोम कर्ज में डूबा है! अपनी शादी के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। देवताओं के कहने पर कुबेर ने उनके लिए धन का इंतजाम किया और बालाजी श्रीनिवास वेंकटेश्‍वर ने उन्‍हें वचन दिया कि वह अपने भक्‍तों से प्राप्‍त दान से ही उनका कर्ज उतारेंगे। कहा जाता है, बालाजी को शादी के लिए कुबेर ने उस जमाने अर्थात चोल शासन काल के समय करीब 75 करोड़  रुपए की राशि दी थी! श्रीनिवास ने उनसे कहा, कलियुग का अंत होते ही वह उनका पूरा मूलधन वापस कर देंगे, लेकिन तब तक उन्‍हें ब्‍याज यानी सूद देते रहेंगे। बालाजी भक्‍तों से प्राप्‍त धन को अभी तक कुबेर को सूद के रूप में ही चुका रहे हैं। ब्रह्मा और शिव श्रीनिवास और कुबेर के बीच हुए इस लेने-देन के साक्षी बने। लेकिन सच पूछिए तो भगवान और भक्‍त के इस ‘लेन-देने संबंध’ में समाज को समृद्ध बनाने का दर्शन छिपा है!

चलिए बालाजी की शादी की रोचक कथा से इसकी शुरुआत करता हूं
पदमावती का जन्‍म: चोल राज आकाशराजा को कोई संतान नहीं था। उन्‍होंने श्रीशुक मुनि की आज्ञा से संतान प्राप्ति के लिए यज्ञ किया। यज्ञ के अंत में यज्ञशाला में राजा द्वारा हल जोतने की परंपरा थी। हल जोतते समय हल का फल किसी कठोर वस्‍तु से टकराई। राजा ने जमीन खोदकर जब उसे निकाला तो वह एक छोटी पेटी यानी बक्‍सा था। पेटी को खोलने पर सहस्रदलवाले कमल में एक  शिशु कन्‍या बिलखती हुई मिली। चोल राजा अति प्रसन्‍न हुए। चूंकि शिशु कन्‍या कमल के फूल में मिली थी इसलिए राजा ने उसका नाम पदमावती रखा।

श्रीनिवास और पदमावती की पहली मुलाकात: समय व्‍यतीत होता रहा और पदवावती कमल के फूल के समान खिलती हुई यौवन की दहलीज पर पहुंच गई। एक दिन पदमावती उद्यान में फूल चुन रही थी। उस वन में श्रीनिवास(बालाजी) आखेट के लिए गए थे। उन्‍होंने देखा कि एक हाथी एक युवती के पीछे पड़ा है और वह डर कर भाग रही है। श्रीनिवास जी ने वाण चलाकर हाथी के वेग को रोका और उस युवती यानी पदमावती की जान बचाई। श्रीनिवास और पदमावती ने एक-दूसरे को देखा और मन ही मन एक-दूसरे की सुंदरता पर रीझ गए। दोनों के मन में एक-दूसरे के लिए अनुराग यानी प्रेम उत्‍पन्‍न हो गया, लेकिन दोनों बिना कुछ कहे चुपचाप अपने-अपने घरों को लौट गए।

श्रीनिवास का विरह: श्रीनिवास अपने घर तो लौट आए, लेकिन उनका मन पदमावती में ही बस गया। वह रात-दिन उस युवती के बारे में ही सोचते रहते थे। अपनी बेचैनी को कम करने के लिए उन्‍होंने उस युवती का पता लगाने की तरकीब सोची और एक ज्‍योतिष का रूप धारण किया और लोगों का भविष्‍य बताने वाले के रूप में उस युवती को ढूंढने निकल पड़े। धीरे-धीरे एक अच्‍छे भविष्‍यवक्‍ता के रूप में श्रीनिवास की ख्‍याति चोल राज में फैल लगी।

पदमावती का विरह: दूसरी तरफ पदमावती को भी चैन नहीं था। उसकी आंखों के सामने भी उसी युवक का चेहरा घूमता रहता था। उसने खाना-पीना कम कर दिया था। वह सो नहीं पाती थी। धीरे-धीरे प्रेम विरह के कारण उसका शरीर कृशकाय होता चला गया। अपनी पुत्री की यह दशा राजा से देखी नहीं जा रही थी। ज्‍योतिष श्रीनिवास की प्रसिद्धि उनके कानों तक भी पहुंची। उन्‍होंने श्रीनिवास को अपने दरबार में बुलवा भेजा।

राजा ने कहा, ‘मान्‍यवर मेरी पुत्री न कुछ खाती है न पीती है। वह किसी शोक के कारण व्‍यथित है। मुझसे उसका दुख देखा नहीं जाता, लेकिन क्‍या करूं वह किसी को कुछ बताती भी नहीं है।’ श्रीनिवास ने कहा, ‘ हे राजन आप अपनी पुत्री को बुलाइए, जरा दूखूं तो आखिर उनके शोक का कारण क्‍या है।’ मन ही मन श्रीनिवास को आभास हो गया कि कहीं यह उसकी मंजिल ही तो नहीं है।

राजा ने पदमावती को बुलवाया। श्रीनिवास की नजर ज्‍यों ही पदमावीत पर पड़ी वह मन ही मन बेहद खुश हुआ और सोचा कि चलो मेरी इस युवती की खोज के लिए की गई मेहनत सफल रही। उसने पदमावती का हाथ अपने हाथ में लिया, उसे कुछ देर पढने का उपक्रम करता रहा और बोला, ” हे राजन अपनी पुत्री प्रेम विरह में जल रही है।’ पदमावती ने उसकी आवाज सुनी तो उसने नजरें ऊपर उठाई। श्रीनिवास को देखते ही उसने उसे पहचान लिया और प्रसन्‍न हो गई। अरसे बाद अपनी पुत्री की प्रसन्‍नता देख राजा को लगा कि ज्‍योतिष ने सही मर्ज पकड़ लिया है।

राजा ने कहा, ‘ आखिर मेरी पुत्री को किससे प्रेम है?’

‘आपकी पुत्री एक दिन वन में फूल चुनने गई थी। तभी वहां एक हाथी पहुंचा और उन पर हमला कर दिया। आपके सैनिक और इनकी दासियां भाग खड़ी हुई। राजकुमारी घबरा गई थी, लेकिन तभी एक युवक धनुष वाण के साथ आया और उसने आपकी पुत्री को हाथी से बचा लिया”-श्रीनिवास ने कहा।

‘ हां ऐसी घटना मेरे सैनिकों ने बताई थी, लेकिन मेरी पुत्री के प्रेम से उस घटना का क्‍या तात्‍पर्य!’

‘ है राजन, उस घटना से ही इसका तात्‍पर्य है। आपकी पुत्री को अपनी जान बचाने वाले उसी युवक से प्रेम हुआ है।’
पदमावती शरमा कर अंदर चली गई।

राजा ने कहा, ‘क्‍या आप उस युवक के बारे में कुछ बता सकते हैं?’
‘हां, क्‍यों नहीं। वह कोई साधारण युवक नहीं, बल्कि शंख-चक्र धारी स्‍वयं भगवान विष्‍णु हैं तो इस समय बैकुंठ को छोड़कर मानव रूप में श्रीनिवास जी के नाम से पृथ्‍वी पर वास कर रहे हैं। आप निश्चिंत होकर अपनी पुत्री का विवाह उनसे करें। मैं इसकी व्‍यवस्‍था कर दूंगा।’

इस तरह श्रीनिवास और पदमावती की शादी तय हो गई।

 

तिरुपति बाला जी मंदिर परिसर में मेरे मम्‍मी और पिताजी

शादी में कुबेर से लिया कर्ज उतारने के लिए ही भक्‍तों से धन लेते हैं बालाजी (तिरुपति बालाजी दोनों हाथों से देते हैं धन, बस थोड़ा उनके लिए भी रख दीजिए! )

देवताओं को निमंत्रण: श्रीनिवास ने अपनी शादी की बात सभी देवी-देवताओं को बताने के लिए शुक मुनि (परम ज्ञानी तोता) को स्‍वर्ग लोग में भेज दिया। स्‍वर्ग लोक में श्रीनिवास जी की शादी का पता चलते ही देवी-देवता अत्‍यंत प्रसन्‍न हुए। देवी-देवता श्रीनिवास जी से मिलने पृथ्‍वी पर पहुंचे और उन्‍हें बधाई दी। लेकिन श्रीनिवास जी खुशी की जगह चिंता में मग्‍न बैठे थे।

देवताओं ने पूछा, ” हे भगवन इस खुशी के मौके पर आप इतने चिंतातुर क्‍यों है।”

श्रीनिवास जी ने कहा, ” बंधुओं चिंता की तो बात ही है। पदमावती कहां राजा की पुत्री है और मैं कहां एक साधारण मानव के रूप में जीवन व्‍यतीत कर रहा हूं। राजा की पुत्री से शादी करने और घर बसाने के लिए धन, वैभव और ऐश्‍वर्य की जरूरत है, वह मैं कहां से लाऊं।”
‘ बस इतनी-सी बात’- देवताओं ने कहा।
‘ हम कुबेर से कह कर आपके लिए धन की व्‍यवस्‍था कर देंगे। इससे आपकी शादी भी हो जाएगी और ऐश्‍वर्य व वैभव भी आपके दास रहेंगे।’
ब्रहमा और शिव सहित सभी देवताओं ने कुबरे की स्‍तुति की, जिसके बाद कुबेर प्रकट हुए।

कुबेर ने ऋण देना स्‍वीकार किया: देवताओं ने श्रीनिवास जी की शादी की बात कुबरे को बताई और धन से सहायता करने की मांग की। कुबेर ने कहा, ‘यह तो मेरा परम सौभाग्‍य होगा कि मैं भगवान विष्‍णु के काम आ सका। भगवन आप जितना स्‍वर्ण और धन चाहें, ले लें। कुबेर का खजाना आप ही का है! ”

‘नहीं, कुबेर जी। मैं जरूरत के हिसाब से ही स्‍वर्ण और धन लूंगा और मेरी एक शर्त भी होगी!’
‘ शर्त कैसी भगवन!’
‘ भगवान ब्रहमा और शिव साक्षी हैं। आप मुझ पर अहसान नहीं करेंगे, बल्कि मुझे ऋण के रूप में धन देंगे, जिसका पाई-पाई मैं ब्‍याज सहित चुकाऊंगा।’
‘ भगवन आप कैसी बात कर रहे हैं!’

मानव की कठिनाई को मैं महसूस करना चाहता हूं: ‘ नहीं मानव रूप में मैं कठिनाईयों का सामना करूंगा, जो कठिनाई मानव के जीवन में आता है। उन कठिनाईयो में धन की कमी और कर्ज का बोझ सबसे बड़ा है।’

‘ बुरा न मानें प्रभु, लेकिन जब आप ऋण पर धन लेने की बात कर रहे हैं तो फिर आपको यह भी बताना होगा कि आप यह धन चुकाएंगे कैसे। ऋणदाता को इसकी गारंटी भी तो चाहिए।’

भक्‍त और भगवान के बीच विश्‍वास से अधिक पारस्‍परिकता का है रिश्‍ता: श्रीनिवास ने कहा, ” यह ऋण मैं नहीं, मेरे भक्‍त चुकाएंगे, लेकिन वह भी मुझ पर कोई अहसान नहीं करेंगे बल्कि मैं उन्‍हें धनवान बनाऊंगा। ”

‘कैसे?’- कुबेर जी ने आश्‍चर्य से पूछा।

‘ कलयुग के आखिरी तक पृथ्‍वी पर मेरी पहचान एक ऐसे देवता के रूप में होगी, जो धन, ऐश्‍वर्य और वैभव से परिपूर्ण है। मेरे भक्‍त मुझसे धन, वैभव और ऐश्‍वर्य की मांग करने आएंगे और मैं उन्‍हें यह अवश्‍य दूंगा। बदले में मेरे भक्‍त जो चढ़ावा चढ़ाएंगे वह मैं आपको ऋण के रूप में चुकाता रहूंगा।’

‘ परंतु भगवन आप मानव जाति पर विश्‍वास कर रहे हैं। यदि आपके भक्‍त आपके आशीर्वाद से धनवान होने के बाद चढ़ावा चढ़ाने आए ही न तो आप मेरा ऋण फिर कैसे चुका पाएंगे।’

‘ कुबेर जी ऐसा नहीं होगा। मेरे भक्‍तों की मुझमें अटूट श्रद्धा होगी। वह मेरे आशीर्वाद से प्राप्‍त धन में मेरा हिस्‍सा रखेंगे। शरीर त्‍यागने के बाद तिरुपति के तिरुपला पर्वत पर बाला जी के नाम से लोग मेरी पूजा करेंगे। मेरी मूर्ति उन्‍हें इसका अहसास कराती रहेगी कि मैं एक हाथ से धन देता हूं तो दूसरे हाथ से उनसे धन देने को भी कहता भी हूं। यह एक भक्‍त और भगवान की एक-दूसरे पर विश्‍वास से अधिक साझेदारी का रिश्‍ता है। इस रिश्‍ते में न कोई दाता है और न कोई याचक, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और सही मायने में एक भगवान और भक्‍त का रिश्‍ता भी ऐसा ही होना चाहिए। ”

ईश्‍वर के रहते यदि गरीबी है तो लोगों को ईश्‍वर का अहसास कभी नही होगा: ”भक्‍त की भक्ति और अराधना उस पर भगवान के कृपा और प्रेम की वर्षा करता है। कम से कम  कलियुग में भगवान बालाजी के रूप में एक ऐसे अराध्‍य होंगे जो कृपा और प्रेम के साथ वैभव का दाता भी होगा। वह धन को त्‍यागने की नहीं, बल्कि धन से ऐश्‍वर्य पाने के लिए प्रेरित करेगा ताकि पूरे समाज में वैभव आए, दरिद्रता मिटे और गरीबी दूर हो।”

‘ वाह भगवन!’

” हां, कुबेर जी यदि ईश्‍वर के रहते गरीबी, दुख और दरिद्रता है तो लोगों को ईश्‍वर का अहसास कभी नहीं होगा। एक गरीब व्‍यक्ति पहले अपनी रोटी की चिंता करेगा या धर्म की। अध्‍यात्‍म की ओर मन भी तभी जाता है जब पेट भरा हो। इसलिए हे कुबेर, कलियुग के आखिरी तक भगवान बालाजी धन, ऐश्‍वर्य और वैभव के दाता के देवता बने रहेंगे। मैं अपने भक्‍तों को धन से परिपूर्ण बनाऊंगा और मेरे भक्‍त दान देकर न केवल मेरे प्रति अपना ऋण उतारेंगे बल्कि मेरा ऋण उतारने में भी मदद करेंगे। यह एक भक्‍त और भगवान के परस्‍पर आश्रितता और विश्‍वास का रिश्‍ता है। कलियुग की समाप्ति के बाद मैं आपका मूलधन लौटा दूंगा।”

” भगवन आप धन्‍य हैं। भक्‍त और भगवान के बीच एक ऐसे रिश्‍ते की कल्‍पना कभी न देखा और न सुना। यह तो एक ऐसा रिश्‍ता है, जो ऊपर से तो केवल एक भक्‍त और भगवान के बीच भक्ति और विश्‍वास का रिश्‍ता दिखता है, लेकिन वास्‍तव में यह एक परस्‍पर साझेदारी से विकसित होने वाले समृद्ध समाज की रचना की सीख देता है। ”

‘यही मेरा उद्देश्‍य भी है कुबेर जी! इस बार मानव रूप में पृथ्‍वी पर आने के पीछे का कारण भी यही है कि मैं कभी वैभव से परिपूर्ण रहे इस समाज को फिर से समृद्धि और ऐश्‍वर्य का दर्शन करा सकूं ‘-  भगवान श्रीनिवास ने कहा।

भगवान श्रीनिवास और कुबरे के बीच हुई वार्ता के साथी स्‍वयं ब्रहृमा और शिव हैं। आज भी पुष्‍करिणी के किनारे ब्रह्मा और शिव बरगद के पेड़ के रूप में खड़े हैं। ऐसा कहा जाता है कि विकास के दौरान इन दोनों पेड़ों को जब काटा जाने लगा तो उनमें से खून की धारा फूट पड़ी। लोगों ने पेड़ काटना बंद किया। बाद में उसे देवता की तरह पूजा जाने लगा। आज भी बालाजी का दर्शन करने के लिए जाने वाले लोग इन दो बरगद के पेड़ों का दर्शन करते हैं।

बाद में बड़ी धूमधाम से श्रीनिवास और पदमावती की शादी हुइ्र, जिसमें ब्रहमा और शिव के अलावा सभी देवगण और मुनिगण शामिल हुए।

तिरुपति बाला जी मंदिर परिसर आनंद निलय में मैं अपनी मां के साथ

बालाजी सही अर्थों में एक ससृद्ध-समाजवादी समाज की रचना कर रहे हैं
कलयुग में बालाजी एकमात्र भगवान हैं जो खुलकर कहते हैं कि ” हे भक्‍त तुम मुझसे घुमा-फिरा कर नहीं, बल्कि सीधे-सीधे घन, वैभव और ऐश्‍वर्य मांगो। मैं तुम्‍हें वह सब दूंगा, बस शर्त है कि तुम उसमें से मेरा एक भाग रख दो।” बालाजी की मूर्ति आप देखेंगे तो उनका एक हाथ धन दे रहा है और दूसरा हाथ धन मांग रहा है।

वास्‍तव में भगवान बालाजी सही अर्थो में समाजवाद को चरितार्थ कर रहे हैं। स्‍पष्‍ट है यदि समाज में धन होगा ही नहीं जो उसका बंटवारा कैसे होगा? एक दरिद्र समाज दरिद्रता ही बांट सकता है! यही कारण है कि साम्‍यवाद और उसका परिष्‍कृत रूप समाजवाद सैद्धांतिक रूप से सभी को लुभाता जरूर है, लेकिन व्‍यावहारिक धरातल पर वह दुनिया में दम तोड़ता नजर आता है।

बाला जी की दूसरी शिक्षा भी बड़ी महत्‍वपूर्ण है। इस कलियुग में आप किसी पर न अहसान कीजिए और न अहसान लीजिए, बल्कि लोगों के बीच पारस्‍परिकता का संबंध विकसित कीजिए। पारस्‍परिकता के आधार पर विकसित संबंध कभी आपको चोट नहीं पहुंचाएगा, लेकिन जिस संबंध में अहसान होगा, सिद्धांत होगा और आदर्शवाद का धरातल होगा वह संबंध कभी भी एक फूल की भांति विकसित नहीं हो सकेगा।

तिरुपति बालाजी का दर्शन करने कैसे जाएं, पढि़ए

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आधुनिक भारत में मुस्लिम कटटरता की शुरुआत और गांधी-नेहरू


आधुनिक भारत में मुस्लिम कटटरता की शुरुआत और गांधी-नेहरू

संदीप देव। आधुनिक भारत में मुस्लिम कटटरता और कठमुल्‍लापन को बढ़ावा देने में जिन दो महापुरुषों ने प्रारंभिक योगदान दिया और जिसकी परिणति पाकिस्‍तान निर्माण के रूप में सामने आया, उनका नाम महात्‍मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू था! बाद में गांधी-नेहरू की गलतियों के कारण ही इकबाल और जिन्‍ना जैसे कटटरपंथियों ने अलग राष्‍ट्र की मांग की!

गांधी ने की गलती की शुरुआत: जिस आधुनिक धर्मनिरपेक्षता की आज दुहाई दी जाती है, उसे कमाल अतातुर्क ने जब टर्की में लागू किया तो गांधी ने उसका विरोध किया और उन्‍होंने मुसलमानों के लिए खिलाफत की मांग की। खिलाफत मतलब, दुनिया भर के मुसलमानों का एक खलीफा अर्थात एक नेता हो और वह उनके निर्देश पर ही चलें, न कि अपने देश के कानून या संविधान से। मुसलमानों में चार खलीफा हो चुके हैं। कमाल अतातुर्क ने इसी खिलाफत को समाप्‍त कर मुसलमानों को आधुनिक लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता से जोड़ने की शुरुआत की, लेकिन गांधी ने उसका विरोध कर भारतीय में प्रतिक्रियावाद और कठमुल्‍लापन को बढ़ावा दिया। गांधी ने दारुल हरब अर्थात गैर इस्‍लामकि देश को दारूल इस्‍लाम अर्थात इस्‍लाम शासित देश बनाने का बीज भारतीय मुसलमानों के दिमाग में बो दिया और गांधी के रहते-रहते अलग इस्‍लाम के नाम पर पाकिस्‍तान का निर्माण भी हो गया। यह गांधी की सबसे बड़ी विफलता थी। अहिंसा की नीति पर चलने वाले गांधी के सामने ही 5 लाख से अधिक हिंदू-मुसलमान एक दूसरे का कत्‍तेआम करते चले गए और गांधी की अहिंसा उनके सामने ही दम तोड़ती नजर आई।

मुसलमानों से नेहरू का विश्‍वासघात: नेहरू ने 1937 में मुस्लिम लीग के साथ विश्‍वासघात किया, जिससे मुसलमानों में यह भावना प्रबल हुई कि नेहरू के रहते मुसलमानों को वाजिब हक आजाद हिंदुस्‍तान में नहीं मिल सकता है। नेहरू ने मुस्लिम लीग के खालिक-उज-जमा के साथ चुनावी समझौता किया, लेकिन जब उत्‍तरप्रदेश में कांग्रेस ने अकेले के दम पर बहुमत हासिल कर लिया तो नेहरू ने यह समझौता तोड़ दिया। नेहरू के इस विश्‍वासघात से न केवल प्रतिक्रियावादी, बल्कि उदार मुसलमानों को भी गहरा आघात लगा और उन्‍होंने इसके तत्‍काल बाद पाकिस्‍तान की मांग उठा दी।

ताज्‍जुब तब होता है जब गांधी-नेहरू को आजाद भारत में धर्मनिरपेक्षता का पर्याय कहा जाता है, जबकि पाकिस्‍तान निर्माण की नींब इन्‍हीं दो महापुरुषों ने रखी थी। ‘सारे जहां से अच्‍छा हिंदोस्‍ता हमारा’ जैसे गीत लिखने वाले मोहम्‍मद इकबाल, जिन्‍ना आदि गांधी-नेहरू के प्रतिक्रिया में उपजे थे। आजाद भारत में कांग्रेस के सहयोग से वामपंथियों द्वारा लिखे गए झूठे इतिहास को सामने लाकर ही हम ऐसी गलतियों को सामने ला सकते हैं!

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सरदार पटेल के नाम पर फिर से संघ पर हमला, आखिर कब तक सच्‍चाई छुपाए जाएंगे!


सरदार पटेल के नाम पर फिर से संघ पर हमला, आखिर कब तक सच्‍चाई छुपाए जाएंगे!

संदीप देव, नई दिल्‍ली। बिखरे हुए भारत को तिनके की तरह समेटने वाले देश के पहले उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्‍लभ भाई पटेल को आजाद होने के 67 साल बाद आज देश याद कर रहा है। 560 से अधिक रियासतों को एक कर भारत के वर्तमान नक्‍शे को मूर्ति रूप देने वाले सरदार पटेल पर जवाहरलाल नेहरू को तरहीह देने का यह खेल हमेशा से मुहम्‍मद, मसीह और मार्क्‍स की संतान ने खेला है और याद रखिए इस तिकड़ी की सम्मिलित विचारधारा से एक अंग्रेज ने कांग्रेस का निर्माण किया था, इसलिए ए.ओ.हयूम की वह कांग्रेस आज भी इस तिकड़ी का ही क्‍लोन है और भारत में इस तिकड़ी के फैलाए झूठ के बल पर ही वह सत्‍ता प्राप्‍त करती रही है।

यही वह तिकड़ी है, जिसने भारत के पूरे इतिहास को अपने हित में नष्‍ट-भ्रष्‍ट किया है। नकली गांधी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती कांग्रेस पार्टी ने आजादी के बाद से ही ‘सत्‍ता मेरी और शिक्षण संस्‍थान तेरी’ – के फलसफे पर चलते हुए नेहरू-गांधी परिवार के पक्ष में पूरा इतिहास लिखवाया, जिसके कारण सरदार पटेल को आधुनिक भारत कभी वह सम्‍मान नहीं दे सका, जिसके वह वास्‍तव में हकदार थे। जिस व्‍यक्ति ने भारत की वर्तमान भौगोलिक स्थिति को परिपूर्ण किया, उसे भारत रत्‍न भी 1990 के दशक में दिया गया, लेकिन सत्‍ता की चटनी चाटते मुहम्‍मद, मसीह और मार्क्‍स की संतनों ने कभी कोई सवाल पैदा नहीं किया। करते भी कैसे, इतिहास से पटेल को दरकिनार करने का खेल भी तो इसी तिकड़ी ने खेला था।

आज जब मोदी सरकार ने सरदार पटेल की 139 वीं जन्‍मजयंती पर ‘एकता दौड़’ का आयोजन किया तो अचानक से यह तिकड़ी फुंफकार उठी, क्‍योंकि उनके समक्ष अब तक के फैलाए झूठ के घेरे को तोड़ने की शुरुआत हो चुकी है। लेकिन झूठी और मक्‍कार यह तिकड़ी फिर से राष्‍ट्रवादियों पर हमला करते हुए कहना शुरू कर दिया है कि सरदार पटेल ने ही गांधी हत्‍या के बाद राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगाया था और यदि आज जिंदा होते तो उसी संघ से निकले एक स्‍वयंसेवक और देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कभी अपने नाम का उपयोग नहीं करने देते। मेरा यह फर्ज है कि मैं आपको गांधी हत्‍या, संघ पर लगे प्रतिबंध, गांधी हत्‍या के बाद नेहरूवादियों द्वारा देश भर में दंगा और मार्क्‍सवादियों द्वारा इसे इतिहास की पुस्‍तक से गायब करने की पूरी दास्‍तान संदर्भ सहित बताऊं ताकि आज की युवा पीढ़ी को उस झूठ का पता चल सके, जिसे तीन ‘मक्‍कार’ की विचारधारा ने मिलकर निर्मित किया है।

देश का बंटवारा ‘मुहम्‍मद’ की संतान मोहम्‍मद अलि जिन्‍ना और उसके मुस्लिम लीग की मांग का नतीजा था तो देश को बांट कर उसे खंड-खंड करने की साजिश ‘मसीह’ की संतान ब्रिटेन की राजनीतिक चाल। ‘मार्क्‍स’ की औलादों ने इनके साथ गठबंधन कर इतिहास की पुस्‍तकों में इन्‍हें नायक बनाने का खेल खेला। चूंकि पंडित जवाहरलाल नेहरू भी रूस से प्रभावित सोशलिस्‍ट थे, इसलिए मार्क्‍स की संतानों ने मोहम्‍मद व मसीह की औलादों की गलतियों को ढंकते हुए नेहरू की आभा को रचने का पूरा खेल खेला। भारत में नेहरूवादी यानी कांग्रेसी और मार्क्‍सवादी दोनों एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं, क्‍योंकि नेहरू से लेकर इंदिरा और बाद में सोनिया गांधी तक ने अपने पक्ष में उन्‍हें पाला-पोसा है। इसलिए मार्क्‍सवादी कहते ही, इसमें आप स्‍वत: कांग्रेसियों को सम्मिलित कर लें।

गांधी हत्‍या, संघ पर प्रतिबंध, पंडित नेहरू और सरदार पटेल
15 अगस्‍त 1947 को आजादी मिलने के थोड़े दिन बाद ही 30 जनवरी 1948 को एक हिंदूवादी नाथूराम गोडसे ने महात्‍मा गांधी की गोली मार कर हत्‍या कर दी। इसने भारतीय राष्‍ट्र के इतिहास को और अधिक विकृत करने मौका इन तीनो मक्‍कारों को उपलब्‍ध करा दिया, क्‍योंकि इन तीनों मक्‍कारों की पूरी दुनिया में लड़ाई है तो केवल राष्‍ट्रवाद से और उस वक्‍त देश में केवल एक राष्‍ट्रवादी संगठन था, आरएसएस, इसलिए आरएसएस को आसान निशाना बनाया गया। उस वक्‍त आरएसएस के सरसंघचालक माधवराम सदाशिवराव गोलवलकर उर्फ गुरूजी थे।

गांधी हत्‍या के बाद गुरुजी पर धारा-302 के तहत हत्‍या के षडयंत्र में शामिल होने का मुकदमा दर्ज किया गया था और उन्‍हें 1 फरवरी 1948 को गिरफतार कर जेल में डाल दिया गया। इसके बाद 4 फरवरी 1948 को संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया और देश भर में हजारों संघ कार्यकर्ताओं को घर से उठा-उठा कर जेल में बंद किया गया। 5 फरवरी को गुरुजी ने प्रतिबंध हटाए जाने तक संघ को विसर्जन करने का आदेश जेल से ही जारी किया। उन्‍होंने इस आशय का लिखित आदेश अपने वकील मित्र दत्‍तोपंत देशपांडे के जरिए भेजा था। उस पत्र में लिखा था, ”इस समय सरकार ने संघ को अवैध घोषित कर दिया है। अत: मैं यह उचित समझता हूं कि प्रतिबंध हटाए जाने तक संघ को विसर्जित कर दूं, किंतु इसके साथ ही मैं यह स्‍पष्‍ट करना भी आवश्‍यक समझता हूं कि सरकार ने संघ पर जो आरोप लगाए हैं, उन्‍हें मैं पूर्णतया अस्‍वीकार व अमान्‍य करता हूं।” उस वक्‍त संदेश प्रसारित करने का एक मात्र जरिया आकाशवाणी और अखबार हुआ करता था। गुरुजी ने आकाशवाणी पर यह संदेश प्रसारित होने के लिए भेजा था, लेकिन सरकार के स्‍वामित्‍व वाली आकाशवाणी ने संघ विसर्जन की सूचना को दबा दिया।

पुलिस की जांच में जब स्‍पष्‍ट हो गया कि गांधी जी की हत्‍या में गुरुजी का कोई हाथ नहीं है तो हत्‍या के केवल सातवें दिन और गिरफ्तारी के केवल 5 दिन बाद 6 फरवारी 1948 को गुरुजी पर से हत्‍या का आरोप वापस ले लिया गया। इससे पंडित नेहरू बहुत नाराज हुए और उन्‍होंने सरदार पटेल से अपना आक्रोश व्‍यक्ति किया और कहा कि गृहमंत्रालय और पुलिस ठीक से जांच की प्रक्रिया को अंजाम नहीं दे रहा है। 26 फरवरी 1948 को जवाहरलाल नेहरू से जांच से अपना विरोध दर्शाते हुए गृहमंत्री सरदार पटेल को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया था कि ” दिल्‍ली की पुलिस व अधिकारियों की संघ के प्रति सहानुभूति है। इसी कारण संघ के लोग पकड़े नहीं जा रहे हैं। उसके कई प्रमुख नेता खुलेआम घूम रहे हैं। देशभर सेस जानकारियों मिल रही हैं कि गांधी जी की हत्‍या संघ के व्‍यापक षडयंत्र के कारण हुई है, परंतु उन सूचनाओं की ठीक प्रकार से जांच नहीं हो रही है। जबकि यह पक्‍की बात है कि षडयंत्र संघ ने ही रखा था।”

पंडित नेहरू के इस पत्र से सरदार पटेल बेहद विचलित हो गए और उन्‍होंने इसके अगले ही दिन 27 फरवरी 1948 को नेहरू को एक पत्र लिखा। उन्‍होंने लिखा कि ”गांधी जी की हत्‍या के संबंध में चल रही कार्यवाही से मैं पूरी तरह से अवगत रहता हूं। सभी अभियुक्‍त पकड़े गए हैं तथा उन्‍होंने अपनी गतिविधियों के संबंध में लंबे बयान भी दिए हैं। उनके बयानों से स्‍पष्‍ट है कि यह षडयंत्र दिल्‍ली में नहीं रचा गया। वहां का कोई भी व्‍यक्ति इस षडयंत्र में शामिल नहीं है। षडयंत्र के केंद्र बम्‍बई, पूना, अहमदनगर तथा ग्‍वालियर रहे हैं। यह बात भी असंदिग्‍ध रूप से उभर कर सामने आई है कि राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ इससे कतई संबद्ध नहीं है। यह षडयंत्र हिंदूसभा के एक कटटरपंथी समूह ने रचा था। यह भी स्‍पष्‍ट हो गया है कि मात्र 10 लोगों द्वारा रचा गया यह षडयंत्र था और उन्‍होंने ने इसे पूरा किया था। इनमें से दो को छोड़कर सभी पकड़े जा चुके हैं।”


गांधी जी की हत्‍या के 19 साल बाद एक बार फिर से हुई संघ को फंसाने की साजिश
नेहरू-सरदार पटेल का पत्र तो आप देख चुके हैं। गांधी जी की हत्‍या में कहीं से भी जब संघ का नाम सामने नहीं आया तो संघ पर से प्रतिबंध हटा दिया गया। दो न्‍यायालययों के आदेश और उससे मिले संघ को क्‍लीन चिट एवं नाथराम गोडसे व नारायण आप्‍टे को मौत की सजा के बाद भी कांग्रेस शांत नहीं हुई। 1966 में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी और उनके सामने भी केवल संघ की दुश्‍मन नजर आ रहा था। गांधी जी की हत्‍या के 19 साल बाद 1966 में सर्वोच्‍च न्‍यायालय के सेवानिवृत्‍त न्‍यायाधीश टी.एल.कपूर की अध्‍यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया गया। कपूर आयोग ने 101 गवाहों के बयान और 407 दस्‍तावेजों के आधार पर 1969 में जो जांच रिपोर्ट दी, उसमें संघ को पूरी तरह से क्‍लीन चिट दी गई।

गांधी जी की हत्‍या के समख केंद्रीय गृह सचिव रहे आर.एन.बनर्जी ने कपूर आयोग के समक्ष दर्ज कराए अपने बयान में कहा था, ”यह साबित नहीं हुआ कि गांधी जी के हत्‍यारे संघ के सदस्‍य थे। बल्कि वे अपराधी तो संघ की गतिविधियों से असंतुष्‍ट थे। संघ की शाखा में होने वाले खेलकुद, व्‍यायाम आदि को वे व्‍यर्थ  मानते थे। वे उग्र व हिंसक गतिविधियों में विश्‍वास रखते थे।”(कपूर आयोग की रिपोर्ट, खंड-2, पृष्‍ठ-165)

आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ” गांधी जी की हत्‍या के बाद यद्यपित संघ पर पाबंदी लगाई गई थी, परंतु ससे यह सिद्ध नहीं हो जाता कि संघ का हत्‍या में हाथ था। स्‍वयं गृह सविच बनर्जी ने इस संबंध में पूछे गए प्रश्‍न के उत्‍तर में कहा था कि ‘ यद्यपि गांधी जी की हत्‍या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा दी गई थी परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि सरकार ने यह स्‍वीकार कर लिया था कि हत्‍या संघ के सदस्‍यों ने की थी।” (कपूर आयोग की रिपोर्ट, खंड-2, पृष्‍ठ-66)

कपूर आयोग ने निष्‍कर्ष में लिखा, ” इस जघन्‍य हत्‍या के लिए संघ को किसी प्रकार जिम्‍मेदार नहीं ठहराया जा सकता।”(कपूर आयोग की रिपोर्ट, खंड-2, पृष्‍ठ-76)

सरकार ने माना संघ पर अनावश्‍यक थी कार्रवाई, बिना शर्त उठा प्रतिबंध

तत्‍कालीन संघ प्रमुख गुरुजी ने 11 अगस्‍त 1948 को पत्र लिखकर पंडित नेहरू और सरदार पटेल को संघ पर से प्रतिबंध हटाने की मांग की, लेकिन उन्‍होंने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद फिर 24 सितंबर 1948 को उन्‍होंने दोबारा पत्र लिखा और सरदार पटेल को हेदराबाद को भारत में मिलाने पर बधाई दी। उन्‍होंने लिखा, ”संघ पर प्रतिबंध और उसे विसर्जित किए जाने के कारण, इसका लाभ लेकर साम्‍यवादी देश के भावुक नवयुवकों को अपने जाल में फंसा कर कुचक्र चला रहे हैं। भारत के पड़ोसी देशों में साम्‍यवाद प्रभावशाली होने के कारण जो विद्रोह और आतंकपूर्ण घटनाएं घट रही हैं, वह भारत के लिए सहज नहीं है। साम्‍यवादियों की शक्ति का सुदृढ़ प्रतिरोध केवल संघ ही कर सकता है, जो आज अस्तित्‍व में नहीं है। महात्‍मा जी की हत्‍या तथा संघ पर लगे प्रतिबंध से साम्‍यवादियों को बडा सुनहरा अवसर मिला है। उनकी प्रगति का समाचार भयावह है।”  उन्‍होंने आगे लिखा, ” मैं तो यही समझता हूं कि आप अपनी सरकार की शक्ति और अहम अपनी सांस्‍कृतिक संघ शक्ति अगर साथ-साथ लगाएं तो हम संकट से शीघ्र मुक्‍त हो सकते हैं।”

गुरुजी के इस पत्र के उत्‍तर में नेहरू ने फिर से संघ पर आरोपों की बौछार कर दी तो सरदार पटेल ने संघ की प्रशंसा करते हुए कहा कि संघ को कांग्रेस में सम्मिलित हो जाना चाहिए। लंबी जांच पड़ताल के बाद जब संघ के खिलाफ कुछ नहीं मिला तो 11 जुलाई 1949 को करीब 19 महीने बाद प्रतिबंध हटा लिया गया। लेकिन तब कांग्रेसियों और वामपंथियों ने यह प्रचारित करना शुरू कर दिया कि गुरुजी ने लिखित में माफी मांगी है और लिखित रूप में सरकार को आश्‍वासन दिया है कि संघ हिंसा आदि में लिप्‍त नहीं होगा, उसके बाद ही संघ पर से यह प्रतिबंध उठाया गया है। यह झूठ आज तक प्रचारित किया जाता है और आज भी टीवी चैनलों पर बहस के दौरान इस झूठ के आधार पर संघ को घसीटा जाता है और ताज्‍जुब तो तब होता है कि भाजपा या संघ की ओर से कोई इसका सही प्रतिउत्‍तर नहीं दे पाता। दरअसल ज्ञान और जानकारी के अभाव में संघ व भाजपा की वर्तमान पीढ़ी भी इस झूठ के प्रचारित होने में उतने ही बड़े गुनाहगार है, जितने कि कांग्रेसी और वामपंथी विचारधारा के पत्रकार व बुद्धिजीवी।

14 अक्‍टूबर 1949 को तत्‍कालीन बंबई विधानसभा की कार्यवाही में सरकार की ओर से ही इस सच्‍चाई से पर्दा उठा दिया गया। बंबई विधानसभा में कुछ सदस्‍यों ने प्रश्‍न पूछा कि संघ पर प्रतिबंध हटाने की वजह क्‍या है? क्‍या संघ के नेता ने सरकार को कोई लिखित आश्‍वासन दिया है? इस पर गृह विभाग ने जो जवाब दिया था, उसे ध्‍यान से पढि़ए। गृह विभाग ने कहा, ” अनावश्‍यक प्रतीत होने के कारण ही राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ पर से बिना शर्त प्रतिबंध उठाया गया है। सरसंघचालक ने किसी प्रकार का अभिवचन या आश्‍वासन नहीं दिया है। (बंबई विधानसभा कार्यवाही, 14 अक्‍टूबर 1949, पृष्‍ठ संख्‍या- 2126)

अब आप देखिए कि उस प्रतिबंध के दौरान पूरी जांच प्रक्रिया गुजरने के बाद संघ से प्रतिबंध हटाया गया। बाप पंडित नेहरू की तरह इंदिरा गांधी ने भी संघ को कुचलने के लिए प्रधानमंत्री बनने के तत्‍काल बाद कपूर आयोग का गठन किया, लेकिन उस जांच में भी संघ को क्‍लीन चिट ही मिली। उसके बावजूद वही मोहम्‍मद, मसीह और मार्क्‍स अथार्त तथाकथित सेक्‍यूलरवादियों (मोहम्‍मद के पक्ष में तुष्टिकरणवादियों, कांग्रेसियों), मसीह (विदेशी फंडेड एनजीओ, इटली की पोप सत्‍ता के पक्षकारों, इटली माता की संतानों) एवं मार्क्‍स (साम्‍यवादी पत्रकारों, बुद्धिजीवियों, मीडिया हाउसों) के अनुयायी गांधी जी की हत्‍या में संघ पर आरोप लगाते रहते हैं। आज जब पहली बार प्रधानमंत्री बने संघ के एक स्‍वयंसेवक नरेंद्र मोदी ने सरदार पटेल की जयंति को ‘एकता दिवस’ के रूप में मनाने की शुरुआत की है तो ये त्रिगुट फिर से हमलावर है। उन्‍हें अब तक अपने द्वारा रचे गए झूठे इतिहास से पर्दा उठने का भय सता रहा है। यही कारण है कि मैंने थोड़ी-सी सच्‍चाई आप सभी के समक्ष रखने की कोशिश की है।

संघ पर अन्‍य स्‍टोरी:

पहले राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के इतिहास को जानिए, फिर बयानबाजी कीजिए!

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मसीह, मोहम्‍मद और मार्क्‍सवादियों का दर्द!


मसीह, मोहम्‍मद और मार्क्‍सवादियों का दर्द!

संदीप देव। मसीह, मोहम्‍मद और मार्क्‍सवादियों का दर्द क्‍या है, इसे कुछ ऐसे समझिए! मसीहवादियों ने पूरे यूरोप को रौंद दिया। प्राचीन यूनान सभ्‍यता आज कहीं नहीं है, उसे वर्तमान रूप में आप ग्रीस नाम से जानते हैं। यूनान का वजूद ही मिट गया। इसी तरह बेबिलोन को मुहम्‍मदवादियों ने नष्‍ट कर इराक और फारस को नष्‍ट कर ईरान बना दिया। कुछ इसी तरह मिश्र की सभ्‍यता को नष्‍ट कर इजिप्‍ट बना दिया। ईसायत और ईस्‍लाम ने पूरी दुनिया की प्राचीन सभ्‍यताओं को नष्‍ट कर उसे नया नाम दिया ताकि दुनिया जाने कि इन दोनों धर्म के आने से पहले पूरा संसार अंधकारमय था और इन्‍होंने ही दुनिया में उजाला भरा, नए राष्‍ट्रों का निर्माण किया, जबकि वास्‍तव में इन्‍होंने केवल और केवल विध्‍वंस किया।

 

लेकिन भारत की हिंदू संस्‍कृति और सभ्‍यता ने इनके पूरे खेल को बिगाड़ दिय। जहां दुनिया की समूची सभ्‍यता को इन्‍होंने 15 से 25 साल के भीतर नष्‍ट कर एक नए नाम से नए देश को खड़ा कर दिया, वहीं 800 साल के इस्‍लामी शासन और 200 साल के ईसायत के शासन के बाद भी राजा भरत का ‘भारत’ भी बना रहा और उसके 80 फीसदी संतान भी वैसे ही रहे। जिन 15 से 20 फीसदी लोगों ने डर और प्रताड़ना के कारण अपना धर्म बदल लिया था, उनकी भी साझी सभ्‍यता और संस्‍कृति बनी रही, कुछ मूर्खों को छोड़कर।

अंग्रेजों ने जाते-जाते पाकिस्‍तान निर्माण के नाम पर भारत की पहचान नष्‍ट करने की कोशिश की और आज धर्मांतरण और आतंकवाद के बल पर फिर से हमें नष्‍ट करना चाहते हैं। पूरी दुनिया में एक मात्र हिंदुस्‍तानी सभ्‍यता और संस्‍कृति थी, जिसने 1000 साल तक धर्म के नाम पर विध्‍वंस फैलाने वाले इन मसीह-मोहम्‍मदवादियों का मुकाबला भी किया, इन्‍हें परास्‍त भी किया, अपनी पहचान भी बनाए रखी और अपने देश के मूल नाम और स्‍वरूप को भी बनाए रखा। इसके बावजूद इन विध्‍वंसकारियों के तीसरे और सबसे आधुनिक पार्टनर, मार्क्‍सवादी इतिहासकरों ने कहा कि भारत कभी एक राष्‍ट्र नहीं था और हिंदू धर्मभीरू थे। जब कुचलने की शक्ति काम नहीं आई तो मानसिक शक्ति से इसे कुचलना चाहा। आप भी अपने सच्‍चे इतिहास को जानकर इन भारत विरोधियों को उनके झूठ का करारा जवाब दीजिए। शास्‍त्रार्थ की परंपरा ही हमारी मूल शक्ति है, यह याद रखिए।

भारत के मूल इतिहास की समझ विकसित करने के लिए जनक्रांति पैदा करने की जरूरत इसलिए और भी बढ़ जाती है कि अभी भी कई मित्रों को देख रहा हूं कि वह पश्चिमी सोच से मुक्‍त होने में असहज महसूस कर रहे हैं और यह अज्ञानता, खुद को हीन मानने और पश्चिम को श्रेष्‍ठ मानने से उत्‍पन्‍न कुंठा की देन है। महिर्ष अरविंद ने लिखा है, ” भारतीय यदि स्‍वयं को महान वैचारिक संस्‍था के रूप में स्‍थापित नहीं कर पाए हैं तो इसके दो कारण हैं– 1) पहला तो यह कि संस्‍कृत भाषा पर उनकी पकड् कमजोर है, क्‍योंकि हमारे विश्‍वविद्यालयों में इस पर विशेष बल नहीं दिया जाता 2) दूसरा, हमारे विद्वानों में स्‍वतंत्र सोच का अभाव है और इसके चलते सहज ही वे पश्चिमी(यूरोपीय) प्राधिकरण के सामने ‘घुटने टेक देते’ हैं। यह आज भी उतना ही सत्‍य है।”

हां, सचमुच यह आज भी उतना ही सत्‍य है, क्‍योंकि ”इतिहास के सच को सामने लाने की मुहिम” में कई मित्र जो सवाल भेज रहे हैं, उन्‍हें पढिए तो आपको पता चलेगा कि सूचना क्रांति के इस युग में भी मानसिक दासता किस हद तक आज की पीढ़ी पर हावी है। ये साथी पूछते हैं, आप इतिहास के नाम पर हिंदू इतिहास मत बताने लगिएगा, आपके पास प्रमाण है सही इतिहास बताने का, क्‍या अब तक जो इतिहास है, वो मूर्खो ने लिखा है और एक आप ही समझदार हैं..आदि-आदि।

ताज्‍जुब होता है जो लोग अपने परदादा तक का नाम नहीं जानते, वो अपने इस मूर्खतापूर्ण इतिहास बोध के साथ सवाल पूछ रहे हैं। आज न केवल भारतीय बल्कि, फ्रेंच, अमेरिकन आदि कई बड़े इतिहासकार हैं, जिनका भारत के वास्‍तविक इतिहास पर शोध पढकर आप दंग रह जाएंगे। ये वस्‍तुनिष्‍ठ लोग हैं। फर्क यह है कि इनका काम अकादमिक स्‍तर का है और मैं जो करने जा रहा हूं, वह इनके अकादमी ज्ञान को आम आदमी तक आम भाषा में पहुंचाने की कोशिश है। मैं किसी इतिहास को खोजने का दावा नहीं कर रहा। मैं ‘क्‍लास’ की चीजों को बस ‘मास’ तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं ताकि इतिहास बोध एक जनक्रांति का रूप ले सके और हमारी सरकार भी हमारी अगली पीढ़ी को देश का वास्‍तविक इतिहास पढने के लिए दे न कि विकृत इतिहास की आ रही परिपाटी को ही दोहराने को कहे.

आप लोगों को पता है कि भारत के मूल इतिहास को विकृत करने का जो प्रयास, मार्क्‍स की संतानों ने किया था, उसमें से एनसीईआरटी व इतिहास की अन्‍य पुस्‍तकों में दर्ज 11 झूठ को अभी तक जिला न्‍यायालय से लेकर सर्वोच्‍च न्‍यायालय बदलने का निर्देश दे चुकी है और वो बदल भी चुकी हैं। यह भारतीय शिक्षा नीति आयोग, शिक्षा बचाओ आंदोलन आदि के कारण संभव हो सका है। इसलिए जो लोग और ऐसे लोगों को मैं केवल और केवल नकारात्‍मक मानता हूं, तो ऐसे लोग जो यह कह रहे हैं कि आपके ”इतिहास के सच को सामने लाने की मुहिम” का क्‍या असर होगा, क्‍या देश का इतिहास सुधारा जा सकता है…तो ऐसे लोगों को कहना चाहता हूं कि हमारे पास उदाहरण है।

उदाहरणस्‍वरूप, जैसे- घोर मार्क्‍सवादी विपिन चंद्रा द्वारा लिखित कक्षा 12 की इतिहास की पुस्‍तक, ” आधुनिक भारत” के पृष्‍ठ-2 पर उन्‍होंने यह झूठ लिखा था कि गुरू गोविंद सिंह जी मुगलों के दरबार में मनसब थे। शिक्षा बचाओ आंदोलन के पेटिशन के कारण अदालत ने इसे बदलने का निर्णय दिया और आज यह एनसीईआरटी की पुस्‍तक में नहीं है। पहले की पुस्‍तक उठा लीजिए और आज की उठा लीजिए, आपको अंतर स्‍पष्‍ट हो जाएगा। दूसरा उदाहरण, मार्क्‍सवादी अर्जुनदेव ने एनसीईआरटी की कक्षा-8 की सामाजिक विज्ञान भाग-1 के पृष्‍ठ संख्‍या’189 पर लिखा था कि लाला लाजपत राय, बालगंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल, वीर सावरकर और अरविंद घोष आतंकवादी थे। अदालत के हस्‍तक्षेप से इसे भी बदला जा चुका है। समय-समय पर आपको सभी 11 बदलाव की जानकारी दे दूंगा, मेरे पास उपलब्‍ध हैं।

वैसे नकारात्‍मक लोग तो कहेंगे, संदीप जी अदालती आदेश के बाद हुए बदलाव का लिंक दे दीजिए, आप ही पुस्‍तक लाकर बता दीजिए। ऐसे लोग न खुद मेहनती होते हैं और न दूसरों को मेहनत करते देखना चाहते हैं। प्‍लीज आप मेहनत कीजिए, पढि़ए और इतिहास के इस आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लीजिए। याद रखिए, हमारी इसी निष्क्रियता के कारण गौरी ओर गजनी इस देश में लूटपाट कर सका, माउंटबेटेन भारत को बांट सका और आजादी के बाद नेहरू-गांधी खानदान ने हमें जमकर लूटा…सो प्‍लीज यदि खुद को राम-कृष्‍ण-बुद्ध-शंकराचार्य की संतान मानते हैं तो तंद्रा तोडि़ए, क्‍योंकि भारत की संतानों ने शस्‍त्र और शास्‍त्र दोनों से जब जब अपने राष्‍ट्र की रक्षा का प्रण लिया है, विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी है। निष्क्रियता और नकारात्‍मकता त्‍यागिए…… क्‍योंकि अब नहीं तो कभी नहीं, यही मेरा मंत्र है..

Web title: sandeep-deo-blogs24

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गौ हत्‍या पर मृत्‍युदंड, केवल महाराजा रणजीत सिंह और बहादुरशाह जफर ने किया था प्रावधान


गौ हत्‍या पर मृत्‍युदंड, केवल महाराजा रणजीत सिंह और बहादुरशाह जफर ने किया था प्रावधान

संदीप देव। आप अपने इतिहास ज्ञान से यह बता सकते हैं कि इस देश में कौन-कौन से वो शासक रहे हैं, जिन्‍होंने गौ-हत्‍या के लिए मृत्‍युदंड का विधान अपने राज्‍य में किया था। मीर कासिम से पहले भारत में गौ हत्‍या होती नहीं थी, इसलिए उससे पहले किसी शासक ने ऐसे कानून बनाने के बारे में सोचा भी नहीं था। देश में सबसे बड़ी सामूहिक गौ-हत्‍या मुहम्‍मद गोरी की सेना ने की थी। तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्‍वीराज चौहान को घेरने के लिए जयचंद ने मुहम्‍मद गोरी को गाय की दीवार बनाने की सलाह दी थी। तराइन के प्रथम युद्ध के समान ही जब मुहम्‍मद गोरी को तराइन के द्वितीय युद्ध में भी अपनी पराजय निश्चित प्रतीत हो रही थी तो उसने युद्ध के मैदान में एकाएक गायों को छोड़ दिया, जिसके कारण पृथ्‍वी राज व उसकी सेना एकदम से असहाय हो गई थी। पृथ्‍वीराज को बंदी बनाने के बाद उन सभी गायों की सामूहिक हत्‍या युद्ध के मैदान में ही करवा दी गई थी, जो भारत में पहला सामूहिक गौ हत्‍याकांड था।

खैर, मध्‍य काल में जिन दो शासकों ने गौर हत्‍या के लिए मृत्‍युदंड का विधान किया था, उसमें पहला, पंजाब के राजा महाराजा रणजीत सिंह थे और दूसरा आखिरी मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर थे। इन दोनों के शासनकाल में गौ हत्‍या करने वालों को मृत्‍युदंड दिया जाता था। आजादी के बाद गौ हत्‍या को रोकने की मांग करने वाले 10 लाख संतों पर दिल्‍ली में गोली चलवाकर इंदिरा गांधी ने गौ-हत्‍या रोकने की जगह सामूहिक संत हत्‍या करवाई थी। उसमें करीब 3 से चार हजार संत मारे गए थे। संसद भवन के सामने की पूरी सड़क खून से लाल हो गई थी और तिहाड़ जेल संतों से भर गया था।

वर्तमान में संयुकत राज्‍य अमेरिका और चीन ने गोमुत्र को पेटेंट करा कर यह दर्शा दिया है कि गाय के मूल स्‍थान वाली भारत भूमि पर भले ही गाय का सम्‍मान न हो, लेकिन अमेरिका-चीन उसके गुणों को समझने लगे हैं। जर्सी व विदेशी नस्‍ल की गाय से देश के गायों की नस्‍ल पहले ही बर्बाद हो चुकी है। अमेरिका ने अपने रिसर्च में यह स्‍पष्‍ट किया है कि शुद्ध भारतीय नस्‍ल की देशी गाय में ‘बीटा कैसिइन ए-2 प्रोटीन’ पाया जाता है, जो बेहद स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक है जबकि यूरोपीय नस्‍ल की गाय को ‘बोस टोरस’ श्रेणी में रखा गया है, जिसके दूध में मधुमेह यानी डायबिटीज बढ़ाने वाला प्रोटीन होता है।

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जिन्‍ना के डायरेक्‍ट एक्‍शन के खिलाफ पंडित मदन मोहन मालवीय की वह ललकार!


जिन्‍ना के डायरेक्‍ट एक्‍शन के खिलाफ पंडित मदन मोहन मालवीय की वह ललकार!

संदीप देव। आज महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की पुण्‍यतिथि है। 12 नवंबर 1946 को उनका देहावसान हुआ था। मैं उन सौभाग्‍यशाली लोगों में हूं, जिसे महामना द्वारा स्‍थापित काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय से स्‍नातक करने का अवसर प्राप्‍त हुआ। पंडित जी 1886 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। 1909 और 1918 के कांग्रेस अधिवेशनों की उन्‍होंने अध्‍यक्षता की थी। खिलाफत के पक्ष में महात्‍मा गांधी की मुस्लिम तुष्टिकरण को देखते हुए उन्‍होंने कांग्रेस छोड़ दिया था और हिंदू महासभा में सम्मिलित हो गए थे। स्‍वतंत्रता आंदोलन में उन्‍होंने कई बार जेल यात्रा की।

1875 में सर सैयद अहमदखां ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्‍थापना ‘मुहम्‍मडन एंग्‍लो-ओरिएंटल कॉलेज के रूप में की थी। धीरे धीरे यह यूनिवर्सिटी शिक्षा के केंद्र की जगह सांप्रदायिकता का केंद्र बन गया। सर सैयद अहमदखां ईस्‍ट इंडिया कंपनी में लिपिक रूप में कार्य करते थे। 1857 में हिंदू-मुस्लिम एकता को देखकर अंग्रेजों ने ही सर सैयद अहमद खां को मुस्लिमों को स्‍वतंत्रता आंदोलन से अलग रखने के लिए आगे बढाया था। पाकिस्‍तान निर्माण की सोच की परंपरा की शुरुआत सर सैयद अहमद खां से ही मानी जाती है। सर सैयद अहमद खं ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरूध्द यह प्रचार करना शुरू कर दिया था कि कांग्रेस हिन्दूओं की पार्टी है, जो मुस्लिम लीग (1906 में स्थापित) की स्‍थापना का प्रमुख विचार बना। अहमद खां कांग्रेस से हमेशा दूर रहे और यहाँ तक कि वे आज़ादी की लड़ाई से भी हिस्सा नहीं लिया।

सर सैयद अहमद खां के प्रभाव में बढते कटर विचार और गांधी के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस में बढते मुस्लिम तुष्टिकरण की काट के लिए ही महामना मालवीय जी ने काशी हिंदू विवि की नींब रखी थी। पेशावर से लेकर कन्‍याकुमारी तक महामना ने इसके लिए चंदा एकत्र किया था, जो उस समय करीब एक करोड़ 64 लाख रुपए हुआ था। काशी नरेश ने जमीन दी थी तो दरभंगा नरेश ने 25 लाख रुपए से सहायता की थी। वहीं हैदराबाद के निजाम ने कहा कि इस विवि से पहले ‘हिंदू’ शब्‍द हटाओ फिर दान दूंगा। महामना ने मना कर दिया तो निजाम ने कहा कि मेरी जूती ले जाओ। महामना उसकी जूति ले गए और हैदराबाद में चारमीनार के पास उसकी नीलामी लगा दी। निजाम की मां को जब पता चला तो वह बंद बग्‍घी में पहुंची और करीब 4 लाख रुपए की बोली लगाकर निजाम का जूता खरीद लिया। उन्‍हें लगा कि उनके बेटे की इज्‍जत बीच शहर में नीलाम हो रही है। ‘ मियां की जूती, मियां के सर’ मुहावरा उसी घटना के बाद से प्रचलित हो गया।

कलकत्‍ता में मोहम्‍म्‍द अली जिन्‍ना ने पाकिस्‍तान की मांग के लिए जब ‘डायरेक्‍ट एक्‍शन’ की घोषणा की थी तो महात्‍मा गांधी ने कहा कि मेरी लाश पर पाकिस्‍तान बनेगा। महात्‍मा गांधी पर भरोसा कर निर्धारित पाकिस्‍तान वाले हिस्‍से के हिंदुओं ने अपना घर-बार नहीं छोड़ा जिसके कारण केवल पूर्वी बंगाल में ही करीब 5 लाख हिंदू मार दिए गए। पंडित मदन मोहन मालवीय इससे बहुत दुखी हुए और उन्‍होंने सार्वजनिक रूप से कहा था, ” हिंदुओं तुम्‍हें तुम्‍हारी माता ने भेड-बकरियों की भांति कटने के लिए उत्‍पन्‍न नहीं किया है। अरे, तुम मुंडमालिनी (काली माता) की संतान हो। उसके स्‍वरूप को स्‍मरण कर, अपने धर्म की रक्षा करो।”
मालवीय जी ने 1934 में कांग्रेस छोड़ा और माधव श्रीहरि के साथ मिलकर ‘ कांग्रेस नेशलिस्‍ट पार्टी’ की स्‍थापना की, जो चुनाव में 12 सीटें जीतने में सफल रही थी। मालवीय जी हिंदू महासभा के तीन अधिवेशनों की अध्‍यक्षता की थी। जिन्‍ना ने डायरेक्‍ट एक्‍शन का नारा, 16 August 1946 को दिया था। केवल 72 घंटे में केवल कोलकाता में ही चार लाख हिंदुओं की हत्‍या हो गई थी और एक लाख से अधिक लोग बेघर हो गए थे। और मालवीय जी की मृत्‍यु 12 नवंबर 1946 को हुई थी। मालवीय जी ने यह बयान अगस्‍त 1946 में दिया था, अपनी मृत्‍यु से तीन महीने पहले और डायरेक्‍ट एक्‍शन के तत्‍काल बाद।
मालवीय जी पाकिस्‍तान निर्माण के प्रखर विरोधी थे। आज हम पंडित मदन मोहन मालवीय को अपनी श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

Web title: Pandit Madan Mohan Malaviya-Biography and contribution.1

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आखिर कौन हैं ‘भंगी’, ‘मेहतर’, ‘दलित’ और ‘वाल्‍मीकि’?


आखिर कौन हैं ‘भंगी’, ‘मेहतर’, ‘दलित’ और ‘वाल्‍मीकि’?

संदीप देव। हमारे-आपके पूर्वजों ने जिन ‘भंगी’ और ‘मेहतर’ जाति को अस्‍पृश्‍य करार दिया, जिनका हाथ का छुआ तक आज भी बहुत सारे हिंदू नहीं खाते, जानते हैं वो हमारे आपसे कहीं बहादुर पूर्वजों की संतान हैं। मुगल काल में ब्राहमणों व क्षत्रियों को दो रास्‍ते दिए गए, या तो इस्‍लाम कबूल करो या फिर हम मुगलों-मुसलमानों का मैला ढोओ। आप किसी भी मुगल किला में चले जाओ वहां आपको शौचालय नहीं मिलेगा।

हिंदुओं की उन्‍नत सिंधू घाटी सभ्‍यता में रहने वाले कमरे से सटा शौचालय मिलता है, जबकि मुगल बादशाह के किसी भी महल में चले जाओ, आपको शौचालय नहीं मिलेगा, जबकि अंग्रेज और वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहां जैसे मुगल बादशाह को वास्‍तुकला का मर्मज्ञ ज्ञाता बताया है। लेकिन सच यह है कि अरब के रेगिस्‍तान से आए दिल्‍ली के सुल्‍तान और मुगल को शौचालय निर्माण तक का ज्ञान नहीं था। दिल्‍ली सल्‍तनत से लेकर मुगल बादशाह तक के समय तक पात्र में शौच करते थे, जिन्‍हें उन ब्राहमणों और क्षत्रियों और उनके परिजनों से फिकवाया जाता था, जिन्‍होंने मरना तो स्‍वीकार कर लिया था, लेकिन इस्‍लाम को अपनाना नहीं।
भंगी और मेहतर शब्‍द का मूल अर्थ
‘भंगी’ का मतलब जानते हैं आप्…। जिन ब्राहमणों और क्षत्रियों ने मैला ढोने की प्रथा को स्‍वीकार करने के उपरांत अपने जनेऊ को तोड़ दिया, अर्थात उपनयन संस्‍कार को भंग कर दिया, वो भंगी कहलाए। और ‘मेहतर’- इनके उपकारों के कारण तत्‍कालिन हिंदू समाज ने इनके मैला ढोने की नीच प्रथा को भी ‘महत्‍तर’ अर्थात महान और बड़ा करार दिया था, जो अपभ्रंश रूप में ‘मेहतर’ हो गया। भारत में 1000 ईस्‍वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्‍या-14 फीसदी हो गई। आपने सोचा कि ये 13 प्रतिशत की बढोत्‍तरी 150-200 वर्ष के मुगल शासन में कैसे हो गई।

वामपंथियों का इतिहास आपको बताएगा कि सूफियों के प्रभाव से हिंदुओं ने इस्‍लाम स्‍वीकार किया, लेकिन गुरुतेगबहादुर एवं उनके शिष्‍यों के बलिदान का सबूत हमारे समक्ष है, जिसे वामपंथी इतिहासकार केवल छूते हुए निकल जाते हैं। गुरु तेगबहादुरर के 600 शिष्‍यों को इस्‍लाम न स्‍वीकार करने के कारण आम जनता के समक्ष आड़े से चिड़वा दिया गया, फिर गुरु को खौलते तेल में डाला गया और आखिर में उनका सिर कलम करवा दिया गया। भारत में इस्‍लाम का विकास इस तरह से हुआ। इसलिए जो हिंदू डर के मारे इस्‍लाम धर्म स्‍वीकार करते चले गए, उन्‍हीं के वंशज आज भारत में मुस्लिम आबादी हैं, जो हिंदू मरना स्‍वीकार कर लिया, वह पूरा का पूरा परिवार काट डाला गया और जो हिंदू नीच मैला ढोने की प्रथा को स्‍वीकार कर लिया, वह भंगी और मेहतर कहलाए।

डॉ सुब्रहमनियन स्‍वामी लिखते हैं, ” अनुसूचित जाति उन्‍हीं बहादुर ब्राहण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्‍होंने जाति से बाहर होना स्‍वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्‍वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्‍हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्‍योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्‍वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्‍वयं अपमान व दमन झेला।”

दलित  और वाल्‍मीकि शब्‍द का वास्‍तविक अर्थ
अपने धर्म की रक्षा के लिए अपने जनेऊ को तोड़कर अर्थात ‘भंग’ कर मुस्लिम शासकों और अमीर के यहां मैला ढोने और उनके द्वारा पात्र में किए गए शौच को सिर पर उठाकर फेंकने वाले हमारे पूर्वजों ने खुद तो अपमान का घूंट पी लिया, लेकिन समाज को झकझोरना नहीं छोड़ा। उन्‍होंने अपने शिखा का त्‍याग नहीं किया ताकि उनके ब्राहमण की पहचान से समाज परिचित रहे और फिर उन्‍होंने अपने काम से निवृत्‍त होकर हिंदू चेतना जागृत करने के लिए घर-घर, गली-गली गा-गा कर राम कथा कहना शुरू कर दिया ताकि हिंदू में व्‍याप्‍त निराशा दूर हो।

मध्‍यकाल के भक्ति आंदोलन को वामपंथी इतिहासकारों ने हिंदुओं में आई कुरीतियों, जाति-पाति भेद आदि को दूर करने का आंदोलन कह कर झूठ प्रचलित किया, जबकि ब्राहमण तुलसीदास से लेकर दलित रैदास तक इस आंदोलन को आततायी शासकों से मुक्ति के लिए जनचेतना का स्‍वरूप दिए हुए थे। दिल्‍ली में रामलीला की शुरुआत अकबर के जमाने में तुलसीदास ने कराई थी ताकि हिंदुओं में व्‍याप्‍त निराशा दूर हो, उनकी लुप्‍त चेतना जागृत हो जाए और उनके अंदर गौरव का अहसास हो ताकि वह सत्‍ता हासिल करने की स्थिति प्राप्‍त कर लें। इसी मध्‍यकालीन भक्ति आंदोलन से निकले समर्थ गुरुराम दास ने छत्रपति शिवाजी को तैयार कर मुगल सल्‍तनत की ईंट से ईंट बजा दी थी।

हां तो, गली-गली हिंदुओं में गौरव जगाने और अपनी पीड़ा को आवाज देने के लिए शासकों का मैला ढोने वाले अस्‍पृश्‍यों को उनके ‘महत्‍तर’ अर्थात महान कार्य के लिए ‘मेहतर’ और रामकथा वाचक के रूप में रामकथा के पहले सृजनहार ‘वाल्‍मीकि’ का नाम उन्‍हें दे दिया। खुद को गिरा कर हिंदू धर्म की रक्षा करने के लिए इन्‍हें एक और नाम मिला ‘दलित’ अर्थात जिन्‍होंने धर्म को ‘दलन’ यानी नष्‍ट होने से बचाया, वो दलित कहलाए।

सोचिए, जो डरपोक और कायर थे वो इस्‍लाम अपनाकर मुसलमान बन गए, जिन्‍होंने इस्‍लाम को स्‍वीकार नहीं किया, बदले में मुस्लिम शासकों और अमीरों का मैला ढोना स्‍वीकार किया वो ‘भंगी’, कहलाए और जिन हिंदुओं ने इनके उपकार को नमन किया और इन्‍हें अपना धर्म रक्षक कहा, उन्‍होंने उन्‍हें एक धर्मदूत की तरह ‘वाल्‍मीकि’, ‘दलित’ ‘मेहतर’ नाम दिया। कालांतर में इतने प्‍यार शब्‍द भी अस्‍पृश्‍य होते चले गए, इसकी भावना भी धूमिल हो गई और हमारे पूर्वजों ने इन धर्मरक्षकों को अपने ही समाज से बहिष्‍कृत कर दिया। हिंदू धर्म कुरीतियों का घर बन गया, जो आज तक जातिप्रथा के रूप में बना हुआ है।

मछुआरी मां सत्‍यवती की संतान महर्षि व्‍यास की तो यह हिंदू समाज श्रद्धा करता है और आज एक मछुआरे को शुद्र की श्रेणी में डालता है, यह है हमारे-आपके समाज का दोगला और कुरीतियों वाला चरित्र। तथाकथित ऊंची जाति ब्राहण और क्षत्रिए उनसे रोटी-बेटी का संबंध बनाने से बचती है, जबकि उन्‍हीं के कारण उनका जन्‍मना ब्राहमणत्‍व और क्षत्रियत्‍व बचा हुअा है। गीता के चौथे अध्‍ययाय के 13 वें श्‍लोक में भगवान श्रीकृष्‍ण ने कहा है, ‘चतुर्वण्‍यम माया श्रष्‍टम गुण-कर्म विभागध:’ अर्थात चार वर्ण मैंने ही बनाए हैं, जो गुण और कर्म के आधार पर है। तो फिर आप अपने मन में यह सवाल क्‍यों नहीं पूछते कि आखिर यह दलित, अस्‍पृश्‍य जाति कहां से आ गई।

जो लोग जन्‍म के आधार पर खुद को ब्राहमण और क्षत्रिए मानते हैं, वो जरा शर्म करें और अपने उन भाईयों को गले लगाएं, जिन्‍होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने जन्‍म से ब्राहण और क्षत्रिए होने का त्‍याग कर भगवान कृष्‍ण के मुताबिक कर्म किया, आततियों से लड़ नहीं सकते थे तो उनका मैला ढोया, लेकिन समय बचने पर रामधुन समाज में प्रसारित करते रहे और ‘वाल्‍मीकि’ कहलाए और हिंदू धर्म के ‘दलन’ से रक्षा की इसलिए ‘दलित’ कहलाए।

याद रखो, यदि हिंदू एक नहीं हुए तो तुम्‍हें नष्‍ट होने से भी कोई नहीं बचा सकता है और यह भी याद रखो कि जो मूर्ख खुद को जन्‍म से ब्राहमण और क्षत्रिय मानता है, वह अरब के आए मुस्लिम और ब्रिटिश से आए अंग्रेज शासको के श्रेष्‍ठता दंभ के समान ही पीडि़त और रुग्‍ण है। वामपंथी इतिहासकारों ने झूठ लिख-लिख कर तुम्‍हें तुम्‍हारे ही भाईयों से अलग कर दिया है तो यह भी याद रखो कि वो कुटिल वामपंथी तुम्‍हें तोडना चाहते हैं। झूठे वामपंथी तुम्‍हारे भगवान नहीं हैं, तुम्‍हारे भगवान राम और कृष्‍ण हैं, जिन्‍होंने कभी जाति भेद नहीं किया। वैसे आज भी कुछ ब्राहण और क्षत्रिए ऐसे हैं, जो इस घमंड में हैं कि भगवान कृष्‍ण तो यादव थे, जो आज की संवैधानिक स्थिति में अनुसूचित जाति है। तो कह दूं, ऐसे सोच वाले हिंदुओं का वंशज ही नष्‍ट होने लायक है। क्‍या आप सभी खुद को हिंदू कहने वाले लोग उस अनुसूचित जाति के लोगों को आगे बढ़कर गले लगाएंगे, उनसे रोटी-बेटी का संबंध रखेंगे। यदि आपने यह नहीं किया तो समझिए, हिंदू समाज कभी एक नहीं हो पाएगा और एक अध्‍ययन के मुकाबले 2061 से आप इसी देश में अल्‍पसंख्‍यक होना शुरू हो जाएंगे।

हां, मुझे उपदेश देने वाला कह कर मेरा उपहास उड़ाओ तो स्‍पष्‍ट बता दूं कि मैं जाति से भूमिहार ब्राहमण हूं और कर्म से भी ज्ञान की दिशा में ही कार्य कर रहा हूं। मेरा सबसे घनिष्‍ठ मित्र एक दलित है, जिसके साथ एक ही थाली में खाना, एक दूसरे के घर पर जाकर एक समान ही रहना, मेरे जीवन में है। मेरा उपनयन संस्‍कार, मेरे पिताजी ने इसलिए किय था कि मेरा गांव जाति युद्ध में फंसा था और उन्‍होंने मेरे उपनयन पर दो जातियों के गुट को एक कर दिया था। इसलिए मैं कहता वहीं हूं, जो मेरे जीवन में है!

Web Title: Who are Dalits.1

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किताबों में ही दफन रह गया, नेहरू खानदान का काला इतिहास!


किताबों में ही दफन रह गया, नेहरू खानदान का काला इतिहास!

14 नवंबर, नेहरू जयंती पर विशेष। दिनेश चंद्र मिश्र। जम्मू-कश्मीर में आए महीनों हो गए थे, एक बात अक्सर दिमाग में खटकती थी कि अभी तक नेहरू के खानदान का कोई क्यों नहीं मिला, जबकि हमने किताबों में पढ़ा था कि वह कश्मीरी पंडित थे। नाते-रिश्तेदार से लेकर दूरदराज तक में से कोई न कोई नेहरू खानदान का तो मिलना ही चाहिए था। नेहरू राजवंश कि खोज में सियासत के पुराने खिलाडिय़ों से मिला लेकिन जानकारी के नाम पर मोतीलाल नेहरू के पिता गंगाधर नेहरू का नाम ही सामने आया।

 

ए लैम्प फार इंडिया- द स्टोरी ऑफ मदाम पंडित
अमर उजाला दफ्तर के नजदीक बहती तवी के किनारे पहुंचकर एक दिन इसी बारे में सोच रहा था तो ख्याल आया कि जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सचिव हाफीजा मुज्जफर से मिला जाए, शायद वह कुछ मदद कर सके। अगले दिन जब आफिस से हाफीजा के पास पहुंचा तो वह सवाल सुनकर चौंक गई। बोली पंडित जी आप पंडित नेहरू के वंश का पोस्टमार्टम करने आए हैं क्या? हंसकर सवाल टालते हुए कहा कि मैडम ऐसा नहीं है, बस बाल कि खाल निकालने कि आदत है इसलिए मजबूर हूं। यह सवाल काफी समय से खटक रहा था।

कश्मीरी चाय का आर्डर देने के बाद वह अपने बुक रैक से एक किताब निकाली, वह थी रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज कि किताब ‘ए लैम्प फार इंडिया- द स्टोरी ऑफ मदाम पंडित।’ उस किताब मे तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा था। जिसके अनुसार गंगाधर असल में एक सुन्नी मुसलमान थे जिनका असली नाम था गयासुद्दीन गाजी। इस फोटो को दिखाते हुए हाफीजा ने कहा कि इसकी पुष्टि के लिए नेहरू ने जो आत्मकथा लिखी है, उसको पढऩा जरूरी है। नेहरू की आत्मकथा भी अपने रैक से निकालते हुए एक पेज को पढऩे को कहा। इसमें एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे। इसी तरह जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत बहादुरशाह जफर के समय में नगर कोतवाल थे।

‘बहादुरशाह जफर’ और ‘1857 का गदर’
इतिहासकारो ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफर के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था। और खोजबीन करने पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे। लेकिन किसी गंगा धर नाम के व्यक्ति का कोई रिकार्ड नहीं मिला है। नेहरू राजवंश की खोज में मेहदी हुसैन की पुस्तक ‘बहादुरशाह जफर’ और ‘1857 का गदर’ में खोजबीन करने पर मालूम हुआ। गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर के डर से बदला गया था,असली नाम तो था गयासुद्दीन गाजी।

जब अंग्रेजों ने दिल्ली को लगभग जीत लिया था तब मुगलों और मुसलमानों के दोबारा विद्रोह के डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके तम्बुओं में ठहरा दिया था। जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं। अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे जो हिन्दू राजाओं-पृथ्वीराज चौहान ने मुसलमान आक्रान्ताओं को जीवित छोडकर की थी,इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को मारना शुरु किया । लेकिन कुछ मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के इलाको मे चले गये थे। उसी समय यह परिवार भी आगरा की तरफ कुच कर गया।

नेहरू की आत्‍मकथा क्‍या कहती है?
नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोककर पूछताछ की थी लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया बाकी तो इतिहास है ही। यह धर उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है और इसी का अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह दर या डार हो गया जो कि कश्मीर के अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है। लेकिन मोतीलाल ने नेहरू उपनाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे। इतने पीछे से शुरुआत करने का मकसद सिर्फ यही है कि हमें पता चले कि खानदानी लोगों कि असलियत क्या होती है।

‘द नेहरू डायनेस्टी’
एक कप चाय खत्म हो गयी थी, दूसरी का आर्डर हाफीजा ने देते हुए के.एन.प्राण कि पुस्तक ‘द नेहरू डायनेस्टी’ निकालने के बाद एक पन्ने को पढऩे को दिया। उसके अनुसार जवाहरलाल मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर । यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल कि एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू । कमला नेहरू उनकी माता का नाम था। जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी। कमला शुरु से ही इन्दिरा के फिरोज से विवाह के खिलाफ थीं क्यों यह हमें नहीं बताया जाता। लेकिन यह फिरोज गाँधी कौन थे? फिरोज उस व्यापारी के बेटे थे जो आनन्द भवन में घरेलू सामान और शराब पहुँचाने का काम करता था। आनन्द भवन का असली नाम था इशरत मंजिल और उसके मालिक थे मुबारक अली। मोतीलाल नेहरू पहले इन्हीं मुबारक अली के यहाँ काम करते थे।

सभी जानते हैं की राजीव गाँधी के नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के नाना के साथ ही दादा भी तो होते हैं। फिर राजीव गाँधी के दादाजी का नाम क्या था? किसी को मालूम नहीं, क्योंकि राजीव गाँधी के दादा थे नवाब खान। एक मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाई करता था और जिसका मूल निवास था जूनागढ गुजरात में है। नवाब खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया। फिरोज इसी महिला की सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था घांदी (गाँधी नहीं)घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था। विवाह से पहले फिरोज गाँधी ना होकर फिरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था। हमें बताया जाता है कि फिरोज गाँधी पहले पारसी थे यह मात्र एक भ्रम पैदा किया गया है।

गांधी की आत्‍मकथा भी तथ्‍य को छुपा जाती है!
इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का शिकार थीं। शांति निकेतन में पढ़ते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अनुचित व्यवहार के लिये निकाल बाहर किया था। अब आप खुद ही सोचिये एक तन्हा जवान लडक़ी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पड़ी हुई हों थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी विपरीत लिंग की ओर, इसी बात का फायदा फिरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को बहला-फुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली। नाम रखा मैमूना बेगम। नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए लेकिन अब क्या किया जा सकता था। जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को मिली तो उन्होंने नेहरू को बुलाकर समझाया।

राजनैतिक छवि की खातिर फिरोज को मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले, यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये बजाय धर्म बदलने के सिर्फ नाम बदला जाये तो फिरोज खान घांदी बन गये फिरोज गाँधी। विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और सत्य के साथ मेरे प्रयोग नामक आत्मकथा लिखने वाले गाँधी ने इस बात का उल्लेख आज तक नहीं नहीं किया।

‘प्रेमेनिसेन्सेस ऑफ नेहरू एज’
खैर उन दोनों फिरोज और इन्दिरा को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुन: वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया ताकि उनके खानदान की ऊँची नाक का भ्रम बना रहे। इस बारे में नेहरू के सेकेरेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक ‘प्रेमेनिसेन्सेस ऑफ नेहरू एज’ ;पृष्ट 94 पैरा 2 (अब भारत में प्रतिबंधित है किताब) में लिखते हैं कि पता नहीं क्यों नेहरू ने सन 1942 में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीतिरिवाजों से किये जाने को अनुमति दी जबकि उस समय यह अवैधानिक था का कानूनी रूप से उसे सिविल मैरिज होना चाहिये था।

यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फिरोज अलग हो गये थे हालाँकि तलाक नहीं हुआ था । फिरोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान किया करते थे और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे। तंग आकर नेहरू ने फिरोज के तीन मूर्ति भवन मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । मथाई लिखते हैं फिरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बड़ी राहत मिली थी। 1960 में फिरोज गाँधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी जबकी वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे।

संजय गांधी का नाम और उनके पिता का डीएनए, आज भी एक रहस्‍य!
संजय गाँधी का असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता । लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था। ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवाया था, इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था । अब संयोग पर संयोग देखिये संजय गाँधी का विवाह मेनका आनन्द से हुआ।

कहा जाता है मेनका जो कि एक सिख लडकी थी संजय की रंगरेलियों की वजह से उनके पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी फि र उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर मानेका किया गया क्योंकि इन्दिरा गाँधी को यह नाम पसन्द नहीं था। फिर भी मेनका कोई साधारण लडकी नहीं थीं क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के लिये सिर्फ एक तौलिये में विज्ञापन किया था। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गाँधी अपनी माँ को ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कामो पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने कि छूट दी ।

एम.ओ.मथाई का एक और खुलासा
एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ 206 पर लिखते हैं – 1948 में वाराणसी से एक सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक नाम श्रद्धा माता था। वह संस्कत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को बेताब रहते थे । वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृत की अच्छी जानकार थी। नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक हिन्दी का पत्र नेहरू को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक इंटरव्यू देने को राजी हुए । चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था। नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के समय ही दिये ।

मथाई के शब्दों में एक रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा वह बहुत ही जवान खूबसूरत और दिलकश थी। एक बार नेहरू के लखनऊ दौरे के समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक पत्र लेकर नेहरू के पास आये नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया और अचानक एक दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं । नवम्बर 1949 में बेंगलूर के एक कान्वेंट से एक सुदर्शन सा आदमी पत्रों का एक बंडल लेकर आया। उसने कहा कि उत्तर भारत से एक युवती उस कान्वेंट में कुछ महीने पहले आई थी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया । उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को वहाँ छोडकर गायब हो गई थी । उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं पत्रों का वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया ।

मथाई लिखते हैं, मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफी कोशिश की लेकिन कान्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस जो कि एक विदेशी महिला थी बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक शब्द भी किसी से नहीं कहा। लेकिन मेरी इच्छा थी कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन कथोलिक संस्कारो में बड़ा करूँ चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था।

नेहरू राजवंश की कुंडली जानने के बाद घड़ी की तरफ देखा तो शाम पांच बज गए थे, हाफीजा से मिली ढेरों प्रमाणिक जानकारी के लिए शुक्रिया अदा करना दोस्ती के वसूल के खिलाफ था, इसलिए फिर मिलते हैं कहकर चल दिए अमर उजाला जम्मू दफ्तर की ओर।

लेखक : नाम है दिनेश चंद्र मिश्र। यूं तो एक दशक से ज्यादा हो गया देश के इतने हिस्सों में कलम की कमाई से पेट भरने गया कि दोस्त हो या दुश्मन सब रोमिंग जर्नलिस्ट ही कहने लगे। ग्लोबलाइजेशन के इस युग में इस अंग्रेजी नाम से खुद को फीलगुड होने लगा। और आपका यह रोमिंग जर्नलिस्ट काशी से कश्मीर तक, दिल्ली से दार्जिलिंग तक के पत्रकारिता जीवन के दिल, दिमाग में सहेजे अभी तक के ढेरों अनुभव बांटने के लिए मुखातिब है। इसके पीछे का मकसद है अनुभव को किताब की शक्ल दी जा सके। इसे पढक़र आपका दिल कहे तो प्यार दें नहीं तो दिल से गलियाँ दें। यह मेरी जिदंगी के लिए आक्सीजन और कार्बन डाइआक्साइड की तरह है। अगर मेरी बातों को कोई व्यक्तिगत लेता है तो उसकी परवाह मुझे नहीं है। अगर किसी से डरता हूं तो ऊपर वाले से वही रोटी देता है वहीं छीनता भी है।

Web Title: Jawaharlal Nehru – Biography.1
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