Posted in जीवन चरित्र

पंडित मदन मोहन मालवीय का वह कथन..


पंडित मदन मोहन मालवीय का वह कथन….

आज महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की पुण्‍यतिथि है। 12 नवंबर 1946 को उनका देहावसान हुआ था। मैं उन सौभाग्‍यशाली लोगों में हूं, जिसे महामना द्वारा स्‍थापित काशी हिंदू विश्‍वविद्यालय से स्‍नातक करने का अवसर प्राप्‍त हुआ। पंडित जी 1886 में कांग्रेस में शामिल हुए थे। 1909 और 1918 के कांग्रेस अधिवेशनों की उन्‍होंने अध्‍यक्षता की थी। खिलाफत के पक्ष में महात्‍मा गांधी की मुस्लिम तुष्टिकरण को देखते हुए उन्‍होंने कांग्रेस छोड़ दिया था और हिंदू महासभा में सम्मिलित हो गए थे। स्‍वतंत्रता आंदोलन में उन्‍होंने कई बार जेल यात्रा की।

1875 में सर सैयद अहमदखां ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्‍थापना ‘मुहम्‍मडन एंग्‍लो-ओरिएंटल कॉलेज के रूप में की थी। धीरे धीरे यह यूनिवर्सिटी शिक्षा के केंद्र की जगह सांप्रदायिकता का केंद्र बन गया। सर सैयद अहमदखां ईस्‍ट इंडिया कंपनी में लिपिक रूप में कार्य करते थे। 1857 में हिंदू-मुस्लिम एकता को देखकर अंग्रेजों ने ही सर सैयद अहमद खां को मुस्लिमों को स्‍वतंत्रता आंदोलन से अलग रखने के लिए आगे बढाया था। पाकिस्‍तान निर्माण की सोच की परंपरा की शुरुआत सर सैयद अहमद खां से ही मानी जाती है। सर सैयद अहमद खं ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के विरूध्द यह प्रचार करना शुरू कर दिया था कि कांग्रेस हिन्दूओं की पार्टी है, जो मुस्लिम लीग (1906 में स्थापित) की स्‍थापना का प्रमुख विचार बना। अहमद खां कांग्रेस से हमेशा दूर रहे और यहाँ तक कि वे आज़ादी की लड़ाई से भी हिस्सा नहीं लिया।

सर सैयद अहमद खां के प्रभाव में बढते कटर विचार और गांधी के नेतृत्‍व वाली कांग्रेस में बढते मुस्लिम तुष्टिकरण की काट के लिए ही महामना मालवीय जी ने काशी हिंदू विवि की नींब रखी थी। पेशावर से लेकर कन्‍याकुमारी तक महामना ने इसके लिए चंदा एकत्र किया था, जो उस समय करीब एक करोड़ 64 लाख रुपए हुआ था। काशी नरेश ने जमीन दी थी तो दरभंगा नरेश ने 25 लाख रुपए से सहायता की थी। वहीं हैदराबाद के निजाम ने कहा कि इस विवि से पहले ‘हिंदू’ शब्‍द हटाओ फिर दान दूंगा। महामना ने मना कर दिया तो निजाम ने कहा कि मेरी जूती ले जाओ। महामना उसकी जूति ले गए और हैदराबाद में चारमीनार के पास उसकी नीलामी लगा दी। निजाम की मां को जब पता चला तो वह बंद बग्‍घी में पहुंची और करीब 4 लाख रुपए की बोली लगाकर निजाम का जूता खरीद लिया। उन्‍हें लगा कि उनके बेटे की इज्‍जत बीच शहर में नीलाम हो रही है। ‘ मियां की जूती, मियां के सर’ मुहावरा उसी घटना के बाद से प्रचलित हो गया।

कलकत्‍ता में मोहम्‍म्‍द अली जिन्‍ना ने पाकिस्‍तान की मांग के लिए जब ‘डायरेक्‍ट एक्‍शन’ की घोषणा की थी तो महात्‍मा गांधी ने कहा कि मेरी लाश पर पाकिस्‍तान बनेगा। महात्‍मा गांधी पर भरोसा कर निर्धारित पाकिस्‍तान वाले हिस्‍से के हिंदुओं ने अपना घर-बार नहीं छोड़ा जिसके कारण केवल पूर्वी बंगाल में ही करीब 5 लाख हिंदू मार दिए गए। पंडित मदन मोहन मालवीय इससे बहुत दुखी हुए और उन्‍होंने सार्वजनिक रूप से कहा था, ” हिंदुओं तुम्‍हें तुम्‍हारी माता ने भेड-बकरियों की भांति कटने केक लिए उत्‍पन्‍न नहीं किया है। अरे, मुत मुंडमालिनी (काली माता) की संतान हो। उसके स्‍वरूप को स्‍मरण करा, अपने धर्म की रक्षा करो।” मालवीय जी पाकिस्‍तान निर्माण के प्रखर विरोधी थे। आज हम पंडित मदन मोहन मालवीय को अपनी श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। https://www.facebook.com/visionIndiaBooksClub

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