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कमरुनाग झील – हिमाचल प्रदेश – इसमें दबा है अरबो का खजाना


कमरुनाग झील – हिमाचल प्रदेश – इसमें दबा है अरबो का खजाना

आज हम आपको एक ऐसी झील के बारे में बताने जा रहे है जिसके बारे में कहा जाता है की उसमे अरबो रुपए का खजाना दफन है यह है हिमाचल प्रदेश  के पहाड़ो में स्थित  कमरुनाग झील।

पुरे साल में 14 और 15 जून को यानी देसी महीने के हिसाब से एक तारीख और हिमाचली भाषा में साजा। गर्मियों के इन दो दिनों में बाबा कमरुनाग पूरी दुनिया को दर्शन देते है। इसलिए लोगों का यहां जन सेलाव पहले ही उमड पड़ता है। क्योंकि बाबा घाटी के सबसे बड़े देवता हैं और हर मन्नत पुरी करते हैं। हिमाचल प्रदेश के मण्डी से लगभग 60 किलोमीटर दूर आता है रोहांडा, यहीं से पैदल यात्रा शुरु होती है। कठिन पहाड़ चड़कर घने जंगल से होकर गुजरना पड़ता है। इस तरह लगभग 8 किलोमीटर चलना पड़ता है।
मंदिर के पास ही एक झील है, जिसे कमरुनाग झील के नाम से जाना जाता है। यहां पर लगने वाले मेले में हर साल भक्तों की काफी भीड़ जुटती है और पुरानी मान्यताओं के अनुसार भक्त झील में सोने-चांदी के गहनें तथा
पैसे डालते हैं। सदियों से चली आ रही इस परम्परा के आधार पर यह माना जाता है कि इस झील के गर्त में अरबों का खजाना दबा पड़ा है।

देव कमरुनाग को वर्षा का देव माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार भगवान कमरुनाग को सोने-चांदी व पैसे चढ़ाने की प्राचीन मान्यता है। यहां जून में लगने वाले मेले के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा झील में सोने-चांदी के गहनों को अर्पित करते हुए देखा जा सकता है। स्थानीय लोगों की मानें तो सदियों से चली आ रही इस परंपरा के आधार पर यह माना जाता है कि झील के गर्त में काफी बड़ा खजाना दबा हुआ है। कमरुनाग में लोहड़ी पर भव्य पूजा का आयोजन किया जाता है।

कमरुनाग जी का जिक्र महाभारत में भी आता है। इन्हें बबरुभान जी के नाम से भी जाना जाता था। ये धरती के सबसे शक्तिशाली योधा थे। लेकिन कृष्ण नीति से हार गए। इन्होने कहा था कि कोरवों और पांडवों का युद्ध देखेंगे और जो सेना हारने लगेगी में उसका साथ दुंगा। लेकिन भगवान् कृष्ण भी डर गए कि इस तरह अगर इन्होने कोरवों का साथ दे दिया तो पाण्डव जीत नहीं पायेंगे। कृष्ण जी ने एक शर्त लगा कर इन्हे हरा दिया और बदले में इनका सिर मांग लिया। लेकिन कमरुनाग जी ने एक खवाइश जाहिर की कि वे महाभारत का युद्ध देखेंगे। इसलिए भगवान् कृष्ण ने इनके काटे हुए सिर को हिमालय के एक उंचे शिखर पर पहुंचा दिया। लेकिन जिस तर्फ इनका सिर घूमता वह सेना जीत की ओर बढ्ने लगती। तब भगवान कृष्ण जी ने सिर को एक पत्थर से बाँध कर इन्हे पांडवों की तरफ घुमा दिया। इन्हें पानी की दिक्कत न हो इसलिए भीम ने यहाँ अपनी हथेली को गाड कर एक झील बना दी।

यह भी कहा जाता है कि इस झील में सोना चांदी चडाते से मन्नत पुरी होती है। लोग अपने शरीर का कोई भी गहना यहाँ चडा देते हैं। झील पैसों से भरी रहती है, ये सोना – चांदी कभी भी झील से निकाला नहीं जाता क्योंकि ये देवतायों का होता है। ये भी मान्यता है कि ये झील सीधे पाताल तक जाती है। इस में देवतायों का खजाना छिपा है। हर साल जून महीने में 14 और 15 जून को बाबा भक्तों को दर्शन देते हैं। झील घने जंगल में है और इन् दिनों के बाद यहाँ कोई भी पुजारी नहीं होता। यहाँ बर्फ भी पड जाती है।
यहाँ से कोई भी इस खज़ाने को चुरा नही सकता। क्योंकि माना जाता है कि कमरुनाग के खामोश प्रहरी इसकी रक्षा करते हैं। एक नाग की तरह दिखने बाला पेड इस पहाड के चारों ओर है। जिसके बारे मे कहते हैं कि ये नाग देवता अपने असली रुप में आ जाता है। अगर कोई इस झील के खजाने को हाथ भी लगाए।

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कामाख्या मंदिर – सबसे पुराना शक्तिपीठ – यहाँ होती हैं योनि कि पूजा, लगता है तांत्रिकों व अघोरियों का मेला


कामाख्या मंदिर – सबसे पुराना शक्तिपीठ – यहाँ होती हैं योनि कि पूजा, लगता है तांत्रिकों व अघोरियों का मेला

कामाख्या मंदिर असम के गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पहाड़ी पर स्थित है। यह मंदिर देवी कामाख्या को समर्पित है। कामाख्या शक्तिपीठ 52 शक्तिपीठों में से एक है तथा यह सबसे पुराना शक्तिपीठ है। जब सती  के  पिता  दक्ष  ने  अपनी पुत्री सती और उस के पति शंकर को  यज्ञ में अपमानित किया और शिव जी को अपशब्द  कहे तो सती ने दुःखी हो कर आत्म-दहन कर लिया। शंकर  ने सती कि  मॄत-देह को उठा कर संहारक नृत्य किया। तब सती के  शरीर  के 51 हिस्से अलग-अलग जगह पर गिरे जो 51 शक्ति पीठ कहलाये। कहा जाता है सती का योनिभाग कामाख्या में गिरा। उसी  स्थल पर कामाख्या  मन्दिर का निर्माण किया गया।

Kamakhya Temple - The Oldest Shakti Peeth

इस मंदिर के गर्भ गृह में योनि के आकार का एक कुंड  है जिसमे से जल निकलता रहता है। यह योनि कुंड कहलाता है।  यह योनिकुंड  लाल कपडे व फूलो से ढका रहता है।

Kamakhya Temple - The Oldest Shakti Peeth

इस मंदिर में प्रतिवर्ष अम्बुबाची मेले का आयोजन किया जाता है। इसमें देश भर के तांत्रिक और अघौरी हिस्‍सा लेते हैं।  ऐसी मान्यता है कि ‘अम्बुबाची मेले’ के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं, और इन तीन दिन में योनि  कुंड से जल प्रवाह कि जगह रक्त प्रवाह होता है । ‘अम्बुबाची मेले को कामरूपों का कुंभ कहा जाता है।
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Kamakhya Temple - The Oldest Shakti Peeth

मां कामाख्या देवी की रोजाना पूजा के अलावा भी साल में कई बार कुछ विशेष पूजा का आयोजन होता है। इनमें पोहन बिया, दुर्गाडियूल, वसंती पूजा, मडानडियूल, अम्बूवाकी और मनसा दुर्गा पूजा प्रमुख हैं।

दुर्गा पूजा: –  हर साल सितम्बर-अक्टूबर के महीने में नवरात्रि के दौरान इस पूजा का आयोजन किया जाता है।

अम्बुबाची पूजा: – ऐसी मान्यता है कि अम्बुबाची पर्व के दौरान माँ कामाख्या रजस्वला होती है इसलिए  तीन दिन के लिए मंदिर बंद कर दिया जाता है। चौथे दिन जब मंदिर खुलता है तो इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
Mahatma Gandhi Temple in Sambalpur Orissa

Kamakhya Temple - The Oldest Shakti Peeth

पोहन बिया: –  पूसा मास के दौरान भगवान कमेस्शवरा और कामेशवरी की बीच प्रतीकात्मक शादी के रूप में यह पूजा की जाती है

दुर्गाडियूल पूजा: –  फाल्गुन के महीने में यह पूजा कामाख्या में की जाती है।

वसंती पूजा: –  यह पूजा चैत्र के महीने में कामाख्या मंदिर में आयोजित की जाती है।

मडानडियूल पूजा: –  चेत्र महीने में भगवान कामदेव और कामेश्वरा के लिए यह विशेष पूजा की जाती है।
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Kamakhya Temple - The Oldest Shakti Peeth

कामाख्या से जुडी किवदंती (Story of Kamakhya Devi) : –
कामाख्या के शोधार्थी एवं प्राच्य विद्या विशेषज्ञ डॉ. दिवाकर शर्मा कहते हैं कि कामाख्या के बारे में किंवदंती है कि घमंड में चूर असुरराज नरकासुर एक दिन मां भगवती कामाख्या को अपनी पत्नी के रूप में पाने का दुराग्रह कर बैठा था। कामाख्या महामाया ने नरकासुर की मृत्यु को निकट मानकर उससे कहा कि यदि तुम इसी रात में नील पर्वत पर चारों तरफ पत्थरों के चार सोपान पथों का निर्माण कर दो एवं कामाख्या मंदिर के साथ एक विश्राम-गृह बनवा दो, तो मैं तुम्हारी इच्छानुसार पत्नी बन जाऊँगी और यदि तुम ऐसा न कर पाये तो तुम्हारी मौत निश्चित है। गर्व में चूर असुर ने पथों के चारों सोपान प्रभात होने से पूर्व पूर्ण कर दिये और विश्राम कक्ष का निर्माण कर ही रहा था कि महामाया के एक मायावी कुक्कुट (मुर्गे) द्वारा रात्रि समाप्ति की सूचना दी गयी, जिससे नरकासुर ने क्रोधित होकर मुर्गे का पीछा किया और ब्रह्मपुत्र के दूसरे छोर पर जाकर उसका वध कर डाला। यह स्थान आज भी `कुक्टाचकि’ के नाम से विख्यात है। बाद में मां भगवती की माया से भगवान विष्णु ने नरकासुर असुर का वध कर दिया।

कामाख्या के दर्शन से पूर्व महाभैरव उमानंद, जो कि गुवाहाटी शहर के निकट ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भाग में टापू के ऊपर स्थित है, का दर्शन करना आवश्यक है। इस टापू को मध्यांचल पर्वत के नाम से भी जाना जाता है,
क्योंकि यहीं पर समाधिस्थ सदाशिव को कामदेव ने कामबाण मारकर आहत किया था और समाधि से जाग्रत होने पर सदाशिव ने उसे भस्म कर दिया था।

Ambubachi Mela At Kamakhya Temple
इस पुरे मंदिर परिसर में कामाख्या देवी के मुख्य मंदिर के अलावा और भी कई मंदिर है इनमे से अधिकतर मंदिर देवी के विभिन्न स्वरूपों के है। पांच मंदिर भगवान शिव के और तीन मंदिर भगवान विष्णु के है।
यह मंदिर कई बार टुटा और बना है आखरी बार इसे 16 वि सदी में नष्ट किया गया था जिसका पुनः निर्माण 17 वी सदी में राजा नर नारायण द्वारा किया गया।
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स्वप्न ज्योतिष के अनुसार नींद में दिखाई देने वाले हर सपने का एक ख़ास संकेत होता है, एक ख़ास फल होता है। यहाँ हम आपको 251 सपनो के स्वपन ज्योतिष के अनुसार संभावित फल बता रहे है।


स्वप्न फल ज्योतिष – जानिए 251 सपनों के फल

Swapna Phal Jyotish Hindi

स्वप्न ज्योतिष के अनुसार नींद में दिखाई देने वाले हर सपने का एक ख़ास संकेत होता है, एक ख़ास फल होता है।  यहाँ हम आपको 251 सपनो के स्वपन ज्योतिष के अनुसार संभावित फल बता रहे है।

सपने                                     फल

1- आंखों में काजल लगाना- शारीरिक कष्ट होना

2- स्वयं के कटे हाथ देखना- किसी निकट परिजन की मृत्यु

3- सूखा हुआ बगीचा देखना- कष्टों की प्राप्ति

4- मोटा बैल देखना- अनाज सस्ता होगा

5- पतला बैल देखना – अनाज महंगा होगा

6- भेडिय़ा देखना- दुश्मन से भय

7- राजनेता की मृत्यु देखना- देश में समस्या होना

8- पहाड़ हिलते हुए देखना- किसी बीमारी का प्रकोप होना

9- पूरी खाना- प्रसन्नता का समाचार मिलना

10- तांबा देखना- गुप्त रहस्य पता लगना

11- पलंग पर सोना- गौरव की प्राप्ति

12- थूक देखना- परेशानी में पडऩा

13- हरा-भरा जंगल देखना- प्रसन्नता मिलेगी

14- स्वयं को उड़ते हुए देखना- किसी मुसीबत से छुटकारा

15- छोटा जूता पहनना- किसी स्त्री से झगड़ा

16- स्त्री से मैथुन करना- धन की प्राप्ति

17- किसी से लड़ाई करना- प्रसन्नता प्राप्त होना

18- लड़ाई में मारे जाना- राज प्राप्ति के योग

19- चंद्रमा को टूटते हुए देखना- कोई समस्या आना

20- चंद्रग्रहण देखना- रोग होना

21- चींटी देखना- किसी समस्या में पढऩा

22- चक्की देखना- शत्रुओं से हानि

23- दांत टूटते हुए देखना- समस्याओं में वृद्धि

24- खुला दरवाजा देखना- किसी व्यक्ति से मित्रता होगी

25- बंद दरवाजा देखना- धन की हानि होना

26- खाई देखना- धन और प्रसिद्धि की प्राप्ति

27- धुआं देखना- व्यापार में हानि

28- भूकंप देखना- संतान को कष्ट

29- सुराही देखना- बुरी संगति से हानि

30- चश्मा लगाना- ज्ञान बढऩा

31- दीपक जलाना- नए अवसरों की प्राप्ति

32- आसमान में बिजली देखना- कार्य-व्यवसाय में स्थिरता

33- मांस देखना- आकस्मिक धन लाभ

34- विदाई समारोह देखना- धन-संपदा में वृद्धि

35- टूटा हुआ छप्पर देखना- गड़े धन की प्राप्ति के योग

36- पूजा-पाठ करते देखना- समस्याओं का अंत

37- शिशु को चलते देखना- रुके हुए धन की प्राप्ति

38- फल की गुठली देखना- शीघ्र धन लाभ के योग

39- दस्ताने दिखाई देना- अचानक धन लाभ

40- शेरों का जोड़ा देखना- दांपत्य जीवन में अनुकूलता

41- मैना देखना- उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति

42- सफेद कबूतर देखना- शत्रु से मित्रता होना

43- बिल्लियों को लड़ते देखना- मित्र से झगड़ा

44- सफेद बिल्ली देखना- धन की हानि

45- मधुमक्खी देखना- मित्रों से प्रेम बढऩा

46- खच्चर दिखाई देना- धन संबंधी समस्या

47- रोता हुआ सियार देखना- दुर्घटना की आशंका

48- समाधि देखना- सौभाग्य की प्राप्ति

49- गोबर दिखाई देना- पशुओं के व्यापार में लाभ

50- चूड़ी दिखाई देना- सौभाग्य में वृद्धि

51- दियासलाई जलाना- धन की प्राप्ति

52- सीना या आंख खुजाना- धन लाभ

53- सूखा जंगल देखना- परेशानी होना

54- मुर्दा देखना- बीमारी दूर होना

55- आभूषण देखना- कोई कार्य पूर्ण होना

56- जामुन खाना- कोई समस्या दूर होना

57- जुआ खेलना- व्यापार में लाभ

58- धन उधार देना- अत्यधिक धन की प्राप्ति

59- चंद्रमा देखना- सम्मान मिलना

60- चील देखना- शत्रुओं से हानि

61- स्वयं को दिवालिया घोषित करना- व्यवसाय चौपट होना

62- चिडिय़ा को रोते देखता- धन-संपत्ति नष्ट होना

63- चावल देखना- किसी से शत्रुता समाप्त होना

64- चांदी देखना- धन लाभ होना

65- दलदल देखना- चिंताएं बढऩा

66- कैंची देखना- घर में कलह होना

67- सुपारी देखना- रोग से मुक्ति

68- लाठी देखना- यश बढऩा

69- खाली बैलगाड़ी देखना- नुकसान होना

70- खेत में पके गेहूं देखना- धन लाभ होना

71- फल-फूल खाना- धन लाभ होना

72- सोना मिलना- धन हानि होना

73- शरीर का कोई अंग कटा हुआ देखना- किसी परिजन की मृत्यु के योग

74- कौआ देखना- किसी की मृत्यु का समाचार मिलना

75- धुआं देखना- व्यापार में हानि

76- चश्मा लगाना- ज्ञान में बढ़ोत्तरी

77- भूकंप देखना- संतान को कष्ट

78- रोटी खाना- धन लाभ और राजयोग

79- पेड़ से गिरता हुआ देखना- किसी रोग से मृत्यु होना

80- श्मशान में शराब पीना- शीघ्र मृत्यु होना

81- रुई देखना- निरोग होने के योग

82- कुत्ता देखना- पुराने मित्र से मिलन

83- सफेद फूल देखना- किसी समस्या से छुटकारा

84- उल्लू देखना- धन हानि होना

85- सफेद सांप काटना- धन प्राप्ति

86- लाल फूल देखना- भाग्य चमकना

87- नदी का पानी पीना- सरकार से लाभ

88- धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना- यश में वृद्धि व पदोन्नति

89- कोयला देखना- व्यर्थ विवाद में फंसना

90- जमीन पर बिस्तर लगाना- दीर्घायु और सुख में वृद्धि

91- घर बनाना- प्रसिद्धि मिलना

92- घोड़ा देखना- संकट दूर होना

93- घास का मैदान देखना- धन लाभ के योग

94- दीवार में कील ठोकना- किसी बुजुर्ग व्यक्ति से लाभ

95- दीवार देखना- सम्मान बढऩा

96- बाजार देखना- दरिद्रता दूर होना

97- मृत व्यक्ति को पुकारना- विपत्ति एवं दु:ख मिलना

98- मृत व्यक्ति से बात करना- मनचाही इच्छा पूरी होना

99- मोती देखना- पुत्री प्राप्ति

100- लोमड़ी देखना- किसी घनिष्ट व्यक्ति से धोखा मिलना

101- अनार देखना- धन प्राप्ति के योग

102- गड़ा धन दिखाना- अचानक धन लाभ

103- सूखा अन्न खाना- परेशानी बढऩा

104- अर्थी देखना- बीमारी से छुटकारा

105- झरना देखना- दु:खों का अंत होना

106- बिजली गिरना- संकट में फंसना

107- चादर देखना- बदनामी के योग

108- जलता हुआ दीया देखना- आयु में वृद्धि

109- धूप देखना- पदोन्नति और धनलाभ

110- रत्न देखना- व्यय एवं दु:ख

111- चेक लिखकर देना- विरासत में धन मिलना

112- कुएं में पानी देखना- धन लाभ

113- आकाश देखना    – पुत्र प्राप्ति

114- अस्त्र-शस्त्र देखना- मुकद्में में हार

115- इंद्रधनुष देखना – उत्तम स्वास्थ्य

116- कब्रिस्तान देखना- समाज में प्रतिष्ठा

117- कमल का फूल देखना- रोग से छुटकारा

118- सुंदर स्त्री देखना- प्रेम में सफलता

119- चूड़ी देखना- सौभाग्य में वृद्धि

120- कुआं देखना- सम्मान बढऩा

121- गुरु दिखाई देना – सफलता मिलना

122- गोबर देखना- पशुओं के व्यापार में लाभ

123- देवी के दर्शन करना- रोग से मुक्ति

124- चाबुक दिखाई देना- झगड़ा होना

125- चुनरी दिखाई देना- सौभाग्य की प्राप्ति

126- छुरी दिखना- संकट से मुक्ति

127- बालक दिखाई देना- संतान की वृद्धि

128- बाढ़ देखना- व्यापार में हानि

129- जाल देखना- मुकद्में में हानि

130- जेब काटना- व्यापार में घाटा

131- चंदन देखना- शुभ समाचार मिलना

132- जटाधारी साधु देखना- अच्छे समय की शुरुआत

133- स्वयं की मां को देखना- सम्मान की प्राप्ति

134- फूलमाला दिखाई देना- निंदा होना

135- जुगनू देखना- बुरे समय की शुरुआत

136- टिड्डी दल देखना- व्यापार में हानि

137- डाकघर देखना    – व्यापार में उन्नति

138- डॉक्टर को देखना- स्वास्थ्य संबंधी समस्या

139- ढोल दिखाई देना- किसी दुर्घटना की आशंका

140- सांप दिखाई देना- धन लाभ

141- तपस्वी दिखाई देना- दान करना

142- तर्पण करते हुए देखना- परिवार में किसी बुुजुर्ग की मृत्यु

143- डाकिया देखना – दूर के रिश्तेदार से मिलना

144- तमाचा मारना- शत्रु पर विजय

145- उत्सव मनाते हुए देखना- शोक होना

146- दवात दिखाई देना- धन आगमन

147- नक्शा देखना- किसी योजना में सफलता

148- नमक देखना- स्वास्थ्य में लाभ

149- कोर्ट-कचहरी देखना- विवाद में पडऩा

150- पगडंडी देखना- समस्याओं का निराकरण

151- त्रिशूल देखना- शत्रुओं से मुक्ति

152- तारामंडल देखना- सौभाग्य की वृद्धि

153- ताश देखना- समस्या में वृद्धि

154- तीर दिखाई देना- लक्ष्य की ओर बढऩा

155- सूखी घास देखना- जीवन में समस्या

156- भगवान शिव को देखना- विपत्तियों का नाश

157- किसी रिश्तेदार को देखना- उत्तम समय की शुरुआत

158- दंपत्ति को देखना- दांपत्य जीवन में अनुकूलता

159- शत्रु देखना- उत्तम धनलाभ

160- दूध देखना- आर्थिक उन्नति

161- मंदिर देखना- धार्मिक कार्य में सहयोग करना

162- नदी देखना- सौभाग्य वृद्धि

163- नाच-गाना देखना- अशुभ समाचार मिलने के योग

164- नीलगाय देखना- भौतिक सुखों की प्राप्ति

165- नेवला देखना- शत्रुभय से मुक्ति

166- पगड़ी देखना- मान-सम्मान में वृद्धि

167- पूजा होते हुए देखना- किसी योजना का लाभ मिलना

168- फकीर को देखना- अत्यधिक शुभ फल

169- गाय का बछड़ा देखना- कोई अच्छी घटना होना

170- वसंत ऋतु देखना- सौभाग्य में वृद्धि

171- बिल्वपत्र देखना- धन-धान्य में वृद्धि

172- स्वयं की बहन देखना- परिजनों में प्रेम बढऩा

173- भाई को देखना- नए मित्र बनना

174- भीख मांगना- धन हानि होना

175- शहद देखना- जीवन में अनुकूलता

176- स्वयं की मृत्यु देखना- भयंकर रोग से मुक्ति

177- रुद्राक्ष देखना- शुभ समाचार मिलना

178- पैसा दिखाई देना- धन लाभ

179- स्वर्ग देखना- भौतिक सुखों में वृद्धि

180- पत्नी को देखना- दांपत्य में प्रेम बढऩा

181- स्वस्तिक दिखाई देना- धन लाभ होना

182- हथकड़ी दिखाई देना- भविष्य में भारी संकट

183- मां सरस्वती के दर्शन- बुद्धि में वृद्धि

184- कबूतर दिखाई देना- रोग से छुटकारा

185- कोयल देखना- उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति

186- अजगर दिखाई देना- व्यापार में हानि

187- कौआ दिखाई देना- बुरी सूचना मिलना

188- छिपकली दिखाई देना- घर में चोरी होना

189- चिडिय़ा दिखाई देना- नौकरी में पदोन्नति

190- तोता दिखाई देना- सौभाग्य में वृद्धि

191- भोजन की थाली देखना- धनहानि के योग

192- इलाइची देखना – मान-सम्मान की प्राप्ति

193- खाली थाली देखना- धन प्राप्ति के योग

194- गुड़ खाते हुए देखना- अच्छा समय आने के संकेत

195- शेर दिखाई देना- शत्रुओं पर विजय

196- हाथी दिखाई देना- ऐेश्वर्य की प्राप्ति

197- कन्या को घर में आते देखना- मां लक्ष्मी की कृपा मिलना

198- सफेद बिल्ली देखना- धन की हानि

199- दूध देती भैंस देखना- उत्तम अन्न लाभ के योग

200- चोंच वाला पक्षी देखना- व्यवसाय में लाभ

201- अंगूठी पहनना- सुंदर स्त्री प्राप्त करना

202- आकाश में उडऩा- लंबी यात्रा करना

203- आकाश से गिरना- संकट में फंसना

204- आम खाना- धन प्राप्त होना

205- अनार का रस पीना- प्रचुर धन प्राप्त होना

206- ऊँट को देखना- धन लाभ

207- ऊँट की सवारी- रोगग्रस्त होना

208- सूर्य देखना- खास व्यक्ति से मुलाकात

209- आकाश में बादल देखना- जल्दी तरक्की होना

210- घोड़े पर चढऩा- व्यापार में उन्नति होना

211- घोड़े से गिरना- व्यापार में हानि होना

212- आंधी-तूफान देखना- यात्रा में कष्ट होना

213- दर्पण में चेहरा देखना- किसी स्त्री से प्रेम बढऩा

214- ऊँचाई से गिरना- परेशानी आना

215- बगीचा देखना- खुश होना

216- बारिश होते देखना- घर में अनाज की कमी

217- सिर के कटे बाल देखना- कर्ज से छुटकारा

218- बर्फ देखना- मौसमी बीमारी होना

219- बांसुरी बजाना- परेशान होना

220- स्वयं को बीमार देखना- जीवन में कष्ट

221- बाल बिखरे हुए देखना- धन की हानि

222- सुअर देखना- शत्रुता और स्वास्थ्य संबंधी समस्या

223- बिस्तर देखना- धनलाभ और दीर्घायु होना

224- बुलबुल देखना- विद्वान व्यक्ति से मुलाकात

225- भैंस देखना- किसी मुसीबत में फंसना

226- बादाम खाना- धन की प्राप्ति

227- अंडे खाना- पुत्र प्राप्ति

228- स्वयं के सफेद बाल देखना- आयु बढ़ेगी

229- बिच्छू देखना- प्रतिष्ठा प्राप्त होगी

230- पहाड़ पर चढऩा- उन्नति मिलेगी

231- फूल देखना- प्रेमी से मिलन

232- शरीर पर गंदगी लगाना- धन प्राप्ति के योग

233- पिंजरा देखना- कैद होने के योग

234- पुल पर चलना- समाज हित में कार्य करना

235- प्यास लगना- लोभ बढऩा

236- पान खाना- सुंदर स्त्री की प्राप्ति

237- पानी में डूबना- अच्छा कार्य करना

238- तलवार देखना- शत्रु पर विजय

239- हरी सब्जी देखना- प्रसन्न होना

240- तेल पीना- किसी भयंकर रोग की आशंका

241- तिल खाना- दोष लगना

242- तोप देखना- शत्रु नष्ट होना

243- तीर चलाना- इच्छा पूर्ण होना

244- तीतर देखना- सम्मान में वृद्धि

245- स्वयं को हंसते हुए देखना- किसी से विवाद होना

246- स्वयं को रोते हुए देखना- प्रसन्नता प्राप्त होना

247- तरबूज खाते हुए देखना- किसी से दुश्मनी होगी

248- तालाब में नहाना- शत्रु से हानि

249- जहाज देखना- दूर की यात्रा होगी

250- झंडा देखना- धर्म में आस्था बढ़ेगी

251- धनवान व्यक्ति देखना- धन प्राप्ति के योग

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भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) – भोपाल – यहाँ है एक ही पत्थर से निर्मित विशव का सबसे बड़ा शिवलिंग (World’s tallest shivlinga made by one rock)


भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) – भोपाल – यहाँ है एक ही पत्थर से निर्मित विशव का सबसे बड़ा शिवलिंग (World’s tallest shivlinga made by one rock)

भोजपुर (Bhojpur), मध्य प्रदेश कि राजधानी भोपाल से 32 किलो मीटर दूर स्तिथ है। भोजपुर से लगती हुई पहाड़ी पर एक विशाल, अधूरा शिव मंदिर हैं। यह भोजपुर शिव मंदिर (Bhojpur Shiv Temple) या भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) के नाम से प्रसिद्ध हैं।  भोजपुर तथा इस शिव मंदिर का निर्माण परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज (1010 ई – 1055 ई ) द्वारा किया गया था। इस मंदिर  कि अपनी कई विशेषताएं हैं।

इस मंदिर कि पहली विशेषता इसका विशाल शिवलिंग हैं जो कि विशव का एक ही पत्थर से निर्मित सबसे बड़ा शिवलिंग (World’s Tallest Shiv Linga) हैं।  सम्पूर्ण शिवलिंग कि लम्बाई 5.5 मीटर (18 फीट ), व्यास 2.3 मीटर (7.5 फीट ), तथा केवल लिंग कि लम्बाई 3.85 मीटर (12 फीट ) है।

World's tallest shivling at Bhojpur Shiv mandir
Shivlinga at Bhojpur Shiv Temple

दूसरी विशेषता भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) के पीछे के भाग में बना ढलान हैजिसका उपयोग निर्माणाधीन मंदिर के समय विशाल पत्थरों को ढोने  के लिए किया गया था। पूरे विश्व में कहीं भी अवयवों को संर चना के ऊपर तक पहुंचाने के लिए ऐसी प्राचीन भव्य निर्माण तकनीक उपलब्ध नहीं है। ये एक प्रमाण के तौर पर हैजिससे ये रहस्य खुल गया कि आखिर कैसे 70 टन भार वाले विशाल पत्थरों का मंदिर क शीर्ष तक पहुचाया गया।


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Earthen ramp behind the temple at Bhojpur
Earthen ramp behind the temple at Bhojpur

भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) कि तीसरी विशेषता इसका अधूरा निर्माण हैं।  इसका निर्माण अधूरा क्यों रखा गया इस बात का इतिहास में कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं है पर ऐसा कहा जाता है कि यह मंदिर एक ही रात में निर्मित होना था परन्तु छत का काम पूरा होने के पहले ही सुबह हो गई, इसलिए काम अधूरा रह गया।

Bhojpur Shiv Temple
Bhojpur Shiv Temple

चौथी विशेषता भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) कि गुम्बदाकार छत हैं।चुकी इस मंदिर का निर्माण भारत में इस्लाम के आगमन के पहले हुआ था अतः इस  मंदिर के गर्भगृह के ऊपर बनी अधूरी गुम्बदाकार छत भारत में ही गुम्बद निर्माण के प्रचलन को प्रमाणित करती है। भले ही उनके निर्माण की तकनीक भिन्न हो। कुछ विद्धान इसे भारत में सबसे पहले गुम्बदीय छत वाली इमारत मानते हैं। इस मंदिर का दरवाजा भी किसी हिंदू इमारत के दरवाजों में सबसे बड़ा है।
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Bhojpur Shiv Temple
Bhojpur Shiv Temple

इस मंदिर की पांचवी विशेषता इसके 40 फीट ऊचाई वाले इसके चार स्तम्भ हैं। गर्भगृह की अधूरी बनी छत इन्हीं चार स्तंभों पर टिकी है।
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Shivlinga at Bhojpur Shiv Temple
Pillars of Temple

भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) कि एक अन्य विशेषता यह है कि इस मंदिर की तसरी विशेषता ये है कि इसके अतिरिक्त भूविन्याससतम्भशिखर कलश और चट्टानों की सतह पर आशुलेख की तरह उत्कीर्ण नहीं किए हुए हैं।

भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) के विस्तृत चबूतरे पर ही मंदिर के अन्य हिस्सों, मंडप, महामंडप तथा अंतराल बनाने की योजना थी।

ऐसा मंदिर के निकट के पत्थरों पर बने मंदिर- योजना से संबद्ध नक्शों से पता चलता है।
इस प्रसिद्घ स्थल में वर्ष में दो बार वार्षिक मेले का आयोजन किया जाता है जो मकर संक्रांति व महाशिवरात्रि पर्व के समय होता है। इस धार्मिक उत्सव में भाग लेने के लिए दूर दूर से लोग यहां पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर यहां तीन दिवसीय भोजपुर महोत्सव का भी आयोजन किया जाने लगा है।
Cave of Parvati (पार्वती कि गुफा )
भोजपुर शिव मंदिर(Bhojpur Shiv Temple) के बिलकुल सामने पश्चमी दिशा में एक गुफा हैं यह पारवती गुफा के नाम से जानी जाती हैं। इस गुफा में पुरातात्विक महत्तव कि अनेक मुर्तिया हैं।
Parvati cave at Bhojpur
Parvati cave at Bhojpur
Jain Temple of Bhojpur ( भोजपुर का जैन टेम्पल )
भोजपुर (Bhojpur) में एक अधूरा जैन मंदिर भी है।  इस मंदिर में भगवन शांतिनाथ कि 6 मीटर ऊंची मूर्ति हैं। दो अन्य मुर्तिया भगवान पार्शवनाथ व सुपारासनाथ कि हैं। इस मंदिर  में लगे एक शिलालेख पर राजा भोज का नाम लिखा है। यह शिलालेख एक मात्र Epigraphic Evidence हैं जो कि राजा भोज से सम्बंधित हैं।
Jain Temple of Bhojpur
Jain Temple of Bhojpur
इसी मंदिर परिसर में आचार्य माँटूंगा का समाधि स्थल  हैं जिन्होंने  Bhaktamara Stotra. लिखा था।

Jangamwadi math (वाराणसी) : जहा अपनों की मृत्यु पर शिवलिंग किये जाते हे दान

Mantunga Acharya Shrine at Bhojpur, Madhya Pradesh
Mantunga Acharya Shrine at Bhojpur, Madhya Pradesh
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पौराणिक कहानी – शिव पूजा में क्यों काम में नहीं लेते केतकी के फूल (केवड़े के पुष्प ) ?


पौराणिक कहानी – शिव पूजा में क्यों काम में नहीं लेते केतकी के फूल (केवड़े के पुष्प ) ?

हिन्दू धर्म में देवी – देवताओं के पूजन में सुगन्धित फूलो का बड़ा महत्व है, हम सभी देवी – देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पूजन में सुगंधित पुष्प काम में लेते है। पर क्या आपको पता है कि शिवजी कि पूजा में केतकी (केतकी संस्कृत का शब्द है हिंदी में इसे केवड़ा कहते है) के फूल का प्रयोग वर्जित है।  आखिर ऐसा क्यों है? इसके बारे में हमारे धर्म ग्रंथो में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है :-

Ketaki Flower Or Kewra Flower
Ketaki Flower Or Kewra Flower

एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट ज्योतिर्मय लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सर्वानुमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा, उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा।

Ketaki Pushap  Or Kewra Pushap
Ketaki Pushap  Or Kewra Pushap

अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग का छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्माजी भी सफल नहीं हुए, परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। केतकी के पुष्प ने भी ब्रह्माजी के इस झूठ में उनका साथ दिया।  ब्रह्माजी के असत्य कहने पर स्वयं भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की आलोचना की।

Shivling
Shivling

दोनों देवताओं ने महादेव की स्तुति की, तब शिवजी बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूँ। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है। शिव ने केतकी पुष्प को झूठा साक्ष्य देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि यह फूल मेरी पूजा में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसीलिए शिव के पूजन में कभी केतकी का पुष्प नहीं चढ़ाया जाता।

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पारिजात वृक्ष – किंटूर – छुने मात्र से मिट जाती है थकान – महाभारत काल से है संबध


पारिजात वृक्ष – किंटूर – छुने मात्र से मिट जाती है थकान – महाभारत काल से है संबध

वैसे तो पारिजात वृक्ष पुरे भारत में पाये जाते है, पर किंटूर में स्तिथ पारिजात वृक्ष अपने आप कई मायनों में अनूठा है तथा यह अपनी तरह का पुरे भारत में इकलौता पारिजात वृक्ष है। उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिला मुख्यालय से 38 किलोमीटर कि दूरी पर किंटूर गाँव है। इस जगह का नामकरण पाण्डवों कि माता कुन्ती के नाम पर हुआ है। यहाँ पर पाण्डवों ने माता कुन्ती के साथ अपना अज्ञातवास बिताया था। इसी किंटूर गाँव में भारत का एक मात्र पारिजात का पेड़ पाया जाता है। कहते है कि पारिजात के वृक्ष को छूने मात्र से सारी थकान मिट जाती है।

Parijaat Tree
पारिजात वृक्ष
पारिजात वृक्ष – एक परिचय (Parijat Tree- An Introduction) :-
आमतौर पर पारिजात वृक्ष 10 फीट  से 25 फीट तक ऊंचे होता है, पर  किंटूर में स्तिथ पारिजात वृक्ष लगभग 45 फीट ऊंचा और 50 फीट मोटा है। इस पारिजात वृक्ष कि सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह अपनी तरह का  इकलौता पारिजात वृक्ष है, क्योकि इस पारिजात वृक्ष पर बीज नहीं लगते है तथा इस पारिजात वृक्ष कि कलम बोने से भी दूसरा वृक्ष तैयार नहीं होता है। पारिजात वृक्ष  पर जून के आस पास बेहद खूबसूरत सफ़ेद रंग के फूल खिलते है। पारिजात के फूल केवल रात कि खिलते है और सुबह होते ही मुरझा जाते है।  इन फूलों का लक्ष्मी पूजन में विशेष महत्तव है। पर एक बात ध्यान रहे कि पारिजात वृक्ष के वे ही फूल पूजा में काम लिए जाते है जो वृक्ष से टूट कर गिर जाते है, वृक्ष से फूल तोड़ने कि मनाही है।
Parijaat Flower
पारिजात के फूल

पारिजात वृक्ष का वर्णन हरिवंश पुराण में भी आता है। हरिवंश पुराण में इसे कल्पवृक्ष कहा गया है जिसकी उतपत्ति समुन्द्र मंथन से हुई थी और जिसे इंद्र ने स्वर्गलोक में स्थपित कर दिया था। हरिवंश पुराण के अनुसार इसको छूने मात्र से ही देव नर्त्तकी उर्वशी कि थकान मिट जाती थी।

Parijat Flower
पारिजात के पुष्प
पारिजात वृक्ष कैसे पंहुचा किंटूर :-
एक बार देवऋषि नारद जब धरती पर श्री कृष्ण से मिलने आये तो अपने साथ पारिजात के सुन्दर पुष्प ले कर आये।  उन्होंने वे पुष्प श्री कृष्ण को भेट किये। श्री कृष्ण ने पुष्प साथ बैठी अपनी पत्नी रुक्मणि को दे दिए।  लेकिन जब  श्री कृष्ण कि दूसरी पत्नी सत्य भामा को पता चला कि स्वर्ग से आये पारिजात के सारे पुष्प श्री कृष्ण ने रुक्मणि को दे दिए तो उन्हें बहुत क्रोध आया और उन्होंने श्री कृष्ण के सामने जिद पकड़ ली कि उन्हें अपनी वाटिका के लिय  पारिजात वृक्ष चाहिए।  श्री कृष्ण के लाख समझाने पर भी सत्य भामा नहीं मानी।

पारिजात वृक्ष

अंततः सत्यभामा कि ज़िद के आगे झुकते हुए श्री कृष्ण ने अपने दूत को स्वर्ग पारिजात वृक्ष लाने के लिए भेजा पर इंद्र ने पारिजात वृक्ष देने से मना कर दिया।  दूत ने जब यह बात आकर श्री कृष्ण को बताई तो उन्होंने स्व्यं ही इंद्र पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को पराजित करके पारिजात वृक्ष को जीत लिया।  इससे रुष्ट होकर इंद्र ने पारिजात वृक्ष को फल से वंचित हो जाने का श्राप दे दिया और तभी से पारिजात वृक्ष फल विहीन हो गया। श्री कृष्ण ने पारिजात वृक्ष को ला कर सत्यभामा कि वाटिका में रोपित कर दिया , पर सत्यभामा को सबक सिखाने के लिया ऐसा कर दिया कि जब पारिजात वृक्ष पर पुष्प आते तो गिरते वो रुक्मणि कि वाटिका में।  और यही कारण है कि पारिजात के पुष्प वृक्ष के नीचे न गिरकर वृक्ष से दूर गिरते है। इस तरह पारिजात वृक्ष , स्वर्ग से पृथ्वी पर आ गया।

Parijaat Tree
पारिजात वृक्ष
इसके बाद जब पाण्डवों ने कंटूर में अज्ञातवास किया तो उन्होंने वहाँ माता कुन्ती के लिए भगवन शिव के एक मंदिर कि स्थापना कि जो कि अब कुन्तेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है।  कहते है कि माता कुन्ती पारिजात के पुष्पों से भगवान् शंकर कि पूजा अर्चना कर सके इसलिए पांडवों ने सत्यभामा कि वाटिका से पारिजात वृक्ष को लाकर यहाँ स्थापित कर दिया और तभी से पारिजात वृक्ष यहाँ पर है।

kunteshwar mahadev temple barabanki
कुन्तेश्वर महादेव मंदिर
Shivling at kunteshwar mahadev temple barabanki
कुन्तेश्वर महादेव मंदिर में शिवलिंग
एक अन्य मान्यता यह भी है कि ‘पारिजात’ नाम की एक राजकुमारी हुआ करती थी, जिसे भगवान सूर्य से प्रेम हो गया था। लेकिन अथक प्रयास करने पर भी भगवान सूर्य ने पारिजात के प्रेम कों स्वीकार नहीं किया, जिससे खिन्न होकर राजकुमारी पारिजात ने आत्महत्या कर ली। जिस स्थान पर पारिजात की क़ब्र बनी, वहीं से पारिजात नामक वृक्ष ने जन्म लिया।

पारिजात वृक्ष के ऐतिहासिक महत्तव व इसकी दुर्लभता को देखते हुए सरकार ने इसे संरक्षित घोषित कर दिया है। भारत सरकार ने इस पर एक डाक टिकट भी जारी किया है।

Stamp on Parijaat Tree
पारिजात वृक्ष पर डाक टिकट
पारिजात वृक्ष के औषधीय गुण ( The medicinal properties of the  Paarijaat tree) :-
पारिजात को आयुर्वेद में हरसिंगार भी कहा जाता है। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है। इसके फूल हृदय के लिए भी उत्तम औषधी माने जाते हैं। वर्ष में एक माह पारिजात पर फूल आने पर यदि इन फूलों का या फिर फूलों के रस का सेवन किया जाए तो हृदय रोग से बचा जा सकता है। इतना ही नहीं पारिजात की पत्तियों को पीस कर शहद में मिलाकर सेवन करने से सूखी खाँसी ठीक हो जाती है। इसी तरह पारिजात की पत्तियों को पीसकर त्वचा पर लगाने से त्वचा संबंधि रोग ठीक हो जाते हैं। पारिजात की पत्तियों से बने हर्बल तेल का भी त्वचा रोगों में भरपूर इस्तेमाल किया जाता है। पारिजात की कोंपल को यदि पाँच काली मिर्च के साथ महिलाएँ सेवन करें तो महिलाओं को स्त्री रोग में लाभ मिलता है। वहीं पारिजात के बीज जहाँ बालों के लिए शीरप का काम करते हैं तो इसकी पत्तियों का जूस क्रोनिक बुखार को ठीक कर देता है।
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किराडू – राजस्थान का खजुराहो – 900 सालो से है वीरान


किराडू – राजस्थान का खजुराहो – 900 सालो से है वीरान

किराडू राजस्थान के बाड़मेर जिले में  स्थित है। किराडू अपने मंदिरों कि शिल्प कला के लिया विख्यात है। इन मंदिरों का निर्माण 11  वि शताब्दी में हुआ था।  किराडू को राजस्थान का खजुराहों भी कहा जाता है। लेकिन किराडू को खजुराहो जैसी ख्याति नहीं मिल पाई क्योकि यह जगह पिछले 900 सालों से वीरान है और आज भी यहाँ पर दिन में कुछ चहल – पहल रहती है पर शाम होते ही यह जगह वीरान हो जाती है , सूर्यास्त के बाद यहाँ पर कोई भी नहीं रुकता है। राजस्थान के इतिहासकारों के अनुसार किराडू शहर अपने समय में सुख सुविधाओं से युक्त एक विकसित प्रदेश था।  दूसरे प्रदेशों के लोग यहाँ पर व्यपार करने आते थे। लेकिन 12  वि शताब्दी में, जब किराडू पर परमार वंश का राज था , यह शहर वीरान हो जाता है।  आखिर ऐसा क्यों होता है, इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो इतिहास में उपलब्ध नहीं है पर इस को लेकर एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है।

किराडू पर है एक साधू का श्राप :-
कहते हैं इस शहर पर एक साधु का श्राप लगा हुआ है। करीब 900साल पहले परमार राजवंश यहां राज करता था। उन दिनों इस शहर में एक ज्ञानी साधु भी रहने आए थे। यहां पर कुछ दिन बिताने के बाद साधु देश भ्रमण पर निकले तो उन्होंने अपने साथियों को स्थानीय लोगों के सहारे छोड़ दिया।

एक दिन सारे शिष्य बीमार पड़ गए और बस एक कुम्हारिन को छोड़कर अन्य किसी भी व्यक्ति ने उनकी देखभाल नहीं की। साधु जब वापिस आए तो उन्हें यह सब देखकर बहुत क्रोध आया। साधु ने कहा कि जिस स्थान पर दया भाव ही नहीं है वहां मानवजाति को भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने संपूर्ण नगरवासियों को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। जिस कुम्हारिन ने उनके शिष्यों की सेवा की थी, साधु ने उसे शाम होने से पहले यहां से चले जाने को कहा और यह भी सचेत किया कि पीछे मुड़कर न देखे।
लेकिन कुछ दूर चलने के बाद कुम्हारिन ने पीछे मुड़कर देखा और वह भी पत्थर की बन गई। इस श्राप के बाद अगर शहर में शाम ढलने के पश्चात कोई रहता था तो  वह पत्थर का बन जाता था।  और यही कारण है कि यह शहर सूरज ढलने के साथ ही वीरान हो जाता है।

अब यह कहानी कितनी सही है और कितनी गलत इसका तो पता नहीं। कुछ इतिहासकारो का मत है कि किराडू मुगलों के आक्रमण के कारण वीरान हुए , लेकिन इस प्रदेश में मुगलों का आक्रमण 14 वि शताब्दी में हुआ था और किराडू 12  वि शताब्दी में ही  वीरान हो गया था इसलिए इसके वीरान  होने के पीछे कोई और ही कारण है।

किराडू के मंदिरों का निर्माण :-
किराडू के मंदिरों का निर्माण किसने कराया इसकी भी कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालाकि यहाँ पर 12 वि शताब्दी के तीन शिलालेख उपलब्ध है पर उन पर भी इनके निर्माण से सम्बंधित कोई जानकारी नहीं है। पहला शिलालेख विक्रम संवत 1209 माघ वदि 14 तदनुसार 24 जनवरी 1153 का  है जो कि गुजरात के चौलुक्य कुमार पाल के समय का है। दूसरा विक्रम संवत 1218, ईस्वी 1161 का है जिसमें परमार सिंधुराज से लेकर सोमेश्वर तक की वंशावली दी गई है और तीसरा यह विक्रम संवत 1235 का है जो गुजरात के चौलुक्य राजा भीमदेव द्वितीय के सामन्त चौहान मदन ब्रह्मदेव का है। इतिहासकारों का मत है कि किराडू के मंदिरों का निर्माण 11 वि शताब्दी में हुआ था तथा इनका निर्माण परमार वंश के राजा दुलशालराज और उनके वंशजो ने किया था।

किराडू में किसी समय पांच भव्य मंदिरों कि एक श्रंखला थी। पर 19 वि शताब्दी के प्रारम्भ में आये भूकम्प से इन मंदिरों को बहुत नुक्सान पहुंचा और दूसरा सदियों से वीरान रहने के कारण इनका ठीक से रख रखाव भी नहीं हो पाया। आज इन पांच मंदिरों में से केवल विष्णु मंदिर और सोमेश्वर मंदिर ही ठीक हालत में है।  सोमेश्वर मंदिर यहाँ का  सबसे बड़ा मंदिर है।  ऐसी मान्यता है कि विष्णु मंदिर से ही यहां के स्थापत्य कला की शुरुआत हुई थी और सोमेश्वर मंदिर को इस कला के उत्कर्ष का अंत माना जाता है।

किराडू के मंदिरों का शिल्प है अद्भुत : स्थापत्य कला के लिए मशहूर इन प्राचीन मंदिरों को देखकर ऐसा लगता है मानो शिल्प और सौंदर्य के किसी अचरज लोक में पहुंच गए हों। पत्थरों पर बनी कलाकृतियां अपनी अद्भुत और बेमिसाल अतीत की कहानियां कहती नजर आती हैं। खंडहरों में चारो ओर बने वास्तुशिल्प उस दौर के कारीगरों की कुशलता को पेश करती हैं।

नींव के पत्थर से लेकर छत के पत्थरों में कला का सौंदर्य पिरोया हुआ है। मंदिर के आलंबन में बने गजधर, अश्वधर और नरधर, नागपाश से समुद्र मंथन और स्वर्ण मृग का पीछा करते भगवान राम की बनी पत्थर की मूर्तियां ऐसे लगती हैं कि जैसे अभी बोल पड़ेगी। ऐसा लगता है मानो ये प्रतिमाएं शांत होकर भी आपको खुद के होने का एहसास करा रही है।

सोमेश्वर मंदिर भगवान् शिव को समर्पित है।  भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की बनावट दर्शनीय है। अनेक खम्भों पर टिका यह मंदिर भीतर से दक्षिण के मीनाक्षी मंदिर की याद दिलाता है, तो इसका बाहरी आवरण खजुराहो के मंदिर का अहसास कराता है। काले व नीले पत्थर पर हाथी- घोड़े व अन्य आकृतियों की नक्काशी मंदिर की सुन्दरता में चार चांद लगाती है। मंदिर के भीतरी भाग में बना भगवान शिव का मंडप भी बेहतरीन है।
किराडू शृंखला का दूसरा मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर सोमेश्वर मंदिर से छोटा है किन्तु स्थापत्य व कलात्मक दृष्टिï से काफी समृद्ध है। इसके अतिरिक्त किराडू के अन्य 3 मंदिर हालांकि खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन इनके दर्शन करना भी एक सुखद अनुभव है।

यदि सरकार और पुरातत्व विभाग किराडू के विकास पर ध्यान दे तो यह जगह एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकती है।

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राजा जगतपाल सिंह का शापित किला – एक शाप के कारण किला बन गया खंडहर


राजा जगतपाल सिंह का शापित किला – एक शाप के कारण किला बन गया खंडहर

झारखण्ड की राजधानी से 18 किलोमीटर की दुरी पर, रांची-पतरातू मार्ग के पिठौरिया गांव में 2 शताब्दी पुराना राजा जगतपाल सिंह का किला है।  किसी जमाने में 100 कमरो वाला विशाल महल अब खंडहर में तब्दील हो चुका है। इसके खंडहर में तब्दील का कारण इस किले पर हर साल बिजली गिरना है।  आश्चर्य जनक रूप से इस किले पर दशको से हर साल बिजली गिरती आ रही है जिससे की हर साल इसका कुछ हिस्सा टूट कर गिर जाता है। दशको से ऐसा होते रहने के कारण यह किला अब बिलकुल खंडहर हो चुका है। आप माने या ना माने लेकिन गांव वालो के अनुसार इस किले पर हर साल बिजली एक क्रांतिकारी द्वारा राजा जगतपाल सिंह को दिए गए श्राप के कारण गिरती है।  वैसे तो बिजली गिरना एक प्राकृति घटना है लेकिन एक ही जगह पर दशको से लगातार बिजली गिरना जरूर आश्चर्य की बात है।

Ruins of fort Jagt pal Singh
खंडहर हो चुके महल के अवशेष   All Images Credit Dr. Nitish Priyadarshi
कौन थे राजा जगतपाल सिंह :
इतिहासकारो के अनुसार पिठौरिया प्रारम्भ से ही मुंडा और नागवंशी राजाओ का प्रमुख केंद्र रहा है।  यह इलाका 1831-32 में हुए कौल विद्रोह के कारण इतिहास में अंकित है। पिठौरिया का राजा जगतपाल सिंह ने चहुमुखा विकास किया  उसे व्यापार और संस्कृति का प्रमुख केंद्र बनाया। वो क्षेत्र की जनता में काफी लोकप्रिय थे लेकिन उनकी कुछ गलतीयों ने उनका नाम इतिहास में खलनायको और गद्दारो की सूचि में शामिल करवा दिया।
Cursed fort of king Jagtpal singh - Ranchi
खंडहर हो चुके महल के अवशेष
क्या थी गलतीयां :
सबसे पहली गलती तो उन्होंने 1831 के विद्रोह के समय की। 1831 में सिंदराय और बिंदराय के नेतृत्व में आदिवासियों ने आंदोलन किया था लेकिन यहाँ की भौगोलिक परस्तिथियों से अनजान अंग्रेज़ विद्रोह को दबा नहीं पा रह थे। इसलिए अंग्रेज़ अधिकारी विलकिंगसन ने राजा जगतपाल सिंह के पास सहायता का सन्देश भिजवाया जिसे की जगतपाल सिंह ने स्वीकार करते हुए अंग्रेजो मदद की। उनकी इस मदद के बदले तत्कालीन गवर्नर जनरल विलियम वैंटिक ने उन्हें 313 रुपए प्रतिमाह आजीवन पेंशन दी। दूसरा और सबसे बड़ा गुनाह उन्होंने 1857 की क्रान्ति में किया।

Fort Jagt pal Singh Ranchi
खंडहर हो चुके महल के अवशेष
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारियों को रोकने के लिए उन्होंने पिठौरिया घाटी की घेराबंदी की थी,ताकि क्रांतिकारी अपने मकसद में सफल न हो सके। इतना ही नहीं वे क्रांतिकारियों की हर गतिविधियों की जानकारी अंग्रेज तक पहुंचाते थे। राजा के प्रति नाराजगी इस कदर व्याप्त थी उस समय क्रांतिकारी ठाकुर विश्वनाथ नाथ शाहदेव  उन्हें सबक सिखाने पिठौरिया पहुंचे और उन पर आक्रमण किया । बाद में वे गिरफ्तार हो गए और जगतपाल सिंह की गवाही के कारण उन्हें 16अप्रैल 1858 को रांची जिला स्कूल के सामने कदम्ब के वृक्ष पर फांसी पर लटका दिया गया। जानकार बताते है कि उनकी ही गवाही पर कई अन्य क्रांतिकारियों को भी फांसी पर लटकाने का काम किया गया।

Haunted fort of  Jagtpal Sing Rinch
खंडहर हो चुके महल के अवशेष
विशवनाथ ने दिया था श्राप :
लोगो की मान्यता है  कि विश्वनाथ शाहदेव ने जगतपाल सिंह को अंग्रेजों का साथ देने और देश के साथ गद्दारी करने पर यह शाप दिया कि आनेवाले समय में जगतपाल सिंह का कोई नामलेवा नहीं रहेगा और उसके किले पर हर साल उस समय तक वज्रपात होता रहेगा, जबतक यह किला पूरी तरह बर्बाद नहीं हो जाता।   तब से हर साल पिठोरिया स्थित जगतपाल सिंह के किले पर वज्रपात हो रहा है।  इस कारण यह किला खंडहर में तब्दील हो चुका है।
Ruins of the Historical fort
नक्काशीदार गेट
वैज्ञानिक बताते है दूसरे कारण :
वैज्ञानिक इस किले पर बिजली गिरने के दूसरे ही कारण बताते है उनके मुताबिक यहाँ मौजूद ऊँचे पेड़ और पहाड़ो में मौजूद लोह अयस्को की प्रचुरता दोनों मिलकर आसमानी बिजली को आकर्षित करने का एक बहुत ही सुगम माध्यम उपलब्ध कराती है जिस कारण बारिश के दिनों में यहाँ अक्सर वज्रपात होता रहता है।  लेकिन लोगो का सवाल यह है की यह किला जब दशको तक आबाद रहा तब क्यों नहीं बिजलियाँ गिरी जबकि उस वक़्त आज से ज्यादा पेड़ और लोह अयस्क था।
Pond constructed by King Jagtpal Singh
राजा जगत पाल सिंह के द्वारा बनवाया गया तालाब
मिलती है मुग़ल वास्तुकला की झलक :
राजा जगत पाल सिंह का यह दो मंजिला महल लगभग 30 एकड़ में फैला हुआ था जिसमे की 100 से ज्यादा कमरे थे। यह किला लाल रंग का था जो की पत्थरो, ईटो और चुने से बना था। इस महल की खासियत यह थी की इसमें मुगलकालीन वास्तुकला का प्रयोग किया गया था।  इसके अलावा उन्होंने रानियों के नहाने के लिए तालाब और पूजा के लिए एक शिव मंदिर भी बनवाया था।  तालाब तो अभी भी सही सलामत है पर मंदिर खंडहर हो चूका है।

Ruins of Shiv Temple at fort Jagtpal Singh
किला परिसर में बने शिव मंदिर के अवशेष  All Images Credit Dr. Nitish Priyadarshi
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पहाड़ी मंदिर – रांची – भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ राष्ट्रीय पर्वो पर फहराया जाता है तिरंगा


पहाड़ी मंदिर – रांची – भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ राष्ट्रीय पर्वो पर फहराया जाता है तिरंगा

रांची रेलवे स्टेशन से 7 किलो मीटर की दुरी पर ‘रांची हिल’ पर शिवजी का अति प्राचीन मंदिर स्थित है जिसे की पहाड़ी मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर धार्मिकता के साथ साथ देशभक्तो के बलिदान के लिए भी जाना जाता है।  यह मंदिर देश का इकलौता ऐसा मंदिर है जहाँ 15 अगस्त और 26 जनवरी को राष्ट्रीय ध्वज ‘तिरंगा’ शान से फहराया जाता है। यह परम्परा यहां पर 1947 से ही चली आ रही है।

Pahari Mandir (Temple) - Ranchi

देशभक्तो को यहां दी जाती थी फांसी :
पहाड़ी बाबा मंदिर का पुराना नाम टिरीबुरू था जो आगे चलकर ब्रिटिश हुकूमत के समय फाँसी टुंगरी में परिवर्तित हो गया क्योकि अंग्रेजो के राज़ में देश भक्तो और  क्रांतिकारियों को यहां फांसी पर लटकाया जाता था। आजादी के बाद रांची में पहला तिरंगा धवज यही पर फहराया गया था जिसे रांची के ही एक स्वतंत्रता सेनानी कृष्ण चन्द्र दास से फहराया था।  उन्होंने यहाँ पर शहीद हुए देश भक्तो की याद व सम्मान में  तिरंगा फहराया था तथा तभी से यह परम्परा बन गई की स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस को यहाँ पर तिरंगा फहराया जाता है। राष्ट्र ध्वज को धर्म ध्वज से ज्यादा सम्मान देते हुए उसे मदिर के ध्वज से ज्यादा ऊंचाई पर फहराया जाता है। पहाड़ी बाबा मंदिर में एक शिलालेख लगा है जिसमें 14 अगस्त, 1947 को देश की आजादी संबंधी घोषणा भी अंकित है।

Shilalekh at Pahari temple

मंदिर से दिखती है रांची शहर की मनोरम छवि :
यह मंदिर समुद्र तल से 2140 मीटर तथा धरातल से 350 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित है। मंदिर तक पहुँचाने के लिए 468 सीढ़ियां चढनी पड़ती है। मंदिर प्रांगण से पुरे रांची शहर का खुबसूरत नज़ारा दिखाई देता है।पर्यावरण प्रेमियों के लिए भी यह मंदिर महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरी पहाड़ी पर मंदिर परिसर के इर्द-गिर्द विभिन्न भाँति के हजार से अधिक वृक्ष हैं।   साथ ही यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त का अनुपम सौंदर्य भी देखा जा सकता है। पहाड़ी मंदिर में भगवान शिव की लिंग रूप में पूजा की जाती है।  शिवरात्रि तथा सावन के महीने में यहां शिव भक्तों की विशेष भीड़ रहती है।

पहाड़ी बाबा मंदिर परिसर में मुख्य रूप से सात मंदिर है

1. भगवान शिव मंदिर (Lord Shiva Temple) :

 Lord Shiva Temple - PAhari MAndir

2. महाकाल मंदिर ( Mahakaal Mandir) :

Mahakaal Mandir at Pahari Temple

3. काली मंदिर (Kali Mandir) :

Kali mandir at Pahari temple

4. विश्वनाथ मंदिर ( Vishwnath Mandir):

Vishawnath Mandir at Pahari temple

5. हनुमान मंदिर (Hanuman Mandir) :

Hanuman Temple at Pahari Temple

6. दुर्गा मंदिर (Durga Mandir) :

Durga Mandir at Pahari temple

7. नाग मंदिर (Naag Mandir) :

Naag Mandir at Pahari temple

पहाड़ी पर जितने भी मंदिर बने है उनमे नागराज का मंदिर सबसे प्राचीन है।  माना जाता है की छोटा नागपुर के नागवंशियों का इतिहास यही से शुरू हुआ है।
पहाड़ी के नीचे, जहां से की मंदिर की चढ़ाई शुरू होती है, एक झील है जिसे ‘रांची लेक’ कहते है इसका निर्माण 1842 में एक अंग्रेज़ कर्नल ओन्सेल ने करवाया था।  झील पर नहाने के लिए पक्के घाट बने हुए है जहाँ पर भक्त मंदिर की चढ़ाई शुरू करने से पहले स्नान करते है।

अधिकृत वेबसाइट (Official Website) http://www.paharimandirranchi.com

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Universe In Temple Designs Hindusim Angkor Vat


Universe In Temple Designs Hindusim Angkor Vat

Ramani's blog

What is in the Macrocosm is in the Microcosm.

What is seen or perceive in the Universe is with in the us.

The Universe and we are not different.

Angkor Vat Temple.jpg Angkor Vat Temple.

The principles in the making of the universe are within us and the Hindu temples keep this point in constructing them.

The Hindu Temples are built according to Vedic Principles of Cosmology and the physical structural guidelines are from the Vaasu Sasta and Agamas.

One would temples, including cave temple of Gavi Gangadhara temple in Bangalore, have the Sun’s Rays falling on the God’s idol on specific days.

Vishnu’s Mathsya temple also has these feature.

There are temples where the shadow of the idol falls at a specific pre marked space.

There are quite a few temples and  please check my posts under Hinduism.

We have the Sun temple at Konark where one can find Astronomy being used…

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