Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक भिखारी , एक सेठ के घर के बाहर खडा होक


एक भिखारी , एक सेठ के घर के बाहर खडा होकर भजन गा रहा था और बदले में खाने को रोटी मांग रहा था | सेठानी काफ़ी देर से उसको कह रही थी , रुको आ रही हूं | रोटी हाथ मे थी पर फ़िर भी कह रही थी की रुको आ रही हूं | भिखारी भजन गा रहा था और रोटी मांग रहा था |
सेठ ये सब देख रहा था , पर समझ नही पा रहा था , आखिर सेठानी से बोला – रोटी हाथ मे लेकर खडी हो, वो बाहर मांग रहा हैं , उसे कह रही हो आ रही हूं तो उसे रोटी क्यो नही दे रही हो ?
सेठानी बोली हां रोटी दुन्गी , पर क्या है ना की मुझे उसका भजन बहुत प्यारा लग रहा हैं , अगर उसको रोटी दुन्गी तो वो आगे चला जायेगा , मुझे उसका भजन और सुनना हैं

यदि प्रार्थना के बाद भी भगवान आपकी नही सुन रहा हैं तो समझना की उस सेठानी की तरह प्रभु को आपकी प्रार्थना प्यारी लग रही हैं इस लिये इंतज़ार कर और प्रार्थना करना

Posted in हिन्दू पतन

लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस सीरियल का ” पट लेखक (Script Writer ) एक कट्टर जिहादी विचार रखने वाला व्यक्ति है .


लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस सीरियल का ” पट लेखक (Script Writer ) एक कट्टर जिहादी विचार रखने वाला व्यक्ति है . जिसका नाम “नावेद असलम ” है .इसने “जामिया मिल्लिया इलामिया ” से सन 1989 में स्नातक की डिग्री ली थी . जामिया इस्लाम के कट्टरवादी और जिहादी विचारों का गढ़ माना जाता है .लोगों को याद होगा कि पहले महराणा प्रताप के बारे में एक सीरियल निकला था . जिसमे राणा को एक हिन्दू धर्म का रक्षक और अकबर को अत्याचारी बताया गया था .इसलिए लोगों के दिमाग से राणा की वह छवि मिटाने और अकबर को एक सेकुलर और सभी धर्मों का आदर करने वाला बादशाह साबित करने के लिए नावेद असलम ने मुल्लों के इशारे पर इस सीरियल की पटकथा लिखी है
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. इस्लाम के प्रारम्भ से लेकर आधुनिक काल तक मुसलमान जिहाद के लिए तलवार का प्रयोग किया करते थे .लेकिन विज्ञानं के इस वर्त्तमान काल में मुसलमानों ने जिहाद के लिए नए तरीके निकाल लिए हैं .जैसे “लव जिहाद ” और “ब्लोगिंग जिहाद ” सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिहाद के इन सभी नए तरीकों में अकसर भोली भाली हिन्दू लड़कियों या युवकों को निशाना बनाया जाता है . और इंटरनेट या टी .वी .सीरियल के माध्यम से इस्लाम के अत्याचारी रूप पर बुरका डालने की कोशिश की जाती , और हिन्दू धर्म में कमियां निकाल कर लोगों को इस्लाम के प्रति आकर्षण पैदा करने का प्रयत्न किया जाता है . अपनी इस कपटी योजना को सफल करने के लिए मक्कार मुसलमान एक तरकीब अपनाते हैं ,कि सबसे बड़े अत्याचारी ,अय्याश , हिन्दूविरोधी मुसलमान बादशाह को न्यायी ,धर्मनिरपेक्ष ,सदाचारी और दयालु साबित करने लगते हैं .इसका ताजा उदाहरण टी .वी सीरियल ” जोधा अकबर ” है . जिसे हिन्दू महिलाएं भी नियमित रूप से देखती हैं .जिस से उनका “ब्रेन वाश ” किया जा रहा है .

1-जोधा अकबर सीरियल
इस सीरियल का निर्माण और प्रदर्शन बालाजी टेली फिल्म्स के बैनर से एकता कपूर कर रही है . और 18 जून सन 2013 से यह सीरियल शनिवार और रविवार को छोड़कर रोज रात 8.30 पर जी टी .वी .पर दिखाया जा रहा है . लेकिन बहुत कम लोग जानते होंगे कि इस सीरियल का ” पट लेखक (Script Writer ) एक कट्टर जिहादी विचार रखने वाला व्यक्ति है . जिसका नाम “नावेद असलम ” है .इसने “जामिया मिल्लिया इलामिया ” से सन 1989 में स्नातक की डिग्री ली थी . जामिया इस्लाम के कट्टरवादी और जिहादी विचारों का गढ़ माना जाता है .लोगों को याद होगा कि पहले महराणा प्रताप के बारे में एक सीरियल निकला था . जिसमे राणा को एक हिन्दू धर्म का रक्षक और अकबर को अत्याचारी बताया गया था .इसलिए लोगों के दिमाग से राणा की वह छवि मिटाने और अकबर को एक सेकुलर और सभी धर्मों का आदर करने वाला बादशाह साबित करने के लिए नावेद असलम ने मुल्लों के इशारे पर इस सीरियल की पटकथा लिखी है . जो सरासर झूठ और निराधार है . यहाँ पर अकबर की असलियत के कुछ नमूने संक्षित में दिये जा रहे हैं .
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2-अकबर की पत्नियां और रखैलें
हकीकत यह है कि अकबर के सभी पूर्वज बाबर, हुमायूं, से लेकर तैमूर तक सब भारत में लूट, बलात्कार, धर्म परिवर्तन, मंदिर विध्वंस, आदि कामों में लगे रहे. वे कभी एक भारतीय नहीं थे और इसी तरह अकबर भी नहीं था. और इस पर भी हमारी हिंदू जाति अकबर को हिन्दुस्तान की शान समझती रही!

अकबर एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था ,इसने अपने नाम में मुहम्मद शब्द जोड़ लिया था . जिस से इसका पूरा नाम “जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर ” हो गया .और जैसे मुहम्मद साहब ने कई पत्नियाँ और रखैलें रखी थीं .लेकिन अकबर ने मुहम्मद साहब से कई गुना अधिक औरतें और रखेलें रख ली थीं , जिन्हें लौंडियाँ कहा जाता है .मुसलमान

अकबर की सिर्फ तीन औरतें बताते हैं ,1 .रुकैय्या बेगम , जो अकबर के फूफा बैरम खान की विधवा थी .2 .सलीमाँ बेगम जो अकबर की चचेरी बहिन थी .3 . लोग जोधा बाई को अकबर की तीसरी पत्नी बताते हैं .इसका असली नाम हीरा कुंवरी या रुक्मावती था , यह आम्बेर के राज भारमल की बड़ी बेटी थी .लोग इसी को जोधा कहते हैं .जोधा अकबर से आयु में बड़ी थी .और राजा मानसिंह की बहिन लगती थी ,जिसे अकबर ने अपने नवरत्नों में शामिल कर लिया था जोधा और अकबर की शादी जयपुर के पास साम्भर नाम की जगह 20 जनवरी सन 1562 को हुई थी .

वास्तव में राजा भारमल ने जोधा की डोली भेजी थी . जिसके बदले अकबर ने उसे मनसबदरी दी थी .लेकिन वास्तविकता कुछ और है ,

अबुल फज़ल ने अकबर के हरम को इस तरह वर्णित किया है- “अकबर के हरम में पांच हजार औरतें थीं और हर एक का अपना अलग घर था.” ये पांच हजार औरतें उसकी 36 पत्नियों से अलग थीं.आइन ए अकबरी में अबुल फजल ने लिखा है- “शहंशाह के महल के पास ही एक शराबखाना बनाया गया था. वहाँ इतनी वेश्याएं इकट्ठी हो गयीं कि उनकी गिनती करनी भी मुश्किल हो गयी. दरबारी नर्तकियों को अपने घर ले जाते थे. अगर कोई दरबारी किसी नयी लड़की को घर ले जाना चाहे तो उसको अकबर से आज्ञा लेनी पड़ती थी. कई बार जवान लोगों में लड़ाई झगडा भी हो जाता था. एक बार अकबर ने खुद कुछ वेश्याओं को बुलाया और उनसे पूछा कि उनसे सबसे पहले भोग किसने किया”रणथंभोर की संधि में अकबर महान की पहली शर्त यह थी कि राजपूत अपनी स्त्रियों की डोलियों को अकबर के शाही हरम के लिए रवाना कर दें यदि वे अपने सिपाही वापस चाहते हैं.ग्रीमन के अनुसार अकबर अपनी रखैलों को अपने दरबारियों में बाँट देता था. औरतों को एक वस्तु की तरह बांटना और खरीदना अकबर की की नीति थी .

विन्सेंट स्मिथ जैसे अकबर प्रेमी को भी यह बात माननी पड़ी कि चित्तौड़ पर हमले के पीछे केवल उसकी सब कुछ जीतने की हवस ही काम कर रही थी. वहीँ दूसरी तरफ महाराणा प्रताप अपने देश के लिए लड़ रहे थे और कोशिश की कि राजपूतों की इज्जत उनकी स्त्रियां मुगलों के हरम में न जा सकें
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3-अकबर की कुरूपता
इतिहास की किताबों और मुग़ल काल की पेंटिंग में अकबर को एक स्वस्थ और रौबदार चहरे वाला सुन्दर व्यक्ति चित्रित किया जाता ,लेकिन,“अकबर एक औसत दर्जे की लम्बाई का था. उसके बाएं पैर में लंगड़ापन था. उसका सिर अपने दायें कंधे की तरफ झुका रहता था. उसकी नाक छोटी थी जिसकी हड्डी बाहर को निकली हुई थी. उसके नाक के नथुने ऐसे दीखते थे जैसे वो गुस्से में हो. आधे मटर के दाने के बराबर एक मस्सा उसके होंठ और नथुनों को मिलाता था. वह गहरे रंग का था”
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4-अकबर की धर्मनिरपेक्षता
आजकल बच्चों को इतिहास की किताबों में पढाया जाता है ,कि अकबर सभी धर्मों का आदर करता था . और यहाँ तक कि उसने जोधा बाई को भी एक मंदिर भी बनवा दिया था ,जिसने वह हिन्दू रीती के अनुसार पूजा ,आरती और कृष्ण की भक्ति किया करती थी , यही” मुगले आजम ” पिक्चर में भी दिखाया था .जो के .आसिफ ने बनायीं थी . लेकिन वास्तविकता यह है कि जोधा से शादी के कुछ समय बाद अकबर ने जोधा को मुसलमान बना दिया था . और उसका इस्लामी नाम “, मरियम उज्जमानी ( مريم ازماني ) रख दिया था .और 6 फरवरी सन 1562 को इसलामी तरीके से निकाह पढ़ लिया था .और इसीलिए जब जोधा मर गयी तो उसका हिन्दू रीती से दाह संस्कार नहीं किया गया , बल्कि एक मुस्लिम की तरह दफना दिया गया .आज भी जोधा की कबर अकबर की कबर जो सिकन्दरा में है उस से से कुछ किलोमीटर बनी है ,देखी जा सकती है .

यही नहीं अकबर ने अपनी अय्याशी के लिए इस्लाम का भी दुरुपयोग किया था ,चूँकि सुन्नी फिरके के अनुसार एक मुस्लिम एक साथ चार से अधिक औरतें नहीं रखता . और जब अकबर उस से अधिक औरतें रखने लगा तो ,काजी ने उसे टोक दिया .इस से नाराज होकर अकबर ने उस सुन्नी काजी को हटा कर शिया काजी को रख लिया , क्योंकि शिया फिरके में असीमित अस्थायी शादियों की इजाजत है , ऐसी शदियों को ” मुतअ ” कहा जाता है .आज भी मुसलमान अपने फायदे के लिए कुरान की व्याख्या किया करते हैं
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4-बादशाह की रहमदिली
मुसलमान अकबर को न्यायी दयालु नरमदिल बताते हैं ,लेकिन यह भी झूठ है ,क्योंकि ,जब 6 नवम्बर 1556 को 14 साल की आयु में अकबर महान पानीपत की लड़ाई में भाग ले रहा था. हिंदू राजा हेमू की सेना मुग़ल सेना को खदेड़ रही थी कि अचानक हेमू को आँख में तीर लगा और वह बेहोश हो गया. उसे मरा सोचकर उसकी सेना में भगदड़ मच गयी. तब हेमू को बेहोशी की हालत में अकबर महान के सामने लाया गया और इसने बहादुरी से हेमू का सिर काट लिया और तब इसे गाजी के खिताब से नवाजा गया. इसके तुरंत बाद जब अकबर महान की सेना दिल्ली आई तो कटे हुए काफिरों के सिरों से मीनार बनायी गयी जो जीत के जश्न का प्रतीक है और यह तरीका अकबर महान के पूर्वजों से ही चला आ रहा है.हेमू के बूढ़े पिता को भी अकबर महान ने कटवा डाला. और औरतों को शाही हरम में भिजवा दिया गया

चित्तौड़ पर कब्ज़ा करने के बाद अकबर महान ने तीस हजार नागरिकों का क़त्ल करवाया.
2 सितम्बर 1573 के दिन अहमदाबाद में उसने 2000 दुश्मनों के सिर काटकर अब तक की सबसे ऊंची सिरों की मीनार बनायी. वैसे इसके पहले सबसे ऊंची मीनार बनाने का सौभाग्य भी अकबर महान के दादा बाबर का ही था. अर्थात कीर्तिमान घर के घर में ही रहा!
अकबरनामा के अनुसार जब बंगाल का दाउद खान हारा, तो कटे सिरों के आठ मीनार बनाए गए थे. यह फिर से एक नया कीर्तिमान था. जब दाउद खान ने मरते समय पानी माँगा तो उसे जूतों में पानी पीने को दिया गया.

अकबर ने मुजफ्फर शाह को हाथी से कुचलवाया. हमजबान की जबान ही कटवा डाली. मसूद हुसैन मिर्ज़ा की आँखें सीकर बंद कर दी गयीं. उसके 300 साथी उसके सामने लाये गए और उनके चेहरे पर गधों, भेड़ों और कुत्तों की खालें डाल कर काट डाला गया. विन्सेंट स्मिथ ने यह लिखा है कि अकबर महान फांसी देना, सिर कटवाना, शरीर के अंग कटवाना, आदि सजाएं भी देते थे.
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5-नए धर्म की स्थापना
अकबर और मुहम्मद साहब में कुछ ऐसी समानताएं हैं ,जिन पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया . जैसे दौनों अनपढ़ और निरक्षर थे . दौनों को कई कई औरतें रखने का शौक था .और जैसे मुहम्मद साहब ने बिना किसी योग्यता के खुद को अल्लाह का रसूल घोषित कर दिया ,और इस्लाम नामका नया दीन ( ) चला दिया . उसी तरह अकबर ने भी खुद को अल्लाह का खलीफा ( ) घोषित करके “दीने इलाही – دین الهی ” नामका धर्म चला दिया . यहाँ तक मुसलमानों के कलमें में यह शब्द “अकबर खलीफतुल्लाह – اكبر خليفة الله ” भी जुड़वा लिए थे .उसने लोगों को आदेश दिए कि आपस में “अल्लाह ओ अकबर” कह कर अभिवादन किया जाए.यही नहीं अकबर ने हिन्दुओं को गुमराह करने के लिए एक फर्जी उपनिषद् “अल्लोपनिषद ” बनवाया था ,जिसमे अरबी और संस्कृत मिश्रित भाषा में मुहम्मद को अल्लाह का रसूल और अकबर को खलीफा बताया गया था . इस फर्जी उपनिषद् का उल्लेख महर्षि दयानंद ने सत्यार्थ प्रकाश में किया है .और अल्लोपनिषद का मुंहतोड़ जवाब भंडाफोडू ब्लॉग ने “अरबोपनिषद ” बना कर दिया था .फिर भी जो नादान लोग जोधा अकबर सीरियल से प्रभावित होकर अकबर को महान और सेकुलर मानते हैं उन्हें पता होना चाहिए कि यह सीरियल नहीं एक जिहाद है ,महाराणा प्रताप के सामने अकबर जैसे दुष्ट का महिमा मंडन उचित नहीं है !

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तुलसी विवाह कथा


तुलसी विवाह कथा>>>

एक लड़की थी जिसका नाम वृंदा था राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु जी की भक्त थी.बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा,पूजा किया करती थी.जब वे बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया,जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.

एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा – स्वामी आप युध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठकर आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी,और जब तक आप वापस नहीं आ जाते में अपना संकल्प नही छोडूगी,जलंधर तो युद्ध में चले गये,और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी,उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके सारे देवता जब हारने लगे तो भगवान विष्णु जी के पास गये.

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता पर देवता बोले – भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है.

भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे ही वृंदा ने अपने पति को देखा,वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए,जैसे ही उनका संकल्प टूटा,युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काटकर अलग कर दिया,उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूँछा – आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया,तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके,वृंदा सारी बात समझ गई,उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ,भगवान तुंरत पत्थर के हो गये सबी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्राथना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे सती हो गयी.

उनकी राख से एक पौधा निकला तब भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से इनका नाम तुलसी है,और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में बिना तुलसी जी के भोग स्वीकार नहीं करुगा.तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे.और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में किया जाता है.देवउठनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है…

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इस तस्विर में निकोलस नोतोविच नाम


इस तस्विर में निकोलस नोतोविच नाम
का रसियन यहुदी १८८७ में लडाख के
हिमीस नाम के स्थल पर इसा की कोलेज
में पहुंच जाता है । वहां पहुंचने से पहले पथ्थर
से गीरने से उसकी एक टांग तुट गई है । मठ के
लामा सेवा चाकरी करते हैं ।
निकोलस के पैर अच्छा होने में कुछ दिन लग
गए । लामा से दोस्ती हो गई ।
निकोलस के लिए मठ के सारे दस्तावेज,
खूफिया या खूले, उपलब्ध हो गए । एक
महत्व का दस्तावेज हाथ लगा । एक
स्थानिय पोस्ट मास्टर जो तब इसाई बन
गया था उसे साध कर उसकी मदद ली गई ।

लामा पाली से स्थानिय भाषा में
बताता था, पोस्ट मास्टर अंग्रेजी में
बताता गया और निकोलस
अपनी भाषा में लिखता गया ।
जब उसका पैर अच्छा हो गया तो युरोप
चला गया । और १८९४ में, जो लिख कर ले
गया था, उस की किताब पब्लिश करने में
सफल हो गया ‘La vie inconnue de
Jesus Christ” ( “ध अननोन यर्स ओफ
जीसस क्राईस्ट ।”) बाद में
उसका अंग्रेजी, जर्मन, स्पेनिश और
इटालियन भाषा में अनुवाद छपा ।
किताब छपते ही युरोप में तहलका मच
गया । नोकोलस का विरोध करने में
दुनिया भर के इतिहास
को बिगाडनेवाला मॅक्स मुलर सब से आगे
था । मुलर ने लामा से पत्र द्वारा पूछा ।
चारों तरफ से दबाव
बना था तो लामाने भी कह
दिया कि यहां १५ साल से कोइ
युरोपियन नही आया है, और हमारे पास
ऐसा कोइ दस्तावेज भी नही है । आखिर
निकोलस को भी जुकना पडा और
कहना पडा की कहानी उसने खूद बनाई है

आग्रा कोमर्स कोलेज का प्रोफेसर
डग्लास भागा भागा हिमीस लामा से
मिलने पहुंच जाता है । लामाने उसे
भी वही जवाब दिया जो मेक्स मूलर के
पत्र के जवाब में कहा था ।

युरोप में तो निकोलस जुठा साबित
हो गया पर भारत के स्वामि अभेदानन्द,
विवेकानन्द के साथी, १९२२ में लामा से
मिलने हिमीस गए । बातचीत में मठाधिश
ने कबूल कर लिया की निकोलस इधर आये
थे, देढ महीने तक उनका इलाज हुआ था । ये
भी कहा कि पाली में
लिखी इसा की जीवन कथा को रसियन
में अनुवाद करने में मदद मठने ही की थी ।

स्वामि को भी वो स्क्रिप्ट दिखाई गई
। १४ भाग में कुल २२३ स्लोक थे ।
लामा ने ये भी बताया कि इसा उनके
आखरी दिनों में चुपचाप कश्मिर चले आए
थे, वो क्रोस पर चडकर नही मरे थे । अपने
शिष्यों के साथ कई साल जीए थे ।

इसा के मरने के तीन चार साल बाद उनके
जीवन की कहानी बताती यह किताब
लिखी गई थी ।

बायबल इसा के जीवन के १७ साल का गॅप
नही भरता है । इसाईयों की अन्य
धार्मिक किताबों में
भी जानकारी नही है । इस १७ साल
की चिंता में डूबे लोग अपने अपने हिसाब
से किताब लिखने लगे ।

एलिजाबेथ क्लेर
की किताब “The Lost Years of Jesus:
Documentary Evidence of Jesus’ 17-
Year Journey to the East”, सवाल
उठाती है इस्ट याने कौनसा इस्ट ? बेशक
इस्ट याने भारत ही है ।

आचार्य रजनीश के भक्तों का दावा है
रजनीश जी ने अमरिकामें इस
कहानी को बताना शुरु कर
दिया था तो उन को विष देकर
अमरिका से निकाल दिया था ।

भारत
आकर थोडे समय में गुजर गए थे ।
दुनिया की जनताने ही निकोलस
की इस कहानी को सच मान कर बायबल
का वो १७ साल का गॅप भर दिया है ।

पूरा नेट इस कहानी के अनुवादों से,
आर्टिकल्स से, विडियों से और इस तरह के
कार्टूनों से भर गया है ।

en.m.wikipedia.org/wiki/Nicolas_Notovitch

पोस्ट साभार : www.FB.com/BaBaCopyPaste

Photo: इस तस्विर में निकोलस नोतोविच नाम
का रसियन यहुदी १८८७ में लडाख के
हिमीस नाम के स्थल पर इसा की कोलेज
में पहुंच जाता है । वहां पहुंचने से पहले पथ्थर
से गीरने से उसकी एक टांग तुट गई है । मठ के
लामा सेवा चाकरी करते हैं ।
निकोलस के पैर अच्छा होने में कुछ दिन लग
गए । लामा से दोस्ती हो गई ।
निकोलस के लिए मठ के सारे दस्तावेज,
खूफिया या खूले, उपलब्ध हो गए । एक
महत्व का दस्तावेज हाथ लगा । एक
स्थानिय पोस्ट मास्टर जो तब इसाई बन
गया था उसे साध कर उसकी मदद ली गई ।

लामा पाली से स्थानिय भाषा में
बताता था, पोस्ट मास्टर अंग्रेजी में
बताता गया और निकोलस
अपनी भाषा में लिखता गया ।
जब उसका पैर अच्छा हो गया तो युरोप
चला गया । और १८९४ में, जो लिख कर ले
गया था, उस की किताब पब्लिश करने में
सफल हो गया ‘La vie inconnue de
Jesus Christ” ( "ध अननोन यर्स ओफ
जीसस क्राईस्ट ।") बाद में
उसका अंग्रेजी, जर्मन, स्पेनिश और
इटालियन भाषा में अनुवाद छपा ।
किताब छपते ही युरोप में तहलका मच
गया । नोकोलस का विरोध करने में
दुनिया भर के इतिहास
को बिगाडनेवाला मॅक्स मुलर सब से आगे
था । मुलर ने लामा से पत्र द्वारा पूछा ।
चारों तरफ से दबाव
बना था तो लामाने भी कह
दिया कि यहां १५ साल से कोइ
युरोपियन नही आया है, और हमारे पास
ऐसा कोइ दस्तावेज भी नही है । आखिर
निकोलस को भी जुकना पडा और
कहना पडा की कहानी उसने खूद बनाई है
।

आग्रा कोमर्स कोलेज का प्रोफेसर
डग्लास भागा भागा हिमीस लामा से
मिलने पहुंच जाता है । लामाने उसे
भी वही जवाब दिया जो मेक्स मूलर के
पत्र के जवाब में कहा था ।

युरोप में तो निकोलस जुठा साबित
हो गया पर भारत के स्वामि अभेदानन्द,
विवेकानन्द के साथी, १९२२ में लामा से
मिलने हिमीस गए । बातचीत में मठाधिश
ने कबूल कर लिया की निकोलस इधर आये
थे, देढ महीने तक उनका इलाज हुआ था । ये
भी कहा कि पाली में
लिखी इसा की जीवन कथा को रसियन
में अनुवाद करने में मदद मठने ही की थी ।

स्वामि को भी वो स्क्रिप्ट दिखाई गई
। १४ भाग में कुल २२३ स्लोक थे ।
लामा ने ये भी बताया कि इसा उनके
आखरी दिनों में चुपचाप कश्मिर चले आए
थे, वो क्रोस पर चडकर नही मरे थे । अपने
शिष्यों के साथ कई साल जीए थे ।

इसा के मरने के तीन चार साल बाद उनके
जीवन की कहानी बताती यह किताब
लिखी गई थी ।

बायबल इसा के जीवन के १७ साल का गॅप
नही भरता है । इसाईयों की अन्य
धार्मिक किताबों में
भी जानकारी नही है । इस १७ साल
की चिंता में डूबे लोग अपने अपने हिसाब
से किताब लिखने लगे ।

 एलिजाबेथ क्लेर
की किताब "The Lost Years of Jesus:
Documentary Evidence of Jesus' 17-
Year Journey to the East", सवाल
उठाती है इस्ट याने कौनसा इस्ट ? बेशक
इस्ट याने भारत ही है ।

आचार्य रजनीश के भक्तों का दावा है
रजनीश जी ने अमरिकामें इस
कहानी को बताना शुरु कर
दिया था तो उन को विष देकर
अमरिका से निकाल दिया था ।

 भारत
आकर थोडे समय में गुजर गए थे ।
दुनिया की जनताने ही निकोलस
की इस कहानी को सच मान कर बायबल
का वो १७ साल का गॅप भर दिया है ।

पूरा नेट इस कहानी के अनुवादों से,
आर्टिकल्स से, विडियों से और इस तरह के
कार्टूनों से भर गया है ।

en.m.wikipedia.org/wiki/Nicolas_Notovitch

पोस्ट साभार : www.FB.com/BaBaCopyPaste
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बहुत समय पहले की बात है। एक चिड़िया ज्यादातर ऐसे राजमार्ग पर रहती थी, जहां से अनाज से लदी गा‍ड़ियां गुजरती थीं।


बहुत समय पहले की बात है। एक चिड़िया ज्यादातर ऐसे राजमार्ग पर रहती थी, जहां से अनाज से लदी गा‍ड़ियां गुजरती थीं।

चावल, मूंग, अरहर के दाने इधर-उधर बिखरे पड़े रहते। वह जी भरकर दाना चुगती। एक दिन उसने सोचा- मुझे कुछ ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि अन्य पक्षी इस रास्ते पर न आएं वरना मुझे दाना कम पड़ने लगेगा।

उसने दूसरी चिड़ियों से कहना शुरू कर दिया- राजमार्ग पर मत जाना, वह बड़ा खतरनाक है। उधर से जंगली हाथी-घोड़े व मारने वाले बैलों वाली गाड़ियां निकलती हैं। वहां से जल्दी से उड़कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा भी नहीं जा सकता।
उसकी बात सुनकर पक्षी डर गए और उसका नाम अनुशासिका रख दिया।

एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती गाड़ी का शब्द सुनकर उसने पीछे मुड़कर देखा- ‘अरे, अभी तो वह बहुत दूर है, थोड़ा और चुग लूं’, सोचकर दाना खाने में इतनी मग्न हो गई कि उसे पता ही नहीं लगा कि गाड़ी कब उसके नजदीक आ गई। वह उड़ न सकी और पहिए के नीचे कुचल जाने से मर गई।

थोड़ी देर में खलबली मच गई- अनुशासिका कहां गई, अनुशासिका कहां गई? ढूंढते-ढूंढते वह मिल ही गई।

अरे, यह तो मरी पड़ी है वह भी राजमार्ग पर! हमें तो यहां आने से रोकती थी और खुद दाना चुगने चली आती थी। सारे पक्षी कह उठे।

सीख:- जो उपदेशक अपने को नियंत्रण में नहीं रख सकते, उनका हाल चिड़िया की तरह ही होता है।

बहुत समय पहले की बात है। एक चिड़िया ज्यादातर ऐसे राजमार्ग पर रहती थी, जहां से अनाज से लदी गा‍ड़ियां गुजरती थीं। 

चावल, मूंग, अरहर के दाने इधर-उधर बिखरे पड़े रहते। वह जी भरकर दाना चुगती। एक दिन उसने सोचा- मुझे कुछ ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि अन्य पक्षी इस रास्ते पर न आएं वरना मुझे दाना कम पड़ने लगेगा।

उसने दूसरी चिड़ियों से कहना शुरू कर दिया- राजमार्ग पर मत जाना, वह बड़ा खतरनाक है। उधर से जंगली हाथी-घोड़े व मारने वाले बैलों वाली गाड़ियां निकलती हैं। वहां से जल्दी से उड़कर सुरक्षित स्थान पर पहुंचा भी नहीं जा सकता। 
उसकी बात सुनकर पक्षी डर गए और उसका नाम अनुशासिका रख दिया।

एक दिन वह राजपथ पर चुग रही थी। जोर से आती गाड़ी का शब्द सुनकर उसने पीछे मुड़कर देखा- 'अरे, अभी तो वह बहुत दूर है, थोड़ा और चुग लूं', सोचकर दाना खाने में इतनी मग्न हो गई कि उसे पता ही नहीं लगा कि गाड़ी कब उसके नजदीक आ गई। वह उड़ न सकी और पहिए के नीचे कुचल जाने से मर गई। 

थोड़ी देर में खलबली मच गई- अनुशासिका कहां गई, अनुशासिका कहां गई? ढूंढते-ढूंढते वह मिल ही गई।

अरे, यह तो मरी पड़ी है वह भी राजमार्ग पर! हमें तो यहां आने से रोकती थी और खुद दाना चुगने चली आती थी। सारे पक्षी कह उठे।

सीख:- जो उपदेशक अपने को नियंत्रण में नहीं रख सकते, उनका हाल चिड़िया की तरह ही होता है।
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हंसों का एक झुण्ड समुद्र तट के ऊपर से गुज़र रहा था , उसी जगह एक कौवा भी मौज मस्ती कर रहा था


हंसों का एक झुण्ड समुद्र तट के ऊपर से गुज़र रहा था , उसी जगह एक कौवा भी मौज मस्ती कर रहा था . उसने
हंसों को उपेक्षा भरी नज़रों से देखा “तुम लोग कितनी अच्छी उड़ान भर लेते हो !” कौवा मज़ाक के लहजे में बोला, “तुम लोग और कर ही क्या सकते हो बस अपना पंख फड़फड़ा कर उड़ान भर सकते हो !!! क्या तुम मेरी तरह फूर्ती से उड़ सकते हो ??? मेरी तरह हवा में कलाबाजियां दिखा सकते हो ???…नहीं , तुम तो ठीक से जानते भी नहीं कि उड़ना किसे कहते हैं !”
कौवे की बात सुनकर एक वृद्ध हंस बोला ,” ये अच्छी बात है कि तुम ये सब कर लेते हो , लेकिन तुम्हे इस बात पर घमंड नहीं करना चाहिए .”
” मैं घमंड – वमंड नहीं जानता , अगर तुम में से कोई भी मेरा मुकाबला कर सकत है तो सामने आये और मुझे हरा कर दिखाए .”
एक युवा नर हंस ने कौवे की चुनौती स्वीकार कर ली . यह तय हुआ कि प्रतियोगिता दो चरणों में होगी , पहले चरण में कौवा अपने करतब दिखायेगा और हंस को भी वही करके दिखाना होगा और दूसरे चरण में कौवे को हंस के करतब दोहराने होंगे .
प्रतियोगिता शुरू हुई , पहले चरण की शुरुआत कौवे ने की और एक से बढ़कर एक कलाबजिया दिखाने लगा , वह कभी गोल-गोल चक्कर खाता तो कभी ज़मीन छूते हुए ऊपर उड़ जाता . वहीँ हंस उसके मुकाबले कुछ ख़ास नहीं कर पाया . कौवा अब और भी बढ़-चढ़ कर बोलने लगा ,” मैं तो पहले ही कह रहा था कि तुम लोगों को और कुछ भी नहीं आता …ही ही ही …”
फिर दूसरा चरण शुरू हुआ , हंस ने उड़ान भरी और समुद्र की तरफ उड़ने लगा . कौवा भी उसके पीछे हो लिया ,” ये कौन सा कमाल दिखा रहे हो , भला सीधे -सीधे उड़ना भी कोई चुनौती है ??? सच में तुम मूर्ख हो !”, कौवा बोला .
पर हंस ने कोई ज़वाब नही दिया और चुप-चाप उड़ता रहा, धीरे-धीरे वे ज़मीन से बहुत दूर होते गए और कौवे का बडबडाना भी कम होता गया , और कुछ देर में बिलकुल ही बंद हो गया . कौवा अब बुरी तरह थक चुका था , इतना कि अब उसके लिए खुद को हवा में रखना भी मुश्किल हो रहा था और वो बार -बार पानी के करीब पहुच जा रहा था . हंस कौवे की स्थिति समझ रहा था , पर उसने अनजान बनते हुए कहा ,” तुम बार-बार पानी क्यों छू रहे हो , क्या ये भी तुम्हारा कोई करतब है ?””नहीं ” कौवा बोला ,” मुझे माफ़ कर दो , मैं अब बिलकुल थक चूका हूँ और यदि तुमने मेरी मदद नहीं की तो मैं यहीं दम तोड़ दूंगा ….मुझे बचा लो मैं कभी घमंड नहीं दिखाऊंगा …”
हंस को कौवे पर दया आ गयी, उसने सोचा कि चलो कौवा सबक तो सीख ही चुका है , अब उसकी जान बचाना ही ठीक होगा ,और वह कौवे को अपने पीठ पर बैठा कर वापस तट की और उड़ चला .
दोस्तों,हमे इस बात को समझना चाहिए कि भले हमें पता ना हो पर हर किसी में कुछ न कुछ quality होती है जो उसे विशेष बनाती है. और भले ही हमारे अन्दर हज़ारों अच्छाईयां हों , पर यदि हम उसपे घमंड करते हैं तो देर-सबेर हमें भी कौवे की तरह शर्मिंदा होना पड़ता है। एक पुरानी कहावत भी है ,”घमंडी का सर हमेशा नीचा होता है।” , इसलिए ध्यान रखिये कि कहीं जाने -अनजाने आप भी कौवे वाली गलती तो नहीं कर रहे ?

हंसों का एक झुण्ड समुद्र तट के ऊपर से गुज़र रहा था , उसी जगह एक कौवा भी मौज मस्ती कर रहा था . उसने
हंसों को उपेक्षा भरी नज़रों से देखा “तुम लोग कितनी अच्छी उड़ान भर लेते हो !” कौवा मज़ाक के लहजे में बोला, “तुम लोग और कर ही क्या सकते हो बस अपना पंख फड़फड़ा कर उड़ान भर सकते हो !!! क्या तुम मेरी तरह फूर्ती से उड़ सकते हो ??? मेरी तरह हवा में कलाबाजियां दिखा सकते हो ???…नहीं , तुम तो ठीक से जानते भी नहीं कि उड़ना किसे कहते हैं !”
कौवे की बात सुनकर एक वृद्ध हंस बोला ,” ये अच्छी बात है कि तुम ये सब कर लेते हो , लेकिन तुम्हे इस बात पर घमंड नहीं करना चाहिए .”
” मैं घमंड – वमंड नहीं जानता , अगर तुम में से कोई भी मेरा मुकाबला कर सकत है तो सामने आये और मुझे हरा कर दिखाए .”
एक युवा नर हंस ने कौवे की चुनौती स्वीकार कर ली . यह तय हुआ कि प्रतियोगिता दो चरणों में होगी , पहले चरण में कौवा अपने करतब दिखायेगा और हंस को भी वही करके दिखाना होगा और दूसरे चरण में कौवे को हंस के करतब दोहराने होंगे .
प्रतियोगिता शुरू हुई , पहले चरण की शुरुआत कौवे ने की और एक से बढ़कर एक कलाबजिया दिखाने लगा , वह कभी गोल-गोल चक्कर खाता तो कभी ज़मीन छूते हुए ऊपर उड़ जाता . वहीँ हंस उसके मुकाबले कुछ ख़ास नहीं कर पाया . कौवा अब और भी बढ़-चढ़ कर बोलने लगा ,” मैं तो पहले ही कह रहा था कि तुम लोगों को और कुछ भी नहीं आता …ही ही ही …”
फिर दूसरा चरण शुरू हुआ , हंस ने उड़ान भरी और समुद्र की तरफ उड़ने लगा . कौवा भी उसके पीछे हो लिया ,” ये कौन सा कमाल दिखा रहे हो , भला सीधे -सीधे उड़ना भी कोई चुनौती है ??? सच में तुम मूर्ख हो !”, कौवा बोला .
पर हंस ने कोई ज़वाब नही दिया और चुप-चाप उड़ता रहा, धीरे-धीरे वे ज़मीन से बहुत दूर होते गए और कौवे का बडबडाना भी कम होता गया , और कुछ देर में बिलकुल ही बंद हो गया . कौवा अब बुरी तरह थक चुका था , इतना कि अब उसके लिए खुद को हवा में रखना भी मुश्किल हो रहा था और वो बार -बार पानी के करीब पहुच जा रहा था . हंस कौवे की स्थिति समझ रहा था , पर उसने अनजान बनते हुए कहा ,” तुम बार-बार पानी क्यों छू रहे हो , क्या ये भी तुम्हारा कोई करतब है ?””नहीं ” कौवा बोला ,” मुझे माफ़ कर दो , मैं अब बिलकुल थक चूका हूँ और यदि तुमने मेरी मदद नहीं की तो मैं यहीं दम तोड़ दूंगा ….मुझे बचा लो मैं कभी घमंड नहीं दिखाऊंगा …”
हंस को कौवे पर दया आ गयी, उसने सोचा कि चलो कौवा सबक तो सीख ही चुका है , अब उसकी जान बचाना ही ठीक होगा ,और वह कौवे को अपने पीठ पर बैठा कर वापस तट की और उड़ चला .
दोस्तों,हमे इस बात को समझना चाहिए कि भले हमें पता ना हो पर हर किसी में कुछ न कुछ quality होती है जो उसे विशेष बनाती है. और भले ही हमारे अन्दर हज़ारों अच्छाईयां हों , पर यदि हम उसपे घमंड करते हैं तो देर-सबेर हमें भी कौवे की तरह शर्मिंदा होना पड़ता है। एक पुरानी कहावत भी है ,”घमंडी का सर हमेशा नीचा होता है।” , इसलिए ध्यान रखिये कि कहीं जाने -अनजाने आप भी कौवे वाली गलती तो नहीं कर रहे ?
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एक बार की बात है . एक व्यक्ति को रोज़-रोज़ जुआ खेलने की बुरी आदत पड़ गयी थी


एक बार की बात है . एक व्यक्ति को रोज़-रोज़ जुआ खेलने की बुरी आदत पड़ गयी थी . उसकी इस आदत से सभी बड़े परेशान रहते. लोग उसे समझाने कि भी बहुत कोशिश करते कि वो ये गन्दी आदत छोड़ दे , लेकिन वो हर किसी को एक ही जवाब देता, ” मैंने ये आदत नहीं पकड़ी, इस आदत ने मुझे पकड़ रखा है !!!”
और सचमुच वो इस आदत को छोड़ना चाहता था , पर हज़ार कोशिशों के बावजूद वो ऐसा नहीं कर पा रहा था.
परिवार वालों ने सोचा कि शायद शादी करवा देने से वो ये आदत छोड़ दे , सो उसकी शादी करा दी गयी. पर कुछ दिनों तक सब ठीक चला और फिर से वह जुआ खेलने जाना लगा. उसकी पत्नी भी अब काफी चिंतित रहने लगी , और उसने निश्चय किया कि वह किसी न किसी तरह अपने पति की इस आदत को छुड़वा कर ही दम लेगी.
एक दिन पत्नी को किसी सिद्ध साधु-महात्मा के बारे में पता चला, और वो अपने पति को लेकर उनके आश्रम पहुंची. साधु ने कहा, ” बताओ पुत्री तुम्हारी क्या समस्या है ?”
पत्नी ने दुखपूर्वक सारी बातें साधु-महाराज को बता दी .
साधु-महाराज उनकी बातें सुनकर समस्या कि जड़ समझ चुके थे, और समाधान देने के लिए उन्होंने पति-पत्नी को अगले दिन आने के लिए कहा .
अगले दिन वे आश्रम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि साधु-महाराज एक पेड़ को पकड़ के खड़े है .
उन्होंने साधु से पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ; और पेड़ को इस तरह क्यों पकडे हुए हैं ?
साधु ने कहा , ” आप लोग जाइये और कल आइयेगा .”
फिर तीसरे दिन भी पति-पत्नी पहुंचे तो देखा कि फिर से साधु पेड़ पकड़ के खड़े हैं .
उन्होंने जिज्ञासा वश पूछा , ” महाराज आप ये क्या कर रहे हैं ?”
साधु बोले, ” पेड़ मुझे छोड़ नहीं रहा है .आप लोग कल आना .”
पति-पत्नी को साधु जी का व्यवहार कुछ विचित्र लगा , पर वे बिना कुछ कहे वापस लौट गए.
अगले दिन जब वे फिर आये तो देखा कि साधु महाराज अभी भी उसी पेड़ को पकडे खड़े है.
पति परेशान होते हुए बोला ,” बाबा आप ये क्या कर रहे हैं ?, आप इस पेड़ को छोड़ क्यों नहीं देते?”
साधु बोले ,”मैं क्या करूँ बालक ये पेड़ मुझे छोड़ ही नहीं रहा है ?”
पति हँसते हुए बोला , “महाराज आप पेड़ को पकडे हुए हैं , पेड़ आप को नहीं !….आप जब चाहें उसे छोड़ सकते हैं.”
साधू-महाराज गंभीर होते हुए बोले, ” इतने दिनों से मै तुम्हे क्या समझाने कि कोशिश कर रहा हूँ .यही न कि तुम जुआ खेलने की आदत को पकडे हुए हो ये आदत तुम्हे नहीं पकडे हुए है!”
पति को अपनी गलती का अहसास हो चुका था , वह समझ गया कि किसी भी आदत के लिए वह खुद जिम्मेदार है ,और वह अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जब चाहे उसे छोड़ सकता है.

एक बार की बात है . एक व्यक्ति को रोज़-रोज़ जुआ खेलने की बुरी आदत पड़ गयी थी . उसकी इस आदत से सभी बड़े परेशान रहते. लोग उसे समझाने कि भी बहुत कोशिश करते कि वो ये गन्दी आदत छोड़ दे , लेकिन वो हर किसी को एक ही जवाब देता, ” मैंने ये आदत नहीं पकड़ी, इस आदत ने मुझे पकड़ रखा है !!!”
और सचमुच वो इस आदत को छोड़ना चाहता था , पर हज़ार कोशिशों के बावजूद वो ऐसा नहीं कर पा रहा था.
परिवार वालों ने सोचा कि शायद शादी करवा देने से वो ये आदत छोड़ दे , सो उसकी शादी करा दी गयी. पर कुछ दिनों तक सब ठीक चला और फिर से वह जुआ खेलने जाना लगा. उसकी पत्नी भी अब काफी चिंतित रहने लगी , और उसने निश्चय किया कि वह किसी न किसी तरह अपने पति की इस आदत को छुड़वा कर ही दम लेगी.
एक दिन पत्नी को किसी सिद्ध साधु-महात्मा के बारे में पता चला, और वो अपने पति को लेकर उनके आश्रम पहुंची. साधु ने कहा, ” बताओ पुत्री तुम्हारी क्या समस्या है ?”
पत्नी ने दुखपूर्वक सारी बातें साधु-महाराज को बता दी .
साधु-महाराज उनकी बातें सुनकर समस्या कि जड़ समझ चुके थे, और समाधान देने के लिए उन्होंने पति-पत्नी को अगले दिन आने के लिए कहा .
अगले दिन वे आश्रम पहुंचे तो उन्होंने देखा कि साधु-महाराज एक पेड़ को पकड़ के खड़े है .
उन्होंने साधु से पूछा कि आप ये क्या कर रहे हैं ; और पेड़ को इस तरह क्यों पकडे हुए हैं ?
साधु ने कहा , ” आप लोग जाइये और कल आइयेगा .”
फिर तीसरे दिन भी पति-पत्नी पहुंचे तो देखा कि फिर से साधु पेड़ पकड़ के खड़े हैं .
उन्होंने जिज्ञासा वश पूछा , ” महाराज आप ये क्या कर रहे हैं ?”
साधु बोले, ” पेड़ मुझे छोड़ नहीं रहा है .आप लोग कल आना .”
पति-पत्नी को साधु जी का व्यवहार कुछ विचित्र लगा , पर वे बिना कुछ कहे वापस लौट गए.
अगले दिन जब वे फिर आये तो देखा कि साधु महाराज अभी भी उसी पेड़ को पकडे खड़े है.
पति परेशान होते हुए बोला ,” बाबा आप ये क्या कर रहे हैं ?, आप इस पेड़ को छोड़ क्यों नहीं देते?”
साधु बोले ,”मैं क्या करूँ बालक ये पेड़ मुझे छोड़ ही नहीं रहा है ?”
पति हँसते हुए बोला , “महाराज आप पेड़ को पकडे हुए हैं , पेड़ आप को नहीं !….आप जब चाहें उसे छोड़ सकते हैं.”
साधू-महाराज गंभीर होते हुए बोले, ” इतने दिनों से मै तुम्हे क्या समझाने कि कोशिश कर रहा हूँ .यही न कि तुम जुआ खेलने की आदत को पकडे हुए हो ये आदत तुम्हे नहीं पकडे हुए है!”
पति को अपनी गलती का अहसास हो चुका था , वह समझ गया कि किसी भी आदत के लिए वह खुद जिम्मेदार है ,और वह अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जब चाहे उसे छोड़ सकता है.
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एक चिड़ा पेड़ पर घोंसला बनाकर मजे से रहता था।


एक चिड़ा पेड़ पर घोंसला बनाकर मजे से रहता था। एक दिन वह दाना पानी के चक्कर में अच्छी फसल वाले खेत में पहुंच गया। वहां खाने पीने की मौज से बड़ा ही खुश हुआ। उस खुशी में रात को वह घर आना भी भूल गया और उसके दिन मजे में वहीं बीतने लगे।

इधर शाम को एक खरगोश उस पेड़ के पास आया जहां चिड़े का घोंसला था। पेड़ जरा भी ऊंचा नहीं था। इसलिए खरगोश ने उस घोंसलें में झांक कर देखा तो पता चला कि यह घोंसला खाली पड़ा है। घोंसला अच्छा खासा बड़ा था इतना कि वह उसमें खरगोश आराम से रह सकता था। उसे यह बना बनाया घोंसला पसंद आ गया और उसने यहीं रहने का फैसला कर लिया।

कुछ दिनों बाद वह चिड़ा खा-खा कर मोटा ताजा बन कर अपने घोंसलें की याद आने पर वापस लौटा। उसने देखा कि घोंसलें में खरगोश आराम से बैठा हुआ है। उसे बड़ा गुस्सा आया, उसने खरगोश से कहा, ‘चोर कहीं के, मैं नहीं था तो मेरे घर में घुस गए हो? चलो निकलो मेरे घर से, जरा भी शरम नहीं आई मेरे घर में रहते हुए?’

खरगोश शान्ति से जवाब देने लगा, ‘कहां का तुम्हारा घर? कौन सा तुम्हारा घर? यह तो मेरा घर है। पागल हो गए हो तुम। अरे! कुआं, तालाब या पेड़ एक बार छोड़कर कोई जाता हैं तो अपना हक भी गवां देता हैं। यहां तो जब तक हम हैं, वह अपना घर है। बाद में तो उसमें कोई भी रह सकता है। अब यह घर मेरा है। बेकार में मुझे तंग मत करो।’

यह बात सुनकर चिड़ा कहने लगा, ‘ऐसे बहस करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। किसी धर्मपण्डित के पास चलते हैं। वह जिसके हक में फैसला सुनायेगा उसे घर मिल जाएगा।’

उस पेड़ के पास से एक नदी बहती थी। वहां पर एक बड़ी सी बिल्ली बैठी थी। वह कुछ धर्मपाठ करती नजर आ रही थी। वैसे तो यह बिल्ली इन दोनों की जन्मजात शत्रु है लेकिन वहां और कोई भी नहीं था इसलिए उन दोनों ने उसके पास जाना और उससे न्याय लेना ही उचित समझा। सावधानी बरतते हुए बिल्ली के पास जा कर उन्होंने अपनी समस्या बताई।

उन्होंने कहा, ‘हमने अपनी उलझन तो बता दी, अब इसका हल क्या है? इसका जबाब आपसे सुनना चाहते हैं। जो भी सही होगा उसे वह घोंसला मिल जाएगा और जो झूठा होगा उसे आप खा लें।’ ‘अरे रे !! यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, हिंसा जैसा पाप नहीं इस दुनिया में। दूसरों को मारने वाला खुद नरक में जाता है। मैं तुम्हें न्याय देने में तो मदद करूंगी लेकिन झूठे को खाने की बात है तो वह मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं एक बात तुम लोगों को कानों में कहना चाहती हूं, जरा मेरे करीब आओ तो!!’

खरगोश और चिड़ा खुश हो गए कि अब फैसला हो कर रहेगा। और उसके बिलकुल करीब गए। फिर क्या? करीब आए खरगोश को पंजे में पकड़ कर मुंह से चिड़े को बिल्ली ने नोंच लिया। दोनों का काम तमाम कर दिया। अपने शत्रु को पहचानते हुए भी उस पर विश्वास करने से खरगोश और चिड़े को अपनी जानें गवांनी पड़ीं।

सच है, शत्रु से संभलकर और हो सके तो चार हाथ दूर ही रहने में भलाई होती है।

एक चिड़ा पेड़ पर घोंसला बनाकर मजे से रहता था। एक दिन वह दाना पानी के चक्कर में अच्छी फसल वाले खेत में पहुंच गया। वहां खाने पीने की मौज से बड़ा ही खुश हुआ। उस खुशी में रात को वह घर आना भी भूल गया और उसके दिन मजे में वहीं बीतने लगे।

इधर शाम को एक खरगोश उस पेड़ के पास आया जहां चिड़े का घोंसला था। पेड़ जरा भी ऊंचा नहीं था। इसलिए खरगोश ने उस घोंसलें में झांक कर देखा तो पता चला कि यह घोंसला खाली पड़ा है। घोंसला अच्छा खासा बड़ा था इतना कि वह उसमें खरगोश आराम से रह सकता था। उसे यह बना बनाया घोंसला पसंद आ गया और उसने यहीं रहने का फैसला कर लिया।

कुछ दिनों बाद वह चिड़ा खा-खा कर मोटा ताजा बन कर अपने घोंसलें की याद आने पर वापस लौटा। उसने देखा कि घोंसलें में खरगोश आराम से बैठा हुआ है। उसे बड़ा गुस्सा आया, उसने खरगोश से कहा, 'चोर कहीं के, मैं नहीं था तो मेरे घर में घुस गए हो? चलो निकलो मेरे घर से, जरा भी शरम नहीं आई मेरे घर में रहते हुए?'

खरगोश शान्ति से जवाब देने लगा, 'कहां का तुम्हारा घर? कौन सा तुम्हारा घर? यह तो मेरा घर है। पागल हो गए हो तुम। अरे! कुआं, तालाब या पेड़ एक बार छोड़कर कोई जाता हैं तो अपना हक भी गवां देता हैं। यहां तो जब तक हम हैं, वह अपना घर है। बाद में तो उसमें कोई भी रह सकता है। अब यह घर मेरा है। बेकार में मुझे तंग मत करो।'

यह बात सुनकर चिड़ा कहने लगा, 'ऐसे बहस करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला। किसी धर्मपण्डित के पास चलते हैं। वह जिसके हक में फैसला सुनायेगा उसे घर मिल जाएगा।' 

उस पेड़ के पास से एक नदी बहती थी। वहां पर एक बड़ी सी बिल्ली बैठी थी। वह कुछ धर्मपाठ करती नजर आ रही थी। वैसे तो यह बिल्ली इन दोनों की जन्मजात शत्रु है लेकिन वहां और कोई भी नहीं था इसलिए उन दोनों ने उसके पास जाना और उससे न्याय लेना ही उचित समझा। सावधानी बरतते हुए बिल्ली के पास जा कर उन्होंने अपनी समस्या बताई। 

उन्होंने कहा, 'हमने अपनी उलझन तो बता दी, अब इसका हल क्या है? इसका जबाब आपसे सुनना चाहते हैं। जो भी सही होगा उसे वह घोंसला मिल जाएगा और जो झूठा होगा उसे आप खा लें।' 'अरे रे !! यह तुम कैसी बातें कर रहे हो, हिंसा जैसा पाप नहीं इस दुनिया में। दूसरों को मारने वाला खुद नरक में जाता है। मैं तुम्हें न्याय देने में तो मदद करूंगी लेकिन झूठे को खाने की बात है तो वह मुझसे नहीं हो पाएगा। मैं एक बात तुम लोगों को कानों में कहना चाहती हूं, जरा मेरे करीब आओ तो!!'

खरगोश और चिड़ा खुश हो गए कि अब फैसला हो कर रहेगा। और उसके बिलकुल करीब गए। फिर क्या? करीब आए खरगोश को पंजे में पकड़ कर मुंह से चिड़े को बिल्ली ने नोंच लिया। दोनों का काम तमाम कर दिया। अपने शत्रु को पहचानते हुए भी उस पर विश्वास करने से खरगोश और चिड़े को अपनी जानें गवांनी पड़ीं।

सच है, शत्रु से संभलकर और हो सके तो चार हाथ दूर ही रहने में भलाई होती है।
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एक मूर्तिकार उच्चकोटि की ऐसी सजीव मूर्तियाँ


एक मूर्तिकार उच्चकोटि की ऐसी सजीव मूर्तियाँ बनाता था, जो सजीव लगती थीं। लेकिन उस मूर्तिकार को अपनी कला पर बड़ा घमंड था।

उसे जब लगा कि जल्दी ही उसक मृत्यु होने वाली है तो वह परेशानी में पड़ गया। यमदूतों को भ्रमित करने के लिये उसने एकदम अपने जैसी दस मूर्तियाँ उसने बना डालीं और योजनानुसार उन बनाई गईमूर्तियों के बीच मे वह स्वयं जाकर बैठ गया।

यमदूत जब उसे लेने आए तो एक जैसी ग्यारह आकृतियाँ देखकर स्तम्भित रह गए। इनमें से वास्तविक मनुष्य कौन है- नहीं पहचान पाए। वे सोचने लगे, अब क्या किया जाए। मूर्तिकार के प्राण अगर न ले सके तो सृष्टि का नियम टूट जाएगा और सत्य परखने के लिये मूर्तियाँ तोड़ें तो कला का अपमान होगा।

अचानक एक यमदूत को मानव स्वभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार की स्मृति आई। उसने चाल चलते हुए कहा- “काश इन मूर्तियों को बनाने वाला मिलता तो मैं से बताता कि मूर्तियाँ तो अति सुंदर बनाई हैं, लेकिन इनको बनाने में एक त्रुटि रह गई।”

यह सुनकर मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा कि मेरी कला में कमी कैसे रह सकत है, फिर इस कार्य में तो मैंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया है। वह बोल उठा-
“कैसी त्रुटि?”
झट से यमदूत ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला, बस यही त्रुटि कर गए तुम अपने अहंकार में। क्या जनते नहीं कि बेजान मूर्तियाँ बोला नहीं करतीं।

गर्व करना सीखें , घमण्ड करना नहीं ।

एक मूर्तिकार उच्चकोटि की ऐसी सजीव मूर्तियाँ बनाता था, जो सजीव लगती थीं। लेकिन उस मूर्तिकार को अपनी कला पर बड़ा घमंड था।

उसे जब लगा कि जल्दी ही उसक मृत्यु होने वाली है तो वह परेशानी में पड़ गया। यमदूतों को भ्रमित करने के लिये उसने एकदम अपने जैसी दस मूर्तियाँ उसने बना डालीं और योजनानुसार उन बनाई गईमूर्तियों के बीच मे वह स्वयं जाकर बैठ गया।

यमदूत जब उसे लेने आए तो एक जैसी ग्यारह आकृतियाँ देखकर स्तम्भित रह गए। इनमें से वास्तविक मनुष्य कौन है- नहीं पहचान पाए। वे सोचने लगे, अब क्या किया जाए। मूर्तिकार के प्राण अगर न ले सके तो सृष्टि का नियम टूट जाएगा और सत्य परखने के लिये मूर्तियाँ तोड़ें तो कला का अपमान होगा।

अचानक एक यमदूत को मानव स्वभाव के सबसे बड़े दुर्गुण अहंकार की स्मृति आई। उसने चाल चलते हुए कहा- "काश इन मूर्तियों को बनाने वाला मिलता तो मैं से बताता कि मूर्तियाँ तो अति सुंदर बनाई हैं, लेकिन इनको बनाने में एक त्रुटि रह गई।"

यह सुनकर मूर्तिकार का अहंकार जाग उठा कि मेरी कला में कमी कैसे रह सकत है, फिर इस कार्य में तो मैंने अपना पूरा जीवन समर्पित किया है। वह बोल उठा- 
"कैसी त्रुटि?" 
झट से यमदूत ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला, बस यही त्रुटि कर गए तुम अपने अहंकार में। क्या जनते नहीं कि बेजान मूर्तियाँ बोला नहीं करतीं।

गर्व करना सीखें , घमण्ड करना नहीं ।
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एक बार मगध के सम्राट बिम्बिसार


एक बार मगध के सम्राट बिम्बिसार संत सत्यकेतु के आश्रम में पहुंचे और दण्डवत होकर निवेदन किया कि भगवन इस विश्व में श्रेष्ठ और महान व्यक्ति कौन है?
सत्यकेतु ने सामने खेत में काम कर रही एक अधिक उम्र की वृद्धा की ओर संकेत करते हुए कहा- ‘उधर देखिए, उस वृद्धा के शरीर में शक्ति नहीं है, लेकिन कुदाली चला रही है। जानते हो क्यों?
तब सम्राट ने पूछा- क्यों? सत्यकेतु ने समझाया 100 वर्ष की अशक्त वृद्धा कुंआ अपने लिए नहीं खोद रही है। आप अपने लिए जीते हैं। मैं दूसरों के लिए जीता हूं। लेकिन यह वृद्धा मानव जाति के लिए जीना चाहती है।

कुंआ खोदकर यह आते-जाते राहगीरों को पानी पिलाएगी। इसमें शक्ति नहीं है और ना ही इसे कुएं की आवश्यकता है। फिर भी लोक कल्याण की भावना इसमें कितनी है आैर यह भविष्य की सोच रखने वाली है। इसलिए कहता हूं कि वह विश्व की महानतम प्राणी है।

संक्षेप में:

आप अपने लिए जीते हैं। अगर आप दूसरों के लिए जीते हैं तो इस तरह जीने का एक अलग मजा होता है इसे आप देख, सुन नहीं सकते बल्कि इसे महसूस कर सकते हैं।

एक बार मगध के सम्राट बिम्बिसार संत सत्यकेतु के आश्रम में पहुंचे और दण्डवत होकर निवेदन किया कि भगवन इस विश्व में श्रेष्ठ और महान व्यक्ति कौन है?
सत्यकेतु ने सामने खेत में काम कर रही एक अधिक उम्र की वृद्धा की ओर संकेत करते हुए कहा- 'उधर देखिए, उस वृद्धा के शरीर में शक्ति नहीं है, लेकिन कुदाली चला रही है। जानते हो क्यों?
तब सम्राट ने पूछा- क्यों? सत्यकेतु ने समझाया 100 वर्ष की अशक्त वृद्धा कुंआ अपने लिए नहीं खोद रही है। आप अपने लिए जीते हैं। मैं दूसरों के लिए जीता हूं। लेकिन यह वृद्धा मानव जाति के लिए जीना चाहती है।

कुंआ खोदकर यह आते-जाते राहगीरों को पानी पिलाएगी। इसमें शक्ति नहीं है और ना ही इसे कुएं की आवश्यकता है। फिर भी लोक कल्याण की भावना इसमें कितनी है आैर यह भविष्य की सोच रखने वाली है। इसलिए कहता हूं कि वह विश्व की महानतम प्राणी है।

संक्षेप में:

आप अपने लिए जीते हैं। अगर आप दूसरों के लिए जीते हैं तो इस तरह जीने का एक अलग मजा होता है इसे आप देख, सुन नहीं सकते बल्कि इसे महसूस कर सकते हैं।