Posted in हिन्दू पतन

बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड—!


बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड—!

बिहार धार्मिक न्यास बोर्ड क्या है और क्यों बनाया गया है ? इसका विश्लेषण होना जरूरी है जहां एक तरफ इसका समाज को लाभ दिखाई दे सकता है वहीं इसका दूसरा पक्ष भी जो बहुत ही खतरनाक भी है, मै आपको चीन और सोबियत रुश ले चलता हूँ वहाँ पर साम्य -वादियों की सत्ता आने के पश्चात उन लोगो ने जिन चर्च मे सोने छड़ी के क्रॉस थे जहां बौद्ध मंदिरों गुम्बों मे सोना-चाँदी की मूर्तियाँ अथवा अन्य बहुमूल्य सामाग्री थी शासकों ने उसे सुरक्षा के नाम पर राजकोष मे जमा कर धार्मिक आस्थाओं को समाप्त करने का प्रयास किया, नेपाल- चीन के प्रभाव मे आकर राजा महेंद्र ने गूठी संस्थान बनाकर पहाड़ और तराई के मंदिरों मे पूजित सोने-चाँदी की पूर्तियाँ उठा ली गयी तानाशाही के कारण कोई कुछ बोल नहीं सकता था सारा का सारा धार्मिक स्थल बिरान सा हो गया हैं।

भारत मे भी सीधे वामपंथियों का शासन तो नहीं था लेकिन नेहरू जी तो संयोग-वस हिन्दू थे इस कारण उनकी भारतीय संस्कृति, भारतीय राष्ट्र, सनातन परम्परा व हिन्दू धर्म मे कोई आस्था नहीं थी उन्होने सीधे हिन्दू धर्म पर हमला नहीं किया लेकिन उन्होने जिस नीति का अनुशरण किया वह हिन्दू बिरोधी थी भारत के कई प्रांतो मे अपने कांग्रेस नेताओं को साधू बना धार्मिक क्षेत्र को नास्तिक व हिन्दू बिरोधी अथवा भारत बिरोधी कराने का प्रयास किया उसी मे एक बिहार के हरिनारायणानंद जी भी हैं जो भारत साधू समाज जो कांग्रेस का एक काम है उन्हे इस कार्य मे लगा दिया, सर्वप्रथम नेहरू जी का ध्यान बिहार की तरफ आया उन्होने एक कांग्रेस कार्यकर्ता स्वामी हरीनारायना नन्द को 1951 मे न्यास बोर्ड बना उसका प्रथम अध्यक्ष बना दिया, बिहार मे हजारों मठ -मंदिर हैं जिनका समाज पर बहुत प्रभाव था वे उसे कैसे समाप्त करें उनके लिए धार्मिक न्यास बोर्ड बनाने का प्रयास किया स्वामी हरीनारायना नन्द के दिमाग मे था की कांग्रेस की सत्ता कभी समाप्त नहीं होगी सरकार से मिलकर हिन्दुत्व को समाप्त करने हेतु धार्मिक न्यास बोर्ड का गठन किया गया बस क्या था ? सब कुछ समाप्त हो गया।

न्यास बोर्ड का परिणाम धीरे -धीरे जब संतों का प्रभाव समाप्त होने लगा संत मात्र सिम्बौलिक (खेतों मे धोक के समान) रहने लगे उन्हे असुरक्षा भाव का अनुभव होने लगा, परम्पराएँ खंडित होने लगी सभी गुरुकुल बंद होने लगे जो मठ गावों मे सामाजिक केंद्र हुआ करते थे अब घृणा के पात्र होने लगे, न्यास बोर्ड की तुलना मुगल शासन से की जा सकती है जैसे उस काल मे जज़िया कर हिन्दू मंदिर, मठों पर था उस सामय के राजाओं, राणाओं ने जज़िया कर से छुटकारा था वहीं आज उससे अधिक मठों, मंदिरों से कर वसूला जा रहा है जिससे किसी मंदिर का विकास नहीं अपनी सरकार द्वारा ही धार्मिक विकास अवरुद्ध, यदि कोई महंत अपने मंदिर की मरम्मत करना चाहता है तो वह अपराधी हो जाता है इस कारण मंदिरों का विकाश अवरुद्ध हो गया, वामपंथियों ने हिन्दू धर्म पर परोक्ष हमला शुरू किया वे मानों नेहरू के ही सैनिक थे बाबाओं के ऊपर अनावस्यक आरोप लगा मठ का सरकारी करण शुरू कर दिया, परम्पराएँ समाप्त कर अपने ब्यक्ति जिंनका उस पंथ से कोई मतलब नहीं उन्हे महंत बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गयी, पहले तो किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन जब पूर्ब आईपीएस किशोर कुणाल न्यास के अध्यक्ष बने तब से साधू-संत परेशान हैं उन्होने समाज मे अपनी प्रतिष्ठा बना ली है और धर्म को समाप्त करने पर तुले हुए हैं अब वे नया पंथ बना जगतगुरु बनाना चाहते हैं कुछ मंदिरों को प्रतिष्ठित कर अन्य मंदिरों के महंतों को निकालना जैसे वे जगतगुरु हों अपने आफिस मे साधुओं का अपमान तो सामान्य सी बात है क्या वे किसी मुल्ला-मौलबी व फादर, पास्टर का अपमान कर सकते हैं ? कुणाल अपने समय के प्रतिष्ठित (जहां-जहां एसपी रहे वहाँ के लोगों का मत अच्छा नहीं) अफसरों मे गिने जाते हैं नितीश कुमार को एक हिन्दू बिरोधी पाखंडी हिन्दू चाहिए था वह कुणाल मिल गए उन्हे न्यास बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया सर्वबिदित है कि किशोर कुणाल पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहा राव के राम जन्म भूमि बिरोध की मुहिम के अगुवा थे इसी कारण हिन्दू बिरोधी- हिन्दू को आगे कर हिन्दुत्व समाप्त करना यही काम है, किशोर कुणाल मंदिरों को धार्मिक न्यास बोर्ड मे न लेकर अपने ब्यक्ति गत ट्रष्ट महावीर मंदिर ट्रष्ट के नाम लिखाना जैसे मुजफ्फरपुर का पोखर मंदिर जो करोणों की संपत्ति है, किसी बड़े मठ जो 100 से हजार एकड़ के हैं बाहुबली हैं कुणाल उसे अनदेखी करते हैं लेकिन जो सज्जन साधू हैं परंपरा से जुड़े हैं उन्हे परेशान करना उनकी नियति ही बन गयी है।

न्यास बोर्ड ने सनातन परंपरा को समाप्त करना ही नियति बना लिया है यदि सन्यासी परंपरा का मठ है तो वहाँ किसी और मत का साधू बैठाना यदि वैष्णव मत का है तो कबीर पंथी जब की न्यास को किसी मठ मे हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है वह केवल ब्यवस्था देख सकता है, संतों, महंतों की नियुक्ति करने का अधिकार उनके परंपरागत जगतगुरु, आचार्य को हैं वे सब के सब अयोध्या, मथुरा, काशी मे रहते हैं, साधू सन्यासियों का अपमान करना सेकुलर दिखाना, इतना ही नहीं न्यास बोर्ड का धन भारत बिरोधी, ”चर्च और मखताब, मदरसों” के लिए देना, यह समाज मे चर्चा का विषय बना हुआ है कारण कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सूचना अधिकार के तहत जब न्यास बोर्ड से पूछा कोई उत्तर नहीं मिला, वास्तविकता यह है कि न्यास बोर्ड की प्रासंगिकता ही समाप्त हो गयी है, अब इसका नए सिरे से गठन होना चाहिए मठो मे महंतों की नियुक्ति परंपरा से होनी चाहिए जिससे भारतीय संस्कृति सुरक्षित रह सके, हमारे मठ, मंदिर हमारी संस्कृति के केंद्र बिन्दु हैं बिना मठ, मंदिर और गुरुद्वारा के भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं की जा सकती वे हिन्दू समाज के प्रतीक हैं उसके साथ खिलवाड़ करना राष्ट्रीय अपराध है, सभी संप्रदायों के संत-महंतों और हिन्दू विचारकों से विचार -बिमर्श कर सरकार को न्यास बोर्ड मे संतों की भूमिका निर्धारित करना और ”बिहार धार्मिक न्यास वोर्ड” के पुनर्गठन के बारे मे सीघ्र निर्णय करना चाहिए।

यदि न्यास बोर्ड ईमानदार है बिहार सरकार सेकुलर है तो चर्च, बौद्ध मंदिर, जैन मंदिर और मस्जिद मदरसे क्यों नहीं न्यास बोर्ड मे–? क्या ये सब बिहार मे नहीं रहते–! हिन्दू ही निरीह प्राणी है-! जिसके धर्म व स्थलों पर जब चाहे तब जो चाहे सो करे लेकिन इनकी हिम्मत नहीं की हिन्दू धर्म के अलावा किसी का छेड़- छाड़ कर सके, आज हिन्दू समाज को आगे आकर अपने मठ- मंदिरों की सुरक्षा हेतु खड़ा ही नहीं लड़ना भी पड़े तो लड़ना चाहिए नहीं तो ये सेकुलरिष्ट हिंदुओं की परंपरा, धार्मिक पहचान समाप्त कर सेकुलर के नाम पर भारत का इस्लामीकरण करने का प्रयास करेगे, हिन्दू समाज को इस समय चैतन्य रहने की अवस्यकता है यह हिंदुओं का देश है अपने देश की रक्षा करना हमारा कर्तब्य है देश की रक्षा का मतलब है देश की संस्कृति, भाषा और धर्म की रक्षा जो एक-दो दिन मे नहीं तो हजारों, लाखों वर्षों की तपस्या से हमारे ऋषियों, मुनियों और चक्रवर्ती सम्राटों ने निर्माण किया है।

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