Posted in कविता - Kavita - કવિતા

मीडिया का मापदंड


मीडिया का मापदंड

असत्य पर, वो सत्य का एक वार होता है….
समाचार तो, एक समाज का आचार होता है….
बिक गयी जब मीडिया, तो सच का क्या है दोष….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

कभी काँग्रेस, कभी भाजपा की करते हैँ प्रशंसा….
लोगोँ को बरगलाना, इनकी बन गयी मंशा….
दौलत जहाँ मिले, वहीँ दरबार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

दिखाते थे कभी, बाबा के चमत्कारोँ की खबरेँ….
दिखाने लगे आश्रम मेँ, बलात्कारोँ की खबरेँ….
मन मेँ जाने कितना, व्याभिचार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

करते हैँ हिँदू मुस्लिम को, लड़वाने की बातेँ….
धर्म के ठेकेदारोँ को, वार्ता पे बिठाते….
चर्चा मेँ इनकी, जातिगत प्रहार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

कभी आँधी की, तूफान की, भूकंप की खबरेँ….
भगदड़ से मचे, लोगोँ मेँ हड़कंप की खबरेँ….
खबरोँ के बीच, विज्ञापन भरमार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

आसाँ हैँ इनकी खातिर, मुश्किल सभी रास्ते….
लाशोँ से ढकी वादी पर, ये खबरेँ तलाशते….
ऐसी ही दुखद खबरोँ का, इंतजार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

जिसको भी चाहेँ उसको, क्रांतिकारी बना देँ….
कवरेज की खातिर, ढोँग को दिलदारी बता देँ….
दौलत ही भूख, दौलत ही आहार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

आरुषि मर्डर केस हो, या दामिनी का बलात्कार….
मुंबई का रेप केस हो, या दंगो की कहीँ मार….
हर खबर पे, इनका नया व्यापार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

यकीँ न हो तो देख लो, अभी ताजा समाचार….
हुदहुद का हो रहा है, जाने कब से इंतजार….
खबरोँ की खाल से सजा, घरबार होता है….
हर पल झूठ और फरेब का, कारोबार होता है….

_अमित ‘मीत’

Posted in रामायण - Ramayan

एक दिन, राम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था।


एक दिन, राम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है। “यम को मुझ तक आने दो। मेरे लिए वैकुंठ, मेरे स्वर्गिक धाम जाने का समय आ गया है”, उन्होंने कहा। लेकिन मृत्यु के देवता यम अयोध्या में घुसने से डरते थे क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था।

यम के प्रवेश के लिए हनुमान को हटाना जरुरी था। इसलिए राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वंय का स्वरुप छोटा करते हुए बिलकुल भंवरे जैसा आकार बना लिया और केवल उस अंगूठी को ढूढंने के लिए छेद में प्रवेश कर गए, वह छेद केवल छेद नहीं था बल्कि एक सुरंग का रास्ता था जो सांपों के नगर नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया।

वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए जहां अंगूठियों का पहाड़ जैसा ढेर लगा हुआ था! “यहां आपको राम की अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा। हनुमान सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे क्योंकि ये तो भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सौभाग्य से, जो पहली अंगूठी उन्होंने उठाई वो राम की अंगूठी थी। आश्चर्यजनक रुप से, दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम की ही अंगूठी थी। वास्तव में वो सारी अंगूठी जो उस ढेर में थीं, सब एक ही जैसी थी। “इसका क्या मतलब है?” वह सोच में पड़ गए।

वासुकी मुस्कुराए और बाले, “जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं। दूसरे भाग या त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है और पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए यह सैकड़ो हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। अंगूठियां गिरती रहीं और इनका ढेर बड़ा होता रहा। भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां काफी जगह है”।

हनुमान जान गए कि उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह राम का उनको समझाने का मार्ग था कि मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकेगा। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे।

जीवन की यह चक्रीय शैली भारतीय विचारों के मूल में है। लेकिन पहले औपनिवेशिक और बाद में राजनैतिक बदलावों ने रामायण के प्रति हमारी समझ को विकृत कर दिया है। इसीलिए हर कोई राम को इतिहास और भूगोल में खोजना चाहता है और तिथियों व स्थान को लेकर विवाद करने पर आमादा है बजाय कि विस्तृत तस्वीर को देखने के।

राम अनंत और सार्वभौमिक हैं और इसीलिए उन्हें किसी काल व स्थान में बांधा नहीं जा सकता। इसीलिए उनका जन्मदिवस हर साल तब मनाया जाता है जब बसंत ऋतु जाने वाली और ग्रीष्म ऋतु आने वाली होती है। हर साल वो आते हैं, हर साल वो जाते हैं, जैसे ऋतुएं बदलती हैं। आस्थावान जानते हैं कि ऐसा कभी नहीं होगा जब राम नहीं लौटेंगे। वो आएंगे।

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

भारत में नहीं पाकिस्तान में है पहला शक्तिपीठ


भारत में नहीं पाकिस्तान में है पहला शक्तिपीठ

हमारे पड़ोसी मुल्क में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी किनारे अघोर पर्वत पर मां हिंगलाज भवानी मंदिर है। यह क्षेत्र पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बॉर्डर पर है।

कहा जाता है कि जब सतयुग में देवी सती ने अपना शरीर अग्निकुंड में समर्पित कर दिया था, तो भगवान शिव ने सती के जले शरीर को लेकर तांडव किया और फिर भगवान विष्णु ने उन्हें शांत करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के जले शरीर को टुकड़ों में विभाजित कर दिया था।

माना जाता है कि सती के शरीर का पहला टुकड़ा यानि सिर का एक हिस्सा यहीं अघोर पर्वत पर गिरा था। जिसे हिंगलाज व हिंगुला भी कहा जाता है यह स्थान कोटारी शक्तिपीठ के तौर पर भी जाना जाता है। बाकी शरीर के टुकड़े हिंदुस्तान के विभिन्न हिस्सों में गिरे,जो बाद में शक्तिपीठ कहलाए।

यहां है ‘नानी का मंदिर’

यह मंदिर बलूचिस्तान राज्य की राजधानी कराची से 120 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में हिंगोल नदी के तट के ल्यारी तहसील के मकराना के तटीय क्षेत्र में हिंगलाज में स्थित एक हिन्दू मंदिर है। यहां सती माता के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर यहां उनका ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था।इस मंदिर को ‘नानी का मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है।

कहते हैं कि हिंगलाज मंदिर को इंसानों ने नहीं बनाया। यहां पहाड़ी गुफा में देवी मस्तिष्क रूप में विराजमान हैं। यह स्थल पर्यटन की दृष्टि से भी बेहद अच्छा माना जाता है। 51 शक्तिपीठों में हिंगलाज पहला शक्तिपीठ माना गया है। शास्त्रों में इस शक्तिपीठ को आग्नेय तीर्थ कहा गया है।
दुनिया का सबसे बड़ा कीचड़ ज्वालामुखी
मंदिर से कुछ ही दूरी पर दुनिया का सबसे बड़ा कीचड़ वाला ज्वालामुखी भी है। चैत्र नवरात्र में यहां एक महीने तक काफी बड़ा मेला लगता है। मंदिर की खास बात यह भी है कि पहले कभी इस मंदिर के पुजारी मुस्लिम हुआ करते थे।

हालांकि पुजारी अभी भी मुस्लिम ही है

भारत में नहीं पाकिस्तान में है पहला शक्तिपीठ

हमारे पड़ोसी मुल्क में पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में हिंगोल नदी किनारे अघोर पर्वत पर मां हिंगलाज भवानी मंदिर है। यह क्षेत्र पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बॉर्डर पर है।

कहा जाता है कि जब सतयुग में देवी सती ने अपना शरीर अग्निकुंड में समर्पित कर दिया था, तो भगवान शिव ने सती के जले शरीर को लेकर तांडव किया और फिर भगवान विष्णु ने उन्हें शांत करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र से सती के जले शरीर को टुकड़ों में विभाजित कर दिया था।

माना जाता है कि सती के शरीर का पहला टुकड़ा यानि सिर का एक हिस्सा यहीं अघोर पर्वत पर गिरा था। जिसे हिंगलाज व हिंगुला भी कहा जाता है यह स्थान कोटारी शक्तिपीठ के तौर पर भी जाना जाता है। बाकी शरीर के टुकड़े हिंदुस्तान के विभिन्न हिस्सों में गिरे,जो बाद में शक्तिपीठ कहलाए।

यहां है 'नानी का मंदिर'

यह मंदिर बलूचिस्तान राज्य की राजधानी कराची से 120 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में हिंगोल नदी के तट के ल्यारी तहसील के मकराना के तटीय क्षेत्र में हिंगलाज में स्थित एक हिन्दू मंदिर है। यहां सती माता के शव को भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से काटे जाने पर यहां उनका ब्रह्मरंध्र (सिर) गिरा था।इस मंदिर को 'नानी का मंदिर' के नाम से भी जाना जाता है।

कहते हैं कि हिंगलाज मंदिर को इंसानों ने नहीं बनाया। यहां पहाड़ी गुफा में देवी मस्तिष्क रूप में विराजमान हैं। यह स्थल पर्यटन की दृष्टि से भी बेहद अच्छा माना जाता है। 51 शक्तिपीठों में हिंगलाज पहला शक्तिपीठ माना गया है। शास्त्रों में इस शक्तिपीठ को आग्नेय तीर्थ कहा गया है।
दुनिया का सबसे बड़ा कीचड़ ज्वालामुखी
मंदिर से कुछ ही दूरी पर दुनिया का सबसे बड़ा कीचड़ वाला ज्वालामुखी भी है। चैत्र नवरात्र में यहां एक महीने तक काफी बड़ा मेला लगता है। मंदिर की खास बात यह भी है कि पहले कभी इस मंदिर के पुजारी मुस्लिम हुआ करते थे।

हालांकि पुजारी अभी भी मुस्लिम ही है
Posted in गौ माता - Gau maata

पंचगव्य का उपयोग


पंचगव्य का उपयोग
1) देसी गाय के गोबर से लीपे हुये घर में प्लेग, हैजा जैसी बिमारीयां नहीं होती है I
2) देसी गाय के गोमूत्र अर्क में खडीशक्कर मिलाकर सेवन करने से मलावरोध, आँखों की जलजल दूर होती है I
3) देसी गाय के दही में सुंठ और मिरे डालकर सेवन करने से मूळव्याध में आराम मिलता है I
4) देसी गाय का मक्खन सेवन करने से वातरोग में आराम मिलता है I
5) देसी गाय का घी ह्रदयरोगी के लीये लाभदायक है, और मोटापा कम करता है I
आपको कोई शारीरिक प्रोब्लेम हो तो Facebook या Whats app पर कॉन्टॉक्ट करें 9922144444
www.krishnapriyagoshala.org

Posted in गौ माता - Gau maata

देसी गाय का महत्त्व


देसी गाय का महत्त्व
1) देसी गाय की आयु 19 साल तक मानी जाती है I
2) गाय उसके जीवन मे 15 बार गर्भवती रहेती है I
3) गोवंश 30 हजारे मेगावॅट ऊर्जा देता है I
4) गोधन से बढ़कर कोई धन नहीं है, क्योंकि गोवंश लक्ष्मी का मूळरुप है I
5) गाय साक्षात विष्णूरुपी है I
आपको कोई शारीरिक प्रोब्लेम हो तो Facebook या Whats app पर कॉन्टॉक्ट करें 9922144444
www.krishnapriyagoshala.org

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

शास्त्रीय अर्थों में मैं स्मृतिजीवी नहीं हूं, लेकिन मेरी स्मृति में कुछ


शास्त्रीय अर्थों में मैं स्मृतिजीवी नहीं हूं, लेकिन मेरी स्मृति में कुछ ऐसे चेहरे हैं, जिन्हें मैं भूल नहीं पायी । मैं अपवाद नहीं हूं, ऐसा तो आपके साथ भी होता होगा। आपके जेहन में भी ऐसे वाकये या चेहरे जरूर दर्ज होंगे, जिनकी कभी आपको अचानक याद आ जाती है।

जब मैं स्कूल में पढ़ती थी । कस्बानुमा हमारा शहर हिंदुस्तान के किसी भी दूसरे छोटे शहर की तरह ही था। मोहल्ला संस्कृति में रचा-बसा।

तब हमारे मोहल्ले में अक्सर एक बुजुर्ग फकीर आया करता था। हरे रंग का लबादानुमा लिबास। एक हाथ में लोभान का धुआं उड़ाता चिरागनुमा एक पात्र और दूसरे में झाड़ूनुमा झालर। उसके आते ही मोहल्ले में उसकी आवाज गूंजने लगती, या अली…. आई बला टाल…। वह गलियों में घुसता और आवाज लगाता, जिस घर के दरवाजे खुले हों, वहां थोड़ी देर ठिठक जाता। अक्सर महिलाएं या बच्चे निकलते और उसकी झोली में थोड़ा सा अनाज, पैसे डाल देते। उसके बाद वह देने वाले के चेहरे से सिर के ऊपर तक अपना चिरागनुमा पात्र घुमाता और फिर झाड़ुनुमा झालर उस पर फिराता और उसे दुआ देता।

लोगों को लगता कि उसकी दुआ से उनके दुख-दर्द दूर हो जाएंगे। लोभान की महक थोड़ी देर तक अजीब सा सम्मोहन पैदा कर देती। मुझे ध्यान नहीं आता कि कभी किसी ने उससे कहा हो कि आगे जाओ…। कई बार मैं भी उसके इस सम्मोहन में खींची चली गयी । देर तक उसकी आवाज गूंजती रहती…. या अली… आई बला टाल…।

उन्हीं दिनों हमारे स्कूल के रास्ते में स्कूल से थोड़ा पहले सड़क के किनारे एक बुजुर्ग औंधे मुंह लेटा होता। उसकी चादर के आसपास कुछ चिल्लर पड़ी होती। थोड़े-थोड़े अंतराल में वह ऊंची आवाज में कहता… हे राम… हे राम…।

हम कभी यह नहीं जान पाए कि उसे वहां रोज सुबह कौन लिटा जाता है। आते-जाते लोग कभी खुल्ले पैसे उसकी चादर में रख जाते। हम पैदल ही स्कूल जाते थे। बरसात का मौसम छोड़ दिया जाए, तो वह हमें अक्सर सड़क किनारे लेटा हुआ मिलता। उसे मैंने किसी से बात करते नहीं देखा। कोई बताता था कि उसकी बेटी उसे वहां लिटा जाती है, लेकिन मैंने कभी उसे वहां नहीं देखा। तब शायद कभी लगा ही नहीं कि सालो बाद उसका चेहरा मुझे इस तरह याद आएगा।

पता ही नहीं चला कि कैसे ये दोनों बूढ़े मेरी जिंदगी से बाहर हो गए। सच पूछिए तो बरसों तक उनकी कोई याद ही नहीं आई। वैसे साल में दो-तीन बार अब भी अपने शहर जाना होता है। पहले से शहर काफी बदल गया है। मेरा मोहल्ला भी पहले जैसा नहीं रहा। वह फकीर अब वहां नहीं आता। बला टालने में न जाने अब कौन लोगों की मदद करता होगा!
स्कूल जाने वाली वह सड़क भी काफी बदल गई है और अब तो उसका वह किनारा भी नजर नहीं आता, जहां वह बुजुर्ग आसमान की ओर ताकते हुए कहता था… हे राम… हे राम।

मैंने उन दोनों बूढ़ों के बारे में कभी किसी से कुछ नहीं पूछा। जाने क्यों ये दोनों बूढ़े इन महानगर में कभी-कभी याद आ जाते हैं।

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

स्टीफेन हकिंग ने भले ही बिग बैंग थियरी दे दी हो लेकिन इसके बारे मे जानकारी योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता मे पहले ही दे दी थी


स्टीफेन हकिंग ने भले ही बिग बैंग थियरी दे दी हो लेकिन इसके बारे मे जानकारी योगेश्वर श्री कृष्ण ने गीता मे पहले ही दे दी थी ………

संदर्भ के लिए भगवत गीता से लिए गए एक श्लोक के इस अनुवाद को पढ़िये ……

‘जैसे घडे के फूट जाने के बाद घडे की मिट्टी पुनः मिट्टी में मिल जाती है, समुद्र में उठी लहरों का जल पुनः समुद्र में समा जाता है, स्वर्ण आभूषणों को गलाने के बाद स्वर्ण पुनः अपने मौलिक रूप में परिवर्तित हो जाता है – उसी प्रकार शरीर में बन्धी आत्मा शरीर छोड देने के पश्चात पुनः परमात्मा में विलीन हो जाती है। अन्ततः सृष्टी में सभी अपने अपने मौलिक स्वरुप में जा मिलते हैं’

ठीक यही बात स्टीफेन हकिंग ने “The brief history of Time” मे कही तो उसे ब्रिटिश सरकार और पूरे विश्व ने सम्मान दिया , उन्हें कई अवार्ड भी मिले

लेकिन कोई कह दे की ये बात तो गीता मे छपी थी …. तब दुनिया उसका मज़ाक उड़ाएगी !!

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं, देवकी परमानन्दं श्री कृष्णं वन्दे जगतगुरुम् !


वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं,
देवकी परमानन्दं श्री कृष्णं वन्दे जगतगुरुम् !
आज के दिन श्रीकृष्णजी ने कंस का वध किया था आज मथुरा में कंस वध का मेला लगता है !!

वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनं,
देवकी परमानन्दं श्री कृष्णं वन्दे जगतगुरुम् !
आज के दिन श्रीकृष्णजी ने कंस का वध किया था आज मथुरा में कंस वध का मेला लगता है !!
Posted in संस्कृत साहित्य

भविष्यमहापुराण (प्रतिसर्गपर्व,3.3.1-27) में उल्लेख हैकि ‘शालिवाहन के वंश में १० राजाओं ने जन्म लेकर क्रमश: ५००वर्ष तक राज्य किया. अन्तिम दसवें राजा भोजराज हुए


भविष्यमहापुराण (प्रतिसर्गपर्व,3.3.1-27) में उल्लेख हैकि ‘शालिवाहन के वंश में १० राजाओं ने जन्म लेकर क्रमश: ५००वर्ष तक राज्य किया. अन्तिम दसवें राजा भोजराज हुए
।उन्होंनेदेश की मर्यादा क्षीणहोती देख दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया ।उनकी सेना दस हज़ार थी और उनके साथ कालिदास एवं अन्य विद्वान्-ब्राह्मण भी थे ।उन्होंने सिंधु नदी को पार करके गान्धार, म्लेच्छ औरकाश्मीर के शठ राजाओं को परास्त किया और उनका कोश छीनकर उन्हें दण्डित किया ।उसी प्रसंग में मरुभूमि मक्का पहुँचने पर आचार्यएवं शिष्यमण्डल के साथ म्लेच्छ महामद (मुहम्मद) नामव्यक्ति उपस्थित हुआ ।राजा भोज ने मरुस्थल (मक्का) में विद्यमान महादेव जी का दर्शन किया ।

महादेवजी को पंचगव्यमिश्रित गंगाजल से स्नान कराकर चन्दनादि से भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया और उनकी स्तुति की:“हे मरुस्थल में निवासकरने वाले तथा म्लेच्छों से गुप्त शुद्ध सच्चिदानन्दरूपवालेगिरिजापते !
आप त्रिपुरासुर के विनाशक तथा नानाविध मायाशक्ति केप्रवर्तक हैं । मैं आपकी शरण में आया हूँ, आप मुझे अपना दास समझें । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।”

इस स्तुति को सुनकर भगवान् शिव ने राजा से कहा- “हे भोजराज !तुम्हें महाकालेश्वर तीर्थ (उज्जयिनी) में जाना चाहिए ।यह ‘वाह्लीक’ नामकी भूमि है, पर अब म्लेच्छों से दूषितहो गयी है । इस दारुण प्रदेश में आर्य-धर्म हैही नहीं ।महामायावी त्रिपुरासुर यहाँ दैत्यराज बलि द्वारा प्रेषितकिया गया है ।वह मानवेतर, दैत्यस्वरूप मेरे द्वारा वरदान पाकर मदमत्तहो उठा है और पैशाचिक कृत्य में संलग्न होकर महामद(मुहम्मद) के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। पिशाचों और धूर्तों सेभरे इस देश में हे राजन् ! तुम्हें नहीं आना चाहिए ।हे राजा ! मेरी कृपा से तुम विशुद्ध हो ।

भगवान् शिवके इन वचनों को सुनकर राजा भोज सेना सहित पुनः अपने देश में वापस आ गये । उनके साथ महामद भी सिंधुतीर पर पहुँच गया ।अतिशयमायावी महामद ने प्रेमपूर्वक राजा से कहा- ”आपके देवता ने मेरा दासत्व स्वीकार कर लिया है ।”राजा यहसुनकर बहुत विस्मित हुए।

और उनका झुकाव उस भयंकरम्लेच्छ के प्रति हुआ ।उसे सुनकर कालिदास ने रोषपूर्वक महामद से कहा-“अरे धूर्त ! तुमने राजा को वश में करने के लिएमाया की सृष्टि की है ।
तुम्हारे जैसेदुराचारी अधम पुरुष को मैं मार डालूँगा ।“ यह कहकर कालिदास नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐंह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) के जप मेंसंलग्न हो गये । उन्होंने (नवार्ण मन्त्र का)
दस सहस्र जपकरके उसका दशांश (एक सहस्र) हवन किया ।
उससे वहमायावी भस्म होकर म्लेच्छ-देवता बन गया ।

इससे भयभीत होकर उसके शिष्य वाह्लीकदेश वापस आ गये और अपने गुरु का भस्म लेकरमदहीनपुर (मदीना) चले गए औरवहां उसे स्थापित कर दिया जिससे वह स्थान तीर्थ
केसमान बन गया।एक समय रात में अतिशय देवरूप महामद नेपिशाच का देह धारणकर राजा भोज से कहा-”हे राजन् !

आपका आर्य धर्म सभी धर्मों में उत्तम है, लेकिनमैं उसे दारुण पैशाचधर्म में बदल दूँगा ।उस धर्म मेंलिंगच्छेदी (सुन्नत/खतना करानेवाले),शिखाहीन, दढि़यल, दूषित आचरण करनेवाले, उच्चस्वर में बोलनेवाले (अज़ान देनेवाले), सर्वभक्षी मेरेअनुयायी होंगे ।कौलतंत्र केबिना ही पशुओं का भक्षण करेंगे. उनका सारा संस्कारमूसल एवं कुश से होगा ।इसलिये ये जाति से धर्म को दूषित करनेवाले ‘मुसलमान’ होंग

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

दिल्ली के नरपिशाच बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने जब चित्तोड़ की महारानी पद्यमिनी


विश्व सबसे साहसिक घटनाओं में से एक…………..

दिल्ली के नरपिशाच बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने जब चित्तोड़ की महारानी पद्यमिनी के रूप की चर्चा सुनी ,तो वह रानी को पाने के लिए आतुर हो बैठा । उसने राणा रतन सिंह को संदेश भेजा की वह रानी पद्यमिनी को उसको सोंप दे वरना वह चित्तोड़ की ईंट से ईंट बजा देगा। अलाउद्दीन की धमकी सुनकर राणा रतन सिंह ने भी उस नरपिशाच को जवाब दिया की वह उस दुष्ट से रणभूमि में बात करेंगे।

कामपिपासु अलाउद्दीन ने महारानी को अपने हरम में डालने के लिए सन १३०३ में चित्तोड़ पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीरो ने उसका स्वागत अपने हथियारों से किया। राजपूतों ने इस्लामिक नरपिशाचों की उतम सेना वाहिनी को मूली गाजर की तरह काट डाला। एक महीने चले युद्ध के पश्चात् अलाउद्दीन को दिल्ली वापस भागना पड़ा। चित्तोड़ की तरफ़ से उसके होसले पस्त हो गए थे। परन्तु वह महारानी को भूला नही था।कुछ समय बाद वह पहले से भी बड़ी सेना लेकर चित्तोड़ पहुँच गया। चित्तोड़ के १०००० सैनिको के लिए इस बार वह लगभग १००००० की सेना लेकर पहुँचा। परंतु उसकी हिम्मत चित्तोड़ पर सीधे सीधे आक्रमण की नही हुई। उस पिशाच ने आस पास के गाँवो में आग लगवा दी, हिन्दुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया। हिंदू ललनाओं के बलात्कार होने लगे।

उसके इस आक्रमण का प्रतिकार करने के लिए जैसे ही राजपूत सैनिक दुर्ग से बहार आए , अलाउदीन ने एक सोची समझी रणनीति के अनुसार कुटिल चाल चली। उसने राणा को संधि के लिए संदेश भेजा। राणा रतन सिंह भी अपनी प्रजा के कत्लेआम से दुखी हो उठे थे। अतः उन्होने अलाउद्दीन को दुर्ग में बुला लिया। अथिति देवो भवः का मान रखते हुए राणा ने अलाउद्दीन का सत्कार किया तथा उस वहशी को दुर्ग के द्वार तक छोड़ने आए। अलाउद्दीन ने राणा से निवेदन किया की वह उसके तम्बू तक चले । राणा रतन सिंह उसके झांसे में आ गए। जैसे ही वो उसकी सेना के दायरे में आए मुस्लमान सैनिकों ने झपटकर राणा व उनके साथिओं को ग्रिफ्तार कर लिया। अब उस दरिन्दे ने दुर्ग में कहला भेजा कि महारानी पद्यमिनी को उसके हरम में भेज दिया जाय, अन्यथा वह राणा व उसके साथियों को तड़पा तड़पा कर मार डालेगा। चित्तोड़ की आन बान का प्रश्न था। कुछ चुनिन्दा राजपूतों की बैठक हुई। बैठक में एक आत्मघाती योजना बनी। जिसके अनुसार अलाउद्दीन को कहला भेजा की रानी पद्यमिनी अपनी ७०० दासिओं के साथ अलाउद्दीन के पास आ रही हैं। योजना के अनुसार महारानी के वेश में एक १४ वर्षीय राजपूत बालक बादल को शस्त्रों से सुसज्जित करके पालकी में बैठा दिया गया। बाकि पालकियों में भी चुनिन्दा ७०० राजपूतों को दासिओं के रूप में हथियारों से सुसज्जित करके बैठाया गया। कहारों के भेष में भी राजपूत सैनिकों को तैयार किया गया। लगभग 2100 राजपूत वीर गोरा , जो की बादल का चाचा था, के नेतृत्व में १००००० इस्लामिक पिशाचों से अपने राणा को आजाद कराने के लिए चल दिए।

अलाउद्दीन ने जैसे ही दूर से छदम महारानी को आते देखा , तो वह खुशी से चहक उठा। रानी का कारंवा उसके तम्बू से कुछ दूर आकर रूक गया। अलाउद्दीन के पास संदेश भेजा गया कि महारानी राणा से मिलकर विदा लेना चाहती हैं। खुशी में पागल हो गए अलाउद्दीन ने बिना सोचे समझे राणा रतन सिंह को रानी की पालकी के पास भेज दिया। जैसे ही राणा छदम रानी की पालकी के पास पहुंचे , लगभग ५०० राजपूतों ने राणा को अपने घेरे में ले लिया और दुर्ग की तरफ़ बढ गए। अचानक चारो और हर हर महादेव के नारों से आकाश गूंजा, बचे हुए १६०० राजपूत ,१००००० इस्लामिक पिशाचों पर यमदूत बनकर टूट पड़े। धोखेबाज इस्लामिक सैनिक हाय अल्लाह, मर गए अल्लाह और धोखा धोखा करते हुए चारों और भागने लगे। १६०० हिंदू वीरों ने अलाउद्दीन की लगभग ९००० की सेना को देखते ही देखते काट डाला और सदा के लिए भारत माता की गोद में सो गए। इस आत्मघाती रणनीति में दो वीर पुरूष गोरा व बादल भारत की पोराणिक कथाओं के नायक बन गए। इस युद्ध में नरपिशाच अलाउद्दीन खिलजी भी बुरी तरह घायल हुआ।यह इतिहास की घटना विश्व इतिहास की महानतम साहसिक घटनाओं में से एक है।

जयतु जयतु हिन्दू राष्ट्रम्, अखिल भारत हिन्दू महासभा, जोधपुर

विश्व सबसे साहसिक घटनाओं में से एक..............

दिल्ली के नरपिशाच बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने जब चित्तोड़ की महारानी पद्यमिनी के रूप की चर्चा सुनी ,तो वह रानी को पाने के लिए आतुर हो बैठा । उसने राणा रतन सिंह को संदेश भेजा की वह रानी पद्यमिनी को उसको सोंप दे वरना वह चित्तोड़ की ईंट से ईंट बजा देगा। अलाउद्दीन की धमकी सुनकर राणा रतन सिंह ने भी उस नरपिशाच को जवाब दिया की वह उस दुष्ट से रणभूमि में बात करेंगे। 

कामपिपासु अलाउद्दीन ने महारानी को अपने हरम में डालने के लिए सन १३०३ में चित्तोड़ पर आक्रमण कर दिया। भारतीय वीरो ने उसका स्वागत अपने हथियारों से किया। राजपूतों ने इस्लामिक नरपिशाचों की उतम सेना वाहिनी को मूली गाजर की तरह काट डाला। एक महीने चले युद्ध के पश्चात् अलाउद्दीन को दिल्ली वापस भागना पड़ा। चित्तोड़ की तरफ़ से उसके होसले पस्त हो गए थे। परन्तु वह महारानी को भूला नही था।कुछ समय बाद वह पहले से भी बड़ी सेना लेकर चित्तोड़ पहुँच गया। चित्तोड़ के १०००० सैनिको के लिए इस बार वह लगभग १००००० की सेना लेकर पहुँचा। परंतु उसकी हिम्मत चित्तोड़ पर सीधे सीधे आक्रमण की नही हुई। उस पिशाच ने आस पास के गाँवो में आग लगवा दी, हिन्दुओं का कत्लेआम शुरू कर दिया। हिंदू ललनाओं के बलात्कार होने लगे।

उसके इस आक्रमण का प्रतिकार करने के लिए जैसे ही राजपूत सैनिक दुर्ग से बहार आए , अलाउदीन ने एक सोची समझी रणनीति के अनुसार कुटिल चाल चली। उसने राणा को संधि के लिए संदेश भेजा। राणा रतन सिंह भी अपनी प्रजा के कत्लेआम से दुखी हो उठे थे। अतः उन्होने अलाउद्दीन को दुर्ग में बुला लिया। अथिति देवो भवः का मान रखते हुए राणा ने अलाउद्दीन का सत्कार किया तथा उस वहशी को दुर्ग के द्वार तक छोड़ने आए। अलाउद्दीन ने राणा से निवेदन किया की वह उसके तम्बू तक चले । राणा रतन सिंह उसके झांसे में आ गए। जैसे ही वो उसकी सेना के दायरे में आए मुस्लमान सैनिकों ने झपटकर राणा व उनके साथिओं को ग्रिफ्तार कर लिया। अब उस दरिन्दे ने दुर्ग में कहला भेजा कि महारानी पद्यमिनी को उसके हरम में भेज दिया जाय, अन्यथा वह राणा व उसके साथियों को तड़पा तड़पा कर मार डालेगा। चित्तोड़ की आन बान का प्रश्न था। कुछ चुनिन्दा राजपूतों की बैठक हुई। बैठक में एक आत्मघाती योजना बनी। जिसके अनुसार अलाउद्दीन को कहला भेजा की रानी पद्यमिनी अपनी ७०० दासिओं के साथ अलाउद्दीन के पास आ रही हैं। योजना के अनुसार महारानी के वेश में एक १४ वर्षीय राजपूत बालक बादल को शस्त्रों से सुसज्जित करके पालकी में बैठा दिया गया। बाकि पालकियों में भी चुनिन्दा ७०० राजपूतों को दासिओं के रूप में हथियारों से सुसज्जित करके बैठाया गया। कहारों के भेष में भी राजपूत सैनिकों को तैयार किया गया। लगभग 2100 राजपूत वीर गोरा , जो की बादल का चाचा था, के  नेतृत्व  में १००००० इस्लामिक पिशाचों से अपने राणा को आजाद कराने के लिए चल दिए।  

अलाउद्दीन ने जैसे ही दूर से छदम महारानी को आते देखा , तो वह खुशी से चहक उठा। रानी का कारंवा उसके तम्बू से कुछ दूर आकर रूक गया। अलाउद्दीन के पास संदेश भेजा गया कि महारानी राणा से मिलकर विदा लेना चाहती हैं। खुशी में पागल हो गए अलाउद्दीन ने बिना सोचे समझे राणा रतन सिंह को रानी की पालकी के पास भेज दिया। जैसे ही राणा छदम रानी की पालकी के पास पहुंचे , लगभग ५०० राजपूतों ने राणा को अपने घेरे में ले लिया और दुर्ग की तरफ़ बढ गए। अचानक चारो और हर हर महादेव के नारों से आकाश गूंजा, बचे हुए १६०० राजपूत ,१००००० इस्लामिक पिशाचों पर यमदूत बनकर टूट पड़े। धोखेबाज इस्लामिक सैनिक हाय अल्लाह, मर गए अल्लाह और धोखा धोखा करते हुए चारों और भागने लगे।  १६०० हिंदू वीरों ने अलाउद्दीन की लगभग ९००० की सेना को देखते ही देखते काट डाला और सदा के लिए भारत माता की गोद में सो गए। इस आत्मघाती रणनीति में दो वीर पुरूष गोरा व बादल भारत की पोराणिक कथाओं के नायक बन गए। इस युद्ध में नरपिशाच अलाउद्दीन खिलजी भी बुरी तरह घायल हुआ।यह इतिहास की घटना विश्व इतिहास की महानतम साहसिक घटनाओं में से एक है।

जयतु जयतु हिन्दू राष्ट्रम्, अखिल भारत हिन्दू महासभा, जोधपुर