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पितृविसर्जन—नवरात्र—विजयादशमी


भारतीय इतिहास व संस्कृति ? आरम्भ से समझने की वस्तु ?? अन्यथा ???

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पितृविसर्जन—नवरात्र—विजयादशमी
बात प्रायः 10,000 वर्ष से भी कहीं अधिक प्राचीन है। तब “भरतखण्ड व भारतवर्ष” शब्दों का अस्तित्व नहीं था और यह देश “कुमारिका खण्ड” अथवा “शक्ति लोक” कहलाता था। तब इस देश के निवासी “शाक्त” कहलाते थे और उनकी संस्कृति “शाक्त संस्कृति” कहलाती थी जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में सागरपर्यन्त विस्तृत थी। “अधोशीर्ष त्रिभुज” इस संस्कृति का प्रतीक था जिसके उपरिशीर्ष “उदरस्थ दोनों अण्डाशयों” के द्योतक थे तथा अधोशीर्ष “स्त्री-जननांग” का। केवल स्त्री-जननांग भी इस संस्कृति का प्रतीक था। सांख्य के त्रिगुणों की संकल्पना सर्वप्रथम इसी संस्कृति के पास थी। “वर्तमान बांग्लादेश एवं पश्चिम बंगाल प्रदेश” को इसका आदर्श भाग एवं केन्द्र माना जाता था। हिमालय व सागर की सर्वाधिक निकटता इस भूभाग की प्रमुख विशेषता है। धान्य (चावल) का उत्पादन, मत्स्य-पालन एवं आखेट ही प्रमुख व्यवसाय थे। यह एक मातृ-सत्तात्मक अथवा मातृमूलक संस्कृति थी जिसमें छोटे-छोटे ग्राम थे। प्रत्येक ग्राम का शासन सूत्र स्त्री के हाथ में होता था जो माता से ज्येष्ठ पुत्री को प्राप्त होता था। पुत्री को “कन्या” कहा जाता था जो ग्राम की स्थायी निवासिनी तथा माता की संपत्ति की उत्तराधिकारिणी होती थी। पुत्र को “वीर” कहा जाता था जो ग्राम का अस्थायी निवासी तथा माता की संपत्ति का रक्षक एवं वर्धक होता था। प्रत्येक ग्राम के निवासी एक ही मातृ-वंश के होते थे। Mitochondrial DNA-marker नामक कोशिकीय तत्त्व ही मातृ-वंश का द्योतक होता है। मातृ-वंश की आदि पूर्वजा को “शक्ति” कहा जाता था। समान मातृ-वंश अथवा समान शक्ति वाले स्त्री-पुरुष का विवाह निषिद्ध था अर्थात् मातृष्वसा (मौसी) की कन्या के साथ विवाह निषिद्ध था और वह माता व मातृष्वसा की ही भाँति पूजनीया होती थी।
“वासन्ती नवरात्र” के अवसर पर प्रत्येक ग्राम में अविवाहित रजस्वला कन्याओं के विवाहार्थ “स्वयंवर” का आयोजन किया जाता था जिसमें अन्य मातृ-वंशों के पुरुष भाग लेते थे और कन्याएँ उनका वरण करती थीं। स्त्री के लिए “बहुविवाह” (polygamy) निषिद्ध था और पुरुष के लिए “एकविवाह” (monogamy) को आदर्श माना जाता था। विवाहोपरान्त “वर अथवा पति” अपनी पत्नी के ग्राम में रहने लगता था और पत्नी के भ्राता विवाहित युगल के लिए समस्त व्यवस्था करते थे। सन्तान का जन्म हो जाने पर पुरुष अपने पिता बनने का समाचार देने के लिए शारदीय नवरात्र के अवसर पर अपनी माता के ग्राम पहुँच जाता था। इसके लिए वह शारदीय नवरात्र के पूर्व पितृपक्ष में ही अपनी पत्नी के ग्राम से निकल पड़ता था। इस घटना को उसकी सन्तानें “पितृविसर्जन” का नाम देती थीं। आदर्श पुरुष वही माना जाता था जो पत्नीग्राम व मातृग्राम में समानरूपेण 6-6 मास निवास करता था।
शाक्त संस्कृति में “माता, भगिनी व पुत्री के प्रति अनासक्ति”, “विवाह होने तक कौमार्य” एवं “रजस्वला होने के उपरान्त कन्या का विवाह” ये तीन अनिवार्य नियम थे जिन्हें न मानने वाले “पिशाच” कहलाते थे। पिशाचों की संस्कृति “पैशाच संस्कृति” कहलाती थी और “उपरिशीर्ष त्रिभुज” इस संस्कृति का प्रतीक था जिसके अधोशीर्ष “दोनों वृषणों” के द्योतक थे तथा उपरिशीर्ष “पुरुष-जननांग” का। केवल पुरुष-जननांग भी इस संस्कृति का प्रतीक था। महानदी के दक्षिण में स्थित सागर तट इस संस्कृति का केन्द्र था। पिशाचों को महानदी के उत्तर में आने की अनुमति नहीं थी।
शाक्त संस्कृति में ब्रह्मा नामक एक परम विद्वान् हुए। अपने पत्नीग्राम में निवास करते समय एक बार वे अपनी ही अरजस्वला पुत्री पर आसक्त हो गए जिसके परिणामस्वरूप उन्हें बहिष्कृत कर महानदी के दक्षिण में भेज दिया गया। विवश होकर उन्होंने पिशाचों की शरण ली। पिशाच उनकी विद्वत्ता से अति प्रभावित हुए। इन्हीं प्रभावित पिशाचों को लेकर उन्होंने एक नवीन संस्कृति बनाई जो पितृ-सत्तात्मक अथवा पितृमूलक थी। इसमें प्रत्येक ग्राम का शासन सूत्र एक पुरुष के हाथ में होता था जो “अग्रणी” कहलाता था। कुछ निश्चित ग्रामों का समूह “गण” कहलाता था जिसका प्रमुख “गणपति” होता था। इस संस्कृति में पुत्र ग्राम का स्थायी निवासी तथा पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी होता था न कि पुत्री।
ब्रह्मा ने प्रभावित पिशाचों के लिए स्वगण की कन्या से विवाह को प्रतिबन्धित किया तथा किशोरावस्था से पूर्व बाल-विवाह का नियम बनाया ताकि उनकी कामुकता अनियन्त्रित होने के पूर्व ही एक समाजोपयोगी मार्ग पा सके। एतदर्थ उन्होंने विवाह को दो चरणों में विभक्त कर दिया। प्रथम चरण में पिता अपनी अरजस्वला पुत्री एक योग्य बालक को सौंपता था तथा बालक के माता-पिता कन्या के रजस्वला होने तक विवाहित युगल के मिलन को प्रतिबन्धित रखते थे। पतिगृह में निवास करते हुए विवाहिता के रजस्वला व सद्योस्नाता होने पर विवाह का द्वितीय चरण आयोजित होता था जिसके उपरान्त विवाहित युगल के मिलन का प्रतिबन्ध समाप्त हो जाता था। कालान्तर में विवाह के दोनों चरणों का आयोजन कन्या के पितृगृह में ही होने लगा। यह “नवीन पैशाच संस्कृति” ही “ब्राह्मण संस्कृति” कहलाई। ब्रह्मा को इस संस्कृति का “पितामह” कहा गया, अतः यह “पैतामह संस्कृति” भी कहलाई। यह “अग्रणी संस्कृति” तथा “गण संस्कृति” भी कहलाती थी। ब्राह्मण संस्कृति ने स्वयं के लिए पैशाच संस्कृति के ही प्रतीकों का वरण कर लिया। महानदी व गोदावरी नदी के मध्य स्थित सागर तट इस संस्कृति का केन्द्र बन गया। जिन पिशाचों ने ब्राह्मण संस्कृति का वरण नहीं किया उन्हें गोदावरी नदी के उत्तर में आने की अनुमति नहीं थी।
भले ही ब्राह्मण संस्कृति में कन्याओं के पास स्वयंवर का अधिकार नहीं था किन्तु इसने गर्हित पिशाचों के लिए समाजोपयोगी बनने का द्वार खोल दिया। इतना ही नहीं, ब्राह्मण संस्कृति को शाक्त संस्कृति की तुलना में अधिक सरल एवं शिव (कल्याणकारी) माना जाने लगा, अतः यह “शैव संस्कृति” भी कहलाई। कालान्तर में “रुद्रों” ने गण-व्यवस्था का एकीकरण व प्रसार किया और कैलाश पर्वत को इस व्यवस्था का केन्द्र बनाया। इस प्रकार शाक्त, पैशाच व ब्राह्मण – ये तीनों संस्कृतियाँ मूलतः इसी देश में उत्पन्न हुईं।
ब्राह्मण संस्कृति के उदय के उपरान्त इस देश में क्रमशः प्राजापत्य, गान्धर्व, आर्ष, दैव व आसुर संस्कृतियों की छोटी-छोटी टोलियों का प्रवेश हुआ। ये सभी संस्कृतियाँ पितृमूलक थीं अर्थात् इनमें पितृ-वंश की परम्परा थी। Y-DNA-marker नामक कोशिकीय तत्त्व ही पितृ-वंश का द्योतक होता है। आर्ष, दैव व आसुर संस्कृतियों में विवाह के अवसर पर कन्या का पिता वर से कन्या का मूल्य वसूल करता था।
प्राजापत्य संस्कृति के सदस्य “विश् अथवा प्रजा” कहलाते थे। अजापालन (goat-herding) इनका प्रमुख व्यवसाय था। इनका शासक “विश्पति अथवा प्रजापति” कहलाता था। प्राजापत्य संस्कृति में शासक के अतिरिक्त नवीन वंश के प्रवर्तक, संस्कृति के प्रसारक तथा नवीन ज्ञान के दाता भी प्रजापति कहलाते थे। सर्वप्रथम जिसने अजापालन आरम्भ किया था उस व्यक्ति को यह संस्कृति “अज” के नाम से स्मरण करती थी। वर्तमान हिमाचल प्रदेश एवं उससे निकली नदियों से सिंचित भूभाग प्राजापत्य संस्कृति का केन्द्र था। रुद्रों के कारण ब्राह्मण संस्कृति का प्राजापत्य संस्कृति
पर नियन्त्रण स्थापित हो गया था।
प्राजापत्य संस्कृति से ही गान्धर्व संस्कृति का जन्म हुआ था। यह संस्कृति भी स्वयं को “अज” से जोड़ती थी। गान्धर्व संस्कृति के सदस्य पुरुष को “गन्धर्व” तथा स्त्री को “अप्सरा” कहा जाता था। अविपालन (sheep-herding or shepherding) एवं संगीत (नृत्य, गायन व वादन) इनके प्रमुख व्यवसाय थे। “वर्तमान अफगानिस्तान” गान्धर्व संस्कृति का केन्द्र था।
आर्ष संस्कृति के सदस्य “ऋषि” कहलाते थे। गोधूम-कृषि (गेहूँ की खेती) एवं गोपालन इनके प्रमुख व्यवसाय थे। ये “गोत्र” नामक समूहों में विभक्त रहते थे जिनके सदस्य प्रायः एक ही वंश के होते थे। प्रत्येक गोत्र का शासक “महर्षि” कहलाता था। आर्ष संस्कृति में शासक के अतिरिक्त नवीन वंश के प्रवर्तक, संस्कृति के प्रसारक तथा नवीन ज्ञान के दाता भी महर्षि कहलाते थे। सर्वप्रथम जिसने गोपालन आरम्भ किया था उस व्यक्ति को यह संस्कृति “कश्यप” के नाम से स्मरण करती थी। सतलज नदी के दक्षिण में स्थित मैदानी भूभाग आर्ष संस्कृति का केन्द्र था।
आर्ष संस्कृति से ही दैव संस्कृति का जन्म हुआ था। यह संस्कृति भी स्वयं को “कश्यप” से जोड़ती थी। दैव संस्कृति के सदस्य “देव” कहलाते थे। अश्वपालन इनका प्रमुख व्यवसाय था। इनके पास सौर पंचांग था और ये अग्निहोत्र भी करते थे। इनका शासक “इन्द्र” कहलाता था। वर्तमान जम्मू व कश्मीर प्रदेश एवं उससे निकली नदियों से सिंचित भूभाग दैव संस्कृति का केन्द्र था।
आसुर संस्कृति अत्यन्त उन्नत संस्कृति थी। यह संस्कृति भी स्वयं को “कश्यप” से जोड़ती थी। आसुर संस्कृति के सदस्य “असुर” कहलाते थे। देवों व ऋषियों की समस्त विशेषताओं के साथ-साथ वे रथ-निर्माण, नहर-निर्माण, वाटिका-निर्माण, प्रस्तर व इष्टका पर आधारित स्थापत्य कला, स्वर्ण-आधारित वाणिज्य, तपोविद्या एवं अध्यात्म (मनोविज्ञान) के प्रवर्तक थे। आसुर संस्कृति की जो शाखा भारत में प्रविष्ट हुई वह स्वयं को “मनुओं” से जोड़ती थी, अतः वह “मानव संस्कृति” भी कहलाती थी। यह संस्कृति मनुष्यों को प्रमुखतः चार प्रकारों में विभक्त करती थी – ज्ञानार्थी, बलार्थी, धनार्थी व भोगार्थी किन्तु इन प्रकारों को वह पूर्णतया आनुवांशिक नहीं मानती थी। यह संस्कृति प्रथम मानव को “स्वयंभू” तथा उनके पुत्र को “स्वायम्भुव मनु” के नाम से स्मरण करती थी। इस प्रकार मानव संस्कृति मानव इतिहास के प्रथम बिन्दु तक जाने का प्रयास करती थी। इसके शासक “राजा” कहलाते थे, अतः इसे “राजन्य संस्कृति” भी कहा जाता था। मनुओं व श्रेष्ठ राजाओं को “राजर्षि” भी कहा गया है। सर्वप्रथम राजर्षियों द्वारा उपदिष्ट होने के कारण अध्यात्म-विद्या को राजविद्या, राजयोग, राजगुह्ययोग आदि नामों से भी जाना जाता था।
कालान्तर में ब्राह्मण संस्कृति ने आर्ष व दैव संस्कृतियों को स्वयं में विलीन कर लिया। इस विलय का केन्द्र-स्थल “ब्रह्मावर्त” कहलाया। प्राजापत्य व आसुर संस्कृतियों ने भी शाक्तों के एक-एक बड़े अंश को स्वयं में विलीन कर लिया। ये विलीन शाक्त क्रमशः “वैश्य” व “क्षत्रिय” कहलाए। “एक अधोशीर्ष त्रिभुज व एक उपरिशीर्ष त्रिभुज का संयोग” वैश्य संस्कृति (जन संस्कृति) का प्रतीक बना।
वैश्य संस्कृति (जन अथवा नन्दिनी संस्कृति) तो ब्राह्मण संस्कृति के नियन्त्रण में थी किन्तु क्षत्रिय संस्कृति (मानव अथवा राजन्य संस्कृति) पर ब्राह्मण संस्कृति का कोई नियन्त्रण नहीं था, फलतः दोनों संस्कृतियों के मध्य संघर्ष हुआ। ब्रह्मर्षि वसिष्ठ व राजर्षि कौशिक के संघर्ष की गाथा इसी सांस्कृतिक संघर्ष को द्योतित करती है। इस संघर्ष में वैश्य संस्कृति ने ब्राह्मण संस्कृति का पक्ष लिया और संघर्षरत दोनों पक्षों में से कोई भी पूर्ण विजयी न हो सका। अतः ब्राह्मण व क्षत्रिय संस्कृतियों के मध्य समझौता हुआ जिसमें ब्राह्मणों ने शिक्षक होने का चयन किया और क्षत्रियों ने शासक होने का चयन किया। एतदर्थ ज्ञानी राजर्षियों को ब्रह्मर्षि माना गया अर्थात् उन्हें ब्राह्मणत्व प्रदान किया गया एवं ब्राह्मण शासकों (गणपतियों) ने अपने शासकत्व का परित्याग कर स्वयं को गुरुकुल के कुलपति के रूप में सीमित कर लिया। इसके साथ ही एक नवीन संस्कृति का उदय हुआ जिसका नेतृत्व करने का अधिकार ब्राह्मणों को प्राप्त हुआ किन्तु शासन करने का अधिकार क्षत्रियों को प्राप्त हुआ और वैश्यों को ब्राह्मणों व क्षत्रियों के नियन्त्रण में रखा गया। इस नवीन संस्कृति को “ब्राह्म संस्कृति” कहा गया।
पिशाचों के एक-एक बड़े अंश ने क्रमशः प्राजापत्य, आसुर व दैव संस्कृतियों को अपना आदर्श मान लिया। पिशाचों के ये अंश क्रमशः “यक्ष”, “रक्ष” व “वानर” कहलाए। कालान्तर में ये संस्कृतियाँ “ब्राह्म संस्कृति” पर आघात करने लगीं, अतः ब्राह्म संस्कृति द्वारा उनका प्रतिकार व आमेलन किया गया। “विजयादशमी” इसी सफल एवं प्रभावी प्रतिकार व आमेलन की द्योतक है।
वृत्त से घिरा तीन उपरिशीर्ष त्रिभुजों व दो अधोशीर्ष त्रिभुजों का संयोग ब्राह्म संस्कृति का प्रतीक बना। रेखाओं के बिन्दु मनुष्यों के द्योतक हैं तथा किसी आकृति से घिरा क्षेत्र समाज पर उसके प्रभाव का द्योतक है। ऊपर वाले दो उपरिशीर्ष त्रिभुज क्रमशः ब्राह्मणों व क्षत्रियों के द्योतक हैं तथा नीचे वाला उपरिशीर्ष त्रिभुज वैश्यों का द्योतक है। बहिर्वर्ती अधोशीर्ष त्रिभुज समस्त स्त्रियों व शूद्रों का द्योतक है, अन्तर्वर्ती अधोशीर्ष त्रिभुज यक्षों, रक्षों, वानरों, ऋक्षों आदि का द्योतक है तथा वृत्त विदेशियों का द्योतक है। केन्द्रीय लघु उपरिशीर्ष त्रिभुज उनका द्योतक है जो ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य तीनों ही वर्णों के कार्य करते हैं। अधोशीर्ष त्रिभुज की रेखाओं के जो भाग उपरिशीर्ष त्रिभुजों से होकर गुजरते हैं, शूद्रों के द्योतक हैं तथा जो भाग उपरिशीर्ष त्रिभुजों के बाहर रहते हैं, स्त्रियों के द्योतक हैं। वृत्त की पूर्ण परिधि की तुलना में त्रिभुजों के शीर्षों द्वारा वृत्त की परिधि को स्पर्श करने वाले नौ बिन्दु नगण्य ही हैं अर्थात् ब्राह्म संस्कृति में विदेशियों के रक्त का मिश्रण नगण्य ही है। ध्यातव्य है कि कतिपय तत्त्व समस्त संस्कृतियों में पाए जाते हैं, यथा – ज्योतिष, युद्धविद्या, गुरुकुल व तीर्थयात्रा।

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