Posted in मूर्ति पूजा - Idolatry

व्‍याल – याली और संघाट पशु मूर्तियां


व्‍याल – याली और संघाट पशु मूर्तियां
देवालयों में पशुओं की नाना प्रकार की मूर्तियां देखने को मिलती है, इनको एकाधिक पशुओं की काया के रूप में संयुक्‍त करके भी दिखाया जाता है। इनको व्‍याल मूर्तियां कहा जाता है, कहीं वराल भी कहा जाता है। विरालिका मूर्तियों के रूप में शिल्पियों में इनका व्‍यवहार रहा है। मंदिरों की द्वार शाखाओं की आखिरी सिंहशाखों में इनका स्‍वरूप देखने को मिलता है। दक्षिण भारत के ग्रंथों, यथा विश्‍वकर्मवास्‍तुशास्त्र में इनको याली के रूप में स्‍वीकारा गया है।
दसवीं सदी के वास्‍तुविद्या नामक ग्रंथ में द्वार की आखिरी शाखा का नाम ही व्‍याल शाखा कहा गया है। इनमें वराह, अश्‍व, अज, मृग, महिष, बंदर, सियार आदि को सिंह, हाथी, मानव, ग्रास आदि के साथ दिखाया जाता है। इनके कई प्रयोग हुए हैं। इन पर स्‍वतंत्र शास्‍त्र को रचा जा सकता है। इनमें मिस्र, ग्रीक की कला का प्रभाव देखा जा सकता है।
समरांगण सूत्रधार और अपराजितपृच्‍छा जैसे ग्रंथों ही नहीं, अन्‍य प्रतिमा शास्‍त्रों में भी व्‍याल मूर्तियों का जिक्र आता है। समरांगण में इनके 16 रूप आए हैं। अपराजित व समरांगण में सिंह, हाथी, अश्‍व, नर, नंदी, मेंढा, तोता, सूअर, भैंसा, चूहा, श्‍वान, गर्दभ, हरिण, शार्दूल, सियार आदि को व्‍याल रूप में दिखाए जाने का वर्णन है। सच में ये कला अद्भुत है, बस इनको देखते ही याली, वराली कला की याद आ जाती है जो पिरामिड की कला के साथ अपना तालमेल दिखाती है।

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