Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

लगुड प्रतिपदा – कार्तिकी प्रतिपदा


लगुड प्रतिपदा – कार्तिकी प्रतिपदा

कार्तिक शुक्‍ला प्रतिपदा से नव संवत्‍सर की मान्‍यता रही है। जिन क्षेत्रों में देवसेनापति स्‍कंद का प्रभाव रहा, उनमें यह संवत्‍सरारंभ तिथि रही है। आप सभी को बधाई…।

कार्तिक शुक्‍ला प्रतिपदा को लगुड प्रतिपदा के नाम से भी जाना जाता रहा है। यह गोवंश के पूजन का पर्व कृषि बहुल क्षेत्र में मनाया जाता रहा है। आज भी इसको ‘खेंखरा’ या ‘खेंकडा’ के नाम से मनाया जाता है। गांवों में इस दिन गोधन का शृंगार किया जाता है और सुबह गायों के क्रीडन के साथ उत्‍सव मनाकर शाम को बैलों को रमाया-खिलाया जाता है। गाेधन के गीतों और गाथाओं का गान किया जाता है। इन गाथाओं काे हीड़ कहा जाता है। ऋग्‍वेद में गोवंश के चिंतन, अभिवर्द्धन के साक्ष्‍य मिलते हैं। मेरे शोध अध्‍ययन का विषय यही रहा है।

नवीं सदी में संपादित ‘कृषि पराशर’ में इस पर्व का विशेष महत्‍व आया है और यह वर्णन सस्‍यवेद से लेकर पुराणों में विस्‍तृत फलक पाए हुए है। कहा गया है कि लगुड प्रतिपदा को गायों के सींगों में श्‍यामलता बांधकर सजाएं और तेल व हल्‍दी चढ़ाकर सजाए, उनका पूजन करें। गोपालजन गायों की बाधाओं की शांति के लिए उनके शरीर पर कुंकुम व चंदन का लेपकर तथा आभूषण धारण करवाएं। अपने हाथ में लाठी लिए घूमाएं, रमाएं। वस्‍त्रादि समपर्ति कर मुख्‍य बैल को सजाएं और गाजे-बाजे के साथ उसे गांव में घूमाएं। (कृषि पराशर 99, 100)
यह भी कहा गया है-
सर्वा गोजातय: सुस्‍था भवन्‍तयेतेन तदगृहे।
नाना व्‍याध्‍ािविमिर्मुक्‍ता वर्षमेकं न संशय:।। (कृषि पराशर 104)
ऐसा करने वाले किसान के घर का समस्‍त गाेवंश निसंदेह एक साल के लिए स्‍वस्‍थ रहता है और बाधाओं से मुक्‍त रहता है।
मेरे गांव में आज भी यह परंपरा यथारूप है। वहां गोपग्‍वाल काे बुलाकर गांव के मुखिया द्वारा उसके लगुड या दण्‍ड की पूजा की जाती है। बाद में गाेक्रीडन होता है…। संध्‍या वेला में पूरे गांव के बैलों को सजाकर उनका लंबरदार के यहां पूजन करवाया जाता है। उनके लिए सुहालिकाएं बनाई जाती हैं।
रात ढले यक्षपूजा के रूप में भारी भरकम घांस को बैलों से जाेत गांव में घूमाया जाता है…।

लगुड प्रतिपदा - कार्तिकी प्रतिपदा

कार्तिक शुक्‍ला प्रतिपदा से नव संवत्‍सर की मान्‍यता रही है। जिन क्षेत्रों में देवसेनापति स्‍कंद का प्रभाव रहा, उनमें यह संवत्‍सरारंभ तिथि रही है। आप सभी को बधाई...।

कार्तिक शुक्‍ला प्रतिपदा को लगुड प्रतिपदा के नाम से भी जाना जाता रहा है। यह गोवंश के पूजन का पर्व कृषि बहुल क्षेत्र में मनाया जाता रहा है। आज भी इसको 'खेंखरा' या 'खेंकडा' के नाम से मनाया जाता है। गांवों में इस दिन गोधन का शृंगार किया जाता है और सुबह गायों के क्रीडन के साथ उत्‍सव मनाकर शाम को बैलों को रमाया-खिलाया जाता है। गाेधन के गीतों और गाथाओं का गान किया जाता है। इन गाथाओं काे हीड़ कहा जाता है। ऋग्‍वेद में गोवंश के चिंतन, अभिवर्द्धन के साक्ष्‍य मिलते हैं। मेरे शोध अध्‍ययन का विषय यही रहा है।

नवीं सदी में संपादित 'कृषि पराशर' में इस पर्व का विशेष महत्‍व आया है और यह वर्णन सस्‍यवेद से लेकर पुराणों में विस्‍तृत फलक पाए हुए है। कहा गया है कि लगुड प्रतिपदा को गायों के सींगों में श्‍यामलता बांधकर सजाएं और तेल व हल्‍दी चढ़ाकर सजाए, उनका पूजन करें। गोपालजन गायों की बाधाओं की शांति के लिए उनके शरीर पर कुंकुम व चंदन का लेपकर तथा आभूषण धारण करवाएं। अपने हाथ में लाठी लिए घूमाएं, रमाएं। वस्‍त्रादि समपर्ति कर मुख्‍य बैल को सजाएं और गाजे-बाजे के साथ उसे गांव में घूमाएं। (कृषि पराशर 99, 100)
यह भी कहा गया है-
सर्वा गोजातय: सुस्‍था भवन्‍तयेतेन तदगृहे।
नाना व्‍याध्‍ािविमिर्मुक्‍ता वर्षमेकं न संशय:।। (कृषि पराशर 104)
ऐसा करने वाले किसान के घर का समस्‍त गाेवंश निसंदेह एक साल के लिए स्‍वस्‍थ रहता है और बाधाओं से मुक्‍त रहता है। 
मेरे गांव में आज भी यह परंपरा यथारूप है। वहां गोपग्‍वाल काे बुलाकर गांव के मुखिया द्वारा उसके लगुड या दण्‍ड की पूजा की जाती है। बाद में गाेक्रीडन होता है...। संध्‍या वेला में पूरे गांव के बैलों को सजाकर उनका लंबरदार के यहां पूजन करवाया जाता है। उनके लिए सुहालिकाएं बनाई जाती हैं। 
रात ढले यक्षपूजा के रूप में भारी भरकम घांस को बैलों से जाेत गांव में घूमाया जाता है...।

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