Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

महाराणा प्रताप कालीन अज्ञात ग्रंथ की खोज__


महाराणा प्रताप कालीन अज्ञात ग्रंथ की खोज__
श्रीकृष्‍ण जुगनू,
साथियो। महाराणा प्रताप /1572: 1597 ई./ के शासनकाल में लिखा एक अज्ञात ग्रंथ मैंने खोज निकाला हैा यह ग्रंथ ‘व्‍यवहारादर्श’ है। महाराणा प्रताप के दरबारी पंडित चक्रपाणि मिश्र ने इसको लिखा था। यह धर्मशास्‍त्रीय विषयों पर एक महत्‍वपूर्ण ग्रंथ है। कोई दस उल्‍लास या अध्‍यायों में लिखा गया है। महाराणा प्रताप के संबंध में यह एकदम नई जानकारी है।

यूं तो चक्रपाणि की तीन पुस्‍तकों – राज्‍याभिषेक पद़धति, मुहूर्तमाला और विश्‍ववल्‍लभ-वृक्षायुर्वेद का संपादन मैंने 2003 ई. में किया था! तब तक यह ग्रंथ अनुपलब्‍ध, अज्ञात था। पुणे में वास्‍तु विषयक पांडुलिपियों की खोज करते-करते यह पांडुलिपि मेंरे हाथों चढ गईा यह मेवाड् से वहां कब और कैसे गई, मालूम नहीं। मगर इसकी रचना चित्‍तौड् या गोगुंदा में की गई थी। यह ग्रंथ निश्चित रूप से 1571 में लिखा गया था। धर्मशास्‍त्रीय विषयों पर लिखा गया यह ग्रंथ निबंध रचना की कोटि का है और महाराणा प्रताप की रुचि के संबंध में एक नया ही आलोक देता है। मेरे लिए नया कार्य क्षेत्र खुल गया है। मैं इसे अपनी ही नहीं, प्रताप के प्रत्‍येक प्रेमी और भक्‍त की उपलब्धि मान रहा हूं।

महाराणा प्रताप के संबंध में जिस तरह नित नई जानकारियां मुझे सुलभ हुई, यह भी उसी कडी की एक अति विशिष्‍टतम उपलब्धि है। मैं इसी वर्ष इसके संपादन, अनुवाद और प्रकाशन का संकल्‍प कर चुका हूं… प्रताप की प्रेरणा को नमन… चक्रपाणि की दिव्‍यात्‍मा के आलोक को नमन… इस सहयोग के लिए मैं पुणे स्थित ओरियंटल इंस्‍टीट्यूट के पांडुलिपि प्रभारी श्रीनंद बापट का आभारी हूं।

महाराणा प्रताप कालीन अज्ञात ग्रंथ की खोज__
श्रीकृष्‍ण जुगनू, 
साथियो। महाराणा प्रताप /1572: 1597 ई./ के शासनकाल में लिखा एक अज्ञात ग्रंथ मैंने खोज निकाला हैा यह ग्रंथ 'व्‍यवहारादर्श' है। महाराणा प्रताप के दरबारी पंडित चक्रपाणि मिश्र ने इसको लिखा था। यह धर्मशास्‍त्रीय विषयों पर एक महत्‍वपूर्ण ग्रंथ है। कोई दस उल्‍लास या अध्‍यायों में लिखा गया है। महाराणा प्रताप के संबंध में यह एकदम नई जानकारी है।

यूं तो चक्रपाणि की तीन पुस्‍तकों - राज्‍याभिषेक पद़धति, मुहूर्तमाला और विश्‍ववल्‍लभ-वृक्षायुर्वेद का संपादन मैंने 2003 ई. में किया था! तब तक यह ग्रंथ अनुपलब्‍ध, अज्ञात था। पुणे में वास्‍तु विषयक पांडुलिपियों की खोज करते-करते यह पांडुलिपि मेंरे हाथों चढ गईा यह मेवाड् से वहां कब और कैसे गई, मालूम नहीं। मगर इसकी रचना चित्‍तौड् या गोगुंदा में की गई थी। यह ग्रंथ निश्चित रूप से 1571 में लिखा गया था। धर्मशास्‍त्रीय विषयों पर लिखा गया यह ग्रंथ निबंध रचना की कोटि का है और महाराणा प्रताप की रुचि के संबंध में एक नया ही आलोक देता है। मेरे लिए नया कार्य क्षेत्र खुल गया है। मैं इसे अपनी ही नहीं, प्रताप के प्रत्‍येक प्रेमी और भक्‍त की उपलब्धि मान रहा हूं। 

महाराणा प्रताप के संबंध में जिस तरह नित नई जानकारियां मुझे सुलभ हुई, यह भी उसी कडी की एक अति विशिष्‍टतम उपलब्धि है। मैं इसी वर्ष इसके संपादन, अनुवाद और प्रकाशन का संकल्‍प कर चुका हूं... प्रताप की प्रेरणा को नमन... चक्रपाणि की दिव्‍यात्‍मा के आलोक को नमन... इस सहयोग के लिए मैं पुणे स्थित ओरियंटल इंस्‍टीट्यूट के पांडुलिपि प्रभारी श्रीनंद बापट का आभारी हूं।

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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