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गोवर्धन पूजा,


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The Surya Temple at Osian (Jodhpur), early 700’s


Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

क्षत्रपों के अधिकार में रहा था वागड


क्षत्रपों के अधिकार में रहा था वागड
– डॉ. श्रीकृष्‍ण ‘जुगनू’

भारतीय इतिहास में क्षत्रपों का शासनकाल बहुत कम पढा और जाना गया जबकि किसी भी क्षेत्र में देशी राजाओं के वंशों के उदय से पूर्व राज्‍य की संभावनाओं की प्रारंभिक तलाश करने का श्रेय क्षत्रपों को दिया जाना चाहिए। ये क्षत्रप आरंभ में शासक नहीं थे मगर उनके पास क्षेत्र की सीमाओं के अपरिमित अधिकार थे। विदेशी मूल के होते हुए भी उन्‍होंने भारतीय जल, खनन और मानवीय संसाधनों के संरक्षण पर पूरा ध्‍यान दिया। उन्‍होंने सामंत या क्षेत्रीय इलाकों के सामंत तुल्‍य अधिकारी होते हुए अपना वर्चस्‍व स्‍थापित किया। दक्षिणी राजस्‍थान के वागड का इतिहास भी क्षत्रपों से स्‍पष्‍टत: जुडता है।

इन शासकों के बहुत से सिक्‍के वागड से मिले हैं। सिरवानिया या सुरवानिया गांव में इन क्षत्रपों के 2393 सिक्‍कों का बडा भंडार पिछली सदी के प्रारंभ में 1911 में मिला था। यह जाहिर करता है कि क्षत्रपों की कोई सात पीढियों का इस क्षेत्र पर अधिकार था। यह अधिकार क्षेत्र गुजरात के लाट क्षेत्र से लेकर गिरनार-उर्ज्‍जयंत पर्वत तक था। वागड भी उनके अधिकार से बाहर नहीं था। ऐसा विदित होता है कि इस क्षेत्र में धातुओं की उपलब्‍धता के कारण सिक्‍के आदि बनाने के लिए उसका उपयोग होता था। इसी कारण इस क्षेत्र को अपने अधिकार में रखने के प्रयास हुए, जाने-अनजाने भी इस क्षेत्र में राज्‍य की नींव पड्ती चली गई।

इनमें रुद्रदामा का नाम महत्‍वपूर्ण है जो भारतीय यवन राजा हुआ। इतिहासकारों ने इसको पश्चिमी क्षत्रप माना है। इसका समय 130 ईस्‍वी के आसपास माना है। यह बहुत प्रतापी राजा था, कच्‍छ के अंधौ गांव से उसके चार शिलालेख मिले हैं। गिरनार के पास अशोक के 14 प्रज्ञापन वाली चट्टान पर उसका समय का शिलालेख है। वह मानवीय संस्‍कारों का पोषक था और युद्ध के सिवाय कभी मानव का वध नहीं करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध था। उसके आधिकार में अनूप, आनर्त, सौराष्‍ट्र, श्‍वभ्र, मरु, कच्‍छ, सिंधुसौवीर, कुकुर, अपरांत, निषाद आदि क्षेत्र थे, कुकुर संभवत: वागड के लिए आया हो मगर तब यह किसी राज्‍य के रूप में नहीं था, तथापि इतिहासकारों ने इस शब्‍द की ओर अधिक ध्‍यान नहीं दिया है किंतु यह निश्चित है कि यह क्षेत्र भी उसके अधिकार से बाहर नहीं था।

रुद्रदामा और परवर्ती क्षत्रप शासकों के सिक्‍के इस क्षेत्र से मिले हैं जिन पर गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने विश्‍लेषण परक एक रिपोर्ट भी लिखी है। इनमें से एक सिक्‍का drachm (15-17 mm / 2,18 g), Obv.: , head facing r. Rev.: , hill of three arches, two crescents and sun. के रूप में चित्र में दिया गया है। रुद्रदामा को उर्जयन्‍त पर्वत की तलहटी में बनी मौर्यकालीन सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार करवाने का भी श्रेय है।

रूद्रदामा का नाम वागड में आज कोई नहीं जानता, मगर गधैया सिक्‍कों के रूप में क्षत्रपों के सिक्‍के इस क्षेत्र में आज तक मिलते रहे हैं। वागड वासियों ने उनके सिक्‍कों को लंबे समय तक अपने आटा लगाने की परात के नीचे भी चिपका कर रखे थे। बाद में बर्तनों के टूट फूट हो जाने पर जब बेचे गए तो वे सिक्‍के भी तौल के भाव बिकते रहे। मगर, इस सिक्‍कों की स्‍मृतियों में क्षत्रपों का इस क्षेत्र पर प्रभाव होना पुष्‍ट होता है, ये सिक्‍के सलूंबर क्षेत्र से भी मिले हैं। संयोग से परवर्ती क्षत्रप का एक सिक्‍का मेरे हाथ भी आ गया तो लगा कि कोई दो हजार सालों से एक सिक्‍का मेरे हाथ में भी आने के इंतजार में था।

Photo: क्षत्रपों के अधिकार में रहा था वागड
- डॉ. श्रीकृष्‍ण 'जुगनू'

भारतीय इतिहास में क्षत्रपों का शासनकाल बहुत कम पढा और जाना गया जबकि किसी भी क्षेत्र में देशी राजाओं के वंशों के उदय से पूर्व राज्‍य की संभावनाओं की प्रारंभिक तलाश करने का श्रेय क्षत्रपों को दिया जाना चाहिए। ये क्षत्रप आरंभ में शासक नहीं थे मगर उनके पास क्षेत्र की सीमाओं के अपरिमित अधिकार थे। विदेशी मूल के होते हुए भी उन्‍होंने भारतीय जल, खनन और मानवीय संसाधनों के संरक्षण पर पूरा ध्‍यान दिया। उन्‍होंने सामंत या क्षेत्रीय इलाकों के सामंत तुल्‍य अधिकारी होते हुए अपना वर्चस्‍व स्‍थापित किया। दक्षिणी राजस्‍थान के वागड का इतिहास भी क्षत्रपों से स्‍पष्‍टत: जुडता है। 

इन शासकों के बहुत से सिक्‍के वागड से मिले हैं। सिरवानिया या सुरवानिया गांव में इन क्षत्रपों के 2393 सिक्‍कों का बडा भंडार पिछली सदी के प्रारंभ में 1911 में मिला था। यह जाहिर करता है कि क्षत्रपों की कोई सात पीढियों का इस क्षेत्र पर अधिकार था। यह अधिकार क्षेत्र गुजरात के लाट क्षेत्र से लेकर गिरनार-उर्ज्‍जयंत पर्वत तक था। वागड भी उनके अधिकार से बाहर नहीं था। ऐसा विदित होता है कि इस क्षेत्र में धातुओं की उपलब्‍धता के कारण सिक्‍के आदि बनाने के लिए उसका उपयोग होता था। इसी कारण इस क्षेत्र को अपने अधिकार में रखने के प्रयास हुए, जाने-अनजाने भी इस क्षेत्र में राज्‍य की नींव पड्ती चली गई।

इनमें रुद्रदामा का नाम महत्‍वपूर्ण है जो भारतीय यवन राजा हुआ। इतिहासकारों ने इसको पश्चिमी क्षत्रप माना है। इसका समय 130 ईस्‍वी के आसपास माना है। यह बहुत प्रतापी राजा था, कच्‍छ के अंधौ गांव से उसके चार शिलालेख मिले हैं। गिरनार के पास अशोक के 14 प्रज्ञापन वाली चट्टान पर उसका समय का शिलालेख है। वह मानवीय संस्‍कारों का पोषक था और युद्ध के सिवाय कभी मानव का वध नहीं करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध था। उसके आधिकार में अनूप, आनर्त, सौराष्‍ट्र, श्‍वभ्र, मरु, कच्‍छ, सिंधुसौवीर, कुकुर, अपरांत, निषाद आदि क्षेत्र थे, कुकुर संभवत: वागड के लिए आया हो मगर तब यह किसी राज्‍य के रूप में नहीं था, तथापि इतिहासकारों ने इस शब्‍द की ओर अधिक ध्‍यान नहीं दिया है किंतु यह निश्चित है कि यह क्षेत्र भी उसके अधिकार से बाहर नहीं था।

रुद्रदामा और परवर्ती क्षत्रप शासकों के सिक्‍के इस क्षेत्र से मिले हैं जिन पर गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने विश्‍लेषण परक एक रिपोर्ट भी लिखी है। इनमें से एक सिक्‍का drachm (15-17 mm / 2,18 g), Obv.: , head facing r. Rev.: , hill of three arches, two crescents and sun. के रूप में चित्र में दिया गया है। रुद्रदामा को उर्जयन्‍त पर्वत की तलहटी में बनी मौर्यकालीन सुदर्शन झील के जीर्णोद्धार करवाने का भी श्रेय है।

रूद्रदामा का नाम वागड में आज कोई नहीं जानता, मगर गधैया सिक्‍कों के रूप में क्षत्रपों के सिक्‍के इस क्षेत्र में आज तक मिलते रहे हैं। वागड वासियों ने उनके सिक्‍कों को लंबे समय तक अपने आटा लगाने की परात के नीचे भी चिपका कर रखे थे। बाद में बर्तनों के टूट फूट हो जाने पर जब बेचे गए तो वे सिक्‍के भी तौल के भाव बिकते रहे। मगर, इस सिक्‍कों की स्‍मृतियों में क्षत्रपों का इस क्षेत्र पर प्रभाव होना पुष्‍ट होता है, ये सिक्‍के सलूंबर क्षेत्र से भी मिले हैं। संयोग से परवर्ती क्षत्रप का एक सिक्‍का मेरे हाथ भी आ गया तो लगा कि कोई दो हजार सालों से एक सिक्‍का मेरे हाथ में भी आने के इंतजार में था।
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बीकानेर में बड़ा बाज़ार स्थित भांडासर जैन मंदिर


बीकानेर में बड़ा बाज़ार स्थित भांडासर जैन मंदिर यहाँ के प्रमुख जैन मंदिरों में से एक है। कहा जाता है इस मंदिर के निर्माण में 40,000 किलोग्राम घी का इस्तेमाल किया गया था। इसका निर्माण सन् 1468 में एक व्यापारी भांडाशाह ने शुरू किया था और भांडाशाह की पुत्री ने सन 1541 में इसे पूरा करवाया था। भांडासर जैन मन्दिर का निर्माण गोदा नामक वास्तुशास्त्री की देखरेख किया गया था। वास्तुशास्त्री गोदा की याद में परकोटा युक्त बीकानेर नगर के रांगडी चौक में पत्थर की सुन्दर चौकी बनाई गई है। यह चौकी सुन्दर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। वि.सं. 1544 में भाण्डाशाह द्वारा निर्माण प्रारंभ कराए गए इस मंदिर का वास्तविक नाम ‘त्रैलोक्य दीपक प्रसाद‘ है जिसे भाण्डाशाह मंदिर भी कहा जाता है। यह धर्मस्थल बीकानेर के मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत प्रतीक है। इसकी गणना बीकानेर के प्राचीनतम स्थापत्य नमूनों में की जाती है।
Photo: बीकानेर में बड़ा बाज़ार  स्थित भांडासर जैन मंदिर  यहाँ के प्रमुख जैन मंदिरों में से एक है। कहा जाता है इस मंदिर के निर्माण में 40,000 किलोग्राम घी का इस्तेमाल किया गया था। इसका निर्माण सन् 1468 में एक व्यापारी भांडाशाह ने शुरू किया था और भांडाशाह की पुत्री ने सन 1541 में इसे पूरा करवाया था। भांडासर जैन मन्दिर का निर्माण गोदा नामक वास्तुशास्त्री की देखरेख किया गया था। वास्तुशास्त्री गोदा की याद में परकोटा युक्त बीकानेर नगर के रांगडी चौक में पत्थर की सुन्दर चौकी बनाई गई है। यह चौकी सुन्दर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। वि.सं. 1544 में भाण्डाशाह द्वारा निर्माण प्रारंभ कराए गए इस मंदिर का वास्तविक नाम ‘त्रैलोक्य दीपक प्रसाद‘ है जिसे भाण्डाशाह मंदिर भी कहा जाता है। यह धर्मस्थल बीकानेर के मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत प्रतीक है। इसकी गणना बीकानेर के प्राचीनतम स्थापत्य नमूनों में की जाती है।
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करमा बाई का मंदिर कालवा(मकराना)


करमा बाई का मंदिर कालवा(मकराना)

अब यहाँ जीर्णोद्धार का काम चल रहा है.

सोलहवीं सदी के प्रारंभ में मकराना के पास कालवा गाँव में डूडी परिवार में करमा बाई का जन्म हुआ था. पिता कृष्ण (जगन्नाथ) भक्त थे. एक बार किसी काम से बाहर गए तो करमा बाई को उनकी पूजा करने और उनको खीचड़े का भोग लगाने की हिदायत देकर गए. करमा बाई तय समय पर भोग लगाकर बैठ गईं कि देखें कब भगवन आते हैं और भोग ग्रहण करते हैं. भगवान आये नहीं. करमा जिद में वहीं बैठ गईं. खुद ने भी खाना नहीं खाया. दो दिन बीत गए. भगवान पिघल गए और भक्त की जिद के आगे हारे. आये, करमा को दर्शन दिए और भोग ग्रहण किया. अब यह तो रोज का काम हो गया. पिता आये तो यह सब देखकर अचरज में पड़ गए. उधर पुरी (ओडिशा) के पुजारी परेशान कि भगवान सुबह सुबह कहाँ जाते हैं. पता लगाया तो हैरान. क्या करते. भगवन के लिए वहीं खीचड़े का भोग तैयार करवाया और करमा बाई के नाम से उसे खिलाया. कालांतर में करमा बाई का मंदिर वहीं जगन्नाथ मंदिर के सामने बना दिया गया.

आज भी पुरी में पहला भोग करमा बाई के खीचड़े का ही लगता है और भक्त करमा बाई की वहाँ विधिवत पूजा होती है. वृन्दावन में भी बांकेबिहारी मंदिर के सामने करमा बाई का मंदिर है.

और यहाँ ? बहुतों को यह कहानी भी नहीं पता है. मकराना के आसपास के लोगों को भी करमा बाई की भक्ति के महत्त्व का पता नहीं है. मैंने अपनी पुस्तक ‘रोचक राजस्थान’ पुस्तक में इस कहानी का अच्छे से वर्णन किया है.

परसों मकराना प्रवास के दौरान कालवा गया और मंदिर में चल रहे निर्माण कार्य को देखा. मित्र भंवर लाल रिणवा और चन्दन सिंह चौहान के साथ. कालवा के मोडूराम बेनीवाल,सरदार सिंह मेडतिया और बहुत से अन्य गणमान्य ग्रामवासियों ने बहुत ही स्नेह और सम्मान से स्वागत किया. सभी का आभार.

‘अभिनव राजस्थान’ की ‘अभिनव संस्कृति’.

सफर जारी है.

चित्रों में वह मकाननुमा मंदिर जहाँ करमा बाई की जिद पर भगवन ने खीचड़ा खाया था. और कृष्ण, राधा और रुक्मणि की त्रिमूर्ति. पुजारीजी ने बताया कि राधा और रुक्मणि की मूर्तियां साथ साथ नहीं होती हैं, केवल यहीं हैं.

Ashok Choudhary's photo.
Ashok Choudhary's photo.
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समीधेश्‍वर प्रासाद बहुत भव्‍य बना हुआ है,


भोजराज का समाधीश्‍वर प्रासाद

राजा भोज (1010-1050 ई.) का कुमारकाल चित्‍तौडगढ में गुजरा और यहीं पर आरंभिक कृतियों का सजृन किया। यही पर वास्‍तु विषयक कृति के प्रणयन के साथ-साथ उन्‍होंने जिस प्रासाद का निर्माण करवाया, वह समाधीश्‍वर प्रासाद है। इसको समीधेश्‍वर मंदिर भी कहा जाता है। इसमें शिव की तीन मुंह वाली भव्‍यतम प्रतिमा है, अलोरा से शिव के जिस मुखाकृति के भव्‍य प्रासाद का क्रम चला, उसी की भव्‍यता यहां देखने को मिलती है। इनके शिल्पियों में वे शिल्‍पीगण थे जिनका संबंध अलोरा के विश्‍वकर्मा प्रासाद से रहा है। इन्‍हीं में एक शिल्‍पधनी थे उषान्, उन्‍हीं से प्रेरित होकर भोज ने स्‍थापत्‍य कार्य को आगे बढाया, लिखित भी और उत्‍खचित रूप में भी। (मेरे द्वारा संपादित, अनुदित समरांगण सूत्रधार की भूमिका, पेज 14)

समीधेश्‍वर प्रासाद बहुत भव्‍य बना हुआ है, खासकर उसकी बाह्य भित्तियों का अलंकरण तत्‍कालीन समाज और संस्‍कृति को जानने के लिए पुख्‍ता आधार लिए हुए हैं, वाहन, अलंकरण, खान-पान, परिधान, व्‍याख्‍यान, राजकीय यात्रा, सत्‍संग, चर्चा, आयुध, मल्‍ल क्रीडा-धनुर्वेद आदि सभी कुछ इन प्रतिमाओं में दिखाई देगा। इसी मंदिर में चालुक्‍य राजा कुमारपाल का शिलालेख है और एक अभिलेख महाराणा मोकल का है। मोकल (निधन 1433 ई.) को इस जीर्ण मंदिर के जीर्णोद्धार का श्रेय है। महाराणा कुंभाकालीन ‘एकलिंग माहात्‍म्‍य’ के एक श्‍लोक में मोकल के इस योगदान का स्‍मरण किया गया है और कहा गया है कि उन्‍होंने इस मंदिर में जीर्णोद्धार के बाद मणि तोरण लगवाया था – नृप समाधीश्‍वर सिद्धतेजा: समाधिभाजां परमं रहस्‍यम्। आराध्‍य तस्‍यालयमुद्धार श्रीचित्रकूटे मणितोरणांकम्।।
इससे पहले भी इसका जीर्णोद्धार हुआ था जिसके दो शिल्पियों के आरेखन बाहर छतरियों पर बने हुए हैं। कुंभा के समय प्रासादों के निर्माण से पूर्व यही प्रासाद यहां के राजाओं के लिए आराध्‍य स्‍वरूप था। यह इस काल की अनोखी परंपरा थी कि शिल्पियों का आरेखन होता था, बाद में भी यह रही।
एकलिंग माहात्‍म्‍य से ज्ञात होता है कि मोकल ने यहीं पर तीर्थों का ऋणमोचन, पापमोचन करने का संकल्‍प किया और सुंदर कुंड का निर्माण करवाया, यही कुंड गोमुख कुंड के नाम से ख्‍यात है, त्रिजगती का अलंकरण भी करवाया, यह आज खंडित रूप में है। यह जगती भी भोजराज ने बनवाई थी। एक अभिलेख में भी यह जिक्र आया है। इस समाधीश्‍वर के प्रासाद से ही प्रासादों की चित्रकूट शैली का प्रवर्तन हुआ जिसे शिल्‍प ग्रंथों में वर्णित किया गया है, यह वर्णन दक्षिण में रचित ‘ईशान शिवगुरुदेव पद्धति’ में भी मिलता है। (चित्र में समाधीश्‍वर मंदिर के वर्तमान स्‍वरूप, गर्भगृह की प्रतिमा और प्राचीन स्‍वरुप को दिखाया गया है, इन चित्रों के लिए अनुज सूर्यनारायण चौहान धन्‍यवादार्ह है)।

Shri Krishan Jugnu's photo.
Shri Krishan Jugnu's photo.
Shri Krishan Jugnu's photo.
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राजस्थान के मंदिर-शिल्प से संबंधित परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य-


राजस्थान के मंदिर-शिल्प से संबंधित परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य-
1. राजस्थान में जो मंदिर मिलते हैं, उनमें सामान्यतः एक अलंकृत प्रवेश-द्वार होता है, उसे ‘तोरण-द्वार’ कहते हैं।
2. सभा-मण्डप- तोरण द्वार में प्रवेश करते ही उपमण्डप आता है। तत्पश्चात् विशाल आंगन आता है, जिसे ‘सभा-मण्डप’ कहते हैं।
3. मूल-नायक- मंदिर में प्रमुख प्रतिमा जिस देवता की होती है उसे ‘मूल-नायक’ कहते हैं।
4. गर्भ-गृह- सभा मण्डप के आगे मूल मंदिर का प्रवेश द्वार आता है। मूल मन्दिर को ‘गर्भ-गृह’ कहा जाता है, जिसमें ‘मूल-नायक’ की प्रतिमा होती है।
5. गर्भगृह के ऊपर अलंकृत अथवा स्वर्णमण्डित शिखर होता है।
6. प्रदक्षिणा पथ- गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा लगाने के लिए जो गलियारा होता है, उसे ‘पद-प्रदक्षिणा पथ’ कहा जाता है।
7. पंचायतन मंदिर- मूल नायक का मुख्य मंदिर चार अन्य लघु मंदिरों से परिवृत (घिरा) हो तो उसे “पंचायतन मंदिर” कहा जाता है।

राजस्थान के विविध रंग- Various Colours Of Rajasthan: राजस्थान के मंदिर-शिल्प से संबंधित परीक्षा…
rajasthanstudy.blogspot.com
“राजस्थान की कला, संस्कृति, इतिहास, भूगोल और समसामयिक दृश्यों के विविध रंगों से युक्त प्रामाणिक एवं मूलभूत जानकारियों की एकमात्र वेब पत्रिका” “यह राजस्थान से संबंधित विभिन्न…
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प्राचीन स्‍तंभों की परंपरा का प्रमाण


यूप : प्राचीन स्‍तंभों की परंपरा का प्रमाण

मेवाड से प्राचीन यूप मिले हैं। ये यूप स्‍तम्‍भ की तरह ऊंचाई वाले और लिंग के आकार के बने हैं। इनमें भीलवाडा जिले के नांदसा गांव का यूप भारतीय विक्रम संवत के इतिहास ही नहीं, यज्ञ, दान, पुराण, स्‍मृति आदि कई परंपराओं के अध्‍ययन और साक्ष्‍य की दृष्टि से महत्‍व रखता है। राजस्‍थान के यूपाभिलेखों में इस यूप का प्राचीनतम होने से खासा महत्‍व रहा है। इस पर भी खास बात ये कि नांदसा में दो यूप है और दोनों ही लेखांकित है। वहां मौजूद यूप पर जो लेख है, वह ब्राह्मी लिपि में हैं दायें से बायें और ऊपर से नीचे समानत: लिखा गया है ताकि एक पाठ नष्‍ट भी हो जाए तो दूसरा बच जाए…। है न दूरदर्शिता।
इसमें 61 दिन तक चलने वाले यज्ञसत्र का उल्‍लेख है, बृहद वैदिक यज्ञ का महत्‍वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्‍य है।
हालांकि नांदसा गांव के निवासी इसका यही महत्‍व समझते हैं कि कभी कभार कोई लोग इसको देखने आते हैं और इस पर कुछ लिखा हुआ है। वे यह मान्‍यता भी लिए हुए है कि पांडव कभी इधर आए थे और भरख गांव के मगरे से भीम ने जो तीर चढाकर फेंका था, वह यही है… मुझे 1990 में नांदसावासियों से यह जनश्रुति सुनकर अजीब भी लगा, फिर याद आया कि ऐसी ही कहानियां अशोक के स्‍तंभों के साथ भी जुडी रही है। दरअसल, उनको जब मेरे एक अखबार के लेख से सूचना मिली कि यह मालवों की दिग्विजय का सूचक यूप है और इसमें संभवत: उसी सोम राजा का जिक्र है जिसका स्‍मरण विष्‍णुपुराण में हुआ है तो कुछ ग्रामीणों ने पत्र आदि के माध्‍यम से मेरा इस बात के लिए आभार माना कि यह तो गजब हो गया…।
इस यूप पर कृतसंवत 282 का अभिलेख है, विक्रम संवत के नामकरण से पूर्व यही संवत मान्‍य था। ईस्‍वी सन् 226 में चैत्र मास की पूर्णिमा को यह रोपा गया था। तब गणित में इकाई, दहाई सैकडा कैसे होते थी, देखिये इसकी पहली पंक्ति –
सिद्धम्।
कृतयोर्द्वयोव्‍वर्ष शतयोद्वयशीतयो : 200 80 2
चेत्रपूर्ण्‍णमासीं मस्‍याम्‍पूर्वायां…।
इसमें दो सौ बयासी संख्‍या लिखने के लिए आज की तरह 282 नहीं लिखा ब‍ल्कि वर्णों के साथ ही 200, 80 और 2 लिखा गया है। इनका जोड 282 होता है, क्‍या तब तक इकाई, दहाई, सैकडा आदि को एकीकृत करके नहीं लिखा जाता था ? यह विचारणीय है मगर यह बडा सच है कि जिस विक्रम संवत पर देश को अभिमान है, उसका प्राचीनतम प्रमाण मेवाड का नांदसा अपनी काेख में लिए हुए है। यही नहीं, इस यूप की बदौलत ही इस गांव में देश के कई ख्‍यातिलब्‍ध इतिहासकारों के पांव इस गांव में पडे, शायद आज उनकी स्‍मृतियों के चिन्‍ह भी मौजूद नहीं है, ये हैं – मि. कार्लायल, अार. आर. हल्‍दर, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, प्रो. भाण्‍डारकर, डी. सी. सरकार आदि। बनारस के प्रसिद्ध विद्वान अनंत सदाशिव अल्‍तेकर ने इसको एपिग्राफिया इंडिका में संपादित किया था…।
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राजस्‍थान के प्राचीन अभिलेख – संपादक-अनुवादक डॉ. श्रीकृष्‍ण ‘जुगनू’, प्रकाशक राजस्‍थानी ग्रंथागार, सोजती गेट, जोधपुर, 2013 ई. पृष्‍ठ 22-24

Photo: यूप : प्राचीन स्‍तंभों की परंपरा का प्रमाण

मेवाड से प्राचीन यूप मिले हैं। ये यूप स्‍तम्‍भ की तरह ऊंचाई वाले और लिंग के आकार के बने हैं। इनमें भीलवाडा जिले के नांदसा गांव का यूप भारतीय विक्रम संवत के इतिहास ही नहीं, यज्ञ, दान, पुराण, स्‍मृति आदि कई परंपराओं के अध्‍ययन और साक्ष्‍य की दृष्टि से महत्‍व रखता है। राजस्‍थान के यूपाभिलेखों में इस यूप का प्राचीनतम होने से खासा महत्‍व रहा है। इस पर भी खास बात ये कि नांदसा में दो यूप है और दोनों ही लेखांकित है। वहां मौजूद यूप पर जो लेख है, वह ब्राह्मी लिपि में हैं दायें से बायें और ऊपर से नीचे समानत: लिखा गया है ताकि एक पाठ नष्‍ट भी हो जाए तो दूसरा बच जाए...। है न दूरदर्शिता।
 इसमें 61 दिन तक चलने वाले यज्ञसत्र का उल्‍लेख है, बृहद वैदिक यज्ञ का महत्‍वपूर्ण अभिलेखीय साक्ष्‍य है। 
हालांकि नांदसा गांव के निवासी इसका यही महत्‍व समझते हैं कि कभी कभार कोई लोग इसको देखने आते हैं और इस पर कुछ लिखा हुआ है। वे यह मान्‍यता भी लिए हुए है कि पांडव कभी इधर आए थे और भरख गांव के मगरे से भीम ने जो तीर चढाकर फेंका था, वह यही है... मुझे 1990 में नांदसावासियों से यह जनश्रुति सुनकर अजीब भी लगा, फिर याद आया कि ऐसी ही कहानियां अशोक के स्‍तंभों के साथ भी जुडी रही है। दरअसल, उनको जब मेरे एक अखबार के लेख से सूचना मिली कि यह मालवों की दिग्विजय का सूचक यूप है और इसमें संभवत: उसी सोम राजा का जिक्र है जिसका स्‍मरण विष्‍णुपुराण में हुआ है तो कुछ ग्रामीणों ने पत्र आदि के माध्‍यम से मेरा इस बात के लिए आभार माना कि यह तो गजब हो गया...।
इस यूप पर कृतसंवत 282 का अभिलेख है, विक्रम संवत के नामकरण से पूर्व यही संवत मान्‍य था। ईस्‍वी सन् 226 में चैत्र मास की पूर्णिमा को यह रोपा गया था। तब गणित में इकाई, दहाई सैकडा कैसे होते थी, देखिये इसकी पहली पंक्ति - 
सिद्धम्। 
कृतयोर्द्वयोव्‍वर्ष शतयोद्वयशीतयो : 200  80  2 
चेत्रपूर्ण्‍णमासीं मस्‍याम्‍पूर्वायां...। 
इसमें दो सौ बयासी संख्‍या लिखने के लिए आज की तरह 282 नहीं लिखा ब‍ल्कि वर्णों के साथ ही 200, 80 और 2 लिखा गया है। इनका जोड 282 होता है, क्‍या तब तक इकाई, दहाई, सैकडा आदि को एकीकृत करके नहीं लिखा जाता था ? यह विचारणीय है मगर यह बडा सच है कि जिस विक्रम संवत पर देश को अभिमान है, उसका प्राचीनतम प्रमाण मेवाड का नांदसा अपनी काेख में लिए हुए है। यही नहीं, इस यूप की बदौलत ही इस गांव में देश के कई ख्‍यातिलब्‍ध इतिहासकारों के पांव इस गांव में पडे, शायद आज उनकी स्‍मृतियों के चिन्‍ह भी मौजूद नहीं है, ये हैं - मि. कार्लायल, अार. आर. हल्‍दर, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, प्रो. भाण्‍डारकर, डी. सी. सरकार आदि। बनारस के प्रसिद्ध विद्वान अनंत सदाशिव अल्‍तेकर ने इसको एपिग्राफिया इंडिका में संपादित किया था...। 
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राजस्‍थान के प्राचीन अभिलेख - संपादक-अनुवादक डॉ. श्रीकृष्‍ण 'जुगनू', प्रकाशक राजस्‍थानी ग्रंथागार, सोजती गेट, जोधपुर, 2013 ई. पृष्‍ठ 22-24
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प्राचीन मंदिर मण्डलेश्वर शिवालय.


प्राचीन मंदिर मण्डलेश्वर शिवालय…..
मित्रों बांसवाडा के अरथुना स्थान को देखने का अवसर मिला |पुरातात्विक महत्व का इस स्थल को देखना रोमांचक अनुभव रहा |अरथुना, बांसवाड़ा के दक्षिण पश्चिम में 55 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन कस्बा है। इसका प्राचीन नाम उत्थुनक बताया जाता है। यहाँपर
अरथुना ग्राम की अनेक टेकरियों की खुदाई मं मन्दिर मिले हैं। पुरातात्विक दृष्टि से इसकी रक्षा हेतु पुरातत्व विभाग सक्रिय है। कहा जाता है की इस क्षेत्र में हल के साथ ईंटे बाहर निकल आती हैं जिनसे पता चलता है कि यहां धरती के भीतर अनेक मन्दिर व प्रासाद दबे पड़े हैं।
सन् 1954 में पुरातत्व विभाग के संरक्षण में लेने के बाद इस समूचे क्षेत्र की व्यापक खुदाई में बडी संख्यामें मूर्तियां और मन्दिरों का अस्तित्व सामने आया। अब तक खुदाई में 30 से अधिक मंदिरों को अस्तित्व में लाया जा चुका है। इसमें सर्वाधिक प्राचीन मंदिर मण्डलेश्वर शिवालय है जिसे चामुण्डराज द्वारा अपने पिता मंडलीक की स्मृति में विक्रम संवत् 1136 तद्नुसार 1080 ईस्वी में बनवाया गया था|
प्राचीन मंदिरों की इस श्रृंखला में उत्कृष्ट कोटि का शिल्प और स्थापत्य देखने को मिलता है | दीवारों, खम्भों आदि पर सुंदर बारीक़ कारीगिरी मनमोहक है |

(9 photos)

Pramod Kumar Chamoli's photo.
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अरथुना बांसवाडा के मंदिर


अरथुना बांसवाडा के मंदिर
मित्रों बांसवाडा के अरथुना स्थान को देखने का अवसर मिला |पुरातात्विक महत्व का इस स्थल को देखना रोमांचक अनुभव रहा |अरथुना, बांसवाड़ा के दक्षिण पश्चिम में 55 किलोमीटर दूर स्थित प्राचीन कस्बा है। इसका प्राचीन नाम उत्थुनक बताया जाता है। यहाँ पर
अरथुना ग्राम की अनेक टेकरियों की खुदाई मं मन्दिर मिले हैं। पुरातात्विक दृष्टि से इसकी रक्षा हेतु पुरातत्व विभाग सक्रिय है। कहा जाता है की इस क्षेत्र में हल के साथ ईंटे बाहर निकल आती हैं जिनसे पता चलता है कि यहां धरती के भीतर अनेक मन्दिर व प्रासाद दबे पड़े हैं।
सन् 1954 में पुरातत्व विभाग के संरक्षण में लेने के बाद इस समूचे क्षेत्र की व्यापक खुदाई में बडी संख्यामें मूर्तियां और मन्दिरों का अस्तित्व सामने आया। अब तक खुदाई में 30 से अधिक मंदिरों को अस्तित्व में लाया जा चुका है। इसमें सर्वाधिक प्राचीन मंदिर मण्डलेश्वर शिवालय है जिसे चामुण्डराज द्वारा अपने पिता मंडलीक की स्मृति में विक्रम संवत् 1136 तद्नुसार 1080 ईस्वी में बनवाया गया था|
प्राचीन मंदिरों की इस श्रृंखला में उत्कृष्ट कोटि का शिल्प और स्थापत्य देखने को मिलता है | दीवारों, खम्भों आदि पर सुंदर बारीक़ कारीगिरी मनमोहक है |
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