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भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश


राष्‍ट्र की पहचान कराने वाला कोश

प्राचीन ग्रंथों को पढ़ते समय जब कभी स्‍थानवाची नाम या उसका पर्याय आता है तो जिज्ञासा होती है कि वह कहां पर है? उसकी क्‍या विशेषता है? उसके बारे में और कहां-कहां जानकारी मिल सकती है ? यह जिज्ञासा भारतीय पुरातत्‍व विभाग के जनरल अलेक्‍जेंडर कनिंघम को हुई और उन्‍होंने 1886 के आसपास एक कोश तैयार किया, मगर उसकी कमियों को जानकर तत्‍काल बंगाल के स्‍वनामधन्‍य श्री नन्‍दुलाल डे ने भूगोल कोश तैयार किया : एंशियंट ज्‍योग्राफी ऑफ इंडिया। उन्‍हें लगा कि कोश प्राचीन स्‍थानों का ही होकर रह गया है तो उन्‍होंने संशोधित और परिवर्धित कोश खड़ा किया : एंशियंट एंड मिडाइवल ज्‍योग्राफी ऑफ इण्डिया। पिछली सदी के प्रारंभिक वर्षों में इसका विदेश से प्रकाशन हुआ। इसके बाद हालांकि इसका पुनर्मुद्रण भी हुआ और इसी आधार पर अन्‍य जनों ने अपने कोश तैयार किए मगर यदि इसका हिंदी अनुवाद हो जाता तो यह सबके प्रयासों पर भारी पड़ता।

बस यही विचार लेकर एक दिन मैंने वयोवृद्ध भूगोलविद् आदरणीय श्रीनारायणलाल शर्मा से निवेदन किया कि डे साहब के कोश का अनुवाद क‍ीजिएगा। यह बात तीर की तरह लगी और उन्‍होंने दिन रात परिश्रम कर इस कोश का बेहतरीन अनुवाद आवश्‍यक मानचित्रों, नक्‍शों सहित किया। मैंने भी एक-एक पंक्ति को देखा, उस काल के प्रकाशित ग्रंथों के संदर्भों को खोजा। सच कहूं तो यह कार्य इतना अधिक था कि नाक पर चढ़ा चश्‍मा खुद भी उतरकर विश्राम लेने की प्रार्थना करने लगा मगर मन उसको इजाजत देने पर राजी नहीं था। कहता था कि तुम खरीदे गए हो, काम में लगे रहना पड़ेगा...।

खैर, पुस्‍तक तैयार हुई तो श्री नारायणजी इस बात पर अड़ गए कि आपको भूमिका लिखनी पड़ेगी। मैं अपनी सीमाएं जानता था। फिर, यह भी जानता था कि डे साहब जैसे भारतविद् की पुस्‍तक पर मुझ जैसा अल्‍पज्ञ क्‍या भूमिका लिखेगा। आग्रह इतना ज्‍यादा हो गया कि... वरना ये कोश छपने नहीं जाएगा। दो साल की उहापोह के बाद आखिरकार भूमिका लिखी गई। यह सब देख मित्रवर श्रीगोविंदलाल सिंह इतने मुग्‍ध हुए कि पुस्‍तक को उठा ले गए और प्रकाशित कर दी : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश।
 कुल 432 पन्‍ने और दीर्घाकार नक्‍शे।*

फ्लेप पर लिखा गया -

''भारतीय भूगोलविदों में श्री नंदलाल डे का नाम बहुत सममान के साथ लिया जाता है। भारत के प्राचीन महत्‍व के स्‍थानों को उनके माहात्‍म्‍य सहित वर्णित करने में उन्‍होंने अपनी पूरी ताकत और क्षमता का जो संकल्‍प किया, उसे प्रस्‍तुत कृति 'भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश' में साकार देखा जा सकता है। उन्‍होंने बंगाल में राष्‍ट्रीय चेतना के उदयकाल में भारतीय महत्‍व के तीर्थों, ऐतिहासिक स्‍थानों, नगरों व ग्रामों, पर्वतों, नदियों, गुफाओं, मंदिरों, मठों इत्‍यादि का शास्‍त्र सम्‍मत भूगोल तैयार कर जन्‍मभूमि को नमस्‍कार किया है। यह कृति न केवल भूगोल बल्कि अध्‍यात्‍मप्राण भारत वर्ष को रूपायित करने का जीवन्‍त स्‍मारक है। प्रो. डे को उनकी इस कृति ने यशकीर्ति प्रदान की है। नि:सन्‍देह यह कृति कालजयी और सार्वकालिक महत्‍व की है।''
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* नाम कृति : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश
प्रकाशक : आर्यावर्त संस्‍कृति संस्‍थान, 
डी 48, गली नंबर 3, दयालपुर, करावलनगर रोड, दिल्‍ली 110094 
प्रथम संस्‍करण : 2014
मूल्‍य : 900 रुपए।

राष्‍ट्र की पहचान कराने वाला कोश

प्राचीन ग्रंथों को पढ़ते समय जब कभी स्‍थानवाची नाम या उसका पर्याय आता है तो जिज्ञासा होती है कि वह कहां पर है? उसकी क्‍या विशेषता है? उसके बारे में और कहां-कहां जानकारी मिल सकती है ? यह जिज्ञासा भारतीय पुरातत्‍व विभाग के जनरल अलेक्‍जेंडर कनिंघम को हुई और उन्‍होंने 1886 के आसपास एक कोश तैयार किया, मगर उसकी कमियों को जानकर तत्‍काल बंगाल के स्‍वनामधन्‍य श्री नन्‍दुलाल डे ने भूगोल कोश तैयार किया : एंशियंट ज्‍योग्राफी ऑफ इंडिया। उन्‍हें लगा कि कोश प्राचीन स्‍थानों का ही होकर रह गया है तो उन्‍होंने संशोधित और परिवर्धित कोश खड़ा किया : एंशियंट एंड मिडाइवल ज्‍योग्राफी ऑफ इण्डिया। पिछली सदी के प्रारंभिक वर्षों में इसका विदेश से प्रकाशन हुआ। इसके बाद हालांकि इसका पुनर्मुद्रण भी हुआ और इसी आधार पर अन्‍य जनों ने अपने कोश तैयार किए मगर यदि इसका हिंदी अनुवाद हो जाता तो यह सबके प्रयासों पर भारी पड़ता।

बस यही विचार लेकर एक दिन मैंने वयोवृद्ध भूगोलविद् आदरणीय श्रीनारायणलाल शर्मा से निवेदन किया कि डे साहब के कोश का अनुवाद क‍ीजिएगा। यह बात तीर की तरह लगी और उन्‍होंने दिन रात परिश्रम कर इस कोश का बेहतरीन अनुवाद आवश्‍यक मानचित्रों, नक्‍शों सहित किया। मैंने भी एक-एक पंक्ति को देखा, उस काल के प्रकाशित ग्रंथों के संदर्भों को खोजा। सच कहूं तो यह कार्य इतना अधिक था कि नाक पर चढ़ा चश्‍मा खुद भी उतरकर विश्राम लेने की प्रार्थना करने लगा मगर मन उसको इजाजत देने पर राजी नहीं था। कहता था कि तुम खरीदे गए हो, काम में लगे रहना पड़ेगा…।

खैर, पुस्‍तक तैयार हुई तो श्री नारायणजी इस बात पर अड़ गए कि आपको भूमिका लिखनी पड़ेगी। मैं अपनी सीमाएं जानता था। फिर, यह भी जानता था कि डे साहब जैसे भारतविद् की पुस्‍तक पर मुझ जैसा अल्‍पज्ञ क्‍या भूमिका लिखेगा। आग्रह इतना ज्‍यादा हो गया कि… वरना ये कोश छपने नहीं जाएगा। दो साल की उहापोह के बाद आखिरकार भूमिका लिखी गई। यह सब देख मित्रवर श्रीगोविंदलाल सिंह इतने मुग्‍ध हुए कि पुस्‍तक को उठा ले गए और प्रकाशित कर दी : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश।
कुल 432 पन्‍ने और दीर्घाकार नक्‍शे।*

फ्लेप पर लिखा गया –

”भारतीय भूगोलविदों में श्री नंदलाल डे का नाम बहुत सममान के साथ लिया जाता है। भारत के प्राचीन महत्‍व के स्‍थानों को उनके माहात्‍म्‍य सहित वर्णित करने में उन्‍होंने अपनी पूरी ताकत और क्षमता का जो संकल्‍प किया, उसे प्रस्‍तुत कृति ‘भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश’ में साकार देखा जा सकता है। उन्‍होंने बंगाल में राष्‍ट्रीय चेतना के उदयकाल में भारतीय महत्‍व के तीर्थों, ऐतिहासिक स्‍थानों, नगरों व ग्रामों, पर्वतों, नदियों, गुफाओं, मंदिरों, मठों इत्‍यादि का शास्‍त्र सम्‍मत भूगोल तैयार कर जन्‍मभूमि को नमस्‍कार किया है। यह कृति न केवल भूगोल बल्कि अध्‍यात्‍मप्राण भारत वर्ष को रूपायित करने का जीवन्‍त स्‍मारक है। प्रो. डे को उनकी इस कृति ने यशकीर्ति प्रदान की है। नि:सन्‍देह यह कृति कालजयी और सार्वकालिक महत्‍व की है।”
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* नाम कृति : भारत का प्राचीन एवं मध्‍ययुगीन भौगालिक कोश
प्रकाशक : आर्यावर्त संस्‍कृति संस्‍थान,
डी 48, गली नंबर 3, दयालपुर, करावलनगर रोड, दिल्‍ली 110094
प्रथम संस्‍करण : 2014
मूल्‍य : 900 रुपए।

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