Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

कालीदास ने उक्त के अतिरिक्त अन्य कई काव्य और नाट्य ग्रंथ भी लिखे।


Sanjay Alung's photo.
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‘अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः ?’ :- (कोई विद्वान लगता है?) :- आज ‘आषाढ़स्य प्रथम दिवसे’ (आषाढ़ के प्रथम दिन) पर कालिदास से विदुषि पत्नी विद्योत्तमा द्वारा, कालीदास द्वारा ज्ञान प्राप्ति उपराँत वापसी पर, उच्चारित प्रथम वाक्य के तीन शब्द – ‘अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः ?’ अर्थात – कोई विद्वान लगता है? विद्योत्तमा के इस आश्चर्यमिश्रित विस्मयकारी प्रश्न का अर्थ/आशय यह है कि, – “आपने क्या कोई विशेष उल्लेखनीय योग्यता प्राप्त कर ली है कि, जिससे कि मैं आपका स्वागत, अभिनन्दन और अभिवादन करूँ?” कालीदास द्वारा ऊँट की चिल्लाहट पर ‘ऊष्ट्र:’ के स्थान पर ‘ऊट्र:’ के गलत ऊच्चारण कर विद्योत्तमा ने कालीदास को पत्नी के लिए सही अर्थों में योग्य पति बनने/बनाने हेतु , योग्यता प्राप्ति उपराँत ही, सम्बन्ध की बात रखी, जिससे कि ऐसे योग्य पति से सम्बन्ध बनाने में पत्नी को भी गर्व और गौरव का अनुभव हो। जब काशी से विद्वान बन काली दास लौटे, तब उक्त प्रश्न किया गया, जिसका उचित समाधान कारक उत्तर दे कालीदास ने विद्योत्तमा को संतुष्ट कर उसका सम्मान प्राप्त किया और आगे चल कर उक्त प्रश्न में प्रयुक्त हुए तीनों शब्दों से ही प्रारम्भ कर तीन पृथ्क-पृथ्क काव्य ग्रंथों की रचना की । ‘अस्ति’ शब्द से ‘कुमार सम्भव’ (अस्त्य् उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः ।पूर्वापरौ तोयनिधी विगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥) ; ‘कश्चित्’ शब्द से ‘मेघदूत’ (कश्चित्कांता…) और ‘वाग्विशेषः’ शब्द से ‘रघुवंश’ (वागार्थविव… ) कालीदास ने उक्त के अतिरिक्त अन्य कई काव्य और नाट्य ग्रंथ भी लिखे।

Posted in रामायण - Ramayan

The inevitable conclusion of this review of available facts


“The inevitable conclusion of this review of available facts, old and new, is that civilization in India – as in other parts of the world – is much more ancient than archeologists generally think, and that most sites excavated so far in Sumer, Iran, Anatolia, Egypt and the Indus Valley, are more recent, by several thousand years, than the cities and settlements described by Valmiki.” – Come Carpentier de Gourdon

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

गोवर्धन पूजा कथा :-


Gagandeep Chaturvedi shared a photo to the group Vote 4 BJP.
2 hrs ·
गोवर्धन पूजा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं.....

गोवर्धन पूजा कथा :-
गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में एक लोकगाथा प्रचलित है.
कथा यह है कि देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था. इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची.
प्रभु की इस लीला में यूं हुआ कि एक दिन उन्होंने
देखा के सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं
और किसी पूजा की तैयारी में जुटे हैं.
श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से मईया यशोदा से प्रश्न किया ”मईया ये आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं”
कृष्ण की बातें सुनकर मैया बोली लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं. मैया के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? मैईया ने कहा वह हमें वर्षा प्रदान करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे
हमारी गायों को चारा मिलता है. यह सब सुनकर भगवान श्री कृष्ण बोले इस प्रकार से तो हमें गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये
वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए. लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की. देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी. प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि, सब इनका कहा मानने से हुआ है. तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत
उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया. इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी. इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के उपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें.
इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे यह ज्ञात हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता अत: वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया. ब्रह्मा जी ने इन्द्र से कहा कि आप जिस कृष्ण की बात कर रहे हैं वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं. ब्रह्मा जी के मुंख से यह सुनकर इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और श्री कृष्ण के पास जाकर उनसे कहा कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकारवश भूल कर बैठा. आप दयालु हैं और कृपालु भी इसलिए मेरी भूल क्षमा करें. इसके पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया.
बोलो श्री कृष्ण-कन्हैया लाल की जय.....

गोवर्धन पूजा की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं…..

गोवर्धन पूजा कथा :-
गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में एक लोकगाथा प्रचलित है.
कथा यह है कि देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था. इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार हैं ने एक लीला रची.
प्रभु की इस लीला में यूं हुआ कि एक दिन उन्होंने
देखा के सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं
और किसी पूजा की तैयारी में जुटे हैं.
श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से मईया यशोदा से प्रश्न किया ”मईया ये आप लोग किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं”
कृष्ण की बातें सुनकर मैया बोली लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं. मैया के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं? मैईया ने कहा वह हमें वर्षा प्रदान करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे
हमारी गायों को चारा मिलता है. यह सब सुनकर भगवान श्री कृष्ण बोले इस प्रकार से तो हमें गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये
वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए. लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की. देवराज इन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी. प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि, सब इनका कहा मानने से हुआ है. तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत
उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे़ समेत शरण लेने के लिए बुलाया. इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी. इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के उपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें.
इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे यह ज्ञात हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई साधारण मनुष्य नहीं हो सकता अत: वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया. ब्रह्मा जी ने इन्द्र से कहा कि आप जिस कृष्ण की बात कर रहे हैं वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं. ब्रह्मा जी के मुंख से यह सुनकर इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और श्री कृष्ण के पास जाकर उनसे कहा कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकारवश भूल कर बैठा. आप दयालु हैं और कृपालु भी इसलिए मेरी भूल क्षमा करें. इसके पश्चात देवराज इन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया.
बोलो श्री कृष्ण-कन्हैया लाल की जय…..