Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

अन्य देशों के द्वारा दीपोत्सव पर जारी डाक टिकट …!!


अन्य देशों के द्वारा दीपोत्सव पर जारी डाक टिकट …!!10006983_947714398575974_8054822791138290418_n

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

1 – जब साइंस नाम
भी नहीं था तब भारत में
नवग्रहों की पूजा होती थी…..
2. जब पश्चिम के लोग कपडे
पहनना नहीं जानते थे. तब
भारत रेशम के
कपडों का व्यापार
करता था……
3. जब कहीं भ्रमण करने
का कोई साधन स्कूटर मोटर
साईकल, जहाज वगैरह
नहीं थे. तब भारत के पास बडे
बडे वायु विमान हुआ करते थे।
(इसका उदाहरण आज
भी अफगानिस्तान में
निकला महाभारत
कालीन विमान है. जिसके
पास जाते ही वहाँ के सैनिक
गायब
हो जाते हैं। जिसे देखकर आज
का विज्ञान भी हैरान है)…..
4. जब डाक्टर्स नहीं थे. तब
सहज में स्वस्थ होने
की बहुत
सी औषधियों का ज्ञाता था,
भारत देश सौर
ऊर्जा की शक्ति का ज्ञाता था भारत
देश। चरक और
धनवंतरी जैसे महान आयुर्वेद के
आचार्य थे भारत देश में……
5. जब लोगों के पास हथियार
के नाम पर लकडी के टुकडे हुआ
करते थे. उस
समय भारत देश ने आग्नेयास्त्र,
प्राक्षेपास्त्र, वायव्यअस्त्र
बडे बडे परमाणु
हथियारों का ज्ञाता था भारत……
6. हमारे इतिहास पर रिसर्च
करके ही अल्बर्ट आईंसटाईन ने
अणु परमाणु
पर खोज की है…..
7. आज हमारे इतिहास पर
रिसर्च करके नासा अंतरिक्ष
में ग्रहों की खोज कर
रहा है……
8. आज हमारे इतिहास पर
रिसर्च करके रशिया और
अमेरीका बडे बडे हथियार
बना रहा है.. …
9. आज हमारे इतिहास पर
रिसर्च करके रूस, ब्रिटेन,
अमेरीका, थाईलैंड,
इंडोनेशिया बडे बडे देश बचपन से
ही बच्चों को संस्कृत
सिखा रहे हैं
स्कूलों मे…..
10.आज हमारे इतिहास पर
रिसर्च करके वहाँ के डाक्टर्स
बिना इंजेक्शन,
बिना अंग्रेजी दवाईयों के
केवल ओमकार का जप करने से
लोगों के हार्ट अटैक,
बीपी, पेट, सिर, गले
छाती की बडी बडी बिमारियाँ ठीक
कर रहे हैं। ओमकार
थैरपी का नाम देकर इस नाम से
बडे बडे हॉस्पिटल खोल
रहे हैं…… और हम किस
दुनिया में जी रहे हैं?? अपने
इतिहास पर गौरव
करने की बजाय हम अपने
इतिहास को भूलते जा रहे हैं।
हम
अपनी महिमा को भूलते
जा रहे हैं।
हम अपने संस्कारों को भूलते
जा रहे हैं…

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Vijay Kumar Jagota added 2 new photos.
5 hrs ·

संघ है क्या…??

“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विशुद्ध रूप से एक राष्ट्रवादी संघटन है”, जिसके सिद्धान्त हिंदुत्व में निहित और आधारित हैं।

संघ की शुरुआत सन् 1925 में विजयदशमी के दिन परमपूज्य डा०केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा की गयी थी और आपको यह जानकर काफी ख़ुशी होगी कि बीबीसी के अनुसार संघ विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान है।

भारत में संघ की लगभग पचास हजार से
भी ज्यादा शाखा लगती हैं और संघ में लगभग 25 करोड़ स्वयंसेवी हैं । वस्तुत: शाखा ही तो संघ की बुनियाद है जिसके ऊपर आज यह इतना विशाल संगठन खड़ा हुआ है।

शाखा की सामान्य गतिविधियों में खेल, योग वंदना और भारत एवं विश्व के सांस्कृतिक पहलुओं पर बौद्धिक चर्चा परिचर्चा शामिल है। जो भी सदस्य शाखा में स्वयं की इच्छा से आते हैं , वे “स्वयंसेवक” कहलाते हैं …!

शाखा में बौद्धिक और शारीरिक रूप से स्वयंसेवकों को संघ की जानकारी तो दी ही जाती हैं साथ-साथ समाज, राष्ट्र और धर्म की शिक्षा भी दी जाती है.

सिर्फ इतना ही नहीं हिंदू धर्म में सामाजिक समानता के लिए संघ ने दलितों और पिछड़े वर्गों को मंदिर में पुजारी पद के लिए प्रशिक्षण का समर्थन किया है |

यहाँ तक कि … महात्मा गाँधी के 1934 RSS के एक कैम्प की यात्रा के दोरान उन्होंने वहां पर पूर्ण अनुशासन पाया और छुआछूत की अनुपस्थिति पायी |

राहत और पुर्नवास संघ की पुरानी परंपरा रही है… उदाहरण के तौर पर संघ ने 1971 के उडीसा चक्रवात और 1977 के आंध्र प्रदेश चक्रवात में राहत कार्यों में महती भूमिका निभाई है |

इतना ही नहीं … संघ से जुडी “सेवा भारती” ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान 57 अनाथ बच्चों को गोद लिया हे जिनमे 38 मुस्लिम (जबकि मुस्लिम संघ को गाली देते हैं फिर भी और 19 हिंदू हैं |

संघ की उपस्थिति भारतीय समाज के हर क्षेत्र में महसूस की जा सकती है जिसकी शुरुआत सन 1925 से होती है। उदाहरण के तौर पर सन 1962 के भारत-चीन युद्ध में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू संघ की भूमिका से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने संघ को सन 1963 के गणतंत्र दिवस की परेड में सम्मिलित होने का निमन्त्रण दिया। और आप यह जान कर ख़ुशी से झूम उठेंगे कि.. सिर्फ़ दो दिनों की पूर्व सूचना पर तीन हजार से भी ज्यादा स्वयंसेवक पूर्ण गणवेश में वहाँ उपस्थित हो गये।

वर्तमान समय में संघ के दर्शन का पालन करने वाले कतिपय लोग देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँचने मे भीं सफल रहे हैं। ऐसे प्रमुख व्यक्तियों में उपराष्ट्रपति पद पर भैरोंसिंह शेखावत, प्रधानमंत्री पद पर अटल बिहारी वाजपेयी एवं उपप्रधानमंत्री व गृहमंत्री के पद पर लालकृष्ण आडवाणी , नरेन्द्र भाई मोदी जैसे दिग्गज लोग शामिल हैं। इतना ही नहीं… जिस दिन सारे स्वयंसेवक सिर्फ एक लाइन बना कर ही सीमा पर खड़े हो गए उस दिन चीन से ले कर बांग्लादेश तक गणवेशधारी स्वयंसेवक ही स्वयंसेवक नजर आयेंगे !

इसीलिए ये शर्म नहीं बल्कि हमारे लिए काफी गर्व की बात होती है ……. जब हमें संघ का स्वयंसेवक कहा जाता है ….!
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ऐक वटवृक्ष है जिसके कई तने और कई शाखाये है।
संघ दुनिया के लगभग 80 से अधिक देशो में कार्यरत है।”संघ के लगभग 50 से ज्यादा संगठन राष्ट्रीय ओर अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है ओर लगभग 200 से अधिक संघठन क्षेत्रीय प्रभाव रखते हैं।
जिसमे कुछ प्रमुख संगठन है जो संघ की विचारधारा को आधार मानकर राष्ट्र और सामाज के बीच सक्रीय है।जिनमे कुछ राष्ट्रवादी,सामाजिक, राजनेतिक, युवा वर्गे के बीच में कार्य करने वाले,शिक्षा के क्षेत्र में,सेवा के क्षेत्र में,सुरक्षा के क्षेत्र में,धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में, संतो के बीच में, विदेशो में,अन्य कई क्षेत्रो में संघ परिवार के संघठन सक्रीय रहते है,जिनमे प्रमुख है:-
🐅विश्व हिन्दू परिषद्
🐅 बजरंगदल
🐅अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्
🐅सेवा भारती
🐅भारतीय किसान संघ
🐅भारतीय जनता पार्टी
🐅भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा
🐅भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा
🐅भारतीय मजदूर संघ
🐅भारतीय शिक्षक संघ
🐅विद्या भारती-सरस्वती शिशु मंदिर
🐅भारतीय स्वाभिमान मंच
🐅स्वदेशी जागरण मंच
🐅धर्म जागरण विभाग
🐅युवा क्रांति मंच
🐅नव निर्माण मंच
🐅श्रीराम सेना
🐅भारत जागो!-विश्व जगाओ
🐅धर्म रक्षा मंच
⛳🐅संस्कृति रक्षा मंच
⛳🐅हिन्दू स्वयंसेवक संघ
⛳🐅प्रवासी भारतीय संघ
⛳🐅नर्मदा बचाओ जागरण मंच
⛳🐅धर्मांतरण विरुद्ध विभाग
⛳🐅वनवासी कल्याण परिषद्
⛳🐅एकल विद्यालय योजना
⛳🐅दुर्गा वाहिनी
⛳🐅मातृशक्ति
⛳🐅राष्ट्र सेविका
⛳🐅ग्राम भारती
🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅🐅

आओ नमन करे इस मातृभूमि को
और दुनिया के सबसे बड़े संघठन से जुड़े।।
⛳⛳⛳⛳⛳⛳⛳⛳⛳⛳⛳

🚩हिंदुत्व का आधार।

⛳”संघ शक्ति”⛳🐅🐅🐅

(और)
🚩”संघ परिवार”🚩
🚩🚩जय श्री राम🚩🚩

Vijay Kumar Jagota's photo.
Vijay Kumar Jagota's photo.
Posted in हिन्दू पतन

Web Site


http://hindu-tolerance.blogspot.com/

http://dharmanext.blogspot.in/2012/07/aurangzeb-responsible-for-46-million.html

http://www.aurangzeb.info/2008/06/exhibit-no_7316.html

http://rajiv-varma.blogspot.com/

http://koenraadelst.bharatvani.org/articles/ayodhya/kashivishvanath.html

http://www.fact-india.com/

http://hindu-tolerance.blogspot.com/

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

The great temple of Keshava Rai at Mathura was built by Bir Singh Deo Bundela


Exhibit No. 13: Demolition of Keshava Rai temple at Mathura. (13th January – 11th February 1670)

The great temple of Keshava Rai at Mathura was built by Bir Singh Deo Bundela during Jahangir’s time at a cost of thirty-three lakhs of rupees. The Dehra of Keshava Rai was one of the most magnificent temples ever built in India and enjoyed veneration of the Hindus throughout the land. Prince Dara Shukoh, who was looked upon by the masses as the future Emperor, had presented a carved stone railing to the temple which was installed in front of the deity at some distance; the devotees stood outside this railing to have ‘darshan’ of Keshava Rai. The railing was removed on Auranzeb’s orders in October 1666.

The Dehra of Keshava Rai was demolished in the month of Ramzan, 1080 A.H. (13th January – 11th February 1670) by Aurangzeb’s order. “In a short time, by the great exertion of the officers, the destruction of this strong foundation of infidelity was accomplished and on its site a lofty mosque was built at the expenditure of a large sum”. To the author of Maasir-i-‘Alamigiri, the accomplishment of this “seemingly impossible work was an “instance of the strength of the Emperor’s faith”. Even more disgraceful was transporting the idols to Agra and burying them under the steps of the mosque of the Begum Sahib “in order to be continually trodden upon”.

The painting shows the demolition of the great temple, on Aurngzeb’s orders in progress and subsequent uncivilized conduct towards the idols.

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Aurangzeb, as he was according to Mughal Records


Exhibit No. 32: Restriction on atishbazi. Akhbarat-i-Darbar-i- Mu‘alla Julus 10, Shawwal 24 / April 9th 1667.

“The Emperor ordered Jumdat-ul-Mulk to write to the Mutsaddis of all the subahs (provinces) of the empire that display of fire-works (atishbazi) is being forbidden. Also, Faulad Khan was ordered to arrange for announcement in the city by the beat of a drum that no one is to indulge in atishbazi”.

Note:

The Hindus celebrate Diwali to commemorate the return of Lord Ram to Ayodhya, after fourteen years of exile and victory over Ravana, by lighting lamps and bursting crackers etc. Some time before imposing the ban on atishbazi (fireworks) Aurangzeb had written (22 November 1665) to the Subahdar of Gujarat that “In the city and parganas of Ahmedabad (or Gujarat) the Hindus, following their superstitious customs, light lamps in the night on Diwali…. It is ordered that in bazars there should be no illumination on Diwali”. (Mirat, 276).

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शक


शक शब्द के कई अर्थ हैं जिनके कारण भ्रम होते हैं। (१) गणना के लिये १-१ को जोड़ते जाते हैं। एक का चिह्न कुश है और प्रायः सभी लिपियों में कुश चिह्न से ही १ लिखते हैं। कुशों को मिलाने पर इनका गट्ठर शक्तिशाली हो जाता है, अतः इसे शक कहते हैं। करण (करणी, बही खाता) लिखने वाले भी गिनती इसी प्रकार करते हैं, १-१ जोड़ते जाते हैं, ४ चिह्न होने पर उनको पांचवें से बान्ध देते हैं। सांख्यिकी में भी वस्तुओं को आप के अनुसार सजाने के लिये हर समूह में उनकी इसी प्रकार गणना की जाती है। आरम्भ से इष्ट तक की गिनती (समुच्चय) को शक कहते हैं। ज्योतिष में भी ग्रह स्थिति की गणना करन्र् के लिये किसी निर्दिष्ट दिन से अब शक के दिनों की गणना करते है। एक दिन कुश है, दिनों का समुच्चय (अहर्गण) शक है। शक के आधार पर ग्रह गति की गणना कर उसे मूल स्थिति में जोड़ कर वर्तमान स्थिति निकालते हैं। दिन गणना के लिये सौर वर्ष सुविधाजनक है अतः इसे शक कहते हैं। पर्वों का निर्धारण चान्द्र तिथि से होता है क्योंकि चन्द्रमा मन का कारक है-चन्द्रमा मनसो जातः। अतः चान्द्रमास गणना कर उसका सौर वर्ष से समन्वय करते हैं। जिस मास में सौर संक्रान्ति नहीं होती है,उसे अधिक मास कहते हैं। विक्रमादित्य काल में ६१२ ई.पू. से शक वर्ष था पर सम्वत् का आरम्भ ५७ ई.पू. में था। बाद में विक्रमादित्य के पौत्र शालिवाहन काल से उनका शक आरम्भ हुआ जो अभी तक की ज्योतिष पुस्तकों में चल रहा है। उससे पूर्व युधिष्ठिर(१७-१२-३१३९ ई.पू.), शिशुनाग (१९५४ ई.पू.), नन्द (१६३४ ई.पू.), शूद्रक (७५६ ई.पू.), चाहमान (६१२ ई.पू.) और श्रीहर्ष (४५६ ई.पू.) शक थे। विश्व के हर देश में दिन-गणना से ही ग्रह स्थिति निकालते थे। यह मानसिक रूप से कुशों का बोझा था-वास्तव में कुश नहीं जोड़ते थे। पर सभी इतिहासकारों ने सुमेर और माया कैलेण्डर के बारे में लिखा है कि वे लोग हर दिन १-१ कुश जोड़ कर बान्धते जाते थे। कुशों का समूह ५००० वर्षों तक नहीं टिकेगा न उतने समय कोई शासन व्यवस्था चल सकती है।
(२) कुश का बड़ा रूप वृक्ष जैसा होने पर उसे शक कहते हैं जो स्तम्भ जैसा मुख्य वृक्ष होता है। उत्तर भारत में मुख्य वृक्ष साल को शक (सखुआ) कहते हैं। दक्षिण भारत में शक-वन को सागवान कहते हैं। शक वृक्ष क्षेत्र में राज्य करने वाली सूर्यवंश की शाखा को शाक्य कहते थे जिसमें शुद्धोदन पुत्र सिद्धार्थ बुद्ध का जन्म हुआ था।
(३) शक द्वीप भारत के दक्षिण पूर्व में था। यह आस्ट्रेलिया है जहां कई प्रकार के युकलिप्टस स्तम्भ जैसे शक-वृक्ष हैं।
(४) मध्य एसिया शक द्वीप नहीं था, यह जम्बू द्वीप का अंश था। यूरोप प्लक्ष द्वीप था। किन्तु पूर्व यूरोप और मध्य एसिया की अलग-अलग जातियों का समूह शक था। यह हूण, रोमक, उक्रयिनी, गोथ, कज्जाक (कालक) आदि जातियों का समूह था। किसी भी शक जाति ने अपना कैलेण्डर अपने देश या भारत में आरम्भ नहीं किया था। वे मुख्यतः इरान का कैल्ण्डर मानते थे (अल-बिरुनि का प्राचीन देशों की कालगणना)

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शुभ दीपावली–


शुभ दीपावली————–

कोई भी राष्ट्र तत्काल अथवा अल्प काल मे नहीं बनता वह एक लंबे समय की परंपरा का एक हिस्सा होता है, हिन्दू समाज मे जब कोई त्यवहार, उत्सव मनाया जाता है तो उसका कोई न कोई उद्देश्य होता है तो इस पवित्र दीपावली पर्व का उद्देश्य क्या है, मनाया ही जाता क्यों है -?

वैदिक काल मे राजा-महाराजा और आर्य गृहस्थों द्वारा नियमित यज्ञ किया जाता था यज्ञ चातुर्मास समाप्ती कार्तिक पुर्णिमा पर चतुर्मास्य यज्ञ किए जाते थे, उत्तरायन-दक्षिणायन के आरंभ मे जो यज्ञ होते थे वे नवसस्येष्ठि यज्ञ कहलाते थे जो कालांतर मे दीपावली का पर्व बन गया, वैदिक काल मे उत्तरायन और दक्षिणायन का बृहद विचार था यजुर्वेद और अथर्वेद इसका विस्तार से वर्णन है, दीपावली परिवर्तन से संबन्धित त्यवहार है, इस समय सूर्य दक्षिणायन होते हैं, साथ ही नया फसल धान आता है उसका चिवुरा खाया जाता है तथा दीपोत्सव मनाया जाता है।

हम सभी जानते हैं की जब भक्त प्रहलाद पौत्र महाराजा बलि ने तीनों लोक अपने पराक्रम से विजित कर लिया वे तीनों लोको पर शासन करने लगे महान दानी थे, सारे देवता भगवान विष्णु के पास गए महाराज यह देवलोक, देवभूमि हमे पुनः वापस दिला दीजिये भगवान जानते थे वह तो महान पराक्रमी और दानी है, वे बामन रूप धारण कर वे राजा बलि के पास गए राजा उनके सुंदर स्वरूप को देख भाव विह्वल हो गए, ब्राह्मण बालक ने अपने लिए तीन कदम धरती मागा महाराज बलि के गुरु शुक्राचार्य ने बहुत समझाया ये भगवान विष्णु है तुम्हें ठगने आए है, लेकिन राज़ा बलि ने उनकी अनसुनी कर यज्ञ वेदी पर बैठ उन्होने कहा कि यदि ये विष्णु ही हैं तो इससे बड़ा महान कार्य और क्या हो सकता है! कि भगवान स्वयं ही मेरे यहाँ दान हेतु आए हैं राज़ा ने संकल्प ले उस सुंदर बामन ब्रह्मण बालक को दान देने का संकल्प लिया संकल्प लेते ही वह सुन्दर छोटा सा बालक विशाल के होता दिखाई दिया, उस बामन ने ढाई कदम से ही धरती नाप दी, तीसरा कदम राजा बलि के सिर पर रखा। उसके पश्चात भगवान ने राजा बलि को पाताल लोक का राज्य वापस कर दिया, देवता बहुत प्रसंद हुए पहली बार धरती पर दीपावली मनायी गयी सभी ने अपने- अपने घरों को सजाया खुशियां मनाई ——-!

जब मृत्यु के रहस्य की गुत्थी सुलझाने हेतु तीन दिनो तक नचिकेता यमराज के दरवाजे पर भूखा- प्यासा बैठा रहा, आने पर यमराज को बड़ा ही पश्चाताप हुआ उन्होने उसके बदले तेजस्वी नचिकेता से तीन वर मागने को कहा उसने किसी प्रकार का प्रलोभन स्वीकार नहीं किया, मजबूर हो यमराज ने मृत्यु रहस्य बता, नचिकेता को संतुष्ट कर वापस पृथ्बी पर भेज दिया नचिकेता के वापस आने पर आध्यात्मिक जगत मे ही नहीं बल्कि मानव समाज में भी दीपावली मनाई गयी तब से यह परंपरा पड़ गयी।

रामायण यानी त्रेतायुग काल मे जब भगवान श्रीराम ने रावण का बध कर अयोध्या लौटे तो यह भी दिन वही विजयदशमी के पश्चात अमावस्या का दिन था बड़ी ही धूम-धाम से अयोध्या ही नहीं सम्पूर्ण मानव जगत मे दीपावली मनाई गयी सभी मानवों ने अपने-अपने घरों को सजाया, दीपक ज्ञान का प्रतीक है अंधकार का शमन करने वाला दीपक देवताओं की ज्योतिर्मय शक्ति का प्रतिनिधि है, इसे भगवान का तेजस्वी रूप माना जाता है, बीच मे एक बड़ा घृत दीपक उसके चरो ओर 10-12 दीप प्रज्वलित कर अपने अंतर-मन को ज्ञान के प्रकाश से भर लेते हैं जिससे हृदय और मन ईश्वरीय प्रकाश से जगमगा उठे, इस कारण समस्त भारतवर्ष मे दीपावली राष्ट्रीय पर्व (त्यवहार) के रूप मे मनाया जाता है।

और दीपावली पर्व भारत का राष्ट्रीय पर्व बन गया जिसे समस्त भारतीय समाज जो भी अपने को भारतीय राष्ट्रीय मानता है सभी भारतीय इस पर्व को राष्ट्रीय पर्व के नाते बड़ी धूमधाम से मनाते हैं ।

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सेक्युलर तो ओरंगजेब की ओलाद है …विरोध तो करेगे ही……. मुग़ल रिकॉर्ड की लिंक ..


सेक्युलर तो ओरंगजेब की ओलाद है …विरोध तो करेगे ही…….
मुग़ल रिकॉर्ड की लिंक ….
http://www.aurangzeb.info/2008/06/exhibit-no_2921.html

सेक्युलर तो ओरंगजेब की ओलाद है ...विरोध तो करेगे ही.......
मुग़ल रिकॉर्ड की लिंक ....
http://www.aurangzeb.info/2008/06/exhibit-no_2921.html
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Alexander सिकन्दर


Alexander सिकन्दर के अभियान का जो विवरण प्राप्त होता है उनमें कुछ नदियों के नाम आते हैं जिन्हें सिन्धु नद से पूर्व दिशा ( भारतीय सीमा के भीतर ) में स्थित मानकर उनका सम्बन्ध अति हास्यास्पद ढंग से रावी चिनाव झेलम व्यास आदि से जोड़ते हैं । यदि अलेक्जेंडर के अभियान के उपलब्ध विवरण को सूक्ष्मता से पढ़ा जाय तो पता चलता है कि केवल काबुल नदी को पार कर लेने के बाद ही उसको इंडिया में मान लिया गया है ।
सिन्धु के पश्चिम से कुभा समेत अनेक नदियाँ सिन्धु में मिलती हैं । सिन्धु की सात सहायक नदियों की भी सिन्धु संज्ञा रही है । इसे ही सिन्धु का पार करना कहा जाता है ।
यहाँ तक कि जो लौटने का मार्ग है वह सिन्धु में नावों से समुद्र की ओर यात्रा करके पाटल पहुँचने का है । क्योंकि सचमुच सिन्धु नद को ही पार करने से अलेक्जेंडर की सेना ने मना कर दिया था । विचार करें जो सिन्धु महानद पार कर सकता हो वह किसी छोटी नदी के पार जाने के लिये क्यों मना करेगा ?
अब केवल दो नदियों के नाम पर दृष्टिपात करें –
शिफा (Hyphasis)
यथा ऋग्वेदे। १। १०४। ३।
“हते ते स्यातां प्रवणे शिफायाः।”
“शिफायाः शिफा नाम नदी तस्याः।” इति तद्भाष्ये सायणः ॥
Hydaspes River अथवा Idaspes
नदियों का नाम भी इडा है, जहाँ जहाँ नदी संगम होते हैं उन नदियों की संज्ञा इडा और पिंगला कर दी जाती है ।
लक्ष्मीनारायण १.१६१.७( ओजस्वती नदी के इडा का रूप होने का उल्लेख),
इडा नारद २.४८.२२( काशी में वरुणा नदी का रूप ),
काशीखण्ड मे असी को “इडा”,(स्कन्द काशी खण्ड ५१२),
गंगा को भी इडा कहा गया है ,
Idaspes,
A riuer running by Parthia and Indie, and at last falleth into the great riuer called Indus. In this riuer is found muche golde and precious stones.

( यह परिभाषा यहाँ से ली गई http://archimedes.fas.harvard.edu/cgi-bin/dict?name=cooper&lang=la&word=idaspes&filter=CUTF8 )
*पोरस का नाम आता है , यह भी सिन्धु के पश्चिम स्थित “पुरुषपुर” का राजा ही हो सकता है , जिसकी एक राजधानी तक्षशिला भी रही होगी ( हिम पर्वतीय क्षेत्र में ऋतु अनुसार प्रवास होता है )
*जिस आम्भी की चर्चा भारत भर में सुनते हैं उसका निम्नलिखित लिंक में नाम तक नहीं है अलबत्ता Memphis नामक स्थान Egypt में होता है ।

सम्पूर्ण युद्ध-यात्रा वृत्तान्त इस लिंक पर दिया गया है
Read more http://history-of-macedonia.com/2008/12/29/alexander-the-great-biography-the-path-to-deification/