Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

राजपूतों की उत्पत्ति-


पूर्व मध्यकालीन राजस्थान-

इस काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना युद्धप्रिय राजपूत जाति का उदय एवं राजस्थान में राजपूत राज्यों की स्थापना है। गुप्तों के पतन के बाद केन्द्रीय शक्ति का अभाव उत्तरी भारत में एक प्रकार से अव्यवस्था का कारण बना। राजस्थान की गणतन्त्र जातियों ने उत्तर गुप्तों की कमजोरियों का लाभ उठाकर स्वयं को स्वतन्त्र कर लिया। यह वह समय था, जब भारत पर हूण आक्रमण हो रहे थे। हूण नेता मिहिरकुल ने अपने भयंकर आक्रमण से राजस्थान को बड़ी क्षति पहुँचायी और बिखरी हुई गणतन्त्रीय व्यवस्था को जर्जरित कर दिया। परन्तु मालवा के यशोवर्मन ने हूणों को लगभग 532 ई. में परास्त करने में सफलता प्राप्त की। इधर राजस्थान में यशोवर्मन के अधिकारी जो राजस्थानी कहलाते थे, अपने-अपने क्षेत्र में स्वतन्त्र होने की चेष्टा कर रहे थे। किसी भी केन्द्रीय शक्ति का न होना इनकी प्रवृत्ति के लिए सहायक बन गया। लगभग इसी समय उत्तरी भारत में हर्षवर्धन का उदय हुआ। उसके तत्त्वावधान में राजस्थान में व्यवस्था एवं शांति की लहर आई, परंतु जो बिखरी हुई अवस्था यहाँ पैदा हो गयी थी, वह सुधर नहीं सकी। इन राजनीतिक उथल-पुथल के सन्दर्भ में यहाँ के समाज में एक परिवर्तन दिखाई देता है। राजस्थान में दूसरी सदी ईसा पूर्व से छठी सदी तक विदेशी जातियाँ आती रहीं और यहाँ के स्थानीय समूह उनका मुकाबला करते रहे। परन्तु कालान्तर में इन विदेशी आक्रमणकारियों की पराजय हुई, इनमें कई मारे गये और कई यहाँ बस गये। जो शक या हूण यहाँ बचे रहे उनका यहाँ की शस्त्रोपजीवी जातियों के साथ निकट सम्पर्क स्थापित होता गया और अन्ततोगत्वा छठी शताब्दी तक स्थानीय और विदेशी योद्धाओं का भेद जाता रहा।

राजपूतों की उत्पत्ति-

राजपूताना के इतिहास के सन्दर्भ में राजपूतों की उत्पत्ति के विभिन्न सिद्धान्तों का अध्ययन बड़ा महत्त्व का है। राजपूतों का विशुद्ध जाति से उत्पन्न होने के मत को बल देने के लिए उनको अग्निवंशीय बताया गया है। इस मत का प्रथम सूत्रपात चन्दबरदाई के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पृथ्वीराजरासो’ से होता है। उसके अनुसार राजपूतों के चार वंश प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान ऋषि वशिष्ठ के यज्ञ कुण्ड से राक्षसों के संहार के लिए उत्पन्न किये गये। इस कथानक का प्रचार 16वीं से 18वीं सदी तक भाटों द्वारा खूब होता रहा। मुहणोत नैणसी और सूर्यमल्ल मिसण ने इस आधार को लेकर उसको और बढ़ावे के साथ लिखा। परन्तु इतिहासकारों के अनुसार ‘अग्निवंशीय सिद्धान्त’ पर विश्वास करना उचित नहीं है क्योंकि सम्पूर्ण कथानक बनावटी व अव्यावहारिक है। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्दबरदाई ऋषि वशिष्ठ द्वारा अग्नि से इन वंशों की उत्पत्ति से यह अभिव्यक्त करता है कि जब विदेशी सत्ता से संघर्ष करने की आवश्यकता हुई तो इन चार वंश के राजपूतों ने शत्रुओं से मुकाबले हेतु स्वयं को सजग कर लिया। गौरीशकंर हीराचन्द ओझा, सी.वी.वैद्य, दशरथ शर्मा, ईश्वरी प्रसाद इत्यादि इतिहासकारों ने इस मत को निराधार बताया है। गौरीशंकर हीराचन्द ओझा राजपूतों को सूर्यवंशीय और चन्द्रवंशीय बताते हैं। अपने मत की पुष्टि के लिए उन्होंने कई शिलालेखों और साहित्यिक ग्रंथों के प्रमाण दिये हैं, जिनके आधार पर उनकी मान्यता है कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज हैं। राजपूतों की उत्पत्ति से सम्बन्धित यही मत सर्वाधिक लोकप्रिय है। राजपूताना के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने राजपूतों को शक और सीथियन बताया है। इसके प्रमाण में उनके बहुत से प्रचलित रीति-रिवाजों का, जो शक जाति के रिवाजों से समानता रखते थे, उल्लेख किया है। ऐसे रिवाजों में सूर्य पूजा, सती प्रथा प्रचलन, अश्वमेध यज्ञ, मद्यपान, शस्त्रों और घोड़ों की पूजा इत्यादि हैं। टॉड की पुस्तक के सम्पादक विलियम क्रुक ने भी इसी मत का समर्थन किया है परन्तु इस विदेशी वंशीय मत का गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने खण्डन किया है। ओझा का कहना है कि राजपूतों तथा विदेशियों के रस्मों-रिवाजों में जो समानता कनर्ल टॉड ने बताई है, वह समानता विदेशियों से राजपूतों ने प्राप्त नहीं की है, वरन् उनकी सत्यता वैदिक तथा पौराणिक समाज और संस्कृति से की जा सकती है। अतः उनका कहना है कि शक, कुषाण या हूणों के जिन-जिन रस्मो-रिवाजों व परम्पराओं का उल्लेख समानता बताने के लिए जेम्स टॉड ने किया है, वे भारतवर्ष में अतीत काल से ही प्रचलित थीं। उनका सम्बन्ध इन विदेशी जातियों से जोड़ना निराधार है। डॉ. डी. आर. भण्डारकर राजपूतों को गुर्जर मानकर उनका संबंध श्वेत-हूणों के स्थापित करके विदेशी वंशीय उत्पत्ति को और बल देते हैं। इसकी पुष्टि में वे बताते हैं कि पुराणों में गुर्जर और हूणों का वर्णन विदेशियों के सन्दर्भ में मिलता है। इसी प्रकार उनका कहना है कि अग्निवंशीय प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान भी गुर्जर थे, क्योंकि राजोर अभिलेख में प्रतिहारों को गुर्जर कहा गया है। इनके अतिरिक्त भण्डारकर ने बिजौलिया शिलालेख के आधार पर कुछ राजपूत वंशों को ब्राह्मणों से उत्पन्न माना है। वे चौहानों को वत्स गोत्रीय ब्राह्मण बताते हैं और गुहिल राजपूतों की उत्पत्ति नागर ब्राह्मणों से मानते हैं। डॉ. ओझा एवं वैद्य ने भण्डराकर की मान्यता को अस्वीकृत करते हुए लिखा है कि प्रतिहारों को गुर्जर कहा जाना जाति विशेष की संज्ञा नहीं है वरन् उनका प्रदेश विशेष गुजरात पर अधिकार होने के कारण है। जहाँ तक राजपूतों की ब्राह्मणों से उत्पत्ति का प्रश्न है, वह भी निराधार है क्योंकि इस मत के समर्थन में उनके साक्ष्य कतिपय शब्दों का प्रयोग राजपूतों के साथ होने मात्र से है। इस प्रकार राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में उपर्युक्त मतों में मतैक्य नहीं है। फिर भी डॉ. ओझा के मत को सामान्यतः मान्यता मिली हुई है। निःसन्देह राजपूतों को भारतीय मानना उचित है। (संदर्भ- माध्यमिक षिक्षा बोर्ड, राजस्थान की राजस्थान अध्ययन की पुस्तक)

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राजपूतों की उत्पत्ति


राजपूतों की उत्पत्ति
राजपूत शब्द की सर्वप्रथम उत्पत्ति 6ठी शताब्दी ईस्वी में हुई थी. राजपूतों ने 6ठी शताब्दी ईस्वी से 12वीं सदी के बीच भारतीय इतिहास में एक प्रमुख स्थान प्राप्त किया था.

राजपूतों की उत्पत्ति के सन्दर्भ में विद्वानों ने कई सिद्धांत का उल्लेख किया हैं. श्री कर्नल जेम्स टॉड द्वारा दिए गए सिद्धांत के अनुसार राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी मूल की थी. उनके अनुसार राजपूत कुषाण,शक और हूणों के वंशज थे. उनके अनुसार चूँकि राजपूत अग्नि की पूजा किया करते थे और यही कार्य कुषाण और शक भी करते थे. इसी कारण से उनकी उत्पति शको और कुषाणों से लगायी जाती थी.

इसी तरह दूसरे सिद्धांत के अनुसार राजपूतों को किसी भी विदेशी मूल से सम्बंधित नहीं किया जाता है. बल्कि उन्हें क्षत्रिय जाति से सम्बंधित किया जाता है. इस सन्दर्भ में यह कहा जाता है की चूँकि उनके द्वारा अग्नि की पूजा की जाती थी जोकि आर्यों के द्वारा भी सम्पादित किया जाता था. अतः राजपूतों की उत्पत्ति भारतीय मूल की थी.

तीसरे सिद्धांत के अनुसार राजपूत आर्य और विदेशी दोनों के वंशज थे. उनके अन्दर दोनों ही जातियों का मिश्रण सम्मिलित था.

चौथा सिद्धांत अग्निकुल सिद्धांत से संबंधित है. चंदवरदायी द्वारा १२वीं शताब्दी के अन्त में रचित ग्रन्थ ‘पृथ्वीराज रासो’ में चालुक्य (सोलंकी), प्रतिहार, चहमान तथा परमार राजपूतों की उत्पत्ति आबू पर्वत के अग्निकुण्ड से बतलाई है, किन्तु इसी ग्रन्थ में एक अन्य स्थल पर इन्हीं राजपूतों को “रवि – शशि जाधव वंशी” कहा है.

इन तमाम विद्वानों के तर्को के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि, यद्यपि राजपूत क्षत्रियों के वंशज थे, फिर भी उनमें विदेशी रक्त का मिश्रण अवश्य था. अतः वे न तो पूर्णतः विदेशी थे, न तो पूर्णत भारतीय

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धनतेरस विशेष –


धनतेरस विशेष –

हिन्दू धर्म के सभी देवताओं के विशेष पर्व पर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।
जैसे नवरात्र में देवी की, श्रावण मास मे भगवान शिव की,
कार्तिक में लक्ष्मी-नारायण की,
भाद्रपद में गणेश की,
ठीक उसी तरह कार्तिक मास की तेरस को , दीपावली पर लक्ष्मी के साथ निधिपति राजाधिराज कुबेर की पूजा-अर्चना की जाती है।

इनकी पूजा से भक्तों की मनोकामना पूरी होकर धनपुत्रादि की प्राप्ति सहज ही मिल जाती है।
मानव जीवन में चारों पुरूषार्थो में अर्थ का विशेष महत्व है।
अर्थ यानि धन के बिना मनुष्य जीवन कष्टमय व्यतीत होता है।
जिनके पास धन है, उनके यहां सभी तरह की सुख-सुविधाएं भोगने को मिलती हैं।

जिस तरह भगवान श्रीगणेश सिद्धि-बुद्धि के स्वामी हैं।
उसी तरह निधिपति राजाधिराज कुबेर धनदान के स्वामी हैं।
इन्हें धनाध्यक्ष एवं नवनिधियों का स्वामी भी कहा जाता है।

इनके वर्णन का इतिहास बहुत प्राचीन है।
इनकी पूजा भगवान शंकरजी के साथ भी होती है।
महालक्ष्मी के साथ तो इनकी विशेष पूजा की जाती है।
उतर दिशा के अधिपति भी महाराज कुबेर है, दस दिक्पालों में यह एक हैं।

सभी देवताओं की पूजा-यज्ञादि के अंत में षोड़षोपचार पूजन के अनंतर आरती एवं पुष्पांजलि का विधान होता है।
पुष्पांजलि एवं राजा के अभिषेक के अंत में ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यंसाहिने नमो वयं वैत्रणाय कुर्म हे… मंत्र का पाठ होता है।
यह महाराज कुबेर की प्रार्थना का मंत्र है।
अत: सभी कामना के फल दृष्टि से एवं धन वैभव का दान करने में वैश्रवण कुबेर ही समर्थ हैं।

कुबेर के जन्मों की कथा इस प्रकार है –

पूर्व जन्म में कुबेर गुणनिधि नामक वेदज्ञ ब्राह्मण थे।
उन्हें शास्त्रों का ज्ञान था और संध्या, देववंदन, पितृ पूजा, अतिथि सेवा करते थे।
सभी प्राणियों के प्रति दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे।
वे बड़े धर्मात्मा थे, किन्तु कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे अपनी सारी पैतृक संपति गंवा डाली।
इतना ही नहीं अच्छे आचरणों से भ्रष्ट भी हो गए और स्नेह वश इनकी माता ने इनके दुष्कर्मो की चर्चा तक इनके पिता से न की।
एक दिन किसी प्रकार इनके पिता को इनके दुष्कर्मो का पता चला और उन्होंने गुणनिधि की माता से अपनी संपति व पुत्र के बारे में जानकारी चाही।
गुणनिधि पिता के प्रकोप भय से घर छोड़कर भाग निकले एवं वन में चले गए।

इधर-उधर भटकने के बाद गुणनिधि ने संध्या समय एक शिवालय देखा।
उस शिव मंदिर में समीपवर्ती गांव के लोग शिवरात्रि के लिए समस्त पूजन सामग्री और प्रसाद के साथ शिव पूजा का विधान कर रहे थे।

गुणनिधि पूरे दिन भूख-प्यास से परेशान था, इस कारण प्रसाद आदि वस्तुओं को देखने पर उसकी भूख और ज्यादा बढ़ गई।
वह वहीं समीप में छुपकर पूजन देख रहे थे एवं सोच रहे थे कि इन लोगों को नींद आने पर प्रसाद चुराकर अपनी भूख शांत करूंगा।

रात्रि में शिव भक्तों के सो जाने पर एक कपड़े की बती जलाकर फल-पकवानों को लेकर भाग ही रहा था कि उसका पैर एक सोए हुए पुजारी के पैर से टकरा गया और वह व्यक्ति चोर-चोर चिल्लाने लगा।

चोर-चोर की आवाज सुनकर सभी सेवक जाग गए एवं गुणनिधि पर नगर रक्षक ने बाण छोड़ा, जिससे उसी समय गुणनिधि के प्राण निकल गए।

यमदूत जब उसे लेकर जाने लगे तो भगवान शंकर की आज्ञा से उनके गणों ने वहां पहुंचकर उसे यमदूतों से छीन लिया और उसे कैलाशपुरी ले गए।
भगवान शंकर ने गुणनिधि के भूखे रहने को व्रत-उपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित जलाए गए वस्त्र की बती को आरती मानकर उस पर प्रसन्न हो गए और उसे अपना शिवप्रद प्रदान किया।

पुन: ये ही गुणनिधि दूसरे कल्प में कुबेर हुए।
पुराणों के अनुसार महाराज कुबेर के पिता विश्रवा एवं पितामह प्रजापति पुलस्त्य था। भारद्वाज ऋषि की कन्या इड़विड़ा इनकी मां थी, इनकी सौतेली माता का नाम कैकसी था।
रावण, कुंभकरण और विभीषण इनके सौतेले भाई थे।
इनकी पत्नी का नाम भद्रा है।
इनके दो पुत्र हैं- नाल कुबेर और मणीग्रीव कैलाश पर स्थित अलकापुरी इनकी राजधानी है।
इनकी सभा में सर्वोच्च रत्न जडि़त सिंहासन पर महाराज कुबेर विराजते हैं।
उस सभा में मिश्र केशी, रंभा, उर्वशी, मेनका आदि अप्सराएं किन्नर, यज्ञ और गंधर्वगण तथा ब्रह्मर्षि देवर्षि तथा ऋषिगण विराजते हैं।

इनकी सेवा में यक्ष एवं राक्षस हर समय रहते हैं।
यक्षों का अधिश्वर बनने के लिए इन्होंने नर्मदा के कावेरी तट पर सौ वर्षो तक घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने इनको यक्षराज बना दिया।
महाराज कुबेर ने जिस स्थान पर तपस्या की उस स्थान का नाम कुबेर तीर्थ पड़ गया है। वहां इनको अनेक वरदान मिले।

रूद्र के साथ मित्रता, धन का स्वामित्व, दिक्पालत्व एवं नल कुबेर नामक पुत्र आदि वर पाते ही धन एवं नव निधियां वहां पहुंच गई।
इसलिए ये नवनिधियों के स्वामी एवं धनाध्यक्ष हुए।

वहीं आकर मरूद्गणों ने राजाधितराज कुबेर का अभिषेक किया, पुष्पक विमान दिया और यक्षों का राजा बना दिया।

राज्यश्री के रूप में साक्षात महालक्ष्मी वहां नित्य निवास करती है।
राजाधिराज धनाध्यक्ष कुबेर अपनी सभा में बैठकर अपने वैभव, धन एवं निधियों का दान करते हैं।
इसलिए इनकी पूजा-अर्चना से ये प्रसन्न होकर भक्तों को वैभव देते हैं।
विशेषकर धन त्रयोदशी एवं दीपावली पर इनकी विशेष पूजा की जाती है।

व्यापार वृद्धि हेतु धन-वैभव, सुख शांति हेतु कुबेर यंत्र की निम्न विधि से साधना करें –

कुबेर यंत्र साधनाकाल समय –
वैसे तो धनतेरस, दीपावली, शिवरात्रि विशेष रूप से कुबेर यंत्र साधना हेतु श्रेष्ठ होती है। किन्तु नवरात्र, होली, ग्रहण, गुरू पुष्य योग, सर्वाथ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग आदि अवसरों पर कुबेर यंत्र साधना भी श्रेष्ठ है।
कुबेर यंत्र –
यंत्र स्वर्ण निर्मित,
रजत निर्मित,
अष्टधातु,
ताम्र निर्मित,
भोजपत्र,
कागज,
वस्त्र आदि पर निर्मित श्रेष्ठ होता है।

इसे ताम्र पर निर्मित करा लें। यह ताम्रपत्र सभी को सुलभ हो जाता है। इसलिए ठीक रहता है।

विधि-
साधक स्वयं या किसी योग्य ब्राह्मण द्वारा यह साधना कराएं।
प्रात:काल या प्रदोश काल मे स्नानादि से निवृत होकर पूर्वाभिमुख या उतराभिमुख आसन पर बैठें।
अपने सामने पूजन सामग्री एवं माला व यंत्र एक पाटे पर रख लें।

सर्व प्रथम आचमन प्राणायाम करके संकल्पपूर्वक गणेशाधि देवताओं का ध्यान करके पूजन करें, फिर किसी ताम्र पात्र में कुबेर यंत्र को रखकर धनाध्यक्ष कुबेर का ध्यान करें।

” मनुजवाह्य विमानवरस्थितंगुरूडरत्नानिभं निधिनाकम् !
शिव संख युकुतादिवि भूषित वरगदे दध गतं भजतान्दलम् !! ”

तत्पश्चात , यथासंभव निम्न मंत्रों मे से किसी भी एक मंत्र की कम से कम 11 माला करें –

” ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा !”

” कुबेर त्वं धनाधीश गृहे ते कमलास्थिता !
तां देवी प्रेशयाशु त्वं मद्-गृहे ते नमो नमः!! ”

” ॐ एं ह्रीं यक्षराजाय कुबेराय वैश्रवणाय धनाधिपतये धनधान्य समृद्धि में देहि देहि दापय दापय स्वाहा ! ”

” ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराए नमः! ”

!! ॐ कुं कुबेराये नमः !!

धनतेरस विशेष -

हिन्दू धर्म के सभी देवताओं के विशेष पर्व पर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। 
जैसे नवरात्र में देवी की, श्रावण मास मे भगवान शिव की, 
कार्तिक में लक्ष्मी-नारायण की, 
भाद्रपद में गणेश की, 
ठीक उसी तरह कार्तिक मास की तेरस को , दीपावली पर लक्ष्मी के साथ निधिपति राजाधिराज कुबेर की पूजा-अर्चना की जाती है।

इनकी पूजा से भक्तों की मनोकामना पूरी होकर धनपुत्रादि की प्राप्ति सहज ही मिल जाती है।
मानव जीवन में चारों पुरूषार्थो में अर्थ का विशेष महत्व है। 
अर्थ यानि धन के बिना मनुष्य जीवन कष्टमय व्यतीत होता है। 
जिनके पास धन है, उनके यहां सभी तरह की सुख-सुविधाएं भोगने को मिलती हैं।

 जिस तरह भगवान श्रीगणेश सिद्धि-बुद्धि के स्वामी हैं। 
उसी तरह निधिपति राजाधिराज कुबेर धनदान के स्वामी हैं।
इन्हें धनाध्यक्ष एवं नवनिधियों का स्वामी भी कहा जाता है। 

इनके वर्णन का इतिहास बहुत प्राचीन है। 
इनकी पूजा भगवान शंकरजी के साथ भी होती है। 
महालक्ष्मी के साथ तो इनकी विशेष पूजा की जाती है। 
उतर दिशा के अधिपति भी महाराज कुबेर है, दस दिक्पालों में यह एक हैं।

सभी देवताओं की पूजा-यज्ञादि के अंत में षोड़षोपचार पूजन के अनंतर आरती एवं पुष्पांजलि का विधान होता है। 
पुष्पांजलि एवं राजा के अभिषेक के अंत में ॐ राजाधिराजाय प्रसह्यंसाहिने नमो वयं वैत्रणाय कुर्म हे... मंत्र का पाठ होता है। 
यह महाराज कुबेर की प्रार्थना का मंत्र है। 
अत: सभी कामना के फल दृष्टि से एवं धन वैभव का दान करने में वैश्रवण कुबेर ही समर्थ हैं। 

कुबेर के जन्मों की कथा इस प्रकार है -

पूर्व जन्म में कुबेर गुणनिधि नामक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। 
उन्हें शास्त्रों का ज्ञान था और संध्या, देववंदन, पितृ पूजा, अतिथि सेवा करते थे। 
सभी प्राणियों के प्रति दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे। 
वे बड़े धर्मात्मा थे, किन्तु कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे अपनी सारी पैतृक संपति गंवा डाली। 
इतना ही नहीं अच्छे आचरणों से भ्रष्ट भी हो गए और स्नेह वश इनकी माता ने इनके दुष्कर्मो की चर्चा तक इनके पिता से न की।
एक दिन किसी प्रकार इनके पिता को इनके दुष्कर्मो का पता चला और उन्होंने गुणनिधि की माता से अपनी संपति व पुत्र के बारे में जानकारी चाही। 
गुणनिधि पिता के प्रकोप भय से घर छोड़कर भाग निकले एवं वन में चले गए। 

इधर-उधर भटकने के बाद गुणनिधि ने संध्या समय एक शिवालय देखा। 
उस शिव मंदिर में समीपवर्ती गांव के लोग शिवरात्रि के लिए समस्त पूजन सामग्री और प्रसाद के साथ शिव पूजा का विधान कर रहे थे। 

गुणनिधि पूरे दिन भूख-प्यास से परेशान था, इस कारण प्रसाद आदि वस्तुओं को देखने पर उसकी भूख और ज्यादा बढ़ गई। 
वह वहीं समीप में छुपकर पूजन देख रहे थे एवं सोच रहे थे कि इन लोगों को नींद आने पर प्रसाद चुराकर अपनी भूख शांत करूंगा। 

रात्रि में शिव भक्तों के सो जाने पर एक कपड़े की बती जलाकर फल-पकवानों को लेकर भाग ही रहा था कि उसका पैर एक सोए हुए पुजारी के पैर से टकरा गया और वह व्यक्ति चोर-चोर चिल्लाने लगा। 

चोर-चोर की आवाज सुनकर सभी सेवक जाग गए एवं गुणनिधि पर नगर रक्षक ने बाण छोड़ा, जिससे उसी समय गुणनिधि के प्राण निकल गए।

यमदूत जब उसे लेकर जाने लगे तो भगवान शंकर की आज्ञा से उनके गणों ने वहां पहुंचकर उसे यमदूतों से छीन लिया और उसे कैलाशपुरी ले गए। 
भगवान शंकर ने गुणनिधि के भूखे रहने को व्रत-उपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित जलाए गए वस्त्र की बती को आरती मानकर उस पर प्रसन्न हो गए और उसे अपना शिवप्रद प्रदान किया। 

पुन: ये ही गुणनिधि दूसरे कल्प में कुबेर हुए।
पुराणों के अनुसार महाराज कुबेर के पिता विश्रवा एवं पितामह प्रजापति पुलस्त्य था। भारद्वाज ऋषि की कन्या इड़विड़ा इनकी मां थी, इनकी सौतेली माता का नाम कैकसी था। 
रावण, कुंभकरण और विभीषण इनके सौतेले भाई थे। 
इनकी पत्नी का नाम भद्रा है। 
इनके दो पुत्र हैं- नाल कुबेर और मणीग्रीव कैलाश पर स्थित अलकापुरी इनकी राजधानी है। 
इनकी सभा में सर्वोच्च रत्न जडि़त सिंहासन पर महाराज कुबेर विराजते हैं। 
उस सभा में मिश्र केशी, रंभा, उर्वशी, मेनका आदि अप्सराएं किन्नर, यज्ञ और गंधर्वगण तथा ब्रह्मर्षि देवर्षि तथा ऋषिगण विराजते हैं। 

इनकी सेवा में यक्ष एवं राक्षस हर समय रहते हैं। 
यक्षों का अधिश्वर बनने के लिए इन्होंने नर्मदा के कावेरी तट पर सौ वर्षो तक घोर तपस्या की जिससे प्रसन्न होकर महादेव ने इनको यक्षराज बना दिया। 
महाराज कुबेर ने जिस स्थान पर तपस्या की उस स्थान का नाम कुबेर तीर्थ पड़ गया है। वहां इनको अनेक वरदान मिले।

रूद्र के साथ मित्रता, धन का स्वामित्व, दिक्पालत्व एवं नल कुबेर नामक पुत्र आदि वर पाते ही धन एवं नव निधियां वहां पहुंच गई। 
इसलिए ये नवनिधियों के स्वामी एवं धनाध्यक्ष हुए। 

वहीं आकर मरूद्गणों ने राजाधितराज कुबेर का अभिषेक किया, पुष्पक विमान दिया और यक्षों का राजा बना दिया। 

राज्यश्री के रूप में साक्षात महालक्ष्मी वहां नित्य निवास करती है। 
राजाधिराज धनाध्यक्ष कुबेर अपनी सभा में बैठकर अपने वैभव, धन एवं निधियों का दान करते हैं। 
इसलिए इनकी पूजा-अर्चना से ये प्रसन्न होकर भक्तों को वैभव देते हैं। 
विशेषकर धन त्रयोदशी एवं दीपावली पर इनकी विशेष पूजा की जाती है।

व्यापार वृद्धि हेतु धन-वैभव, सुख शांति हेतु कुबेर यंत्र की निम्न विधि से साधना करें -

 कुबेर यंत्र साधनाकाल समय - 
वैसे तो धनतेरस, दीपावली, शिवरात्रि विशेष रूप से कुबेर यंत्र साधना हेतु श्रेष्ठ होती है। किन्तु नवरात्र, होली, ग्रहण, गुरू पुष्य योग, सर्वाथ सिद्धि योग, अमृत सिद्धि योग आदि अवसरों पर कुबेर यंत्र साधना भी श्रेष्ठ है।

कुबेर यंत्र - 
यंत्र स्वर्ण निर्मित, 
रजत निर्मित, 
अष्टधातु, 
ताम्र निर्मित, 
भोजपत्र, 
कागज, 
वस्त्र आदि पर निर्मित श्रेष्ठ होता है। 

इसे ताम्र पर निर्मित करा लें। यह ताम्रपत्र सभी को सुलभ हो जाता है। इसलिए ठीक रहता है।

विधि- 
साधक स्वयं या किसी योग्य ब्राह्मण द्वारा यह साधना कराएं। 
प्रात:काल या प्रदोश काल मे स्नानादि से निवृत होकर पूर्वाभिमुख या उतराभिमुख आसन पर बैठें। 
अपने सामने पूजन सामग्री एवं माला व यंत्र एक पाटे पर रख लें।

सर्व प्रथम आचमन प्राणायाम करके संकल्पपूर्वक गणेशाधि देवताओं का ध्यान करके पूजन करें, फिर किसी ताम्र पात्र में कुबेर यंत्र को रखकर धनाध्यक्ष कुबेर का ध्यान करें।

" मनुजवाह्य विमानवरस्थितंगुरूडरत्नानिभं निधिनाकम् !
 शिव संख युकुतादिवि भूषित वरगदे दध गतं भजतान्दलम् !! "

तत्पश्चात , यथासंभव निम्न मंत्रों मे से किसी भी एक मंत्र की कम से कम 11 माला करें -

" ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये
धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा !"

" कुबेर त्वं धनाधीश गृहे ते कमलास्थिता !
तां देवी प्रेशयाशु त्वं मद्-गृहे ते नमो नमः!! "

" ॐ एं ह्रीं यक्षराजाय कुबेराय वैश्रवणाय धनाधिपतये धनधान्य समृद्धि में देहि देहि दापय दापय स्वाहा ! "

" ॐ श्रीं ॐ ह्रीं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराए नमः! "

!!  ॐ कुं कुबेराये नमः !!
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आप उच्च कोटि के मुर्ख है.यहाँ पर कोटि का अर्थ करोड़ नहीं होता है


आप उच्च कोटि के मुर्ख है.यहाँ पर कोटि का अर्थ करोड़ नहीं होता है 
हमारे सनातन हिन्दू धर्म में कितने देवता हैं ? कुछ लोग 33 करोड़ तो कुछ 33 प्रकार के बतलाते हैं . इस विषय में हम वेदों का शिरोभाग जिसे उपनिषद् कहते हैं उससे इस विषय को प्रस्तुत करते हैं ------बृहदारण्यक उपनिषद् में शाकल्य ऋषि ने याज्ञवल्क्य महर्षि से पूछा --देवता कितने हैं ---कति देवाः ? याज्ञवल्क्य जी ने अन्तम उत्तर देते हुए कहा -------33 ही देवता हैं ----- त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवाः। अब प्रश्न हुआ --वे 33 देवता कौन कौन हैं ? इसका उत्तर दिया गया ------
8 वसु-  धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष
11 रुद्र-हर, बहुरुप, त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।
12 आदित्य-  धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु..
1 इन्द्र
1प्रजापति
कुल योग = 33
यही 33 देवता हैं । -----. बृहदारण्यकोपनिषद् 9/3/1-2
इस प्रकार वेद में 33 ही देवता कहे गये हैं । यहां कहीं भी --33 कोटि देवता --ऐसे शब्द का प्रयोग ही नहीं है। जिससे हमें कोटि शब्द के अर्थ को बतलाने के लिए बाध्य होना पड़े ।

ये 33 देवता भी एक ही देवता = परमात्मा =ब्रह्म =भगवान् के विभिन्न रूप हैं । वस्तुतः एक ही देव है जो भिन्न भिन्न प्रकार से अनेक नामों से कहा गया है---एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति --ऋग्वेद,वही एक देव सर्वत्र व्याप्त (समाया) हुआ है.

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः ----श्वेताश्वतरोपनिषद्-6/11. 
हमारा सनातन हिन्दू धर्म मुस्लिम या इशायियों की भांति छुद्र विचारधारा वाला नहीं है । यहां तो यह उस समय ही विनिर्णीत हो चुका कि जो कुछ दिखायी या सुनायी देता है वह सब वही एक देव है --- सर्वं खल्विदं ब्रह्म---3/14/1.

अतः हमारे सनातन धर्म में मूलतः एक ही देव हैं जिन्हे हम इन 33 देवताओं की बात क्या , सम्पूर्ण विश्व को उन्ही का रूप देखते हैं.
ब्रह्मसूत्र के "देवताधिकरण" -अध्याय 1/पाद 3/अधिकरण 8/सूत्र 27. का शांकर भाष्य एवं उसकी भामती टीका में भी विवरण मिलता है.
TP Shukla

आप उच्च कोटि के मुर्ख है.यहाँ पर कोटि का अर्थ करोड़ नहीं होता है
हमारे सनातन हिन्दू धर्म में कितने देवता हैं ? कुछ लोग 33 करोड़ तो कुछ 33 प्रकार के बतलाते हैं . इस विषय में हम वेदों का शिरोभाग जिसे उपनिषद् कहते हैं उससे इस विषय को प्रस्तुत करते हैं ——बृहदारण्यक उपनिषद् में शाकल्य ऋषि ने याज्ञवल्क्य महर्षि से पूछा –देवता कितने हैं —कति देवाः ? याज्ञवल्क्य जी ने अन्तम उत्तर देते हुए कहा ——-33 ही देवता हैं —– त्रयस्त्रिंशत्त्वेव देवाः। अब प्रश्न हुआ –वे 33 देवता कौन कौन हैं ? इसका उत्तर दिया गया ——
8 वसु- धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष
11 रुद्र-हर, बहुरुप, त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।
12 आदित्य- धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु..
1 इन्द्र
1प्रजापति
कुल योग = 33
यही 33 देवता हैं । —–. बृहदारण्यकोपनिषद् 9/3/1-2
इस प्रकार वेद में 33 ही देवता कहे गये हैं । यहां कहीं भी –33 कोटि देवता –ऐसे शब्द का प्रयोग ही नहीं है। जिससे हमें कोटि शब्द के अर्थ को बतलाने के लिए बाध्य होना पड़े ।

ये 33 देवता भी एक ही देवता = परमात्मा =ब्रह्म =भगवान् के विभिन्न रूप हैं । वस्तुतः एक ही देव है जो भिन्न भिन्न प्रकार से अनेक नामों से कहा गया है—एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति –ऋग्वेद,वही एक देव सर्वत्र व्याप्त (समाया) हुआ है.

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः —-श्वेताश्वतरोपनिषद्-6/11.
हमारा सनातन हिन्दू धर्म मुस्लिम या इशायियों की भांति छुद्र विचारधारा वाला नहीं है । यहां तो यह उस समय ही विनिर्णीत हो चुका कि जो कुछ दिखायी या सुनायी देता है वह सब वही एक देव है — सर्वं खल्विदं ब्रह्म—3/14/1.

अतः हमारे सनातन धर्म में मूलतः एक ही देव हैं जिन्हे हम इन 33 देवताओं की बात क्या , सम्पूर्ण विश्व को उन्ही का रूप देखते हैं.
ब्रह्मसूत्र के “देवताधिकरण” -अध्याय 1/पाद 3/अधिकरण 8/सूत्र 27. का शांकर भाष्य एवं उसकी भामती टीका में भी विवरण मिलता है.
TP Shukla

Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

धनतेरस धन से सम्बंधित नहीं है


न्दे मातरम्

धनतेरस धन से सम्बंधित नहीं है

fb.com/bhairajivdixit

स्वदेशी के सन्दर्भ में धनतेरस का महत्व 

कुंठित उपभोक्तावाद से प्रेरित बाजारीकरण के कारण धनतेरस को लेकर कुछ भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास एक प्रश्नावली के द्वारा :

प्रश्न:

धनतेरस में "धन" शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: 

यह बहुत कम लोग जानते है की वास्तव में धनतेरस में "धन" शब्द स्वास्थ्य के देवता धनवंतरी से लिया गया है
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न: 

अगर धन नहीं तो फिर धनतेरस का क्या महत्त्व है?

उत्तर:

देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।

प्रश्न:

आज के दिन कुछ नया खरीदने की परंपरा क्यों है?

उत्तर: 

समुद्र मंथन के समय धन्वन्तरि जी कलश में अमृत लेकर प्रकट हुए थे इसी कारण इस दिन बर्तन खरीदने की प्रथा है 

आज के दिन वास्तविक परम्परा केवल नया बर्तन खरीदने की है या चाँदी भी खरीद सकते है

बाजारीकरण और धन के प्रति हमारे लगाव ने हमें अँधा बना दिया है और हम भीड़ के पीछे चलकर कुछ भी खरीदने को चल पड़ते है जैसे टीवी, गाडी, कपडे, फर्नीचर आदि जो मूर्खता है और पूर्णतया कुंठित उपभोक्तावाद से प्रेरित है  

प्रश्न: इस दिन चाँदी खरीदने की प्रथा क्यों है?

इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है। 
संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है। 
भगवान धन्वन्तरी जो चिकित्सा के देवता भी हैं उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है। 
लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हें। 

निवेदन: 

लोग अन्धानुकरण कर आज कुछ न कुछ खरीदने को और कंपनिया कुछ न कुछ बेचने को आतुर है 

इस जानकारी को अपने बच्चो तक और अपने परिजनों तक ज़रूर पहुचाये और स्वास्थ्य रुपी धन के इस दिन को केवल पैसे की दृष्टि से न देखें

नहीं तो हमारी परम्पराये या तो ख़त्म हो जाएँगी या उनका स्वरुप बिगड़ जायेगा

इस दिन कुछ ऐसा ख़रीदे की आपके देश में पैसा जाये विदेशी कंपनियों में नहीं 

वन्दे मातरम्

- निवेदक
  वीरेंद्र सिंह

धनतेरस धन से सम्बंधित नहीं है

fb.com/bhairajivdixit

स्वदेशी के सन्दर्भ में धनतेरस का महत्व

कुंठित उपभोक्तावाद से प्रेरित बाजारीकरण के कारण धनतेरस को लेकर कुछ भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास एक प्रश्नावली के द्वारा :

प्रश्न:

धनतेरस में “धन” शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर:

यह बहुत कम लोग जानते है की वास्तव में धनतेरस में “धन” शब्द स्वास्थ्य के देवता धनवंतरी से लिया गया है
कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ही धन्वन्तरि का जन्म हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न:

अगर धन नहीं तो फिर धनतेरस का क्या महत्त्व है?

उत्तर:

देवी लक्ष्मी हालांकि की धन देवी हैं परन्तु उनकी कृपा प्राप्त करने के लिए आपको स्वस्थ्य और लम्बी आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पहले से ही यानी धनतेरस से ही दीपामालाएं सजने लगती हें।

प्रश्न:

आज के दिन कुछ नया खरीदने की परंपरा क्यों है?

उत्तर:

समुद्र मंथन के समय धन्वन्तरि जी कलश में अमृत लेकर प्रकट हुए थे इसी कारण इस दिन बर्तन खरीदने की प्रथा है

आज के दिन वास्तविक परम्परा केवल नया बर्तन खरीदने की है या चाँदी भी खरीद सकते है

बाजारीकरण और धन के प्रति हमारे लगाव ने हमें अँधा बना दिया है और हम भीड़ के पीछे चलकर कुछ भी खरीदने को चल पड़ते है जैसे टीवी, गाडी, कपडे, फर्नीचर आदि जो मूर्खता है और पूर्णतया कुंठित उपभोक्तावाद से प्रेरित है

प्रश्न: इस दिन चाँदी खरीदने की प्रथा क्यों है?

इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन का वास होता है।
संतोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास संतोष है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है।
भगवान धन्वन्तरी जो चिकित्सा के देवता भी हैं उनसे स्वास्थ्य और सेहत की कामना के लिए संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है।
लोग इस दिन ही दीपावली की रात लक्ष्मी गणेश की पूजा हेतु मूर्ति भी खरीदते हें।

निवेदन:

लोग अन्धानुकरण कर आज कुछ न कुछ खरीदने को और कंपनिया कुछ न कुछ बेचने को आतुर है

इस जानकारी को अपने बच्चो तक और अपने परिजनों तक ज़रूर पहुचाये और स्वास्थ्य रुपी धन के इस दिन को केवल पैसे की दृष्टि से न देखें

नहीं तो हमारी परम्पराये या तो ख़त्म हो जाएँगी या उनका स्वरुप बिगड़ जायेगा

इस दिन कुछ ऐसा ख़रीदे की आपके देश में पैसा जाये विदेशी कंपनियों में नहीं

वन्दे मातरम्

– निवेदक
वीरेंद्र सिंह

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इस तस्विर में निकोलस नोतोविच नाम का रसियन यहुदी १८८७ में लडाख के हिमीस नाम के स्थल पर इसा की कोलेज में पहुंच जाता है ।


इस तस्विर में निकोलस नोतोविच नाम
का रसियन यहुदी १८८७ में लडाख के
हिमीस नाम के स्थल पर इसा की कोलेज
में पहुंच जाता है । वहां पहुंचने से पहले पथ्थर
से गीरने से उसकी एक टांग तुट गई है । मठ के
लामा सेवा चाकरी करते हैं ।
निकोलस के पैर अच्छा होने में कुछ दिन लग
गए । लामा से दोस्ती हो गई ।
निकोलस के लिए मठ के सारे दस्तावेज,
खूफिया या खूले, उपलब्ध हो गए । एक
महत्व का दस्तावेज हाथ लगा । एक
स्थानिय पोस्ट मास्टर जो तब इसाई बन
गया था उसे साध कर उसकी मदद ली गई ।

लामा पाली से स्थानिय भाषा में
बताता था, पोस्ट मास्टर अंग्रेजी में
बताता गया और निकोलस
अपनी भाषा में लिखता गया ।
जब उसका पैर अच्छा हो गया तो युरोप
चला गया । और १८९४ में, जो लिख कर ले
गया था, उस की किताब पब्लिश करने में
सफल हो गया ‘La vie inconnue de
Jesus Christ” ( “ध अननोन यर्स ओफ
जीसस क्राईस्ट ।”) बाद में
उसका अंग्रेजी, जर्मन, स्पेनिश और
इटालियन भाषा में अनुवाद छपा ।
किताब छपते ही युरोप में तहलका मच
गया । नोकोलस का विरोध करने में
दुनिया भर के इतिहास
को बिगाडनेवाला मॅक्स मुलर सब से आगे
था । मुलर ने लामा से पत्र द्वारा पूछा ।
चारों तरफ से दबाव
बना था तो लामाने भी कह
दिया कि यहां १५ साल से कोइ
युरोपियन नही आया है, और हमारे पास
ऐसा कोइ दस्तावेज भी नही है । आखिर
निकोलस को भी जुकना पडा और
कहना पडा की कहानी उसने खूद बनाई है

आग्रा कोमर्स कोलेज का प्रोफेसर
डग्लास भागा भागा हिमीस लामा से
मिलने पहुंच जाता है । लामाने उसे
भी वही जवाब दिया जो मेक्स मूलर के
पत्र के जवाब में कहा था ।

युरोप में तो निकोलस जुठा साबित
हो गया पर भारत के स्वामि अभेदानन्द,
विवेकानन्द के साथी, १९२२ में लामा से
मिलने हिमीस गए । बातचीत में मठाधिश
ने कबूल कर लिया की निकोलस इधर आये
थे, देढ महीने तक उनका इलाज हुआ था । ये
भी कहा कि पाली में
लिखी इसा की जीवन कथा को रसियन
में अनुवाद करने में मदद मठने ही की थी ।

स्वामि को भी वो स्क्रिप्ट दिखाई गई
। १४ भाग में कुल २२३ स्लोक थे ।
लामा ने ये भी बताया कि इसा उनके
आखरी दिनों में चुपचाप कश्मिर चले आए
थे, वो क्रोस पर चडकर नही मरे थे । अपने
शिष्यों के साथ कई साल जीए थे ।

इसा के मरने के तीन चार साल बाद उनके
जीवन की कहानी बताती यह किताब
लिखी गई थी ।

बायबल इसा के जीवन के १७ साल का गॅप
नही भरता है । इसाईयों की अन्य
धार्मिक किताबों में
भी जानकारी नही है । इस १७ साल
की चिंता में डूबे लोग अपने अपने हिसाब
से किताब लिखने लगे ।

एलिजाबेथ क्लेर
की किताब “The Lost Years of Jesus:
Documentary Evidence of Jesus’ 17-
Year Journey to the East”, सवाल
उठाती है इस्ट याने कौनसा इस्ट ? बेशक
इस्ट याने भारत ही है ।

आचार्य रजनीश के भक्तों का दावा है
रजनीश जी ने अमरिकामें इस
कहानी को बताना शुरु कर
दिया था तो उन को विष देकर
अमरिका से निकाल दिया था ।

भारत
आकर थोडे समय में गुजर गए थे ।
दुनिया की जनताने ही निकोलस
की इस कहानी को सच मान कर बायबल
का वो १७ साल का गॅप भर दिया है ।

पूरा नेट इस कहानी के अनुवादों से,
आर्टिकल्स से, विडियों से और इस तरह के
कार्टूनों से भर गया है ।

en.m.wikipedia.org/wiki/Nicolas_Notovitch

पोस्ट साभार : www.FB.com/BaBaCopyPaste

इस तस्विर में निकोलस नोतोविच नाम
का रसियन यहुदी १८८७ में लडाख के
हिमीस नाम के स्थल पर इसा की कोलेज
में पहुंच जाता है । वहां पहुंचने से पहले पथ्थर
से गीरने से उसकी एक टांग तुट गई है । मठ के
लामा सेवा चाकरी करते हैं ।
निकोलस के पैर अच्छा होने में कुछ दिन लग
गए । लामा से दोस्ती हो गई ।
निकोलस के लिए मठ के सारे दस्तावेज,
खूफिया या खूले, उपलब्ध हो गए । एक
महत्व का दस्तावेज हाथ लगा । एक
स्थानिय पोस्ट मास्टर जो तब इसाई बन
गया था उसे साध कर उसकी मदद ली गई ।

लामा पाली से स्थानिय भाषा में
बताता था, पोस्ट मास्टर अंग्रेजी में
बताता गया और निकोलस
अपनी भाषा में लिखता गया ।
जब उसका पैर अच्छा हो गया तो युरोप
चला गया । और १८९४ में, जो लिख कर ले
गया था, उस की किताब पब्लिश करने में
सफल हो गया ‘La vie inconnue de
Jesus Christ” ( "ध अननोन यर्स ओफ
जीसस क्राईस्ट ।") बाद में
उसका अंग्रेजी, जर्मन, स्पेनिश और
इटालियन भाषा में अनुवाद छपा ।
किताब छपते ही युरोप में तहलका मच
गया । नोकोलस का विरोध करने में
दुनिया भर के इतिहास
को बिगाडनेवाला मॅक्स मुलर सब से आगे
था । मुलर ने लामा से पत्र द्वारा पूछा ।
चारों तरफ से दबाव
बना था तो लामाने भी कह
दिया कि यहां १५ साल से कोइ
युरोपियन नही आया है, और हमारे पास
ऐसा कोइ दस्तावेज भी नही है । आखिर
निकोलस को भी जुकना पडा और
कहना पडा की कहानी उसने खूद बनाई है
।

आग्रा कोमर्स कोलेज का प्रोफेसर
डग्लास भागा भागा हिमीस लामा से
मिलने पहुंच जाता है । लामाने उसे
भी वही जवाब दिया जो मेक्स मूलर के
पत्र के जवाब में कहा था ।

युरोप में तो निकोलस जुठा साबित
हो गया पर भारत के स्वामि अभेदानन्द,
विवेकानन्द के साथी, १९२२ में लामा से
मिलने हिमीस गए । बातचीत में मठाधिश
ने कबूल कर लिया की निकोलस इधर आये
थे, देढ महीने तक उनका इलाज हुआ था । ये
भी कहा कि पाली में
लिखी इसा की जीवन कथा को रसियन
में अनुवाद करने में मदद मठने ही की थी ।

स्वामि को भी वो स्क्रिप्ट दिखाई गई
। १४ भाग में कुल २२३ स्लोक थे ।
लामा ने ये भी बताया कि इसा उनके
आखरी दिनों में चुपचाप कश्मिर चले आए
थे, वो क्रोस पर चडकर नही मरे थे । अपने
शिष्यों के साथ कई साल जीए थे ।

इसा के मरने के तीन चार साल बाद उनके
जीवन की कहानी बताती यह किताब
लिखी गई थी ।

बायबल इसा के जीवन के १७ साल का गॅप
नही भरता है । इसाईयों की अन्य
धार्मिक किताबों में
भी जानकारी नही है । इस १७ साल
की चिंता में डूबे लोग अपने अपने हिसाब
से किताब लिखने लगे ।

 एलिजाबेथ क्लेर
की किताब "The Lost Years of Jesus:
Documentary Evidence of Jesus' 17-
Year Journey to the East", सवाल
उठाती है इस्ट याने कौनसा इस्ट ? बेशक
इस्ट याने भारत ही है ।

आचार्य रजनीश के भक्तों का दावा है
रजनीश जी ने अमरिकामें इस
कहानी को बताना शुरु कर
दिया था तो उन को विष देकर
अमरिका से निकाल दिया था ।

 भारत
आकर थोडे समय में गुजर गए थे ।
दुनिया की जनताने ही निकोलस
की इस कहानी को सच मान कर बायबल
का वो १७ साल का गॅप भर दिया है ।

पूरा नेट इस कहानी के अनुवादों से,
आर्टिकल्स से, विडियों से और इस तरह के
कार्टूनों से भर गया है ।

en.m.wikipedia.org/wiki/Nicolas_Notovitch

पोस्ट साभार : www.FB.com/BaBaCopyPaste
Posted in रामायण - Ramayan

रामायण के घटना स्थलों का विदेश में स्थानीकरण


 

रामायण के घटना स्थलों का विदेश में स्थानीकरण

भारतवासी जहाँ कहीं भी गये वहाँ की सभ्यता और संस्कृति को तो उन लोगों ने प्रभावित किया है, वहाँ के स्थानों के भी नाम बदलकर उनका भारतीयकरण कर दिया। कहा गया है कि इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप का नामकरण सुमित्रा के नाम पर हुआ था। जावा के एक मुख्य नर का नाम योग्याकार्य है। ‘योग्या’ संस्कृत के अयोध्या का विकसित रुप है और जावानी भाषा में कार्टा का अर्थ नगर होता है। इस प्रकार योग्याकार्टा का अर्थ अयोध्या नगर है। मध्य जावा की एक नदी का नाम सेरयू है और उसी क्षेत्र के निकट स्थित एक गुफा का नाम किस्केंदा अर्थात् किष्किंधा है।१ जावा के पूर्वीछोर पर अवस्थित एक शहर का नाम सेतुविंदा है जो निश्चय ही सेतुबंध का जावानी रुप है। इंडोनेशिया में रामायणीय संस्कृति से संबद्ध इस स्थानों का नामकरण कब हुआ, यह कहना कठिन है, किंतु मुसलमान बहुल इस देश का प्रतीक चिन्ह गरुड़ निश्चय ही भारतीय संस्कृति से अपने सरोकार को उजागर करता है।मलाया स्थित लंग्या सुक अर्थात् लंका के राजकुमार ने चीन के सम्राट को ५१५ई. में दूत के माध्यम से एक पत्र भेजा था जिसमें यह लिखा गया था कि उसके देश में मूल्यवान संस्कृत की जानकारी है उसके भव्य नगर के महल और प्राचीर गंधमादन पर्वत की तरह ऊँचे है।२ मलाया के राजदरबार के पंडितों को संस्कृत का ज्ञान था, इसकी पुष्टि संस्कृत में उत्कीर्ण वहाँ के प्राचीन शिला लेखों से भी होती है। गंधमादन उस पर्वत का नाम था जिसे मेघनाद के वाण से आहत लक्ष्मण के उपचार हेतु हनुमान ने औषधि लाने के क्रम में उखाड़ कर लाया था। मलाया स्थित लंका की भौगोलिक स्थिति के संबंध में क्रोम नामक डच विद्वान का मत है कि यह राज्य सुमत्रा द्वीप में था, किंतु ह्मिवटले ने प्रमाणित किया है कि यह मलाया प्राय द्वीप में ही था।३बर्मा का पोपा पर्वत ओषधियों के लिए विख्यात है। वहाँ के निवासियों को यह विश्वास है कि लक्ष्मण के उपचार हेतु पोपा पर्वत के ही एक भाग को हनुमान उखाड़कर ले गये थे। वे लोग उस पर्वत के मध्यवर्ती खाली स्थान को दिखाकर पर्यटकों को यह बताते हैं कि पर्वत के उसी भाग को हनुमान उखाड़ कर लंका ले गये थे। वापसी यात्रा में उनका संतुलन बिगड़ गया और वे पहाड़ के साथ जमीन पर गिर गये जिससे एक बहुत बड़ी झील बन गयी। इनवोंग नाम से विख्यात यह झील बर्मा के योमेथिन जिला में है।४ बर्मा के लोकाख्यान से इतना तो स्पष्ट होता ही है कि वहाँ के लोग प्राचीन काल से ही रामायण से परिचित थे और उन लोगों ने उससे अपने को जोड़ने का भी प्रयत्न किया।थाईलैंड का प्राचीन नाम स्याम था और द्वारावती (द्वारिका) उसका एक प्राचीन नगर था। थाई सम्राट रामातिबोदी ने १३५०ई. में अपनी राजधानी का नाम अयुध्या (अयोध्या) रखा जहाँ ३३ राजाओं ने राज किया। ७ अप्रैल १७६७ई. को बर्मा के आक्रमण से उसका पतन हो गया। अयोध्या का भग्नावशेष थाईलैंड का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है। अयोध्या के पतन के बाद थाई नरेश दक्षिण के सेनापति चाओ-फ्रा-चक्री को नागरिकों ने १७८५ई. में अपना राजा घोषित किया। उसका अभिषेक राम प्रथम के नाम से हुआ। राम प्रथम ने बैंकॉक में अपनी राजधानी की स्थापना की। राम प्रथम के बाद चक्री वंश के सभी राजाओं द्वारा अभिषेक के समय राम की उपाधि धारण की जाती है। वर्तमान थाई सम्राट राम नवम हैं। थाईलैंड में लौपबुरी (लवपुरी) नामक एक प्रांत है। इसके अंतर्गत वांग-प्र नामक स्थान के निकट फाली (वालि) नामक एक गुफा है। कहा जाता है कि वालि ने इसी गुफा में थोरफी नामक महिष का वध किया था।५ यहाँ यह उल्लेखनीय है कि थाई रामायण रामकियेन में दुंदुभि दानव की कथा में थोड़ा परिवर्तन हुआ है। इसमें दुंदुभि राक्षस के स्थान पर थोरफी नामक एक महाशक्तिशाली महिष है जिसका वालि द्वारा वध होता है। वालि नामक गुफा से प्रवाहित होने वाली जलधारा का नाम सुग्रीव है। थाईलैंड के ही नखोन-रचसीमा प्रांत के पाक-थांग-चाई के निकट थोरफी पर्वत है जहाँ से वालि ने थोरफी के मृत शरीर को उठाकर २००कि.मी. दूर लौपबुरी फेंक दिया था।६ सुखो थाई के निकट संपत नदी के पास फ्राराम गुफा है। उसके पास ही सीता नामक गुफा भी है।७दक्षिणी थाईलैंड और मलयेशिया के रामलीला कलाकारों को ऐसा विश्वास है कि रामायण के पात्र मूलत: दक्षिण-पूर्व एशिया के निवासी थे और रामायण की सारी घटनाएँ इसी क्षेत्र में घटी थी। वे मलाया के उत्तर-पश्चिम स्थित एक छोटे द्वीप को लंका मानते हैं। इसी प्रकार उनका विश्वास है कि दक्षिणी थाईलैंड के सिंग्गोरा नामक स्थान पर सीता का स्वयंवर रचाया गया था जहाँ राम ने एक ही बाण से सात ताल वृक्षों को बेधा था। सिंग्गोरा में आज भी सात ताल वृक्ष हैं।८ जिस प्रकार भारत और नेपाल के लोग जनकपुर को निकट स्थित एक प्राचीन शिलाखंड को राम द्वारा तोड़े गये धनुष का टुकड़ा मानते हैं, उसी प्रकार थाईलैंड और मलेशिया के लोगों को भी विश्वास है कि राम ने उन्हीं ताल वृक्षों को बेध कर सीता को प्राप्त किया था।वियतनाम का प्राचीन नाम चंपा है। थाई वासियों की तरह वहाँ के लोग भी अपने देश को राम की लीलभूमि मानते है। उनकी मान्यता की पुष्टि सातवीं शताब्दी के एक शिलालेख से होती है जिसमें आदिकवि वाल्मीकि के मंदिर का उल्लेख हुआ है जिसका पुनर्निमाण प्रकाश धर्म नामक सम्राट ने करवाया था।९ प्रकाशधर्म (६५३-६७९ई.) का यह शिलालेख अनूठा है, क्योंकि आदिकवि की जन्मभूमि भारत में भी उनके किसी प्राचीन मंदिर का अवशेष उपलब्ध नहीं है।भारतवासी जहाँ कही भी गये भौतिक साधनों के अतिरिक्त आस्था के संबल भी साथ ले गये। भौतिक संसाधनों का तो कालांतर में विनाश हो गया, किंतु उनके विश्वास का वृक्ष स्थानीय परिवेश में फलता-फूलता रहा। प्राकृतिक कारणों से उनकी आकृति और प्रकृति में संशोधन और परिवर्तन अवश्य हुआ, किंतु उन्होंने शिला खंडों पर खोद कर जो उनका इतिहास छोड़ा था, वह आज भी उनकी कहानी कर रही है।

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

MAHARAJA HARI SINGH : THE LAST RULER OF JAMMU & KASHMIR By. Col. J.P. Singh (Retd).


MAHARAJA HARI SINGH : THE LAST RULER OF JAMMU & KASHMIR By. Col. J.P. Singh (Retd).

Maharaja Hari Singh  was born on 23rd Sept 1895 in Amar Mahal Jammu which is a museum of world fame and most popular tourist attraction in Jammu. He was son of Raja General Amar Singhji; younger brother of Maharaja Partap Singh. He ascended to the throne of Jammu & Kashmir State in 1925 after the demise of Maharaja Sir Partap Singh. He was one of the most renowned ruler of British India as well as  Indian Union as a ruler of geographically largest and strategically most important empire of Jammu & Kashmir which continues to remain in the lime light for several political and historical reasons. He gained acclamation for being “The Last Ruling King of Independent India” since he continued to be Maharaja of Jammu & Kashmir till 5th  November 1952 while all other rulers of princely states had seized to be Kings by 1948.

When he was 13 years old he was sent to ‘Mayo College of Princes’ for studies. Soon after his admission in the Mayo College his father Raja Amar Singhji died . After his father’s death, British Govt in Delhi took keen interest in his education and bringing up. A British Army Officer was deputed as his guardian with the responsibility of ensuring proper education and training with the aim of grooming him to be a good ruler. After completing his education in Mayo College he was sent to ‘Imperial Cadet Corps’ at Dehradun to imbibe in him Military and  Martial traits as well as polishing his English language. Maharaja Hari Singh married Maharani Tara Devi in 1928 as his fourth wife after his previous three wives had died earlier one after the other without an issue. This marriage was on the advice of the astrologers and true to their prediction a Yuvraj was born to them on 9 March 1931 as the next Heir Apparent.

In 1915 he was appointed Commander-in-Chief of J&K State Forces when he was only 20 years old. On assuming command of the state forces, he introduced lot of reforms in the training and welfare of officers and soldiers. Central cook houses called Langars and Officers Messes were introduced by him in the state force prior to which the officers and jawans used to cook their own meals.  During the reign of Maharaja Partap Singh Union Jack used to fly on all official buildings of the State. Maharaja Hari Singh ordered their removal which was contested by the British govt but he didn’t relent. Later, on Viceroy’s request he allowed a British flag to be flown only on the residential building of the Resident thereby exerting his full authority over his sate.

His rule has been described as glorious by British historians because of several reforms that he introduced in administration and judiciary. After ascending to the throne he brought about several rules and regulations for the welfare and betterment of his subjects. There are numerous instances worth mentioning but few of them such as making primary education compulsory for all subjects; men & women, prohibiting child marriage and opening all the places of worship for his low caste subjects are most remarkable. He opened lot of new schools and colleges to promote education.  He managed to check corruption in the administration by adopting unique ways of detecting corruption, findings culprit officials and punishing them. He banned  beggar and it is said that during his rule none dared to accept bribes or deny wages for any  services rendered. He even ploughed land himself to get land holding rights to his subjects. He was made a member of the Imperial War Council from 1944 to 1946 during the World War II. During the war he visited Middle East where he joined his units which were fighting against Axis Powers. He lived with them in their temporary trenches and bunkers which encouraged them and boosted their moral. Showing his solidarity with his forces in the battlefield earned him lot of respect not only of his men but also of the Allied Powers particularly of the British Army.

Hari Singh’s rule witnessed lot of political upheavals. From 1931 onwards his rule faced Kashmiri insurrection against his rule which became a mass movement in the valley under the leadership of Sheikh Mohd Abdullah. He opposed Jinnah’s Muslim League for its communal agenda illustrated in his two nation theory; hence faced his wrath. He was victim of hostility of Indian National Congress because of Pt Nehru and Sheikh Mohd Abdullah. Immediately after independence and partition of India he saw the tragic communal riots which engulfed the State of Jammu & Kashmir as well. It was followed by an invasion of his State by Pakistani raiders. Jammu & Kashmir had become an  independent country after the lapse of British Paramountacy on 15 Aug 1947. It was during his reign that the first Indo-Pak war was fought on the soil of Jammu & Kashmir. Finally the Govt of India took over the control of J&K thus ending the 106 years old hereditary rule of the last Maharaja of India on 15th  November 1952.

Maharaja Hari Singh was a democratic and progressive ruler and knew what was to come. He had made it clear in the Round Table Conference in London that he was for independence of India for which he had to pay heavily as Britishers never trusted him thereafter. As a result he had to face many uprisings fomented and abetted  by the British. He also knew that the era of the dynastic rule was to end soon for which he prepared his son to fit in the future democratic set up of the country. Dr Karan Singh bears  testimony to it as he became the first elected head of the State as a Sadar-i-Riyasat and later Union Minister for many years and is still a Member of Parliament even 63 years after the transfer of power. In fact he should have been the President of India today. Hopefully next time. The credit for preparing him for the distinguished career in the changed political scenario goes to him.

Lord Mountbatten visited Srinagar in June 1947. He advised Maharaja Hari Singh to accede to Pakistan on the grounds of religion of majority population and geographical contiguity. Although the advice amounted to be an order because the state was part of the Dominion.  Maharaja ignored this advice and instead wanted more time to decide the future of his State. He knew that Pt Nehru and Sheikh Abdullah were for State’s accession to India which was his wish as well. But all the rail and land routes to J&K passed through Pakistan. Despite Gurdaspur District falling part of India and River Ravi becoming the boundary line, there was no road or rail link to India through Pathankot which hindered Maharaja’s early decision of accession to India. But Pt Nehru took keen interest in the development of road link to Jammu facilitating accession. When India gained independence he had the option of joining either  India or Pakistan or to remain independent. He knew the consequences of all the options for which he offered Standstill Agreement with both the Dominions, which unfortunately was not accepted by Pt Nehru which changed the course of history. Had Pt Nehru accepted it, it would have given India over two months to understand the problems of the most strategic State of the world and prepare  for anything untoward from any direction. It might have perhaps averted Pakistani attack in Oct 47 as the State would have been the joint responsibility of both the Dominions. However following the invasion by Pakistan on 21 October 1947 he appealed  to the Indian Union for help. India refused  unless he acceded to the Indian Union. He signed the instrument of accession with the govt of India on 26 October 1947 acceding his country to the Indian Union which included Jammu, Kashmir, Northern Areas, Ladakh, Trans Karakoram Tract, POK and Aksai Chin. The events mentioned above leading to the accession with Indian Union created Indo-Pak hostility which has resulted into 4 military conflicts and the ongoing proxy war in Kashmir. Due to unresolved and undemocratic nature of transition all the territories mentioned above are considered disputed.

Due to growing hostility with his Prime Minister Sheikh Abdullah, he appointed his son Yuvraj Karan Singh as his regent and left for Bombay in 1949, never to return to his State there after. He spent rest of his life in Bombay. His passions for Polo, Horse Racing and Reading kept him occupied for the remaining period of life. Lt Gen His Highness Shriman Rajrajeshwar Maharajadhiraj Sri Sir Hari Singh Indar Mahindar Bahadur Sipar-i-Sultanat, GCSI, GCIE, GCVO, KCVO, Maharaja of Jammu & Kashmir breathed his last on 26 April 1961 at Bombay. As per his will his Ashes were brought to Jammu and spread all over J&K and immersed in River Tawi at Jammu.

Amar Kshatriya Rajput Sabha is remembering the beloved rulers by celebrating his 115th Birth Anniversary  on 23 September 2010 at Raj Tilak Bhavan Purani Mandi Jammu.