Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

अरब के लुटेरों द्वारा भारत पर आक्रमण व भारत मे इस्लाम धर्म का आगमन (एक श्रंखला) भाग-4. -:


अरब के लुटेरों द्वारा भारत पर आक्रमण व भारत मे इस्लाम धर्म का आगमन (एक श्रंखला) भाग-4. -:

गतांक से आगे :- अपने अत्याचारी अभियान को जारी रखते हुये कासिम एक असुरक्षित बिसय (जिला) के प्रमुख नगर पर टूट पङा। इसका प्रमुख मुख्या (मुखिया) कहलाता था। उसे परिवार सहित, अन्य मुखियों के हाथ पैर बांध कर कासिम के सामने पेश किया गया। इस्लाम के कोङे मार-मार कर, अमानवीय यातनायें देकर पहले उन्हें मुसलमान बनाया गया, फिर कासिम का सहयोग करने के लिये विवश किया गया। अब वे हिंदुओं के शत्रु तथा अपने ही राजा दाहीर के विरोध में खङे थे। बिसय मुखिया को कासिम नें बैत का राजा घोषित कर दिया। बैत दाहीर की राज्य सीमा में था। यही अरबों की युद्ध कला थी, एक हिंदु को दुसरे हिंदु से लङा कर कायर का पक्ष ले लो, उसे इस्लाम का मददगार घोषित करो। सबसे पहले उसे तलवार की नोंक पर मुसलमान बना लो। जीत की सारी भूमी उसे उपहार में देनें का लालच दो, नीच से नीच कुकर्मं करने में उसकी पीठ पर रहो, इस प्रकार हिंदुओं को आपस में लङा कर मार डालो और इसका फायदा होता था इन विदेशी अपहरणकारी मुसलमानों का। वे धर्म परिवर्तित मुसलमानों को बहला फुसला कर छ्ल कपट से जीती हुई जमीन का बङा भू-भाग अपने अधिकार में कर लेते थे। पहले या बाद में, मुस्लिम सहायक को हर हाल में मुसलमान बनना पङता था। दुसरे के पद, अधिकार और राज्य को अनाधिकारी हिंदु का घोषित कर हिंदु को हिंदु के विरोध में खङा करने की नीती का पालन अकबर, औरंगजेब, शाहजहाँ आदि सभी मुसलमान शासकों ने समान रूप से किया। अब बिसय मुखिया और इस्लाम का एक ही ध्येय और लक्ष्य हो गया। इसीलिये उसे मोर के चित्र वाला छ्त्र, एक लाख दीरहाम, एक आसन और एक सम्मानित परिधान दिया गया। ठाकुरों को सम्मानित परिधान और सजे-सजाये घोङे दिये गये। इस प्रकार हिंदुओं को घूस देकर, हिंदु नाविकों को डरा धमका कर उन्होनें सिंधु नदी पार की। देवालयपुर (करांची) के पतन के बाद बंदरगाह, दुर्ग स्थित मंदिर एवं वहां का शासक तीनों कासिम के चंगुल में फंस गये। वहां के शासक को मार-मार कर मुसलमान बनाया गया था। कुछ ही दिनों में वह एक पक्का उद्ध्र्ष्ट मुसलमान बन गया। उसने अपना नाम मौलाना इस्लाम रख लिया था। भयंकर कट्टरता में उसनें कासिम के कुछ लुटेरों को भी मात दे दी। उस पर कासिम को पुरा विश्वास हो गया था। कासिम ने इसे एक सीरियन के साथ दूत बना कर दाहीर के पास भेजा। दाहीर के दरबार में वह अपनें भूत-पुर्व राजा के सामने झुका तक नहीं। अब वह एक विदेशी मौलाना इस्लामी जो हो गया था। उसने अपने धर्म से ही नहीं सामान्य शिष्टाचार से भी हाथ धो लिये थे। दाहीर नें इस नये अर्धचंद्री मौलाना को दुत्कार दिया। इन्होनें दाहीर के समर्पण की मांग की थी। हज्जाज की बुरी नज़र दाहीर के अंत:पुर में भी थी। कासीम पर वह बङी आस लगाये बैठा था। उसने कासिम की सहायता के लिये लुटेरों की एक और टुकङी भेजी। कासिम नें सिंधु पुल के दुसरे छोर की निगरानी के लिये नीरुन में बनाये गये नये मुसलमान, बिसय मुखिया,मुसाब,भट्टी ठाकुर, धर्म त्यागी और अफगान जाटों को नियुक्त किया ताकि दाहीर का पुत्र अपनें किले से दाहीर की सहायता के लिये ना आ सके। इधर कासिम ने सिंधु पर नावों का बेङा बनाने की कोशीश की। पर हर बार दाहीर की सेना नें बाणों,पत्थरों और आग के गोलों की वर्षा कर उसे छिन्न-भिन्न कर दिया। बार बार असफल होनें पर कासिम ने दुसरा तरीका अपनाया। सिंधु के पाट (बहाव क्षेत्र) जितना बेङा उसनें अपनी और नदी के किनारे बना लिया और फिर नदी की धारा में बहा दिया। तरकीब काम कर गई। झट-पट दुसरे किनारे कीलें ठोक कर नावों का पुल बना लिया गया। घमासान लङाई छिङ गई। सैनिकों की संख्या कम होने के कारण दाहीर को पिछे हट कर किले में शरण लेनी पङी। इधर दाहीर का एक मंत्री भयभित हो उठा। उसने दाहीर को संधि करने की सलाह दी। इस कायरता पुर्ण उपदेश पर दाहीर सिंह की तरह दहाङ उठे। उसने सारे क्षेत्र को युद्ध भूमी मे बदल दिया। अपनी मातृभूमी की रक्षा के समय कायरता दिखाने वाले मंत्री का सिर काट दिया। जंगली चीतों से घिरे अकेले हाथी की तरह दाहीर जुझ रहा था। उसकी अपनी ही सेना और प्रजा सामुहिक रूप से मुसलमान बनाये जा रहे थे। नये धर्म के नियमों ने उन्हें रातों रात देशद्रोही बना दिया था। कासिम बैत के किले की और बढा। यहाँ दाहीर के दो पुत्र जयसिम्हा और फूफी थे। किले से सुरक्षित दूरी पर खाई खोद कर कासिम ने अपना धन रखवा दिया। दाहीर का नदी रक्षक पकङा गया था। कासिम की यातनाओं नेंं उसे भी मुसलमान बना दिया था। अब वह कासिम के लुटेरों का मार्ग-दर्शक था। बैत दुर्ग से कासिम रावर के किले की ओर बढा। रास्ते में उसनें जयपुर में भयंकर तबाही का खेल खेला। मंदिरों और लोगों को मुसलमान बना, स्त्रियों और बच्चों को गुलाम तथा बाकियों को काट कर फेंक दिया। जयपुर के मध्य में एक सरोवर था। यहाँ कासिम की जनरक्षक टुकङी थी। दुश्मनों की गतिविधियों की जानकारी देना इसका काम था। अपनी मुख्य सेना के साथ दाहीर सरोवर के दुसरी ओर काजीतात में था। नये मुसलमान रासिल की निगरानी में उन्होनें तीन मार्गों से घुसने का प्रयास किया। काजीतात के पिछे हिंदवादी बसा था। इसे अधिकार मे लेने की सलाह उसने कासिम को दी। कासिम के पहुंचने के साथ ही हिंद्वादी मुस्लिमवादी हो गया। सदा की भांति लूट, हत्या, बलात्कार का बाजार गर्म हो उठा। अब कासिम का विशाल गिरोह दो भागों में बंटा हुआ था। एक भाग वाधवा नदी स्थित जयपुर में तथा दुसरा भाग हिंदवादी मे था। बीच काजीतात में फंसे थे दाहीर। सामरिक महत्व के सभी मार्गों पर कासिम की हैवान सेना का आतंक छाया हुआ था। जिसके लिये न्याय, धर्म और इन्सानिया का कोई मतलब नहीं था। लूट,बलात्कार के नीच से नीच कुकर्म भी इसके लिये महान, आदरणी और अनुकरणीय थे। संकट की इस घङी में दाहीर का एक और मंत्री भयभीत हो उठा। दाहीर नें उसे याद दिलाया कि राजा और मंत्री शांतिकाल में विशेष सुविधा एवं अधिकार प्राप्त प्रतिष्ठित व्यक्ति होते हैं, सिर्फ इसलिये कि वे अपनें देश, सभ्यता,धर्म की रक्षा के लिये दुश्मन के साथ लङाई में अपनी जान देने को तत्पर रहें। यह बङे अपमान की बात है कि तुम शांति संधि की बात करते हो। यह कैसी शांति होगी जबकी तुम्हारे मंदिरों को मस्जिद बना देंगे और तुम्हे मुसलमान बना कर तुम्हारा हिंदुत्व मिटा देंगेंं। निर्णायक युद्ध में दाहीर ने अपने सभी आश्रितों, स्त्रियों, बच्चों को रावर के किले में भेज दिया। कासिम की सेना से कुछ ही दूर अपना खेमा गाङ दिया। पांच दिन तक घमासान युद्ध होता रहा। एक के बाद एक कासिम की सेना आती रही और दाहीर की सेना उसे मसलती रही। समय था जुन 712 ई॰ का और स्थान था बधवा और सिंधु का मध्य भाग। कासिम ने जीत के लिये सब तरकीब अपनाई। हिंदु सेना को पथ-भ्र्ष्ट करनें और बहकाने स्त्रियों को मार मार कर राजी किया गया। एक अरबी इतिहासकार के अनुसार जब इस्लाम की सेना ने धावा बोला तो अधिकांश काफिर मार डाले गये। एकाएक सेना के बाईं और कोलाहल होने लगा। दाहीर ने सोचा कि यह शोर उसकी अपनी सेना में हो रहा है। उसने जोरों से चीख कर कहा इधर आओ मै यहाँ हुँ। तब स्त्रियों ने अपनी बुलंद आवाज मे कहा- हे राजा हम आपकी प्रजा हैं, हम इन अरबों के चंगुल में फंस गई हैं, इन्होनें ने हमें बंदी बना लिया है। दाहीर दहाङ उठे और कहा मेरे जीवीत रहते किस में हिम्मत है जो तुम्हें बंदी बना सके, और अपना हाथी मुसलमान सेना की और हाँक दिया। कासिम नें आग के गोले फेंकने वाले से कहा अब तुम्हारी बारी है। एक शक्तिशाली विक्षेपक नें आदेश पा कर दाहीर के हौंदे पर आग का गोला फेंक दिया। हौंदे में आग लग गई। हाथी पानी की ओर भागा। बाणों की वर्षा,मुसलमानी तलवारबाजों के नरसन्हार से सुरक्षार्थ अंग-रक्षकों नें दाहीर के चारों तरफ एक घेरा डाल दिया। महावत नें किसी प्रकार आग बुझाई और हाथी को वश में कर के एक बार फिर उसे शत्रु की सेना की ओर हाँका। दाहीर हाथी से उतर कर घोङे पर सवार हो भयानक तरीके से तलवार चलाते हुये शत्रु सेना को चीर कर अंदर पहुँच गये। सहायकों से दूर, चारों तरफ से अरबी नर-पिशाचों से घिरे दाहीर नें शत्रु सेना का भारी नुकसान किया। राजा दाहीर अब थक कर चूर हो गये थे। उनके प्रत्येक अंग से खुन बह रहा था। आखिरकार वीर शिरोमणी दाहीर समर-भूमी में सो गये। 712 ई॰ जुन महीनें के बृहस्पतिवार को सुर्यास्त के समय हिंदुत्व का गौरवशाली, तेजस्वी सुर्य अपनी पुर्ण गरिमा के साथ सिंधु के पावन तट पर अस्त हो गया। भारत नें अपनें एक साहसी पुत्र को खो दिया। 75 वर्षों से निरंतर अरबी घुसपैठ का यह परिणाम था। हमेंशा लोगों नें यही सोचा- जरा सी जमीन ही तो गई है, थोङे से मंदिर ही तो मस्जिद बनें हैं, कुछ हजार लोग ही तो मुसलमान बनें हैं। इस जरा, थोङे, कुछ की शांत सहशीलता का पालन पोषण ही हमारी एक भयंकर और घातक भूल थी।

शेष अगली पोस्ट में…………….

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उपनिषद् सूची – १०८


!! उपनिषद् !!

!! उपनिषद् सूची – १०८ !!

1. ईशावास्‍य उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
2. केन उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
3. कठ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
4. प्रश्‍न उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
5. मुण्डक उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
6. माण्डुक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, मुख्य उपनिषद्
7. तैत्तिरीय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
8. ऐतरेय उपनिषद् = ऋग् वेद, मुख्य उपनिषद्
9. छान्दोग्य उपनिषद् = साम वेद, मुख्य उपनिषद्
10. बृहदारण्यक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, मुख्य उपनिषद्
11. ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
12. कैवल्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
13. जाबाल उपनिषद् (यजुर्वेद) = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
14. श्वेताश्वतर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
15. हंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
16. आरुणेय उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
17. गर्भ उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
18. नारायण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
19. परमहंस उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
20. अमृत-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
21. अमृत-नाद उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
22. अथर्व-शिर उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
23. अथर्व-शिख उपनिषद् =अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
24. मैत्रायणि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
25. कौषीतकि उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
26. बृहज्जाबाल उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
27. नृसिंहतापनी उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
28. कालाग्निरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
29. मैत्रेयि उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
30. सुबाल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
31. क्षुरिक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
32. मान्त्रिक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
33. सर्व-सार उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
34. निरालम्ब उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
35. शुक-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
36. वज्रसूचि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
37. तेजो-बिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
38. नाद-बिन्दु उपनिषद् = ऋग् वेद, योग उपनिषद्
39. ध्यानबिन्दु उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
40. ब्रह्मविद्या उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
41. योगतत्त्व उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
42. आत्मबोध उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
43. परिव्रात् उपनिषद् (नारदपरिव्राजक) = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
44. त्रिषिखि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
45. सीता उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
46. योगचूडामणि उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
47. निर्वाण उपनिषद् = ऋग् वेद, संन्यास उपनिषद्
48. मण्डलब्राह्मण उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, योग उपनिषद्
49. दक्षिणामूर्ति उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
50. शरभ उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
51. स्कन्द उपनिषद् (त्रिपाड्विभूटि) = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
52. महानारायण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
53. अद्वयतारक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
54. रामरहस्य उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
55. रामतापणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
56. वासुदेव उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
57. मुद्गल उपनिषद् = ऋग् वेद, सामान्य उपनिषद्
58. शाण्डिल्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
59. पैंगल उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
60. भिक्षुक उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
61. महत् उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
62. शारीरक उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
63. योगशिखा उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
64. तुरीयातीत उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
65. संन्यास उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
66. परमहंस-परिव्राजक उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
67. अक्षमालिक उपनिषद् = ऋग् वेद, शैव उपनिषद्
68. अव्यक्त उपनिषद् = साम वेद, वैष्णव उपनिषद्
69. एकाक्षर उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
70. अन्नपूर्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
71. सूर्य उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
72. अक्षि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
73. अध्यात्मा उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
74. कुण्डिक उपनिषद् = साम वेद, संन्यास उपनिषद्
75. सावित्रि उपनिषद् = साम वेद, सामान्य उपनिषद्
76. आत्मा उपनिषद् = अथर्व वेद, सामान्य उपनिषद्
77. पाशुपत उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
78. परब्रह्म उपनिषद् = अथर्व वेद, संन्यास उपनिषद्
79. अवधूत उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
80. त्रिपुरातपनि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
81. देवि उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
82. त्रिपुर उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
83. कठरुद्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
84. भावन उपनिषद् = अथर्व वेद, शाक्त उपनिषद्
85. रुद्र-हृदय उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
86. योग-कुण्डलिनि उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, योग उपनिषद्
87. भस्म उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
88. रुद्राक्ष उपनिषद् = साम वेद, शैव उपनिषद्
89. गणपति उपनिषद् = अथर्व वेद, शैव उपनिषद्
90. दर्शन उपनिषद् = साम वेद, योग उपनिषद्
91. तारसार उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
92. महावाक्य उपनिषद् = अथर्व वेद, योग उपनिषद्
93. पञ्च-ब्रह्म उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शैव उपनिषद्
94. प्राणाग्नि-होत्र उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्
95. गोपाल-तपणि उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
96. कृष्ण उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
97. याज्ञवल्क्य उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
98. वराह उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
99. शात्यायनि उपनिषद् = शुक्ल यजुर्वेद, संन्यास उपनिषद्
100. हयग्रीव उपनिषद् (१००) = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
101. दत्तात्रेय उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
102. गारुड उपनिषद् = अथर्व वेद, वैष्णव उपनिषद्
103. कलि-सण्टारण उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, वैष्णव उपनिषद्
104. जाबाल उपनिषद् (सामवेद) = साम वेद, शैव उपनिषद्
105. सौभाग्य उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
106. सरस्वती-रहस्य उपनिषद् = कृष्ण यजुर्वेद, शाक्त उपनिषद्
107. बह्वृच उपनिषद् = ऋग् वेद, शाक्त उपनिषद्
108. मुक्तिक उपनिषद् (१०८) = शुक्ल यजुर्वेद, सामान्य उपनिषद्

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सुब्रमनियम स्वामी ने कहा -मस्जिद के मुतावल्‍ली (केयरटेकर) को खोज लिया है।


सुब्रमनियम स्वामी ने कहा -मस्जिद के मुतावल्‍ली (केयरटेकर) को खोज लिया है। केयरटेकर ने कहा है कि वह पैसे लेकर सरयू नदी के पार कहीं और मस्जिद बनाने को तैयार है।
सुब्रमण्‍यम स्‍वामी ने कहा >>>यदि एक बार मूर्ति की प्राण प्रतिष्‍ठा हो जाती है और उसे बाद में तोड़कर मस्जिद भी बना दी जाए तो भी वह मंदिर ही रहेगा। यहां उन्‍होंने यह भी कहा कि सुन्‍नी समुदाय के लोग हमेशा गड़बड़ी करते हैं। इसी वजह से राम मंदिर के निर्माण में देरी हो रही है।

बाबरी मस्जिद के विवाद के लिए पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू ही जिम्‍मेदार है. स्‍वामीजी ने दुबई के अल फैजल का नाम लिया जो कि राजवंश से ताल्‍लुक रखता है। फैजल के मुताबिक, लोग मस्जिद को आलीशान महल या फिर रोड बनाने के लिए तोड़ते रहते हैं। इसमें कोई ताज्‍जुब की बात नहीं है। उन्‍होंने कहा कि मस्जिद सिर्फ नमाज पढ़ने की जगह होती है जो कहीं भी हो सकती है। ऐसे में अगर इसे तोड़ना है तो प्‍यार से तोड़ा जा सकता है

रामजन्मभूमि ,बाबरी मस्जिद विवाद

विदेशी मजहब का लुटेरा हत्यारा मुगल शासक बाबर के आदेश पर साल 1527 में अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि मंदिर को तोड़कर वहा पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था। इसे छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा।
साल 1940 से पहले, इस मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान कहा जाता था। बाबर के रोजनामचा में विवादित स्थल पर मस्जिद होने का कोई जिक्र मौजूद नहीं है।
ऐसे में मुस्लिम समुदाय ऐसा नहीं कर सकता है। मुस्लिमों के अनुसार निर्माण के समय यहां पर कोई मंदिर मौजूद नहीं था। बीते 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही यह मुद्दा पुरे देश में फ़ैल गया. देशभर में हुए दंगों में दो हजार से अधिक लोग भी मारे गए। मस्जिद विध्वंस के दस दिन बाद मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला -खुदाई में मंदिर के सबूत मिले >>>

साल 2003 में हाईकोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्‍व विभाग ने विवादित स्थल पर बीते 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 तक खुदाई की। इसमें एक प्राचीन मंदिर के प्रमाण मिले। इसके बाद साल 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 574 पेज की नक्शों और समस्त साक्ष्यों सहित एक रिपोर्ट पेश की गई थी।

12 सितंबर 2011 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे राम जन्मभूमि घोषित कर दिया। इसके बाद बहुमत से फैसला करते हुए इसे तीन हिस्सों में बांट दिया।

हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को राम जन्मभूमि मानते हुए इसको हिंदुओं को सौंपे जाने का आदेश दिया गया। एक हिस्से को निर्मोही अखाड़े को देने का आदेश दिया गया। इस हिस्से में सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि इस भूमि के कुछ टुकड़े पर मुस्लिम नमाज अदा करते रहे हैं। लिहाजा तीसरा हिस्सा उनके ही पास रहना चाहिए। तीन जजों की पूर्ण विशेष पीठ का यह पूरा फैसला लगभग दस हजार पन्नों में दर्ज है।

http://www.bhaskar.com/news-ht/UP-LUCK-bjp-leader-subramanian-swamy-said-babri-masjid-will-build-soon-latest-news-hindi-4778293-PHO.html
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TP Shukla

सुब्रमनियम स्वामी ने कहा -मस्जिद के मुतावल्‍ली (केयरटेकर) को खोज लिया है। केयरटेकर ने कहा है कि वह पैसे लेकर सरयू नदी के पार कहीं और मस्जिद बनाने को तैयार है। 
सुब्रमण्‍यम स्‍वामी ने कहा >>>यदि एक बार मूर्ति की प्राण प्रतिष्‍ठा हो जाती है और उसे बाद में तोड़कर मस्जिद भी बना दी जाए तो भी वह मंदिर ही रहेगा। यहां उन्‍होंने यह भी कहा कि सुन्‍नी समुदाय के लोग हमेशा गड़बड़ी करते हैं। इसी वजह से राम मंदिर के निर्माण में देरी हो रही है।

बाबरी मस्जिद के विवाद के लिए पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू ही जिम्‍मेदार है. स्‍वामीजी  ने दुबई के अल फैजल का नाम लिया जो कि राजवंश से ताल्‍लुक रखता है। फैजल के मुताबिक, लोग मस्जिद को आलीशान महल या फिर रोड बनाने के लिए तोड़ते रहते हैं। इसमें कोई ताज्‍जुब की बात नहीं है। उन्‍होंने कहा कि मस्जिद सिर्फ नमाज पढ़ने की जगह होती है जो कहीं भी हो सकती है। ऐसे में अगर इसे तोड़ना है तो प्‍यार से तोड़ा जा सकता है

रामजन्मभूमि ,बाबरी मस्जिद विवाद

 विदेशी मजहब का लुटेरा हत्यारा  मुगल शासक बाबर के आदेश पर साल 1527 में अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि मंदिर को तोड़कर वहा पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था। इसे छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा। 
साल 1940 से पहले, इस मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान कहा जाता था।  बाबर के रोजनामचा में विवादित स्थल पर मस्जिद होने का कोई जिक्र मौजूद नहीं है।
 ऐसे में मुस्लिम समुदाय ऐसा नहीं कर सकता है। मुस्लिमों के अनुसार निर्माण के समय यहां पर कोई मंदिर मौजूद नहीं था। बीते 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही यह मुद्दा पुरे देश में फ़ैल गया.   देशभर में हुए दंगों में दो हजार से अधिक लोग भी मारे गए। मस्जिद विध्वंस के दस दिन बाद मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला -खुदाई में मंदिर के सबूत मिले >>>

साल 2003 में हाईकोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्‍व विभाग ने विवादित स्थल पर बीते 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 तक खुदाई की। इसमें एक प्राचीन मंदिर के प्रमाण मिले। इसके बाद साल 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 574 पेज की नक्शों और समस्त साक्ष्यों सहित एक रिपोर्ट पेश की गई थी।

 12 सितंबर 2011 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे राम जन्मभूमि घोषित कर दिया। इसके बाद बहुमत से फैसला करते हुए इसे तीन हिस्सों में बांट दिया।

 हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को राम जन्मभूमि मानते हुए इसको हिंदुओं को सौंपे जाने का आदेश दिया गया। एक हिस्से को निर्मोही अखाड़े को देने का आदेश दिया गया। इस हिस्से में सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि इस भूमि के कुछ टुकड़े पर मुस्लिम नमाज अदा करते रहे हैं। लिहाजा तीसरा हिस्सा उनके ही पास रहना चाहिए। तीन जजों की पूर्ण विशेष पीठ का यह पूरा फैसला लगभग दस हजार पन्नों में दर्ज है।

http://www.bhaskar.com/news-ht/UP-LUCK-bjp-leader-subramanian-swamy-said-babri-masjid-will-build-soon-latest-news-hindi-4778293-PHO.html
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TP Shukla
Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

Maharao Bhim Singh ji II Sahib Bahadur of Kotah / Kota


Maharao Bhim Singh ji II Sahib Bahadur of Kotah / Kota
ca. 1945-1947
The only son and heir of Maharaja Sri Sir Umed Singhji II, Bhim Singhji II succeeded his father following his death in 1940. He immediately entered into service with the British Indian Army as an officer, serving during the Second World War and being promoted to Major by 1948.
Although he planned several education and modernisation programs for Kotah, they did not reach fruition before Indian independence. He was knighted with the KCSI in 1947, and signed the Instrument of Accession to the Dominion of India on the 15 August. The following year, on 25 March 1948, Sir Bhim Singhji merged Kotah into the Rajasthan Union of states and became its first Rajpramukh, but was demoted to Uprajpramukh (Deputy Rajpramukh) when the Maharana of Udaipur, who was of a higher rank than Sir Bhim Singhji, acceded to the Rajasthan Union. Sir Bhim Singhji continued in the office of Uprajpramukh until it, along with the office of Rajpramukh, was abolished by the Government of India on 31 October 1956.

In 1956, Sir Bhim Singhji served as an Alternate Delegate to the United Nations General Assembly that year. Conversely, since 1959 he had been President of the Rajasthan Board for the Preservation of Wildlife.

An expert shooter, he was Captain of the Indian shooting team at the Singapore Shooting Championships in 1969, at the 1976 Summer Olympics and at the 1978 Asian Games

Maharao Bhim Singh ji II Sahib Bahadur of Kotah / Kota
ca. 1945-1947
The only son and heir of Maharaja Sri Sir Umed Singhji II, Bhim Singhji II succeeded his father following his death in 1940. He immediately entered into service with the British Indian Army as an officer, serving during the Second World War and being promoted to Major by 1948. 
Although he planned several education and modernisation programs for Kotah, they did not reach fruition before Indian independence. He was knighted with the KCSI in 1947, and signed the Instrument of Accession to the Dominion of India on the 15 August. The following year, on 25 March 1948, Sir Bhim Singhji merged Kotah into the Rajasthan Union of states and became its first Rajpramukh, but was demoted to Uprajpramukh (Deputy Rajpramukh) when the Maharana of Udaipur, who was of a higher rank than Sir Bhim Singhji, acceded to the Rajasthan Union. Sir Bhim Singhji continued in the office of Uprajpramukh until it, along with the office of Rajpramukh, was abolished by the Government of India on 31 October 1956.

In 1956, Sir Bhim Singhji served as an Alternate Delegate to the United Nations General Assembly that year. Conversely, since 1959 he had been President of the Rajasthan Board for the Preservation of Wildlife.

An expert shooter, he was Captain of the Indian shooting team at the Singapore Shooting Championships in 1969, at the 1976 Summer Olympics and at the 1978 Asian Games

Maharao Bhim Singh ji II Sahib Bahadur of Kotah / Kota
ca. 1945-1947
The only son and heir of Maharaja Sri Sir Umed Singhji II, Bhim Singhji II succeeded his father following his death in 1940. He immediately entered into service with the British Indian Army as an officer, serving during the Second World War and being promoted to Major by 1948.
Although he planned several education and modernisation programs for Kotah, they did not reach fruition before Indian independence. He was knighted with the KCSI in 1947, and signed the Instrument of Accession to the Dominion of India on the 15 August. The following year, on 25 March 1948, Sir Bhim Singhji merged Kotah into the Rajasthan Union of states and became its first Rajpramukh, but was demoted to Uprajpramukh (Deputy Rajpramukh) when the Maharana of Udaipur, who was of a higher rank than Sir Bhim Singhji, acceded to the Rajasthan Union. Sir Bhim Singhji continued in the office of Uprajpramukh until it, along with the office of Rajpramukh, was abolished by the Government of India on 31 October 1956.

In 1956, Sir Bhim Singhji served as an Alternate Delegate to the United Nations General Assembly that year. Conversely, since 1959 he had been President of the Rajasthan Board for the Preservation of Wildlife.

An expert shooter, he was Captain of the Indian shooting team at the Singapore Shooting Championships in 1969, at the 1976 Summer Olympics and at the 1978 Asian Games

Posted in रामायण - Ramayan

रामजन्मभूमि ,बाबरी मस्जिद विवाद


सुब्रमनियम स्वामी ने कहा -मस्जिद के मुतावल्‍ली (केयरटेकर) को खोज लिया है। केयरटेकर ने कहा है कि वह पैसे लेकर सरयू नदी के पार कहीं और मस्जिद बनाने को तैयार है।
सुब्रमण्‍यम स्‍वामी ने कहा >>>यदि एक बार मूर्ति की प्राण प्रतिष्‍ठा हो जाती है और उसे बाद में तोड़कर मस्जिद भी बना दी जाए तो भी वह मंदिर ही रहेगा। यहां उन्‍होंने यह भी कहा कि सुन्‍नी समुदाय के लोग हमेशा गड़बड़ी करते हैं। इसी वजह से राम मंदिर के निर्माण में देरी हो रही है।

बाबरी मस्जिद के विवाद के लिए पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू ही जिम्‍मेदार है. स्‍वामीजी ने दुबई के अल फैजल का नाम लिया जो कि राजवंश से ताल्‍लुक रखता है। फैजल के मुताबिक, लोग मस्जिद को आलीशान महल या फिर रोड बनाने के लिए तोड़ते रहते हैं। इसमें कोई ताज्‍जुब की बात नहीं है। उन्‍होंने कहा कि मस्जिद सिर्फ नमाज पढ़ने की जगह होती है जो कहीं भी हो सकती है। ऐसे में अगर इसे तोड़ना है तो प्‍यार से तोड़ा जा सकता है

रामजन्मभूमि ,बाबरी मस्जिद विवाद

विदेशी मजहब का लुटेरा हत्यारा मुगल शासक बाबर के आदेश पर साल 1527 में अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि मंदिर को तोड़कर वहा पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था। इसे छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा।
साल 1940 से पहले, इस मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान कहा जाता था। बाबर के रोजनामचा में विवादित स्थल पर मस्जिद होने का कोई जिक्र मौजूद नहीं है।
ऐसे में मुस्लिम समुदाय ऐसा नहीं कर सकता है। मुस्लिमों के अनुसार निर्माण के समय यहां पर कोई मंदिर मौजूद नहीं था। बीते 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही यह मुद्दा पुरे देश में फ़ैल गया. देशभर में हुए दंगों में दो हजार से अधिक लोग भी मारे गए। मस्जिद विध्वंस के दस दिन बाद मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला -खुदाई में मंदिर के सबूत मिले >>>

साल 2003 में हाईकोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्‍व विभाग ने विवादित स्थल पर बीते 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 तक खुदाई की। इसमें एक प्राचीन मंदिर के प्रमाण मिले। इसके बाद साल 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 574 पेज की नक्शों और समस्त साक्ष्यों सहित एक रिपोर्ट पेश की गई थी।

12 सितंबर 2011 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे राम जन्मभूमि घोषित कर दिया। इसके बाद बहुमत से फैसला करते हुए इसे तीन हिस्सों में बांट दिया।

हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को राम जन्मभूमि मानते हुए इसको हिंदुओं को सौंपे जाने का आदेश दिया गया। एक हिस्से को निर्मोही अखाड़े को देने का आदेश दिया गया। इस हिस्से में सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि इस भूमि के कुछ टुकड़े पर मुस्लिम नमाज अदा करते रहे हैं। लिहाजा तीसरा हिस्सा उनके ही पास रहना चाहिए। तीन जजों की पूर्ण विशेष पीठ का यह पूरा फैसला लगभग दस हजार पन्नों में दर्ज है।

http://www.bhaskar.com/news-ht/UP-LUCK-bjp-leader-subramanian-swamy-said-babri-masjid-will-build-soon-latest-news-hindi-4778293-PHO.html
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TP Shukla

सुब्रमनियम स्वामी ने कहा -मस्जिद के मुतावल्‍ली (केयरटेकर) को खोज लिया है। केयरटेकर ने कहा है कि वह पैसे लेकर सरयू नदी के पार कहीं और मस्जिद बनाने को तैयार है। 
सुब्रमण्‍यम स्‍वामी ने कहा >>>यदि एक बार मूर्ति की प्राण प्रतिष्‍ठा हो जाती है और उसे बाद में तोड़कर मस्जिद भी बना दी जाए तो भी वह मंदिर ही रहेगा। यहां उन्‍होंने यह भी कहा कि सुन्‍नी समुदाय के लोग हमेशा गड़बड़ी करते हैं। इसी वजह से राम मंदिर के निर्माण में देरी हो रही है।

बाबरी मस्जिद के विवाद के लिए पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू ही जिम्‍मेदार है. स्‍वामीजी  ने दुबई के अल फैजल का नाम लिया जो कि राजवंश से ताल्‍लुक रखता है। फैजल के मुताबिक, लोग मस्जिद को आलीशान महल या फिर रोड बनाने के लिए तोड़ते रहते हैं। इसमें कोई ताज्‍जुब की बात नहीं है। उन्‍होंने कहा कि मस्जिद सिर्फ नमाज पढ़ने की जगह होती है जो कहीं भी हो सकती है। ऐसे में अगर इसे तोड़ना है तो प्‍यार से तोड़ा जा सकता है

रामजन्मभूमि ,बाबरी मस्जिद विवाद

 विदेशी मजहब का लुटेरा हत्यारा  मुगल शासक बाबर के आदेश पर साल 1527 में अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि मंदिर को तोड़कर वहा पर बाबरी मस्जिद का निर्माण किया था। इसे छीनने के बाद मीर बाकी ने इसका नाम बाबरी मस्जिद रखा। 
साल 1940 से पहले, इस मस्जिद को मस्जिद-ए-जन्मस्थान कहा जाता था।  बाबर के रोजनामचा में विवादित स्थल पर मस्जिद होने का कोई जिक्र मौजूद नहीं है।
 ऐसे में मुस्लिम समुदाय ऐसा नहीं कर सकता है। मुस्लिमों के अनुसार निर्माण के समय यहां पर कोई मंदिर मौजूद नहीं था। बीते 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही यह मुद्दा पुरे देश में फ़ैल गया.   देशभर में हुए दंगों में दो हजार से अधिक लोग भी मारे गए। मस्जिद विध्वंस के दस दिन बाद मामले की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया गया।

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला -खुदाई में मंदिर के सबूत मिले >>>

साल 2003 में हाईकोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्‍व विभाग ने विवादित स्थल पर बीते 12 मार्च 2003 से 7 अगस्त 2003 तक खुदाई की। इसमें एक प्राचीन मंदिर के प्रमाण मिले। इसके बाद साल 2003 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में 574 पेज की नक्शों और समस्त साक्ष्यों सहित एक रिपोर्ट पेश की गई थी।

 12 सितंबर 2011 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए इसे राम जन्मभूमि घोषित कर दिया। इसके बाद बहुमत से फैसला करते हुए इसे तीन हिस्सों में बांट दिया।

 हाईकोर्ट ने विवादित भूमि को राम जन्मभूमि मानते हुए इसको हिंदुओं को सौंपे जाने का आदेश दिया गया। एक हिस्से को निर्मोही अखाड़े को देने का आदेश दिया गया। इस हिस्से में सीता रसोई और राम चबूतरा शामिल है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि इस भूमि के कुछ टुकड़े पर मुस्लिम नमाज अदा करते रहे हैं। लिहाजा तीसरा हिस्सा उनके ही पास रहना चाहिए। तीन जजों की पूर्ण विशेष पीठ का यह पूरा फैसला लगभग दस हजार पन्नों में दर्ज है।

http://www.bhaskar.com/news-ht/UP-LUCK-bjp-leader-subramanian-swamy-said-babri-masjid-will-build-soon-latest-news-hindi-4778293-PHO.html
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TP Shukla
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आइये आज आपको “धरती पर भगवान हैं सिद्ध करके दिखाता हूँ” :


आइये आज आपको “धरती पर भगवान हैं सिद्ध करके दिखाता हूँ” :

१. “अमरनाथजी” में शिवलिंग अपने आप बनता है
२. “माँ ज्वालामुखी” में हमेशा ज्वाला निकलती है
३. “मैहर माता मंदिर” में रात को आल्हा अब भी आते हैं
४. सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर में 3000 बम में से एक
का ना फूटना
५. इतने बड़े हादसे के बाद भी “केदारनाथ मंदिर” का बाल ना बांका होना
६. पूरी दुनियां मैं आज भी सिर्फ “रामसेतु के पत्थर” पानी में तैरते हैं
७. “रामेश्वरम धाम” में सागर का कभी उफान न मारना
८. “पुरी के मंदिर” के ऊपर से किसी पक्षी या विमान का न निकलना
९. “पुरी मंदिर” की पताका हमेशा हवा के विपरीत दिशा में उड़ना
१०. उज्जैन में “भैरोंनाथ” का मदिरा पीना
११. गंगा और नर्मदा माँ (नदी) के पानी का कभी खराब न होना

(अब जिसका मन करे “प्रभु” का नाम लेकर इस पोस्ट को शेयर करता चले).

Jay Shree Ram !!!
Asmin -02…

आइये आज आपको "धरती पर भगवान हैं सिद्ध करके दिखाता हूँ"  :

१. "अमरनाथजी"  में शिवलिंग अपने आप बनता है 
२. "माँ ज्वालामुखी" में हमेशा ज्वाला निकलती है 
३. "मैहर माता मंदिर" में रात को आल्हा अब भी आते हैं 
४. सीमा पर स्थित तनोट माता मंदिर में 3000 बम में से एक
का ना फूटना
५. इतने बड़े हादसे के बाद भी "केदारनाथ मंदिर" का बाल ना बांका होना
६. पूरी दुनियां मैं आज भी सिर्फ "रामसेतु के पत्थर" पानी में तैरते हैं 
७. "रामेश्वरम धाम" में सागर का कभी उफान न मारना
८. "पुरी के मंदिर" के ऊपर से किसी पक्षी या विमान का न निकलना
९. "पुरी मंदिर" की पताका हमेशा हवा के विपरीत दिशा में उड़ना
१०. उज्जैन में "भैरोंनाथ" का मदिरा पीना
११. गंगा और नर्मदा माँ (नदी) के पानी का कभी खराब न होना

(अब जिसका मन करे "प्रभु" का नाम लेकर इस पोस्ट को शेयर करता चले).

Jay Shree Ram !!!
Asmin -02...
Posted in हिन्दू पतन

अमेरिकीयूनिवर्सिटी में गीता पढ़ना हुआ जरूरी !


अमेरिकीयूनिवर्सिटी में गीता पढ़ना हुआ जरूरी !
जो काम भारत मे होना था वो अमेरिका मे हो रहा है…
न्यायाधीश ऐ आर दवे ने संस्कृत अनिवार्य करने की बात कही भर, काँग्रेस और वामपंथियों को लगे चुनचुने, अरे छद्दम देशभक्तों पढो अमेरिका में क्या हो रहा है,
अमेरिका की सेटन हॉल यूनिवर्सिटी (Seton Hall University) में सभी छात्रों के लिए गीता पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया है।
इस यूनिवर्सिटी का मानना है कि छात्रों को सामाजिक सरोकारों से रूबरू कराने के लिए गीता से बेहतर कोई और माध्यम नहीं हो सकता है। लिहाजा उसने सभी विषयों के छात्रों के लिए अनिवार्य पाठ्यक्रम के …तहत इसकी स्टडी को जरूरीबना दिया है।
यूनिवर्सिटी केस्टिलमेन बिजनस स्कूल के प्रफेसर ए.डी. अमर ने यह जानकारी दी।यह यूनिवर्सिटी 1856 में न्यू जर्सी में स्थापित हुई थी और एक स्वायत्त कैथलिक यूनिवर्सिटी है।यूनिवर्सिटी के 10, 800 छात्रों में से एक तिहाई से ज्यादा गैर ईसाई हैं।
इनमें भारतीय छात्रों की संख्या अच्छी- खासी है। गीता की स्टडी अनिवार्य बनाने इस फैसले के पीछे प्रफेसर अमर की प्रमुख भूमिका रही।उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी में कोर कोर्स के तहत सभी छात्रों के लिए अनिवार्य पाठ्यक्रम होता है, जिसकी स्टडी सभी विषयों के छात्रों को करनी होती है।2001 में यूनिवर्सिटी ने अलग पहचान कायम करने के लिए कोर कोर्स की शुरुआत की थी।इसमें छात्रों को सामाजिक सरोकारों और जिम्मेदारियों से रूबरू कराया जाता है।उन्होंने बताया कि इस मामले में गीता का ज्ञान सर्वोत्तम साधन है।गीता की अहमियत को समझते हुए यूनिवर्सिटी ने इसकी स्टडी अनिवार्य की।
हमारे संस्कार पाश्चत्य को पसंद आ गये पर हमारे देश में कब गीता का पाठ नियमित होगा……बोलो जय श्री राम …जय श्री कृष्णा…..

Bidyut Kar's photo.
Bidyut Kar's photo.
Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

अरब के लुटेरों का भारत पर आक्रमण तथा भारत में इस्लाम का आगमन ( एक श्रंखला ) भाग 5 -:


अरब के लुटेरों का भारत पर आक्रमण तथा भारत में इस्लाम का आगमन ( एक श्रंखला ) भाग 5 -:
गतांक से आगे………
युद्ध अभी चल रहा था। दाहीर की अवशिष्ट सेना लङते हुये अपना मार्ग बनाती रावर दुर्ग की और पिछे हट रही थी। अब कासिम की नज़र रावर पर थी। दाहीर पत्नी रानीबाई नें जयसिम्हा के साथ रावर को भी त्याग दिया। वे बृहमनवादी उर्फ बृहमनावाद चले गये। दाहीर की दुसरी पत्नी मैनाबाई 15000 सैनिकों के साथ रावर की सुरक्षा का भार सम्भाला। दाहीर की बची हुई सेना भी इनसे आकर मिल गई थी। कासिम बराबर रावर पर दबाव दे रहा था। उसने अपनी सेना को दो भागों में विभक्त कर दिया था। दिन रात अग्नि के गोलों और पत्थरों की वर्षा की जा रही थी। रक्त पिपासु हाथों में पङनें के बजाय मैंनाबाई नें जौहर का व्रत लिया। लकङी, रुई, तेल की एक विशाल चिता प्रज्वलित की गई। मुसलमानों के हजारों साल के शासन में यह कहानी सैकङों बार दोहराई गई है। मुस्लिम पशुओँ के लोलुप और कामुक स्पर्श के बदले हिंदु विरांगनाओँ नें अग्नि का आलिंगन करना उत्तम ही समझा। कासिम शहर में पृविष्ट हुआ। उसनें 6000 हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया। प्रमुख मंदिर मस्जिद बन गये। 30,000 बन्दियों में दाहीर के दरबारियोँ और सेवकों की सिर्फ 30 पुत्रियाँ थी। दाहीर की नातिन जयश्री भी इनमेंं से एक थी। इन सभी को हज्जाज के पास भेज दिया गया। दाहीर का राज छ्त्र, लूटी सम्पदा और निर्यातित बन्दियों को हज्जाज नें खलीफा के पास भेज दिया। एक निर्लज्ज अरबी इतिहासकार लिखता है- वालिद नें अल्लाह का शुक्रिया अदा किया। कुछ हिंदु स्त्रिओँ को उसनें बेच दिया, कुछ अपनें अनुचरों में बांट दी गई। जब उसनें दाहीर की नातिन को देखा तो उसके रुप,सौंदर्य को देख कर सतब्ध रह गया। विस्मय से अभिभुत हो उसनें अपनी उंगलियोँ को दांतों से काटा। अब्दुल्ला ने उसे पाने की इच्छा जताई। मगर खलीफा ने कहा- ‘हे मेरे भतीजे, मै इस लङकी को बेहद पसंद करता हुँ। मै इस से इतना प्रभावित हुँ कि इसे अपने लिये रखना चाहता हुँ ‘। इसी लम्पटता की प्रशंसा भारतीय इतिहासकार मीठे-मीठे शब्दों में करते हैं। क्या मजाक है कि इसे ये लोग अरबी और भारतीय सभ्यता का विशिष्ट संगम मानते हैं। लूट की किस्त के बाद ही रावर के ध्वंस का समाचार भी आया। हज्जाज ने उत्तर दिया–काफिरों को जरा भी मौका मत देना। तुरंत उनके सिर कलम कर देना…ये अल्लाह का हुक्म है। क्या यह विशिष्ट पंक्ति नही है? है? इसे अरबी इतिहासकारों ने लिखा है। इस एक पंक्ति ने हिंदुत्व और हिंदुस्तान के प्रति उनकी घृणित और कुत्सित मनोवृति और खुनी षडयंत्र का पर्दा फाश कर दिया है और हम आंखें बंद किये बैठे रहे। अपने देशभक्त पिता के छिन्न-भिन्न, बर्बाद राज्य को देख कर अनाथ जयसिम्हा ने अपना दिल पत्थर का कर लिया। उसने अखनोर में अपने भाई फुफी,मटिया में चाचा और वैकानन के शासक धवल को संदेश भेज दिया। पर ये स्थान एक दुसरे से काफी दूर थे। साथ ही मार्गोंं पर दुश्मन का आतंक भी छाया हुआ था। उस पर उन्हें अपने अपने नगर और नागरिकों की रक्षा भी करनी थी। बृहम्नावाद को तहस-नहस करने की पुरी तैयारी कासिम ने कर ली थी, वह रावर से निकला। रास्ते में दो उपनगर थे बहरुर और दहलीला। दोनों उपनगरों पर वह दो महीनों तक घेरा डाले पङा रहा। दिन-रात हमले होते रहे। अंतत: दोनों नगर टूट गये। तब तक हिंदु स्त्रियाँ जौहर ज्वाला मे भस्म हो इन अरबी लुटेरों के खुनी पंजों से बहुत दूर पहुंच चूकी थी। उपनगरों को छान कर लूटी सम्पदा और गुलामों का विभाजन कर बगदाद और दमिश्क भेज दिया गया। बृाहम्नावाद की और बढते हुये कासिम नें रास्ते में दाहीर के भूतपुर्व सलाहकार शशिशेखर को मुसलमान बनाकर अपनी सेना सलाहकार बना लिया। दुसरे हिंदु राजकुमार धारण के पुत्र नूवां को दहलीला मे बंदी बना लिया गया गया। फिर उसे मुसलमान बना कर उसी स्थान का शासक घोषित कर दिया। फिर उन इलाकों में आतंक फैलाने, असहाय नागरिकों से जजिया वसुलने वसुलने और उन्हें मौत को भी मात देने वाली पीङा देकर मुसलमान बनाने के लिये दाहीर ने सेना की एक टुकङी को बृह्मनावाद की और भेजा। अब कासिम की सेना ने बृह्मनावाद को घेर लिया। नगर के चार द्वार थे। नगर का पूर्ण नियंत्रण दाहीर पुत्र वीर जयसिम्हा के हाथ मे था। उसके प्रभावशाली निर्देशन में हिंदु सेना प्रतिदिन चारों द्वारों से निकल कर कासिम की लुटेरी सेना पर धावा बोला करती करती थी। जयसिम्हा के गुरिल्ला युद्ध ने कासिम की सेना का रसद मार्ग बंद कर दिया था। इस संकट की घङी में कासिम नें बिसय मुखिया को एक कुमुक और खाद्य पदार्थ भेजने का समाचार दिया। यही बिसय मुखिया जो कभी अंतरमन से हिंदु हुआ करता था था मगर इस्लाम की जादुई हड्डी नें उसे देशद्रोही बना कर ही छोङा। रक्त शुद्धी की उचित और परम्परा की अंध भक्ति होने के कारण हिंदु महा विनाश से भी शिक्षा नहीं ले सके कि नियम कायदों को ताक पर रखनें वाले इनके शत्रु शत्रु उनकी कङियों को कमजोर कर रहे हैं। अगर एक भी हिंदु से मुसलमान बने इन लोगों को वापिस अपनी गोद में ले लिया गया होता एक हिंदु के धर्म परिवर्तन के बदले 10 शत्रुओं का सफाया कर दिया होता तो शत्रु को जैसा का तैसा उत्तर मिल जाता जाता और भारत अपनी स्वतंत्रता नहीं खोता। छ: महिनों तकशहर पर घेरा पङा रहा। बाहर मुस्लिम शत्रुओं नें खङी फसल तबाह कर दी। जलाशय विषाक्त कर दिये गये। अतएव नागरिक बङी संकटपूर्ण स्थति मे घिर गये। परिस्थति की गम्भीरता को देखते हुये काश्मीर के राजा से सहायता की याचना के लिये कुछ अंगरक्षकों के साथ जयसिम्हा नें चुपचाप नगर छोङ दिया। जयसिम्हा की अनुपस्थिति में नगर व्यापारियों को आश्वासन और घूस देकर कासिम ने अपनी और मिला लिया। षडयंत्र में यह शामिल हुआ कि नित्य की लङाई से वापिस लौटने पर वे जबतवादी द्वार में आंगल ( सांकल) नहीं लगायेंगे। जहाँ कासिम का उन्मादी रोष एक छेद भी ना कर सका वहाँ वहाँ विश्वासघात फलीभूत हुआ। अल्लाह के नारे लगाती कासिम का लुटेरा गिरोह जबतवादी द्वार से अचानक टूट पङा। कासिम के भयंकर नरसन्हार और पाशविक व्यभिचार से यथासम्भव बचनें के लिये नगर निवासियों नें पुर्वी द्वार खोल कर बच्चों और स्त्रियों को भगा दिया। इस विश्वासघात की खबर सुनकर दाहीर की दुसरी पत्नी (मैनाबाई) नें अपनी सेना को ललकार कर नियंत्रित करने का प्रयास किया। उन्हें अपनें परिवार और देश के प्रति उनके कृतव्य का स्मरण कराया। अल्लाह के नाम पर की जाने वाली इस पाशविक क्रुरता की आरी से बचनें के लिये अधिकांश हिंदु नारियों नें अपने आप को अग्नि की लपटोंं को समर्पित कर जौहर का पवित्र कृतव्य निभाया। जौहर की इस ज्वाला में लादी और उसकी दो पुत्रियाँ भी समा गई। सम्भवत: कासिम के निर्देश पर ही अरबी इतिहासकारों नें यह गढकर लिखा है कि दाहीर की दो पुत्रियाँ सुर्यदेवी और परिमलदेवी बंदिनी बना ली गईं। मगर क्यों? ? नगर पर धोखे से अधिकार करने से पूर्व कासिम की हालत बहुत खस्ता हो चूकी थी। वहीं एक अरबी इतिहासकार के अनुसार कासिम निर्दयिता के आसन पर बैठ गया और 16 हजार व्यक्तियों के खून से जमीन लाल हो गई। लाशों से पटे मंदिर मस्जिद बना दिये गये। नगर की सारी गायों को काट कर उनका मांस कासिम के सर्वभक्षी गिरोह को परोस दिया गया। कासिम ने सारा शहर छान मारा मगर दाहीर के परिवार का कहीं पता ना चला। दुसरे दिन एक हजार व्यक्तियों को दाहीर के सामने पेश किया गया। इनकी बङी-बङी दाढियाँ थी व केश मुंडे हुये थे। उनसे दाहीर के परिवार का पता पुछा गया लेकिन उन्होनें एक शब्द भी नहीं कहा। उन्हें अमानवीय और पाशविक यातनायें दी गईं। एक अरबी इतिहासकार के अनुसार उन पर पैगम्बर पैगम्बर साहाब के कानून के आधार पर टेक्स लगाया गया। जो मुसमान बन गये उन्हें गुलामी, सम्पत्ति कर, और प्राण कर से मुक्त कर दिया गया। शेष लोग जिनका घर पहले ही लूट लिया गया था उनसे भारी टेक्स वसुल किया गया। अरबी लुटेरे दल-ब-दल घरों में घुस गये उन्होनें घर पति को आज्ञा दी दी कि प्रत्येक स्वस्थ अतिथी का एक दिन और अस्वस्थ अतिथी का तीन दिन मनोरंजन किया जाये। हज्जाज के आदेश पर कासिम की सेना एक नगर से दुसरे नगर को को नष्ट करती, एक शहर से दुसरे शहर को लूटती, हिंदु युवतियों का बलात्कार करके उनका हरण करतीकरती, प्रत्येक घरों को लूट कर उनमें आग लगाती,नरसन्हार करती, लोगों को गुलाम और मुसलमान बनाती सिंध पर छा गई। दाहीर की राजधानी अलोर में उन्हें फिर प्रबल विरोध का सामना करना पङा। वहाँ दाहीर पुत्र फूफी का नियंत्रण था। फूफी अपने पिता की ही तरह वीर,दृढ और अटल था। कासिम के गिरोह के 50,000 गुंडों नें अलोर के बाहर पङाव डाल दिया। नगर के बाहर एक सुंदर बाग था जिसमें एक सरोवर तथा एक सुंदर मंदिर था। कासिम नें इसे तहस-नहस कर दिया। इधर अलोर के रक्षकों नें कासिम को विवेक से काम लेकर लौट जानें की चेतावनी दी। कई महीनों तक बेबस कासिम घेरा डाले पङा रहा। अलोर की जनता चट्टान की तरह अटल रही। तब कासिम ने एक स्त्री को लादी जैसे वस्त्र पहनाये पहनायेऔर उसे एक काले ऊंट पर बैठाया। जैसा कि लादी का अपना व्यवहार था। फिर उसे कुछ सैनिकों के साथ नगर की प्राचीर के पास भेज दिया। वहाँ उसने ऊंची आवाज मे कह– :हे नगर वासियो ! मुझे तुमसे कुछ बात कहनी है। मेरे पास आकर सुनो”। इस पर कुछ प्रमुख व्यक्ति नगर की प्राचीर पर आये। तब उस स्त्री ने पर्दा उठा कर कहा मैं दाहीर पत्नी लादी हुँ। राजा मारा गया है और उसका सिर काट कर दमिश्क भेज दिया गया है। राज ध्वज और राज छ्त्र भी भेजा जा चुका है। अपनें आपको बरबाद मत करो। ( क्या सुंदर प्रलोभन है जिसमे हम आज तक फंसते चले आ रहे हैं) हैं) इतना कह कर वह चीख पङी और जार-जार रो कर शोक गीत गाने लगी।
शेष अगली पोस्ट में…..

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काशी में भगवान ”शिव” ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए थे।


काशी में भगवान ”शिव” ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रगट हुए थे। सम्राट विक्रमादित्य ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।
मंदिर को लूटने आए महमूद गजनवी के भांजे सालार मसूद को सम्राट सुहेल देव पासी ने मौत के घाट उतारा था।
मंदिर को 1194 में कुतुबब्दीन ने तोड़ा। मंदिर फिर से बना।
1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने फिर इसे तोड़ा।
1494 में मुस्लिम शासको ने काशी के विश्वनाथ मंदिर सहित सभी मंदिरों को तोड़ दिया.काशी में एक भी मंदिर नहीं बचा था.
1585 में राजा टोडरमल की सहायता से फिर मंदिर बना।

काशी विश्वनाथ के मूल मंदिर के स्थान पर आज ज्ञानवापी मस्जिद है.>>>

2.9.1669 को औरंगजेब ने काशी-विश्वनाथ मन्दिर फिर से ध्वस्त करा दिया और मस्जिद का निर्माण करा दिया।
औरंगजेब ने ही मथुरा में मंदिर तोड़वा कर वहां ईदगाह बनवाई थी।
1752 से लेकर 1780 के बीच मराठा सरदार दत्ता जी सिंधिया व मल्हार राव होल्कर ने काशी विश्वनाथ मन्दिर की मुक्ति के प्रयास किए।

मूल मंदिर के थोड़ी दूर पर वर्तमान काशीविश्वनाथ मंदिर है >>>>

7 अगस्त, 1770 में महाद जी सिन्धिया ने दिल्ली के बादशाह शाह आलम से मन्दिर तोडऩे की क्षतिपूर्ति वसूल करने का आदेश जारी करा लिया।
लेकिन तब तक काशी पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का प्रभाव हो गया था, इसलिए मंदिर का नवीनीकरण रुक गया।

इन्दौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1780 में विश्वनाथ मंदिर बनवाया, जिस पर पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने 9 क्विंटल सोने का छत्र बनवाया। ग्वालियर की महारानी बैजाबाई ने ज्ञानवापी का मंडप बनवाया और महाराजा नेपाल ने वहां नन्दी की विशाल प्रतिमा स्थापित करवाई।

काशी विश्वनाथ मंदिर का मुकदमा मुस्लमान हार चुके है >>>>

11 अगस्त, 1936 को दीन मुहम्मद, मुहम्मद हुसैन और मुहम्मद जकारिया ने स्टेट इन काउन्सिल में प्रतिवाद संख्या-62 दाखिल किया और दावा किया कि सम्पूर्ण परिसर वक्फ की सम्पत्ति है। लम्बी गवाहियों एवं ऐतिहासिक प्रमाणों व शास्त्रों के आधार पर यह दावा गलत पाया गया और 24 अगस्त 1937 को वाद खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपील संख्या 466 दायर की गई लेकिन 1942 में उच्च न्यायालय ने इस अपील को भी खारिज कर दिया। कानूनी गुत्थियां साफ होने के बावजूद मंदिर-मस्जिद का मसला आज तक फंसा कर रखा गया है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का इतिहास >>>>

अमेरिका के लेखक तथा साहित्यकार मार्क ट्विन ने काशी कि यात्रा के बाद लिखा कि ”बनारस”” इतिहास से भी पुराना नगर है. वह परंपराओं से पुराना है। वह कहावतों और कहानियों से भी पुराना है। विश्व कि समस्त सभ्यताओ से पुराना है. यहां भूत, वर्तमान, शाश्वत तथा निरंतरता साथ-साथ विद्यमान हैं। काशी गंगा के पश्चिम किनारे पर स्थित है।

चीनी यात्री हुएन सांग (629-675) ने अपनी काशी यात्रा के उल्लेख में 100 फुट ऊंची शिव मूर्ती वाले विशाल तथा भव्य मंदिर का वर्णन किया है.

बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए शंकराचार्य का आगमन भी यहीं हुआ और उन्होंने वैदिक धर्म की स्थापना की।
महर्षि पतंजलि ने अपना काव्य यहीं लिखा था। संत कबीर ने संत मत की स्थापना यहीं की।
मीरा बाई के गुरु संत रैदास (रविदास) भी काशी के निवासी थे।
रामचरितमानस और अन्य ग्रंथों की रचना गोस्वामी तुलसी दास ने यहीं पर की थी।

काशी नागरी प्रचारिणी सभा, भारतेंदु हरिचंद्र, मुंशी प्रेमचंद्र अैर जयशंकर प्रसाद आदि अन्य विद्वान भी काशी की ही देन हैं।

काशी के गंगा तट पर लगभग सौ घाट हैं।
इनमें से एक पर स्वयं हरिश्चंद्र ने श्मशान का मृतक दाह संस्कार लगान वसूलने का कार्य किया था।
आधुनिक शिक्षा का विश्वविद्यालय-बनारस हिंदू युनिवर्सिटी पं मदन मोहन मालवीय ने यहीं स्थापित किया था.
जयपुर के शासक जय सिंह ने एक वेधशाला भी बनवायी थी। यह 1600 सन में बनी थी। इसके यंत्र आज भी ग्रहों की सही नाप और दूरी बतलाते हैं।

स्कंध पुराण में 15000 श्लोको में काशी विश्वनाथ का गुणगान मिलता है। इससे सिद्ध होता है कि यह मंदिर हजारो वर्ष पुराना है.
इसके उत्तर में वारान तथा दक्षिण में आसी नदियां बहती हैं।

इसको काशी का, यानी प्रकाश का नगर भी कहते हैं। प्रकाश ज्योति शिव को भी कहते हैं। इसको ‘अविमुक्त’, अर्थात जिसको शिव ने कभी भी नहीं छोड़ा, भी कहते हैं। इसको ‘आनंद वन’ और ‘रुद्रवास’ भी कहते हैं।
भारत के सांस्कृतिक तथा धार्मिक ग्रंथो में ज्योति प्रकाश का विशेष अर्थ है ‘ज्योति’, जो अंधकार को मिटाती है, ज्ञान फैलाती है, पापों का नाश करती है, अज्ञान को नष्ट करती है आदि। काशी अज्ञान, पाप का नाश करने वाली है, मोक्ष और समृद्धि प्रदान करने वाली है.

प्रलयकाल में भी काशी का लोप नहीं होता। उस समय भगवान [शंकर]] इसे अपने [त्रिशूल] पर धारण कर लेते हैं और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार देते हैं। आदि सृष्टि स्थली भी यहीं भूमि बतलायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने का कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होने सारे की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और इन्हीं की अर्चना से श्रीवशिष्ठजी तीनों लोकों में पुजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये।

सर्वतीर्थमयी एवं सर्वसंतापहारिणी मोक्षदायिनी काशी की महिमा ऐसी है कि यहां प्राणत्याग करने से ही मुक्ति मिल जाती है। भगवान भोलानाथ मरते हुए प्राणी के कान में तारक-मंत्र का उपदेश करते हैं, जिससे वह आवगमन से छुट जाता है, चाहे मृत-प्राण्ाी कोई भी क्यों न हो। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित एवंम दुखों परिपीड़ित जनों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है।

वामपंथी (हिन्दू विरोधी), सेक्युलर विचारधारा के इतिहासकार मंदिर को तोडना सही ठहराते है ये देश द्रोही इतिहासकार विदेशी मजहब से पैसे लेकर यही लिखे है >>>>>

सन 1669 ईस्वी में औरंगजेब अपनी सेना एवं हिन्दू राजा मित्रों के साथ वाराणसी के रास्ते बंगाल जा रहा था.रास्ते में बनारस आने पर हिन्दू राजाओं की पत्नियों ने गंगा में डुबकी लगा कर काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने की इच्छा व्यक्त की …जिसे औरंगजेब सहर्ष मान गया, और, उसने अपनी सेना का पड़ाव बनारस से पांच किलोमीटर दूर ही रोक दिया !

फिर उस स्थान से हिन्दू राजाओं की रानियां पालकी एवं अपने अंगरक्षकों के साथ गंगाघाट जाकर गंगा में स्नान कर विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने चली गई !
पूजा के उपरांत सभी रानियां तो लौटी लेकिन कच्छ की रानी नहीं लौटी , जिससे औरंगजेब के सेना में खलबली गयी और, उसने अपने सेनानायक को रानी को खोज कर लाने का हुक्म दिया …!

औरंगजेब का सेनानायक अपने सैनिकों के साथ रानी को खोजने मंदिर पहुंचा … जहाँ, काफी खोजबीन के उपरांत “”भगवान गणेश की प्रतिमा के पीछे”” से नीचे की ओर जाती सीढ़ी से मंदिर के तहखाने में उन्हें रानी रोती हुई मिली…. जिसकी अस्मिता और गहने मंदिर के पुजारी द्वारा लुट चुके थे …!

इसके बाद औरंगजेब के लश्कर के साथ मौजूद हिन्दू राज्यों ने मंदिर के पुजारी एवं प्रबंधन के खिलाफ कठोरतम करवाई की मांग की.
जिससे विवश होकर औरंगजेब ने सभी पुजारियों को दण्डित करने एवं उस “”विश्वनाथ मंदिर”” को ध्वस्त करने के आदेश देकर मंदिर को तोड़वा दिया !उसी जगह ज्ञानवापी मस्जिद बना दी.

हिन्दू विरोधी इन इतिहासकारों कि कहानी का झूठ >>>>>

झूठ न.1-औरंगजेब कभी भी बनारस और बंगाल नहीं गया था.उसकी जीवनी में भी यह नहीं लिखा है.किसी भी इतिहास कि किताब में यह नहीं लिखा है.

झूठ न.2- क्या इतिहासकारों का ये कहना है कि औरंगजेब की जीवनी में हिन्दू राजाओ के साथ कही जाना नहीं लिखा है.

झूठ न.3-युद्ध पर जाते मुस्लिम शासक के साथ हिन्दू राजा अपनी पत्नियों को साथ नहीं ले जा सकते है.क्योकि मुस्लिम शासक लूट पाट में औरतो को बंदी बनाते थे.

झूठ न.4- जब कच्छ की रानी तथा अन्य रानिया अपने अंगरक्षकों के साथ मंदिर गयी थी.तब किसी पुजारी या महंत द्वारा उसका अपहरण कैसे संभव हुआ. पुजारी द्वारा ऐसा करते हुए किसी ने क्यों नहीं देखा.…

झूठ न.5- अगर, किसी तरह ये न हो सकने वाला जादू हो भी गया था तो साथ के हिन्दू राजाओं ने पुजारी को दंड देने एवं मंदिर को तोड़ने का आदेश देने के लिए औरंगजेब को क्यों कहा. हिन्दू राजाओं के पास इतनी ताकत थी कि वो खुद ही उन पुजारियों और मंदिर प्रबंधन को दंड दे देते.

झूठ न.6 -क्या मंदिरों को तोड़कर वहां पर मस्जिद बनाने की प्रार्थना भी साथ गए हिन्दू राजाओं ने ही की थी.

झूठ न.7 -मंदिर तोड़ने के बाद और पहले के इतिहास में उस तथाकथित कच्छ की रानी का जिक्र क्यों नहीं है…

इन सब सवालों के जबाब किसी भी इतिहासकारों के पास नहीं है क्योंकि यह एक पूरी तरह से मनगढंत कहानी है….!

हकीकत बात ये है कि औरंगजेब मदरसे में पढ़ा हुआ एक कट्टर मुसलमान और जेहादी था,लुटेरा हत्यारा अरबी मजहब का औरंगजेब ने हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए,हिन्दू धर्म को समाप्त करने के लिए ना सिर्फ काशी विश्वनाथ बल्कि, कृष्णजन्म भूमि मथुरा के मंदिर अन्य सभी प्रसिद्द मंदिरों को ध्वस्त कर वहां मस्जिदों का निर्माण करवा दिया था…..

जिसे ये मनहूस वामपंथी सेक्युलर इतिहासकार किसी भी तरह से न्यायोचित ठहराने में लगे हुए हैं….

और .. अपने पुराने विश्वनाथ मंदिर की स्थिति ये है कि…..

वहां औरंगजेब द्वारा बनवाया गया ज्ञानवापी मस्जिद आज भी हम हिन्दुओं का मुंह चिढ़ा रहा है … और, मुल्ले उसमे नियमित नमाज अदा करते हैं !

जबकि आज भी ज्ञानवापी मस्जिद के दीवारों पर हिन्दू देवी -देवताओं के मूर्ति अंकित हैं और, मस्जिद के ठीक सामने भगवान विश्वनाथ की नंदी विराजमान है….!

इसीलिए…..हे हिन्दुओं जागो–जानो अपने सही इतिहास को क्योंकि इतिहास की सही जानकारी ही….. इतिहास की पुनरावृति को रोक सकती है…!
TP Shukla

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Following Ram, the Prince of Ayodhya – Maria Wirth


Following Ram, the Prince of Ayodhya – Maria Wirth

Lakshman, Ram & Sita

Maria Wirth“The Ramayana is more than a grand epic. It is a sacred scripture that contains all what one needs to know to live a dignified life and to conduct oneself in an ideal way in the different relationships. Ram is not only an exemplary human being, but an avatar, a conscious embodiment of the divine principle that comes down to earth whenever the bad is gaining the upper hand, and humanity strays from the dharmic path.” – Maria Wirth

Rishi Valmiki“Where you are from? Do people there also know about Ram?” Some boys had discovered me sitting at the back of a shrine at the outskirts of Chamba near Tehri and typically for Indian kids, who are never shy, had asked this question. “No, where I am from people don’t know about Ram”, I replied. They looked disappointed. Only then I realised that the crackling of loudspeakers that I heard from a village down the hill, was in preparation for theRamlila.

That incident happened in September 1985. A year later, I attended the grand Ramleela in Varanasi over 30 evenings and wrote about it for a German magazine to let some Germans also know about Ram.

Recently I read this article again and realised that it is still valid today. I reproduce it here in English in a shorter version, since it just was again that special time of the year, when Ram’s story was staged in Varanasi and other places all over the country, probably in very much the same way as it has been way back in 1986.

Far from becoming obsolete over time, the Ramleela is set to conquer the western world as well. In July 2013 an International Ramleela Conference was held at the University of the West Indies and a World Ramleela Council was established. The major aim was to promote the Ramleela as a cultural heritage internationally.

Lakshman, Rama & SitaHere is my article from 1986

Ram, the prince of Ayodhya, lived many thousand years ago. Yet even today most people in India know in detail his eventful life story, which is recounted in the Ramayana. Not only in India—in Nepal, Myanmar, Laos, Thailand and Indonesia, too, Ram had great influence on art and literature. An international Ramayana festival last year in Bangkok made clear, how alive Ram is even today and which great importance the Ramayana has in Southeast Asia. “If Asia has an epic in common, it is the Ramayana”, was declared in Bangkok.

In the land of its origin, however, the Ramayana is more than a grand epic. It is a sacred scripture that contains all what one needs to know to live a dignified life and to conduct oneself in an ideal way in the different relationships. Ram is not only an exemplary human being, but an avatar, a conscious embodiment of the divine principle that comes down to earth whenever the bad is gaining the upper hand, and humanity strays from the dharmic path.

TulsidasValmiki, supposedly a contemporary of Ram, narrates in 24.000 Sanskrit shlokas vividly the life story of the prince, who later becomes the king of Ayodhya. In the 17th century Tulsidaswrote the story of Ram in colloquial Hindi and made it even more popular. Ram is an ideal, an outstanding example for others—noble, just, brave, ever protecting the weak, and doing the right thing at the right time. He is ready rather to die than to break his word and prepared to wage a war to rescue his wife Sita who had been kidnapped by a demon king.

Sita, the princess who marries Ram, possesses all the virtues, which a woman is supposed to have according to the ancientrishis. She is modest, chaste, always intent on the wellbeing of her husband, warm-hearted, full of trust in god, considerate, graceful—and exquisitely beautiful.

Feminist groups, which also exist in India, are likely to find fault with Sita, yet the majority of Hindu women do not care. They revere Sita as their ideal even today.

For Ram to be a model for others, he has to have a difficult life. And he indeed faces countless, unexpected complications and hardship. For example on the very day, when the handsome, much-loved prince is to ascend the throne, his fatherDasaratha, caused by an intrigue in the palace, has to send him into exile for 14 long years. It breaks his father’s heart. Ram calmly takes off the festive robes and dresses in a simple dhoti. Sita and his brother Lakshman insist on joining him. And so the three of them finally walk out of the town into the forest—and the whole of Ayodhya weeps.

To my very western question when this happened, I always got the same answer: “Many thousand years ago for sure. But the exact date is not important. Important is, to let Ram come alive in your inner vision and learn from him for your own life.”

This ‘present’ view or attitude has no doubt a valid point and is probably the reason, why Indians do not get tired to listen again and again to Ram’s story or to watch it in village plays. In Varanasi, I met a man who had attended the Ramlila there 35 times. Each year he followed Ram with devotion and attention for 30 nights.

The Ramlila in Varanasi is staged in Ramnagar on the other side of the Ganges, under the patronage of the Maharaja, with great pomp, yet very traditionally. There were no loudspeakers in spite of thousands of spectators and people were not allowed to take photos with a flash.

Ramlila of RamnagarThe lila culminates after Dussehra, when Ram returns to Ayodhya after his exile and takes over as king. Every evening before the play,pooja is performed for the actors and thereafter they are considered to be true embodiments of their roles. Many people touched respectfully the feet of the 12-year old boy who played Ram, when there was an occasion during breaks. The actors were right in the midst of the crowd. There was a festive atmosphere with food carts and stalls selling trinkets. When Ram went into exile, several thousand spectators walked with him around two kilometres to the place, where the next episode would unfold. An amazing experience in itself.

Anant Narayan SinghThe Maharaja moved high up on a fabulously decorated elephant through the crowd. The yuvarajwas sitting on another elephant, which was also splendidly decorated.

I have particularly fond memories of the journeys back across the Ganges in the middle of the night after the play. Mainly men crossed over to the town on countless, crowded boats in the stillness of the night—once it was even 4 o’clock in the morning. They narrated excitedly to each other, how admirably Ram had conducted himself today and how exemplary Sita had reacted—as if it had just really happened and they had had the good fortune of having been present. When the talking occasionally stopped, they started singing “Sita Ram, Sita Ram”—everyone in his own tune and rhythm. Towards the end of the boat ride, when we were gliding past a Shiva temple on the ghats of Varanasi, they interrupted their “Sita Ram” for a moment and full throatily shouted a salutation to Shiva: “Hara Hara Mahadev!”

I was not afraid of riding alone in a cycle rickshaw at that late hour from the Ganges to the tourist bungalow near the railway station through unusually empty streets. My trust was never disappointed. Varanasi is a fascinating, intense city, where life and death are present side by side and this world and the beyond merge into each other. Kashi (light) was the name of the city in ancient times. In all likelihood it is the most ancient Ramlila in Ramnagarof all towns on this earth and has its origin in an age, when the world was still more transparent for its luminous essence and less dense in the material sense.

Maybe this special, spiritual atmosphere contributed to an amazing coincidence on the side-lines during the Ramlila:

Georg, a college mate from Hamburg, had planned a trip to India on short notice. He sent a letter to my address in South India asking whether we could meet. “Write to American Express in Delhi as I will be soon in Delhi”, he wrote. Yet I knew nothing of that, as I was in the North and his letter was lying in the South. (Those were the times before email and mobile). Georg went daily to the American Express to enquire whether my letter had arrived and was daily disappointed. As he did not want to spend his vacation waiting for a letter in Delhi, he started off on the usual tourist route—Agra, Khajuraho and Varanasi.

One morning, as I had breakfast in the tourist bungalow, the door of the restaurant opened and in came Georg. For some moments, we both stared at each other, stunned, unable to believe what we saw. Then we both stirred back to life, amazed at this incredible coincidence. – Maria Wirth Blog, 16 October 2014

Ramlila at Ramnagar

Ram Leela as performed at Ram Nagar before the Raja of Benares in 1834