Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

“चुण्डावत मांगी सैनानी सिर काट दे दियो क्षत्राणी”


“चुण्डावत मांगी सैनानी सिर काट दे दियो क्षत्राणी”
राजस्थान के इतिहास की वह घटना जब एक राजपूत रानी विवाह के सिर्फ सात दिन बाद आपने शीश अपने हाथो से काट कर युद्ध में जाने को तैयार अपने को भिजवा दिया ताकि उनका पति नयी नवेली पत्नी की खूबसूरती में उलझ कर अपना कर्तव्य न भूले

हाड़ी रानी जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था | यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत लुणा जी चुण्डावत की रानी थी | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला | नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया | युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा | सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके | और रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया
अपने बंधन से मुक्त होकर उन्होंने अद्वतीय शौर्य दिखाया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए वीर गति हो गए और दूसरे राजपूतो के की भांति वो भी वीर गति को प्राप्त होकर एक अमर कहानी लिख गए

Hadi Rani a legendary character daughter of Hada Rajput married to Chundawat Chieften of Salumbar, Mewar who sacrificed herself to motivate her husband to go to the War. When Maharana Raj Singh I (1653-1680) of Mewar called her husband to join the battle against Aurangzeb, the Sardar having married only a few days earlier hesitated about going into battle. However Rajput honour being what it is, he had to join the battle. He asked his wife Hadi Rani for some memento to take with him to the battlefield. Thinking that she was an obstacle to his doing his duty for Mewar, she ordered that her head be severed and presented to her husband. The Sardar shattered but nevertheless proud tied the memento around his neck by its hair. With no one to live for, he fought bravely until he was killed.

"चुण्डावत मांगी सैनानी सिर काट दे दियो क्षत्राणी"
राजस्थान के इतिहास की वह घटना जब एक राजपूत रानी विवाह के सिर्फ सात दिन बाद आपने शीश अपने हाथो से काट कर युद्ध में जाने को तैयार अपने को भिजवा दिया ताकि उनका पति नयी नवेली पत्नी की खूबसूरती में उलझ कर अपना कर्तव्य न भूले  

हाड़ी रानी जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था | यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत लुणा जी    चुण्डावत की रानी थी | जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले ही उसके पति रावत चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला | नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पता लगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया | युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा | सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोच कर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के चलते इस वीर रानी ने अपना शीश काट कर ही निशानी के तौर पर भेज दिया ताकि उसका पति अब उसका मोह त्याग निर्भय होकर अपनी मातृभूमि के लिए युद्ध कर सके | और रावत चुण्डावत ने अपनी पत्नी का कटा शीश गले में लटका औरंगजेब की सेना के साथ भयंकर युद्ध किया 
अपने बंधन से मुक्त होकर उन्होंने अद्वतीय शौर्य दिखाया और वीरता पूर्वक लड़ते हुए अपनी मातृभूमि के लिए वीर गति हो गए और दूसरे राजपूतो के की भांति वो भी वीर गति को प्राप्त होकर एक अमर कहानी लिख गए 

Hadi Rani a legendary character daughter of Hada Rajput married to Chundawat Chieften of Salumbar, Mewar who sacrificed herself to motivate her husband to go to the War. When Maharana Raj Singh I (1653-1680) of Mewar called her husband to join the battle against Aurangzeb, the Sardar having married only a few days earlier hesitated about going into battle. However Rajput honour being what it is, he had to join the battle. He asked his wife Hadi Rani for some memento to take with him to the battlefield. Thinking that she was an obstacle to his doing his duty for Mewar, she ordered that her head be severed and presented to her husband. The Sardar shattered but nevertheless proud tied the memento around his neck by its hair. With no one to live for, he fought bravely until he was killed.
Posted in हिन्दू पतन

आजकल एक बड़ा खतरनाक प्रचलन चला है हिन्दुओं में, वह यह कि जैसे ही कोई त्यौहार आने वाला होता है, खुद हिन्दू ही उस त्यौहार को ऐसे पेश करते हैं जैसे वो उनके ऊपर बोझ है :


निवेदन है कि ये मैसेज ज़रूर पढ़ें-

आजकल एक बड़ा खतरनाक प्रचलन चला है हिन्दुओं में, वह यह कि जैसे ही कोई त्यौहार आने वाला होता है, खुद हिन्दू ही उस त्यौहार को ऐसे पेश करते हैं जैसे वो उनके ऊपर बोझ है :

1) रक्षाबंधन पर मूर्खता :
कुछ हिन्दू ऐसे मैसेज भेजते हैं कि ||कोई भी अनजान चीज को हाथ नहीं लगाये, उसमें राखी हो सकती है !! ||

अरे कूल dude !! तुम्हारे लिए अपनी बहन बोझ बन रही है?? तुम तो राखी का मज़ाक़ बना बैठे हो, तुम क्या अपनी माँ बहन की रक्षा करोगे? राखी एक रक्षा सूत्र है, अगर तुम भूल रहे हो तो याद दिलाऊँ राजस्थान में औरतें अपनी रक्षा के लिए जोहर कर आग में कूद जाती थी।

रानी पद्मिनी के साथ 36000 औरतें जोहर हो गयी थीं। एक महिला की रक्षा मज़ाक लगती है???

2) दशहरा पर मूर्खता :
यह मैसेज आजकल खूब प्रचलन में है कि || रावण सीता जी को उठा ले गया है और राम जी लंका पर चढ़ाई करने जा रहे हैं, उसके लिये बंदरो की आवश्यकता है, जो भी मैसेज पढ़े तुरंत निकल जाये ||

वाह!!! आज सीता अपहरण हिन्दुओं के लिए मज़ाक़ का विषय हो गया है। जोरू का गुलाम बनना गर्व का विषय और राम का सैनिक बनना मज़ाक़ हो रहा है!!!

दूसरा जोक || रावण को कोर्ट ले जाया गया व कहा गया कि गीता पर हाथ रख कसम खाओ तब रावण कहता है सीता पर हाथ रखा उसमें इतना बवाल हो गया, गीता पर रखा तो……||

यह बड़े शर्म की बात है कि अग्नि परीक्षा देने के बाद भी आज हिन्दू सीता माता के चरित्र पर सवाल उठाने को मज़ाक़ समझते हैं। कभी अपनी माता के बारें में ऐसे मज़ाक़ उड़ाया? अगर नहीं तो तुम्हें किसने हक दिया समस्त हिंदुत्व की माता पर हाथ रखने को मज़ाक़ बनाने का ????

एक हमारा मीडिया पहले ही हिन्दू त्यौहारों के पीछे पड़ा है-
होली पर पानी बर्बाद होता है लेकिन ईद पर जानवरों की क़ुरबानी धर्म है!

दिवाली पर पटाके छोड़ना प्रदूषण है पर ईसाई नव वर्ष पर आतिशबाजी जश्न है!

नवरात्री पर 10 बजे के बाद गरबा ध्वनि प्रदूषण हो जाती है, वहीं मोहरम की रात ढोल ताशे कूटना और नववर्ष की रात जानवरों की तरह 12 बजे तक बाजे बजाना धर्म है!!!

करवा चौथ और नाग पंचमी पाखंड है वहीं ईसा का मरकर पुनः लौटना गुड फ्राइडे वैज्ञानिक है!!

हिन्दुओं को यह लगता है कि अपने पर्व का मज़ाक़ बनाना सही है तो इससे बड़ी लानत क्या होगी??

हम राखी और सीता अपहरण पर मज़ाक़ करते हैं, इसके पीछे समाज की मानसिकता बनती है। लोग लड़की की रक्षा से कतराते हैं , क्योंकि राखी को हमने मज़ाक़ बना दिया है, हमने सीता माता जैसी पवित्र माँ का मज़ाक़ बना दिया है। इससे पता चलता है हम कितने धार्मिक हैं!

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हिन्दू धर्म की विडंबना देखिए :-

जन्माष्टमी आयी तो श्री कृष्ण को टपोरी तडीपार और ना जाने क्या-क्या कहा!

गणेश जी आये तो उनका भी मज़ाक़ बनाया!

नवरात्रि आयी तो ये चुटकुला आया “नौ दिन दुर्गा-दुर्गा फिर मुर्गा-मुर्गा…”

विजयादशमी पर श्री राम-माता सीता और रावण पर चुटकुले चले!

अब दिवाली पर भी कुछ आ जायेगा!

कभी सोचा है ओरिजनली कौन ये सब पोस्ट कर रहा है??? ये कभी किसी ने भी जानने की कोशिश नहीं की.. बस अपने मोबाइल पर आया तो बिना सोचे समझे फॉरवर्ड करने की वही भेड़ चाल चालू..!!
इस तरह के मैसेज बनाने वाले जानते हैं कि हम हिन्दू अपने धर्म को लेके सजग नहीं हैं और एडवांस्ड दिखने के चक्कर में कुछ भी फॉरवर्ड कर देंगे. तभी ये ऐसे मैसेज बनाकर सर्कुलेट करते हैं!!

किसी और धर्म के लोगों को उनके धर्म के जोक्स पढ़ते या फॉरवर्ड करते देखा है?? उनको तो छोड़ो, आप भी उनके धर्म के जोक्स फॉरवर्ड करने से पहले 10 बार सोचते हो कि किसको भेजूँ-किसको नहीं?? तो हिन्दू धर्म का मज़ाक़ उड़ाते शर्म नहीं आती..??

मेरा करबद्ध निवेदन है कि अपने हाथों से अपने धर्म का अपमान ना करें..

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

बोले हुए शब्द वापस नहीं आते………..!


बोले हुए शब्द वापस नहीं आते………..!
**************************************

बहुधा सोचता हूँ, यह मुँह से निकले हुए कटु शब्द तीर सरीखे होते हैं और सीधे ह्रदय पर ही अघात करते हैं । इसलिए यह कहा गया है, ईश्वर ने दो ऑंखें और एक जिव्हा प्रदान की है, जो भी मुँह से शब्द निकाले तो इन दोनों आँखों से देखभाल के यह शब्द निकालें । जब यह शब्द मुँह से निकल जाते हैं, तो उनको उसी प्रकार वापिस नहीं लिया जा सकता है,जैसे तरकश से निकला हुआ तीर । लाख कोशिश करो तब भी यह शब्द अगर कटु होते हैं,तोजोड़ने के पश्चात ऐसे ही जुडते है,जैसे धागा टूटने के बाद उन टूटे हुए धागों से जोड़ने पर गांठ पड़ जाती है। अगर एक बार यह गांठ पड़ गयी चाहे जितना क्षमा माँगे या सॉरी कहे रिश्ते सामान्य नहीं होते । इसीलिए किसी ने कहा है :-

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये |
औरों को भी शीतल करे और खुद भी शीतल होए ||

आज मैं आपके साथ एक छोटी सी Story share कर रहा हूँ जो मैंने You Can Win में पढ़ी थी. इसे ध्यान से पढ़िए और इससे मिलने वाली सीख को गाँठ बाँध लीजिये.

एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया.उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा.

संत ने किसान से कहा , ” तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो , और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो .” किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया.

तब संत ने कहा , ” अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ”

किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है,तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते.

इस कहानी से क्या सीख मिलती है:

कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर human nature कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं hurt हो ही जाता है.

जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए.

बोले हुए शब्द वापस नहीं आते...........! 
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बहुधा सोचता हूँ, यह मुँह से निकले हुए कटु शब्द तीर सरीखे होते हैं और सीधे ह्रदय पर ही अघात करते हैं । इसलिए यह कहा गया है, ईश्वर ने दो ऑंखें और एक जिव्हा प्रदान की है, जो भी मुँह से शब्द निकाले तो इन दोनों आँखों से देखभाल के यह शब्द निकालें । जब यह शब्द मुँह से निकल जाते हैं, तो उनको उसी प्रकार वापिस नहीं लिया जा सकता है,जैसे तरकश से निकला हुआ तीर । लाख कोशिश करो तब भी यह  शब्द अगर कटु होते हैं,तो जोड़ने के पश्चात ऐसे ही जुडते है,जैसे धागा टूटने के बाद उन टूटे हुए धागों से जोड़ने पर गांठ पड़ जाती है।  अगर एक बार यह गांठ पड़ गयी चाहे जितना क्षमा माँगे या सॉरी कहे रिश्ते सामान्य  नहीं होते ।    इसीलिए किसी ने कहा है :- 

ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोये |
औरों को भी शीतल करे और खुद भी शीतल होए || 

आज मैं आपके साथ एक छोटी सी Story share कर रहा हूँ जो मैंने You Can Win में पढ़ी थी. इसे ध्यान से पढ़िए और इससे मिलने वाली सीख को गाँठ बाँध लीजिये. 

एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया.उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा.

संत ने किसान से कहा , ” तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो , और उन्हें शहर  के बीचो-बीच जाकर रख दो .” किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया.

तब संत ने कहा , ” अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ”

किसान वापस गया पर तब  तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है,तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते.

इस कहानी से क्या सीख मिलती है:

कुछ कड़वा बोलने से पहले ये याद रखें कि भला-बुरा कहने के बाद कुछ भी कर के अपने शब्द वापस नहीं लिए जा सकते. हाँ, आप उस व्यक्ति से जाकर क्षमा ज़रूर मांग सकते हैं, और मांगनी भी चाहिए, पर human nature कुछ ऐसा होता है की कुछ भी कर लीजिये इंसान कहीं ना कहीं hurt हो ही जाता है.

जब आप किसी को बुरा कहते हैं तो वह उसे कष्ट पहुंचाने के लिए होता है पर बाद में वो आप ही को अधिक कष्ट देता है. खुद को कष्ट देने से क्या लाभ, इससे अच्छा तो है की चुप रहा जाए.
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हिंदु राष्ट्र के मुकुट-मणी छत्रपति शिवजी


हिंदु राष्ट्र के मुकुट-मणी छत्रपति शिवजी
छत्रपती का शिव-चरित्र हिन्दी में क्यों?
आज बहुत से राजनैतिक दल इस प्रकार का प्रचार करते है की, छत्रपती शिवाजी महाराज का सारा इतिहास और उनके उपरांत उन्होंने स्थापित हिंदवी-स्वराज्य का इतिहास आज के महाराष्ट्र नामक राज्य में घटित हुआ! इस मिथ्या प्रचार का परिणाम ये देखने को मिलता है की जो हिन्दू आज के महाराष्ट्र राज्य से नहीं है उनका शिवाजी महाराज से कोई संबंध नही है इस प्रकार की एक सोच सब में दिखती है! यह सर्वथा असत्य है! नेहरु-गाँधी का प्रभाव भारत में आने से पहले छत्रपती शिवाजी महाराज का नाम प्रत्येक भारतवासी के मुख पर था! स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की सभा में “गर्व से कहो हम हिंदु है” ये सिंह-गर्जना की थी वो भी छत्रपती से चरित्र से प्रेररित हो कर! इसी लिए जब वे अमेरिका से वापस भारत लौटे तो उन्होंने भागलपुर में छत्रपती शिवाजी महाराज पर एक अद्वितीय व्यख्यान किया! जिसमे स्वामीजी ने कहा की “शिवाजी महाराज का प्रेरणा दाई इतिहास समस्त भारतवासीयो की आत्मा है”! स्वामी विवेकानंद को “मराठी मानुस” नही थे! ये मैंने इस लिए कहा है क्योकि आज जिहादी शक्तियों ने बड़ी ही चालाकी से शिवाजी महाराज को “मराठी मानुस” तक ही सीमित कर दिया है! महाराणा प्रताप को राजपूत समाज तक और गुरु गोविन्द सिंह को सीख बंधुओ तक! इसका परिणाम ये है की यदी किसी उत्तर अथवा दक्षिण भारत के हिन्दू घर में शिवाजी की प्रतिमा दिखाई देती है तो देखनेवाले के मुह से बिना बोले निकल आता है “क्या आप महाराष्ट्रियन है?” जब की ३५० वर्ष पहले छत्रपती के समय महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, या तमिलनाडु इन में से कोई भी राज्य नही था! १ में १९६० इस दिन महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ और तब से ही “मराठी मानुस” का जन्म हुआ! तभी से गुज्जू भाई और कन्नड़ अन्ना का भी गाझी वंशी नेहरूजी के कहने पर जन्म हुआ! ३५० वर्ष पूर्व ये सब लोग केवल और केवल हिन्दू अस्मिता में जीते थे! 

प्रत्यक्ष छत्रपती शिवाजी महराज का राजकवी कानपूर के टीकमगढ़ का निवासी कवी भूषण था!
छत्रपती शिवाजी महाराज के मृत्यु समय १६८० में हिन्दवी स्वराज्य आज के महराष्ट्र, आन्ध्र, कर्नाटक और तमिलनाडु का बहुत बड़ा भाग मिल कर बनता था! इस विशाल साम्राज्य के हिंदु-गणको के हिन्दू ह्दय सम्राट कहलाते थे छत्रपती शिव-राय! आप लोगो को जानकर ये आश्चर्य होगा की शिवाजी महाराज का इतिहास कविद्र परमानंद नामक एक महान इतिहास शास्त्री ने लिखा है! छत्रपती का पराक्रमी इतिहास अपनी काव्यपूर्ण वाणी में लिपीबद्ध किया है कवी भूषण ने वो भी हिन्दी में जिसे “शिव-बावनी” कहते है! उनकी शिव-बावनी १९२० तक सारे भारतवासीयो को कंठस्त (Byheart) थी, इसके बहुतसे प्रमाण है! इस शिव-बावनी पर प्रतिबंध डालने का काम सब से पहले किसनी किया तो वो थे (भारत के इस्लामीकरण का सपना देखनेवाले) महान आत्मा गाँधी! उन्होंने एसा विचित्र कुतर्क दिया की “शिव-बावनी पर प्रतिबंध नही डाला गया तो मुस्लिमो की भावना आहत होगी जिससे वो स्वाधीनता संग्राम में भाग नही लेंगे”! इतना ही नही गाँधी ने छत्रपती शिवाजी को पथभ्रष्ट भी कहा था! (http://www.esamskriti.com/essay-chapters/Why-was-Gandhi-killed-(full)-2.aspx) दुर्भाग्य से गाँधी अपने षड्यंत्र में सफल हुए और हम शिव-बावनी को भूल गए! यदि हमारे वीर राष्ट्रपुरुषो का पराक्रम हम ना भूले होते किसी छुपे हुए “गंजे मुल्ले” में दम नही था की पाकिस्तान निर्माण कर सके!
ये वही गाँधी है जिहोने हिन्दुओ को भाषा के नाम पर तोड़ने के लिए “भाषा आधारित प्रान्त रचना” का षड्यंत्र रचा! वे इसे पुरा तो नही कर पाए किंतु उनकी उतराधिकारी गाझी-वंशी सत्ता (घियासुध्दीन गाझी का गुप्त इतिहास अवश्य पढ़े https://www.facebook.com/photo.php?fbid=359902477432206&set=pb.100002373698075.-2207520000.1413130730.&type=3&theater) में इस भाषा आधारित विद्वेष और घृणा को भारतवासीयो के बीच कूट कूट कर ठूसा गया! 
शिवबावनी की एक रोमांचक झलक हम यहा प्रस्तुत कर रहे है! जो मरे हुए मृतक शरीर में भी प्राण फूंकने का सामर्थ्य रखता है!
इंद्र जिमि जृंभपर ! बाडव सुअंभपर !रावण सदंभपर !रघुकुल राज है !!
पौन वारिवाह पर !संभु रतिनाह पर !ज्यो सहसवाह पर !राम द्विज राज है !
दावा दृमदंड पर !चिता मृगझुंड पर !भूषण वितुंड पर !जैसे मृगराज है !!
तेज तमंअंस पर !कन्न्ह जिमि कंस पर !त्यों म्लेंच्छ बंस पर !शेर शिवराज है !!
शेर शिवराज है !!शेर शिवराज है !!शेर शिवराज है !!शेर शिवराज है !! 
ये काव्य भूषणवी बोली में है जो ३५० वर्षो पहले की हिन्दी का रूप है! इसका अनुवाद नीचे दिया गया है!
जैसे जम्भासुर राक्षस पर इंद्र और दशानन रावण पर प्रभु श्री राम भरी है!
जैसे पवन की गती के आगे कोई नही टिक सकता और जिस प्रकार भगवान शिवा ने कामदेव को भस्म किया!
जिसक प्रकार सैकड़ो की झुण्ड में भैसे की गर्द को सिंह दबोच लेता है और हिरणों के झुण्ड पर चिता सवार होता है!
जैसे पापी कंस के छाती पर चढ़ कर कृष्ण उसका वध कर दता है!
ठीक वैसे ही सारे मलेच्छ वंश  (अर्थात सारे जिहादियो सुलतान बादशाहों) के छाती पर चढ़ कर शेर शिवाजी उनका वध अकेले ही करते है!
क्यों है न प्रेरणादाई? जिहादी गाँधी मुर्ख नही थे जो इसपर प्रतिबंध लगाया!
आज हम उस असत्य भाषा वाद की दीवारों को गिरा कर छत्रपती शिवाजी को हिन्दूहृदय सम्राट के रूप में प्रत्येक हिन्दू के हृदय में विराजीत करेंगे! यही संकल्प है इस लेखमाला का! क्या आप साथ देंगे?

हिंदु राष्ट्र के मुकुट-मणी छत्रपति शिवजी
छत्रपती का शिव-चरित्र हिन्दी में क्यों?
आज बहुत से राजनैतिक दल इस प्रकार का प्रचार करते है की, छत्रपती शिवाजी महाराज का सारा इतिहास और उनके उपरांत उन्होंने स्थापित हिंदवी-स्वराज्य का इतिहास आज के महाराष्ट्र नामक राज्य में घटित हुआ! इस मिथ्या प्रचार का परिणाम ये देखने को मिलता है की जो हिन्दू आज के महाराष्ट्र राज्य से नहीं है उनका शिवाजी महाराज से कोई संबंध नही है इस प्रकार की एक सोच सब में दिखती है! यह सर्वथा असत्य है! नेहरु-गाँधी का प्रभाव भारत में आने से पहले छत्रपती शिवाजी महाराज का नाम प्रत्येक भारतवासी के मुख पर था! स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की सभा में “गर्व से कहो हम हिंदु है” ये सिंह-गर्जना की थी वो भी छत्रपती से चरित्र से प्रेररित हो कर! इसी लिए जब वे अमेरिका से वापस भारत लौटे तो उन्होंने भागलपुर में छत्रपती शिवाजी महाराज पर एक अद्वितीय व्यख्यान किया! जिसमे स्वामीजी ने कहा की “शिवाजी महाराज का प्रेरणा दाई इतिहास समस्त भारतवासीयो की आत्मा है”! स्वामी विवेकानंद को “मराठी मानुस” नही थे! ये मैंने इस लिए कहा है क्योकि आज जिहादी शक्तियों ने बड़ी ही चालाकी से शिवाजी महाराज को “मराठी मानुस” तक ही सीमित कर दिया है! महाराणा प्रताप को राजपूत समाज तक और गुरु गोविन्द सिंह को सीख बंधुओ तक! इसका परिणाम ये है की यदी किसी उत्तर अथवा दक्षिण भारत के हिन्दू घर में शिवाजी की प्रतिमा दिखाई देती है तो देखनेवाले के मुह से बिना बोले निकल आता है “क्या आप महाराष्ट्रियन है?” जब की ३५० वर्ष पहले छत्रपती के समय महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, या तमिलनाडु इन में से कोई भी राज्य नही था! १ में १९६० इस दिन महाराष्ट्र राज्य का गठन हुआ और तब से ही “मराठी मानुस” का जन्म हुआ! तभी से गुज्जू भाई और कन्नड़ अन्ना का भी गाझी वंशी नेहरूजी के कहने पर जन्म हुआ! ३५० वर्ष पूर्व ये सब लोग केवल और केवल हिन्दू अस्मिता में जीते थे!

प्रत्यक्ष छत्रपती शिवाजी महराज का राजकवी कानपूर के टीकमगढ़ का निवासी कवी भूषण था!
छत्रपती शिवाजी महाराज के मृत्यु समय १६८० में हिन्दवी स्वराज्य आज के महराष्ट्र, आन्ध्र, कर्नाटक और तमिलनाडु का बहुत बड़ा भाग मिल कर बनता था! इस विशाल साम्राज्य के हिंदु-गणको के हिन्दू ह्दय सम्राट कहलाते थे छत्रपती शिव-राय! आप लोगो को जानकर ये आश्चर्य होगा की शिवाजी महाराज का इतिहास कविद्र परमानंद नामक एक महान इतिहास शास्त्री ने लिखा है! छत्रपती का पराक्रमी इतिहास अपनी काव्यपूर्ण वाणी में लिपीबद्ध किया है कवी भूषण ने वो भी हिन्दी में जिसे “शिव-बावनी” कहते है! उनकी शिव-बावनी १९२० तक सारे भारतवासीयो को कंठस्त (Byheart) थी, इसके बहुतसे प्रमाण है! इस शिव-बावनी पर प्रतिबंध डालने का काम सब से पहले किसनी किया तो वो थे (भारत के इस्लामीकरण का सपना देखनेवाले) महान आत्मा गाँधी! उन्होंने एसा विचित्र कुतर्क दिया की “शिव-बावनी पर प्रतिबंध नही डाला गया तो मुस्लिमो की भावना आहत होगी जिससे वो स्वाधीनता संग्राम में भाग नही लेंगे”! इतना ही नही गाँधी ने छत्रपती शिवाजी को पथभ्रष्ट भी कहा था! (http://www.esamskriti.com/essay-chapters/Why-was-Gandhi-killed-(full)-2.aspx) दुर्भाग्य से गाँधी अपने षड्यंत्र में सफल हुए और हम शिव-बावनी को भूल गए! यदि हमारे वीर राष्ट्रपुरुषो का पराक्रम हम ना भूले होते किसी छुपे हुए “गंजे मुल्ले” में दम नही था की पाकिस्तान निर्माण कर सके!
ये वही गाँधी है जिहोने हिन्दुओ को भाषा के नाम पर तोड़ने के लिए “भाषा आधारित प्रान्त रचना” का षड्यंत्र रचा! वे इसे पुरा तो नही कर पाए किंतु उनकी उतराधिकारी गाझी-वंशी सत्ता (घियासुध्दीन गाझी का गुप्त इतिहास अवश्य पढ़े https://www.facebook.com/photo.php?fbid=359902477432206&set=pb.100002373698075.-2207520000.1413130730.&type=3&theater) में इस भाषा आधारित विद्वेष और घृणा को भारतवासीयो के बीच कूट कूट कर ठूसा गया!
शिवबावनी की एक रोमांचक झलक हम यहा प्रस्तुत कर रहे है! जो मरे हुए मृतक शरीर में भी प्राण फूंकने का सामर्थ्य रखता है!
इंद्र जिमि जृंभपर ! बाडव सुअंभपर !रावण सदंभपर !रघुकुल राज है !!
पौन वारिवाह पर !संभु रतिनाह पर !ज्यो सहसवाह पर !राम द्विज राज है !
दावा दृमदंड पर !चिता मृगझुंड पर !भूषण वितुंड पर !जैसे मृगराज है !!
तेज तमंअंस पर !कन्न्ह जिमि कंस पर !त्यों म्लेंच्छ बंस पर !शेर शिवराज है !!
शेर शिवराज है !!शेर शिवराज है !!शेर शिवराज है !!शेर शिवराज है !!
ये काव्य भूषणवी बोली में है जो ३५० वर्षो पहले की हिन्दी का रूप है! इसका अनुवाद नीचे दिया गया है!
जैसे जम्भासुर राक्षस पर इंद्र और दशानन रावण पर प्रभु श्री राम भरी है!
जैसे पवन की गती के आगे कोई नही टिक सकता और जिस प्रकार भगवान शिवा ने कामदेव को भस्म किया!
जिसक प्रकार सैकड़ो की झुण्ड में भैसे की गर्द को सिंह दबोच लेता है और हिरणों के झुण्ड पर चिता सवार होता है!
जैसे पापी कंस के छाती पर चढ़ कर कृष्ण उसका वध कर दता है!
ठीक वैसे ही सारे मलेच्छ वंश (अर्थात सारे जिहादियो सुलतान बादशाहों) के छाती पर चढ़ कर शेर शिवाजी उनका वध अकेले ही करते है!
क्यों है न प्रेरणादाई? जिहादी गाँधी मुर्ख नही थे जो इसपर प्रतिबंध लगाया!
आज हम उस असत्य भाषा वाद की दीवारों को गिरा कर छत्रपती शिवाजी को हिन्दूहृदय सम्राट के रूप में प्रत्येक हिन्दू के हृदय में विराजीत करेंगे! यही संकल्प है इस लेखमाला का! क्या आप साथ देंगे?

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पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी


पिताजी के अचानक आ धमकने से पत्नी तमतमा उठी….“लगता है, बूढ़े को पैसों की ज़रूरत आ पड़ी है,
वर्ना यहाँ कौन आने वाला था… अपने पेट का गड्ढ़ा भरता नहीं, घरवालों का कहाँ से भरोगे ?”

मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखने लगा।
पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर कर रहे थे।

इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता फट चुका है।वह स्कूल जाते वक्त रोज भुनभुनाता है।पत्नी के इलाज के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं।

बाबूजी को भी अभी आना था।
घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी।खाना खा चुकने पर
पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया।मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आये होंगे….
पिताजी कुर्सी पर उठ कर बैठ गए। एकदम बेफिक्र…!!!
“ सुनो ” कहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा।
मैं सांस रोक कर उनके मुँह की ओर देखने लगा।

रोम-रोम कान बनकर
अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था।

वे बोले… “ खेती के काम में घड़ी भर भी फुर्सत नहीं मिलती।इस बखत काम का जोर है।रात की गाड़ी से
वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक
नहीं मिली… जब तुम
परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो।
उन्होंने जेब से सौ-सौ के पचास
नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए, “रख लो।
तुम्हारे काम आएंगे। धान की फसल अच्छी हो गई थी।
घर में कोई दिक्कत नहीं है तुम बहुत कमजोर लग रहे हो।ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो।
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
शब्द जैसे मेरे हलक में फंस कर रह गये हों।मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार
से डांटा…“ले लो, बहुत बड़े हो गये हो क्या ..?”
“ नहीं तो।” मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने
के लिए इसी तरह हथेली पर अठन्नी टिका देते थे, पर तब
मेरी नज़रें आजकी तरह झुकी नहीं होती थीं।
दोस्तों एक बात हमेशा ध्यान रखे… माँ बाप अपने बच्चो पर बोझ हो सकते हैं बच्चे उन पर बोझ कभी नही होते है।

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कहानी एक राजपूत वीर की जिसने सिख साम्राज्य की पूर्ण स्थापना की।


कहानी एक राजपूत वीर की जिसने सिख साम्राज्य की पूर्ण स्थापना की। ……ये पहले पंजाब के ऐसे सेनापति थे जिन्होंने मुगलो के अजय होने का भ्रम तोडा

हम बात कर रहे है वीर बाँदा सिंह बहादुर की बाबा बन्दा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के राजौरी क्षेत्र में 1670 ई. तदनुसार विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 को हुआ था। वह राजपूतों के (मिन्हास) भारद्वाज गोत्र से सम्बद्ध था और उसका वास्तविक नाम लक्ष्मणदेव था। 15 वर्ष की उम्र में वह जानकीप्रसाद नाम के एक बैरागी का शिष्य हो गया और उसका नाम माधोदास पड़ा। तदन्तर उसने एक अन्य बाबा रामदास बैरागी का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहे । वहाँ एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड क्षेत्र को चला गया जहाँ गोदावरी के तट पर उसने एक आश्रम की स्थापना की।

जब गुरु गोविन्द सिंह जी की मुगलो से पराजय हुयी और उनके दो सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या कर दी गयी इससे विचलित होकर वे दक्षिण की और चले गए 3 सितंबर, 1708 ई. को नान्देड में सिक्खों के दसवें गुरु गुरु गोबिन्द सिंह ने इस आश्रम को देखा और वह वो लक्ष्मण देव (बाँदा बहादुर) से मिले और उन्हें अपने साथ चले के लिए कहा और उपदेश दिया की “”राजपूत अगर सन्याशी बनेगा तोह देश धर्म को कौन बचाएगा राजपूत का पहला कर्तव्य रक्षा करना है”” “”गुरुजी ने उन्हें उपदेश दिया अनाथ अबलाये तुमसे रक्षा की आशा करती है, गो माता मलेक्षो की छुरियो क़े नीचे तडपती हुई तुम्हारी तरफ देख रही है, हमारे मंदिर ध्वस्त किये जा रहे है, यहाँ किस धर्म की आराधना कर रहे हो तुम एक बीर अचूक धनुर्धर, इस धर्म पर आयी आपत्ति काल में राज्य छोड़कर तपस्वी हो जाय””
पंजाब में सिक्खों की दारुण यातना तथा गुरु गोबिन्द सिंह के सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या ने लक्ष्मण देव जी को अत्यन्त विचलित कर दिया। गुरु गोबिन्द सिंह के आदेश से ही वह पंजाब आये, गुरु गोविन्द सिंह ने स्वयं उन्हें अपनी तलवार प्रदान की गुरु गोविन्द सिंह ने उन्हें नया नाम बाँदा दिया और लक्ष्मण देव हिन्दू धरम की रक्षा के लिए सिख धरम में दीक्षित हुए
छद्म वेशी तुर्कों ने धोखे से गुरुगोविन्द सिंह की हत्या करायी, बन्दा को पंजाब पहुचने में लगभग चार माह लग गया सभी शिक्खो में यह प्रचार हो गया की गुरु जी ने बन्दा को उनका जत्थेदार यानी सेनानायक बनाकर भेजा है देखते-देखते सेना गठित हो गयी
सिक्खों के सहयोग से मुगल अधिकारियों को पराजित करने में सफल हुआ। मई, 1710 में उसने सरहिंद को जीत लिया और सतलुज नदीके दक्षिण में सिक्ख राज्य की स्थापना की। उसने खालसा के नाम से शासन भी किया और गुरुओं के नाम के सिक्के चलवाये। सिंह ने अपने राज्य के एक बड़े भाग पर फिर से अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया। 1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फर्रुखसियर की शाही फौज ने अब्दुल समद खाँ के नेतृत्व में उसे गुरुदासपुर जिले के धारीवाल क्षेत्र के निकट गुरुदास नंगल गाँव में कई मास तक घेरे रखा। खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उसने 7 दिसम्बर को आत्मसमर्पण कर दिया। फरवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ वहदिल्ली लाया गया जहाँ 5 मार्च से 13 मार्च तक प्रति दिन 100 की संख्या में सिक्खों को फाँसी दी गयी। 16 जून को बादशाह फर्रुखसियर के आदेश से बन्दा सिंह तथा उसके मुख्य सैन्य-अधिकारियों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये।

Banda Bahadur, a Rajput warrior who lead the Khalsa armies against the Mughal empire and founded the first independent Sikh kingdom.His real name was lakshman das (27 October 1670 – 9 June 1716 Delhi) he native from Rajori Town born in minhas rajput family.

At age 15 he left home to become an ascetic, and was given the name ‘’Madho Das’’. He established a monastery at Nāndeḍ, on the bank of the river Godāvarī, where in September 1708 he was visited by, and became a disciple of, Guru Gobind Singh, who gave him the new name of Banda Singh Bahadur. Armed with the blessing and authority of Gobind Singh, he assembled a fighting force and led the struggle against the Mughal Empire. His first major action was the sack of the Mughal provincial capital, Samana, in November 1709.[2] After establishing his authority in Punjab, Banda Singh Bahadur abolished the zamindari system, and granted property rights to the tillers of the land. He was captured by the Mughals and tortured to death in 1716.

कहानी एक राजपूत वीर की जिसने सिख साम्राज्य की पूर्ण स्थापना की। ……ये पहले पंजाब के ऐसे सेनापति थे जिन्होंने मुगलो के अजय होने का भ्रम तोडा 

हम बात कर रहे है वीर बाँदा सिंह बहादुर की बाबा बन्दा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के राजौरी क्षेत्र में 1670 ई. तदनुसार विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 को हुआ था। वह राजपूतों के (मिन्हास) भारद्वाज गोत्र से सम्बद्ध था और उसका वास्तविक नाम लक्ष्मणदेव था। 15 वर्ष की उम्र में वह जानकीप्रसाद नाम के एक बैरागी का शिष्य हो गया और उसका नाम माधोदास पड़ा। तदन्तर उसने एक अन्य बाबा रामदास बैरागी का शिष्यत्व ग्रहण किया और कुछ समय तक पंचवटी (नासिक) में रहे । वहाँ एक औघड़नाथ से योग की शिक्षा प्राप्त कर वह पूर्व की ओर दक्षिण के नान्देड क्षेत्र को चला गया जहाँ गोदावरी के तट पर उसने एक आश्रम की स्थापना की।

जब गुरु गोविन्द सिंह जी की मुगलो से पराजय हुयी और उनके दो सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या कर दी गयी इससे विचलित होकर वे दक्षिण की और चले गए 3 सितंबर, 1708 ई. को नान्देड में सिक्खों के दसवें गुरु गुरु गोबिन्द सिंह ने इस आश्रम को देखा और वह वो लक्ष्मण देव (बाँदा बहादुर) से मिले और उन्हें अपने साथ चले के लिए कहा और उपदेश दिया की “”राजपूत अगर सन्याशी बनेगा तोह देश धर्म को कौन बचाएगा राजपूत का पहला कर्तव्य रक्षा करना है”” “”गुरुजी ने उन्हें उपदेश दिया अनाथ अबलाये तुमसे रक्षा की आशा करती है, गो माता मलेक्षो की छुरियो क़े नीचे तडपती हुई तुम्हारी तरफ देख रही है, हमारे मंदिर ध्वस्त किये जा रहे है, यहाँ किस धर्म की आराधना कर रहे हो तुम एक बीर अचूक धनुर्धर, इस धर्म पर आयी आपत्ति काल में राज्य छोड़कर तपस्वी हो जाय””
पंजाब में सिक्खों की दारुण यातना तथा गुरु गोबिन्द सिंह के सात और नौ वर्ष के शिशुओं की नृशंस हत्या ने लक्ष्मण देव जी को अत्यन्त विचलित कर दिया। गुरु गोबिन्द सिंह के आदेश से ही वह पंजाब आये, गुरु गोविन्द सिंह ने स्वयं उन्हें अपनी तलवार प्रदान की गुरु गोविन्द सिंह ने उन्हें नया नाम बाँदा दिया और लक्ष्मण देव हिन्दू धरम की रक्षा के लिए सिख धरम में दीक्षित हुए 
छद्म वेशी तुर्कों ने धोखे से गुरुगोविन्द सिंह की हत्या करायी, बन्दा को पंजाब पहुचने में लगभग चार माह लग गया सभी शिक्खो में यह प्रचार हो गया की गुरु जी ने बन्दा को उनका जत्थेदार यानी सेनानायक बनाकर भेजा है देखते-देखते सेना गठित हो गयी
सिक्खों के सहयोग से मुगल अधिकारियों को पराजित करने में सफल हुआ। मई, 1710 में उसने सरहिंद को जीत लिया और सतलुज नदीके दक्षिण में सिक्ख राज्य की स्थापना की। उसने खालसा के नाम से शासन भी किया और गुरुओं के नाम के सिक्के चलवाये। सिंह ने अपने राज्य के एक बड़े भाग पर फिर से अधिकार कर लिया और इसे उत्तर-पूर्व तथा पहाड़ी क्षेत्रों की ओर लाहौर और अमृतसर की सीमा तक विस्तृत किया। 1715 ई. के प्रारम्भ में बादशाह फर्रुखसियर की शाही फौज ने अब्दुल समद खाँ के नेतृत्व में उसे गुरुदासपुर जिले के धारीवाल क्षेत्र के निकट गुरुदास नंगल गाँव में कई मास तक घेरे रखा। खाद्य सामग्री के अभाव के कारण उसने 7 दिसम्बर को आत्मसमर्पण कर दिया। फरवरी 1716 को 794 सिक्खों के साथ वहदिल्ली लाया गया जहाँ 5 मार्च से 13 मार्च तक प्रति दिन 100 की संख्या में सिक्खों को फाँसी दी गयी। 16 जून को बादशाह फर्रुखसियर के आदेश से बन्दा सिंह तथा उसके मुख्य सैन्य-अधिकारियों के शरीर काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये।

Banda Bahadur, a Rajput warrior who lead the Khalsa armies against the Mughal empire and founded the first independent Sikh kingdom.His real name was lakshman das (27 October 1670 – 9 June 1716 Delhi) he native from Rajori Town born in minhas rajput family. 

At age 15 he left home to become an ascetic, and was given the name ‘’Madho Das’’. He established a monastery at Nāndeḍ, on the bank of the river Godāvarī, where in September 1708 he was visited by, and became a disciple of, Guru Gobind Singh, who gave him the new name of Banda Singh Bahadur. Armed with the blessing and authority of Gobind Singh, he assembled a fighting force and led the struggle against the Mughal Empire. His first major action was the sack of the Mughal provincial capital, Samana, in November 1709.[2] After establishing his authority in Punjab, Banda Singh Bahadur abolished the zamindari system, and granted property rights to the tillers of the land. He was captured by the Mughals and tortured to death in 1716.
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पूरा नाम रानी चेन्नमा


 

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जन्म 23 अक्तूबर, 1778 ई.
जन्म भूमि कित्तूर, कर्नाटक
मृत्यु 21 फरवरी, 1829 ई.
अविभावक धूलप्पा और पद्मावती
पति/पत्नी राजा मल्लसर्ज
कर्म भूमि दक्षिण भारत
भाषा संस्कृत भाषा, कन्नड़ भाषा, मराठी भाषा और उर्दू भाषा
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी चेन्नम्मा ने लक्ष्मीबाई से पहले ही अंग्रेज़ों की सत्ता को सशस्त्र चुनौती दी थी और अंग्रेज़ों की सेना को उनके सामने दो बार मुँह की खानी पड़ी थी।

रानी चेन्नम्मा (जन्म- 23 अक्तूबर 1778, कित्तूर, कर्नाटक; मृत्यु- 21 फरवरी, 1829 ई.) का दक्षिण भारत के कर्नाटक में वही स्थान है जो स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का है। चेन्नम्मा ने लक्ष्मीबाई से पहले ही अंग्रेज़ों की सत्ता को सशस्त्र चुनौती दी थी और अंग्रेज़ों की सेना को उनके सामने दो बार मुँह की खानी पड़ी थी।
परिचय

‘चेन्नम्मा’ का अर्थ होता है- ‘सुंदर कन्या’। इस सुंदर बालिका का जन्म 23 अक्तूबर, 1778 ई. में दक्षिण के कित्तूर (कर्नाटक) नामक स्थान पर काकतीय राजवंश में हुआ था। पिता धूलप्पा और माता पद्मावती ने उसका पालन-पोषण राजकुल के पुत्रों की भाँति किया। उसे संस्कृत भाषा, कन्नड़ भाषा, मराठी भाषा और उर्दू भाषा के साथ-साथ घुड़सवारी, अस्त्र शस्त्र चलाने और युद्ध-कला की भी शिक्षा दी गई।
विवाह

चेन्नम्मा का विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्ज के साथ हुआ। कित्तूर उन दिनों मैसूर के उत्तर में एक छोटा स्वतंत्र राज्य था। परन्तु यह बड़ा संपन्न था। यहाँ हीरे-जवाहरात के बाज़ार लगा करते थे और दूर-दूर के व्यापारी आया करते थे। चेन्नम्मा ने एक पुत्र को जन्म दिया, पर उसकी जल्दी मृत्यु हो गई। कुछ दिन बाद राजा मल्लसर्ज भी चल बसे। तब उनकी बड़ी रानी रुद्रम्मा का पुत्र शिवलिंग रुद्रसर्ज गद्दी पर बैठा और चेन्नम्मा के सहयोग से राजकाज चलाने लगा। शिवलिंग के भी कोई संतान नहीं थी। इसलिए उसने अपने एक संबंधी गुरुलिंग को गोद लिया और वसीयत लिख दी कि राज्य का काम चेन्नम्मा देखेगी। शिवलिंग की भी जल्दी मृत्यु हो गई।
कित्तूर पर हमला

अंग्रेज़ों की नजर इस छोटे परन्तु संपन्न राज्य कित्तूर पर बहुत दिन से लगी थी। अवसर मिलते ही उन्होंने गोद लिए पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और वे राज्य को हड़पने की योजना बनाने लगे। आधा राज्य देने का लालच देकर उन्होंने राज्य के कुछ देशद्रोहियों को भी अपनी ओर मिला लिया। पर रानी चेन्नम्मा ने स्पष्ट उत्तर दिया कि उत्तराधिकारी का मामला हमारा अपना मामला है, अंग्रेज़ों का इससे कोई लेना-देना नहीं। साथ ही उसने अपनी जनता से कहा कि जब तक तुम्हारी रानी की नसों में रक्त की एक भी बूँद है, कित्तूर को कोई नहीं ले सकता। रानी का उत्तर पाकर धारवाड़ के कलेक्टर थैकरे ने 500 सिपाहियों के साथ कित्तूर का किला घेर लिया। 23 सितंबर, 1824 का दिन था। किले के फाटक बंद थे। थैकरे ने दस मिनट के अंदर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी। इतने में अकस्मात क़िले के फाटक खुले और दो हज़ार देशभक्तों की अपनी सेना के साथ रानी चेन्नम्मा मर्दाने वेश में अंग्रेज़ों की सेना पर टूट पड़ी। थैकरे भाग गया। दो देशद्रोही को रानी चेन्नम्मा ने तलवार के घाट उतार दिया। अंग्रेज़ों ने मद्रास और मुंबई से कुमुक मंगा कर 3 दिसंबर, 1824 को फिर कित्तूर का किला घेर डाला। परन्तु उन्हें कित्तूर के देशभक्तों के सामने फिर पीछे हटना पड़ा। दो दिन बाद वे फिर शक्तिसंचय करके आ धमके। छोटे से राज्य के लोग काफ़ी बलिदान कर चुके थे। चेन्नम्मा के नेतृत्व में उन्होंने विदेशियों का फिर सामना किया, पर इस बार वे टिक नहीं सके। रानी चेन्नम्मा को अंग्रेज़ों ने बंदी बनाकर जेल में डाल दिया। उनके अनेक सहयोगियों को फाँसी दे दी। कित्तूर की मनमानी लूट हुई।
मृत्यु

21 फ़रवरी, 1829 ई. को जेल के अंदर ही इस वीरांगना रानी चेन्नम्मा का देहांत हो गया।

 

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काली की वीरता…Add Poll10606192_874067785946515_5815902522474714091_n

राजस्थान के डूंगरपुर जिले के रास्तपाल गाँव की 19 जून, 1947 की घटना हैः

उस गाँव की 10 वर्षीय कन्या काली अपने खेत से चारा सिर पर उठाकर आ रही थी। हाथ में हँसिया था। उसने देखा कि ‘ट्रक के पीछे हमारे स्कूल के मास्टर साहब बँधे हैं और घसीटे जा रहे हैं।’

काली का शौर्य उभरा, वह ट्रक के आगे जा खड़ी हुई और बोलीः

“मेरे मास्टर को छोड़ दो।”

सिपाहीः “ऐ छोकरी ! रास्ते से हट जा।”

“नहीं हटूँगी। मेरे मास्टर साहब को ट्रक के पीछे बाँधकर क्यों घसीट रहे हो?”

“मूर्ख लड़की ! गोली चला दूँगा।”

सिपाहियों ने बंदूक सामने रखी। फिर भी उस बहादुर लड़की ने उनकी परवाह न की और मास्टर को जिस रस्सी से ट्रक से बाँधा गया था उसको हँसिये काट डाला !

लेकिन निर्दयी सिपाहियों ने, अंग्रेजों के गुलामों ने धड़ाधड़ गोलियाँ बरसायीं। काली नाम की उस लड़की का शरीर तो मर गया लेकिन उसकी शूरता अभी भी याद की जाती है।

काली के मास्टर का नाम था सेंगाभाई। उसे क्यों घसीटा जा रहा था? क्योंकि वह कहता था कि ‘इन वनवासियों की पढ़ाई बंद मत करो और इन्हें जबरदस्ती अपने धर्म से च्युत मत करो।’

अंग्रेजों ने देखा कि ‘यह सेंगाभाई हमारा विरोध करता है सबको हमसे लोहा लेना सिखाता है तो उसको ट्रक से बाँधकर घसीटकर मरवा दो।’

वे दुष्ट लोग गाँव के इस मास्टर की इस ढँग से मृत्यु करवाना चाहते थे कि पूरे डूंगरपुर जिले मे दहशत फैल जाय ताकि कोई भी अंग्रेजों के विरुद्ध आवाज न उठाये। लेकिन एक 10 वर्ष की कन्या ने ऐसी शूरता दिखाई कि सब देखते रह गये !

कैसा शौर्य ! कैसी देशभक्ति और कैसी धर्मनिष्ठा थी उस 10 वर्षीय कन्या की। बालको ! तुम छोटे नहीं हो।

हम बालक हैं तो क्या हुआ, उत्साही हैं हम वीर हैं।

हम नन्हें-मुन्ने बच्चे ही, इस देश की तकदीर हैं।।

तुम भी ऐसे बनो कि भारत फिर से विश्वगुरु पद पर आसीन हो जाय। आप अपने जीवनकाल में ही फिर से भारत को विश्वगुरु पद पर आसीन देखो…