Posted in हिन्दू पतन

समझिये कि धर्म को कैसे कमज़ोर किया जाता है ? नीचे दिखाया गया पोस्ट इसका एक सरल उदाहरण है ..


समझिये कि धर्म को कैसे कमज़ोर किया जाता है ? नीचे दिखाया गया पोस्ट इसका एक सरल उदाहरण है ..

सामान्य रूप से, प्रथम दृष्टया, देखने पर इसमें बहुत ही अच्छा सन्देश समझ आता है .. कितनी अच्छी बात है कि गरीबो पर ध्यान दिया जाए .. एक दम भावुक कि कोई इसके विपरीत बोलने की हिम्मत ना कर सकें ..

किन्तु प्यार से ज़हर पिलाया जा रहा यह दिखाई नहीं देता ..

चलिए मान लेते है कि उपरोक्त एक बहुत अच्छा सन्देश है .. तब क्यों न बहुत से त्यौहारो को ही मनाना ही छोड़ दे ? सब त्यौहार में बस एक ही काम करें .. गरीब बच्चो की सेवा में ही लगे रहे। फिर क्यों न महा-शिवरात्रि में शिवजी को दूध पिलाना भी छोड़ दें ? होली पर पानी व्यर्थ करना छोड़ दें ? दशहरा पर रावण का पुतला जलना भी छोड़ दें, वहाँ पर भी पंगत लगाकर गरीबो को भोजन दें.. दिवाली पर प्रकाश करना भी छोड़ दें, हवन करना भी छोड़ दें क्योकि उससे भी कुछ पैसे बचेंगे वो किसी मदरसे में दे देंगे वहां भी तो बच्चे पढ़ते है ।

कृपया हिन्दुओ को अपना ज्योहार अपने तरीके से मनाने दें, खुशियों के साथ। किसी के बाप का पैसा नहीं है कि हमें यह बताये कि हमारे त्योहारों में क्या क्या ना किया जाए | और न ही हम सब सिर्फ साधू संत है .. हम राजा भी है, क्षत्रिय भी है, वैश्य भी है, शूद्र भी है .. हमारे अपने शौक है .. हमारे अपने जीने का तरीका है .. हमारी अपनी परम्पराएँ है अपना समाज है अपना रीति-रिवाज है ..

गरीबो को खाना खिलने के लिए साल में और दिन भी होते है.. किसने मना किया आपको ? बस दिवाली की पटाखों, शिवरात्रि के दूध, और होली के पानी से ही गरीबो का पेट भरेगा ? सारे दुनिया के Pollution, गरीबी, कमज़ोर वर्ग का ठेका क्या बस हिन्दुओ के त्योहारों और परम्पराओ ने ही ले रखा है ? कुछ भी हो शुरू हो जाते है की ये मत करो वो करो ..

सेक्युलर / कम्युनिस्ट / इंटेलेक्चुअल लोगो के बिछाए जाल में न फंसे .. वरना ये आप को कहीं का भी नहीं छोड़ेंगे .. पैसा बचाने के लिए और भी तरीके है.. गरीबो की सेवा के और भी तरीके है .. कृपया त्यौहार के सामान्य तरीको से छेद-छाड़ न करें। हमें खुशियों से अपना त्यौहार मनाने दें.

मित्रो, कृपया सोचिये और देखिये क़ी पानी बचाने, दूध ना चडाने और पटाखे न चलाने में बहुत थोडा सा अंतर है.. किन्तु सबका सिर्फ एक ही मतलब है और वो है अपने धर्म और मान्यताओ को गलत साबित कर, संदेह पैदा करना और अपने आत्मविश्वास को कमज़ोर करना और आपका यह सन्देश ऐसा ही कर रहा है।

ये एक षड़यंत्र है हमारी मान्यताओ को गलत साबित करने का, हमारे तौर-तरीको पर प्रश्न चिन्ह लगाने का .. हमारे अन्दर अपने त्यौहार मनाने के प्रति संदेह पैदा करने का .. अनावश्यक बातो में, निरर्थक बहस में उलझाने का .. हिन्दू कोई गरीब नहीं है .. याद कीजिए अपने देवी-देवताओ को कि किनती शान-शौकत से रहते थे .. हमें अधिकार भी है और स्वतंत्रता भी कि हम अपने तरीके से खुशियाँ मनाये और धन-वैभव का प्रदर्शन भी करें .. बहुत हो चुका गरीबी, भुखमरी का रोना-धोना .. हिन्दुओ को अपनी आन-बान-शान से मानाने चाहिए .. धर्मार्थ कार्यो के साल में बहुत दिन होते है ..

कृपया चिंतन करें, सत्य आपको स्पष्ट दिखाई देने लगेगा।

समझिये कि धर्म को कैसे कमज़ोर किया जाता है ? नीचे दिखाया गया पोस्ट इसका एक सरल उदाहरण है ..

सामान्य रूप से, प्रथम दृष्टया, देखने पर इसमें बहुत ही अच्छा सन्देश समझ आता है .. कितनी अच्छी बात है कि गरीबो पर ध्यान दिया जाए .. एक दम भावुक कि कोई इसके विपरीत बोलने की हिम्मत ना कर सकें ..

किन्तु प्यार से ज़हर पिलाया जा रहा यह दिखाई नहीं देता ..

चलिए मान लेते है कि उपरोक्त एक बहुत अच्छा सन्देश है .. तब क्यों न बहुत से त्यौहारो को ही मनाना ही छोड़ दे ? सब त्यौहार में बस एक ही काम करें .. गरीब बच्चो की सेवा में ही लगे रहे। फिर क्यों न महा-शिवरात्रि में शिवजी को दूध पिलाना भी छोड़ दें ? होली पर पानी व्यर्थ करना छोड़ दें ? दशहरा पर रावण का पुतला जलना भी छोड़ दें, वहाँ पर भी पंगत लगाकर गरीबो को भोजन दें.. दिवाली पर प्रकाश करना भी छोड़ दें, हवन करना भी छोड़ दें क्योकि उससे भी कुछ पैसे बचेंगे वो किसी मदरसे में दे देंगे वहां भी तो बच्चे पढ़ते है ।

कृपया हिन्दुओ को अपना ज्योहार अपने तरीके से मनाने दें, खुशियों के साथ। किसी के बाप का पैसा नहीं है कि हमें यह बताये कि हमारे त्योहारों में क्या क्या ना किया जाए | और न ही हम सब सिर्फ साधू संत है .. हम राजा भी है, क्षत्रिय भी है, वैश्य भी है, शूद्र भी है .. हमारे अपने शौक है .. हमारे अपने जीने का तरीका है .. हमारी अपनी परम्पराएँ है अपना समाज है अपना रीति-रिवाज है ..

गरीबो को खाना खिलने के लिए साल में और दिन भी होते है.. किसने मना किया आपको ? बस दिवाली की पटाखों, शिवरात्रि के दूध, और होली के पानी से ही गरीबो का पेट भरेगा ? सारे दुनिया के Pollution, गरीबी, कमज़ोर वर्ग का ठेका क्या बस हिन्दुओ के त्योहारों और परम्पराओ ने ही ले रखा है ? कुछ भी हो शुरू हो जाते है की ये मत करो वो करो ..

सेक्युलर / कम्युनिस्ट / इंटेलेक्चुअल लोगो के बिछाए जाल में न फंसे .. वरना ये आप को कहीं का भी नहीं छोड़ेंगे .. पैसा बचाने के लिए और भी तरीके है.. गरीबो की सेवा के और भी तरीके है .. कृपया त्यौहार के सामान्य तरीको से छेद-छाड़ न करें। हमें खुशियों से अपना त्यौहार मनाने दें.

मित्रो, कृपया सोचिये और देखिये क़ी पानी बचाने, दूध ना चडाने और पटाखे न चलाने में बहुत थोडा सा अंतर है.. किन्तु सबका सिर्फ एक ही मतलब है और वो है अपने धर्म और मान्यताओ को गलत साबित कर, संदेह पैदा करना और अपने आत्मविश्वास को कमज़ोर करना और आपका यह सन्देश ऐसा ही कर रहा है।

ये एक षड़यंत्र है हमारी मान्यताओ को गलत साबित करने का, हमारे तौर-तरीको पर प्रश्न चिन्ह लगाने का .. हमारे अन्दर अपने त्यौहार मनाने के प्रति संदेह पैदा करने का .. अनावश्यक बातो में, निरर्थक बहस में उलझाने का .. हिन्दू कोई गरीब नहीं है .. याद कीजिए अपने देवी-देवताओ को कि किनती शान-शौकत से रहते थे .. हमें अधिकार भी है और स्वतंत्रता भी कि हम अपने तरीके से खुशियाँ मनाये और धन-वैभव का प्रदर्शन भी करें .. बहुत हो चुका गरीबी, भुखमरी का रोना-धोना .. हिन्दुओ को अपनी आन-बान-शान से मानाने चाहिए .. धर्मार्थ कार्यो के साल में बहुत दिन होते है ..

कृपया चिंतन करें, सत्य आपको स्पष्ट दिखाई देने लगेगा।

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