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ये दिल्ली है मेरी जान, इसमे कोई शक नहीं


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2 hrs ·

ये दिल्ली है मेरी जान, इसमे कोई शक नहीं कि ऐतिहासिक विरासत और शान-शौकत से भरपूर दिल्ली में कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान प्रगति की जो आंधी आई उससे दिल्ली की तस्वीर और तकदीर दोनों ही बदल गई। पर इसी चकाचौंध के पीछे एक ऐसा दाग भी है जो सदियों से दिल्ली का नासूर बना हुआ है। और वह है दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड। देश की आज़ादी के पहले से ही अंग्रेजों के जमाने में यहां मुजरे सुनने का चलन था और मुजरा करने वाली तवायफों को लाइसेंस भी मिला हुआ था। उस समय दिल्ली के चारों ओर फैले जिस्म के इस कारोबार को एक जगह इकट्ठा कर दिया गया और जीबी रोड बन गया जिस्म के कारोबार का अड्डा। जीबी रोड का पुरा नाम ग्रेस्टीस बेसीन रोड हैं, ऩई दिल्ली रेलवे स्टेशन से 100 मीटर की दुरी पर यह एरिया हैं ।पहले तयावफों का बाजार चावड़ी बाजार मे था बाद मे इसे शहर से बाहर कर दिया गया आज का जीबी रोड उस समय के वर्लड सिटी से बाहर का इलाका था ।
यह जी बी रोड पर मेरी तीसरी रिपोर्टिंग थी रविवार का दिन था नई दिल्ली पुलिस स्टेशन के एसएचओ सुरेन्द्र कौड़ से इजाजत लेने पुलिस थाने मैं जिस सोंच के साथ गयी थी बिल्कुल उसके उल्टा हुआ और जितना सुना था उनके बारे मे बिल्कुल वैसी हीं थी, क्योंकी मेरे पास कोई विडीयो कैमरा नहीं था इसलिए मुझे इजाजत मिल गइ, उन्होने एक सिपाही को मेरे साथ भेज दिया, मैं और उनका सिपाही दोनो लोग पहुंचे उस इलाके मे सिपाही ने वहां के पुलिस बुथ मे बैठे एक सिपाही से बात कि और मुझे लेकर वह एक कोठे के पास गया मेरे साथ उपर तक तो नहीं गया लेकिन एक लड़के को मेरे साथ भेज दिया उसे सारी बातें समझा दीं उसने वह लड़का अब मेरे साथ था । जिस दिल्ली पर लोग जान लुटा देते हैं हम उसी दिल्ली के एक ऐसे इलाके की बात कर रहे हैं जहां हर रोज ना जाने कितनी जानें जानें लुट जाती हैं, बैलगाडी से लेकर bmw तक इस रोड पर दिख जाती हैं बताने वाले ये बताते हैं कि 30 साल पहले जब यहां कि दुकानों के शटर बंद होते थे तब उनके शटर खुलते थे लेकिन अब यहां 27*7 सर्विस दी जाती हैं । 100 साल से भी पुरानी इमारतों मे बने तहखाने और कबुरतरखाने जैसी खिड़कियों से झांकती महिलाएं सड़क पर आने जाने वाले हर मुसाफिर मे अपना ग्राहक ढ़ुढ़ती हैं. हमने भी ये जानने की कोशिश की यह कौन सी जगह जहां रहने वालों की जिंदगी अंधेरे कमरो तक सिमट कर रह गई हैं यहां रहने वाले ना तो अपना नाम बता सकती हैं ना हीं अपना चेहरा किसी को दिखा सकती हैं आखिर वो कौन सी मजबुरी हैं जहां सबको अपनी पहचान छुपा कर रखनी पड़ती हैं, यकिन नहीं होता की हमारे इस महानगर मे एक ऐसा छेत्र भी हैं जहां से गुजरना अपने आप मे कइ तरह के सवालों से होकर गुजरना हैं, लगभग 100 से 200 मीटर लंबी सड़क हैं जीबी रोड लेकिन देह ब्यापार के धंधे ने इसे बाकी दिल्ली से जुदा कर दिया हैं ऐसा लगता हैं अपने हीं समाज से यह बिलकुल अलग हैं यहा रहने बाले लोगो को हेय दृष्टि से देखा जाता हैं
सड़क के दुसरी तरफ हर दो दुकान के बीच मे उपर जाने के लिए एक सिढ़ी मिल जाएगी जहां पहले हीं आपको दलालों से बचने की चेतावनी दिवारों पर लिखी मिल जाएगी पुरे जीबी रोड मे लगभग 28 सिढीयों मे 108 कोठें चल रहे हैं । सिढीयों के रास्ते मे बने बरामदेनुमे हॉल मे घुसा ज्यादातर औरतें सो रही थी, 2/4 के बक्सेनुमा कमरे मे रहना आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जिंदगी कैसे गुजर रही हैं उसी बक्से मे दो से तीन महिलाएं सो रही थी बक्सों के बीच मे एक कमरा दिखा जिसमे तमाम मजहबों के देवी देवताओं की तस्वीरें और एक पलंग के साथ दो कुर्सियां और जरुरत की तमाम चिजें उपल्ब्ध थी, देखने से ही समझ मे आ गया कि वो कमरा मालकिन हैं, आश्चर्य हुआ कि ये भी न्युज चैनलों पर न्यूज भी देखती हैं, पुछने पर पता चला कि देखना पड़ता हैं कि कहीं रेड तो नहीं पड़ा वैसे रेड डालने से पहले इनके पास खबर न्युज चैनलों से भी पहले पहुंच जाती हैं ।सड़क से उपर कि तरफ देखने पर जिस खिड़की पर महिलाएं इशारे करते दिखती हैं मैं भी वहीं जाकर खड़ी हो गयी निचे देखा तो कइयों की निगाह इस खिड़की पर टीकी थी, वही खड़ी एक लड़की से बात करने लगी , उसने बताया कि रेट ठिक ना मिलने पर या ज्यादा परेशानी होने पर वे कोठे बदल लेती हैं
यहां आकर पता चला कि सेक्स वर्कर के उत्थान के नाम पर करोड़ो की कमाइ करने वाले एनजीओ असल मे कितने सजग हैं इनकी बेहतरी के लिए जहां इंसान को बोरे मे ठुंस कर रहने को मजबुर कर दिया गया हो, छत पर बने पानी की टंकियों मे ताला लगा रहता हैं यकिन मानीए उन 2 बाई चार के कमरों मे दिन गुजारते अपनी पहचान छिपाने को मजबुर इन महिलाओं को सब उनकी जवानी की नजर से देखते हैं उन ग्राहकों के से कम नहीं हैं वे लोग जो इनके उत्थान और पुनर्वास की बात करते हैं । हर कोठे मे ताला लगा फ्रिज दिख जाएगा मतलब जर्जर मकानो मे भी फाइव स्टार होटलों की ब्यवस्था करने की इमानदार कोशिश नजर आती हैं, लता दीदी के साथ-साथ मुजरों की भी तस्वीरें दिखेगी और पहली बार जाना की यहां मुजरा भी होता हैं और ये बताती हैं मुजरों के शौकिन आज भी हैं लेकिन शाम होते ही मुजरे के का रंग बदल जाती हैं । जीबी रोड में हर रात नौ बजे के बाद मुजरा पेश करने वाली, उम्र की 45 वीं दहलीज पर पहुंच चुकी शहनाज कहती हैं, ‘मुझे आज भी वो दिन याद है, जब कोठा लोगों से गुलजार रहता था. आज हमारे लिए काफी कठिन समय है.’ राजस्थान की मूल निवासी शहनाज उन हसीन दिनों की याद करते हुए कहती हैं, ‘वह समय था जब हमें पार्टियों और शादियों में मुजरा के लिए कहा जाता था, आज इसके कुछ ही कद्रदान हैं. हर आदमी की ख्वाहिश है कि उसकी पार्टी में विदेशी महिला नृत्य करे और यह स्टेटस दिखाने की भी बात तो है. । हमारे साथ कैमरा नहीं था इसलिए जो भी मिली अपनी भाषा अपने लहजे मे खुलकर बात की, हमने उनके इस धंधे मे आने का कारण जानना चाहा और लगभग वही सुना जो पहले सुन रखा था इसलिए वो बताने का कोई तात्पर्य नहीं बनता । .
एक कोठे पर दो तीन लड़कियों से बात करते-करते एक लड़की ने कहा कि दीदी आप अपने दर्द से दोस्ती कर लिजीए आपकी जिंदगी आसान हो जाएगी, मैं भौचक रह गयी की कितनी बड़ी बात उसने की उस लड़की का नाम तो नहीं लिख सकती लेकिन मुझे मालुम था कि वो सही कह रही हैं और इसी उम्र मे इतनी बड़ी बात करना जैसे वो अपनी पुरी जिंदगी जी ली हो और एक लंबा अनुभव हो । मुझे जितना पता था कि जीबी रोड मे ज्यादातर बंगाल, झारखंड, और आसाम कि लड़कियां रहती हैं लेकिन सिर्फ तीन कोठें पर जाने के बाद देश के लगभग हर कोने कि लड़कियां और महिलाएं मिली, आंध्र प्रदेश से लेकर मुंबई और गुजरात हर राज्य कि मजबूरीयां इन कोठों मे कैद हैं । वहां कि कई महिलाएं अपने बच्चों को हॉस्टल मे रखती हैं औऱ हफ्ते मे एक दिन या महिने मे एक दिन उनसे मिलती हैं, एक महिला बताने लगी कि मैडम कोई नहीं चाहता कि उसके औलाद पर इसकी परछाई भी पड़े, उन्होने बताया कि कैसे नोंचा उनको जाता हैं और 100 रु मे सिर्फ 20 से 25 रु उनके हिस्से आती है बाकी सब अलग-अलग लोगों मे बंट जाती हैं । वे कहने लगी की कितनों दिनो से ये बात आपलोग भी कर रहे हैं और तमाम संस्थाएं कर रही हैं की इसे कानुनी अधिकार दे दिए जाए लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ, अगर हमे कानुनी अधिकार मिल जाएगा तो हमारी कमीशन कम हो जाएगी और पैसे भी ज्यादा बचेंगें तब हो सकता हैं कि हमारी स्थीति कुछ अच्छी हो जाए।
अंदर का मुआयना कर छत पर जाने पर देखा एक ब्यक्ति बर्तन धो रहा था पुछने पर पता चला वो रसोइया हैं, उसने बताया खाने का समय निर्धारित हैं दोपहर के 2 या 3 बजे और रात ढलने के बाद ठिक उसी समय इस बीच उन महिलाओं को कोई और खा रहा होता हैं । अनजानी लड़की को देखते हीं रसोइयां पुछ बैठा कौन हो यह क्या कर रही हो कोई चक्कर तो नहीं हैं, मैने उसे बताया कि नहीं ऐसा कुछ नहीं हैं मेरे साथ कोई और नहीं था । निचे आई तो वहां के दुकानदार बताने लगे कि सस्ता सामान बेचने के बावजुद दिन भर ग्राहकों का इंतजार रहता हैं, लोग इस इलाके मे आने के डर से महंगा समान खरिदना मंजुर करते हैं, जर्जर मकानों के निचे बने दुकानों मे एसी लगे होने के बाबजुद ग्राहकों का नहीं आना उस इलाके कि पहचान बयां करती हैं । दुकानदार ने बात करते हुए बताया कि अगर कोई रिस्तेदार पुछ ले कि आपकी दुकान कहां पर हैं तब बताते हुए भी शर्म आती हैं । तभी मेरे मन मे आया कि इसके आसपास के इलाके को जाने कि वहां रहने वाले लोग क्या कहते हैं मैने नीचे आकर सिपाही जी को कहा कि अब आप जा सकते हैं फिर मैं वहां से निकल पड़ी ।
जीबी रोड के ठिक पिछे का मोहल्ला हैं शाहगंज वहा पर यहां 400 साल पुरानी मस्जीद हैं और मुस्लीम बहुल इलाका हैं । यहां आकर जीबी रोड का असली दर्द आपको मालुम पड़ेगा । कइ लोगों से बात करने पर रहमान मुझे अपने घर ले गए, चाय मंगाइ और उनके अम्मीजान और दोनो बहने शादिया और फातिमा से बात करने लगा, शादिया दिल्ली युनीवर्सीटी की बीए की छात्रा हैं और बताने लगी की कैसे वो अपने दोस्तो को अपने घर नहीं बुला सकती, शादियां बताती हैं कि शुरु-शुरु मे तो जिसने भी मेरे घर का पता जाना तो सबने अजीब तरीके ब्यहार किया और पुछा कि तुम्हारा घर वहां हैं ऐसे चौंके जैसे हम किसी तरिपाड़ इलाके से आए हैं लेकिन सच ये भी हैं कि तरीपाड़ वाला इलाका भी इससे बेहतर हैं, उनकी अम्मी जान बोल पड़ी की शाम होने से पहले हमलोग घर आ जाते हैं भले हीं हमारा काम खत्म हो ना हो । शादिया बताने लगी कि उनके दोस्त इसलिए उसके घर नहीं आते की वे अपने घरवालों से क्या बताएंगें की कहां जा रहे हैं । एक बुजुर्ग मिले जो बताने लगे की शादी के कार्ड मे जीबी रोड का जिक्र नहीं करने से हमारे रिस्तेदार पहले ही मना कर देते हैं। इनका दर्द ऐसा हैं जो आज अपनी पहचान ढुढ रहे हैं, उनको तो अपने घर से भगा दिया गया इसलिए उनकी पहचान गुम हो गई लेकिन शाहगंज के निवासी तो समाजिक धारणाओं की वजह से अपनी पहचान छिपाने को मजबुर हैं आज के इस सफर मे हमने यहां आकर एक नई दुनीया और उसमे रहने वाले प्राणीयों को जानने का मौका मिला और एक सिख यहां हमे मिली की अगर आपको तकलीफ हैं, दर्द हैं, तो आप उससे दोस्ती कर ले आपकी जींदगी आसान बन जाएगी.

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