Posted in गौ माता - Gau maata

गौ वध होने से पहले इस पृथ्वी मे केवल तीन


गौ वध होने से पहले इस पृथ्वी मे केवल तीन
ही रोग थे ।इच्छा , बुढापा और मृत्यु ।
पाखण्डियों के बहकावे मे आकर , स्वार्थ
प्रेरित हो कुछ लोगों द्वारा तामसी यज्ञों मे
लाखों गौओं का वध होने से पाप व हाहाकार इतना बढ गया ,कि पृथ्वी मे रोगों की संख्या 98 हो गई ।यवन , हप्सी , मंगोल व म्लेच्छ आदि के द्वारा अभी भी सामूहिक रूप से गो वध जारी ही है ।

जिससे रोगों की संख्या अब 266 तक पहुँच
चुकी है ।अगर ऐसे ही गौ हत्या जारी रही ,
तो आने वाले कल मे पूरी पृथ्वी तरह तरह के
रोंगों से घिर जाएगी ।उस समय के लोग
भूलकर भी नरक की अलग से कल्पना नही कर पाएँगे ।पोंगा पण्डितों की तरह गाय की पूँछ पकडने व पूजा करने की जरूरत नहीं है ।आज के प्रदूषित वायुमण्डल को देखते हुए,
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उत्तम नस्ल की शुद्ध देशी गायों का संवर्धन व विकास जरूरी है ।क्योंकि ऐसी शुद्ध नस्ल की देशी गायों के पंचगव्य से पृथ्वी के वायुमण्डल की वायु व शरीर का शोधन होता है ।इतना ही नही पृथ्वी के वायुमण्डल के बाहर भी इसमे जीवन सुरक्षा हेतु पर्याप्त गुण मौजूद हैं ।

निवेदक आपका मित्र
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया
ज्वाइन us www.gokranti.com
Www.gokranti.in

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ही रोग थे ।इच्छा , बुढापा और मृत्यु ।
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लाखों गौओं का वध होने से पाप व हाहाकार इतना बढ गया ,कि पृथ्वी मे रोगों की संख्या 98 हो गई ।यवन , हप्सी , मंगोल व म्लेच्छ आदि के द्वारा अभी भी सामूहिक रूप से गो वध जारी ही है ।

जिससे रोगों की संख्या अब 266 तक पहुँच
चुकी है ।अगर ऐसे ही गौ हत्या जारी रही ,
तो आने वाले कल मे पूरी पृथ्वी तरह तरह के
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भूलकर भी नरक की अलग से कल्पना नही कर पाएँगे ।पोंगा पण्डितों की तरह गाय की पूँछ पकडने व पूजा करने की जरूरत नहीं है ।आज के प्रदूषित वायुमण्डल को देखते हुए,
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उत्तम नस्ल की शुद्ध देशी गायों का संवर्धन व विकास जरूरी है ।क्योंकि ऐसी शुद्ध नस्ल की देशी गायों के पंचगव्य से पृथ्वी के वायुमण्डल की वायु व शरीर का शोधन होता है ।इतना ही नही पृथ्वी के वायुमण्डल के बाहर भी इसमे जीवन सुरक्षा हेतु पर्याप्त गुण मौजूद हैं ।

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