Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

इतिहास की किताबों में लिखा है की चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शाशनका


इतिहास की किताबों में लिखा है की चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शाशनकाल 380 AD में शुरू हुआ था| क्या आपने कभी सोचा की जब हम सभी ने इसी चैत्र मास प्रतिपदा,30 मार्च को 2071 विक्रम संवत के रूप में नया वर्ष मनाया,तो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शाशनकाल 380 AD में कैसे हो सकता है ?
ये तो BC में होना चाहिए| हाँ सत्य ये है की विक्रमादित्य 102 BC में पैदा हुए थे और 15 AD तक भारतवर्ष का नाम दुनिया में रोशन किया था|उसी दौरान 57 BC में गद्दी संभाली तथा विक्रम संवत की स्थापना की | विदेशी इतिहासकारों को ,यहाँ के प्राचीन इतिहास और संस्कृति का पता नहीं था तो उन्होंने हमें उल्लू बना दिया और हम अभी भी उन्ही पन्नों में देख रहे हैं|

इतिहास की किताबों में लिखा है की चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शाशनकाल 380 AD में शुरू हुआ था| क्या आपने कभी सोचा की जब हम सभी ने इसी चैत्र मास प्रतिपदा,30 मार्च को 2071 विक्रम संवत के रूप में नया वर्ष मनाया,तो चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शाशनकाल 380 AD में कैसे हो सकता है ?
ये तो BC में होना चाहिए| हाँ सत्य ये है की विक्रमादित्य 102 BC में पैदा हुए थे और 15 AD तक भारतवर्ष का नाम दुनिया में रोशन किया था|उसी दौरान 57 BC में गद्दी संभाली तथा विक्रम संवत की स्थापना की | विदेशी इतिहासकारों को ,यहाँ के प्राचीन इतिहास और संस्कृति का पता नहीं था तो उन्होंने हमें उल्लू बना दिया और हम अभी भी उन्ही पन्नों में देख रहे हैं|
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रानी कलावती:-


आज हम आपको एक ऐसी क्षत्राणि की कथा बता रहे हे जिसने अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए
रानी कलावती:-
अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ?
अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | अंत:पुर में अपनी रानी से जब वह युद्ध के लिए विदा लेने गया तो उसकी रानी कलावती ने युद्ध में साथ चलने का निवेदन करते हुए कहा – ” स्वामी ! मैं आपकी जीवनसंगिनी हूँ,मुझे सदा संग रहने का अवसर प्रदान कीजिये |
सिंहनी के आघात अपने वनराज से दुर्बल भलें हों पर गीदड़ों व सियारों के संहार हेतु तो पर्याप्त है |
” कर्णसिंह ने अपनी वीर पत्नी की भावनाओं को समझते हुए उसे साथ चलने की अनुमति दे दी |
छोटी सी सेना का विशाल यवन सेना से मुकाबला था | रानी कलावती शस्त्र-सञ्चालन में निपुण थी |
अपने पति की पार्श्व रक्षा करती हुई वह शत्रु का संहार कर रही थी | इधर स्वाधीनता की रक्षा करने वाले वीर राजपूत मृत्यु का वरण करने को उत्सुक थे और उनके सामने थे वेतनभोगी यवन सैनिक |
घमासान युद्ध हो रहा था,इतने में एक आघात कर्णसिंह को लगा जिससे वे बेहोश हो गए | कलावती ने दोनों हाथों से शस्त्र सञ्चालन कर पति के आस-पास स्थित सारे शत्रु सैनिकों का सफाया कर दिया | युद्ध उत्साही क्षत्रिय सैनिको के आगे वेतनभोगी यवन सेना पराजित हुई |
विजय हासिल कर रानी कलावती अपने घायल पति को लेकर वापिस लौटी | राजवैध ने परिक्षण कर बताया कि विषैले शस्त्र से आहात होने के कारण राजा कर्णसिंह बेहोश हुए है,उनके विष को चूसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है |
विष चूसने वाले के जीवित रहने की सम्भावना कम थी क्योंकि शत्रु द्वारा प्रयुक्त जहर बहुत विषैला था | इससे पहले कि विष चूसने वाले की खोज की जाय,उसे तलाश करने का प्रयास किया जाय,रानी ने स्वयं उस मारक विष को चूस डाला |
विष चूसने की विधि में कलावती निपुण नहीं थी फिर भी पति के प्राणों की रक्षार्थ उसने अविलम्ब यह कार्य किया | जब राजा कर्णसिंह की बेहोशी टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले तो समीप ही पड़ी प्रेमप्रतिमा की मृत देह नजर आई |
अपने प्राणोंत्सर्ग कर पति के प्राणों की रक्षा करने वाली रानी कलावती का त्याग अविस्मरणीय व वन्दनीय है |

आज हम आपको एक ऐसी क्षत्राणि की कथा बता रहे हे जिसने अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए  अपने प्राण न्योछावर कर दिए
रानी कलावती:- 
अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ? 
अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | अंत:पुर में अपनी रानी से जब वह युद्ध के लिए विदा लेने गया तो उसकी रानी कलावती ने युद्ध में साथ चलने का निवेदन करते हुए कहा - " स्वामी ! मैं आपकी जीवनसंगिनी हूँ,मुझे सदा संग रहने का अवसर प्रदान कीजिये | 
सिंहनी के आघात अपने वनराज से दुर्बल भलें हों पर गीदड़ों व सियारों के संहार हेतु तो पर्याप्त है |
" कर्णसिंह ने अपनी वीर पत्नी की भावनाओं को समझते हुए उसे साथ चलने की अनुमति दे दी |
छोटी सी सेना का विशाल यवन सेना से मुकाबला था | रानी कलावती शस्त्र-सञ्चालन में निपुण थी | 
अपने पति की पार्श्व रक्षा करती हुई वह शत्रु का संहार कर रही थी | इधर स्वाधीनता की रक्षा करने वाले वीर राजपूत मृत्यु का वरण करने को उत्सुक थे और उनके सामने थे वेतनभोगी यवन सैनिक | 
घमासान युद्ध हो रहा था,इतने में एक आघात कर्णसिंह को लगा जिससे वे बेहोश हो गए | कलावती ने दोनों हाथों से शस्त्र सञ्चालन कर पति के आस-पास स्थित सारे शत्रु सैनिकों का सफाया कर दिया | युद्ध उत्साही क्षत्रिय सैनिको के आगे वेतनभोगी यवन सेना पराजित हुई |
विजय हासिल कर रानी कलावती अपने घायल पति को लेकर वापिस लौटी | राजवैध ने परिक्षण कर बताया कि विषैले शस्त्र से आहात होने के कारण राजा कर्णसिंह बेहोश हुए है,उनके विष को चूसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है |
विष चूसने वाले के जीवित रहने की सम्भावना कम थी क्योंकि शत्रु द्वारा प्रयुक्त जहर बहुत विषैला था | इससे पहले कि विष चूसने वाले की खोज की जाय,उसे तलाश करने का प्रयास किया जाय,रानी ने स्वयं उस मारक विष को चूस डाला | 
विष चूसने की विधि में कलावती निपुण नहीं थी फिर भी पति के प्राणों की रक्षार्थ उसने अविलम्ब यह कार्य किया | जब राजा कर्णसिंह की बेहोशी टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले तो समीप ही पड़ी प्रेमप्रतिमा की मृत देह नजर आई |
अपने प्राणोंत्सर्ग कर पति के प्राणों की रक्षा करने वाली रानी कलावती का त्याग अविस्मरणीय व वन्दनीय है |
Posted in हिन्दू पतन

Afghanistan


Afghanistan
संस्कृत भाषा के शब्द अश्वक (Aśvaka) जिसका अर्थ “घुड़सवार” है से जनित “अफ़्गानों की भूमि”; अरबी भाषा में افغان (Afġān) है और प्राकृत भाषा के शब्द आभगन (Avagānā)। यह देश घोड़ों की अपनी अच्छी नस्ल के लिए विख्यात था अतः फ़ारसी प्रत्यय ـستان -stan (स्तान/स्थान) जिसका मतलब जगह अथवा भूमि से है से मिलकर बना। यह नाम प्राचीन काल में कम्बोज के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया था।
Ahimsa
संस्कृत शब्द अहिंसा (ahimsā) इसका मूल है, जिसका मतलब है “हानिकारक नहीं” होने से है[1]
Ambarella
सिंहली: ඇඹරැල්ලා से बना जिसका मूल संस्कृत शब्द: अम्बरेल्ला है, यह एक पेड़ की नसल है।[2]
Amrita
इस शब्द की व्युत्पति संस्कृत शब्द अमृतम् (amrtam) से हुई, इसे अनन्त जीवन के लिए उपयुक्त शरबत अथवा पेय माना जाता है।[3]
Aniline
जर्मन शब्द: Anilin, फ़्रान्सीसी: Aniline और पुर्तगाली: Anil अरबी में النيل al-nili और फ़ारसी نیلا nila, का मूल संस्कृत शब्द नीली (nili) है।[4]
Aryan
लैटीन Ariana, यूनानी में Ἀρεία Areia, मूल रूप से संस्कृत शब्द आर्य (Arya-s) से बना है जिसका अर्थ “महान, माननीय” होता है।[5]
Asana
संस्कृत शब्द आसन (āsanam) से जनित जिसका अर्थ “बैठने का आसन” (seat) से है।[6]
Ashram
संस्कृत शब्द आश्रम (āsramah) से व्युत्पन्न, सामान्यतः एक धार्मिक आश्रम।[7]
Atoll
महल भाषा:އަތޮޅު, संस्कृत शब्द अंतला (antala) से जनित।[8]

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

Thiruchendur Murugan Temple, Tamil Nadu


Thiruchendur Murugan Temple, Tamil Nadu

Thiruchendur Murugan Temple (Tamil: திருச்செந்தூர் முருகன் கோவில்) is a Hindu temple complex dedicated to Lord Muruga. It is also one of the Arupadaiveedu (six major abodes) or Six sacred temple complexes of Kaumaram religion. It is the only one among the Six sacred temple complexes to be situated near the sea shore. Other five are situated in mountain region. The puranic name or historical name for this temple is jayanthipuram. It is one of the largest temple complexes (by area) of India and it is one of the most visited temple complex in India (devotees from countries like Singapore,Malaysia,Sri Lanka,England,Australia). It is the only temple in Tamilnadu which has a separate bus terminal and It is one of the temple which has separate parking facilities for devotees and tourists. The sannathi street of this temple is the longest of its kind among the temples of Tamilnadu. This is the only temple where Raja gopura is situated in western gate. This temple is the largest temple among all the temples built by saints. This temple is not constructed by Kings,it is built by three holy saints. It is one of the richest temple (by wealth) of TamilNadu.This is the only Hindu temple which has no Eastern gateway. This temple is the fourth Hindu temple in Tamil Nadu to get ISO certification. This is the only temple in tamilnadu where sanctum sanctorium is below the ground level.The 133 feet Rajagopura,built in the shores of Bay of Bengal,very near to the sea,just within 200 meters is still a mystery and an outstanding example for the Dravidian temple architecture and an example for extreme civil engineering of Ancient Tamils.

Thiruchendur Murugan Temple, Tamil Nadu

Thiruchendur Murugan Temple (Tamil: திருச்செந்தூர் முருகன் கோவில்) is a Hindu temple complex dedicated to Lord Muruga. It is also one of the Arupadaiveedu (six major abodes) or Six sacred temple complexes of Kaumaram religion. It is the only one among the Six sacred temple complexes to be situated near the sea shore. Other five are situated in mountain region. The puranic name or historical name for this temple is jayanthipuram. It is one of the largest temple complexes (by area) of India and it is one of the most visited temple complex in India (devotees from countries like Singapore,Malaysia,Sri Lanka,England,Australia). It is the only temple in Tamilnadu which has a separate bus terminal and It is one of the temple which has separate parking facilities for devotees and tourists. The sannathi street of this temple is the longest of its kind among the temples of Tamilnadu. This is the only temple where Raja gopura is situated in western gate. This temple is the largest temple among all the temples built by saints. This temple is not constructed by Kings,it is built by three holy saints. It is one of the richest temple (by wealth) of TamilNadu.This is the only Hindu temple which has no Eastern gateway. This temple is the fourth Hindu temple in Tamil Nadu to get ISO certification. This is the only temple in tamilnadu where sanctum sanctorium is below the ground level.The 133 feet Rajagopura,built in the shores of Bay of Bengal,very near to the sea,just within 200 meters is still a mystery and an outstanding example for the Dravidian temple architecture and an example for extreme civil engineering of Ancient Tamils.
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मित्रो,गत कुछ दशकोँ से छद्म सेकुलरवादियोँ द्वारा सूफी सन्तोँ को महिमामण्डित करने का जोरदार अभियान देश मेँ चल रहा है।


मित्रो,गत कुछ दशकोँ से छद्म सेकुलरवादियोँ द्वारा सूफी सन्तोँ को महिमामण्डित करने का जोरदार अभियान देश मेँ चल रहा है। इन कथित सूफी सन्तोँ के वार्षिक उर्सो पर राष्ट्रपति से प्रधानमत्रीँ तक भाग ले रहे है। इनकी दरगाहोँ के विस्तार एवं सौदर्यीकरण पर देश के शासकोँ ने अरबोँ रूपये खर्च किये। इन्हेँ धार्मिक भेदभाओँ से ऊपर उठकर सच्चा मानववादी बताया जाता है।खास बात यह है कि इनके मजारोँ पर हाजिरी देने वाले 80% लोग हिन्दू होते हैँ। मीडिया भी उन्हेँ राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप मेँ प्रस्तुत करता है।
परन्तु मित्रोँ, ऐतिहासिक तथ्योँ के अनुसार देश के अधिकांश तथाकथित सूफी सन्त इस्लाम के जोशीले प्रचारक थे।
हिन्दुओँ के धर्मान्तरण एवं उनके उपासना स्थलोँ को नष्ट करनेँ मेँ उन्होनेँ जोर शोर से भाग लिया था।
अजमेर के बहुचर्चित ‘सूफी’ ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को भला कौन नहीँ जानता! ‘सिरत अल् कुतुब’ के अनुसार उसने सात लाख हिन्दुओँ को मुसलमान बनाया था। ‘मजलिस सूफिया’ नामक ग्रन्थ के अनुसार जब वह मक्का मेँ हज करने के लिए गया था,तो उसे यह निर्देश दिया गया था कि वह हिन्दुस्तान जाये और वहाँ पर कुफ्र के अन्धकार को
दूर करके इस्लाम का प्रचार करे।
‘मराकत इसरार’ नामक एक ग्रन्थ के अनुसार उसने तीसरी शादी एक हिन्दू लड़की का जबरन् धर्मान्तरण करके की थी। यह बेबस महिता एक राजा की पुत्री थी,जो कि युद्ध मेँ चिश्ती मियाँ के हाथ लगी थी। उसने इसका नाम उम्मत अल्लाह रखा, जिससे एक पुत्री बीबी हाफिज जमाल पैदा हुई. जिसका मजार इसकी दरगाह मेँ मौजूद है।
‘तारीख-ए-औलिया’ के अनुसार ख्वाजा ने अजमेर के तत्कालीन शासक पृथ्वीराज को उनके गुरू अजीतपाल जोगी के माध्यम से मुसलमान बनने की दावत दी थी, जिसे उन्होनेँ ठुकरा दिया था।
इस पर ख्वाजा ने तैश मेँ आकर मुस्लिम शासक मुहम्मद गोरी को भारत पर हमला करने के लिए उकसाया था।

हमारे प्रश्न- मित्रो, मैँ पूछना चाहता हूँ कि यदि चिश्ती वास्तव मेँ सन्त था और सभी धर्मो को एक समान मानता था, तो उसे सात लाख हिन्दुओँ को मुसलमान बनाने की क्या जरूरत थी?
क्या यह मानवता है कि युद्ध मेँ पराजित एक किशोरी का बलात् धर्मान्तरण कर निकाह किया जाये?
यदि वह सर्व धर्म की एकता मेँ विश्वास रखता था, तो फिर उसने मोहम्मद गोरी को भारत पर हमला करने और हिन्दू मन्दिरोँ को ध्वस्त करने लिए क्योँ प्रेरित किया था?

मित्रोँ, ये प्रश्न ऐसे हैँ,जिन पर उन लोगोँ को गम्भीरता से विचार करना चाहिए जो कि ख्वाजा को एक सेकुलर ‘सन्त’ के रूप मेँ महिमामण्डित करने का जोरदार अभियान चला रहेँ हैँ। और विशेषत: हमारे हिन्दू भाई जरूर सत्य को पहचाने।

मित्रो,गत कुछ दशकोँ से छद्म सेकुलरवादियोँ द्वारा सूफी सन्तोँ को महिमामण्डित करने का जोरदार अभियान देश मेँ चल रहा है। इन कथित सूफी सन्तोँ के वार्षिक उर्सो पर राष्ट्रपति से प्रधानमत्रीँ तक भाग ले रहे है। इनकी दरगाहोँ के विस्तार एवं सौदर्यीकरण पर देश के शासकोँ ने अरबोँ रूपये खर्च किये। इन्हेँ धार्मिक भेदभाओँ से ऊपर उठकर सच्चा मानववादी बताया जाता है।खास बात यह है कि इनके मजारोँ पर हाजिरी देने वाले 80% लोग हिन्दू होते हैँ। मीडिया भी उन्हेँ राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप मेँ प्रस्तुत करता है।
परन्तु मित्रोँ, ऐतिहासिक तथ्योँ के अनुसार देश के अधिकांश तथाकथित सूफी सन्त इस्लाम के जोशीले प्रचारक थे।
हिन्दुओँ के धर्मान्तरण एवं उनके उपासना स्थलोँ को नष्ट करनेँ मेँ उन्होनेँ जोर शोर से भाग लिया था।
अजमेर के बहुचर्चित 'सूफी' ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को भला कौन नहीँ जानता! 'सिरत अल् कुतुब' के अनुसार उसने सात लाख हिन्दुओँ को मुसलमान बनाया था। 'मजलिस सूफिया' नामक ग्रन्थ के अनुसार जब वह मक्का मेँ हज करने के लिए गया था,तो उसे यह निर्देश दिया गया था कि वह हिन्दुस्तान जाये और वहाँ पर कुफ्र के अन्धकार को
दूर करके इस्लाम का प्रचार करे।
'मराकत इसरार' नामक एक ग्रन्थ के अनुसार उसने तीसरी शादी एक हिन्दू लड़की का जबरन् धर्मान्तरण करके की थी। यह बेबस महिता एक राजा की पुत्री थी,जो कि युद्ध मेँ चिश्ती मियाँ के हाथ लगी थी। उसने इसका नाम उम्मत अल्लाह रखा, जिससे एक पुत्री बीबी हाफिज जमाल पैदा हुई. जिसका मजार इसकी दरगाह मेँ मौजूद है।
'तारीख-ए-औलिया' के अनुसार ख्वाजा ने अजमेर के तत्कालीन शासक पृथ्वीराज को उनके गुरू अजीतपाल जोगी के माध्यम से मुसलमान बनने की दावत दी थी, जिसे उन्होनेँ ठुकरा दिया था।
इस पर ख्वाजा ने तैश मेँ आकर मुस्लिम शासक मुहम्मद गोरी को भारत पर हमला करने के लिए उकसाया था।

हमारे प्रश्न- मित्रो, मैँ पूछना चाहता हूँ कि यदि चिश्ती वास्तव मेँ सन्त था और सभी धर्मो को एक समान मानता था, तो उसे सात लाख हिन्दुओँ को मुसलमान बनाने की क्या जरूरत थी?
क्या यह मानवता है कि युद्ध मेँ पराजित एक किशोरी का बलात् धर्मान्तरण कर निकाह किया जाये?
यदि वह सर्व धर्म की एकता मेँ विश्वास रखता था, तो फिर उसने मोहम्मद गोरी को भारत पर हमला करने और हिन्दू मन्दिरोँ को ध्वस्त करने लिए क्योँ प्रेरित किया था?

मित्रोँ, ये प्रश्न ऐसे हैँ,जिन पर उन लोगोँ को गम्भीरता से विचार करना चाहिए जो कि ख्वाजा को एक सेकुलर 'सन्त' के रूप मेँ महिमामण्डित करने का जोरदार अभियान चला रहेँ हैँ। और विशेषत: हमारे हिन्दू भाई जरूर सत्य को पहचाने।
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रानी कलावती:-


आज हम आपको एक ऐसी क्षत्राणि की कथा बता रहे हे जिसने अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए
अपने प्राण न्योछावर कर दिए

रानी कलावती:-
अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ?
अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | अंत:पुर में अपनी रानी से जब वह युद्ध के लिए विदा लेने गया तो उसकी रानी कलावती ने युद्ध में साथ चलने का निवेदन करते हुए कहा – ” स्वामी ! मैं आपकी जीवनसंगिनी हूँ,मुझे सदा संग रहने का अवसर प्रदान कीजिये |
सिंहनी के आघात अपने वनराज से दुर्बल भलें हों पर गीदड़ों व सियारों के संहार हेतु तो पर्याप्त है |
” कर्णसिंह ने अपनी वीर पत्नी की भावनाओं को समझते हुए उसे साथ चलने की अनुमति दे दी |
छोटी सी सेना का विशाल यवन सेना से मुकाबला था | रानी कलावती शस्त्र-सञ्चालन में निपुण थी |
अपने पति की पार्श्व रक्षा करती हुई वह शत्रु का संहार कर रही थी | इधर स्वाधीनता की रक्षा करने वाले वीर राजपूत मृत्यु का वरण करने को उत्सुक थे और उनके सामने थे वेतनभोगी यवन सैनिक |
घमासान युद्ध हो रहा था,इतने में एक आघात कर्णसिंह को लगा जिससे वे बेहोश हो गए | कलावती ने दोनों हाथों से शस्त्र सञ्चालन कर पति के आस-पास स्थित सारे शत्रु सैनिकों का सफाया कर दिया | युद्ध उत्साही क्षत्रिय सैनिको के आगे वेतनभोगी यवन सेना पराजित हुई |
विजय हासिल कर रानी कलावती अपने घायल पति को लेकर वापिस लौटी | राजवैध ने परिक्षण कर बताया कि विषैले शस्त्र से आहात होने के कारण राजा कर्णसिंह बेहोश हुए है,उनके विष को चूसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है |
विष चूसने वाले के जीवित रहने की सम्भावना कम थी क्योंकि शत्रु द्वारा प्रयुक्त जहर बहुत विषैला था | इससे पहले कि विष चूसने वाले की खोज की जाय,उसे तलाश करने का प्रयास किया जाय,रानी ने स्वयं उस मारक विष को चूस डाला |
विष चूसने की विधि में कलावती निपुण नहीं थी फिर भी पति के प्राणों की रक्षार्थ उसने अविलम्ब यह कार्य किया | जब राजा कर्णसिंह की बेहोशी टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले तो समीप ही पड़ी प्रेमप्रतिमा की मृत देह नजर आई |
अपने प्राणोंत्सर्ग कर पति के प्राणों की रक्षा करने वाली रानी कलावती का त्याग अविस्मरणीय व वन्दनीय है |
आपको अगर हमारी पोस्ट बढ़िया लगे तो सभी पोस्ट सहरे जरूर करे

आज हम आपको एक ऐसी क्षत्राणि की कथा बता रहे हे जिसने अपने पति के प्राणो की रक्षा के लिए 
अपने प्राण न्योछावर कर दिए

रानी कलावती:- 
अल्लाउद्दीन खिलजी के सेनापति ने दक्षिण भारत पर विजय प्राप्त करने से पूर्व रास्ते में एक छोटे से राज्य के राजा कर्णसिंह को अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा | बिना युद्ध किये एक क्षत्रिय पराजय स्वीकार करले,यह कैसे संभव हो सकता है ? 
अत: कर्णसिंह ने यवनों से संघर्ष करने को तैयार हुआ | अंत:पुर में अपनी रानी से जब वह युद्ध के लिए विदा लेने गया तो उसकी रानी कलावती ने युद्ध में साथ चलने का निवेदन करते हुए कहा - " स्वामी ! मैं आपकी जीवनसंगिनी हूँ,मुझे सदा संग रहने का अवसर प्रदान कीजिये | 
सिंहनी के आघात अपने वनराज से दुर्बल भलें हों पर गीदड़ों व सियारों के संहार हेतु तो पर्याप्त है |
" कर्णसिंह ने अपनी वीर पत्नी की भावनाओं को समझते हुए उसे साथ चलने की अनुमति दे दी |
छोटी सी सेना का विशाल यवन सेना से मुकाबला था | रानी कलावती शस्त्र-सञ्चालन में निपुण थी | 
अपने पति की पार्श्व रक्षा करती हुई वह शत्रु का संहार कर रही थी | इधर स्वाधीनता की रक्षा करने वाले वीर राजपूत मृत्यु का वरण करने को उत्सुक थे और उनके सामने थे वेतनभोगी यवन सैनिक | 
घमासान युद्ध हो रहा था,इतने में एक आघात कर्णसिंह को लगा जिससे वे बेहोश हो गए | कलावती ने दोनों हाथों से शस्त्र सञ्चालन कर पति के आस-पास स्थित सारे शत्रु सैनिकों का सफाया कर दिया | युद्ध उत्साही क्षत्रिय सैनिको के आगे वेतनभोगी यवन सेना पराजित हुई |
विजय हासिल कर रानी कलावती अपने घायल पति को लेकर वापिस लौटी | राजवैध ने परिक्षण कर बताया कि विषैले शस्त्र से आहात होने के कारण राजा कर्णसिंह बेहोश हुए है,उनके विष को चूसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है |
विष चूसने वाले के जीवित रहने की सम्भावना कम थी क्योंकि शत्रु द्वारा प्रयुक्त जहर बहुत विषैला था | इससे पहले कि विष चूसने वाले की खोज की जाय,उसे तलाश करने का प्रयास किया जाय,रानी ने स्वयं उस मारक विष को चूस डाला | 
विष चूसने की विधि में कलावती निपुण नहीं थी फिर भी पति के प्राणों की रक्षार्थ उसने अविलम्ब यह कार्य किया | जब राजा कर्णसिंह की बेहोशी टूटी और उन्होंने अपने नेत्र खोले तो समीप ही पड़ी प्रेमप्रतिमा की मृत देह नजर आई |
अपने प्राणोंत्सर्ग कर पति के प्राणों की रक्षा करने वाली रानी कलावती का त्याग अविस्मरणीय व वन्दनीय है |
आपको अगर हमारी पोस्ट बढ़िया लगे तो सभी पोस्ट सहरे जरूर करे
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इतिहास के पन्नो से (पन्ना धाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान)


इतिहास के पन्नो से (पन्ना धाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान)
चित्र – बलुन्दा गढ़,पाली,राजस्थान
घटना – 16 वी शताब्दी (1734 विक्रम सवंत)

भारतीय इतिहास में खासकर राजस्थान के इतिहास में बलिदानों की गौरव गाथाओं की एक लम्बी श्रंखला है इन्ही गाथाओं में आपने मेवाड़ राज्य की स्वामिभक्त पन्ना धाय का नाम तो जरुर सुना होगा जिसने अपने दूध पिते पुत्र का बलिदान देकर चितौड़ के राजकुमार को हत्या होने से बचा लिया था | ठीक इसी तरह राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) राज्य के नवजात राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए मारवाड़ राज्य के बलुन्दा ठिकाने की रानी बाघेली ने अपनी नवजात दूध पीती राजकुमारी का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह के जीवन की रक्षा की व राजकुमार अजीतसिंह का औरंगजेब के आतंक के बावजूद लालन पालन किया, पर पन्नाधाय के विपरीत रानी बाघेली के इस बलिदान को इतिहासकारों ने अपनी कृतियों में जगह तो दी है पर रानी बाघेली के त्याग और बलिदान व जोधपुर राज्य के उतराधिकारी की रक्षा करने का वो एतिहासिक और साहित्यक सम्मान नहीं मिला जिस तरह पन्ना धाय को | रानी बाघेली पर लिखने के मामले में इतिहासकारों ने कंजूसी बरती है और यही कारण है कि रानी के इस अदम्य त्याग और बलिदान से देश का आमजन अनभिज्ञ है |
28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया | और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया | इन दोनों नवजात राजकुमारों व रानियों को लेकर जोधपुर के सरदार अपने दलबल के साथ अप्रेल 1679 में लाहौर से दिल्ली पहुंचे | तब तक औरंगजेब ने कूटनीति से पूरे मारवाड़ राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और जगह जगह मुग़ल चौकियां स्थापित कर दी और राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर राज्य के उतराधिकारी के तौर पर मान्यता देने में आनाकानी करने लगा |
तब जोधपुर के सरदार दुर्गादास राठौड़,बलुन्दा के ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास आदि ने औरंगजेब के षड्यंत्र को भांप लिया उन्होंने शिशु राजकुमार को जल्द जल्द से दिल्ली से बाहर निकलकर मारवाड़ पहुँचाने का निर्णय लिया पर औरंगजेब ने उनके चारों और कड़े पहरे बिठा रखे थे ऐसी परिस्थितियों में शिशु राजकुमार को दिल्ली से बाहर निकलना बहुत दुरूह कार्य था | उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी | उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई | यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |
छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |
यही राजकुमार अजीतसिंह बड़े होकर जोधपुर का महाराजा बने|इस तरह रानी बाघेली द्वारा अपनी कोख सूनी कर राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदलकर जोधपुर राज्य के उतराधिकारी को सुरक्षित बचा कर जोधपुर राज्य में वही भूमिका अदा की जो पन्ना धाय ने मेवाड़ राज्य के उतराधिकारी उदयसिंह को बचाने में की थी | हम कल्पना कर सकते है कि बलुन्दा ठिकाने की वह रानी बाघेली उस वक्त की नजाकत को देख अपनी पुत्री का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब के चुंगल से बचाकर मारवाड़ नहीं पहुंचाती तो मारवाड़ का आज इतिहास क्या होता?
नमन है भारतभूमि की इस वीरांगना रानी बाघेली जी और इनके इस अद्भुत त्याग व बलिदान को

इतिहास के पन्नो से (पन्ना धाय से कम न था रानी बाघेली का बलिदान)
चित्र - बलुन्दा गढ़,पाली,राजस्थान 
घटना - 16 वी शताब्दी (1734 विक्रम सवंत)  

भारतीय इतिहास में खासकर राजस्थान के इतिहास में बलिदानों की गौरव गाथाओं की एक लम्बी श्रंखला है इन्ही गाथाओं में आपने मेवाड़ राज्य की स्वामिभक्त पन्ना धाय का नाम तो जरुर सुना होगा जिसने अपने दूध पिते पुत्र का बलिदान देकर चितौड़ के राजकुमार को हत्या होने से बचा लिया था | ठीक इसी तरह राजस्थान के मारवाड़ (जोधपुर) राज्य के नवजात राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब से बचाने के लिए मारवाड़ राज्य के बलुन्दा ठिकाने की रानी बाघेली ने अपनी नवजात दूध पीती राजकुमारी का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह के जीवन की रक्षा की व राजकुमार अजीतसिंह का औरंगजेब के आतंक के बावजूद लालन पालन किया, पर पन्नाधाय के विपरीत रानी बाघेली के इस बलिदान को इतिहासकारों ने अपनी कृतियों में जगह तो दी है पर रानी बाघेली के त्याग और बलिदान व जोधपुर राज्य के उतराधिकारी की रक्षा करने का वो एतिहासिक और साहित्यक सम्मान नहीं मिला जिस तरह पन्ना धाय को | रानी बाघेली पर लिखने के मामले में इतिहासकारों ने कंजूसी बरती है और यही कारण है कि रानी के इस अदम्य त्याग और बलिदान से देश का आमजन अनभिज्ञ है |
28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद नामक सैनिक ठिकाने पर जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया था उनके निधन के समय उनके साथ रह रही दो रानियाँ गर्भवती थी इसलिए वीर शिरोमणि दुर्गादास सहित जोधपुर राज्य के अन्य सरदारों ने इन रानियों को महाराजा के पार्थिव शरीर के साथ सती होने से रोक लिया | और इन गर्भवती रानियों को सैनिक चौकी से लाहौर ले आया गया जहाँ इन दोनों रानियों ने 19 फरवरी 1679 को एक एक पुत्र को जन्म दिया,बड़े राजकुमार नाम अजीतसिंह व छोटे का दलथंभन रखा गया | इन दोनों नवजात राजकुमारों व रानियों को लेकर जोधपुर के सरदार अपने दलबल के साथ अप्रेल 1679 में लाहौर से दिल्ली पहुंचे | तब तक औरंगजेब ने कूटनीति से पूरे मारवाड़ राज्य पर कब्ज़ा कर लिया और जगह जगह मुग़ल चौकियां स्थापित कर दी और राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर राज्य के उतराधिकारी के तौर पर मान्यता देने में आनाकानी करने लगा |
तब जोधपुर के सरदार दुर्गादास राठौड़,बलुन्दा के ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास आदि ने औरंगजेब के षड्यंत्र को भांप लिया उन्होंने शिशु राजकुमार को जल्द जल्द से दिल्ली से बाहर निकलकर मारवाड़ पहुँचाने का निर्णय लिया पर औरंगजेब ने उनके चारों और कड़े पहरे बिठा रखे थे ऐसी परिस्थितियों में शिशु राजकुमार को दिल्ली से बाहर निकलना बहुत दुरूह कार्य था | उसी समय बलुन्दा के मोहकमसिंह की रानी बाघेली भी अपनी नवजात शिशु राजकुमारी के साथ दिल्ली में मौजूद थी वह एक छोटे सैनिक दल से हरिद्वार की यात्रा से आते समय दिल्ली में ठहरी हुई थी | उसने राजकुमार अजीतसिंह को बचाने के लिए राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदल लिया और राजकुमार को राजकुमारी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से निकालकर बलुन्दा ले आई | यह कार्य इतने गोपनीय तरीके से किया गया कि रानी ,दुर्गादास,ठाकुर मोहकम सिंह,खिंची मुकंदास,कु.हरिसिघ के अलावा किसी को कानों कान भनक तक नहीं लगी यही नहीं रानी ने अपनी दासियों तक को इसकी भनक नहीं लगने दी कि राजकुमारी के वेशभूषा में जोधपुर के राजकुमार अजीतसिंह का लालन पालन हो रहा है |
छ:माह तक रानी राजकुमार को खुद ही अपना दूध पिलाती,नहलाती व कपडे पहनाती ताकि किसी को पता न चले पर एक दिन राजकुमार को कपड़े पहनाते एक दासी ने देख लिया और उसने यह बात दूसरी रानियों को बता दी,अत: अब बलुन्दा का किला राजकुमार की सुरक्षा के लिए उचित न जानकार रानी बाघेली ने मायके जाने का बहाना कर खिंची मुक्न्दास व कु.हरिसिंह की सहायता से राजकुमार को लेकर सिरोही के कालिंद्री गाँव में अपने एक परिचित व निष्टावान जयदेव नामक पुष्करणा ब्रह्मण के घर ले आई व राजकुमार को लालन-पालन के लिए उसे सौंपा जहाँ उसकी (जयदेव)की पत्नी ने अपना दूध पिलाकर जोधपुर के उतराधिकारी राजकुमार को बड़ा किया |
यही राजकुमार अजीतसिंह बड़े होकर जोधपुर का महाराजा बने|इस तरह रानी बाघेली द्वारा अपनी कोख सूनी कर राजकुमार को अपनी राजकुमारी से बदलकर जोधपुर राज्य के उतराधिकारी को सुरक्षित बचा कर जोधपुर राज्य में वही भूमिका अदा की जो पन्ना धाय ने मेवाड़ राज्य के उतराधिकारी उदयसिंह को बचाने में की थी | हम कल्पना कर सकते है कि बलुन्दा ठिकाने की वह रानी बाघेली उस वक्त की नजाकत को देख अपनी पुत्री का बलिदान देकर राजकुमार अजीतसिंह को औरंगजेब के चुंगल से बचाकर मारवाड़ नहीं पहुंचाती तो मारवाड़ का आज इतिहास क्या होता?
नमन है भारतभूमि की इस वीरांगना रानी बाघेली जी और इनके इस अद्भुत त्याग व बलिदान को
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FRAUD OF BRITISHERS ON HINDU’S !!!


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21 hrs ·

JEWELS OF BHARATAM ….SERIES[TM]

FRAUD OF BRITISHERS ON HINDU’S !!!

FALSE SOMNATH TEMPLE GATES …………Hindus were temporarily hoodwinked by Britishers to think that sandalwood gates of somnath were :

1. Taken by Mohammd Gazni in 1024 .
2. The gates were attached to the building covering Mahmuds tomb at Ghazni .
3. Britishers Attacked and brought back it fo Agra in 1842.

This ruse was to find acceptability amongst the indian princess and public as positive response to the British rule …. but failed.

The gates were uprooted and brought back in triumph. But on arrival, they were found to be of Egyptian workmanship and not associated in any way with India. So they were placed in a store-room in the Agra Fort under the aegis of Archaeological Survey of India , and possibly by now have been eaten by white ants.

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Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक थे पण्डित जी और एक थी पण्डिताइन।


Vikas Khurana

एक थे पण्डित जी और एक थी पण्डिताइन।
पण्डित जी के मन में जातिवाद कूट-कूट करभरा था।
परन्तु पण्डिताइन समझदार थी।
समाज की विकृत रूढ़ियों को नही मानती थी।
एक दिन पण्डित जी को प्यास लगी।
संयोगवश् घर में पानी नही था। इसलिए पण्डिताइन पड़ोस से पानी ले आयी।
पानी पीकर पण्डित जी ने पूछा।)पण्डित जी- कहाँ से लाई हो।
बहुतठण्डा पानी है।
पण्डिताइन जी- पड़ोस के कुम्हार के घर से।
(पण्डित जी ने यह सुन कर लोटा फेंक दिया और उनके तेवर चढ़ गये।
वे जोर-जोर सेचीखने लगे।
पण्डित जी- अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट करदिया।
कुम्हार के घर का पानी पिला दिया।
(पण्डिताइन भय से थर-थर काँपने लगी,
उसनेपण्डित जी से माफी माँग ली।
पण्डिताइन- अब ऐसी भूल नही होगी।
शाम को पण्डित जी जब खाना खाने बैठे तो पण्डिताइन ने उन्हें सूखी रोटियाँ परसदी।
पण्डित जी- साग नही बनाया।
पण्डिताइन जी- बनाया तो था, लेकिन फेंकदिया।
क्योंकि जिस हाँडी में वो पकाया था,वो तो कुम्हार के घर की थी।
पण्डित जी- तू तो पगली है।
कहीं हाँडी मेंभी छूत होती है?
यह कह कर पण्डित जी ने दो-चार कौर खायेऔर बोले-
पण्डित जी- पानी तो ले आ।
पण्डिताइन जी- पानी तो नही है जी।
पण्डित जी- घड़े कहाँ गये ?
पण्डिताइन जी- वो तो मैंने फेंक दिये।
कुम्हारके हाथों से बने थे ना। पण्डित जी ने फिर दो-चार कौर खाये और बोले-
पण्डित जी- दूध ही ले आ।
उसमें ये सूखी रोटी मसल कर खा लूँगा।
पण्डिताइन जी- दूध भी फेंक दिया जी।
गायको जिस नौकर ने दुहा था,
वह भी कुम्हार ही था।
पण्डित जी- हद कर दी!
तूने तो, यह भी नही जानती दूध में छूत नही लगती।
पण्डिताइन जी- यह कैसी छूत है जी!जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध म ेंनही लगती।
पण्डित जी के मन में आया कि दीवार से सरफोड़ ले,
गुर्रा कर बोले-पण्डित जी- तूने मुझे चौपट कर दिया।
जा अब आँगन में खाट डाल दे। मुझे नींद आरही है।
पण्डिताइन जी- खाट! उसे तो मैंने तोड़ करफेंक दिया।
उसे नीची जात के आदमी नेेबुना था ना।
(पण्डित जी चीखे!)
पण्डित जी- सब मे आग लगा दो।
घर में कुछ बचा भी है या नही।
पण्डिताइन जी- हाँ! घर बचा है। उसेभी तोड़ना बाकी है।
क्योकि उसेभी तो नीची जाति के मजदूरों नेही बनाया है।
(पण्डित जी कुछ देर गुम-सुम खड़े रहे! फिरबोले-
पण्डित जी- तूने मेरी आँखें खोल दीं।
मेरी ना-समझी से ही सब गड़-बड़हो रही थी।
कोई भी छोटा बड़ा नही है।सभी मानव समान हैं ।

एक थे पण्डित जी और एक थी पण्डिताइन। पण्डित जी के मन में जातिवाद कूट-कूट करभरा था। परन्तु पण्डिताइन समझदार थी। समाज की विकृत रूढ़ियों को नही मानती थी। एक दिन पण्डित जी को प्यास लगी। संयोगवश् घर में पानी नही था। इसलिए पण्डिताइन पड़ोस से पानी ले आयी। पानी पीकर पण्डित जी ने पूछा।)पण्डित जी- कहाँ से लाई हो। बहुतठण्डा पानी है। पण्डिताइन जी- पड़ोस के कुम्हार के घर से। (पण्डित जी ने यह सुन कर लोटा फेंक दिया और उनके तेवर चढ़ गये। वे जोर-जोर सेचीखने लगे। पण्डित जी- अरी तूने तो मेरा धर्म भ्रष्ट करदिया। कुम्हार के घर का पानी पिला दिया। (पण्डिताइन भय से थर-थर काँपने लगी, उसनेपण्डित जी से माफी माँग ली। पण्डिताइन- अब ऐसी भूल नही होगी। शाम को पण्डित जी जब खाना खाने बैठे तो पण्डिताइन ने उन्हें सूखी रोटियाँ परसदी। पण्डित जी- साग नही बनाया। पण्डिताइन जी- बनाया तो था, लेकिन फेंकदिया। क्योंकि जिस हाँडी में वो पकाया था,वो तो कुम्हार के घर की थी। पण्डित जी- तू तो पगली है। कहीं हाँडी मेंभी छूत होती है? यह कह कर पण्डित जी ने दो-चार कौर खायेऔर बोले- पण्डित जी- पानी तो ले आ। पण्डिताइन जी- पानी तो नही है जी। पण्डित जी- घड़े कहाँ गये ? पण्डिताइन जी- वो तो मैंने फेंक दिये। कुम्हारके हाथों से बने थे ना। पण्डित जी ने फिर दो-चार कौर खाये और बोले- पण्डित जी- दूध ही ले आ। उसमें ये सूखी रोटी मसल कर खा लूँगा। पण्डिताइन जी- दूध भी फेंक दिया जी। गायको जिस नौकर ने दुहा था, वह भी कुम्हार ही था। पण्डित जी- हद कर दी! तूने तो, यह भी नही जानती दूध में छूत नही लगती। पण्डिताइन जी- यह कैसी छूत है जी!जो पानी में तो लगती है, परन्तु दूध म ेंनही लगती। पण्डित जी के मन में आया कि दीवार से सरफोड़ ले, गुर्रा कर बोले-पण्डित जी- तूने मुझे चौपट कर दिया। जा अब आँगन में खाट डाल दे। मुझे नींद आरही है। पण्डिताइन जी- खाट! उसे तो मैंने तोड़ करफेंक दिया। उसे नीची जात के आदमी नेेबुना था ना। (पण्डित जी चीखे!) पण्डित जी- सब मे आग लगा दो। घर में कुछ बचा भी है या नही। पण्डिताइन जी- हाँ! घर बचा है। उसेभी तोड़ना बाकी है। क्योकि उसेभी तो नीची जाति के मजदूरों नेही बनाया है। (पण्डित जी कुछ देर गुम-सुम खड़े रहे! फिरबोले- पण्डित जी- तूने मेरी आँखें खोल दीं। मेरी ना-समझी से ही सब गड़-बड़हो रही थी। कोई भी छोटा बड़ा नही है।सभी मानव समान हैं ।
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लालकिला हिन्दुओ का लालकोट है


लालकिला हिन्दुओ का लालकोट है..शाहजहाँ और उसके पूर्वज विदेशी मजहब के लुटेरे,हत्यारे थे…जहाँ से विदेशी मजहब का जन्म हुआ वहा तो एक भी ईमारत लाल किला,कुतुबमीनार,ताजमहल जैसा नहीं बनवा सका .तो क्या खाक बनवाएगा ?
# लालकिला का असली नाम लालकोट हैं #
जैसे ताजमहल का असली नाम तेजोमहालय है और क़ुतुब मीनार का असली नाम विष्णु स्तम्भ है वैसे ही यह बात भी सत्य है|
– अक्सर हमें यह पढाया जाता है कि दिल्ली का लालकिला शाहजहाँ ने बनवाया था| लेकिन यह एक सफ़ेद झूठ है और इतिहासकारों का कहना है की वास्तव में लालकिला पृथ्वीराज ने बारहवीं शताब्दी में पूरा बनवाया था जिसका नाम “लाल कोट “था जिसे तोमर वंश के शासक ‘अनंग पाल’ ने १०६० में बनवाना शुरू किया था |महाराज अनंगपाल तोमर और कोई नहीं बल्कि महाभारत के अभिमन्यु के वंशज तथा महाराज पृथ्वीराज चौहान के नाना जी थे|
इसका प्रमाण >
तारीखे फिरोजशाही के पृष्ट संख्या 160 (ग्रन्थ ३) में लेखक लिखता है कि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल ( लाल प्रासाद/ महल ) कि ओर बढ़ा और वहां उसने आराम किया.
>अकबरनामा और अग्निपुराण दोनों ही जगह इस बात के वर्णन हैं कि महाराज अनंगपाल ने ही एक भव्य और आलिशान दिल्ली का निर्माण करवाया था.
> शाहजहाँ से 250 वर्ष पहले ही 1398 ईस्वी में तैमूरलंग ने भी पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया हुआ है (जो कि शाहजहाँ द्वारा बसाई बताई जाती है).
– लाल किले के एक खास महल मे वराह के मुँह वाले चार नल अभी भी लगे हुए हैं क्या शाहजहाँ सूअर के मुंह वाले नल को लगवाता ? हिन्दू ही वराह को अवतार मान कर पावन मानते है|
– किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है क्योंकि राजपूत राजा गजो (हाथियों) के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे जबकि इस्लाम जीवित प्राणी के मूर्ति का विरोध करता है|
– लालकिला के दीवाने खास मे केसर कुंड नाम से एक कुंड भी बना हुआ है जिसके फर्श पर हिंदुओं मे पूज्य कमल पुष्प अंकित है| साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह है कि केसर कुंड एक हिंदू शब्दावली है जो कि हमारे राजाओ द्वारा केसर जल से भरे स्नान कुंड के लिए प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होती रही है|
– गुंबद या मीनार का कोई अस्तित्व तक नही है लालकिला के दीवानेखास और दीवानेआम मे| दीवानेखास के ही निकट राज की न्याय तुला अंकित है \ ब्राह्मणों द्वारा उपदेशित राजपूत राजाओ की न्याय तुला चित्र से प्रेरणा लेकर न्याय करना हमारे इतिहास मे प्रसिद्द है|
– दीवाने ख़ास और दीवाने आम की मंडप शैली पूरी तरह से 984 ईस्वी के अंबर के भीतरी महल (आमेर/पुराना जयपुर) से मिलती है जो कि राजपूताना शैली मे बना हुई है|
आज भी लाल किले से कुछ ही गज की दूरी पर बने हुए देवालय हैं जिनमे से एक लाल जैन मंदिर और दूसरा गौरीशंकर मंदिर है जो कि शाहजहाँ से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं के बनवाए हुए है|
– लाल किले के मुख्य द्वार के फोटो में बने हुए लाल गोले में देखिये , आपको अधिकतर ऐसी अलमारियां पुरानी शैली के हिन्दू घरो के मुख्य द्वार पर या मंदिरों में मिल जायंगी जिनपर गणेश जी विराजमान होते हैं |
-और फिर शाहजहाँ ने एक भी शिलालेख मे लाल किले का वर्णन तक नही है|

लालकिला हिन्दुओ का लालकोट है..शाहजहाँ और उसके पूर्वज विदेशी मजहब के लुटेरे,हत्यारे थे...जहाँ से विदेशी मजहब का जन्म हुआ वहा तो एक भी ईमारत लाल किला,कुतुबमीनार,ताजमहल जैसा नहीं बनवा सका .तो क्या खाक बनवाएगा ?
# लालकिला का असली नाम लालकोट हैं #
जैसे ताजमहल का असली नाम तेजोमहालय है और क़ुतुब मीनार का असली नाम विष्णु स्तम्भ है वैसे ही यह बात भी सत्य है|
- अक्सर हमें यह पढाया जाता है कि दिल्ली का लालकिला शाहजहाँ ने बनवाया था| लेकिन यह एक सफ़ेद झूठ है और इतिहासकारों का कहना है की वास्तव में लालकिला पृथ्वीराज ने बारहवीं शताब्दी में पूरा बनवाया था जिसका नाम “लाल कोट “था जिसे तोमर वंश के शासक ‘अनंग पाल’ ने १०६० में बनवाना शुरू किया था |महाराज अनंगपाल तोमर और कोई नहीं बल्कि महाभारत के अभिमन्यु के वंशज तथा महाराज पृथ्वीराज चौहान के नाना जी थे|
इसका प्रमाण >
तारीखे फिरोजशाही के पृष्ट संख्या 160 (ग्रन्थ ३) में लेखक लिखता है कि सन 1296 के अंत में जब अलाउद्दीन खिलजी अपनी सेना लेकर दिल्ली आया तो वो कुश्क-ए-लाल ( लाल प्रासाद/ महल ) कि ओर बढ़ा और वहां उसने आराम किया.
>अकबरनामा और अग्निपुराण दोनों ही जगह इस बात के वर्णन हैं कि महाराज अनंगपाल ने ही एक भव्य और आलिशान दिल्ली का निर्माण करवाया था.
> शाहजहाँ से 250 वर्ष पहले ही 1398 ईस्वी में तैमूरलंग ने भी पुरानी दिल्ली का उल्लेख किया हुआ है (जो कि शाहजहाँ द्वारा बसाई बताई जाती है).
- लाल किले के एक खास महल मे वराह के मुँह वाले चार नल अभी भी लगे हुए हैं क्या शाहजहाँ सूअर के मुंह वाले नल को लगवाता ? हिन्दू ही वराह को अवतार मान कर पावन मानते है|
- किले के एक द्वार पर बाहर हाथी की मूर्ति अंकित है क्योंकि राजपूत राजा गजो (हाथियों) के प्रति अपने प्रेम के लिए विख्यात थे जबकि इस्लाम जीवित प्राणी के मूर्ति का विरोध करता है|
- लालकिला के दीवाने खास मे केसर कुंड नाम से एक कुंड भी बना हुआ है जिसके फर्श पर हिंदुओं मे पूज्य कमल पुष्प अंकित है| साथ ही ध्यान देने योग्य बात यह है कि केसर कुंड एक हिंदू शब्दावली है जो कि हमारे राजाओ द्वारा केसर जल से भरे स्नान कुंड के लिए प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होती रही है|
- गुंबद या मीनार का कोई अस्तित्व तक नही है लालकिला के दीवानेखास और दीवानेआम मे| दीवानेखास के ही निकट राज की न्याय तुला अंकित है \ ब्राह्मणों द्वारा उपदेशित राजपूत राजाओ की न्याय तुला चित्र से प्रेरणा लेकर न्याय करना हमारे इतिहास मे प्रसिद्द है|
- दीवाने ख़ास और दीवाने आम की मंडप शैली पूरी तरह से 984 ईस्वी के अंबर के भीतरी महल (आमेर/पुराना जयपुर) से मिलती है जो कि राजपूताना शैली मे बना हुई है|
आज भी लाल किले से कुछ ही गज की दूरी पर बने हुए देवालय हैं जिनमे से एक लाल जैन मंदिर और दूसरा गौरीशंकर मंदिर है जो कि शाहजहाँ से कई शताब्दी पहले राजपूत राजाओं के बनवाए हुए है|
- लाल किले के मुख्य द्वार के फोटो में बने हुए लाल गोले में देखिये , आपको अधिकतर ऐसी अलमारियां पुरानी शैली के हिन्दू घरो के मुख्य द्वार पर या मंदिरों में मिल जायंगी जिनपर गणेश जी विराजमान होते हैं |
-और फिर शाहजहाँ ने एक भी शिलालेख मे लाल किले का वर्णन तक नही है|