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Patna ghandhi maidan


कुछ लोगों का कहना है कि कुछ लोगों के एक नाले में गिर जाने के बाद यह घटना हुई. कुछ लोग बिजली के करंट से लैस एक तार के गिरने की अफवाह और कुछ लोगों की ओर से भीड़ में फैलाई गई अफवाह की बात कर रहे हैं. घटना की विस्तृत जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.
प्रत्यक्षदर्शी मनीष कुमार ने बताया, ‘कुछ युवकों ने ‘भागो-भागो’ चिल्लाना शुरू कर दिया जिसके बाद लोगों में दहशत फैल गयी और भगदड़ मच गई. सैकड़ों महिलाएं और बच्चे गिर गए और अपनी जान बचाने के लिए भाग रही भीड़ के पैरों नीचे कुचले गए.

गांधी मैदान के दक्षिण की ओर यातायात और लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था.
घटना के गवाह होने का दावा करने वाले आइसक्रीम बेचने वाले सुमन और उसके दोस्तों- रंजीत कुमार तथा अजय प्रसाद ने बताया कि कुछ युवकों ने ऊपर लटकते बिजली के तारों के गिरने की अफवाह फैलाई, एक लटकते तार से उलझकर एक बुजुर्ग व्यक्ति का गिर पड़ना तथा बाहर निकलती भीड़ के धक्कामुक्की करने समेत कई चीजों के चलते भगदड़ मच गई.

एक पीड़ित प्रत्यक्षदर्शी महिला ने कहा की पुलिस लाठी नहीं चलाती तो इतनी भगदड़ नहीं होती !
गांधी मैदान के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर अपनी जान बचाने के लिए भागे चले गए थे और इनमें से कुछ सैंकड़ों की भीड़ के पैरों के नीचे रौंदे गए.’भगदड़ के बाद गांधी मैदान व मुख्य सड़क पर दूर-दूर तक चप्पलें, जूते, खिलौने बिखरे पड़े थे.

घटना के वक्त मौजूद लोगों के मुताबिक, गांधी मैदान के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित सड़क पर जिला पुलिस और वीआईपी की गाड़ियां खडी होने के कारण सड़क पर लोगों के लिए बहुत कम जगह थी.

शहर के लोगों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया कि दशहरा उत्सव समाप्त होने के बावजूद गांधी मैदान के निकासी द्वारों को लोगों के लिए नहीं खोला गया.
‘मैदान के 11 गेटों में से केवल दो निकासी के लिए थे और लोग बाहर निकलने के लिए एक दूसरे को रौंदे डाल रहे थे.’

व्यवस्था में लापरवाही ! :->

जब गांधी मैदान में रावण जल रहा था, तो मुख्यमंत्री गर्व से सीना ताने खड़े थे. शाम 6 बजकर 10 मिनट में रावण को ‘निपटाकर’ मुख्यमंत्री अपने गांव महकार के लिए रवाना हो गए, जो पटना से करीब 125 किलोमीटर है. उनकी रवानगी के 35 मिनट बाद जहां रावण जला, ठीक उसी मैदान के पास 33 जिंदगियां लापरवाही की भेंट चढ़ गईं. मुख्यमंत्री तो वक्त पर पहुंचे नहीं और उनके मंत्री जो सामने आए, उनका सारा ध्यान जीतन राम मांझी का बचाव करने में गुजर गया.जब लोगों को सरकार और सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत थी, तो सूबे के मुख्यमंत्री को तो छोड़िए, उनका कोई सिपहसालार भी वहां मौजूद नहीं था. घटना कोई दूर-दराज की नहीं, राजधानी पटना की थी. इसके बावजूद न तो समय पर एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता, न ही सरकार की ओर से कोई संजीदगी दिखी. आखिरकार देर रात मुख्यमंत्री आए.. हादसे का जायजा लेने की रस्म निभाई. हॉस्पीटल के भीतर गए, अधिकारियों से बात की और मीडिया के सामने आकर रटा-रटाया बयान दिया और फिर चले गए.

हैरान कर देने वाली खबर तो यह है कि हादसे की जगह से सटे मौर्या होटल में एक बड़े अधिकारी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही थी, जिसमें बिहार के कई आला अधिकारी और नेता शामिल थे. खबरों के मुताबिक हादसे के दो घंटे बाद तक पार्टी चलती रही. मौतों से बेपरवाह अधिकारी और नेता पार्टी का लुत्फ उठाते रहे, लेकिन किसी ने रंग में भंग नहीं होने दी.

जब सरकार अपंग हो, प्रशासन का नामोनिशान न हो, तो समझा जा सकता है कि इतना बड़ा आयोजन कैसे हो रहा होगा. गांधी मैदान में सालों से रावण दहन होता रहा है. लाखों की भीड़ जमा होती रही है. इस बार करीब 5 लाख की भीड़ थी, लेकिन पूरा आयोजन भगवान भरोसे रहा. न इतनी बड़ी भीड़ के लिए कोई खास बंदोबस्त था, न ही ट्रैफिक के लिए कोई इंतजाम. सड़कों पर घुप्प अंधेरा पसरा था, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं थी. जब बेसिक प्लानिंग नहीं थी, फिर आगे की कौन सोचे? ऐसी तैयारी की बात तो दूर-दूर तक नहीं सोची गई कि कोई हादसा हो भी सकता है या भगदड़ भी मच सकती है.

पटना में रावण दहन के बाद भीड़ में भगदड़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 33 हो गई है. 100 से ज्यादा घायल हुए लोगों का तत्परता से चिकित्सा करवाया जा रहा है. घायलों के परिजन चिकित्सालय के बाहर बिलख रहे हैं. जो अपनो को खो चुके हैं, वे शवगृह के बाहर रो रहे हैं. पूरा पटना महा नगर ही आंसुओं के ज्वार में डूबा हुआ है. जिंदगी के मेले से मौत के मुहल्ले में परिवर्तित हुए गांधी मैदान की पीड़ादायी दृश्य किसी को भी रुला देने के लिए काफी है. पूरी रात सदमे का साया पटना पर मंडराता रहा. जो लोग अपनों को खो चुके हैं, उनके लिए बीती रात का एक-एक घडी १०० वर्ष लग रहा थी. लोगों की चीख रह-रहकर शहर के सन्नाटे को चीर रही थी.

राम भरोसे …….

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कुछ लोगों का कहना है कि कुछ लोगों के एक नाले में गिर जाने के बाद यह घटना हुई. कुछ लोग बिजली के करंट से लैस एक तार के गिरने की अफवाह और कुछ लोगों की ओर से भीड़ में फैलाई गई अफवाह की बात कर रहे हैं. घटना की विस्तृत जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.
प्रत्यक्षदर्शी मनीष कुमार ने बताया, ‘कुछ युवकों ने ‘भागो-भागो’ चिल्लाना शुरू कर दिया जिसके बाद लोगों में दहशत फैल गयी और भगदड़ मच गई. सैकड़ों महिलाएं और बच्चे गिर गए और अपनी जान बचाने के लिए भाग रही भीड़ के पैरों नीचे कुचले गए.

गांधी मैदान के दक्षिण की ओर यातायात और लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था.
घटना के गवाह होने का दावा करने वाले आइसक्रीम बेचने वाले सुमन और उसके दोस्तों- रंजीत कुमार तथा अजय प्रसाद ने बताया कि कुछ युवकों ने ऊपर लटकते बिजली के तारों के गिरने की अफवाह फैलाई, एक लटकते तार से उलझकर एक बुजुर्ग व्यक्ति का गिर पड़ना तथा बाहर निकलती भीड़ के धक्कामुक्की करने समेत कई चीजों के चलते भगदड़ मच गई.

एक पीड़ित प्रत्यक्षदर्शी महिला ने कहा की पुलिस लाठी नहीं चलाती तो इतनी भगदड़ नहीं होती !

गांधी मैदान के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर अपनी जान बचाने के लिए भागे चले गए थे और इनमें से कुछ सैंकड़ों की भीड़ के पैरों के नीचे रौंदे गए.’भगदड़ के बाद गांधी मैदान व मुख्य सड़क पर दूर-दूर तक चप्पलें, जूते, खिलौने बिखरे पड़े थे. 

घटना के वक्त मौजूद लोगों के मुताबिक, गांधी मैदान के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित सड़क पर जिला पुलिस और वीआईपी की गाड़ियां खडी होने के कारण सड़क पर लोगों के लिए बहुत कम जगह थी.

शहर के लोगों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया कि दशहरा उत्सव समाप्त होने के बावजूद गांधी मैदान के निकासी द्वारों को लोगों के लिए नहीं खोला गया.
 ‘मैदान के 11 गेटों में से केवल दो निकासी के लिए थे और लोग बाहर निकलने के लिए एक दूसरे को रौंदे डाल रहे थे.’

व्यवस्था में लापरवाही ! :-> 

जब गांधी मैदान में रावण जल रहा था, तो मुख्यमंत्री गर्व से सीना ताने खड़े थे. शाम 6 बजकर 10 मिनट में रावण को 'निपटाकर' मुख्यमंत्री अपने गांव महकार के लिए रवाना हो गए, जो पटना से करीब 125 किलोमीटर है. उनकी रवानगी के 35 मिनट बाद जहां रावण जला, ठीक उसी मैदान के पास 33 जिंदगियां लापरवाही की भेंट चढ़ गईं. मुख्यमंत्री तो वक्त पर पहुंचे नहीं और उनके मंत्री जो सामने आए, उनका सारा ध्यान जीतन राम मांझी का बचाव करने में गुजर गया.जब लोगों को सरकार और सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत थी, तो सूबे के मुख्यमंत्री को तो छोड़िए, उनका कोई सिपहसालार भी वहां मौजूद नहीं था. घटना कोई दूर-दराज की नहीं, राजधानी पटना की थी. इसके बावजूद न तो समय पर एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता, न ही सरकार की ओर से कोई संजीदगी दिखी. आखिरकार देर रात मुख्यमंत्री आए.. हादसे का जायजा लेने की रस्म निभाई. हॉस्पीटल के भीतर गए, अधिकारियों से बात की और मीडिया के सामने आकर रटा-रटाया बयान दिया और फिर चले गए.

हैरान कर देने वाली खबर तो यह है कि हादसे की जगह से सटे मौर्या होटल में एक बड़े अधिकारी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही थी, जिसमें बिहार के कई आला अधिकारी और नेता शामिल थे. खबरों के मुताबिक हादसे के दो घंटे बाद तक पार्टी चलती रही. मौतों से बेपरवाह अधिकारी और नेता पार्टी का लुत्फ उठाते रहे, लेकिन किसी ने रंग में भंग नहीं होने दी.  

जब सरकार अपंग हो, प्रशासन का नामोनिशान न हो, तो समझा जा सकता है कि इतना बड़ा आयोजन कैसे हो रहा होगा. गांधी मैदान में सालों से रावण दहन होता रहा है. लाखों की भीड़ जमा होती रही है. इस बार करीब 5 लाख की भीड़ थी, लेकिन पूरा आयोजन भगवान भरोसे रहा. न इतनी बड़ी भीड़ के लिए कोई खास बंदोबस्त था, न ही ट्रैफिक के लिए कोई इंतजाम. सड़कों पर घुप्प अंधेरा पसरा था, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं थी. जब बेसिक प्लानिंग नहीं थी, फिर आगे की कौन सोचे? ऐसी तैयारी की बात तो दूर-दूर तक नहीं सोची गई कि कोई हादसा हो भी सकता है या भगदड़ भी मच सकती है.

पटना में रावण दहन के बाद भीड़ में भगदड़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 33 हो गई है. 100 से ज्यादा घायल हुए लोगों का तत्परता से चिकित्सा करवाया जा रहा है. घायलों के परिजन चिकित्सालय  के बाहर बिलख रहे हैं. जो अपनो को खो चुके हैं, वे शवगृह के बाहर रो रहे हैं. पूरा पटना महा नगर ही आंसुओं के ज्वार में डूबा हुआ है. जिंदगी के मेले से मौत के मुहल्ले में परिवर्तित हुए गांधी मैदान की पीड़ादायी दृश्य किसी को भी रुला देने के लिए काफी है. पूरी रात सदमे का साया पटना पर मंडराता रहा. जो लोग अपनों को खो चुके हैं, उनके लिए बीती रात का एक-एक घडी १०० वर्ष लग रहा थी. लोगों की चीख रह-रहकर शहर के सन्नाटे को चीर रही थी.

राम भरोसे .......

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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