Posted in हिन्दू पतन

Spread the word: Patna stampede helpline number is 0612-2219810


Spread the word: Patna stampede helpline number is 0612-2219810
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Center has asked the Bihar government for a detailed report on how it can let such a stampede happen (claiming at least 33 lives by state records), when it is well known in advance how crowded our festivities are.
The bigger question however is, how long are our devotees and pilgrims going to suffer due to negligence of our administration ?

Reportedly 3-4 people from the back of the crowd shouted that an electrical wire has fallen loose – which led to the stampede.So sloppy was the administration that eyewitnesses say that 3 gates were opened for less than a 100 VIPs present at the occasion while only one gate was opened for approximately a lakh of not-so-Important citizens. There goes all your safety norms in the waste basket. Who cares for the so called ‘majority’ ?

Had it been some minority crowd, imagine the rush of media, police and administration. every victim’s next of kin would have had a job and ten lakh compensation in their kitty before sunrise today.
But alas it’s the ‘majority’ ones who’ve suffered so they’ve to rush from pillar to post just to get their injured admitted and bribe the officials to get compensation to treat their injuries.
You know this is the truth, however inconvenient, communal, or disturbing it may sound.
Sample this: It’s been learnt that the state CM had no information about the incident for hours after the incident. maybe he heard it from the TV while casually switching channels. Even the state health minister took 16 hours to reach the spot.
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On a hindsight, one also gets a suspicion – isn’t all this happening too often to our devotees these days ? hand of ideologically motivated miscreants can’t be ruled out given the nature and identity of victims. To avoid further deepening of distrust, will the state governments wake up and learn their lessons ?

Spread the word: Patna stampede helpline number is 0612-2219810
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Center has asked the Bihar government for a detailed report on how it can let such a stampede happen (claiming at least 33 lives by state records), when it is well known in advance how crowded our festivities are.
The bigger question however is, how long are our devotees and pilgrims going to suffer due to negligence of our administration ?

Reportedly 3-4 people from the back of the crowd shouted that an electrical wire has fallen loose - which led to the stampede.So sloppy was the administration that eyewitnesses say that 3 gates were opened for less than a 100 VIPs present at the occasion while only one gate was opened for approximately a lakh of not-so-Important citizens. There goes all your safety norms in the waste basket. Who cares for the so called 'majority' ?

Had it been some minority crowd, imagine the rush of media, police and administration. every victim's next of kin would have had a job and ten lakh compensation in their kitty before sunrise today.
But alas it's the 'majority' ones who've suffered so they've to rush from pillar to post just to get their injured admitted and bribe the officials to get compensation to treat their injuries.
You know this is the truth, however inconvenient, communal, or disturbing it may sound.
Sample this: It's been learnt that the state CM had no information about the incident for hours after the incident. maybe he heard it from the TV while casually switching channels. Even the state health minister took 16 hours to reach the spot. 
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On a hindsight, one also gets a suspicion - isn't all this happening too often to our devotees these days ? hand of ideologically motivated miscreants can't be ruled out given the nature and identity of victims. To avoid further deepening of distrust, will the state governments wake up and learn their lessons ?
Posted in रामायण - Ramayan

रामायण सच्ची होने के आज के सबूत……….


रामायण सच्ची होने के आज के सबूत……….
रामायण को आज के ज़माने में कई लोग शक की निगाह से देखते हैं। कई लोग हिन्दू धर्म के गौरवशाली इतिहास को झुठलाने की कोसिस भी करते हैं। यहाँ तक की आज का हिन्दू युवा भी पौराणिक कथाओं को संदेह की द्रष्टि से देखता है। लेकिन हम आपको यहाँ पे वो सबूत देंगे जिससे सिद्ध हो जाएगा की रामायण कोई झूठी रचना नहीं है। तो चलिए जानते हैं रामायण के वास्तविक तथ्यों के बारे में।
रामसेतु
रामसेतु जिसे अंग्रेजी में एडम्स ब्रिज भी कहा जाता है, भारत (तमिलनाडु) के दक्षिण
पूर्वी तट के किनारे रामेश्वरम द्वीप तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के मध्य चूना पत्थर से बनी एक श्रृंखला है। भौगोलिक प्रमाणों से पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू-मार्ग से आपस में जोड़ता था। यह पुल करीब 18 मील (30 किलोमीटर) लंबा है।
ऐसा माना जाता है कि 15वीं शताब्दी तक पैदल पार करने योग्य था। एक चक्रवात के कारण यह पुल अपने पूर्व स्वरूप में नहीं रहा। रामसेतु एक बार फिर तब सुर्खियों में आया था, जब नासा के उपग्रह द्वारा लिए गए चित्र मीडिया में सुर्खियां बने थे।समुद्र पर सेतु के निर्माण को राम की दूसरी बड़ी रणनीतिक जीत कहा जा सकता है, क्योंकि समुद्र की तरफ से रावण को कोई खतरा नहीं था और उसे विश्वास था कि इस विराट समुद्र को पार कोई भी उसे चुनौती नहीं दे सकता।
गोस्वामी तुलसीदासजी के मुताबिक जब दशानन रावण ने समुद्र पर पुल बनने की बात सुनी तो उसके दसों मुख एकसाथ बोल पड़े- बांध्यो जलनिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस, सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीश’। मानस के इस दोहे में आपको समुद्र के 10 पर्यायवाची भी मिल सकते हैं।मानस और नासा से इतर महाकवि जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों में भी रामसेतु होने के संकेत मिलते हैं-सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह, दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह।
अशोक वाटिका
अशोक वाटिका लंका में स्थित है, जहां रावण ने सीता को हरण करने के पश्चात बंधक बनाकर रखा था। ऐसा माना जाता है कि एलिया पर्वतीय क्षेत्र की एक गुफा में सीता माता को रखा गया था, जिसे ‘सीता एलिया’ नाम से जाना जाता है। यहां सीता माता के नाम पर एक मंदिर भी है।
यहीं पर आंजनेय हनुमान ने निशानी के रूप में राम की अंगूठी सीता को सौंपी थी। ऐसा माना जाता है कि अशोक वाटिका में नाम अनुरूप अशोक के वृक्ष काफी मात्रा में थे। राम की विरह वेदना से दग्ध सीता अपनी इहलीला समाप्त कर लेना चाहती थीं। वे चाहती थीं कि अग्नि मिल जाए तो वे खुद को अग्नि को समर्पित कर दें। इतना हीं नहीं उन्होंने नूतन कोंपलों से युक्त अशोक के वृक्षों से भी अग्नि की मांग की थी।तुलसीदास जी ने लिखा भी है- ‘नूतन किसलय अनल समाना, देहि अगिनि जन करहि निदाना’। अर्थात तेरे नए पत्ते अग्नि के समान हैं। अत: मुझे अग्नि प्रदान कर और मेरे दुख का शमन कर।
सुग्रीव गुफा
सुग्रीव अपने भाई बाली से डरकर जिस कंदरा में रहता था, उसे सुग्रीव गुफा के नाम से जाना जाता है। यह ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि दक्षिण भारत में प्राचीन विजयनगर साम्राज्य के विरुपाक्ष मंदिर से कुछ ही दूर पर स्थित एक पर्वत को ऋष्यमूक कहा जाता था और यही रामायण काल का ऋष्यमूक है। मंदिर के निकट सूर्य और सुग्रीव आदि की मूर्तियां स्थापित हैं।
रामायण की एक कहानी के अनुसार वानरराज बाली ने दुंदुभि नामक राक्षस को मारकर उसका शरीर एक योजन दूर फेंक दिया था। हवा में उड़ते हुए दुंदुभि के रक्त की कुछ बूंदें मातंग ऋषि के आश्रम में गिर गईं। ऋषि ने अपने तपोबल से जान लिया कि यह करतूत किसकी है।
क्रुद्ध ऋषि ने बाली को शाप दिया कि यदि वह कभी भी ऋष्यमूक पर्वत के एक योजन क्षेत्र में आएगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह बात उसके छोटे भाई सुग्रीव को ज्ञात थी और इसी कारण से जब बाली ने उसे प्रताड़ित कर अपने राज्य से निष्कासित किया तो वह इसी पर्वत पर एक कंदरा में अपने मंत्रियों समेत रहने लगा। यहीं उसकी राम और लक्ष्मण से भेंट हुई और बाद में राम ने बाली का वध किया और सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य मिला।

रामायण सच्ची होने के आज के सबूत..........<br />
रामायण को आज के ज़माने में कई लोग शक की निगाह से देखते हैं। कई लोग हिन्दू धर्म के गौरवशाली इतिहास को झुठलाने की कोसिस भी करते हैं। यहाँ तक की आज का हिन्दू युवा भी पौराणिक कथाओं को संदेह की द्रष्टि से देखता है। लेकिन हम आपको यहाँ पे वो सबूत देंगे जिससे सिद्ध हो जाएगा की रामायण कोई झूठी रचना नहीं है। तो चलिए जानते हैं रामायण के वास्तविक तथ्यों के बारे में।<br />
रामसेतु<br />
रामसेतु जिसे अंग्रेजी में एडम्स ब्रिज भी कहा जाता है, भारत (तमिलनाडु) के दक्षिण<br />
पूर्वी तट के किनारे रामेश्वरम द्वीप तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिमी तट पर मन्नार द्वीप के मध्य चूना पत्थर से बनी एक श्रृंखला है। भौगोलिक प्रमाणों से पता चलता है कि किसी समय यह सेतु भारत तथा श्रीलंका को भू-मार्ग से आपस में जोड़ता था। यह पुल करीब 18 मील (30 किलोमीटर) लंबा है।<br />
ऐसा माना जाता है कि 15वीं शताब्दी तक पैदल पार करने योग्य था। एक चक्रवात के कारण यह पुल अपने पूर्व स्वरूप में नहीं रहा। रामसेतु एक बार फिर तब सुर्खियों में आया था, जब नासा के उपग्रह द्वारा लिए गए चित्र मीडिया में सुर्खियां बने थे।समुद्र पर सेतु के निर्माण को राम की दूसरी बड़ी रणनीतिक जीत कहा जा सकता है, क्योंकि समुद्र की तरफ से रावण को कोई खतरा नहीं था और उसे विश्वास था कि इस विराट समुद्र को पार कोई भी उसे चुनौती नहीं दे सकता।<br />
गोस्वामी तुलसीदासजी के मुताबिक जब दशानन रावण ने समुद्र पर पुल बनने की बात सुनी तो उसके दसों मुख एकसाथ बोल पड़े- बांध्यो जलनिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस, सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीश'। मानस के इस दोहे में आपको समुद्र के 10 पर्यायवाची भी मिल सकते हैं।मानस और नासा से इतर महाकवि जयशंकर प्रसाद की पंक्तियों में भी रामसेतु होने के संकेत मिलते हैं-सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह, दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह।<br />
अशोक वाटिका<br />
अशोक वाटिका लंका में स्थित है, जहां रावण ने सीता को हरण करने के पश्चात बंधक बनाकर रखा था। ऐसा माना जाता है कि एलिया पर्वतीय क्षेत्र की एक गुफा में सीता माता को रखा गया था, जिसे 'सीता एलिया' नाम से जाना जाता है। यहां सीता माता के नाम पर एक मंदिर भी है।<br />
यहीं पर आंजनेय हनुमान ने निशानी के रूप में राम की अंगूठी सीता को सौंपी थी। ऐसा माना जाता है कि अशोक वाटिका में नाम अनुरूप अशोक के वृक्ष काफी मात्रा में थे। राम की विरह वेदना से दग्ध सीता अपनी इहलीला समाप्त कर लेना चाहती थीं। वे चाहती थीं कि अग्नि मिल जाए तो वे खुद को अग्नि को समर्पित कर दें। इतना हीं नहीं उन्होंने नूतन कोंपलों से युक्त अशोक के वृक्षों से भी अग्नि की मांग की थी।तुलसीदास जी ने लिखा भी है- 'नूतन किसलय अनल समाना, देहि अगिनि जन करहि निदाना'। अर्थात तेरे नए पत्ते अग्नि के समान हैं। अत: मुझे अग्नि प्रदान कर और मेरे दुख का शमन कर।<br />
सुग्रीव गुफा<br />
सुग्रीव अपने भाई बाली से डरकर जिस कंदरा में रहता था, उसे सुग्रीव गुफा के नाम से जाना जाता है। यह ऋष्यमूक पर्वत पर स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि दक्षिण भारत में प्राचीन विजयनगर साम्राज्य के विरुपाक्ष मंदिर से कुछ ही दूर पर स्थित एक पर्वत को ऋष्यमूक कहा जाता था और यही रामायण काल का ऋष्यमूक है। मंदिर के निकट सूर्य और सुग्रीव आदि की मूर्तियां स्थापित हैं।<br />
रामायण की एक कहानी के अनुसार वानरराज बाली ने दुंदुभि नामक राक्षस को मारकर उसका शरीर एक योजन दूर फेंक दिया था। हवा में उड़ते हुए दुंदुभि के रक्त की कुछ बूंदें मातंग ऋषि के आश्रम में गिर गईं। ऋषि ने अपने तपोबल से जान लिया कि यह करतूत किसकी है।<br />
क्रुद्ध ऋषि ने बाली को शाप दिया कि यदि वह कभी भी ऋष्यमूक पर्वत के एक योजन क्षेत्र में आएगा तो उसकी मृत्यु हो जाएगी। यह बात उसके छोटे भाई सुग्रीव को ज्ञात थी और इसी कारण से जब बाली ने उसे प्रताड़ित कर अपने राज्य से निष्कासित किया तो वह इसी पर्वत पर एक कंदरा में अपने मंत्रियों समेत रहने लगा। यहीं उसकी राम और लक्ष्मण से भेंट हुई और बाद में राम ने बाली का वध किया और सुग्रीव को किष्किंधा का राज्य मिला।
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Patna ghandhi maidan


कुछ लोगों का कहना है कि कुछ लोगों के एक नाले में गिर जाने के बाद यह घटना हुई. कुछ लोग बिजली के करंट से लैस एक तार के गिरने की अफवाह और कुछ लोगों की ओर से भीड़ में फैलाई गई अफवाह की बात कर रहे हैं. घटना की विस्तृत जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.
प्रत्यक्षदर्शी मनीष कुमार ने बताया, ‘कुछ युवकों ने ‘भागो-भागो’ चिल्लाना शुरू कर दिया जिसके बाद लोगों में दहशत फैल गयी और भगदड़ मच गई. सैकड़ों महिलाएं और बच्चे गिर गए और अपनी जान बचाने के लिए भाग रही भीड़ के पैरों नीचे कुचले गए.

गांधी मैदान के दक्षिण की ओर यातायात और लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था.
घटना के गवाह होने का दावा करने वाले आइसक्रीम बेचने वाले सुमन और उसके दोस्तों- रंजीत कुमार तथा अजय प्रसाद ने बताया कि कुछ युवकों ने ऊपर लटकते बिजली के तारों के गिरने की अफवाह फैलाई, एक लटकते तार से उलझकर एक बुजुर्ग व्यक्ति का गिर पड़ना तथा बाहर निकलती भीड़ के धक्कामुक्की करने समेत कई चीजों के चलते भगदड़ मच गई.

एक पीड़ित प्रत्यक्षदर्शी महिला ने कहा की पुलिस लाठी नहीं चलाती तो इतनी भगदड़ नहीं होती !
गांधी मैदान के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर अपनी जान बचाने के लिए भागे चले गए थे और इनमें से कुछ सैंकड़ों की भीड़ के पैरों के नीचे रौंदे गए.’भगदड़ के बाद गांधी मैदान व मुख्य सड़क पर दूर-दूर तक चप्पलें, जूते, खिलौने बिखरे पड़े थे.

घटना के वक्त मौजूद लोगों के मुताबिक, गांधी मैदान के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित सड़क पर जिला पुलिस और वीआईपी की गाड़ियां खडी होने के कारण सड़क पर लोगों के लिए बहुत कम जगह थी.

शहर के लोगों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया कि दशहरा उत्सव समाप्त होने के बावजूद गांधी मैदान के निकासी द्वारों को लोगों के लिए नहीं खोला गया.
‘मैदान के 11 गेटों में से केवल दो निकासी के लिए थे और लोग बाहर निकलने के लिए एक दूसरे को रौंदे डाल रहे थे.’

व्यवस्था में लापरवाही ! :->

जब गांधी मैदान में रावण जल रहा था, तो मुख्यमंत्री गर्व से सीना ताने खड़े थे. शाम 6 बजकर 10 मिनट में रावण को ‘निपटाकर’ मुख्यमंत्री अपने गांव महकार के लिए रवाना हो गए, जो पटना से करीब 125 किलोमीटर है. उनकी रवानगी के 35 मिनट बाद जहां रावण जला, ठीक उसी मैदान के पास 33 जिंदगियां लापरवाही की भेंट चढ़ गईं. मुख्यमंत्री तो वक्त पर पहुंचे नहीं और उनके मंत्री जो सामने आए, उनका सारा ध्यान जीतन राम मांझी का बचाव करने में गुजर गया.जब लोगों को सरकार और सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत थी, तो सूबे के मुख्यमंत्री को तो छोड़िए, उनका कोई सिपहसालार भी वहां मौजूद नहीं था. घटना कोई दूर-दराज की नहीं, राजधानी पटना की थी. इसके बावजूद न तो समय पर एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता, न ही सरकार की ओर से कोई संजीदगी दिखी. आखिरकार देर रात मुख्यमंत्री आए.. हादसे का जायजा लेने की रस्म निभाई. हॉस्पीटल के भीतर गए, अधिकारियों से बात की और मीडिया के सामने आकर रटा-रटाया बयान दिया और फिर चले गए.

हैरान कर देने वाली खबर तो यह है कि हादसे की जगह से सटे मौर्या होटल में एक बड़े अधिकारी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही थी, जिसमें बिहार के कई आला अधिकारी और नेता शामिल थे. खबरों के मुताबिक हादसे के दो घंटे बाद तक पार्टी चलती रही. मौतों से बेपरवाह अधिकारी और नेता पार्टी का लुत्फ उठाते रहे, लेकिन किसी ने रंग में भंग नहीं होने दी.

जब सरकार अपंग हो, प्रशासन का नामोनिशान न हो, तो समझा जा सकता है कि इतना बड़ा आयोजन कैसे हो रहा होगा. गांधी मैदान में सालों से रावण दहन होता रहा है. लाखों की भीड़ जमा होती रही है. इस बार करीब 5 लाख की भीड़ थी, लेकिन पूरा आयोजन भगवान भरोसे रहा. न इतनी बड़ी भीड़ के लिए कोई खास बंदोबस्त था, न ही ट्रैफिक के लिए कोई इंतजाम. सड़कों पर घुप्प अंधेरा पसरा था, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं थी. जब बेसिक प्लानिंग नहीं थी, फिर आगे की कौन सोचे? ऐसी तैयारी की बात तो दूर-दूर तक नहीं सोची गई कि कोई हादसा हो भी सकता है या भगदड़ भी मच सकती है.

पटना में रावण दहन के बाद भीड़ में भगदड़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 33 हो गई है. 100 से ज्यादा घायल हुए लोगों का तत्परता से चिकित्सा करवाया जा रहा है. घायलों के परिजन चिकित्सालय के बाहर बिलख रहे हैं. जो अपनो को खो चुके हैं, वे शवगृह के बाहर रो रहे हैं. पूरा पटना महा नगर ही आंसुओं के ज्वार में डूबा हुआ है. जिंदगी के मेले से मौत के मुहल्ले में परिवर्तित हुए गांधी मैदान की पीड़ादायी दृश्य किसी को भी रुला देने के लिए काफी है. पूरी रात सदमे का साया पटना पर मंडराता रहा. जो लोग अपनों को खो चुके हैं, उनके लिए बीती रात का एक-एक घडी १०० वर्ष लग रहा थी. लोगों की चीख रह-रहकर शहर के सन्नाटे को चीर रही थी.

राम भरोसे …….

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कुछ लोगों का कहना है कि कुछ लोगों के एक नाले में गिर जाने के बाद यह घटना हुई. कुछ लोग बिजली के करंट से लैस एक तार के गिरने की अफवाह और कुछ लोगों की ओर से भीड़ में फैलाई गई अफवाह की बात कर रहे हैं. घटना की विस्तृत जांच के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.
प्रत्यक्षदर्शी मनीष कुमार ने बताया, ‘कुछ युवकों ने ‘भागो-भागो’ चिल्लाना शुरू कर दिया जिसके बाद लोगों में दहशत फैल गयी और भगदड़ मच गई. सैकड़ों महिलाएं और बच्चे गिर गए और अपनी जान बचाने के लिए भाग रही भीड़ के पैरों नीचे कुचले गए.

गांधी मैदान के दक्षिण की ओर यातायात और लोगों की आवाजाही को नियंत्रित करने के लिए कोई पुलिसकर्मी मौजूद नहीं था.
घटना के गवाह होने का दावा करने वाले आइसक्रीम बेचने वाले सुमन और उसके दोस्तों- रंजीत कुमार तथा अजय प्रसाद ने बताया कि कुछ युवकों ने ऊपर लटकते बिजली के तारों के गिरने की अफवाह फैलाई, एक लटकते तार से उलझकर एक बुजुर्ग व्यक्ति का गिर पड़ना तथा बाहर निकलती भीड़ के धक्कामुक्की करने समेत कई चीजों के चलते भगदड़ मच गई.

एक पीड़ित प्रत्यक्षदर्शी महिला ने कहा की पुलिस लाठी नहीं चलाती तो इतनी भगदड़ नहीं होती !

गांधी मैदान के दक्षिणी-पूर्वी छोर पर अपनी जान बचाने के लिए भागे चले गए थे और इनमें से कुछ सैंकड़ों की भीड़ के पैरों के नीचे रौंदे गए.’भगदड़ के बाद गांधी मैदान व मुख्य सड़क पर दूर-दूर तक चप्पलें, जूते, खिलौने बिखरे पड़े थे. 

घटना के वक्त मौजूद लोगों के मुताबिक, गांधी मैदान के दक्षिण पूर्वी छोर पर स्थित सड़क पर जिला पुलिस और वीआईपी की गाड़ियां खडी होने के कारण सड़क पर लोगों के लिए बहुत कम जगह थी.

शहर के लोगों ने जिला प्रशासन पर आरोप लगाया कि दशहरा उत्सव समाप्त होने के बावजूद गांधी मैदान के निकासी द्वारों को लोगों के लिए नहीं खोला गया.
 ‘मैदान के 11 गेटों में से केवल दो निकासी के लिए थे और लोग बाहर निकलने के लिए एक दूसरे को रौंदे डाल रहे थे.’

व्यवस्था में लापरवाही ! :-> 

जब गांधी मैदान में रावण जल रहा था, तो मुख्यमंत्री गर्व से सीना ताने खड़े थे. शाम 6 बजकर 10 मिनट में रावण को 'निपटाकर' मुख्यमंत्री अपने गांव महकार के लिए रवाना हो गए, जो पटना से करीब 125 किलोमीटर है. उनकी रवानगी के 35 मिनट बाद जहां रावण जला, ठीक उसी मैदान के पास 33 जिंदगियां लापरवाही की भेंट चढ़ गईं. मुख्यमंत्री तो वक्त पर पहुंचे नहीं और उनके मंत्री जो सामने आए, उनका सारा ध्यान जीतन राम मांझी का बचाव करने में गुजर गया.जब लोगों को सरकार और सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत थी, तो सूबे के मुख्यमंत्री को तो छोड़िए, उनका कोई सिपहसालार भी वहां मौजूद नहीं था. घटना कोई दूर-दराज की नहीं, राजधानी पटना की थी. इसके बावजूद न तो समय पर एम्बुलेंस, न ही कोई सहायता, न ही सरकार की ओर से कोई संजीदगी दिखी. आखिरकार देर रात मुख्यमंत्री आए.. हादसे का जायजा लेने की रस्म निभाई. हॉस्पीटल के भीतर गए, अधिकारियों से बात की और मीडिया के सामने आकर रटा-रटाया बयान दिया और फिर चले गए.

हैरान कर देने वाली खबर तो यह है कि हादसे की जगह से सटे मौर्या होटल में एक बड़े अधिकारी के बेटे के जन्मदिन की पार्टी चल रही थी, जिसमें बिहार के कई आला अधिकारी और नेता शामिल थे. खबरों के मुताबिक हादसे के दो घंटे बाद तक पार्टी चलती रही. मौतों से बेपरवाह अधिकारी और नेता पार्टी का लुत्फ उठाते रहे, लेकिन किसी ने रंग में भंग नहीं होने दी.  

जब सरकार अपंग हो, प्रशासन का नामोनिशान न हो, तो समझा जा सकता है कि इतना बड़ा आयोजन कैसे हो रहा होगा. गांधी मैदान में सालों से रावण दहन होता रहा है. लाखों की भीड़ जमा होती रही है. इस बार करीब 5 लाख की भीड़ थी, लेकिन पूरा आयोजन भगवान भरोसे रहा. न इतनी बड़ी भीड़ के लिए कोई खास बंदोबस्त था, न ही ट्रैफिक के लिए कोई इंतजाम. सड़कों पर घुप्प अंधेरा पसरा था, लेकिन इसकी चिंता किसी को नहीं थी. जब बेसिक प्लानिंग नहीं थी, फिर आगे की कौन सोचे? ऐसी तैयारी की बात तो दूर-दूर तक नहीं सोची गई कि कोई हादसा हो भी सकता है या भगदड़ भी मच सकती है.

पटना में रावण दहन के बाद भीड़ में भगदड़ से मरने वालों की संख्या बढ़कर 33 हो गई है. 100 से ज्यादा घायल हुए लोगों का तत्परता से चिकित्सा करवाया जा रहा है. घायलों के परिजन चिकित्सालय  के बाहर बिलख रहे हैं. जो अपनो को खो चुके हैं, वे शवगृह के बाहर रो रहे हैं. पूरा पटना महा नगर ही आंसुओं के ज्वार में डूबा हुआ है. जिंदगी के मेले से मौत के मुहल्ले में परिवर्तित हुए गांधी मैदान की पीड़ादायी दृश्य किसी को भी रुला देने के लिए काफी है. पूरी रात सदमे का साया पटना पर मंडराता रहा. जो लोग अपनों को खो चुके हैं, उनके लिए बीती रात का एक-एक घडी १०० वर्ष लग रहा थी. लोगों की चीख रह-रहकर शहर के सन्नाटे को चीर रही थी.

राम भरोसे .......

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Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

जब पहली बार दानव समाज की कंपनी “इस्ट इन्डिया कंपनी” के मेनेजर अंग्रेज भारत में आए


जब पहली बार दानव समाज की कंपनी “इस्ट इन्डिया कंपनी” के मेनेजर अंग्रेज भारत में आए थे तब राजाओं, नवाबों और बादशाहों की तेल मालिश और पगचंपी करते थे । मालिश और पगचंपी का मतलब खूश करना, हिरे जवाहरात की भेंट देकर, तारिफ के पूल बांध कर आसमान में चडा देना, मिथ्याभिमान के अफीमी नशे में डूबा देना ।

ये शातिर व्यापारी सामनेवाले को आसमान पर चडा देते हैं और नीचे से उसकी चीजें लूट लेते हैं । इतिहास लिखता है कि राजाओं को आसमान में उडा कर जमीन पर रहे उनके राज्यों को ही इस्ट इन्डिया कंपनी हडप कर गई थी ।

कभी सुना है किसी व्यापारी ने दुकान बंद कर दी हो ! दुकानदारी बापदादा का धंधा होता है क्यों कोइ बंद करे ? लेकिन दुकान किस चीज की है वो तो देखना पडेगा ।

उन इस्ट इन्डिया वाले दानवों की दुकान भी बंध नही हुई है । आज भी चल रही है । नाम बदल दिया है, बोर्ड और दरवाजे बदल दिए हैं । दरवाजा पहले खूले आम रोड पर खूलता था, आज पिछली गली से घुम के जाना पडता है । अलग अलग दरवाजे पर बोर्ड भी टंगे हैं “आईएमएफ”, “फॅड रिजर्व”, वर्ल्ड बॅन्क” इत्यादी ।

राजा और बादशाहों की चंपी करनेवाले के बच्चे आज भारत की जनता और उनके पतिनिधि राजनेताओं की चंपी कर रहे हैं । उधार की आदत डाल कर, पगचंपी के नये नये आविष्कार कर के जनता को सुख सुविधा देने के बहाने उनका जीवन खर्चिला बना दिया है । और मुर्ख जनता भी हाई सोसाईटी, लो सोसाईटी, लोकल, पॉश विस्तार वाले, गंवार, शहरी, झोपडपट्टी वाला, नगरवासी और उपनगरवासी, परावासी और नरिमान पोइन्ट वाला, वराछारोड वाला और अठवा लाईन्स वाले । खर्च करने वालों की क्षमता के आधार पर आर्थिक जातियां बना ली है । कोइ इस नयी जाती व्यवस्था से इतरा रहा है कोइ दुःखी हो रहा है । नफरत की शुरुआत अभी तो सिर्फ ताने मारने तक सिमीत है आगे देखो क्या होता है ।

सुख सुविधा नशे के समान है । जीतना मिले तलब बढती जाती है और इसलिए ही सब से सुखी माने जाते लोग भी दुःखी है, उन को और चाहिए, दिल मांगे मोर । लेकिन हर चीज का अंत होता है । पगचंपी करने वाले दानव भी नए नए सुख सुविधा के सामान खोज नही पा रहे हैं, सुख के नशे की अंतिम क्षण में जनता को क्या देना है । दानवों के इस सुख सुविधा और विकास का भांडा फुट जाए और मानव समुदाय उत्पात मचा दे, ईस से पहले मानव समुदाय को एकदम अपने शिकंजे में कस लेना है, बेन्किन्ग और युनिवर्सल आईडी, का फंदा कस रहे हैं ।

आगे इतिहास लिखेगा कि जीन जातियों के दिल मोर मांगता था वो मानव जातीयां खतम हो गई है।

दानवों के अपने पूरखों का सपना “धरती की मालिकी हमारे बाप की है” साकार करना है । विकास का नया फंडा “टिकाउ विकास, याने ‘सस्टेइनेबल डेवलपमेन्ट” शुरु किया है । शुरुआत की है पूराने विकास को क्लाईमेक्स पर ले जाना । मानव जात के सपनों में और हवा भरके और उंचाई पर उडाना है । आदमी ज्यादा उंचाई से गीरेगा तभी तो खतम होगा ना !

स्मार्ट सिटी और शहरी करण से जनता गांव छोड रही है, खेती काम को हिनता से देख रही है, अपनी खेती की जमीने बेच रही है । ये भारत के कथित सब से विकसित गुजरात की बात है, गांव खाली हो रहे हैं, गांवों में बुढे बचे हैं । गीनेचुने युवा है उन को किसी काम के काबिल नही समजे जाते हैं तो बेचारे खेती कर रहे हैं । उन बेचारों को शादी के लिए लडकी भी नही मिल रही है । विकास के क्लाईमेक्स ने समाज रचना ही तोड दी है । गांव को छोड कर शहर गए बच्चे भी बुढापे की और जा रहे हैं । उन में सामाजिक वेल्यु अभी बची है तो गांव में रहते अपने बुढे मांबाप की फिकर सताने लगी है, अपने बीवी बच्चे मेकोले की औलाद बन जाने से मांबाप को अपने पास तो नही रख सकते लेकिन गांवों में सामुहिक रसोईधर और टिफिन व्यवस्था बनाई है । गांव का कोइ भी बुढा या बुढी रसोईघर जाकर खा सकता है या टिफिन मंगवा सकता है । हमारे सौराष्ट्र विभाग के युवा ही प्रथम शिकार बने हैं, मुंबई, सुरत, अमदावाद और वडोदरा हमारे युवाधन को निगल गया है, उनमें से एक मैं भी हूं ।

शहरी जन गांव के घर जमीन बेच कर १०वें माले पर फ्लेट खरीद ना चाहते, बच्चों को मेकोले की औलादें बनाना चाहते हैं, अपने धंधे का नूकसान भरपाई करना चाहते हैं या बेकारी में बैठे बैठे ही खाना खाना चाहते हैं । मेरे घर का भी ये हाल हो तो दुसरों की क्या बात करें ।

स्मार्ट सिटी के बाद क्या होगा ? गांव खाली, नफरत योग्य और निकम्मे । जमीन सस्ती और बिकाउ, दानव प्यादे जमीन खरीद लेन्गे । दानवों की कंपनिया एफडीआई, जब गांव आई तो समज लेना विकास का क्लाइमेक्स पूरा और ‘सस्टेइनेबल देवलोपमेन्ट शुर’ !
शहरों में ये जो पगचंपी वाले धंधे शुरु है ना, सेवा के, एक दुसरे को खूश करने के, वो सब बंद ।

बस, अब बहुत हो गया, अब असली धंधे पर आ जाओ । खेती ही असली धंधा है जो आदमी का पेट भरता है । जीन गांवों को निकम्मे कहे उन्ही गांवों के खेतो में प्यार से आ जाओ हम नौकरी देते हैं । पोलपोट की तरह जनसंहार कर के शहरों को खाली नही करवाएन्गे, पगचंपी के हमारे धंधे तो खूद बंद कर देन्गे बाकी लोगों के धंधों को मंदी के हथियार से मार देन्गे । भूखा आदमी आखिर जाएगा किधर ?

एक बात बता देते हैं, दानवों ने ८ के दशक में एक मीनी ट्रायल कंबोडिया में लिया था । दानव राज पोलपोट ने १९७५ में फ्रांस में यहुदी बेन्कर माफियाओं की तालीम से और उनकी मदद से अपने देश कंबोडिया में साम्यवादी खूजली गॅन्ग बनाकर उत्पात मचा दिया था । देश की आबादी में हर ३ में से १ को मार दिया था । मरनेवालों की संख्या लाखों में थी । मरने वाले ज्यादातर वही थे जो सैनिक को सवाल करते थे कि हमे शहर से भगा कर गांव क्यों भेज रहे हो ? मरने वालों में दुसरे वो थे जो साम्यवाद के सिध्धांत पर अपना धर्म नही छोड रहे थे । तो मुस्लिम उस में ज्यादा मरे । कुछ हिन्दु थे वो भी मरे लेकिन अवसरवादी और रंग बदलते बौधों ने अपना धर्म त्याग दिया तो बच गए । आदमी को मारने के लिए भी उन हरामी यहुदी व्यापारियों ने अपना सिध्धांत सिखाया था । आदमी की मौत को सस्ती करो । मेहंगी गोलियां बचा के रख्खो । एक कंटेनर भर के पोलिथीन की थैलियां युरोप से भेजी गई । आदमी के माथे पर थैली पहना कर गले में मजबूती से बांध दी जाती थी जीस से आदमी सांस ना ले सके और बीना हवा धुट घुट कर मर जाता था ।

हमारे सामने आज दोतीन तरह के सिनेरियो खडे हो गए हैं ।

दानव दूत और दानव सेना नायक अमरिका भारत के नागरिक और नागरिक के प्रतिनिधी मोदी की तारिफ पर तारिफ कर रहा है और उसी बहाने अपनी कंपनियां भारत में घुसा देना चाहता है । मोदी के साथ साथ भारत की जनता भी आसमान में उडने लगे हैं । उधार के डोलर के मजे ले लो, पसी ने से बने रुपए में क्या रख्खा है !

अमरिका के लगभग 40 टॉप अमेरिकी सांसदों का दिल भी जीत लिया ।
किस ने ? मोदी ने या दानवों की कुट नीती ने ?

इन सांसदों ने उनके शब्दों को ‘प्रेरणादायी और बड़ा विज़न वाला’ बताया। मैडिसन स्क्वेयर में अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि वह एक छोटे आदमी थे, जो ‘चाय बेचकर’ यहां तक पहुंचे हैं, लेकिन ‘छोटे लोगों के लिए बड़े काम’ करने की इच्छा रखते हैं।

दासी पुत्र चंद्रगुप्त भी छोटा आदमी था और उसने तो सच में महान कार्य किया था । क्या मोदी भी वैसा महान कार्य करना चाहते हैं या भारत की जनता को जकड कर दनवों के हवाले कर के नीच कार्य करना चाहते हैं ?

दानवों के ही देश के नागरिक उन बेंकर माफिया दानवों के विरुध्ध उन के एजडे को रोकने के लिए “स्टोप न्यु बर्ल्ड ऑर्डेर” लिखे बेनर लेकर घुम रहे हैं । हमें लूट कर उन लोगों को तो दानवों ने मजे ही करवाए थे, तो भी वो विरोध कर रहे हैं । यहां हम भारतिय तो उन दानवो के कारण पिडित है और पिडीत जनता का प्रतिनिधि विरोध करने के बदले पूरी जनता को बेंकर माफियाओं के हवाले करने के लिए झिरो बेलेन्स वाले बेन्क खाते खूलवा रहा है और उन के ही देश में छाती फुलाकर बता भी रहा है ! दानवों के विरोधी आगे क्या कह सकते हैं, भाड में जाओ ! मरो मरने का शौक हो तो !

दुसरे सीन में एक फोटो देख कर भारत की भोली जनता भी बोलने लगी । ‘हमें यहुदियों से प्यार है । हमे इजराईल से प्यार है ।’ शेखचिल्ली अधर्म गुरुओं ने सिखा दिया है कि दुश्मन से भी प्यार करो ! भारत की मुर्ख जनता ने बराबर रट लिया है । विज्ञान या गणित के सुत्र नही रटे अपनों को मारने मराने वाले अधर्मि सुत्र रट लिए ।

मोदी ने दानव के प्यादों को छोड सिधे ही दानवों से मुलाकात की तो भारत के अंधलोग जुम उठे थे उस की बात थी । उन अंधलोग का भी कसुर नही है, पूरी बात जानते ही नही तो क्या करे ! उनकी सुई मुस्लीम प्रजा पर अटकी है उन के बॉस यहुदी पर नही ।

जीन को पता नही और खूशफहमी के साथ जी रहे हैं उन के लिए ।

सस्टेइनेबल डेवलोपमेन्ट का मतलब सदियों तक दुनिया की बाकी जनता उन ६ मिल्यन यहुदियों की सेवा करे । वो बाकी मानव जात को अपना पशु मान कर चलती है, जो अब भी मानव है उन को पशुता की तरफ ले जाने के लिए धर्म से अलग कर रहे हैं, जीस धर्म ने पशु समान आदमी को मानव बनाया था, फिल्म, टीवी, नेट और मिडिया को काम सौंपा है की धर्म विरुध्ध सेक्स के नंगे नाच शुरु कर दो आदमी पशुता की तरफ जल्दी चला जाएगा, ऐसे ऐसे बुध्धिहीन प्रोग्राम दिखाओ की आदमी की बुध्धि खील न सके और पशु बनने में बाधा न बने, आदमी को हंसाते कॉमेडी शो भी दिखाओ कि आदमी गंभीरता खो कर हल्का हो जाए, बातें हंसने में टालने लगे । गंभीर जनता सोचा करती है । सोचता हुआ आदमी पशु बनना तो दूर दानव समाज को ही नूकसान करता है ।

दुनिया पर राज करने का सपना उन दानव यहुदीयों के धर्म स्थापक अब्राहम का था । दुनिया को उल्लु बनाने के लिए यहोवा नामका नकली भगवान भी पैदा कर लिया और उस भगवान ने कहा है की धरती अब तेरी और तेरे संतानो की है । उस की तीन संतान यहुदी, इसाई और मुस्लिमों के बीच स्पर्धा है की धरती किस की ? यहुदी धन के कारण आगे हैं और धरती का कबजा कर लिया है ।

अब उस के कबजे से भारत को छुडाना है या पूरी तरह गुलाम बन जाना है ? २०४६ में भारत की आजादी खतम हो रही है । जनता को ही सोचना होगा की कोई पोलपोट के आगमन की राह देखनी है या कोइ चंद्र गुप्त को पैदा करना है ! सोच लो !

Posted in हिन्दू पतन

डॉ सुब्रमनियन स्वामी बताते है की सऊदी अरब में मस्जिद तोड़ते हैं क्योंकि वो कहते हैं की मस्जिद कोई धार्मिक स्थान नहीं है।


डॉ सुब्रमनियन स्वामी बताते है की सऊदी अरब में मस्जिद तोड़ते हैं क्योंकि वो कहते हैं की मस्जिद कोई धार्मिक स्थान नहीं है। यह बस एक नमाज पढने की जगह है और आप नमाज कही भी पढ़ सकते है। एक बार सऊदी अरब के राजा को अपना महल बनाना था और उसके लिए उसे जगह चाहिए थी तो उसने कहा की बिलाल मस्जिद को तोड़ डालो महल बनाने के लिए। इसपे लोगों ने कहा की इस मस्जिद में पैगम्बर मुहम्मद नमाज पढ़ते थे , इसे तो कम से कम मत तोड़ो, क्योंकि सऊदी अरब में कई बार सड़क बनाने के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है। तब वहां के राजा ने कहा की खबरदार! ऐसी बात करने से तुम्हारे दिमाग में मूर्ति पूजा का विचार आ रहा है। इस्लाम में हम मूर्ति पूजा नहीं मानते हैं। क्या फर्क पड़ता है की पैगम्बर मुहम्मद ने यहाँ पर नमाज पढ़ा? यह एक मस्जिद है और इसे हम दूसरी जगह बनायेंगे। 

मै यही कहता हूँ सभी मुसलमान भाइयों से की श्री राम की जगह (अयोध्या) में, श्री कृष्ण की जगह (मथुरा) में और भगवान् शिव की जगह काशी विश्वनाथ में जहां इन भगवानो के मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये गए थे, वहां के बजाये हम आपको दूसरी जगह मस्जिद बना कर देंगे। लेकिन जहा मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है उन्हें आप छोड़ दो। मुस्लिम छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन कई लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं की अगर हिन्दू मुस्लिम के बीच में भाईचारा की भावना आ जाएगी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे इसलिए वो ऐसा होने नहीं देते। हम मुस्लिम, इसाई और बाकि धर्मो के लोगो को एक साथ तब जोड़ सकते हैं जब हम स्पष्ट बात करें। जो हम कहें वो करें, बस उनके वोट लेने के लिए नहीं।

http://www.youtube.com/watch?v=85YxApDtCco

Subramanian Swamy

डॉ सुब्रमनियन स्वामी बताते है की सऊदी अरब में मस्जिद तोड़ते हैं क्योंकि वो कहते हैं की मस्जिद कोई धार्मिक स्थान नहीं है। यह बस एक नमाज पढने की जगह है और आप नमाज कही भी पढ़ सकते है। एक बार सऊदी अरब के राजा को अपना महल बनाना था और उसके लिए उसे जगह चाहिए थी तो उसने कहा की बिलाल मस्जिद को तोड़ डालो महल बनाने के लिए। इसपे लोगों ने कहा की इस मस्जिद में पैगम्बर मुहम्मद नमाज पढ़ते थे , इसे तो कम से कम मत तोड़ो, क्योंकि सऊदी अरब में कई बार सड़क बनाने के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है। तब वहां के राजा ने कहा की खबरदार! ऐसी बात करने से तुम्हारे दिमाग में मूर्ति पूजा का विचार आ रहा है। इस्लाम में हम मूर्ति पूजा नहीं मानते हैं। क्या फर्क पड़ता है की पैगम्बर मुहम्मद ने यहाँ पर नमाज पढ़ा? यह एक मस्जिद है और इसे हम दूसरी जगह बनायेंगे।

मै यही कहता हूँ सभी मुसलमान भाइयों से की श्री राम की जगह (अयोध्या) में, श्री कृष्ण की जगह (मथुरा) में और भगवान् शिव की जगह काशी विश्वनाथ में जहां इन भगवानो के मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये गए थे, वहां के बजाये हम आपको दूसरी जगह मस्जिद बना कर देंगे। लेकिन जहा मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है उन्हें आप छोड़ दो। मुस्लिम छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन कई लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं की अगर हिन्दू मुस्लिम के बीच में भाईचारा की भावना आ जाएगी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे इसलिए वो ऐसा होने नहीं देते। हम मुस्लिम, इसाई और बाकि धर्मो के लोगो को एक साथ तब जोड़ सकते हैं जब हम स्पष्ट बात करें। जो हम कहें वो करें, बस उनके वोट लेने के लिए नहीं।

http://www.youtube.com/watch?v=85YxApDtCco

Subramanian Swamy

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

Vedic Vimanas
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Shivkur bapuji talpade was the first man to fly an unmanned flying saucer.

It was an advanced Vedic Mercury ion plasma , imploding and expanding vortex noiseless flying machine , which could move in all directions. Accelerated pressurised Mercury when spun and thus heated gives out latent energy.

Vaimanika Shastra is described in Sanskrit in 100 sections, eight chapters, 500 principles and 3000 slokas including 32 techniques to fly an aircraft.

This feat was witnessed by more than three thousand people including Britishers at Chowpatty beach in 1895,
The airplane was aloft at nearly 200 metres height and was airborne for 18 minutes.

Vedic Vimanas or flying saucers used mercury vortex ion engines. The ion engine was first demonstrated by German-born NASA scientist Ernst Stuhlinger.
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SOURCE : http://ajitvadakayil.blogspot.in/2011/11/shivkur-bapuji-talpade-nobel-prize-and.html
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— with Ravindra Panday.

Photo: Vedic Vimanas
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Shivkur bapuji talpade was the first man to fly an unmanned flying saucer.

 It was an advanced Vedic Mercury ion plasma , imploding and expanding vortex noiseless flying machine , which could move in all directions. Accelerated pressurised Mercury when spun and thus heated gives out latent energy.

Vaimanika Shastra is described in Sanskrit in 100 sections, eight chapters, 500 principles and 3000 slokas including 32 techniques to fly an aircraft.

This feat was witnessed by more than three thousand people including Britishers at Chowpatty beach in 1895,
The airplane was aloft at nearly 200 metres height and was airborne for 18 minutes.

Vedic Vimanas or flying saucers used mercury vortex ion engines. The ion engine was first demonstrated by German-born NASA scientist Ernst Stuhlinger.
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SOURCE : http://ajitvadakayil.blogspot.in/2011/11/shivkur-bapuji-talpade-nobel-prize-and.html
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Posted in Harshad Ashodiya

भगवान के विचार हमारे जीवन मे , घर घर , समाज मे और विस्व मे जाने चाहिये


मई जब लंडन गया था . तब देखा १००० मेसे एक आदमी होगा जिसको बाइबल ना आती हो . सब को बाइबल पता और पढ़ाई के साथ . वहा सादी भी पादरी उनको ही करवाता है जो सनडे रेग्युलर चर्च मे जाता हो . हमारे यहा भी आइसा ही था . जो जनेऊ धारण करते उनको ही सादी का हक मिलता था। मई आज यहा कह रहा हु . भारत मे लोग कितना पासा दान देते है ? सिर्फ बम्बई मे गणेश पंडाल मे १२ किलो सोना !!!!! लेकिन ज्ञान के बारे मे सून्‍य …!! किसीको रामायण , महाभारत, गीता वेद और गणेश के बारे मे कुछ नहीं पता. और जो मदिरो मे पैसा चढ़ावा दिया जाता है वो तो हज के सब सीडी और माड्रेसा मे चला जाता है .
ये ज्ञान विस्तार की बात कौन करेगा ? हम भगवान को जब पैसा देते है तो वो भगवान का बन जाता है . उनका अधिकार बन जाता है . भगवान को कभी पूछा की आपके पैसो का हम क्या करे ? गीता मे कहा है …जरा पढ़ो तो सही।
आज भगवान का सारा पैसा उनके विचारो के प्रसार मे लगाना चाहिये . रामायण , गीता , महाभारत और वेद मानव मात्रा के लिये है वो समाज मे जाने चाहिये . मई पूछता हु आप अपने लड़को मे तेजस्विता , साहसिकता, निडरता, सत्यप्रियता, मातृभक्त , पितृ भक्त देखना चाहते हैकि नहीं ? ये सब गुण कहा मिलेंगे ? बुजुर्गो से अलग रह कर पति कमाने जाता है पत्नी कमाने जाती है समय कब मिलेगा ?
लोग मानते है वेद भक्ति विसायक है ….लेकिन सत्य यह है वेद जीवन विसायक है. वस्तु शास्त्रा ( घर बनाने के लिये ), आयुर्वेद ( दवा के लिये ) गान्धर्वा वेद ( संगीत कला ) इत्यादि वेद से ही लिया गया है.
मई एक सत्य उदाहरण देता हु रामायण पढ़ने के बाद स्त्री के पति के लिये फरियाद काम हो जाती है सीता का राम के लिये प्यार देख कर उनको भी आइसा बनाने को जी चाहता है
इतनाही कहता हु . भगवान के विचार हमारे जीवन मे , घर घर , समाज मे और विस्व मे जाने चाहिये

मई जब लंडन गया था . तब देखा १००० मेसे एक आदमी होगा जिसको बाइबल ना आती हो . सब को बाइबल पता और पढ़ाई के साथ . वहा सादी भी पादरी उनको ही करवाता है जो सनडे रेग्युलर चर्च मे जाता हो . हमारे यहा भी आइसा ही था . जो जनेऊ धारण करते उनको ही सादी का हक मिलता था। मई आज यहा कह रहा हु . भारत मे लोग कितना पासा दान देते है ? सिर्फ बम्बई मे गणेश पंडाल मे १२ किलो सोना !!!!! लेकिन ज्ञान के बारे मे सून्‍य ...!! किसीको रामायण , महाभारत, गीता वेद और गणेश के बारे मे कुछ नहीं पता. और जो मदिरो मे पैसा चढ़ावा दिया जाता है वो तो हज के सब सीडी और माड्रेसा मे चला जाता है . 
ये ज्ञान विस्तार की बात कौन करेगा ? हम भगवान को जब पैसा देते है तो वो भगवान का बन जाता है . उनका अधिकार बन जाता है . भगवान को कभी पूछा की आपके पैसो का हम क्या करे ? गीता मे कहा है ...जरा पढ़ो तो सही। 
आज भगवान का सारा पैसा उनके विचारो के प्रसार मे लगाना चाहिये . रामायण , गीता , महाभारत और वेद मानव मात्रा के लिये है वो समाज मे जाने चाहिये . मई पूछता हु आप अपने लड़को मे तेजस्विता , साहसिकता, निडरता, सत्यप्रियता, मातृभक्त , पितृ भक्त देखना चाहते हैकि  नहीं ? ये सब गुण  कहा मिलेंगे ? बुजुर्गो से अलग रह कर पति कमाने जाता है पत्नी कमाने जाती है समय कब मिलेगा ? 
लोग मानते है वेद भक्ति विसायक है ....लेकिन सत्य यह है वेद जीवन विसायक है. वस्तु शास्त्रा  ( घर बनाने के लिये ), आयुर्वेद ( दवा के लिये ) गान्धर्वा वेद ( संगीत कला ) इत्यादि वेद  से ही लिया गया है.
मई एक सत्य  उदाहरण देता हु  रामायण पढ़ने के बाद स्त्री के पति के लिये फरियाद काम हो जाती  है सीता का राम के लिये प्यार देख कर उनको भी आइसा बनाने को जी चाहता है 
इतनाही कहता हु . भगवान के विचार हमारे जीवन मे , घर घर , समाज मे और विस्व मे जाने चाहिये
Posted in रामायण - Ramayan

accessing the Mewar Ramayana


Curator’s perspective: accessing the Mewar Ramayana

The digital version of the complete Valmiki Ramayana prepared for  Rana Jagat Singh of Mewar in 1649-53 was launched on 21 March at the CSMVS, Mumbai, making freely available to the world one of the greatest achievements of Indian art.  For the complete digital version of the manuscript together with descriptions of the paintings and essays on its various aspects, see www.bl.uk/ramayana.  My own involvement with the manuscript goes back to 1971 when as a young Sanskritist straight from Oxford I first joined the British Museum, before the collections were transferred to the British Library in 1973.  I spent a lot of time exploring the oriental select manuscripts lobby, pulling the manuscripts off the shelf one by one for a brief examination.  The bound manuscripts were kept in so far as possible in strict numerical sequence in the main runs of Additional and Oriental manuscripts, so that Arabic, Persian, Hebrew or Sanskrit manuscripts could be found side by side, encouraging a serendipitous tendency to explore other cultures.  I was vaguely aware of the great Mughal manuscripts in the collections, the subject of British Library exhibitions in 1982 and 2012, but was there I wondered anything comparable from the Hindu world?

Add.15295 cover

Add.15295 doublure
Covers and doublure of a volume of the Ramayana as bound in the British Museum bindery in 1844.  British Library, Add.15295.  noc

I soon found three massive bound volumes which announced themselves on the spines as five volumes of the Ramayana, books 1, 2, 4, 6 and 7.  On hauling them off the shelf and opening them I found them crammed with paintings.  Each of the volumes had had all its folios, the unillustrated ones as well as the full page paintings, let into heavy guard papers which were then bound up in these elaborate bindings.  The folios being in landscape format, the volumes had to be turned on their sides to be read.  On further investigation, one of the volumes, the Bala Kanda or first book, with over 200 paintings, turned out to have been written in 1712 in Udaipur under Maharana Sangram Singh (Add.15295), but the other four books containing 286 full page paintings were prepared in Udaipur for Rana Jagat Singh between 1649 and 1652, as well as in the first year of his successor Rana Raj Singh in 1653 (Add.152396-7).  They had, I found, never been exhibited, since the volumes were too large to fit into the department’s then exhibition cases; they had never been lent to be exhibited elsewhere, not even to the great exhibition of Indian art at Burlington House in 1947, since the British Museum did not then lend at all; and I could find only one brief reference to them in the art historical literature, in Douglas Barrett and Basil Gray’s Indian Painting of 1963.  They were of course mentioned in Cecil Bendall’s Catalogue of Sanskrit Manuscripts in the British Museum (London, 1902), but he was concerned about the text and not the pictures:  back then in 1902 no one in the west knew anything about Indian painting, while A.K. Coomaraswamy had yet to publish his book on Rajput painting.  In 1971 when I told those of my colleagues who were interested in Persian and Indian painting about these great volumes, my excitement was greeted with some indifference: they knew of their existence of course, but Rajput painting and manuscripts did not conform to Mughal standards of painting, let alone Persian.  The volumes turned out to be illustrated in three different styles of contemporary Mewar painting, involving the artists Sahib Din and Manohar and their studios and an unknown master working in a mixed Mewar-Deccani style.

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Hanuman espies Rama and Laksmana as they approach Lake Pampa.  Ramayana, Kiskindha Kanda.  Mewar-Deccani style, Udaipur, 1653.  British Library, Add.15297(1), f.2r.  noc

Since that to me momentous discovery in 1971, I have been occupied with trying to publish these volumes and to place them within their artistic and cultural contexts.  I had found only four volumes of Jagat Singh’s Ramayana – where were the other three?  I soon found some of the original Bala Kanda of 1649 ascribed to the artist Manohar in the then Prince of Wales Museum in Bombay, and most of the rest of the paintings in the book in a private collection in that city.  But when Dr Moti Chanda published some of its paintings in 1955, he was unaware of the four London volumes.  It emerged that one volume, book 3, the Aranya Kanda or Forest book, was still in Udaipur.  It had been transferred along with the rest of the royal Mewar library to the Udaipur branch of the Rajasthan Oriental Research Institute, and was subsequently moved to that institute’s headquarters in Jodhpur.  In 1982 the four London volumes formed some of the highlights of my exhibition The Art of the Book in India in the British Library.

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Hanuman is brought bound before Ravana and his tail set on fire.  Ramayana, Sundara Kanda.  Mewar-Deccani style, Udaipur, c. 1650.  British Library, IO San 3621, f.9r.  noc

While I was preparing that exhibition Mildred Archer and Toby Falk, who had been working on a catalogue of the Indian miniatures in the then separate India Office Library, brought to my attention a volume of 18 paintings of a Sundara Kanda that had been acquired in 1912.  This it seems was what remained of the final volume to be unearthed and I included it in my exhibition.  I also brought to London for the exhibition folios from the two volumes still in India, thereby uniting the entire manuscript for the first time since 1820.  Since then I have published various articles on different aspects of them and other scholars including Vidya Dehejia and Andrew Topsfield have also worked on them, but the task is immense, since we are concerned here with over 400 paintings as well as a most interesting text, which is earlier than most of the manuscripts used for the critical edition of the Ramayana prepared in Baroda in 1960-75.

Add.Or.4662
Maharana Bhim Singh of Mewar (reg. 1778-1828) out hunting.  Mewar, 1810-20.  British Library, Add.Or.4662.  noc

But how did these volumes get to London in the first place?  Maharana Bhim Singh of Mewar was the typical Rajput ruler of the time, more interested in hunting and grand festivals than in literary pursuits, but he did revive the royal painting studio.  He was on very friendly terms with Captain James Tod, the future historian of the Rajputs, who was appointed in 1818 as the East India Company’s Agent to the western Rajput states.   On Tod’s final departure from Udaipur in 1820 the Maharana presented to him four volumes of Jagat Singh’s Ramayana as well as the Bala Kanda of 1712 prepared under Sangram Singh.   Tod on his return to London in 1823 presented the five volumes to the Duke of Sussex, one of the younger sons of King George III, who had accumulated a vast and important library, and it was at the sale of the Duke’s library in 1844 that the five volumes were purchased for the British Museum.  They were still in bundles in their loose-leaf traditional format and it was then that they were bound up in their handsome bindings, the enormous Bala Kanda in one volume (Add.15295) and the remaining four books in two volumes (Add.15296 and Add.15297).

It emerged over the 40 years since 1971 that the bound volumes in London had kept the paintings in absolutely pristine condition, since up to that time scarcely anyone had looked at them, but as I and other scholars turned their pages in subsequent years it became increasingly obvious that the paintings were suffering, since the folios housed in their rigid bindings could not be turned without the paintings flexing and with that the ensuing risk of the pigments flaking.  One of my first tasks was to organise the splitting of Add.15297 since the two heavily illustrated books within, including Sahib Din’s masterpiece the Yuddha Kanda (Book 6), were most at risk.

Add_15297(1)_f.150r
Hanuman disturbs the divine inhabitants of the Himalaya when fetching herbs to cure Laksmana who had been wounded by Ravana.  Ramayana, Yuddha Kanda.  By Sahib Din, Udaipur, 1652.  British Library, Add.15297(1), f.150r.  noc

Add_15297(2)_f.88r
In Valmiki’s hermitage Lava and Kusa recite the story of Rama before Satrughna.  Ramayana, Uttara Kanda.  Style of Manohar, Udaipur, 1653.  British Library, Add.15297(2), f.88r.  noc

Book 7 the Uttara Kanda was removed and a new binding matching the original was prepared for it, as well as a new spine for the Yuddha Kanda.  In 1995, some 20 folios concerned with Rama’s quest for Sita were detached and mounted separately in an exhibition at the British Library, The Mythical Quest, and were later lent to several exhibitions in the UK as well as to the Asian Civilizations Museum, Singapore.

It seemed to me many years ago that the best way to ensure the safety of the paintings was to dismantle the volumes entirely and mount the paintings separately, but this raised opposition within the Library as the volumes themselves were of great historic interest.  However my view eventually prevailed.  The volumes were dismantled and the paintings individually mounted and a large part of the London volumes were shown in a grand Ramayana exhibition in the British Library in 2008 with my accompanying book published both in London and in India.  From them on it was but a step to conceive of reuniting the whole manuscript digitally, not just the paintings but the text as well, so that scholars could work in particular on the relationship between text and painting, and also so that everyone could have access to one of the greatest monuments of Indian art.

 J.P. Losty, Curator of Visual Arts (Emeritus)  ccownwork

– See more at: http://britishlibrary.typepad.co.uk/asian-and-african/2014/04/page/2/#sthash.nmG13n3H.dpuf

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

Patna ghandhi maidan


अति संवेदनशील खबर जरूर पढ़ें —————-
मित्रों देश को ऑस्थिर कर विदेशी धार्मिक षड्यंत्रकारी शक्तियाँ देश में अपनी सत्ता और साम्राज्य बनाने और आपकी मानशिकता को बदलने और भारतीय समाज में संस्कृति को नीचा और गन्दा साबित कर क्रुप्रचार का सहारा ले ,,अपने ईसाई और क्रुरानी धर्म की जड़ें पुरे देश में 65 वर्षों में कांग्रेस के शाषनकाल में बुरितरेह देश में सक्रिय हो चुकी हैं ,,,ये परम्परा कांग्रेस को अंग्रेजों द्वारा विरासत में मिली है जिसके द्वारा 65 वषों मैं 2500 दंगे और हादसों का (डिवाइड एंड रूल) साजिश से पुरे देश को अइस्थिर और अराजकता के बल पर सत्ता हाशिल करती आ रही थी ? इन साजिशों को अंजाम देनेवाले मास्टर-माइंड और सडयंत्रकारियों को बहुत ही आसानी से पहचान सकते है , ये विदेशी कालेधन पर पलनेवाले हिंजड़े सेकुलरवादी बन महत्वपूर्ण पदों पर आसीन , अरस्तु, प्लेटो, सुकरात, के ज्ञान-आदर्शों पर चलने वाले मैकोले की विदेशी शिक्षा के भारतीय विदेशी गुलाम , प्रभुत्व बुद्धजीवी बता , भारतीय समाज मैं जहर भरने और समाज को ईसाई बनाने मैं टीवी फ़िल्में, विज्ञापन, समाचारों और पत्रपरिकाओं पर बेसुमार कालेधन से इन सड़यंत्रकारी विदेशी माफियाओं को मदद कर इन हदशों को अंजाम देने और समाज को ऐस्थिर करने में विदेशीयों को भरपूर मदद करती हैं
इसी साज़िशों में एक दंगा ब्रिगेड है ! धार्मिक उन्माद को किस तरह अंजाम और कालेधन की व्यवस्थित कर अंजाम तक कैसे पहुचाया जाता है यह सायद आप के संज्ञान में न हो। …. उदाहरण के लिए , अब जरा सोचिये की किसी भारतीय को कहा जाये की तुम्हें कुम्भ, या भारतीय धार्मिक मेले मेंजा कर अस्थिर्ता या अराजकता फैलानी है ,,सायद कोई तैयार न हो ,,अगर होभी जाये तो साजिश का भांडा फूट सकता है इस लिए ये ईसाई वह क्रुरानी नासूरों का सहारा सहारा लेती हैं बेखौफ और आर्थिक और विदेशी नियंत्रित राजनितिकदलों के इसारे पर नरशिंहार कर डालते हैं उदाहरण के लिए , गोधरा ट्रेन हदशा , उप्र में आजम खान का हिंदुओं को खून का कुंभमेला , और अब गांधी मैदान में दशहरे पर इन माफियाओं का खूनी प्लान ??????
अब जरा गौर करें क़ि रावण दहन के उपरांत 6 बड़े दरवाजे क्यों नहीं खोले गये, की भारतीय समाज भिन्न भिन्न दिशाओं की तरफ निकल जाते , ,,,,,दूसरा, जो रास्ता था वोह 5 लाख दरसकों के लिए 2.5 का क्यों बनाया गया ,,,तीसरा लाइट पहले से ही क्यों गायब करी गयी , महिलाओं और मर्दों को एक ही जगह से क्यों निकला जा रहा था ,,,,,cc टीवी कैमरे कहाँ थे ,,,,,वोह जो बेवजह जनता के बीच बेहतहासा भाग भाग कर शोर मचा रहे थे की करेंट , हाई टेंसन तार टूट गया भागो भागो चिल्लाना सुरु कर रहे थे , राजनाथ सिंह , सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, राहुल की तरह वहां के चीफमिनिस्टर क्यों एक घंटा पहले ही भाग खड़े हुए ,,,,,और बिहार के सारे मंत्री घटना के वक्त एक होटल में शराब और अईयाशियां की पैसे से कर रहे थे ,,,अब शायद हम मित्रों को सारी साजिशों की हकीकत की असलियत का घिन्नौना रूप समझ आ गया होगा ,,और सम्पूर्ण ईसाई साजिश समझ चुकें होंगे। …… अब सोचए की इसके बाद यह हरामी करते क्या हैं यह तो और बुरी है ,,,,,,इसके बाद कुरुरानी नासूर मदद के बहाने मासूम लड़कियों को जो उनकी टारगेट पर थी उन्हें गायब कर चुकें होंगें ,,,और लूट-पाट अलग जेवरात, पर्श, फ़ोन, इत्यादि ,,,और दूसरा ईसाई माफिया पुरे देश में मजबूर हिन्दुओं के घर जा जा कर उनसे कहेंगे की तुम्हारे भगवान ने क्या तुम्हारी मदद की ,,,हमारे धर्म में तो ऐसा नहीं होता ,,,, लिखते हुये बहुत ही अफ़सोस होता है की यह कोई एक घटना नहीं , चार हजार सेभी ज्यादा यह खूनी साजिशों को कांग्रेस की यहूदी सरकारें देश मैं ईसाई साम्रराज्य को इस्थापित करने के लिए अंजाम दे चुकी हैं ,,,,,,और हम नहीं जागे ,,,,,,वह दोस्ती और भाईचारे के सेकुलर नारे के साथ ,,,भारतीय संस्कृति और समाज को बर्बाद और जड़ से मिटने के लिए प्रतिपल अपनी जड़ें बखूबी जमा चुकी हैं ,,,क्या आप जागें हैं जागिये और जगाइये ,,,,,,अपना देश और धर्म बचाईये ,,,दसहरे का मतलब , अपने अंदर का रावण नहीं ,,,समाज और वैदिक धर्म के दुश्मन दैत्यों का वध करना है ,,,,,सोचए आप के खून को पी रहे मच्छर को आप क्यों मर देते हो ,,,,,,यह वाही खुनी दानव और दैत्य हैं ,,शास्त्रों की पूजा के बाद इन्हीं दैत्यों के वध का संकल्प लिया जाता है ,,की भारतीय संस्कृति और समाज बचा रहे ,,,जागिये

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मित्रों देश को ऑस्थिर कर विदेशी धार्मिक षड्यंत्रकारी शक्तियाँ देश में अपनी सत्ता और साम्राज्य बनाने और आपकी मानशिकता को बदलने और भारतीय समाज में संस्कृति को नीचा और गन्दा साबित कर क्रुप्रचार का सहारा ले ,,अपने ईसाई और क्रुरानी धर्म की जड़ें पुरे देश में 65 वर्षों में कांग्रेस के शाषनकाल में बुरितरेह देश में सक्रिय हो चुकी हैं ,,,ये परम्परा कांग्रेस को अंग्रेजों द्वारा विरासत में मिली है जिसके द्वारा 65 वषों मैं 2500 दंगे और हादसों का (डिवाइड एंड रूल) साजिश से पुरे देश को अइस्थिर और अराजकता के बल पर सत्ता हाशिल करती आ रही थी ? इन साजिशों को अंजाम देनेवाले मास्टर-माइंड और सडयंत्रकारियों को बहुत ही आसानी से पहचान सकते है , ये विदेशी कालेधन पर पलनेवाले हिंजड़े सेकुलरवादी बन महत्वपूर्ण पदों पर आसीन , अरस्तु, प्लेटो, सुकरात, के ज्ञान-आदर्शों पर चलने वाले मैकोले की विदेशी शिक्षा के भारतीय विदेशी गुलाम , प्रभुत्व बुद्धजीवी बता , भारतीय समाज मैं जहर भरने और समाज को ईसाई बनाने मैं टीवी फ़िल्में, विज्ञापन, समाचारों और पत्रपरिकाओं पर बेसुमार कालेधन से इन सड़यंत्रकारी विदेशी माफियाओं को मदद कर इन हदशों को अंजाम देने और समाज को ऐस्थिर करने में विदेशीयों को भरपूर मदद करती हैं  
इसी साज़िशों में एक दंगा ब्रिगेड है ! धार्मिक उन्माद को किस तरह अंजाम और कालेधन की व्यवस्थित कर अंजाम तक कैसे पहुचाया जाता है यह सायद आप के संज्ञान में न हो। .... उदाहरण के लिए , अब जरा सोचिये की किसी भारतीय को कहा जाये की  तुम्हें कुम्भ, या भारतीय धार्मिक मेले मेंजा कर  अस्थिर्ता या अराजकता फैलानी है ,,सायद कोई तैयार न हो ,,अगर होभी जाये तो साजिश का भांडा फूट सकता है इस लिए ये ईसाई वह क्रुरानी नासूरों का सहारा सहारा लेती हैं बेखौफ और आर्थिक और विदेशी नियंत्रित राजनितिकदलों के इसारे पर नरशिंहार कर डालते हैं उदाहरण के लिए , गोधरा ट्रेन हदशा , उप्र में आजम खान का हिंदुओं को खून का कुंभमेला , और अब गांधी मैदान में दशहरे पर इन माफियाओं का खूनी प्लान ??????
अब जरा गौर करें क़ि रावण दहन के उपरांत 6 बड़े दरवाजे क्यों नहीं खोले गये,  की भारतीय समाज भिन्न भिन्न दिशाओं की तरफ निकल जाते , ,,,,,दूसरा, जो रास्ता था वोह 5 लाख दरसकों के लिए 2.5 का क्यों बनाया गया ,,,तीसरा लाइट पहले से ही क्यों गायब करी गयी ,  महिलाओं और मर्दों को एक ही जगह से क्यों निकला जा रहा था ,,,,,cc टीवी कैमरे कहाँ थे ,,,,,वोह जो बेवजह जनता के बीच बेहतहासा भाग भाग कर शोर मचा रहे थे की करेंट , हाई टेंसन तार टूट गया भागो भागो चिल्लाना सुरु कर रहे थे , राजनाथ सिंह , सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, राहुल की तरह वहां के चीफमिनिस्टर क्यों एक घंटा पहले ही भाग खड़े हुए ,,,,,और बिहार के सारे मंत्री घटना के वक्त एक होटल में शराब और अईयाशियां की पैसे से कर रहे थे ,,,अब शायद हम मित्रों को सारी साजिशों की हकीकत की असलियत का घिन्नौना रूप समझ आ गया होगा ,,और सम्पूर्ण ईसाई साजिश समझ चुकें होंगे। …… अब सोचए की इसके बाद यह हरामी करते क्या हैं यह तो और बुरी है ,,,,,,इसके बाद कुरुरानी नासूर मदद के बहाने मासूम लड़कियों को जो उनकी टारगेट पर थी उन्हें गायब कर चुकें होंगें ,,,और लूट-पाट अलग जेवरात, पर्श, फ़ोन, इत्यादि ,,,और दूसरा ईसाई माफिया पुरे देश में मजबूर हिन्दुओं के घर जा जा कर उनसे कहेंगे की तुम्हारे भगवान ने क्या तुम्हारी मदद की ,,,हमारे धर्म में तो ऐसा नहीं होता ,,,, लिखते हुये बहुत ही अफ़सोस होता है की यह कोई एक घटना नहीं , चार हजार सेभी ज्यादा यह खूनी साजिशों को कांग्रेस की यहूदी सरकारें देश मैं ईसाई साम्रराज्य को इस्थापित करने के लिए अंजाम दे चुकी हैं ,,,,,,और हम नहीं जागे ,,,,,,वह दोस्ती और भाईचारे के सेकुलर नारे के साथ ,,,भारतीय संस्कृति और समाज को बर्बाद और जड़ से मिटने के लिए प्रतिपल अपनी जड़ें बखूबी जमा चुकी हैं ,,,क्या आप जागें हैं जागिये और जगाइये ,,,,,,अपना देश और धर्म बचाईये ,,,दसहरे का मतलब , अपने अंदर का रावण नहीं ,,,समाज और वैदिक धर्म के दुश्मन दैत्यों का वध करना है ,,,,,सोचए आप के खून को पी रहे मच्छर को आप क्यों मर देते हो ,,,,,,यह वाही खुनी दानव और दैत्य हैं ,,शास्त्रों की पूजा के बाद इन्हीं दैत्यों के वध का संकल्प लिया जाता है ,,की भारतीय संस्कृति और समाज बचा रहे ,,,जागिये
Posted in संस्कृत साहित्य

राष्ट्र-रक्षा केलिये सभी द्वारा क्षत्रिय धर्म पालन-


राष्ट्र-रक्षा केलिये सभी द्वारा क्षत्रिय धर्म पालन-(१) प्राचीन काल में परशुराम जी ने शस्त्र और शास्त्र दोनों की पूजा की थी, जिनकी स्तुति में कहते हैं-अग्रतः सकलं शास्त्रं पृष्ठतः सशरं धनुः।
(२) उसके बाद मगध में अजिन ब्राह्मण के घर उत्पन्न बुद्ध ने असुर (असीरिया की रानी सेमीरामी) द्वारा ३५ लाख सेना के आक्रमण काल में आबू पर्वत पर राजा शूद्रक के नेतृत्व में ४ राजाओं का संघ बनाया जब ७५६ ई.पू. में शूद्रक शक आरम्भ हुआ। शूद्रक स्वयं ब्राह्मण थे, नाम वैश्य जैसा था-इन्द्राणीगुप्त, किन्तु ४ राजाओं का संघ बनाने के कारण उनको सम्मान के लिये शूद्रक कहा गया-आशुद्रवति इति शूद्रः। भविष्य पुराण, प्रतिसर्ग पर्व १, अध्याय ६-
एतस्मिन्नेव काले तु कान्यकुब्जो द्विजोत्तमः। अर्बुदं शिखरं प्राप्य ब्रह्महोममथाकरोत्।४५॥
वेदमन्त्रप्रभावाच्च जाताश्चत्वारि क्षत्रियाः। प्रमरस्सामवेदी च चपहानिर्यजुर्विदः॥४६॥
त्रिवेदी च तथा शुक्लोऽथर्वा स परिहारकः॥४७॥
समुद्रगुप्त का कृष्ण चरित-अथ राज कवयः
पुरन्दरबलो विप्रः शूद्रकः शास्त्रशस्त्रवित्। धनुर्वेद चौरशास्त्रं रूपके द्वे तथाकरोत्॥६॥
स विपक्षविजेताभूच्छास्त्रैः शस्त्रश्च कीर्तये॥ बुद्धिवीर्येनास्य वरे सौगताश्च प्रसेहिरे॥७॥
स तस्तारारिसैन्यस्य देहखण्डै रणे महीम्। धर्माय राज्यं कृतवान् तपस्विव्रतमाचरन्॥८॥
शस्त्रार्जितमयं राज्यं प्रेम्णाऽकृत निजं गृहम्। एवं ततस्तस्य तदा साम्राज्यं धर्मशासितम्॥९॥
कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक का भरतवाक्य-भवतु तव विडौजाः प्राज्यवृष्टिः प्रजासु त्वमपि विततयज्ञो वज्रिणं भावयेथाः।
गणशत परिवर्तैरेवमन्योन्यकृत्यैर्नियतमुभयलोकानुग्रहश्लाघनीयैः॥
यहां भी मालवगण के संस्थापक शूद्रक को १०० गणों का शासक कहा गया है। उनके आबू पर्वत के यज्ञ का भी निर्देश है जिसमें ४ अग्निवंशी राजाओं का संघ बना। अग्निमित्र या परमार विक्रमादित्य गण के शासक नहीं थे।
(३) प्रायः १०५० ई. में ११ लाख सेना द्वारा गजनवी के भतीजे सालार मसूद द्वारा अयोध्या पर आक्रमण होने पर उसे आजमगढ़ के पासी राजा सुहेल देव (इस्लामी इतिहासकारों द्वारा लिखित नाम) द्वारा बहराइच युद्ध में पूरी तरह निर्मूल किया गया तथा राममन्दिर का पुनर्निर्माण किया गया जिसे १५२७ में बाबर ने पुनः तोड़ा।
(४) हल्दीघाटी के युद्ध में राणाप्रताप की २२,००० सेना में अधिकांश भील थे, जिनमें १४,००० मारे गये। भील भी जनेऊ पहनते थे, १४,००० शवों के जनेऊ का वजन ७४ मन था, जो अकबर ने इकट्ठा कर नपवाया था। प्रत्येक जनेऊ प्रायः २५० ग्राम का होगा-यह उलटा जनेऊ तलवार लटकाने के लिये होता है। उलटा जनेऊ युद्ध या श्राद्ध में पहनते हैं।
(५) गुरु तेगबहादुर ने बिहार में सभी जातियों के कई परिवारों को तलवार बांटे थे। उनके द्वारा दिये गये तलवार की पूजा आज भी कई ब्राह्मण और अन्य जातियों के परिवारों में होती है। कटिहार के पूर्व सांसद कमलनाथसिंह ठाकुर के यहां भी ऐसी तलवार थी। गुरु गोविन्द सिंह जी ने भी सन्त-सिपाही का आदर्श प्रस्तुत किया।