Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

याद करो वो दिन जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस


याद करो वो दिन जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
हिटलर के पास गए थे…………….जब नेताजी ने भारत को आज़ाद करने की बात की तब हिटलर ने कहा था…………….कि भारत को अंग्रेजों का ही गुलाम रहने दो ।
तब नेताजी ने कहा क्यूँ ??
इस पर हिटलर ने कहा आप भारत को अंग्रेजों से आज़ाद तो करा दोगे लेकिन भारत कल किसी “ऐरे गैरे” का गुलाम हो जाएगा…… अंग्रेजों का गुलाम रहा तो अंग्रेज़ फिर भी भारत
का कुछ काम ठीक करेंगे लेकिन अगर भारत किसी”ऐरे गैरे” का गुलाम हो गया तो फिर आपका प्रयत्न और सफलता दोनों बेकार जाएंगी….. और भारत किसी बुरे दिनों में फंस जाएगा।आओ क्रांति करें, 1857 का इतिहास
दोहराएँ…….पुराने दिनों कि यादें ताज़ा करें !
देश और धर्म का अपमान, नहीं सहेगा हिन्दुस्तान…

याद करो वो दिन जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
हिटलर के पास गए थे................जब नेताजी ने भारत को आज़ाद करने की बात की तब हिटलर ने कहा था................कि भारत को अंग्रेजों का ही गुलाम रहने दो ।
तब नेताजी ने कहा क्यूँ ??
इस पर हिटलर ने कहा आप भारत को अंग्रेजों से आज़ाद तो करा दोगे लेकिन भारत कल किसी "ऐरे गैरे" का गुलाम हो जाएगा...... अंग्रेजों का गुलाम रहा तो अंग्रेज़ फिर भी भारत
का कुछ काम ठीक करेंगे लेकिन अगर भारत किसी"ऐरे गैरे" का गुलाम हो गया तो फिर आपका प्रयत्न और सफलता दोनों बेकार जाएंगी..... और भारत किसी बुरे दिनों में फंस जाएगा।आओ क्रांति करें, 1857 का इतिहास
दोहराएँ.......पुराने दिनों कि यादें ताज़ा करें !
देश और धर्म का अपमान, नहीं सहेगा हिन्दुस्तान...
Posted in Love Jihad

लव-जिहाद


कुरआन से लव-जिहाद का प्रमाण:

وَّالْمُحْصَنٰتُ مِنَ النِّسَاۗءِ اِلَّا مَامَلَكَتْ اَيْمَانُكُمْ ۚ كِتٰبَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ ۚ وَاُحِلَّ لَكُمْ مَّا وَرَاۗءَ ذٰلِكُمْ اَنْ تَبْتَغُوْا بِاَمْوَالِكُمْ مُّحْصِنِيْنَ غَيْرَ مُسٰفِحِيْنَ ۭ فَـمَا اسْتَمْتَعْتُمْ بِهٖ مِنْھُنَّ فَاٰتُوْھُنَّ اُجُوْرَھُنَّ فَرِيْضَةً ۭ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيْمَا تَرٰضَيْتُمْ بِهٖ مِنْۢ بَعْدِ الْفَرِيْضَةِ ۭ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ
عَلِــيْمًا حَكِـيْمًا

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‎कुरआन से लव-जिहाद का प्रमाण: وَّالْمُحْصَنٰتُ مِنَ النِّسَاۗءِ اِلَّا مَامَلَكَتْ اَيْمَانُكُمْ ۚ كِتٰبَ اللّٰهِ عَلَيْكُمْ ۚ وَاُحِلَّ لَكُمْ مَّا وَرَاۗءَ ذٰلِكُمْ اَنْ تَبْتَغُوْا بِاَمْوَالِكُمْ مُّحْصِنِيْنَ غَيْرَ مُسٰفِحِيْنَ ۭ فَـمَا اسْتَمْتَعْتُمْ بِهٖ مِنْھُنَّ فَاٰتُوْھُنَّ اُجُوْرَھُنَّ فَرِيْضَةً ۭ وَلَا جُنَاحَ عَلَيْكُمْ فِيْمَا تَرٰضَيْتُمْ بِهٖ مِنْۢ بَعْدِ الْفَرِيْضَةِ ۭ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَلِــيْمًا حَكِـيْمًا اور حرام کی گئی شوہر والی عورتیں مگر وہ جو تمہاری ملکیت میں آ جائیں (١) اللہ تعالیٰ نے احکام تم پر فرض کر دئیے ہیں، ان عورتوں کےسوااورعورتیں تمہارے لئے حلال کی گئیں کہ اپنے مال کے مہر سے تم ان سے نکاح کرنا چاہو برے کام سے بچنے کے لئے نہ کہ شہوت رانی کے لئے (٢) اس لئے جن سے تم فائدہ اٹھاؤ انہیں ان کا مقرر کیا ہوا مہر دے دو (٣) اور مہر مقرر ہونے کے بعد تم آپس کی رضامندی سے جو طے کر لو تم پر کوئی گناہ نہیں (٤) कुरआन अनुवाद फारुखान :- और वे औरतें भी हराम हैं जो किसी दूसरे की निकाह में हों अलबत्ता ऐसी औरतों की बात और है, जो युद्ध में तुम्हारे हाथ आएं | यह अल्लाह का कानून है, जिसका पालन तुम्हारे लिए अनिवार्य कर दिया गया है | इसके अलावा जितनी औरतें हैं उन्हें अपने मालों के द्वारा हासिल करना तुम्हारे लिए हलाल कर दिया है, शर्त यह है कि निकाह के घेर में लेकर उन्हें सुरक्षित करो, ना कि स्वच्छन्द कामतृप्ति करने लगो | फिर जो दाम्पत्य जीवन का आनंद तुम उनसे लो, उसके बदले में उनके महर अनिवार्य समझते हुए अदा करो | अलबत्ता, महर निश्चित हो जाने के बाद आपस की रजामंदी से तुम्हारे बीच अगर कोई समझौता हो जाए तो उसमें कोई हर्ज नहीं | अल्लाह सबकुछ जानने वाला तत्वदर्शी है | - सूरा निसा आयात नंबर -24 Also (forbidden are) women already married, except those (slaves) whom your right hands possess. Thus has Allah ordained for you. All others are lawful, provided you seek (them in marriage) with Mahr (bridal-money given by the husband to his wife at the time of marriage) from your property, desiring chastity, not committing illegal sexual intercourse, so with those of whom you have enjoyed sexual relations, give them their Mahr as prescribed; but if after a Mahr is prescribed, you agree mutually (to give more), there is no sin on you. Surely, Allah is Ever All-Knowing, All-Wise.|‎
Posted in PM Narendra Modi

मनमोहन सिंह की आवाज अपने ही देश में कोई नहीं सुन सका मोदी जी की आवाज़ दुनिया पूरी दुनिया में गूंज रही है।
• मोदी ने कहा था एक दिन अमेरिका लाइन में लगेगा आज सच हो गया— सभी अमेरिकन कांग्रेस को मोदी ने लाइन में खड़ा करवा ही दिया
• 64 साल का इंसान उपवास में भी 65 मिनट तक बिना रुके धारा प्रवाह वाणी में गर्जना करते देख… “आज अमेरिका भी मान गया ये हिन्दुश्तान का शेर है”
• जिस तरह का माहौल अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर में बना हुआ है, मुझे शक है कि कल से सभी अमेरिकन “हेलो फ्रेन्डस, हाऊ आर यू” के जगह पर “जय श्री कृष्णा, केम छो मित्रों” कहना न शुरू कर दें।
• मोदी जी भी बहुत शरारती हैं सेकुलरों को जलाने के लिए भगवा जैकेट पेहेन कर मैडिसन स्क्वायर गार्डन पहुंचे हैं। आज तो सेकुलरों का बर्नोल से भी काम नहीं चलने वाला है। आज पक्का सेक्युलरों को फायर ब्रिगेड की जरूरत पड़ने वाली है।
• अब समझ में आया अमेरिका को सेक्युलर नेता क्यों मोदी जी को वीसा नहीं देने के लिए चिट्ठियाँ लिखे थे । चुनाव के पहले आज जैसा माहौल बनता तो 44 सीटे भी नहीं मिल पाती बाबा को ।
• इसे मोदी का जादू कहो या हिन्दुओं की एकता की ताकत कि पिछले 67 सालों में हिन्दुस्तान के जितने भी प्रधान मंत्री हुये सभी ने अमेरिका के आगे सर झुकाया मगर पहली बार एक शख्स के आगे अमेरिका ने सर झुकाया है।मोदी जी आने वाले कुछ महीनों में ओबामा को पछाड कर दुनिया के नंबर एक होगे और 5 साल बाद भारत दुनिया की अगुवाई करेगा।

मनमोहन सिंह की आवाज अपने ही देश में कोई नहीं सुन सका मोदी जी की आवाज़ दुनिया पूरी दुनिया में गूंज रही है।
• मोदी ने कहा था एक दिन अमेरिका लाइन में लगेगा आज सच हो गया--- सभी अमेरिकन कांग्रेस को मोदी ने लाइन में खड़ा करवा ही दिया
• 64 साल का इंसान उपवास में भी 65 मिनट तक बिना रुके धारा प्रवाह वाणी में गर्जना करते देख... "आज अमेरिका भी मान गया ये हिन्दुश्तान का शेर है"
• जिस तरह का माहौल अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर में बना हुआ है, मुझे शक है कि कल से सभी अमेरिकन "हेलो फ्रेन्डस, हाऊ आर यू" के जगह पर "जय श्री कृष्णा, केम छो मित्रों" कहना न शुरू कर दें।
• मोदी जी भी बहुत शरारती हैं सेकुलरों को जलाने के लिए भगवा जैकेट पेहेन कर मैडिसन स्क्वायर गार्डन पहुंचे हैं। आज तो सेकुलरों का बर्नोल से भी काम नहीं चलने वाला है। आज पक्का सेक्युलरों को फायर ब्रिगेड की जरूरत पड़ने वाली है।
• अब समझ में आया अमेरिका को सेक्युलर नेता क्यों मोदी जी को वीसा नहीं देने के लिए चिट्ठियाँ लिखे थे । चुनाव के पहले आज जैसा माहौल बनता तो 44 सीटे भी नहीं मिल पाती बाबा को ।
• इसे मोदी का जादू कहो या हिन्दुओं की एकता की ताकत कि पिछले 67 सालों में हिन्दुस्तान के जितने भी प्रधान मंत्री हुये सभी ने अमेरिका के आगे सर झुकाया मगर पहली बार एक शख्स के आगे अमेरिका ने सर झुकाया है।मोदी जी आने वाले कुछ महीनों में ओबामा को पछाड कर दुनिया के नंबर एक होगे और 5 साल बाद भारत दुनिया की अगुवाई करेगा।
Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक साधु नदी किनारे एक धोबी के कपड़े धोने के पत्थर पर खड़े-खड़े ध्यान करने लगे।


एक साधु नदी किनारे एक धोबी के कपड़े धोने के पत्थर पर खड़े-खड़े ध्यान करने लगे। 
इतने में धोबी गधे पर कपड़े लादे वहां आया। 
उसने साधु को देखा तो वह प्रतीक्षा करने लगा कि उसके पत्थर से साधु हटें तो वह अपना काम शुरू करे। 

कुछ देर प्रतीक्षा करने पर भी जब साधु नहीं हटे तो उसने प्रार्थना की- महात्माजी, आप पत्थर से उतरकर किनारे खड़े हो जाएं तो मैं अपने काम में लगूं।

साधु ने धोबी की बात अनसुनी कर दी। 

धोबी ने फिर प्रार्थना की, किंतु साधु ने इस बार भी ध्यान नहीं दिया। 

अब धोबी ने धीरे से साधु का हाथ पकड़कर उन्हें पत्थर से उतारने की कोशिश की।

एक धोबी के हाथ पकड़ने में साधु को अपना अपमान नजर आया उन्होंने धोबी को धक्का दे दिया। 

साधु का क्रोध देखकर धोबी की श्रद्धा भी समाप्त हो गई। 
उसने भी साधु को धक्का देकर पत्थर से हटा दिया। 

अब तो साधु धोबी से भिड़ गए। 
धोबी बलवान था, अत: उसने साधु को उठाकर पटक दिया।

साधु भगवान से प्रार्थना करने लगा- हे भगवान, मैं इतने भक्तिभाव से रोज आपकी पूजा करता हूं, फिर भी आप मुझे इस धोबी से छुड़ाते क्यों नहीं? 

जवाब में साधु ने आकाशवाणी सुनी, तुम्हें हम छुड़ाना चाहते हैं किंतु समझ नहीं आता कि दोनों में साधु कौन है और धोबी कौन? 

यह सुन साधु का घमंड चूर हो गया। 
उसने धोबी से क्षमा मांगी और वह सच्चा साधु बन गया। 

दरअसल, साधु का वेष धारण करने से नहीं, बल्कि सद्गुणों को आचरण में उतारने से साधुता आती है।
अत: गेरुए वस्त्र पहनने के पूर्व अपना मन निर्मल गुणों से युक्त करें।

एक साधु नदी किनारे एक धोबी के कपड़े धोने के पत्थर पर खड़े-खड़े ध्यान करने लगे।
इतने में धोबी गधे पर कपड़े लादे वहां आया।
उसने साधु को देखा तो वह प्रतीक्षा करने लगा कि उसके पत्थर से साधु हटें तो वह अपना काम शुरू करे।

कुछ देर प्रतीक्षा करने पर भी जब साधु नहीं हटे तो उसने प्रार्थना की- महात्माजी, आप पत्थर से उतरकर किनारे खड़े हो जाएं तो मैं अपने काम में लगूं।

साधु ने धोबी की बात अनसुनी कर दी।

धोबी ने फिर प्रार्थना की, किंतु साधु ने इस बार भी ध्यान नहीं दिया।

अब धोबी ने धीरे से साधु का हाथ पकड़कर उन्हें पत्थर से उतारने की कोशिश की।

एक धोबी के हाथ पकड़ने में साधु को अपना अपमान नजर आया उन्होंने धोबी को धक्का दे दिया।

साधु का क्रोध देखकर धोबी की श्रद्धा भी समाप्त हो गई।
उसने भी साधु को धक्का देकर पत्थर से हटा दिया।

अब तो साधु धोबी से भिड़ गए।
धोबी बलवान था, अत: उसने साधु को उठाकर पटक दिया।

साधु भगवान से प्रार्थना करने लगा- हे भगवान, मैं इतने भक्तिभाव से रोज आपकी पूजा करता हूं, फिर भी आप मुझे इस धोबी से छुड़ाते क्यों नहीं?

जवाब में साधु ने आकाशवाणी सुनी, तुम्हें हम छुड़ाना चाहते हैं किंतु समझ नहीं आता कि दोनों में साधु कौन है और धोबी कौन?

यह सुन साधु का घमंड चूर हो गया।
उसने धोबी से क्षमा मांगी और वह सच्चा साधु बन गया।

दरअसल, साधु का वेष धारण करने से नहीं, बल्कि सद्गुणों को आचरण में उतारने से साधुता आती है।
अत: गेरुए वस्त्र पहनने के पूर्व अपना मन निर्मल गुणों से युक्त करें।

Posted in रामायण - Ramayan

श्री राम की जगह (अयोध्या)


डॉ सुब्रमनियन स्वामी बताते है की सऊदी अरब में मस्जिद तोड़ते हैं क्योंकि वो कहते हैं की मस्जिद कोई धार्मिक स्थान नहीं है। यह बस एक नमाज पढने की जगह है और आप नमाज कही भी पढ़ सकते है। एक बार सऊदी अरब के राजा को अपना महल बनाना था और उसके लिए उसे जगह चाहिए थी तो उसने कहा की बिलाल मस्जिद को तोड़ डालो महल बनाने के लिए। इसपे लोगों ने कहा की इस मस्जिद में पैगम्बर मुहम्मद नमाज पढ़ते थे , इसे तो कम से कम मत तोड़ो, क्योंकि सऊदी अरब में कई बार सड़क बनाने के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है। तब वहां के राजा ने कहा की खबरदार! ऐसी बात करने से तुम्हारे दिमाग में मूर्ति पूजा का विचार आ रहा है। इस्लाम में हम मूर्ति पूजा नहीं मानते हैं। क्या फर्क पड़ता है की पैगम्बर मुहम्मद ने यहाँ पर नमाज पढ़ा? यह एक मस्जिद है और इसे हम दूसरी जगह बनायेंगे। 

मै यही कहता हूँ सभी मुसलमान भाइयों से की श्री राम की जगह (अयोध्या) में, श्री कृष्ण की जगह (मथुरा) में और भगवान् शिव की जगह काशी विश्वनाथ में जहां इन भगवानो के मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये गए थे, वहां के बजाये हम आपको दूसरी जगह मस्जिद बना कर देंगे। लेकिन जहा मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है उन्हें आप छोड़ दो। मुस्लिम छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन कई लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं की अगर हिन्दू मुस्लिम के बीच में भाईचारा की भावना आ जाएगी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे इसलिए वो ऐसा होने नहीं देते। हम मुस्लिम, इसाई और बाकि धर्मो के लोगो को एक साथ तब जोड़ सकते हैं जब हम स्पष्ट बात करें। जो हम कहें वो करें, बस उनके वोट लेने के लिए नहीं।

http://www.youtube.com/watch?v=85YxApDtCco

Subramanian Swamy

डॉ सुब्रमनियन स्वामी बताते है की सऊदी अरब में मस्जिद तोड़ते हैं क्योंकि वो कहते हैं की मस्जिद कोई धार्मिक स्थान नहीं है। यह बस एक नमाज पढने की जगह है और आप नमाज कही भी पढ़ सकते है। एक बार सऊदी अरब के राजा को अपना महल बनाना था और उसके लिए उसे जगह चाहिए थी तो उसने कहा की बिलाल मस्जिद को तोड़ डालो महल बनाने के लिए। इसपे लोगों ने कहा की इस मस्जिद में पैगम्बर मुहम्मद नमाज पढ़ते थे , इसे तो कम से कम मत तोड़ो, क्योंकि सऊदी अरब में कई बार सड़क बनाने के लिए मस्जिदों को तोड़ा जाता है। तब वहां के राजा ने कहा की खबरदार! ऐसी बात करने से तुम्हारे दिमाग में मूर्ति पूजा का विचार आ रहा है। इस्लाम में हम मूर्ति पूजा नहीं मानते हैं। क्या फर्क पड़ता है की पैगम्बर मुहम्मद ने यहाँ पर नमाज पढ़ा? यह एक मस्जिद है और इसे हम दूसरी जगह बनायेंगे।

मै यही कहता हूँ सभी मुसलमान भाइयों से की श्री राम की जगह (अयोध्या) में, श्री कृष्ण की जगह (मथुरा) में और भगवान् शिव की जगह काशी विश्वनाथ में जहां इन भगवानो के मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाये गए थे, वहां के बजाये हम आपको दूसरी जगह मस्जिद बना कर देंगे। लेकिन जहा मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है उन्हें आप छोड़ दो। मुस्लिम छोड़ने के लिए तैयार हैं, लेकिन कई लोग ऐसे हैं जो सोचते हैं की अगर हिन्दू मुस्लिम के बीच में भाईचारा की भावना आ जाएगी तो हम कहीं के नहीं रहेंगे इसलिए वो ऐसा होने नहीं देते। हम मुस्लिम, इसाई और बाकि धर्मो के लोगो को एक साथ तब जोड़ सकते हैं जब हम स्पष्ट बात करें। जो हम कहें वो करें, बस उनके वोट लेने के लिए नहीं।

http://www.youtube.com/watch?v=85YxApDtCco

Subramanian Swamy

Posted in मूर्ति पूजा - Idolatry

हमारे ऋषियों ने हमें मूर्ति पूजा करना बताया है.


हम तो श्रेष्ठ हिन्दू है..आदि काल से ही वेद ज्ञानी भी है..इसीलिए हम इधर उधर भटकते नहीं.हम मूर्ति में ही ईश्वर को मानकर उसी की पूजा करते है.क्योकि हमारे ऋषियों ने हमें मूर्ति पूजा करना बताया है.

भगवान श्रीराम ने भी लंका विजय के पहले रामेश्वर में शिवलिंग की पूजा की.
माता सीता ने भी स्वयंवर के पहले भगवती देवी की पूजा की.
रावण ने भी शिवजी की पूजा की.
शिवाजी महाराज ने भी ”भवानी”’की पूजा की .
संत ज्ञानेश्वर महाराज ने भी मूर्ति पूजा की.
स्वामी विवेकानंद जी के गुरु रामाकृष्ण परमहंस ने माँ काली की मूर्ति की पूजा की.
बाबा कीनाराम ने शिव की उपासना काशी में की.
तैलंग स्वामी ने काशी में मूर्ति पूजा की.
सिद्ध योगी देवरहवा बाबा ने मूर्ति की पूजा की.
इस्कान के संस्थापक ने भी श्रीकृष्ण की पूजा की.

मीराबाई ने श्रीकृष्ण की पूजा की.
आद्य शंकराचार्य जी ने भी शिव की पूजा की.
चारो शंकारचार्य भी मूर्ति की पूजा करते है.

हमारे पास हजारो महापुरुषों के नाम है जिन्होंने मूर्ति पूजा किया है.
यज्ञ भी पूजा का ही एक भाग है.हम यज्ञ भी करते है.मंदिरों में मूर्ति पूजा भी करते है..मंदिरों में ”यज्ञ कुंड” भी है.
TP Shukla

हम तो श्रेष्ठ हिन्दू है..आदि काल से ही वेद ज्ञानी भी है..इसीलिए हम इधर उधर भटकते नहीं.हम मूर्ति में ही ईश्वर को मानकर उसी की पूजा करते है.क्योकि हमारे ऋषियों ने हमें मूर्ति पूजा करना बताया है.

भगवान श्रीराम ने भी लंका विजय के पहले रामेश्वर में शिवलिंग की पूजा की.
माता सीता ने भी स्वयंवर के पहले भगवती देवी की पूजा की.
रावण ने भी शिवजी की पूजा की.
शिवाजी महाराज ने भी ''भवानी'''की पूजा की .
संत ज्ञानेश्वर महाराज ने भी मूर्ति पूजा की.
स्वामी विवेकानंद जी के गुरु रामाकृष्ण परमहंस ने माँ काली की मूर्ति की पूजा की.
बाबा कीनाराम ने शिव की उपासना काशी में की.
तैलंग स्वामी ने काशी में मूर्ति पूजा की.
सिद्ध योगी देवरहवा बाबा ने मूर्ति की पूजा की.
इस्कान के संस्थापक ने भी श्रीकृष्ण की पूजा की.

मीराबाई ने श्रीकृष्ण की पूजा की.
आद्य शंकराचार्य जी ने भी शिव की पूजा की.
चारो शंकारचार्य भी मूर्ति की पूजा करते है.

हमारे पास हजारो महापुरुषों के नाम है जिन्होंने मूर्ति पूजा किया है.
यज्ञ भी पूजा का ही एक भाग है.हम यज्ञ भी करते है.मंदिरों में मूर्ति पूजा भी करते है..मंदिरों में ''यज्ञ कुंड'' भी है.
TP Shukla
Posted in Secular

मोहम्मद रफी


हिंदू धर्म मे सेकुलर मुसलमान के तौर पर सब से ज्यादा प्रसिद्ध तमाम भजन गायक **मोहम्मद रफी ** के पुत्र ** शाहिद रफी ** बने भगवान राम, शिव , सीता मा , भारत मां को गाली देने वाली अक्बरूद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के स्टार प्रचारक व विधायक पद के प्र्त्याशी..
महाराष्ट्र के मुसलमानो से भाजपा और शिवसेना को उखाड़ फेकने का आह्वान किया..
बोले भारत के लिये *मोदी * नही *ओवैसी * की जरूरत

हिंदू धर्म मे सेकुलर मुसलमान के तौर पर सब से ज्यादा प्रसिद्ध तमाम भजन गायक **मोहम्मद रफी ** के पुत्र ** शाहिद रफी ** बने भगवान राम, शिव , सीता मा , भारत मां को गाली देने वाली अक्बरूद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के स्टार प्रचारक व विधायक पद के प्र्त्याशी..
महाराष्ट्र के मुसलमानो से भाजपा और शिवसेना को उखाड़ फेकने का आह्वान किया..
बोले भारत के लिये *मोदी * नही *ओवैसी * की जरूरत
Posted in Media

Rajdeep Sardesai


Rajdeep Sardesai tried to malign Indian PM MODI outside Madison Sqaure Garden, New York City. He also physically assaulted an NRI and showed his real face!! …
YOUTUBE.COM
Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

नेहरू और अग्निवेश ने भारत के झूठे इतिहास का प्रचार किया


नेहरू और अग्निवेश ने भारत के झूठे इतिहास का प्रचार किया

महेन्द्रपाल आर्य

हम भारतवासी बहुत पहले से सुनते आये हैं कि ‘पंडित’ कहलाने वाले जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ‘भारत की खोज’ में यह लिखा है, कि ‘आर्य’ लोग बाहर से आये हैं। भारत के मूल निवासियों पर अत्याचार किया आदि। इसी के साथ कड़ी मिलाते हुए तथाकथित आर्य समाजी अग्निवेश ने अपनी वेवसाईट में भी यही दर्शाया है। वहां लिखा है कि आर्य लोग बाहर से आए, जो राहजनी, और व्यभिचारी थे, यहाँ के कोल भीलों पर अत्याचार किया। आगे लिखा है कि जो आर्य लोग उत्तर दिशा से भारत में आएं, पहले वाली सभ्यता जो अच्छी थी। आर्य लोगों ने उसे नष्ट किया। यहाँ आकर आग लगाई, लूटपाट किया तथा युवा महिलाओं से बलात्कार किया। यह लिखा है अग्निवेश डाटकाम में। ऐसा लगता है कि अग्निवेश ने मुसलमानों का पूरा कुकर्म आर्यों में सिर फोड़ दिया है। इसका प्रमाण एक पुस्तक, ‘मस्जिद से यज्ञ शाला की ओर’ में भी लिखा है।

इस मुद्दे को प्रकाश में इसलिए लाया जा रहा है, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय अब यह प्रमाणित करने जा रही है कि ‘आर्य लोग इस देश के मूल निवासी हैं।’ इससे पहले कई भारतीय सनातनी संस्थाओं और विद्वानों ने भी आर्यों के मूल भारतीय होने के कई बार प्रमाण दे चुके हैं। आर्य लोग इसी देश के हैं, इस देश का नाम ही आर्यावर्त है। आदिकाल से हमारे यहाँ हर कर्म-कांड को करते कराते यही संकल्प दोहराया जाता है, “अर्यावार्तांतरगते।” यह अकाट्य प्रमाण है। यही सत्य है।

अब सवाल यह है कि भारत के मूल सत्य को प्रमाणित दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा कर दिया जाएगा। तब नेहरू के झूठे पुलिन्दे भारत की खोज का क्या होगा? जिसमें पंडित कहलाने वाले नेहरू ने आर्यों को बाहर से आये लिखा है। आर्यों के सस्थाओं को पुलिसिया बल के सहारे कब्जा करने वाले वामपंथी अग्निवेश जिसने आर्यों को रहजन और व्यभिचारी बताया है अपने वेबसाईट में, का क्या होगा?

अग्निवेश अपने को आर्य कहलाते है, पैनल में बैठकर दयानन्द के विचारों को मानता हूँ कहते हैं। जिस दयानन्द ने ही आर्यों को इस देशका मूल निवासी माना है, उन्हीं आर्यों को विदेशी कहकर उनकी संस्था को कब्ज़ा करना यह कौन-सा आर्यों का काम है? कब्जा किये संस्थाओं में अपने चेलों को ही बैठा दिया तो छोड़ा क्या? अब दिल्ली विश्वविद्यालय आर्यों का सत्य प्रमाणति कर यह कह देगी कि आर्य इस देश के मूल निवासी हैं। फिर आर्यों के बहार से आने वाली बात जवाहरलाल नेहरू की हो, अथवा लाल वस्त्र धारी वामपंथी अग्निवेश की हो, इनके नंगा झूठ का प्रमाण सबको मिल जाएगा।

ऐसे शोधकर्तायों को साधुवाद और धन्यवाद देना चाहिए, जिन लोगों ने एक विवादित विषय की खोज कर उसके सत्य को उजागर किया है।

नेहरू और अग्निवेश ने भारत के झूठे इतिहास का प्रचार किया

महेन्द्रपाल आर्य

हम भारतवासी बहुत पहले से सुनते आये हैं कि ‘पंडित’ कहलाने वाले जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पुस्तक ‘भारत की खोज’ में यह लिखा है, कि ‘आर्य’ लोग बाहर से आये हैं। भारत के मूल निवासियों पर अत्याचार किया आदि। इसी के साथ कड़ी मिलाते हुए तथाकथित आर्य समाजी अग्निवेश ने अपनी वेवसाईट में भी यही दर्शाया है। वहां लिखा है कि आर्य लोग बाहर से आए, जो राहजनी, और व्यभिचारी थे, यहाँ के कोल भीलों पर अत्याचार किया। आगे लिखा है कि जो आर्य लोग उत्तर दिशा से भारत में आएं, पहले वाली सभ्यता जो अच्छी थी। आर्य लोगों ने उसे नष्ट किया। यहाँ आकर आग लगाई, लूटपाट किया तथा युवा महिलाओं से बलात्कार किया। यह लिखा है अग्निवेश डाटकाम में। ऐसा लगता है कि अग्निवेश ने मुसलमानों का पूरा कुकर्म आर्यों में सिर फोड़ दिया है। इसका प्रमाण एक पुस्तक, ‘मस्जिद से यज्ञ शाला की ओर’ में भी लिखा है।

इस मुद्दे को प्रकाश में इसलिए लाया जा रहा है, क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय अब यह प्रमाणित करने जा रही है कि ‘आर्य लोग इस देश के मूल निवासी हैं।’ इससे पहले कई भारतीय सनातनी संस्थाओं और विद्वानों ने भी आर्यों के मूल भारतीय होने के कई बार प्रमाण दे चुके हैं। आर्य लोग इसी देश के हैं, इस देश का नाम ही आर्यावर्त है। आदिकाल से हमारे यहाँ हर कर्म-कांड को करते कराते यही संकल्प दोहराया जाता है, “अर्यावार्तांतरगते।” यह अकाट्य प्रमाण है। यही सत्य है।

अब सवाल यह है कि भारत के मूल सत्य को प्रमाणित दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा कर दिया जाएगा। तब नेहरू के झूठे पुलिन्दे भारत की खोज का क्या होगा? जिसमें पंडित कहलाने वाले नेहरू ने आर्यों को बाहर से आये लिखा है। आर्यों के सस्थाओं को पुलिसिया बल के सहारे कब्जा करने वाले वामपंथी अग्निवेश जिसने आर्यों को रहजन और व्यभिचारी बताया है अपने वेबसाईट में, का क्या होगा?

अग्निवेश अपने को आर्य कहलाते है, पैनल में बैठकर दयानन्द के विचारों को मानता हूँ कहते हैं। जिस दयानन्द ने ही आर्यों को इस देशका मूल निवासी माना है, उन्हीं आर्यों को विदेशी कहकर उनकी संस्था को कब्ज़ा करना यह कौन-सा आर्यों का काम है? कब्जा किये संस्थाओं में अपने चेलों को ही बैठा दिया तो छोड़ा क्या? अब दिल्ली विश्वविद्यालय आर्यों का सत्य प्रमाणति कर यह कह देगी कि आर्य इस देश के मूल निवासी हैं। फिर आर्यों के बहार से आने वाली बात जवाहरलाल नेहरू की हो, अथवा लाल वस्त्र धारी वामपंथी अग्निवेश की हो, इनके नंगा झूठ का प्रमाण सबको मिल जाएगा।

ऐसे शोधकर्तायों को साधुवाद और धन्यवाद देना चाहिए, जिन लोगों ने एक विवादित विषय की खोज कर उसके सत्य को उजागर किया है।
Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

विदेशी इतिहासकारों के उल्लेख


आधुनिक भारत में अंग्रेजों के समय से जो इतिहास पढाया जाता है वह चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश से आरम्भ होता है। उस से पूर्व के इतिहास को ‘ प्रमाण-रहित’ कह कर नकार दिया जाता है। हमारे ‘देसी अंग्रेजों’ को यदि सर जान मार्शल प्रमाणित नहीं करते तो हमारे ’बुद्धिजीवियों’ को विशवास ही नहीं होना था कि हडप्पा और मोइन जोदडो स्थल ईसा से लग भग 5000 वर्ष पूर्व के समय के हैं और वहाँ पर ही विश्व की प्रथम सभ्यता ने जन्म लिया था।

विदेशी इतिहासकारों के उल्लेख

विश्व की प्राचीनतम् सिन्धु घाटी सभ्यता मोइन जोदडो के बारे में पाये गये उल्लेखों को सुलझाने के प्रयत्न अभी भी चल रहे हैं। जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोइन जोदडो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्हों ने देखा कि वहाँ की गलियों में नर-कंकाल पडे थे। कई अस्थि पिंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थि पिंजरों ने एक दूसरे के हाथ इस तरह पकड रखे थे मानों किसी विपत्ति नें उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुँचा दिया था।

उन नर कंकालों पर उसी प्रकार की रेडियो -ऐक्टीविटी के चिन्ह थे जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गये थे। मोइन जोदडो स्थल के अवशेषों पर नाईट्रिफिकेशन के जो चिन्ह पाये गये थे उस का कोई स्पष्ट कारण नहीं था क्यों कि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है।

मोइनजोदडो की भूगोलिक स्थिति

मोइन जोदडो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है। उस के चारों ओर दो किलोमीटर के क्षेत्र में तीन प्रकार की तबाही देखी जा सकती है जो मध्य केन्द्र से आरम्भ हो कर बाहर की तरफ गोलाकार फैल गयी थी। पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने पाया कि मिट्टी चूने के बर्तनों के अवशेष किसी ऊष्णता के कारण पिघल कर ऐक दूसरे के साथ जुड गये थे। हजारों की संख्या में वहां पर पाये गये ढेरों को पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने काले पत्थरों ‘बलैक -स्टोन्स’ की संज्ञा दी। वैसी दशा किसी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे की राख के सूख जाने के कारण होती है। किन्तु मोइन जोदडो स्थल के आस पास कहीं भी कोई ज्वालामुखी की राख जमी हुयी नहीं पाई गयी।

निशकर्ष यही हो सकता है कि किसी कारण अचानक ऊष्णता 2000 डिग्री तक पहुँची जिस में चीनी मिट्टी के पके हुये बर्तन भी पिघल गये । अगर ज्वालामुखी नहीं था तो इस प्रकार की घटना अणु बम के विस्फोट पश्चात ही घटती है।
महाभारत के आलेख

इतिहास मौन है परन्तु महाभारत युद्ध में महा संहारक क्षमता वाले अस्त्र शस्त्रों और विमान रथों के साथ ऐक एटामिक प्रकार के युद्ध का उल्लेख भी मिलता है। महाभारत में उल्लेख है कि मय दानव के विमान रथ का परिवृत 12 क्यूबिट था और उस में चार पहिये लगे थे। देव दानवों के इस युद्ध का वर्णन स्वरूप इतना विशाल है जैसे कि हम आधुनिक अस्त्र शस्त्रों से लैस सैनाओं के मध्य परिकल्पना कर सकते हैं। इस युद्ध के वृतान्त से बहुत महत्व शाली जानकारी प्राप्त होती है। केवल संहारक शस्त्रों का ही प्रयोग नहीं अपितु इन्द्र के वज्र अपने चक्रदार रफलेक्टर के माध्यम से संहारक रूप में प्रगट होता है। उस अस्त्र को जब दाग़ा गया तो ऐक विशालकाय अग्नि पुंज की तरह उस ने अपने लक्ष्य को निगल लिया था। वह विनाश कितना भयावह था इसका अनुमान महाभारत के निम्न स्पष्ट वर्णन से लगाया जा सकता हैः-

“अत्यन्त शक्तिशाली विमान से ऐक शक्ति – युक्त अस्त्र प्रक्षेपित किया गया…धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा…वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया…उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे…बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के बर्तन टूट गए थे और पक्षी सफेद पड़ चुके थे…कुछ ही घण्टों में समस्त खाद्य पदार्थ संक्रमित होकर विषैले हो गए…उस अग्नि से बचने के लिए योद्धाओं ने स्वयं को अपने अस्त्र-शस्त्रों सहित जलधाराओं में डुबा लिया…”

उपरोक्त वर्णन दृश्य रूप में हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के दृश्य जैसा दृष्टिगत होता है।

ऐक अन्य वृतान्त में श्री कृष्ण अपने प्रतिदून्दी शल्व का आकाश में पीछा करते हैं। उसी समय आकाश में शल्व का विमान ‘शुभः’ अदृष्य हो जाता है। उस को नष्ट करने के विचार से श्री कृष्ण नें ऐक ऐसा अस्त्र छोडा जो आवाज के माध्यम से शत्रु को खोज कर उसे लक्ष्य कर सकता था। आजकल ऐसे मिस्साईल्स को हीट-सीकिंग और साऊड-सीकरस कहते हैं और आधुनिक सैनाओं दूारा प्रयोग किये जाते हैं।

राजस्थान से भी…
प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट के अन्य और भी अनेक साक्ष्य मिलते हैं। राजस्थान में जोधपुर से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव राख की मोटी सतह पाई जाती है, वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे।

‘लक्ष्मण-रेखा’ प्रकार की अदृष्य ‘इलेक्ट्रानिक फैंस’ तो कोठियों में आज कल पालतु जानवरों को सीमित रखने के लिये प्रयोग की जातीं हैं, अपने आप खुलने और बन्द होजाने वाले दरवाजे किसी भी माल में जा कर देखे जा सकते हैं। यह सभी चीजे पहले आशचर्य जनक थीं परन्तु आज ऐक आम बात बन चुकी हैं। ‘मन की गति से चलने वाले’ रावण के पुष्पक-विमान का ‘प्रोटोटाईप’ भी उडान भरने के लिये चीन ने बना लिया है।

निस्संदेह रामायण तथा महाभारत के ग्रंथकार दो प्रथक-प्रथक ऋषि थे और आजकल की सैनाओं के साथ उन का कोई सम्बन्ध नहीं था। वह दोनो महाऋषि थे और किसी साईंटिफिक – फिक्शन के थ्रिल्लर – राईटर नहीं थे। उन के उल्लेखों में समानता इस बात की साक्षी है कि तथ्य क्या है और साहित्यक कल्पना क्या होती है। कल्पना को भी विकसित होने के लिये किसी ठोस धरातल की आवश्यक्ता होती है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र जैसे अस्त्र अवश्य ही परमाणु शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना, हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है, पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।

आधुनिक भारत में अंग्रेजों के समय से जो इतिहास पढाया जाता है वह चन्द्रगुप्त मौर्य के वंश से आरम्भ होता है। उस से पूर्व के इतिहास को ‘ प्रमाण-रहित’ कह कर नकार दिया जाता है। हमारे ‘देसी अंग्रेजों’ को यदि सर जान मार्शल प्रमाणित नहीं करते तो हमारे ’बुद्धिजीवियों’ को विशवास ही नहीं होना था कि हडप्पा और मोइन जोदडो स्थल ईसा से लग भग 5000 वर्ष पूर्व के समय के हैं और वहाँ पर ही विश्व की प्रथम सभ्यता ने जन्म लिया था।

विदेशी इतिहासकारों के उल्लेख

विश्व की प्राचीनतम् सिन्धु घाटी सभ्यता मोइन जोदडो के बारे में पाये गये उल्लेखों को सुलझाने के प्रयत्न अभी भी चल रहे हैं। जब पुरातत्व शास्त्रियों ने पिछली शताब्दी में मोइन जोदडो स्थल की खुदाई के अवशेषों का निरीक्षण किया था तो उन्हों ने देखा कि वहाँ की गलियों में नर-कंकाल पडे थे। कई अस्थि पिंजर चित अवस्था में लेटे थे और कई अस्थि पिंजरों ने एक दूसरे के हाथ इस तरह पकड रखे थे मानों किसी विपत्ति नें उन्हें अचानक उस अवस्था में पहुँचा दिया था।

उन नर कंकालों पर उसी प्रकार की रेडियो -ऐक्टीविटी के चिन्ह थे जैसे कि जापानी नगर हिरोशिमा और नागासाकी के कंकालों पर एटम बम विस्फोट के पश्चात देखे गये थे। मोइन जोदडो स्थल के अवशेषों पर नाईट्रिफिकेशन के जो चिन्ह पाये गये थे उस का कोई स्पष्ट कारण नहीं था क्यों कि ऐसी अवस्था केवल अणु बम के विस्फोट के पश्चात ही हो सकती है।

मोइनजोदडो की भूगोलिक स्थिति

मोइन जोदडो सिन्धु नदी के दो टापुओं पर स्थित है। उस के चारों ओर दो किलोमीटर के क्षेत्र में तीन प्रकार की तबाही देखी जा सकती है जो मध्य केन्द्र से आरम्भ हो कर बाहर की तरफ गोलाकार फैल गयी थी। पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने पाया कि मिट्टी चूने के बर्तनों के अवशेष किसी ऊष्णता के कारण पिघल कर ऐक दूसरे के साथ जुड गये थे। हजारों की संख्या में वहां पर पाये गये ढेरों को पुरात्तव विशेषज्ञ्यों ने काले पत्थरों ‘बलैक -स्टोन्स’ की संज्ञा दी। वैसी दशा किसी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे की राख के सूख जाने के कारण होती है। किन्तु मोइन जोदडो स्थल के आस पास कहीं भी कोई ज्वालामुखी की राख जमी हुयी नहीं पाई गयी।

निशकर्ष यही हो सकता है कि किसी कारण अचानक ऊष्णता 2000 डिग्री तक पहुँची जिस में चीनी मिट्टी के पके हुये बर्तन भी पिघल गये । अगर ज्वालामुखी नहीं था तो इस प्रकार की घटना अणु बम के विस्फोट पश्चात ही घटती है।
महाभारत के आलेख

इतिहास मौन है परन्तु महाभारत युद्ध में महा संहारक क्षमता वाले अस्त्र शस्त्रों और विमान रथों के साथ ऐक एटामिक प्रकार के युद्ध का उल्लेख भी मिलता है। महाभारत में उल्लेख है कि मय दानव के विमान रथ का परिवृत 12 क्यूबिट था और उस में चार पहिये लगे थे। देव दानवों के इस युद्ध का वर्णन स्वरूप इतना विशाल है जैसे कि हम आधुनिक अस्त्र शस्त्रों से लैस सैनाओं के मध्य परिकल्पना कर सकते हैं। इस युद्ध के वृतान्त से बहुत महत्व शाली जानकारी प्राप्त होती है। केवल संहारक शस्त्रों का ही प्रयोग नहीं अपितु इन्द्र के वज्र अपने चक्रदार रफलेक्टर के माध्यम से संहारक रूप में प्रगट होता है। उस अस्त्र को जब दाग़ा गया तो ऐक विशालकाय अग्नि पुंज की तरह उस ने अपने लक्ष्य को निगल लिया था। वह विनाश कितना भयावह था इसका अनुमान महाभारत के निम्न स्पष्ट वर्णन से लगाया जा सकता हैः-

“अत्यन्त शक्तिशाली विमान से ऐक शक्ति – युक्त अस्त्र प्रक्षेपित किया गया…धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा…वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया…उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे…बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के बर्तन टूट गए थे और पक्षी सफेद पड़ चुके थे…कुछ ही घण्टों में समस्त खाद्य पदार्थ संक्रमित होकर विषैले हो गए…उस अग्नि से बचने के लिए योद्धाओं ने स्वयं को अपने अस्त्र-शस्त्रों सहित जलधाराओं में डुबा लिया…”

उपरोक्त वर्णन दृश्य रूप में हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के दृश्य जैसा दृष्टिगत होता है।

ऐक अन्य वृतान्त में श्री कृष्ण अपने प्रतिदून्दी शल्व का आकाश में पीछा करते हैं। उसी समय आकाश में शल्व का विमान ‘शुभः’ अदृष्य हो जाता है। उस को नष्ट करने के विचार से श्री कृष्ण नें ऐक ऐसा अस्त्र छोडा जो आवाज के माध्यम से शत्रु को खोज कर उसे लक्ष्य कर सकता था। आजकल ऐसे मिस्साईल्स को हीट-सीकिंग और साऊड-सीकरस कहते हैं और आधुनिक सैनाओं दूारा प्रयोग किये जाते हैं।

राजस्थान से भी…
प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट के अन्य और भी अनेक साक्ष्य मिलते हैं। राजस्थान में जोधपुर से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव राख की मोटी सतह पाई जाती है, वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे।

‘लक्ष्मण-रेखा’ प्रकार की अदृष्य ‘इलेक्ट्रानिक फैंस’ तो कोठियों में आज कल पालतु जानवरों को सीमित रखने के लिये प्रयोग की जातीं हैं, अपने आप खुलने और बन्द होजाने वाले दरवाजे किसी भी माल में जा कर देखे जा सकते हैं। यह सभी चीजे पहले आशचर्य जनक थीं परन्तु आज ऐक आम बात बन चुकी हैं। ‘मन की गति से चलने वाले’ रावण के पुष्पक-विमान का ‘प्रोटोटाईप’ भी उडान भरने के लिये चीन ने बना लिया है।

निस्संदेह रामायण तथा महाभारत के ग्रंथकार दो प्रथक-प्रथक ऋषि थे और आजकल की सैनाओं के साथ उन का कोई सम्बन्ध नहीं था। वह दोनो महाऋषि थे और किसी साईंटिफिक – फिक्शन के थ्रिल्लर – राईटर नहीं थे। उन के उल्लेखों में समानता इस बात की साक्षी है कि तथ्य क्या है और साहित्यक कल्पना क्या होती है। कल्पना को भी विकसित होने के लिये किसी ठोस धरातल की आवश्यक्ता होती है।
हमारे प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र जैसे अस्त्र अवश्य ही परमाणु शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना, हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है, पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।