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“Cult” और दुनिया के धर्म


“Cult” और दुनिया के धर्म
दुनियामे सर्वत्र “cult ” चलते है . हर धरम में होते है . उनको धर्म के साथ नहीं जोड़ सकते. जैसे अगोरी विद्या ये एक “cult ” ही है . उनको हिन्दू धर्म नहीं कह सकते . मेलि विद्या में अमावस की रात मुर्गी की बलि ये सको ” cult” कहते है . गूगल में “cult” टाइप करेंगे तो हर जगह अफ्रीका यूरोप मुग्लिस्तान और भारत में भी ये मिलेगा. और उनके बाबा भी जय हो निर्मल बाबा लेकिन ये सब धर्म नहीं है वो लोगो को संजना चाहिए.
“कल्ट” का एक उदहारण देता हु आज भी गाव में बारिश लेट हो जाए तो लोग एक डमी जनाजा निकलते है .ये समजकर दुकाल में मौत हो गई आब तो बारिश आ जाओ . या फिर बहुत दुखी आदमी गोडे की नाल दरवाजे पे लगता है प्रदशित करके की घोड़े की तरह मई जिस गया आब तो हे प्रकृति मुझे सुख दो.
जाने दो मई इतनाही कहना चाहता हु कही नेपाल में कही बंगाल में भेसे ये अगोरी विद्या में मंदिर में कटती हो तो मेरा भी विरोध है और न काट नई चाहिए . लईकिन उसको हिन्दू धर्म के साथ न जोड़े . ये हमारा वैदिक धर्म है . कही भी उनका जिक्र नहीं शास्त्र में. जैसे दूसरे धर्म में तो उनका पर्व और उत्सव है . और “cult” को ले कर हमारे धरम की दुसरो के साथ तुलनाना करे . कम से कम आज सर रामायण और महाभारत और वेद पढ़ना सारू करे और आपने ज्ञान बढ़ाये .download (1)

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

एक बार एक सेठ के यहां दो ख्यातिप्राप्त विद्वान पधारे


एक बार एक सेठ के यहां दो ख्यातिप्राप्त विद्वान पधारे। उनमें से एक पंडित थे और दूसरे प्रोफ़ेसर , दोनों का खूब आदर-सत्कार किया गया। नाना प्रकार के व्यंजन खिलाए गए। सुबह जब एक विद्वान नहाने-धोने गए, तब सेठ ने दूसरे विद्वान से पहले की प्रशंसा करते हुए कहा, प्रफेसर साहब उच्च कोटि के विद्वान हैं, ज्ञानी होने के साथ शोधकर्ता भी हैं।
यह सुनते ही दूसरे विद्वान के चेहरे का रंग बदल गया। बोले, क्या कह रहे हो सेठ जी। उस प्रफेसर का ज्ञान तथा विद्वता से दूर-दूर तक भी नाता नहीं है। दो-चार किताबों से नोट्स बना कर छात्रों के सामने कुछ उल्टा-सीधा लेक्चर दे आता है। किसी तरह विद्यालय प्रशासन की चापलूसी कर के टिका हुआ है। पर है पूरा बैल।
जैसे ही प्रोफ़ेसर साहब निवृत्त हो कर आए, पंडित जी फ्रेश होने चले गए। सेठ ने नम्रतापूर्वक प्रोफ़ेसर साहब से पंडित जी का गुणगान करते हुए कहा कि यह मेरा सौभाग्य है कि आप जैसे उच्च कोटि के विद्वान और पंडित जी जैसे संस्कृत और न्याय में पारंगत प्रतिष्ठित धर्मज्ञाता मेरे यहां एक साथ पधारे।
इस बार प्रोफ़ेसर साहब की भृकुटि तन गई। उन्होंने कहा, उस पंडित के बारे में कहां से सुनी आपने ये बातें? वह तो धर्म और भगवान का भय दिखा कर सबको उल्लू बनाता है। अपने शिष्यों से बेगार कराता है। दान के पैसे खा जाता है। उसे कुछ आता-जाता नहीं, निपट गधा है।
एक निरा बैल और दूसरा निपट गधा। सेठ पूरे लक्ष्मी के सेवक। उन्होंने नाश्ते में एक टोकने में भूसा और एक टोकने में घास उन दोनों के सामने परोस दी और कहा, स्वीकार कीजिए। भूसा और घास देख कर प्रफेसर और पंडित- दोनों आग बबूला हो गए। फिर एक साथ सेठ से बोले, आप हमारा अपमान कर रहे हैं।
सेठ ने विनम्रता से उत्तर दिया, इसमें मेरा कोई कसूर नहीं है। मैं तो सदा ही पंडितों और विद्वानों की बात मानता रहा हूं। आज भी मैंने आप दोनों की ही बात मानी है। पंडित जी! आप ने ही तो प्रोफ़ेसर साहब को ‘बैल’ बताया था। और प्रोफ़ेसर साहब, आपने पंडित जी को ‘गधा’ की संज्ञा दी थी। मैंने सोचा, बैल के लिए भूसा और गधे के लिए घास से बढ़ कर और कौन सा अच्छा नाश्ता हो सकता है। सेठ की बात सुन कर दोनो का मुंह उतर गया।
यह सब ईर्ष्या का परिणाम था। यह ईर्ष्या भी अद्भुत चीज है। यह कभी किसी दुराचारी व्यक्ति से या किसी पापी, अनाचारी, अत्याचारी के प्रति उत्पन्न नहीं होती। न कभी किसी सामान्य स्तर के व्यक्ति से होती है। यह होगी तो प्रतिभावान से, गुणवान से, अपने समकक्ष से। भाई-भाई से, पड़ोसी-पड़ोसी से ईर्ष्या करता है। जो जिसके जितना करीब है, वह उससे उतनी ही अधिक ईर्ष्या करता है। दूसरा सकारात्मक पहलू यह भी है कि जब लगे कि कोई नया ईर्ष्यालु पैदा हुआ है तो निश्चित जानें कि अपने अंदर अवश्य कोई नया गुण पैदा हुआ है। अवगुणी से कोई ईर्ष्या नहीं करता।
नीतिकारों ने दो प्रकार की वृत्ति कही है -एक मक्खी की वृत्ति, दूसरी भ्रमर की वृत्ति। मक्खी के सामने एक तरफ मिठाइयों की थाल रखी जाए, दूसरी ओर मल की। वह मिठाई की थाल की उपेक्षा कर गंदगी पर बैठना अधिक पसंद करेगी। सुंदर, सुवासित तेल और अच्छे से अच्छे वस्त्रों पर न बैठ कर शरीर में यदि कहीं फोड़ा हो तो वहां बैठेगी। यह मक्खी की वृत्ति है। पर भौंरा फूल पर ही बैठेगा है। वह सुगंध खोजता है, भूल कर भी गंदगी पर नहीं बैठता। यह भ्रमर वृत्ति है। भारतीय संस्कृति कहती है कि गुणग्राही बनो। कोई व्यक्ति जैसी भावना पालता है, उसका जीवन वैसा ही बनता है। ईर्ष्यालु के घर से लक्ष्मी चली जाती है और वहां अपनी छोटी बहन दरिद्रता को छोड़ जाती है। ईर्ष्या सुखी जीवन की शत्रु है।