Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

“हिन्दुपुत्रो , हम दक्कन को पार कर मध्य भारत को जीत लें।


“हिन्दुपुत्रो , हम दक्कन को पार कर मध्य भारत को जीत लें। इस समय मुगल कमजोर, धृष्ट, व्यभिचारी और अफीम-नशेड़ी हो चुके हैं। सदियों से उत्तर के तहखाने में संचित धन-संपदा अब हमारी हो सकती है। यह उपयुक्त समय है जब हम अपनी पवित्र मातृभूमि भारतवर्ष से इन म्लेच्छों और बर्बरों को बाहर निकाल सकते हैं।
आईए, इन्हें हिमालय से आगे वहाँ फेंक दें, जहाँ से यह आये थे। निश्चय ही, भगवा ध्वज कृष्णा से सिन्धु नदी तक फहराएगा। अब हिन्दूस्थान हमारा है।पेड़ के तने को काटने से उसकी डालियाँ अपने आप गिर जाएँगी। आप हमारी बात पर ध्यान दीजिए, मैं और मेरे लोग अटक के दीवार पर अवश्य ही केसरिया फहराकर रहेंगे।”

छत्रपति शाहू महाराज उनसे बहुत प्रभावित हुए और कहा, “आगे बढ़ें और धरती के स्वर्ग हिमालय तक अपना केसरिया फहराएँ” और इस तरह वीर योद्धा पेशवा को अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ने की अनुमति दे दी।

बाजीराव लगातार बीस वर्षों तक उत्तर की तरफ बढ़ते रहे, प्रत्येक वर्ष उनकी दूरी दिल्ली से कम होती जाती थी और मुगल साम्राज्य के पतन का समय नजदीक आता जा रहा था।
मथुरा से लेकर बनारस और सोमनाथ तक हिन्दुओं के पवित्र तीर्थयात्रा के मार्ग को उनके द्वारा शोषण, भय व उत्पीड़न से मुक्त करा दिया गया था।

वह विश्व इतिहास के उन तीन सेनापतियों में शामिल हैं, जिसने एक भी युद्ध नहीं हारा। कई महान इतिहासकारों ने उनकी तुलना अक्सर नेपोलियन बोनापार्ट से की है।

मुगल, पठान और मध्य एशियाई जैसे बादशाहों के महान योद्धा बाजीराव के द्वारा पराजित हुए। निजाम-उल-मुल्क, खान-ए-दुर्रान, मुहम्मद खान ये कुछ ऐसे योद्धाओं के नाम हैं, जो मराठों की वीरता के आगे धराशायी हो गये। बाजीराव की महान उपलब्धियों में भोपाल और पालखेड का युद्ध, पश्चिमी भारत में पुर्तगाली आक्रमणकारियों के ऊपर विजय इत्यादि शामिल हैं।

बाजीराव का विजयी अभियान सं १७२३ में मालवा और गुजरात पर विजय प्राप्त करने से शुरुवात होता है. मालवा के ठाकुर और जमींदारो ने बाजीराव को पत्र लिखकर मालवा को सुल्तान के चंगुल से छुड़ाने का अनुरोध किया। उसका स्वीकार करते हुए बाजीराव ने मालवा और गुरत के सुल्तानों को ध्वस्त करते हुए दोनों ही राज्यों पर केसरिया लहराया।
निजाम-उल-मुल्क को १७२८ में पालखेड की लड़ाई में बुरी तरह से हराने के बाद भी उसने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद शाह से मिलकर षड्यंत्र किये जिसके फलस्वरूप बाजीराव द्वारा दोबारा उसे भोपाल की लड़ाई में शिकस्त कहानी पड़ी। बादमे दिल्ली मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह पर चढ़ाई करते हुए बाजीराव ने दिल्ली की मुग़ल सेना का धुंवा उड़ा डाला ,जिस डर से सुलतान दिल्ली से भाग खड़ा हुआ.

बुन्देल खंड के राजा छत्रसाल पर मुग़ल साम्राज्य के सेनापति मोहम्मद खान बंगश ने हमला बोल दिया था ,राजा छत्रसाल ने बाजीराव से मदत माँगी।
छत्रसाल ने बाजीराव को खत में लिखा –

जो गति भई गजेंद्र की, वही गति हमरी आज।
बाजी जात बुंदेल की, बाजी रखियो लाज ॥

खत मिलते ही मराठा सेनाये कूच कर गयी और अपेक्षित रीती से बंगश हार गया। दिल्ली वापस जाने का रास्ता छोड़ने के लिए बंगश ने घुटने टेक कर सभी शर्त मंजूर करते हुए बाजीराव से माफ़ी मांगी।

उत्तर से दक्षिण तक अब बाजीराव को रोकने वाला कोई बचा नहीं था.

बाजीराव ने अपने जीवन में ४१ लड़ाईया लड़ी जिनमे से पुरे ४१ में उन्हें विजय प्राप्त हुयी।
सिर्फ लड़ाईया ही नहीं बल्कि हिन्दू एकत्रीकरण में राजपूतो को मराठो से जोड़ने की बाजीराव की भूमिका परिणामकारक सिद्ध हुयी। बुंदी, आमेर, डूंगरगढ़, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर इत्यादि राजपूत रियासते बाजीराव से एकनिष्ठ थी.

देव ,देश और धर्म के लिए संघर्षरत ,पेशवा बाजीराव जैसे हमारे पूर्वजो ने यशस्वी पराक्रम किया , और इसमें वो सफल हुए क्योकी उनकी इस सफलता का एक मात्र आधार और लक्ष था ” हिन्दू राष्ट्र ”

जयति अखंड हिन्दू राष्ट्रं
जय हो मैय्या की
हर हर महादेव —

"हिन्दुपुत्रो , हम दक्कन को पार कर मध्य भारत को जीत लें। इस समय मुगल कमजोर, धृष्ट, व्यभिचारी और अफीम-नशेड़ी हो चुके हैं। सदियों से उत्तर के तहखाने में संचित धन-संपदा अब हमारी हो सकती है। यह उपयुक्त समय है जब हम अपनी पवित्र मातृभूमि भारतवर्ष से इन म्लेच्छों और बर्बरों को बाहर निकाल सकते हैं। आईए, इन्हें हिमालय से आगे वहाँ फेंक दें, जहाँ से यह आये थे। निश्चय ही, भगवा ध्वज कृष्णा से सिन्धु नदी तक फहराएगा। अब हिन्दूस्थान हमारा है।पेड़ के तने को काटने से उसकी डालियाँ अपने आप गिर जाएँगी। आप हमारी बात पर ध्यान दीजिए, मैं और मेरे लोग अटक के दीवार पर अवश्य ही केसरिया फहराकर रहेंगे।" छत्रपति शाहू महाराज उनसे बहुत प्रभावित हुए और कहा, "आगे बढ़ें और धरती के स्वर्ग हिमालय तक अपना केसरिया फहराएँ" और इस तरह वीर योद्धा पेशवा को अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए आगे बढ़ने की अनुमति दे दी। बाजीराव लगातार बीस वर्षों तक उत्तर की तरफ बढ़ते रहे, प्रत्येक वर्ष उनकी दूरी दिल्ली से कम होती जाती थी और मुगल साम्राज्य के पतन का समय नजदीक आता जा रहा था। मथुरा से लेकर बनारस और सोमनाथ तक हिन्दुओं के पवित्र तीर्थयात्रा के मार्ग को उनके द्वारा शोषण, भय व उत्पीड़न से मुक्त करा दिया गया था। वह विश्व इतिहास के उन तीन सेनापतियों में शामिल हैं, जिसने एक भी युद्ध नहीं हारा। कई महान इतिहासकारों ने उनकी तुलना अक्सर नेपोलियन बोनापार्ट से की है। मुगल, पठान और मध्य एशियाई जैसे बादशाहों के महान योद्धा बाजीराव के द्वारा पराजित हुए। निजाम-उल-मुल्क, खान-ए-दुर्रान, मुहम्मद खान ये कुछ ऐसे योद्धाओं के नाम हैं, जो मराठों की वीरता के आगे धराशायी हो गये। बाजीराव की महान उपलब्धियों में भोपाल और पालखेड का युद्ध, पश्चिमी भारत में पुर्तगाली आक्रमणकारियों के ऊपर विजय इत्यादि शामिल हैं। बाजीराव का विजयी अभियान सं १७२३ में मालवा और गुजरात पर विजय प्राप्त करने से शुरुवात होता है. मालवा के ठाकुर और जमींदारो ने बाजीराव को पत्र लिखकर मालवा को सुल्तान के चंगुल से छुड़ाने का अनुरोध किया। उसका स्वीकार करते हुए बाजीराव ने मालवा और गुरत के सुल्तानों को ध्वस्त करते हुए दोनों ही राज्यों पर केसरिया लहराया। निजाम-उल-मुल्क को १७२८ में पालखेड की लड़ाई में बुरी तरह से हराने के बाद भी उसने दिल्ली के सुल्तान मोहम्मद शाह से मिलकर षड्यंत्र किये जिसके फलस्वरूप बाजीराव द्वारा दोबारा उसे भोपाल की लड़ाई में शिकस्त कहानी पड़ी। बादमे दिल्ली मुग़ल बादशाह मोहम्मद शाह पर चढ़ाई करते हुए बाजीराव ने दिल्ली की मुग़ल सेना का धुंवा उड़ा डाला ,जिस डर से सुलतान दिल्ली से भाग खड़ा हुआ. बुन्देल खंड के राजा छत्रसाल पर मुग़ल साम्राज्य के सेनापति मोहम्मद खान बंगश ने हमला बोल दिया था ,राजा छत्रसाल ने बाजीराव से मदत माँगी। छत्रसाल ने बाजीराव को खत में लिखा - जो गति भई गजेंद्र की, वही गति हमरी आज। बाजी जात बुंदेल की, बाजी रखियो लाज ॥ खत मिलते ही मराठा सेनाये कूच कर गयी और अपेक्षित रीती से बंगश हार गया। दिल्ली वापस जाने का रास्ता छोड़ने के लिए बंगश ने घुटने टेक कर सभी शर्त मंजूर करते हुए बाजीराव से माफ़ी मांगी। उत्तर से दक्षिण तक अब बाजीराव को रोकने वाला कोई बचा नहीं था. बाजीराव ने अपने जीवन में ४१ लड़ाईया लड़ी जिनमे से पुरे ४१ में उन्हें विजय प्राप्त हुयी। सिर्फ लड़ाईया ही नहीं बल्कि हिन्दू एकत्रीकरण में राजपूतो को मराठो से जोड़ने की बाजीराव की भूमिका परिणामकारक सिद्ध हुयी। बुंदी, आमेर, डूंगरगढ़, उदयपुर, जयपुर, जोधपुर इत्यादि राजपूत रियासते बाजीराव से एकनिष्ठ थी. देव ,देश और धर्म के लिए संघर्षरत ,पेशवा बाजीराव जैसे हमारे पूर्वजो ने यशस्वी पराक्रम किया , और इसमें वो सफल हुए क्योकी उनकी इस सफलता का एक मात्र आधार और लक्ष था " हिन्दू राष्ट्र " जयति अखंड हिन्दू राष्ट्रं जय हो मैय्या की हर हर महादेव —
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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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