Posted in भारतीय उत्सव - Bhartiya Utsav

Guru purnima


रामकृष्ण परमहंस एवं स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंदजीने देवी जगदंबामाताके पास केवल ‘ज्ञान, भक्ति एवं वैराग्य’ की मांग की थी । यह क्यूं किया, इसका स्पष्टीकरण देते हुए स्वामी विवेकानंदजी कहते हैं, ‘संसारमें रहनेवाले सैकडो विचार मेरे मनमें भरे रहते थे । पहलेकी तरह धन कमाने हेतु घरसे बाहर निकल पडा । अनेक प्रयास कर इधर-उधर घूम रहा था । एक एटर्नीके कार्यालयमें थोडा-बहुत कार्य कर साथ ही कुछ पुस्तकोंका अनुवाद कर कुछ धन कमाया तथा बडी कठिनाईसे दिन कटने लगे थे; परंतु स्थायी तौरपर कुछ कार्य प्राप्त नहीं हुआ । अतएव मां एवं भाईके पोषणका स्थायी प्रबंध नहीं हुआ । कुछ दिनों पश्चात मनमें विचार आया कि ईश्वर ठाकुरजीके (रामकृष्ण परमहंस) कथनानुसार करूंगा, इसलिए मां एवं भाईको अन्न-वस्त्रके अभावके कारण होनेवाले दुःख दूर करने हेतु उनसे विनती कर उनकी ओरसे प्रार्थना करवा लूंगा । मेरे कारण ऐसी प्रार्थना करनेके लिए वे कभी भी अस्वीकारकृत नहीं करेंगे । ऐसा विचार कर शीघ्र ही मैं दक्षिणेश्वरको पहुंचा तथा ठाकुरजीके पास हठ कर पुनःपुनः उन्हें कहने लगा, ‘मां एवं भाईके आर्थिक कष्ट दूर करने हेतु आपको जगन्माताके समक्ष प्रार्थना करनी ही होगी ।’ ठाकुरजीने उत्तर दिया, ‘पुत्र, यह बात मैं माताको नहीं बता सकता । तू ही स्वयं माताको यह बात क्यों नहीं बताता ? क्या तू माताजीको नहीं मानता ? अतएव इतने कष्ट तू भुगत रहा है ।’ मैंने बता दिया, ‘मैं तो माताको पहचानता भी नहीं हूं; आप ही मेरे लिए उन्हें बताइए । आपको बताना ही पडेगा । वैसा किए बिना मैं आपको बिलकुल नहीं छोडूंगा ।’ ठाकुरजीने प्रेमपूर्वक उत्तर दिया, ‘अरे, कितनी बार मैंने माताको बताया है कि माता, नरेंद्रके दुःख-कष्ट दूर कर; तू उसे नहीं मानता, अतएव माता सुनती नहीं है । ठीक है, आज मंगळवार है; मैं बताता हूं कि आज रात्रिको तू कालीमंदिरमें जाकर माताको प्रणाम कर । तू जो कुछ मांगेगा,  माता तुझे वह अवश्य ही प्रदान करेगी । मेरी माता चिन्मयी ब्रह्मशक्ति है । उसने अपनी इच्छाके अनुसार इस जगतको जन्म दिया है । उसकी इच्छा हो, तो उसके लिए क्या करना असंभव है ?’

‘मेरा दृढ विश्वास था कि यदि ठाकुरजीने इस प्रकारसे सूचित किया है, तो उनके प्रार्थना करते ही निश्चित रूपसे मेरे सभी दुःख दूर होंगे । अत्यंत बेचैन होकर मैं रात्रिकी प्रतीक्षा करने लगा । धीरे धीरे रात्रि होने लगी । एक प्रहर बीत जानेके पश्चात ठाकुरजीने मुझे कालीमंदिरमें जानेके लिए कहा  । मंदिरमें जाते-जाते एक प्रकारकी गहरी नशा मुझपर छा गई, मेरे पांव लडखडाने लगे तथा क्या मैं माताको वास्तवमें देख सकूंगा एवं उनके मुंखसे निकलेवाले शब्द सुन सकूंगा इस प्रकारके स्थिर विश्वासके कारण अन्य सभी विषयोंको भूलकर मैंने मेरा मन अत्यंत एकाग्र एवं तल्लीन किया तथा उसी बातपर विचार करने लगा । मंदिरमें उपस्थित होनेपर देखा कि वास्तवमें  माता चिन्मयी हैं, वास्तवमें  वह जीवित हैं साथ ही अनंत प्रीति एवं सौंदर्यका  उत्पत्तिस्थान हैं । भक्ति एवं प्यारसे हृदय उछलने लगा; व्याकुल होकर पुनःपुनः प्रणाम कर कहता गया, ‘माता, मुझे विवेक, वैराग्य, ज्ञान एवं भक्ति प्रदान करें,  वह भी ऐसे कि मुझे निर्विघ्न रूपसे निरंतर आपका दर्शन प्राप्त होता रहे ।’ हृदय शांतिसे भर गया ।  सारा जगत पूरीतरह अदृश्य हो गया केवल  माता ही मेरे हृदयमें व्याप्त हो गई  ।

पुनः ठाकुरजीके पास पहुंचते ही उन्होंने पूछा, ‘क्या संसारकी न्यूनता दूर करने हेतु तुमने माताको प्रार्थना की ?’ उनके प्रश्नसे विस्मित होकर मैंने बताया, ‘नहीं महाराज, मैं भूल गया । अब मैं क्या करूं ?’ उन्होंने उत्तर दिया, ‘जाओ, पुनः जाओ एवं प्रार्थना करो ।’ पुनः मैं मंदिरमें गया । माताके सामने उपस्थित होनेपर पुनः मोहित होकर सबकुछ भूल गया एवं पुनःपुनः प्रणाम कर ज्ञान-भक्ति प्राप्त होने हेतु प्रार्थना कर लौटकर आया । ठाकुरजीने हंसते हंसते पूछा, ‘क्या इस समय तूने बताया ?’ पुनः विस्मित होकर मैंने उत्तर दिया , ‘नहीं महाराज, माताका दर्शन होते ही एक दैवी शक्तिके प्रभावके कारण सभी बातें भूलकर केवल ज्ञान-भक्तिलाभके विषयमें ही मैंने बताया । अब क्या होगा ?’ ठाकुरजीने बताया, ‘वाह रे पुत्र, क्या तुमने स्वयंको थोडा संभालकर यह प्रार्थना की ! यदि संभव हो, तो पुनः एक बार जाकर वह बातें बताकर आओ । जाओ, शीघ्र जाओ ।’ लौटकर पुनः मंदिरमें गया; मंदिरमें प्रवेश करते ही अत्यंत शरमसे मेरा हृदय भर गया । विचार करने लगा कि  वास्तवमें क्षुद्रसी यह  बात माताको  बताने हेतु आया था । यह तो ठाकुरजीके कथनानुसार ‘राजाको प्रसन्न कर लेनेपर उसके पास कद्दु मांगने जैसी मूर्खता होगी ! क्या मेरी बुद्धि इतनी हीन होगई है! शरम एवं घृणासे उमडकर माताको पुनःपुनः  प्रणाम कर कहने लगा, ‘माता, मुझे अन्य कुछ नहीं चाहिए, केवल ज्ञानभक्ति प्रदान करें ।’ मंदिरके बाहर  आनेपर मनमें विचार आया कि  निश्चित ही यह ठाकुरजीकी लीला है । अन्यथा तीन-तीन बार माताके  पास जानेपर  कुछ भी बतानेमें असमर्थ रहना । तदुपरांत ठाकुरजीको मैंने अनुरोधसे बताया कि निश्चित रूपसे आपने ही मुझे ऐसे मोहमें डाल दिया है, अब आपको ही बताना पडेगा कि मेरी मां एवं भाईको  अन्नवस्त्रका अभाव  न रहे । उन्होंने उत्तर दिया  ‘अरे, इस प्रकारकी प्रार्थना मैं किसीके लिए  कभी भी नहीं कर सका । मेरे मुंहसे इस प्रकारकी प्रार्थना बाहर निकलती ही नहीं है । तुझे मैंने बताया था कि माताके पास जो कुछ मांगेगा, वहीं तुझे प्राप्त होगा । तू माताके पास मांग न सका । तेरे भाग्यमें सांसारिकसुख नहीं है, उसके लिए मैं क्या कर सकता हूं ?’ मैंने बताया, ‘महाराज, यह कुछ नहीं चलेगा । मेरे लिए आपको यह बात बतानी ही होगी; मेरा दृढ विश्वास है कि आपके कहनेपर मेरी मां तथा भाईके दुःख शेष ही नहीं रहेंगे । इस प्रकार जब मैं बारबार उनके पीछे पडा, तो उन्होंने बताया, ‘ठीक है, उन्हें खुरदरे अन्नवस्त्रकी कभी भी न्यूनता प्रतीत नहीं होगी ।’

सारांश, चित्तशुद्ध रहनेवाला उपासक मांग करेगा, तो केवल परमार्थकी ही ! जनकल्याणकी ही ! तनिक भी स्वार्थका अंश उसकी मांगमें नहीं होगा ऐसे उपसकोंकी इच्छापूर्तिद्वारा ही जगतका कल्याण  निःसंशय होगा !

गुरु द्रोणाचार्य एवं शिष्य अर्जुन !

गुरुदेव द्रोणाचार्यकी विशेष कृपाका पात्र शिष्य अर्जुन !

 

द्रोणाचार्यके अन्य शिष्योंद्वारा अर्जुनकी उपेक्षा करना और गुरुदेवजीने अर्जुनको धोती लानेके लिए आश्रम भेजना : अर्जुनपर गुरुदेवजीकी विशेष कृपा है, यह बात द्रोणाचार्यजीके अन्य शिष्योंको सहन नहीं होती थी । इसलिए, वे सब अर्जुनकी उपेक्षा करते थे । एक समय, द्रोणाचार्यजी अर्जुनसहित अपने शिष्योंको लेकर स्नान करनेके लिए नदीपर गए और वटवृक्षके नीचे खडे होकर बोले, ‘अर्जुन, मै आश्रममें अपनी धोती भूलकर आया हूं  । जाओ, तुम उसे लेकर आओ ।

शिष्योंको मंत्रशक्तिका महत्त्व समझानेके लिए गुरुदेवजीने एक अभिमंत्रित बाण वटवृक्षकी पत्तियोंपर छोडना और वह बाण प्रत्येक पत्तीको छेदना : गुर्वाज्ञाके कारण अर्जुन धोती लानेके लिए आश्रम गया, उस समय गुरु द्रोणाचार्यजीने कुछ शिष्योंसे कहा, ‘गदा एवं धनुष्यमें शक्ति होती है; परंतु मंत्रमें उससे अधिक शक्ति होती है । मंत्रजाप करनेवाले इसका महत्त्व एवं पद्धति समझ लें, तो मंत्रमें अधिक सामर्थ्य होता है, यह बात वे समझ जाएंगे । मैं अभिमंत्रित एक ही बाणसे इस वटवृक्षके  सब पत्तियोंको छेद सकता हूं । यह कहकर, द्रोणाचार्यजीने भूमिपर एक मंत्र लिखा एवं उसी मंत्रसे अभिमंत्रित एक बाण छोडा । बाणने वृक्षके सभी पत्तोंको छेद दिया । यह देखकर, सब शिष्य आश्चर्यमें पड गए ।

वापस आए अर्जुनकी दृष्टि वृक्षकी पत्तिओंपर पडना, उसमें जिज्ञासा निर्माण होना एवं भूमिपर लिखा हुआ वृक्षकी पत्तियोंको छेदनेका (वृक्षच्छेदनका) मंत्र पढकर उसने वह प्रयोग करना, इसके कारण पत्तियोंमें दूसरा छेद भी निर्माण होना : पश्चात गुरु द्रोणाचार्यजी सब शिष्योंके साथ स्नान करने गए । उसी समय अर्जुन धोती लेकर आया । उसकी  दृष्टि वृक्षकी पत्तियोंपर पडी । वह सोचने लगा । इस वटवृक्षकी पत्तियोंपर पहले तो छेद नहींr थे । मैं जब सेवा करने गया था, उस समय गुरुदेवजीने शिष्योंको एक रहस्य बताया था । रहस्य बताया था, तो उसके कुछ सूत्र होंगे, प्रारंभ होगा, इसके चिह्न भी होंगे । अर्जुनने इधर-उधर देखा, तो उसे भूमिपर लिखा हुआ मंत्र दिखाई दिए । वृक्षच्छेदनके सामर्थ्यसे युक्त यह मंत्र अद्भुत है, यह बात उसके मनमें समा गई । उसने यह मंत्र पढना आरंभ किया । जब उसके मनमें दृढ विश्वास उत्पन्न हो गया कि यह मंत्र निश्चित सफल होगा, तब उसने धनुष्यपर बाण चढाया और मंत्रका उच्चारण कर छोड दिया । इससे वटवृक्षकी पत्तियोंपर, पहले बने छेदके समीप दूसरा छेद बन गया । यह देखकर अर्जुनको अत्यंत आनंद हुआ ।  गुरुदेवजीने अन्य शिष्योंको जो विद्या सिखाई, वह मैंने भी  सीख ली, ऐसा विचार कर, वह गुरुदेवजीको धोती देनेके लिए नदीकी ओर चल पडा ।

स्नानसे लौटनेके पश्चात जब द्रोणाचार्यजीने वटवृक्षकी पत्तियोंपर दूसरा छेद देखा, तो उन्होंने अपने साथके सभी शिष्योंसे प्रश्न किया –

द्रोणाचार्य : स्नानसे पहले वटवृक्षकी सभी पत्तियोंपर एक छेद था । अब दूसरा छेद आपमेंसे किसने किया ?

सब शिष्य : हमने नहीं किया ।

द्रोणाचार्य (अर्जुनकी ओर देखकर) : यह कार्य तुमने किया है क्या ?

(अर्जुन कुछ डरा; परंतु झूठ कैसे कहूं; इसलिए बोला)

अर्जुन : मैंने आपकी आज्ञाके बिना आपके मंत्रका प्रयोग किया । क्योंकि, मुझे लगा कि आपने इन सबको यह विद्या सिखा दी है, तो आपसे इस विषयमें पूछकर आपका समय न गंवाकर अपनेआप सीख लूं । गुरुदेवजी, मुझसे चूक हुई हो, तो क्षमा कीजिएगा ।

द्रोणाचार्य : नहीं अर्जुन, तुममें जिज्ञासा, संयम एवं सीखनेकी लगन है । उसी प्रकार, मंत्रपर तुम्हारा विश्वास है । मंत्रशक्तिका प्रभाव देखकर सब केवल चकित होकर स्नान करने चले  गए । उनमेंसे एकने भी दूसरा छेद करनेका विचार भी नहीं किया । तुम धैर्य दिखाकर एवं प्रयत्न कर उत्तीर्ण हो गए । तू मेरा सर्वोत्तम शिष्य है । अर्जुन, तुमसे श्रेष्ठ धनुर्धर होना असंभव है ।

शिष्य इतना जिज्ञासू हो कि गुरुका अंतःकरण अभिमानसे भर जाए !

 

छत्रपति शिवाजी महाराज की गुरुभक्ति !

छत्रपति शिवाजी महाराज अपने गुरुदेव समर्थ रामदास स्वामीके एकनिष्ठ भक्त थे । इसलिए समर्थ भी अन्य शिष्योंकी अपेक्षा उनसे अधिक प्रेम करते थे । यह देख अन्य शिष्योंको लगा, ‘‘शिवाजीके राजा होनेसे ही समर्थ उनसे अधिक प्रेम करते हैं !’’ समर्थ रामदासस्वामीने यह भ्रम त्वरित दूर करनेका संकल्प लिया । वे अपने शिष्यगणोंके साथ वनोंमें गए । वहां वे रास्ता खो बैठे । इसके साथ समर्थ एक गुफामें पेटकी पीडाका नाटक कर कराहते हुए सो गए । आनेपर शिष्योंने देखा कि गुरुदेव पीडासे कराह रहे हैं । शिष्योंने इसपर उपाय पुछा । समर्थद्वारा उपाय बतानेपर सभी शिष्य एकदूसरेके मुंह देखने लगे । जिसप्रकार दुर्बल मानसिकता एवं ढोंगी भक्तोंकी अवस्था होती है, बिल्कुल ऐसा ही गंभीर वातावरण बन गया ।

छ. शिवाजी महाराज समर्थ रामदासस्वामीके दर्शन लेने निकल पडे । उन्हें जानकारी मिली कि समर्थ इसी वनमें कहीं होंगे । ढूंढते-ढूंढते वे एक गुफाकी ओर आए । गुफामें पीडासे कराहनेकी ध्वनि सुनाई दी । भीतर जाकर देखनेपर ज्ञात हुआ कि साक्षात गुरुदेव ही व्याकुल होकर सोए हैं । राजा शिवाजीने हाथ जोडकर उनसे उनकी वेदनाका कारण पूछा ।

समर्थ : शिवा, पेटमें असहनीय पीडा हो रही है ।

शिवाजी महाराज : गुरुदेव, इसपर कुछ दवा ?

समर्थ : शिवा, इसपर कोई दवा नहीं ! यह असाध्य रोग है । केवल एक ही दवा काम कर सकेगी; परंतु जाने दो ।

शिवाजी महाराज : गुरुदेव, निःसंकोच बताएं । अपने गुरुदेवको आश्वस्त (सुखी) किए बिना हम शांत बैठ नहीं पाएंगे ।

समर्थ : मादा बाघका दूध और वो भी ताजा  ! परंतु शिवा, उसका मिलना संभव नहीं !

शिवाजी महाराजने उनके समीपका एक कमंडलू उठाया एवं समर्थको वंदन कर वे तुरंत बाघिनको ढूंढनेके लिए निकल पडे । कुछ दूर जानेपर एक स्थानपर बाघके दो बच्चे दिखाई दिए । राजा शिवाजीने सोचा, ‘‘इनकी मां भी निश्चित रूपसे यहीं कहीं निश्चित होगी ।’’ संयोगसे (दैवयोगसे) उनकी मां वहां आई । अपने बच्चोंके पास अपरिचित व्यक्तिको देख वह उनपर गुर्राने लगी । राजा शिवाजी स्वयं उस बाघिनसे लडनेमें सक्षम थे; परंतु इस स्थितिमें वे लडना नहीं चाहते थे अपितु केवल बाघिनका दूध चाहते थे । उन्होंने धैर्यके साथ हाथ जोडकर बाघिनसे विनती की, ‘‘माता, हम यहां आपको मारने अथवा आपके बच्चोंको कष्ट पहुंचाने नहीं आए । हमारे गुरुदेवका स्वास्थ्य सुधारनेके लिए हमें आपका दूध चाहिए, वह हमें दे दो, उसे हम अपने गुरुदेवको देकर आते हैं । तदुपरांत तुम भले ही मुझे खा जाओ ।’’ ऐसा कहकर राजा शिवाजीने उसकी पीठपर प्रेमसे हाथ फिराया ।

अबोल प्राणी भी प्रेमपूर्ण व्यवहारसे वशमें होते हैं । बाघिनका क्रोध शांत हुआ एवं वह उन्हें बिल्लीसमान चाटने लगी । अवसर देख राजाने उसके स्तनोंसे  कमंडलूमें दूध भर लिया । उसे प्रणाम कर अत्यंत आनंदसे उन्होंने वहांसे प्रस्थान किया । गुफामें पहुंचनेपर गुरुदेवके समक्ष दूधसे भरा कमंडलू रख राजाने गुरुदेव समर्थको प्रणाम किया । ‘‘अंततः तुम बाघिनका दूध लानेमें सफल हुए ! तुम धन्य हो शिवा ! तुम्हारे जैसे एकनिष्ठ शिष्य रहनेपर गुरुकी पीडी कैसे टिकी रहेगी ?’’ गुरुदेव समर्थने राजा शिवाजीके शीशपर अपना हाथ रखकर अन्य उपस्थित शिष्योंकी ओर देखा ।

अतएव शिष्य समझ गए कि बह्मवेत्ता गुरु जब किसी शिष्यसे प्रेम करते हैं, तो उसकी विशेष योग्यता होती है । वह उनकी विशेष कृपाका अधिकारी होता है । ईर्षा रखनेसे हमारी दुर्गुण एवं दुर्बलता बढती हैं । इसलिए ऐसी विशेष कृपाका अधिकारी होनेवाले अपने गुरुबंधुके प्रति ईर्षा रखनेकी अपेक्षा हमें हमारी दुर्बलता एवं दुर्गुण नष्ट करनेके लिए तत्पर रहना चाहिए ।

 

शिष्यकी परीक्षा

रामानुजाचार्य शठकोपस्वामीजीके शिष्य थे । स्वामीजीने रामानुजजीको ईश्वरप्राप्तिका रहस्य बताया था । परंतु उसे किसीको न बतानेका निर्देश दिया था; किंतु रामानुजजीने अपने गुरुकी इस आज्ञाको नहीं माना, उन्होंने ईश्वरप्राप्तिका जो मार्ग बताया था, उस पूर्ण ज्ञानको उन्होंने लोगोंको देना प्रारंभ किया । यह ज्ञात होनेपर शठकोपस्वामीजी     बहुत  क्रोधित हुए । रामानुजजीको बुलाकर वे कहने लगे, ‘‘ मेरी आज्ञाका उल्लंघन कर तू साधनाका रहस्य प्रकट कर रहा है । यह अधर्म है,  पाप है । इसका परिणाम क्या होगा तुझे ज्ञात है ?’’
रामानुजजीने विनम्रतासे कहा, ‘‘ हे गुरुदेव, गुरुकी आज्ञाका उल्लंघन करनेसे शिष्यको नरकमें जाना पडता है ।’’ शठकोपस्वामीजीने पूछा, ‘‘ यह  ज्ञात होते हुए भी तुमने जानबूझकर ऐसा क्यों किया ?’’
इसपर रामानुजजी कहने लगे, ‘‘ वृक्ष अपना सब कुछ लोगोंको देता है । क्या उसे कभी  इसका पश्चात्ताप प्रतीत होता है ? मैंने जो कुछ किया, उसके पीछे लोगोंका कल्याण हो, लोगोंको भी ईश्वरप्राप्तिका आनंद प्राप्त हो, यही हेतु है । इसके लिए  यदि मुझे नरकमें भी जाना पडे, तो मुझे उसका तनिक भी दुख नहीं होगा ।’’
रामानुजजीकी, समाजको ईश्वरप्राप्तिकी साधना बतानेकी, लालसाको देखकर स्वामीजी प्रसन्न हुए । उन्होंने रामानुजजीको अपने निकट लिया,  उनको उत्तमोत्तम आशीर्वाद दिए तथा उनको समाजमें सत्यके ज्ञानका प्रचार करने हेतु बडे प्रेमसे भेजा ।

        बच्चो, रामानुजजीने समाजको ईश्वरप्राप्तिकी साधना बताई । उनकी इस लालसासे स्वामीजी उनपर प्रसन्न हुए, इसी प्रकार हमें भी ज्ञान बांटना चाहिए ।

 

शिवाजी महाराजकी गुरुभेंट

समर्थ रामदास स्वामीजीकी ख्याति सुननेपर छ.शिवाजी महाराजको उनके दर्शनकी लालसा निर्माण हुई । उनसे मिलनेके लिए वे कोंढवळको गए । वहां भेट होगी इस आशासे सायंकालतक रुके, तब भी महाराजकी स्वामीजीसे भेंट नहीं हुई । तत्पश्चात प्रतापगढ आनेपर रातमें नींदमें भी महाराजके मनमें वही विचार था । समर्थ रामदास स्वामीजी जानबूझकर महाराजसे मिलना टाल रहे थे । ऐसे ही कुछ दिन निकल जानेपर एक दिन समर्थजीके दर्शनकी लालसा अत्यधिक बढनेसे वे भवानीमाताके मंदिरमें गए । उस रात शिवाजी महाराज वहांपर ही देवीके सामने निद्राधीन हो गए ।  रातमें स्वप्नमें उन्हें पैरमें  खडांऊ, देहपर भगवा वस्त्र, हाथमें माला, बगलमें कुबडी ऐसे तेजस्वी रूपमें समर्थ रामदास स्वामीजीके दर्शन हुए । छ. शिवाजी महाराजने उन्हें साष्टांग नमस्कार किया । समर्थजीने उनके सिरपर हाथ रखकर उन्हें आशिर्वाद दिया । नींदमेंसे जागनेपर महाराजने देखा तो उनके हाथमें प्रसादके रूपमें नारियल था ।  उस समयसे वे समर्थ रामदास स्वामीजीको अपने गुरु मानने लगे ।

आगे छ. शिवाजी महाराजने अत्यधिक पराक्रम करनेपर समर्थ रामदास स्वामीजीने स्वयं शिंगणवाडी प्रत्यक्ष आकर महाराजको दर्शन दिए । शिवाजी महाराजने उनकी पाद्यपूजा की । समर्थजीने उन्हें प्रसाद के रूपमें एक नारियल, मुठ्ठीभर माटीr, लीद एवं पत्थर दिए । उस समय महाराजके मनमें आया कि़, ‘हमें राज्यकारभारका त्याग कर समर्थजीकी सेवा करनेमें शेष आयु लगानी  चाहिए । समर्थजी महाराजके मनका यह विचार समझ गए और उन्होंने कहा ‘राजा, क्षत्रिय धर्मका पालन कीजिए । प्राण जानेपर भी धर्मका त्याग न करें । प्रजाके रक्षणके लिए तुम्हारा जन्म हुआ है, वह छोडकर यहां सेवा करनेके लिए न रहें । मेरा केवल स्मरण करनेपर भी मैं आपसे मिलने आऊंगा । सुखसे, आनंदसे राज्य कीजिए’ । तत्पश्चात् समर्थजीने उन्हें राज्य करनेकी आदर्श पद्धति समझाई । समर्थजीने शिवाजी महाराजको उनके कल्याणके लिए नारियल दिया था । सर्वथा संतुष्ट एवं तृप्त मनसे छ. शिवाजी महाराज राज्य करने लगे । महाराजने माटी अर्थात पृथ्वी, पत्थर अर्थात गढ जीता एवं लीद अर्थात अश्वदलसे भी समृद्ध हो गए । गुरुके कृपाप्रसादसे शिवाजी महाराजको किसी वस्तुका अभाव नहीं रहा ।

छ. शिवाजी महाराजने विदेशी शत्रुओंका नाश करके स्वराज्यकी स्थापना करनेका जो कार्य आरंभ किया था उसपर समर्थजीको अत्यधिक अभिमान था ।  वे लोगोंको छत्रपतीजीके कार्यमें सहायता करने तथा शक्ति संपादन करके स्वराज्य एवं धर्मरक्षणके लिए लडनेका उपदेश करते थे ।  छ. शिवाजी महाराजकी समर्थजीके प्रति अत्यधिक श्रद्धा थी । अनेक प्रसंगोंमें महाराज समर्थ रामदास स्वामीजीका विचार एवं आशिर्वाद लेते थे । आपत्कालमें हमें सतर्कता कैसे बरतना चाहिए, इस संदर्भमें समर्थजाद्वारा छ. शिवाजी महाराजको दिया गया उपदेश ‘दासबोध’ नामक ग्रंथमें  है । उसमें समर्थजी कहते हैं, ‘सदैव सतर्कतासे रहकर आचरण करें, शत्रु-मित्रको ठीकसे परखें, एकांतमें अत्यधिक विचार कर योजना बनाएं, निरंतर प्रयास करते रहें । इसके पूर्व अनेक महान लोग हो गए, उन्होंने अत्यधिक बुरी स्थिति तथा कष्ट सहन किए हैं । आलसका त्याग कर, बिना कष्टके अनेक लोगोंसे मित्रता करके कार्य करते रहें’।

बालमित्रो, . शिवाजी महाराजको समर्थ रामदासस्वामीजीसे मिलनेकी लालसा थी उनकी तीव्र उत्कंठासे उन्हें स्वप्नमें एवं तदुपरांत प्रत्यक्ष समर्थ रामदास स्वामीजीके दर्शन हुए उत्कंठासे हम किसी भी लक्ष्यको साध्य कर सकते हैं

 

श्रीगुरुकी आज्ञापालनहेतु स्वयंको 
झोंक देनेवाला शिष्य आरुणी !

प्राचीन समयमें धौम्य नामक मुनिका एक आश्रम था । उस आश्रममें उनके अनेक शिष्य विद्याभ्यासके लिए रहते थे । उनमें आरुणी नामक एक शिष्य था । एक समय धुंआधार वर्षा होने लगी । समीपके नालेका पानी खेतमें न जाए, इसहेतु प्रतिबंध लगानेके लिए वहां एक बांध बनाया गया । उस बांधमें  दरारें पडने लगी तब गुरुदेवने कुछ शिष्योंसे कहा, ‘पानीको खेतमें आनेसे रोको !’

आरुणी एवं कुछ शिष्य बांधके समीप आए । बांधमेंआई दरारोंको भरनेके लिए सबने प्रयास किए ; परंतु पानीका वेग अत्यधिक होनेके कारण संपूर्ण प्रयास निष्फल हो गए । बांधके  बीचका भाग टूटने लगा एवं पानी धीरे-धीरे खेतमें आने लगा । अब कोई लाभ नहीं, ऐसा सोचकर सभी शिष्य लौट आए । दिनभर परिश्रम करनेसे थके सभी शिष्य गाढी नींदसे सो गए । सवेरेतक वर्षा थम गई । तब सबके ध्यानमें आया कि आरुणीका कोई पता नहीं है । संपूर्ण आश्रममें ढूंढनेपर भी जब वह नहीं मिला, तब वे सभी गुरुदेवजीके समीप जाकर बोले, ‘‘ हे गुरुदेव, आरुणी खो गया है ।” श्रीगुरु बोले, ‘हम खेतमें जाकर देखेंगे’ सब शिष्य एवं ऋषि धौम्य खेतमें गए और उन्होंने देखा कि, टूटे हुए बांधके बीचमें पानीको रोकने हेतु स्वयं आरुणी ही वहां आडा होकर सोया हुआ है  । यह देखकर सबको आश्चर्य हुआ । रातभर पानीमें भोजन-नींदके बिना  ऐसा करते देख आरुणीके प्रति सभीके मनमें प्रेमभाव निर्माण हुआ । वर्षा रूक जानेके कारण पानीका बहाव तो पूर्वकी अपेक्षा घट गया था परंतु आरुणीको वहां नींद लग गई थी । सभी वहां गए और  उसे जगाया । श्रीगुरुने उसे समीप लेकर प्रेमसे उसके सिरपर हाथ फेरा । यह देखकर सब शिष्योंके आंखोंमें पानी आया ।

बच्चो, आरुणीसे हमें क्या सिखना है ? तो श्रीगुरुकी आज्ञापालन करनेकी तीव्र उत्कंठा । आज्ञापालन करनेके लिए आरुणीने स्वयंका विचार नहीं किया; इसलिए वह गुरुका एक सच्चा शिष्य बना । अतः हम भी हमारे गुरुके चरणोंमें प्रार्थना करेंगे कि, ‘हे गुरुदेव, हममें भी ‘आज्ञापालन’ गुण निर्माण हो !’

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