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महाकवि कालिदास


मुहम्मद मरे नहीं थे, भारत केमहाकवि कालिदास के हाथों मारे गए थे :?इतिहास का एक अत्यंत रोचक तथ्य है कि इस्लाम के पैगम्बर(रसूल) मुहम्मद साहब सन ६३२ मेंअपनी स्वाभाविक मौत नहीं मरे थे, अपितुभारत के महान साहित्यकार कालिदास के हाथों मारे गए थे.मदीना में दफनाए गए (?) मुहम्मदकी कब्र की जांच की जाएतो रहस्य से पर्दा उठ सकता है कि कब्र में मुहम्मद का कंकालहै या लोटा ।भविष्यमहापुराण (प्रतिसर्गपर्व)में सेमेटिक मजहबों केसभी पैगम्बरों का इतिहास उनके नाम के साथ वर्णितहै. नामों का संस्कृतकरण हुआ है Iइस पुराण में मुहम्मद औरईसामसीह का भी वर्णन आया है.मुहम्मद का नाम “महामद” आया है. मक्केश्वर शिवलिंगका भी उल्लेख आया है. वहीं वर्णनआया है कि सिंधु नहीं के तट पर मुहम्मद औरकालिदास की भिड़ंत हुई थी और कालिदासने मुहम्मद को जलाकर भस्म कर दिया.ईसा को सलीब पर टांग दिया गया और मुहम्मदभी जलाकर मार दिए गए- सेमेटिक मजहब के येदो रसूल किसी को मुंह दिखाने लायकनहीं रहे.शर्म के मारे मुसलमानकिसी को नहीं बताते कि मुहम्मद जलाकरमार दिए गए, बल्कि वह यह बताते हैं कि उनकी मौतकुदरती हुई थीIभविष्यमहापुराण (प्रतिसर्गपर्व,3.3.1-27) में उल्लेख हैकि ‘शालिवाहन के वंश में १० राजाओं ने जन्म लेकर क्रमश: ५००वर्ष तक राज्य किया. अन्तिम दसवें राजा भोजराज हुए ।उन्होंनेदेश की मर्यादा क्षीणहोती देख दिग्विजय के लिए प्रस्थान किया ।उनकी सेना दस हज़ार थी और उनकेसाथ कालिदास एवं अन्य विद्वान्-ब्राह्मण भी थे ।उन्होंने सिंधु नदी को पार करके गान्धार, म्लेच्छ औरकाश्मीर के शठ राजाओं को परास्त किया औरउनका कोश छीनकर उन्हें दण्डित किया ।उसी प्रसंग में मरुभूमि मक्का पहुँचने पर आचार्यएवं शिष्यमण्डल के साथ म्लेच्छ महामद (मुहम्मद) नामव्यक्ति उपस्थित हुआ ।राजा भोज ने मरुस्थल (मक्का) मेंविद्यमान महादेव जी का दर्शन किया ।महादेवजी को पंचगव्यमिश्रित गंगाजल से स्नानकराकर चन्दनादि से भक्तिपूर्वक उनका पूजन किया औरउनकी स्तुति की:“हे मरुस्थल में निवासकरनेवाले तथा म्लेच्छों से गुप्त शुद्ध सच्चिदानन्दरूपवालेगिरिजापते ! आप त्रिपुरासुर के विनाशक तथा नानाविध मायाशक्ति केप्रवर्तक हैं । मैं आपकी शरण में आया हूँ, आपमुझे अपना दास समझें । मैं आपको नमस्कार करता हूँ ।” इसस्तुति को सुनकर भगवान् शिव ने राजा से कहा- “हे भोजराज !तुम्हें महाकालेश्वर तीर्थ (उज्जयिनी)में जाना चाहिए ।यह ‘वाह्लीक’ नामकी भूमि है, पर अब म्लेच्छों से दूषितहो गयी है । इस दारुण प्रदेश में आर्य-धर्म हैही नहीं ।महामायावी त्रिपुरासुर यहाँ दैत्यराज बलि द्वारा प्रेषितकिया गया है ।वह मानवेतर, दैत्यस्वरूप मेरे द्वारा वरदान पाकर मदमत्तहो उठा है और पैशाचिक कृत्य में संलग्न होकर महामद(मुहम्मद) के नाम से प्रसिद्ध हुआ है ।पिशाचों और धूर्तों सेभरे इस देश में हे राजन् ! तुम्हें नहीं आना चाहिए ।हे राजा ! मेरी कृपा से तुम विशुद्ध हो । भगवान् शिवके इन वचनों को सुनकर राजा भोज सेना सहित पुनः अपने देश मेंवापस आ गये ।उनके साथ महामद भी सिंधुतीर पर पहुँच गया ।अतिशयमायावी महामद ने प्रेमपूर्वक राजा से कहा- ”आपकेदेवता ने मेरा दासत्व स्वीकार कर लिया है ।”राजा यहसुनकर बहुत विस्मित हुए। और उनका झुकाव उस भयंकरम्लेच्छ के प्रति हुआ ।उसे सुनकर कालिदास ने रोषपूर्वकमहामद से कहा-“अरे धूर्त ! तुमने राजा को वश में करने के लिएमाया की सृष्टि की है । तुम्हारे जैसेदुराचारी अधम पुरुष को मैं मार डालूँगा ।“ यह कहकरकालिदास नवार्ण मन्त्र (ॐ ऐंह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे) के जप मेंसंलग्न हो गये । उन्होंने (नवार्ण मन्त्र का) दस सहस्र जपकरके उसका दशांश (एक सहस्र) हवन किया । उससे वहमायावी भस्म होकर म्लेच्छ-देवता बन गया ।इससेभयभीत होकर उसके शिष्य वाह्लीकदेश वापस आ गये और अपने गुरु का भस्म लेकरमदहीनपुर (मदीना) चले गए औरवहां उसे स्थापित कर दिया जिससे वह स्थान तीर्थ केसमान बन गया।एक समय रात में अतिशय देवरूप महामद नेपिशाच का देह धारणकर राजा भोज से कहा-”हे राजन् !आपका आर्यधर्म सभी धर्मों में उत्तम है, लेकिनमैं उसे दारुण पैशाचधर्म में बदल दूँगा ।उस धर्म मेंलिंगच्छेदी (सुन्नत/खतना करानेवाले),शिखाहीन, दढि़यल, दूषित आचरण करनेवाले, उच्चस्वर में बोलनेवाले (अज़ान देनेवाले), सर्वभक्षी मेरेअनुयायी होंगे ।कौलतंत्र केबिना ही पशुओं का भक्षण करेंगे. उनका सारा संस्कारमूसल एवं कुश से होगा ।इसलिये ये जाति से धर्म को दूषितकरनेवाले ‘मुसलमान’ होंगे ।इस प्रकार का पैशाच धर्म मैं विस्तृतकरूंगा I”‘एतस्मिन्नन्तरेम्लेच्छ आचार्येण समन्वितः ।महामद इति ख्यातः शिष्यशाखा समन्वितः ।। 5 ।।नृपश्चैव महादेवं मरुस्थलनिवासिनम् ।गंगाजलैश्च संस्नाप्य पंचगव्यसमन्वितैः ।चन्दनादिभिरभ्यच्र्य तुष्टाव मनसा हरम् ।। 6 ।।भोजराज उवाचनमस्ते गिरिजानाथ मरुस्थलनिवासिने।त्रिपुरासुरनाशाय बहुमायाप्रवर्तिने ।। 7 ।।म्लेच्छैर्मुप्ताय शुद्धाय सच्चिदानन्दरूपिणे ।त्वं मां हि किंकरं विद्धि शरणार्थमुपागतम्।। 8 ।।सूत उवाचइति श्रुत्वा स्तवं देवः शब्दमाह नृपाय तम् ।गंतव्यं भोजराजेन महाकालेश्वरस्थले ।। 9 ।।म्लेच्छैस्सुदूषिता भूमिर्वाहीका नाम विश्रुता ।आर्यधर्मो हि नैवात्र वाहीके देशदारुणे ।। 10 ।।वामूवात्र महामायो योऽसौ दग्धो मया पुरा ।त्रिपुरो बलिदैत्येन प्रेषितः पुनरागतः ।। 11 ।।अयोनिः स वरो मत्तः प्राप्तवान्दैत्यवर्द्धनः ।महामद इति ख्यातः पैशाचकृतितत्परः।। 12 ।।नागन्तव्यं त्वया भूप पैशाचे देशधूर्तके ।मत्प्रसादेन भूपाल तव शुद्धि प्रजायते ।। 13 ।।इति श्रुत्वा नृपश्चैव स्वदेशान्पु नरागमतः ।महामदश्च तैः साद्धै सिंधुतीरमुपाययौ।। 14 ।।उवाच भूपतिं प्रेम्णा मायामदविशारदः ।तव देवो महाराजा मम दासत्वमागतः ।। 15 ।।इति श्रुत्वा तथा परं विस्मयमागतः ।। 16 ।।म्लेच्छधनें मतिश्चासीत्तस्यभूपस्य दारुणे ।। 17 ।।तच्छ्रुत्वा कालिदासस्तु रुषा प्राह महामदम् ।माया ते निर्मिता धूर्त नृपमोहनहेतवे ।। 18 ।।हनिष्यामिदुराचारं वाहीकं पुरुषाधनम् ।इत्युक्त् वा स जिद्वः श्रीमान्नवार्णजपतत्परः ।। 19।।जप्त्वा दशसहस्रंच तदृशांश जुहाव सः ।भस्म भूत्वा स मायावी म्लेच्छदेवत्वमागतः ।। 20 ।।मयभीतास्तु तच्छिष्या देशं वाहीकमाययुः ।गृहीत्वा स्वगुरोर्भस्म मदहीनत्वामागतम्।। 21 ।।स्थापितं तैश्च भूमध्येतत्रोषुर्मदतत्पराः ।मदहीनं पुरं जातं तेषां तीर्थं समं स्मृतम्।। 22 ।।रात्रौ स देवरूपश्च बहुमायाविशारदः ।पैशाचं देहमास्थाय भोजराजं हि सोऽब्रवीत् ।। 23 ।।आर्यधर्मो हि ते राजन्सर्वधर्मोत्तमः स्मृतः ।ईशाख्या करिष्यामि पैशाचं धर्मदारुणम् ।। 24 ।।लिंगच्छेदी शिखाहीनः श्मश्रुधारी स दूषकः ।उच्चालापी सर्वभक्षी भविष्यति जनो मम।। 25 ।।विना कौलं च पशवस्तेषां भक्षया मता मम ।मुसलेनेव संस्कारः कुशैरिव भविष्यति ।। 26 ।।तस्मान्मुसलवन्तो हि जातयो धर्मदूषकाः ।इति पैशाचधर्मश्च भविष्यति मया कृतः ।। 27 ।।’(भविष्यमहापुराणम् (मूलपाठ एवं हिंदी-अनुवादसहित), अनुवादक: बाबूराम उपाध्याय, प्रकाशक: हिंदी-साहित्य-सम्मेलन, प्रयाग; ‘कल्याण’ (संक्षिप्त भविष्यपुराणांक),प्रकाशक: गीताप्रेस, गोरखपुर, जनवरी,1992 ई.)कुछ विद्वान कह सकते हैं कि महाकवि कालिदास तो प्रथमशताब्दी के शकारि विक्रमादित्य के समय हुए थे औरउनके नवरत्नों में से एक थे, तोहमें ऐसा लगता है कि कालिदासनाम के एक नहीं बल्कि अनेक व्यक्तित्व हुए हैं,बल्कि यूं कहा जाए की कालिदास एकज्ञानपीठ का नाम है, जैसे वेदव्यास, शंकराचार्यइत्यादि.विक्रम के बाद भोज के समय भी कोईकालिदास अवश्य हुए थे. इतिहास तो कालिदास को छठी-सातवी शती (मुहम्मद केसमकालीन) में ही रखता है.कुछ विद्वान “सरस्वतीकंठाभरण”, समरांगणसूत्रधार”,”युक्तिकल्पतरु”-जैसे ग्रंथों के रचयिता राजा भोजको भी ९वी से११वी शताब्दी में रखते हैं जो गलत है.भविष्यमहापुराण में परमार राजाओंकी वंशावली दी हुई है.इसवंशावली से भोज विक्रमकी छठी पीढ़ी मेंआते हैं और इस प्रकार छठी-सातवी शताब्दी (मुहम्मद केसमकालीन) में ही सिद्ध होतेहैं.कालिदासत्रयी-एकोऽपि जीयते हन्त कालिदासो न केनचित्।शृङ्गारे ललितोद्गारे कालिदास त्रयी किमु॥(राजशेखर का श्लोक-जल्हणकी सूक्ति मुक्तावली तथा हरि कविकी सुभाषितावली में)इनमें प्रथम नाटककार कालिदास थे जो अग्निमित्र या उसके कुछबाद शूद्रक के समय हुये। द्वितीय महाकवि कालिदसथे, जो उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य के राजकवि थे।इन्होंनेरघुवंश, मेघदूत तथा कुमारसम्भव-ये ३ महाकाव्य लिखकरज्योतिर्विदाभरणनामक ज्योतिष ग्रन्थ लिखा। इसमें विक्रमादित्यतथा उनके समकालीनसभी विद्वानों का वर्णन है।अन्तिम कालिदासविक्रमादित्य के ११ पीढ़ी बाद के भोजराजके समय थे तथा आशुकवि और तान्त्रिक थे-इनकी चिद्गगन चन्द्रिका है तथा कालिदास और भोजके नाम से विख्यात काव्य इनके हैं।

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