Posted in Love Jihad

जब आप यह जान जायेंगे की दुबई और अरब में एक किडनी लगवाने के 15 लाख रुपये देने पड़ते हैं


जब आप यह जान जायेंगे की दुबई और अरब में एक किडनी लगवाने के 15 लाख रुपये देने
पड़ते हैं

तो आप यह भी अंदाज़ा लगा सकते हैं की लव जेहाद की शिकार की 20% लड़किया वापस कभी नहीं आती है क्यों ???

असल में माँ और गर्भ दोनों को संभालने की क्षमता रखने वाले स्त्री की किडनी बहुत टिकाऊ और विश्वसनीय होती है और एक शारीर में दो किडनी का मतलब है दोगुना का फायदा।

जेहादियों को सिर्फ निकाह और बच्चे पैदा करने की ही नजर से न देखिये … पहलू और भी हैं.

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मित्रों मरे फेसबुक Facebook पज़े पर जा कर लव जिहाद को जरूर पढ़ें ????


मित्रों मरे फेसबुक Facebook पज़े पर जा कर लव जिहाद को जरूर पढ़ें ????
मित्रों पिछले 65 वर्षों में जब तक माउंटबैटन भारत में रहा तब तक नेहरू के साथ मिलकर देश की संस्कृति बर्बाद करने के अंधे-कानून बनता रहा , चाहें गौ-मास का व्यापर हो या मेकोले की एजुकेसन “शिक्छा” हो , गंगा में गंदे नालों को मिलाना हो, या लेंडएक्यूजीसँ एक्ट, इसमें एक कानून था “इंडियन मेरिजएक्ट” यह क्यों बनाया गया , बड़ी रोचक कहानी है भारतीय शादियों के आलावा हरामियों अय्याशों के लिए कानून बनाना , इसकी कहानी नेहरू इंद्रा गांधी और वी.कृष्णन मैनन की अवैध शारीरिक भूख की जो जग जाहिर थी, को वैध बनाने की जो समाज में अवैध तरह से क़ानूनी आइयाशी होती रहे, जैसा की अभी कोंग्रेसी नेता और मीडिया सेकुलीस्यम की रंडी-पेशे की कहानियां चरितयार्थ है और इसी “इंडियन मेरिजएक्ट” के कारण भारत के कितने घर और परिवार बबाद हो गये हैं , लवर-लवेरियों का कानून भारतियों ने नहीं बनाया , यह देश में पल रहे विदेशी हरामियों के पालतुओं द्वारा बनाया गया कानून जो भारतियों पर थोपा गया है , जिसके तहत फिल्मों, टीवी की वाशना की मंडी करोड़ों का कालाधन पहुचना, छिछोरों, अवाराओं, हरामियों, को देश की बेहेन बेटियों को अयाशी के दलदल में फ़साना और वाशना की मंडियों से भारतीय समाज को कुचलने में हो रहा है, इस सहयोगी अंग्रेजी अंन्धे कानून से, यहीं से लवजिहाद को हवा मिली है जो दरिन्दों की तरह स्कूल, कॉलेज, यूनिवस्टीयों के बीच मंडराते है, और बेहेन बेटियों को, वाशना और भोग कर गँड़ेरियों की तरह चूश कर वेश्या बनाने में ,इस अंन्धे कानून की मदद से देश का चरित्र लूट में यह सक्रीय है ! यह काम कोई हरामी कौम ही कर सकती है जिनका कोई नैतिक चरित्र ही नहीं होता जिनका मजहब, वह सुकरात की बाइबिल जिसमें केवल महिलाओं को भोग ही मानते है जरा सोचिये की इस कानून से ईसाइयों और मुसलमानों को ही फायदा क्यों पहुचता है और भारतीय घर परिवार बर्बाद, और कानून बनाने वाले भी वाही हरामी तबका, और जानते है इससे ही भारतियों की बेहेन बेटियों से अपना रंडी बाजार बनाते हैं, जो फिल्मों टीवी सीरियलों, धारावाहिक कलबों पार्टियों में वाशना भरे डांस, जो छोटे से छोटा गाँव और बड़े शहरों तक यह हरामी तबका अपने वाशना से भरे जहरीले नशे जैसे कुकीन, चारश, गांजा, इशमैक अफीम, विदेशी ड्रग्स कुरानी कालाजादु ईसाई “शम्मोहन क्रिया” के साथ सक्रिय हैं जो इससे बड़ी आसानी से बेहेन, बेटियों का शिकार कर लेते हैं हमें अब ये ईसाई और इस्लामी कानून बदलवाने हैं , जिसमें बेसुमार कालाधन लगा है , जबसे इस लवजिहाद का नाम आया है -ये हरामी सेकुलर और कोंग्रेसी मीडिया में नाम आने से बचाओ में सक्रीय हो रहे है उनका तिलल्मिलाना और इस विदेशी अन्धे कानून से अपने को बचाने में लगे हैं , और सहारा ले कर इस अंन्धे कानून की दलीलें दे हैं ? जागिये और जगाइए अपना देश बचाईये
ज़ी टीवी के “राहुल” ने सच्चाई को उजागर कर कर बड़ा ही प्रसंसनीय कार्य है उसका धन्यवाद

Posted in राजनीति भारत की - Rajniti Bharat ki

फूलन देवी हत्या का आरोपी शेर सिंह राणा कौन है?


फूलन देवी हत्या का आरोपी शेर सिंह राणा कौन है?
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फूलन देवी एक नामी डकैत थी जो बाद में राजनीति में चली आई पर आने से पहले उसने एक गाँव के 30 क्षत्रिय जाति के लोगों को गोलियों से भून डाला जिसका बदला शेर सिंह राणा ने फूलन देवी की हत्या करके लिया और खुद आत्मसमर्पण कर दिया पर उसके बाद जो हुआ उसे आपको ये बिकाऊ मीडिया नहीं दिखायेगा। वो हम बताते है।

आज़ादी के बाद पहली बार कोई कैदी तिहाड़ की मजबूत और अभेद कही जाने वाली जेल तोड़कर भगा वो कैदी बांग्लादेश, नेपाल, पकिस्तान होता हुआ अफगानिस्तान पहुँच गया मोहम्मद गजनवी की मज़ार के ठीक बाहर पृथ्वीराज चौहान की समाधि थी जहाँ उनकी अस्थियों को दफनाया गया था और जिसे गजनी जाने वाला हर शख्स ठोकर मार के जाता था। उस कैदी ने खुद को पत्रकार बताया और डोक्युमेंट्री बनाने के बहाने वहां रहने लगा और एक दिन मौका मिलते ही रात में पृथ्वीराज चौहान की अस्थियाँ निकालकर अगले ही दिन उसे भारत में अपनी माँ के पास कुरियर के माध्यम से भेज दिया और कुछ दिन बाद खुद भी भारत लौट आया, अपनी माँ से अस्थियाँ लेकर वो हरिद्वार गया गंगा में उन्हें विसर्जित किया और स्वयं को फिर पुलिस के हवाले कर दिया। वो चाहता तो जेल कभी नहीं जाता पर वो गया ताकि उसके बाकी 10 साथी रिहा हो सके। ये सुनने में भले फ़िल्मी लगे पर विश्वास कीजिये ये सत्य है और जल्द ही इसपर बनी फिल्म भी प्रदर्शित होगी।
वो शख्स है, शेर सिंह राणा।

अगर कोई पुलिस अधिकारी फूलन देवी को मारता तो उसे मैडल मिलता पर देश के इस सपूत को क्या मिला? सोचिये?

Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था…..


जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था…..
वहां 2 माह से तोप चला रहा इजरायल :
गाजा पट्टी पर कब्जे के लिए दो माह से जंग
छिड़ी है। इसी इलाके में 1918 के प्रथम विश्व युद्ध में
मारवाड़ के घुड़सवार शूरवीरों ने
जर्मन सेना की मशीनगनों का मुकाबला करते हुए
इजरायल के हैफा शहर पर महज एक
घंटे में कब्जा कर लिया था….
नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर लांसर के मेजर दलपतसिंह शेखावत
और कैप्टन अमान सिंह
जोधा। 23 सितंबर को हुए इस युद्ध में मेजर दलपतसिंह समेत
सात हिन्दुस्तानी शहीद
हुए। दिल्ली स्थित तीन मूर्ति स्मारक इसी युद्ध के
शहीदों को समर्पित है।
खास बात यह है कि एक मूर्ति मेजर दलपत सिंह की है,
इजरायल 2018 में इस विजय
दिवस की शताब्दी मनाएगा। गौर करने लायक तथ्य है
कि इस विजय गाथा को इजराइली
बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ते हैं। तोपों के गोलों के
बीच अमान सिंह ने एक घंटे में
हैफा पर किया था कब्जा प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश
व जर्मनी की सेनाएं प्रमुख थीं। जर्मनी
व तुर्की की गठबंधन सेना ने हैफा के दुर्ग पर कब्जा कर
लिया। वे तोपों व मशीनगनों से
इजरायल सेना पर हमला कर रहे थे।
भारतीय सेना को इसे मुक्त कराने
की जिम्मेदारी मिली। जोधपुर लांसर के मेजर दलपत
सिंह शेखावत अपनी टुकड़ी के साथ निकल पड़े। युद्ध में
जर्मन सेना लगातार उन पर तोप
व मशीनगनों से गोले दागती रही। इस दौरान मेजर
दलपत सिंह शहीद हो गए। जोधपुर
लांसर के कैप्टन अमान सिंह जोधा ने कमान संभालते हुए
जर्मन सेना का मुकाबला किया
एक घंटे के भीतर हैफा शहर उनके कब्जे में था, जर्मन
मशीनगनों पर हौसला पड़ा भारी
उस वक्त जोधपुर रियासत के घुड़सवारों के पास हथियार
के नाम पर मात्र बंदूकें थी। वहीं,
जर्मन सेना तोपों तथा मशीनगनों से लैस थी। लेकिन
राजस्थान के रणबांकुरों के हौसले
के आगे दुश्मन पस्त हो गया। देवली पाबूजी के
निवासी थे मेजर दलपत सिंह शहीद हुए
मेजर दलपत सिंह शेखावत पाली जिले के नाडोल के निकट
देवली पाबूजी के रहने वाले
थे। यहां के जागीरदार ठाकुर हरि सिंह के इकलौते पुत्र
ठाकुर दलपत सिंह को पढ़ाई के लिए जोधपुर के प्रशासक
सर प्रताप ने इंग्लैंड भेजा। 18 साल की उम्र में वे जोधपुर
लांसर में
बतौर घुड़सवार भर्ती हुए व बाद में मेजर बने। हैफा के युद्ध में
ब्रिटिश सेना ने उन्हें कमान
सौंपी। दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस, अमान सिंह
को इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट मेजर
दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस जबकि कैप्टन अमान
सिंह जोधा को सरदार बहादुर की
उपाधि देते हुए आईओएम (इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट)
तथा ओ.बी.ई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश
इंपायर) से सम्मानित किया गया था। 700 सैनिक
बंदी बनाए, असलहा कब्जे में किया
23 सितंबर, 1918 को दिन में 2 बजे जोधपुर लांसर व मैसूर
लांसर के घुड़सवारों ने हैफा
शहर पर चढ़ाई की और एक घंटे में ही हैफा शहर के दुर्ग पर
विजय पताका फहरा दी।
भारतीय शूरवीरों ने जर्मन- तुर्की सेना के 700
सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। इनमें
23 तुर्की तथा 2 जर्मन अफसर भी थे। वहीं, 17 तोपें, 11
मशीनगन व हजारों की संख्या
में जिंदा कारतूस भी जब्त किए गए। घुड़सवार हमले
का यह निर्णायक युद्ध था।
मारवाड़ के 6 और सपूत भी हुए शहीद इस युद्ध में मेजर दलपत
सिंह के साथ 6 घुड़सवार
शहीद हुए, जबकि टुकड़ी के 60 घोड़े भी मारे गए। जोधपुर
लांसर सवार तगतसिंह, सवार शहजादसिंह, मेजर शेरसिंह
आईओएम, दफादार धोकल सिंह, सवार गोपालसिंह और
सवार सुल्तानसिंह भी इस युद्ध में शहीद हुए थे..
जय राजपुताना…..

जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था..... वहां 2 माह से तोप चला रहा इजरायल : गाजा पट्टी पर कब्जे के लिए दो माह से जंग छिड़ी है। इसी इलाके में 1918 के प्रथम विश्व युद्ध में मारवाड़ के घुड़सवार शूरवीरों ने जर्मन सेना की मशीनगनों का मुकाबला करते हुए इजरायल के हैफा शहर पर महज एक घंटे में कब्जा कर लिया था.... नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर लांसर के मेजर दलपतसिंह शेखावत और कैप्टन अमान सिंह जोधा। 23 सितंबर को हुए इस युद्ध में मेजर दलपतसिंह समेत सात हिन्दुस्तानी शहीद हुए। दिल्ली स्थित तीन मूर्ति स्मारक इसी युद्ध के शहीदों को समर्पित है। खास बात यह है कि एक मूर्ति मेजर दलपत सिंह की है, इजरायल 2018 में इस विजय दिवस की शताब्दी मनाएगा। गौर करने लायक तथ्य है कि इस विजय गाथा को इजराइली बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ते हैं। तोपों के गोलों के बीच अमान सिंह ने एक घंटे में हैफा पर किया था कब्जा प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश व जर्मनी की सेनाएं प्रमुख थीं। जर्मनी व तुर्की की गठबंधन सेना ने हैफा के दुर्ग पर कब्जा कर लिया। वे तोपों व मशीनगनों से इजरायल सेना पर हमला कर रहे थे। भारतीय सेना को इसे मुक्त कराने की जिम्मेदारी मिली। जोधपुर लांसर के मेजर दलपत सिंह शेखावत अपनी टुकड़ी के साथ निकल पड़े। युद्ध में जर्मन सेना लगातार उन पर तोप व मशीनगनों से गोले दागती रही। इस दौरान मेजर दलपत सिंह शहीद हो गए। जोधपुर लांसर के कैप्टन अमान सिंह जोधा ने कमान संभालते हुए जर्मन सेना का मुकाबला किया एक घंटे के भीतर हैफा शहर उनके कब्जे में था, जर्मन मशीनगनों पर हौसला पड़ा भारी उस वक्त जोधपुर रियासत के घुड़सवारों के पास हथियार के नाम पर मात्र बंदूकें थी। वहीं, जर्मन सेना तोपों तथा मशीनगनों से लैस थी। लेकिन राजस्थान के रणबांकुरों के हौसले के आगे दुश्मन पस्त हो गया। देवली पाबूजी के निवासी थे मेजर दलपत सिंह शहीद हुए मेजर दलपत सिंह शेखावत पाली जिले के नाडोल के निकट देवली पाबूजी के रहने वाले थे। यहां के जागीरदार ठाकुर हरि सिंह के इकलौते पुत्र ठाकुर दलपत सिंह को पढ़ाई के लिए जोधपुर के प्रशासक सर प्रताप ने इंग्लैंड भेजा। 18 साल की उम्र में वे जोधपुर लांसर में बतौर घुड़सवार भर्ती हुए व बाद में मेजर बने। हैफा के युद्ध में ब्रिटिश सेना ने उन्हें कमान सौंपी। दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस, अमान सिंह को इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट मेजर दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस जबकि कैप्टन अमान सिंह जोधा को सरदार बहादुर की उपाधि देते हुए आईओएम (इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट) तथा ओ.बी.ई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश इंपायर) से सम्मानित किया गया था। 700 सैनिक बंदी बनाए, असलहा कब्जे में किया 23 सितंबर, 1918 को दिन में 2 बजे जोधपुर लांसर व मैसूर लांसर के घुड़सवारों ने हैफा शहर पर चढ़ाई की और एक घंटे में ही हैफा शहर के दुर्ग पर विजय पताका फहरा दी। भारतीय शूरवीरों ने जर्मन- तुर्की सेना के 700 सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। इनमें 23 तुर्की तथा 2 जर्मन अफसर भी थे। वहीं, 17 तोपें, 11 मशीनगन व हजारों की संख्या में जिंदा कारतूस भी जब्त किए गए। घुड़सवार हमले का यह निर्णायक युद्ध था। मारवाड़ के 6 और सपूत भी हुए शहीद इस युद्ध में मेजर दलपत सिंह के साथ 6 घुड़सवार शहीद हुए, जबकि टुकड़ी के 60 घोड़े भी मारे गए। जोधपुर लांसर सवार तगतसिंह, सवार शहजादसिंह, मेजर शेरसिंह आईओएम, दफादार धोकल सिंह, सवार गोपालसिंह और सवार सुल्तानसिंह भी इस युद्ध में शहीद हुए थे.. जय राजपुताना.....
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Many ‘love jihad’ case come to light in Jharkhand.


Many ‘love jihad’ case come to light in Jharkhand.
Cops send Chatra Love Jihad victim girl to Deoghar home.
Court sends ‘love jihad’ accused, mother to 14-day judicial custody.
VHP activists take on cars, shops in Ranchi out of protest against Love Jihad.
http://wp.me/pCXJT-3Ty

Another ‘love jihad’ case comes to light in Jharkhand.Alok K N Mishra | TNN | Ranchi | Aug 29, 2014:: Another case of alleged love jihad was reported from Chatra…
HINDUEXISTENCE.ORG
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इसे कहते है Love Jihad का नमूना !


इसे कहते है Love Jihad का नमूना !

मन्दिर में जिन्होंने कभी मत्था ना टेका……
वो मजारों पे फूल चढ़ाये जा रहे हैं…..

राम के नाम से जुबां जिनकी दुखती…..
वो मुहम्मद के गुण गाए जा रहे हैं…..

आरती से जिनके हाथ कांपते थे …….
वो अजानों में हाथ उठाए जा रहे हैं……

राम नाम जिनको साम्प्रदायिक लगता…..
वो अल्ला-हू-अकबर गाए जा रहे हैं…..

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

गुरूकुल


प्रश्नोत्तरी ( गुरूकुल शिक्षा पद्धति ) :-

प्रश्न :- गुरूकुल शिक्षा प्रणाली क्या होती है ?
उत्तर :- घर में न रहकर गुरू के अधीन रहते हुए ब्रह्मचर्य पूर्वक त्याग, तपस्या युक्त जीवन यापन करते हुए विद्या अर्जन करना गुरूकुल शिक्षा प्रणाली है ।

प्रश्न :- ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जो आचार्य कुल में रहकर शरीर की रक्षा, चित की रक्षा करते हुए विद्या के लिये प्रयत्न करे उसे ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी कहते हैं ।

प्रश्न :- गुरूकुल में कितनी आयु के बच्चों का प्रवेश होता है ?
उत्तर :- गुरूकुल में 6 वर्ष की आयु में प्रवेश होता है । या अपवाद रूप में किसी गुरूकुल में बड़ी आयु में भी प्रवेश होता ही है ।

प्रश्न :- गुरूकुल में प्रवेश पाने वाले बच्चों की पारिवारिक अवस्था कैसी होनी चाहिये ?
उत्तर :- गुरूकुल में अमीर, गरीब, राजा, दरिद्र, आदिवासी, अछूत सबका समान रूप से प्रवेश हो सकता है, कोई भेद भाव नहीं है ।

प्रश्न :- गुरूकुलीय विद्यार्थी के भोजन, वस्त्र कैसे होते हैं ?
उत्तर :- गुरूकुलीय विद्यार्थीयों का भोजन शुद्ध, सात्विक तथा वस्त्र सभ्य शिष्ट आदर्श होते हैं ।

प्रश्न :- प्राचीन गुरूकुलों में कौन कौन से विषय पढ़ाये जाते थे ?
उत्तर :- प्राचीन गुरूकुलों में वेद, दर्शन, उपनिषद, व्याकरण आदि आर्ष ग्रन्थ पढ़ाये जाने के साथ साथ गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, चिकित्सा, भूगोल, खगोल, अन्तरिक्ष , गृह निर्माण, शिल्प, कला, संगीत, तकनीकी, राजनीती, अर्थशास्त्र, न्याय, विमान विद्या, युद्ध, अयुद्ध निर्माण, योग, यज्ञ एवं कृषि इत्यादि जो मनुष्य के भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिये आवश्यक होते हैं वे सभी पढ़ाये जाते थे ।

प्रश्न :- गुरूकुल में पढ़ाई का समय क्या होता था ?
उत्तर :- गुरूकुल में पढ़ाई का समय सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक होता था ।

प्रश्न :- गुरूकुल की समय व्यवस्था कैसी थी ?
उत्तर :- सामान्यतः प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर विद्यार्थीगण उठते थे, शौच आदि क्रिया से निवृत होकर ऊषा पान ( तांबे के बर्तन का जल पीना ) करते थे । फिर व्यायाम, स्नान, संध्या, प्राणायाम, अग्निहोत्र ( यज्ञ ) आदि के बाद भोजन करते थे । और फिर विद्या का अध्ययन आरम्भ होता था । जिसमें महत्वपूर्ण विषय आते थे । कक्षाओं में न पढ़ाकर वृक्षों के नीचे या प्राकृतिक वातावरण में पढ़ाया जाता था । सूर्यास्त के समय संध्या अग्निहोत्र आदि से निवृत होकर विद्यार्थी रात्री का भोजन करके विश्राम करते थे । भोजन केवल दो बार ही मिलता था । क्योंकि मनुष्य को दीर्घायु के लिये दो समय ही भोजन करना उचित है ।

प्रश्न :- प्राचीन गुरूकुलों में शिक्षा का शुल्क क्या था ?
उत्तर :- प्राचीन काल में गुरूकुल शिक्षा निःशुल्क थी ।

प्रश्न :- गुरूकुलों का खर्च कैसे चलता था ?
उत्तर :- गुरुकुलों का खर्च ग्रामीणों के दान से और सरकार के द्वारा चला करता था ।

प्रश्न :- गुरूकुल कहाँ बनाये जाते थे ?
उत्तर :- गुरूकुल ग्रामों से दूर अरण्य ( वन ) में बसाये जाते थे ।

प्रश्न :- गुरूकुल केवल बालकों के ही होते थे या बालिकाओं के भी ?
उत्तर :- गुरूकुल बालकों और बालिकाओं के दोनो के हुआ करते थे । और दोनों के गुरूकुलों में दूरी कम से कम 12 कोस की हुआ करती थी ।

प्रश्न :- गुरूकुलों की शिक्षा का माध्यम क्या था ?
उत्तर :- गुरूकुलों की शिक्षा का माध्यम संस्कृत ही था और सदा संस्कृत ही रहेगा ।

प्रश्न :- भारत में गुरूकुल शिक्षा प्रणाली कितनी पुरानी है ?
उत्तर :- भारत में गुरूकुल शिक्षा प्रणाली आदिकाल से है । जब से मनुष्य की उत्पत्ति हुई है ।

प्रश्न :- प्राचीन काल में भारत में कितने गुरूकुल थे ?
उत्तर :- यह समूचे भरतखंड की सीमा त्रिविष्टिप ( तिब्बत ) से लेकर सींहल द्वीप ( श्रीलंका ) , ब्रह्मदेश ( म्यांमार ) से लेकर काम्बोज ( अफगानिस्तान ) तक थी । तो हर गाँव में कम से कम एक गुरूकुल था, किसी में तो तीन भी पाये जाते थे, हम औसतन 2 मान कर चलें तो, भारत में करीब 18 लाख के गाँव थे । तो कुल योग हुआ 18 x 2 = 36 लाख कम से कम गुरूकुल आर्यवर्त की सीमाओं में पाये जाते थे । तो पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक करीब इतने वैदिक गुरूकुल थे जहाँ, बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे । इससे अधिक भी हो सकते हैं । परंतु इससे कम नहीं ।

प्रश्न :- कुछ प्रचीन विश्वविद्यालयों के नाम लिखें ।
उत्तर :- नालंदा विश्वविद्यालय , तक्षशिला विश्वविद्यालय, वल्लभीपुर आदि प्रसिद्ध हैं ।

प्रश्न :- आधुनिक काल में गुरूकुल की स्थापना कब, कहाँ हुई ? और किसने की ?
उत्तर :- आधुनिक काल में सर्व प्रथम हरिद्वार के कांगड़ी नामक गाँव में सन् 1902 में गुरूकुल की स्थापना स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी ने की थी ।

प्रश्न :- राष्ट्र की खोई गरिमा कैसे वापिस आयेगी ?
उत्तर :- राष्ट्र की खोई गरिमा गुरूकुल शिक्षा प्रणाली की पुनः स्थापना करने से आयेगी ।

प्रश्न :- गुरूकुल शिक्षा प्रणाली से शिक्षा प्राप्त किये महापुरुषों के नाम बतायें ?
उत्तर :- राम, कृष्ण, वशिष्ठ, कपिल, कणाद, भीष्म, गौतम, पतंजली, धनवंतरी, परशूराम, अर्जुन, भीम, द्रोण, याज्ञवलक्य, गार्गी, मैत्रेयी, द्रौपदी, अंजना आदि महान आत्मायें गुरूकुलों से ही हुईं हैं ।

प्रश्नोत्तरी ( गुरूकुल शिक्षा पद्धति ) :-

प्रश्न :- गुरूकुल शिक्षा प्रणाली क्या होती है ?
उत्तर :- घर में न रहकर गुरू के अधीन रहते हुए ब्रह्मचर्य पूर्वक त्याग, तपस्या युक्त जीवन यापन करते हुए विद्या अर्जन करना गुरूकुल शिक्षा प्रणाली है ।

प्रश्न :- ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जो आचार्य कुल में रहकर शरीर की रक्षा, चित की रक्षा करते हुए विद्या के लिये प्रयत्न करे उसे ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी कहते हैं ।

प्रश्न :- गुरूकुल में कितनी आयु के बच्चों का प्रवेश होता है ?
उत्तर :- गुरूकुल में 6 वर्ष की आयु में प्रवेश होता है । या अपवाद रूप में किसी गुरूकुल में बड़ी आयु में भी प्रवेश होता ही है ।

प्रश्न :- गुरूकुल में प्रवेश पाने वाले बच्चों की पारिवारिक अवस्था कैसी होनी चाहिये ?
उत्तर :- गुरूकुल में अमीर, गरीब, राजा, दरिद्र, आदिवासी, अछूत सबका समान रूप से प्रवेश हो सकता है, कोई भेद भाव नहीं है ।

प्रश्न :- गुरूकुलीय विद्यार्थी के भोजन, वस्त्र कैसे होते हैं ?
उत्तर :- गुरूकुलीय विद्यार्थीयों का भोजन शुद्ध, सात्विक तथा वस्त्र सभ्य शिष्ट आदर्श होते हैं ।

प्रश्न :- प्राचीन गुरूकुलों में कौन कौन से विषय पढ़ाये जाते थे ?
उत्तर :- प्राचीन गुरूकुलों में वेद, दर्शन, उपनिषद, व्याकरण आदि आर्ष ग्रन्थ पढ़ाये जाने के साथ साथ गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, चिकित्सा, भूगोल, खगोल, अन्तरिक्ष , गृह निर्माण, शिल्प, कला, संगीत, तकनीकी, राजनीती, अर्थशास्त्र, न्याय, विमान विद्या, युद्ध, अयुद्ध निर्माण, योग, यज्ञ एवं कृषि इत्यादि जो मनुष्य के भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिये आवश्यक होते हैं वे सभी पढ़ाये जाते थे ।

प्रश्न :- गुरूकुल में पढ़ाई का समय क्या होता था ?
उत्तर :- गुरूकुल में पढ़ाई का समय सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक होता था ।

प्रश्न :- गुरूकुल की समय व्यवस्था कैसी थी ?
उत्तर :- सामान्यतः प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर विद्यार्थीगण उठते थे, शौच आदि क्रिया से निवृत होकर ऊषा पान ( तांबे के बर्तन का जल पीना ) करते थे । फिर व्यायाम, स्नान, संध्या, प्राणायाम, अग्निहोत्र ( यज्ञ ) आदि के बाद भोजन करते थे । और फिर विद्या का अध्ययन आरम्भ होता था । जिसमें महत्वपूर्ण विषय आते थे । कक्षाओं में न पढ़ाकर वृक्षों के नीचे या प्राकृतिक वातावरण में पढ़ाया जाता था । सूर्यास्त के समय संध्या अग्निहोत्र आदि से निवृत होकर विद्यार्थी रात्री का भोजन करके विश्राम करते थे । भोजन केवल दो बार ही मिलता था । क्योंकि मनुष्य को दीर्घायु के लिये दो समय ही भोजन करना उचित है ।

प्रश्न :- प्राचीन गुरूकुलों में शिक्षा का शुल्क क्या था ?
उत्तर :- प्राचीन काल में गुरूकुल शिक्षा निःशुल्क थी ।

प्रश्न :- गुरूकुलों का खर्च कैसे चलता था ?
उत्तर :- गुरुकुलों का खर्च ग्रामीणों के दान से और सरकार के द्वारा चला करता था ।

प्रश्न :- गुरूकुल कहाँ बनाये जाते थे ?
उत्तर :- गुरूकुल ग्रामों से दूर अरण्य ( वन ) में बसाये जाते थे ।

प्रश्न :- गुरूकुल केवल बालकों के ही होते थे या बालिकाओं के भी ?
उत्तर :- गुरूकुल बालकों और बालिकाओं के दोनो के हुआ करते थे । और दोनों के गुरूकुलों में दूरी कम से कम 12 कोस की हुआ करती थी ।

प्रश्न :- गुरूकुलों की शिक्षा का माध्यम क्या था ?
उत्तर :- गुरूकुलों की शिक्षा का माध्यम संस्कृत ही था और सदा संस्कृत ही रहेगा ।

प्रश्न :- भारत में गुरूकुल शिक्षा प्रणाली कितनी पुरानी है ?
उत्तर :- भारत में गुरूकुल शिक्षा प्रणाली आदिकाल से है । जब से मनुष्य की उत्पत्ति हुई है ।

प्रश्न :- प्राचीन काल में भारत में कितने गुरूकुल थे ?
उत्तर :- यह समूचे भरतखंड की सीमा त्रिविष्टिप ( तिब्बत ) से लेकर सींहल द्वीप ( श्रीलंका ) , ब्रह्मदेश ( म्यांमार ) से लेकर काम्बोज ( अफगानिस्तान ) तक थी । तो हर गाँव में कम से कम एक गुरूकुल था, किसी में तो तीन भी पाये जाते थे, हम औसतन 2 मान कर चलें तो, भारत में करीब 18 लाख के गाँव थे । तो कुल योग हुआ 18 x 2 = 36 लाख कम से कम गुरूकुल आर्यवर्त की सीमाओं में पाये जाते थे । तो पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक करीब इतने वैदिक गुरूकुल थे जहाँ, बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे । इससे अधिक भी हो सकते हैं । परंतु इससे कम नहीं ।

प्रश्न :- कुछ प्रचीन विश्वविद्यालयों के नाम लिखें ।
उत्तर :- नालंदा विश्वविद्यालय , तक्षशिला विश्वविद्यालय, वल्लभीपुर आदि प्रसिद्ध हैं ।

प्रश्न :- आधुनिक काल में गुरूकुल की स्थापना कब, कहाँ हुई ? और किसने की ?
उत्तर :- आधुनिक काल में सर्व प्रथम हरिद्वार के कांगड़ी नामक गाँव में सन् 1902 में गुरूकुल की स्थापना स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी ने की थी ।

प्रश्न :- राष्ट्र की खोई गरिमा कैसे वापिस आयेगी ?
उत्तर :- राष्ट्र की खोई गरिमा गुरूकुल शिक्षा प्रणाली की पुनः स्थापना करने से आयेगी ।

प्रश्न :- गुरूकुल शिक्षा प्रणाली से शिक्षा प्राप्त किये महापुरुषों के नाम बतायें ?
उत्तर :- राम, कृष्ण, वशिष्ठ, कपिल, कणाद, भीष्म, गौतम, पतंजली, धनवंतरी, परशूराम, अर्जुन, भीम, द्रोण, याज्ञवलक्य, गार्गी, मैत्रेयी, द्रौपदी, अंजना आदि महान आत्मायें गुरूकुलों से ही हुईं हैं ।
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Rakilbul Hussain’s alias Ranjeet Kumar Kohli connections with the high and mighty,


Rakilbul Hussain’s alias Ranjeet Kumar Kohli connections with the high and mighty, including bureaucrats, politicians and judicial officers, have put some big names under the scanner of the investigating officers in the Tara Shahdeo case. Kohli confessed to have been running a sex racket using young girls whom he lured on the pretext of arranging admission to premier educational institutes, the police said.

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गुरु गोबिन्द सिंह


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२ महापुरुष गुरु गोबिन्द सिंह और
छत्रपति शिवाजी दोनो के जनम और
म्रुत्यु मैं क़रीब ४० साल का अंतराल है
पर दोनो ने ही भारत मैं मुग़ल
साम्राज्य की रिढ कि हड्डी तोड दी
१. गुरु गोबिन्द सिंह के बालक
बाबा ज़ोराबर सिंह और बाबा फ़तेह
सिंह से मुग़लों ने इस्लाम धर्म ग्रहण
करने को कहा और इन्होने इस्लाम
ग्रहण करने के लिये मना कर
दिया तो इन्हे मुग़लों ने दिवारों मैं
ज़िंदा चुनवाया.
शिवाजी के सुपुत्र
शाम्भाजी को औरंगजेब ने क़ैद किया और
क़ैद मैं शाम्भाजी महराज को हर रोज़
इस्लाम धर्म ग्रहण करने
को कहा जाता था और जब ये इस्लाम
धर्म ग्रहण करने से मना करते थे, तब उन
के शरीर के एक-एक हिस्से को हर रोज़
काट के अलग किया जाता था, ४० दिन
तक औरंग्ज़ेब ने इन्हे म्रुत्यु तुल्य
यातनायें दी और अन्त मैं
शाम्भाजी को मार दिया.
२. भारतीय इतिहास में दो ऐसे पत्र
मिलते हैं जिन्हें दो विख्यात
महापुरुषों ने दो कुख्यात व्यक्तिओं
को लिखे थे। इनमे पहिला पत्र
“जफरनामा” कहलाता है जिसे श्री गुरु
गोविन्द सिंह ने औरंगजेब को भाई
दया सिंह के हाथों भेजा था।
दूसरा पत्र छ्त्रपति शिवाजी ने आमेर
के राजा जयसिंह को भेजा था जो उसे ३
मार्च १६६५ को मिल गया था। इन
दोनों पत्रों में यह समानताएं हैं
की दोनों फारसी भाषा में शेर के रूप में
लिखे गए हैं। दोनों की पृष्टभूमि और
विषय एक जैसी है। दोनों में देश और धर्म
के प्रति अटूट प्रेम प्रकट
किया गया है।
उन्हे कभी न भुलें जिन की बलिदानों के
वज़ह से हमारा धर्म सुरक्षित है
वाहे गुरु दा खालसा वाहेगुरु दी फ़तेह
हर हर महादेव!

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तेजपात


तेजपात (Indian Bay Leaf)-

भारत में उष्णकटिबंधीय एवं इसके अतिरिक्त उपउष्णकटिबन्धीय हिमालय से भूटान तक ९००-१५०० मी तक की ऊंचाई पर सिक्किम में २४०० मी तथा सिल्हट एवं खसिया के पहाड़ी क्षेत्रों में ९००-१२०० मी की ऊंचाई तक तेजपात के जंगली वृक्ष पाये जाते हैं | इसके पत्तों को धूप में सुखाकर प्रयोग में लिया जाता है | पत्तियों का रंग जैतूनी हरा तथा ३ स्पष्ट शिराओं युक्त तथा इसमें लौंग एवं दालचीनी की सम्मिलित मनोरम गंध पायी जाती है | यह सदा हरा रहने वाला वृक्ष है | आज हम तेजपात के औषधीयगुणों की चर्चा करेंगे –

१- तेजपात के ५-६ पत्तों को एक गिलास पानी में इतने उबालें की पानी आधा रह जाए | इस पानी से प्रतिदिन सिर की मालिश करने के बाद नहाएं | इससे सिर में जुएं नहीं होती हैं |

२- चाय-पत्ती की जगह तेजपात के चूर्ण की चाय पीने से सर्दी-जुकाम,छींकें आना ,नाक बहना,जलन ,सिरदर्द आदि में शीघ्र लाभ मिलता है |

३- तेजपात के पत्तों का बारीक चूर्ण सुबह-शाम दांतों पर मलने से दांतों पर चमक आ जाती है |

४- तेजपात के पत्रों को नियमित रूप से चूंसते रहने से हकलाहट में लाभ होता है |

५- एक चम्मच तेजपात चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से खांसी में आराम मिलता है |

६- तेजपात के पत्तों का क्वाथ (काढ़ा) बनाकर पीने से पेट का फूलना व अतिसार आदि में लाभ होता है |

७- इसके २-४ ग्राम चूर्ण का सेवन करने से उबकाई मिटती है |