Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

आज तो ग्लोबलाईजेशन ने दुनिया छोटी कर दी है


Siddharth Bharodiya

आज तो ग्लोबलाईजेशन ने दुनिया छोटी कर दी है । अगर कोइ अपना घरबार छोड के कहीं दुसरी जगह जाता है तो बूरा नही लगता है । लेकिन एक समय था जब आदमी दुसरे शहर भी जाता था तो अपने घर, अपने गांव के लिए तडपता था, तो दुसरे देश की बात ही क्या करनी !

ये गीत ऐसी ही तडप दिखाता है ।

पिपरा के पतवा सरीखा डोले मनवा
कि जियरा में उठत हिलोर
अरे पुरवा के झोंकवा से आईल रे संदेसवा
की चल आज देसवा की ओर

झुकि झुकि बोले कारे कारे बदरा
कबसे पुकारे तोहे नयनों का कजरा
उमड़ घुमड़ जब गरजे बदरिया रे
ठुमक ठुमक नाचे मोर

सिमिट सिमिट बोले लम्बी रे डगरिया
जल्दी जल्दी चलू राही अपनी नगरिया
रहिया तकत बिरहनिया दुल्हनिया रे
बांध के लगनवा की डोर

यही गीत संगीत और ऍक्शन के साथ ।
http://www.youtube.com/watch?v=2QYaeHut-lU

मैं ने यहां एक कहानी पेस्ट की है । जो सुरिनाम के एक भारतिय गुलाम गिरमीटए के बेटे ने लिखी है । जीस में उसके बाप की भारत के लिए जो तडप थी उस का वर्णन है ।
—————
कितने बरस गुज़र गए अपने देश से गए हुए, बल्कि लगता है कितनी सदियाँ गुज़र गईं और मै तरस गया अपने देश, अपने गाँव नरीखेड़ा की मिटटी को छूने के लिए। नियति थी की मै यहाँ ‘ सूरीनाम’ में ‘गिरमिटिया मजदूर ‘ बन कर आ गया था।

उस वक्त ये नहीं पता था की यही हमारी उपाधि हो जाएगी। एक अच्छी सोच के साथ यहाँ आया था लालच बस यही था कि यहाँ नौकरी मिलेगी और मै अपने घर-परिवार, गाँव सबका नाम रोशन करूँगा जैसे और भी आस-पास के गाँव के लोग यहाँ सूरीनाम आकर करते हैं। कभी कोई वापस लौट कर ही नहीं आता इतना खुश हो जाते हैं सब यहाँ ।

कच्ची उम्र में तरक्की के सपने संजोये मै भी चला आया था ‘दक्षिण अमेरिका’ के पश्चिम में स्थित छोटे से देश ‘सूरीनाम’ में। यहाँ तक का सफ़र पानी के जहाज का था और सारा खर्चा हमारे अंग्रेज़ मालिकों ने ही उठाया था जिनसे हमने यहाँ की तारीफें सुनी थी और बस उसी ख़ुशी की तलाश में,गरीबी से निजात पाने मै और मेरे जैसे न जाने कितने ही लोग आये थे इंडिया से। उस दिन अपना गाँव- देश छोड़ते हुए ज़रा भी दुःख नहीं हुआ था उम्र ही ऐसी थी, बस सपनो को मुट्ठी में करना था और उन्ही सपनो को सच करने का वादा दिलाकर ही अंग्रेज़ हमे यहाँ लाये थे।

कई दिनों के लम्बे सफ़र और उसकी थकान के बाद जैसे ही जहाज़ बंदरगाह पर पहुँचता है जंजीरों से जकड़ा जाता है ठीक उसी तरह से जकड़ दिए गए थे हम सब भी सदा के लिए। जहाज़ तो एक समय बाद वापस मुक्त हो जाता है लेकिन हमारी मुक्ति हमे मौत ही दिलाएगी। अंग्रेजों द्वारा दिलाये गए सारे वादे खोखले थे और सामने था रात्रि के समंदर जैसा काला पानी सा सच !

सूरीनाम जहाँ की भाषा को ‘सरनामी’ भाषा कहते हैं,सीखने में हमे काफी वक्त लगा क्योंकि हमसे बात करने के लिए इस भाषा का नहीं बल्कि ‘कोड़ों की मार ‘ भाषा का ही अधिक प्रयोग किया जाता था। रोज़ अनगिनत बार कोड़ों की मार से शरीर नीला-काला हो जाता था पर धीरे-धीरे चीखें कम निकलती थीं,आदत हो गई थी शरीर को। यहाँ मै ही अकेला नहीं था बल्कि पूरे भारत वर्ष के अलग-अलग प्रान्तों की भीड़ थी और वो सब भी हमारी तरह अच्छे जीवन के प्रलोभन से ही यहाँ आये थे।

कलकत्ता के लोगों की संख्या अधिक थी। भारतीय इतने अधिक थे कि यूँ लगता था अपने ही देश का कोई छोटा सा शहर बसा है सूरीनाम में। सूरीनाम में गन्ना बहुत अधिक होता है और हम सबसे यहाँ गन्ने की खेती ही करवाई जाती थी। पूरे दिन बिना खाना-पानी के काम कराया जाता था और सिर्फ एक बार इतना ही खाना मिलता था की हम जिन्दा रह सकें। हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं था क्योंकि हम वहां से भाग भी नहीं सकते थे। पानी के रास्ते जहाज़ से ले तो आये गए किन्तु वापसी का कोई भी रास्ता हमारे लिए नहीं था। हमारा जीवन समुद्र के खारे पानी के साथ मिलकर नमकीन ही रह गया,बल्कि नमक कुछ अधिक ही। अपने घर और देश से दूर यहाँ आकर हमे ये अहसास हुआ कि क्या खो चुके हैं हम।

समय बीता और साथ ही हमारा जीवन भी, एक नए जीवन की शुरुआत भी यहीं से हुई और उसका पहला कदम था यहीं की एक लड़की से शादी। हम एक-दूसरे को अधिक नहीं जानते थे और न ही एक-दूसरे की भाषा की हमे समझ थी लेकिन फिर ये भी तो सच है प्यार कब भाषा का मोहताज़ हुआ है। आँखों ने मन की बातें पढ़ लीं और ज़ुबाँ ने जो कहना चाहा वो कानो से लेकर ह्रदय तक संप्रेषित हो गया। एक बार फिर से जीवन जीने की चाह जगी। हमने शादी कर ली और शादी के एक वर्ष बाद ही जब बेटे रिहान का जन्म हुआ तब यूँ लगा जैसे अपना ही नया जन्म हुआ हो। सारी तकलीफ़ें जैसे उड़न छू हो गई पल भर में ही । हम दोनों खूब काम करते और जो भी मुश्किल से पैसे बचते उन्हें रिहान की परवरिश के लिए रख लेते क्योंकि अपने अंश अपने बेटे को हम एक बेहतर जीवन देंगे ये हमने एक दूसरे से वादा किया था।

रिहान धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था और हम दोनों उसके अच्छे भविष्य के लिए तत्पर। रिहान बहुत समझदार था सारी परिस्थितियों से वाकिफ़ भी था इस लिये हमेशा यही कहता कि नौकरी मिलते ही मै आप दोनों को इन सारे कष्टों से दूर रखूंगा, बहुत कर लिया आप दोनों ने अब मेरी बारी है कि मै अपने मम्मी-पापा को खुशियाँ दूं।

आज भी याद है वो दिन जब रिहान को पहली तन्खाह मिली थी उसने पूछा था बताओ पापा क्या दिलाऊँ आपको और मैंने कहा था, बस एक बार मुझे मेरे गाँव मेरे देश ले चलना बेटा और दूजी कोई चाह नहीं है मेरी। मेरा देश बहुत अच्छा है, वहाँ सब में आपस में बहुत प्यार है, वहाँ हर जाति-धर्म के लोग आपस में मिलकर रहते हैं और सभी एक दूसरे के त्यौहार मानते हैं, इतना भाईचारा दुनिया में और कहीं नहीं। मुझे पावन गंगा नदी में स्नान करना है फिर एक बार महसूस करना है जैसे माँ की गोद में बैठ गए हों उस स्पर्श का अहसास आज भी कितना ममतामई है। रिहान, मेरे गाँव से बस थोड़ी ही दूरी पर है जगह बक्सर। गंगा नदी वहीँ से होकर गुज़रती है और वहां पर माँ चंडी देवी का प्राचीन सिद्ध मंदिर भी है। मंदिर के ठीक नीचे अंतिम सीढ़ियों में सदा ही गंगा का जल बहता रहता है। मेरे पिता जी बताते थे की मेरा मुंडन भी वहीँ उसी मंदिर के आँगन में हुआ था और मेरे बालों को आंटे की लोई में भरकर वहीँ गंगा नदी में प्रवाहित किया गया था। बक्सर के करीब 13 किलोमीटर पहले जगह पड़ती है भगवंत नगर वहां के मान हलवाई की दुकान और उसके मीठे समोसे बहुत प्रसिद्ध थे। ताज़ी गरम जलेबियाँ बरगद के पत्ते में मिलती थीं आज भी याद है उन गरम जलेबियों की मिठास जब कि उस वक्त मै 10 बरस का थ। हमारे गाँव में सब घर अपने जैसे ही थे जहाँ भूख लगे वहीँ खाना खा लो। चाचा,काका-काकी जैसे रिश्ते सिर्फ स्नेह और ममता ही बरसाते थे। रिहान मेरी पहली और अंतिम इच्छा यही होगी कि तुम मुझे मेरे गाँव, मेरे देश ले चलना। अभी कोई जल्दी नहीं है पहले खूब कमाओ, जियो अपनी माँ को आराम दो अपना परिवार बसाओ फिर मुझे मेरी मिटटी तक ले चलना।

अपने दादा जी की डायरी पढ़ते-पढ़ते रॉबर्ट की ऑंखें नम हो आईं आज अचानक ही दादा जी के कमरे से उसे ये डायरी मिली थी जो उसने बड़ी उत्सुकता वश पढनी शुरू कर दी थी बिना अपने पापा रिहान की इज़ाज़त के। रॉबर्ट डायरी लेकर अपने पापा रिहान के पास जाता है । पापा आपसे बिना पूछे दादा जी की डायरी पढ़ी और मेरा मन बहुत दुखी हो गया है क्या आप दादा जी को उनके देश भारत लेकर गए थे ?

नहीं !! कहते हुए रिहान एक लम्बी सांस लेते हुए अपनी आँखें बंद कर लेता है। कुछ देर की चुप्पी के बाद रिहान कहता है मै तुम्हारे दादा जी को भारत ले जाना चाहता था किन्तु नहीं ले जा सका । कई समस्याएं थीं उस वक्त और जब तक मै उनकी ये इच्छा पूरी करता वो नहीं रहे इस बात का दुःख मुझे आज तक है क्योंकि सिर्फ यही एक चीज़ मांगी थी उन्होंने मुझसे और मै नहीं दे पाया। उस वक्त तुम बहुत छोटे थे ,तुम्हारे जन्म के समय ही तुम्हारी माँ गुज़र गईं और तुम्हारा लालन पालन तुम्हारी दादी ने ही किया। उस हालत में न तो मै तुम लोगों को भारत ले जा सकता था और न ही तुम्हे छोड़कर। इसी तरह वक्त कब बीत गया पता ही नहीं चला और एक रात तुम्हारे दादा जी सोए तो फिर उस गहरी नींद से कभी नहीं उठे। तुम्हारी दादी इसी देश की थीं इस लिए भी मै बाद में भारत नहीं गया क्योंकि पिता जी की अंतिम इच्छा पूरी नहीं कर सका था इस लिए कम से कम माँ के अंतिम समय में मै उन्हें उनके देश उनकी मात्र भूमि से दूर नहीं ले जाना चाहता था। आज अच्छा लग रहा है ये जानकार रॉबर्ट, कि तुम दादा जी की भावनाओं को समझ सके हो ” आय एम् प्राउड ऑफ़ यू माय सन “.

डैड क्या हम इण्डिया चल सकते हैं, क्या हम वहाँ चल कर दादा जी के परिवार से मिल सकते हैं ? आखिर वो हमारा भी तो है …है ना डैड।

रॉबर्ट यहाँ तुम्हारा परिवार है ,वाइफ है दो बच्चे हैं इस हालात में तुम इंडिया जाने की कैसे सोच सकते हो जब कि तुम कभी इंडिया गए भी नहीं। हाँ तुम मेरी टिकट करा दो और मै अपने पिता के देश उनके गाँव हो आता हूँ ,उन सभी तीर्थ स्थलों के दर्शन भी कर लूँगा जिनका जिक्र पापा हमेशा ही किया करते थे। वापस आकर तुम सब को ले चलूँगा जब बच्चों की भी छुट्टियां होंगीं तब ! तुम्हारा इस तरह पापा की डायरी पढना इस बात का संकेत है कि पापा आज भी अपने देश के लिए तड़प रहे हैं शायद उनकी आत्मशांति तभी होगी जब मै उनके देश-गाँव हो आऊंगा। वहाँ की मिटटी के स्पर्श मात्र से तुम्हारे दादा जी को मुक्ति मिल जाएगी और शायद मुझे भी, आखिर वही तो है हमारा भी देश हमारा अपना।

रॉबर्ट अपने डैड रिहान की टिकट करा देता है और रिहान असंख्य सपने संजोये हुए रखता है कदम अपने पापा की स्वप्न से भी सुन्दर दुनिया में। उसे याद है कि पापा सदा ही अपने गाँव पैसे भेजा करते थे,गाँव के अपने सभी भाई-बंधुओं के लिए और जब, वो बड़ा हुआ उसे अच्छी नौकरी मिली तब से तो उसके पापा ने हर महीने एक निश्चित रकम गाँव भेजनी शुरू कर दी थी सिर्फ यही सोचकर कि घर परिवार से दूर होना मजबूरी है लेकिन घर-परिवार की पैसों से मदद करना कर्तव्य।

रिहान लम्बी हवाई यात्रा के बाद इण्डिया पंहुचता है अभी सुबह के तीन बजे हैं । रखता है अपना पहला कदम देश की राजधानी दिल्ली के हवाई अड्डे पर। सोचता है मन ही मन कि क्या सच में ये उसका देश है ?

पूरा दिन है उसके पास क्यूँकि उसके गाँव जाने की ट्रेन रात साढ़े नौ बजे की है। टैक्सी वाले को रेलवे स्टेशन के पास के ही किसी होटल में चलने के लिए कहता है। सुबह-सुबह बिलकुल शांत है दिल्ली। इण्डिया गेट और राष्ट्रपति भवन देख कर खुश होता है वह कि हमारा देश तो सच में बहुत सुन्दर है। होटल में पंहुचकर सोने की कोशिश तो बहुत करता है लेकिन कौतूहल उसे सोने नहीं देता। नहा-धो कर तैयार हो चल पड़ता है दिल्ली की सैर करने। होटल से ही टैक्सी तय कर ली थी पूरे दिन दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों और शहर के घूमने की । रिहान खुश है आज बार-बार उसे पापा याद आ रहे हैं और पापा की कहीं हजारों बातें।

पूरा दिन कब गुजर गया पता ही न चला शाम हो गई। ट्रेन निश्चित समय से २ घंटे की देरी से चल रही है फिर भी रिहान जाकर पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेट फॉर्म न.६ पर इंतज़ार करता है। करीब ढाई घंटे बाद अनाउन्समेंट होता है की अम्बाला से चलकर ऊंचाहार जाने वाली ‘ ऊंचाहार एक्सप्रेस ‘ प्लेट फॉर्म न . ६ पर आ रही है। सारा सामान ले वो झट से ट्रेन में चढ़ जाता है। ट्रेन चल पड़ती है और रिहान अपनी आँखों में असंख्य सपने संजोये याद करता है अपने पापा को। कहता है मन में ‘ पापा ‘ मै आ रहा हूँ। अगली सुबह वो कानपुर स्टेशन पर उतर जाता है और वहीँ से अपने गाँव के लिए टैक्सी कर लेता है उसे पता ही नहीं की ये ट्रेन उसके गाँव के बेहद करीब से गुज़रती है। टैक्सी वाला बताता है उसे कि साहब ये गाड़ी तो आपके गाँव के पास से ही जाती है, आप इतना पहले उतर गए हैं। रिहान फिर भी निश्चिन्त है कोई बात नहीं ,आपको मेरे गाँव का पता मालूम है ना बस आप ले चलिए फिर। मात्र एक घंटे में ही वो एक ‘बक्सर’ नामक जगह पर पंहुच जाता है। वहाँ एक विशाल नदी को देख कर ड्राइवर से पूछता है की ये कौन सी नदी है ? ” गंगा नदी ” ड्राइवर का जवाब सुनते ही रिहान बोल पड़ता है ओ वॉव ! रोको प्लीज़ मैं इस पावन नदी का स्पर्श करना चाहता हूँ। रिहान बचपन से ही पापा से गंगा नदी की पवित्रता के बारे में सुनता आया था। गंगा नदी के स्पर्श में रिहानअपने पापा का स्पर्श महसूस करता है। नदी में स्नान के बाद वो प्रसिद्ध सिद्ध पीठ चंडी माता के दर्शन करता है। रिहान भावुक हो उठता है ये सोचकर कि पापा कितने बेचैन रहे होंगे अपने देश अपनी मिटटी से अलग। आज वो पापा के दर्द को खुद में महसूस करता है।

बक्सर से करीब १२ किलोमीटर बाद वो भगवंत नगर नामक एक छोटे से कस्बे में पंहुचता है यहाँ पर ड्राइवर रुककर उसके गाँव ‘ नरी खेड़ा ‘ का रास्ता पूंछता है। रिहान गाड़ी से उतर आता है सामने एक चाय की दूकान पर बैठ जाता है। काफी लोगों की भीड़ इकठ्ठा थी उस दूकान पर तभी उसकी नज़र दूकान के ऊपर लिखे उसके नाम पर जा पड़ती है ,काफी धुंधला सा दिख रहा है शायद जब दूकान खुली होगी तभी नाम लिख कर टांगा गया होगा। ” मान हलवाई ” नाम पढ़कर वो अचंभित हो गया और एकदम जोर से बोला, मान हलवाई ! रिहान की आवाज़ सुन आस-पास के लोग उसे देखने लगे कि हुआ क्या है। किसी ने बोला भी ‘ इसमें आश्चर्य की क्या बात है ‘ लगता है कोई परदेसी है ?

रिहान अपना पूरा परिचय बताता है और साथ ही देश आने का उद्देश्य भी। वहाँ उपस्थित दो लोग उसे झट से गले लगा लेते हैं और कहते हैं ‘अरे ,तू सरजू का बेटा है, मेरे सरजू का । मै सरजू का बड़ा भाई हूँ और ये छोटा चचेरा भाई है । रिहान की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता वो झट से दोनों लोगों के पैर छूता है। अरे चाय लाओ भाई साथ ही समोसे, पकौड़ी और गरमागरम जलेबी भी। चाय आती है सब पीते हैं और खूब जमकर खाते हैं बाद में बिल रिहान की तरफ बढा दिया जता है। ये कैसा आतिथ्य ? रिहान बिल के पैसे देते हुए सोचता है ।

रिहान कहता है कि ‘घर चलें काका’ सुनते ही काका कहते हैं हाँ क्यों नहीं बेटा फिर तुरंत ही बोल पड़ते हैं कि कुछ पैसे चाहिए हमे। हमारे पास तो वैसे भी कुछ है ही नहीं । सरजू तो कमाने गया और फिर लौटा ही नही भूल गया हम सबको,कभी एक पैसा तक न भेजा उसने । ये सुनकर रिहान दंग रह गया क्योंकि जब से वो बड़ा हुआ था वो खुद ही पैसा भेजता था इन सबके नाम से ,फिर ये झूठ क्यों बोल रहे हैं ?

आधा दिन बीत गया उसी दूकान पर लेकिन किसी ने रिहान को घर या गाँव चलने के लिए नहीं कहा बल्कि तब तक कुछ और लोग उसके आने की खबर पाकर वहीँ आ गए और अपना- अपना रोना रोने लगे कि अब तुम आ गए हो बेटा तो तुम ही कुछ करो जब इतना कमाया है तो वो अपनों के लिए ही ना । हम सब बेहद गरीब हैं या तो हमारी पैसों से मदद कर दो या फिर अपने ही साथ ले चलो । सरजू तो कभी आया नहीं और हम बस जिम्मेदारियों के नीचे दबते चले गए। अब जो तुमने हमारी मदद न की तो क्या यहाँ हमारी गरीबी का मजाक बनाने आये हो । रिहान को कुछ समझ नहीं आ रहा था एक पल को उसे ऐसा लगा जैसे उसकी सोचने समझ पाने की कोई शक्ति कहीं चली ही गई है कि ये सब क्या कह रहे हैं जबकि उसके पापा ने तो ख़त के ज़रिये अपनी सारी ज़मीन तक इन्ही भाइयों के नाम कर दी थी और हमेशा ही इन्हें पैसे भेजते रहे फिर ये लोग उल्टा हमसे पैसे क्यों मांग रहे हैं, देखने में तो कोई भी निर्धन नहीं लग रहा है । दुकान पर बैठे -बैठे शाम होने को आई लेकिन न ही किसी ने उससे खाने को पूछा और न ही गाँव चलने को कहा बल्कि सब के सब किसी भूखे गिद्ध की तरह उससे पैसे ही मांगते रहे और अपनी लाचारियाँ जताते रहे बल्कि उससे ज्यादा उसके सूटकेस पर सभी की नज़रें जमीं रहीं ।

अँधेरा घिरने लगा और वो सब एक साथ उठ खड़े हुए कि अच्छा अब चलते हैं, रिहान भी उठा कि हाँ चलिए मैं भी बहुत थक गया हूँ तभी काका बोले बेटा तुम कहाँ चलोगे तुम यहीं कहीं अपना इंतजाम कर लो हमारे घर तो बहुत छोटे हैं और हम सब तो जमीन पर ही सोते हैं कोई खाट या बिस्तर नहीं है हमारे पास या तो कुछ पैसे दे दो तो हम तुम्हारे लिए बिस्तर खरीद लें। अब तक रिहान को समझ आ गया कि ये सब लालची हैं और उसने तुरंत कहा नहीं काका आप सब जाओ मैं आज यही रुक जाऊँगा कल मिलेंगे फिर आप सभी से । पैसे तो मैं भी लेकर नहीं आया कल सुबह बैंक से निकालूँगा, आज की रात यहीं कहीं गुजार लूँगा । कल आप के साथ गाँव चलूँगा । ठीक है बेटा अब तुम आराम करो हम कल सुबह ही आ जायेंगे । सभी चले जाते हैं और रिहान वहीँ बैठा रहता है जब तक दूकान बंद नहीं हो जाती है ।

रात हो गई साहब, चलना नहीं है ?

ड्राइवर की आवाज़ से रिहान की खामोशी टूटती है । चलना है लेकिन पहले कहीं खाना खा लेते हैं जोर की भूख लगी है । ड्राइवर एक ढाबे पर रोकता है तो रिहान कहता है कि भूख ही नहीं है ।

लेकिन साहब आपने ही तो कहा था की भूख लगी है ।

हाँ , क्योंकि तुम्हे भूख लगी होगी कुछ खा लो फिर चलना है ।

ड्राइवर खाना खाता है और रिहान अपने गले में पापा के रुन्धते-अटकते शब्दों को निगलने की कोशिश करता है ।

चलें साहब मैंने खा लिया, किधर रिहान के मुंह से निकलता है । मैंने आपके गाँव नरीखेड़ा का रास्ता समझ लिया था दिन में ही, कहते हुए ड्राइवर गाड़ी स्टार्ट करता है और सीधा नरी खेड़ा गाँव पंहुचता है । गाँव के ठीक बाहर ही रिहान गाड़ी रोकने को कहता है । तुम यहीं रुको मैं जरा गाँव के अन्दर हो कर आता हूँ ।

पूरे दिन का नजारा देख कर ड्राइवर भी इतना तो समझ ही चुका था कि साहब क्या देखने पैदल जा रहे हैं इस लिए उसने बस यही कहा हाँ ठीक है साहब वैसे भी खाने के बाद मुझे नींद आती है तब तक एक नींद मार लेता हूँ।

रिहान के लिए ये गाँव क्या देश ही नया था फिर भी अपने पापा की नज़रों से उसने गाँव को अपने बेहद करीब महसूस किया था । एक गाँव वाले से सरजू के घर का पता पूछता है और घर के बाहर पंहुच कर हतप्रभ रह जाता है । एक आलीशान घर के बाहर दो जीप खड़ीं थीं, नौकर – चाकर घूम रहे थे । बाहर ही दो खाट पड़ी थीं और चार-पांच कुर्सियां भी साथ ही एक लकड़ी की बेंच भी । तभी ठीक किनारे थोडा दूर उसकी नज़र पड़ी एक काफी मोटे से नीम के पेड़ पर जिसे वो हमेशा ही पापा से सुनता आया था कि पापा का बचपन उसी के साथ बीता था वो वहीँ बैठ जाता है सट कर नीम के पेड़ से अँधेरा होने की वजह से किसी की नज़र उस पर नहीं पड़ती ।

रिहान के कानों में आवाज़ पड़ती है कि आज तो बच गए अगर वो गाँव आ जाता तो तो हमारे ठाट – बाट देखकर अगले ही महीने से हमे रकम भेजना बंद कर देता । सरजू का बडा भाई अपने परिवार के साथ बैठा बात कर रहां था । सभी जोर-जोर से हँसे फिर कोई बोला काका ये सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है कल जितना हो सके निकलवा लीजियेगा । अरे तू चिंता मत कर बेटे इसके बाप ने भी जीवन भर हमे पैसे भेजे हैं यही सोचकर कि हम यहाँ बहुत गरीबी में हैं और अब ये भी भेजता रहेगा । कल ही किसी बहाने से मोटी रकम निकलवा लूँगा बैंक से ।

ये सब सुन कर रिहान सन्न रह गया वहीँ हांथों से नीम के पेड़ के नीचे की थोड़ी नम सी मिटटी को निकाल कर मुठ्ठी में लिया और वहां से चला गया । टैक्सी में बैठते ही बोला सीधे कानपुर चलो अभी ।

रात कानपुर के एक होटल में गुजारी और अगले ही दिन दिल्ली और फिर वहां से पहली फ्लाईट ले सीधे सूरीनाम के लिए उड़ गया । सूरीनाम में उतर कर पहली बार उसे ये ज़मीन अपनी लगी, उसे लगा कि उसके पैरों तले ज़मीन है ।

अचानक रिहान को घर पर देख सभी अचम्भित रह जाते हैं साथ ही घबराए हुए से उसकी खैरियत पूछते हैं । बहुत थका हूँ अभी, कह कर वो अपने कमरे में चला जाता है और सो जाता है ।

अगले दिन सुबह रॉबर्ट पूछता है डैड क्या हुआ ? आप बहुत परेशान लग रहे हैं और इतनी जल्दी वापस कैसे आ गए सब ठीक तो है ? प्लीज बताइए, कैसा है दादा जी का गाँव बल्कि इण्डिया कैसा है ,कौन-कौन मिला आपको ,सब कैसे हैं वहाँ पर …

रिहान बिलकुल चुप था फिर थोड़ी देर बाद बोला पापा के गाँव में अब कोई नहीं रहा । आस -पास के गाँव वालों से पूछने पर पता चला कि कई वर्षों पहले वहाँ प्लेग फैला था और एक महामारी की तरह पूरा गाँव उसकी चपेट में आ गया । रॉबर्ट इण्डिया अपना देश है और जैसा पापा ने बताया था उससे भी अधिक नया लगा मुझे लेकिन पापा का गाँव और उसका नामों निशाँ नहीं है अब ।

ओह ! कहकर रॉबर्ट ऑफिस चला जाता है रिहान अपने पैंट की जेब में पड़ी नीम के पेड़ के नीचे की मिट्टी निकालता है और घर के बाहर के अपने छोटे से लॉन में उड़ा देता है ये कहते हुए कि “पापा आपके घर, आपके देश की मिट्टी अब यहीं है और सदा यहीं रहेगी आपके साथ”।

पत्रिका ‘ विश्व गाथा ‘ के सितम्बर – नवंबर : २०१३ अंक में प्रकाशित.

अगर ये कहानी सच है तो सरजू के परिवार वाले खूद अंग्रेज से भी बूरे निकले जो रुपए के लालच में उन पर उपकार करनेवाले खूद अपने भाई को ही भूल गए । उस भाई को जो पूरी जिंदगी गुलाम गीरमीट बन कर बडी मुसिबत भरी जिन्दगी जिया था । धिक्कार है !!

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Author:

Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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