Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

ये गन्ने की हरी हरी पत्तियां जाने हमरी सब बतियां


ये गन्ने की हरी हरी पत्तियां जाने हमरी सब बतियां

मुझे याद है ६० के दशक में हमारे घर में कोइ चाय नही पिता था लेकिन समेटी (राशन) की दुकान से जो मोरस (शक्कर) मिलती थे हम ड्रम में भर लेत थे । सारा गांव यही करता था, शुभप्रसंग आते रहते थे तो उस समय सस्ती मोरस शुभप्रसंग के खाने बनाने में काम आती थी ।

 

सुधरे हुए घरों में या शहर में चाय जरूर पी जाती थी ।

 

शक्कर को मोरस इसलिए कहते थे क्यों कि मोरेशियस से आती थी ।

 

मोरस का मिठा स्वाद भारत की जनता लेती रही पर किसी को पता नही चला या किसी को बताया नही गया कि इस मोरस के पिछे क्या क्या शैतानी खेल खेले गए थे, भारत के ही कुछ भाई बेहनो को क्या क्या मुसिबतें, यातनाएं झेलनी पडी थी ।

 

युरोप के व्यापारी अपने शक्कर के खारखानों के लिए भारत की अंग्रेज सरकार से मिलकर भारत के नागरिकों को गुलाम बन्धुआ मजदूर बना कर छल से या बलपूर्वक गन्ने के खेतों में काम करने के लिए ले गए थे । अबोध मजदूरों को एक एग्रीमेन्ट में साईन करवा लेते थे और पांच साल के लिए बांध लेते थे । इसलिए उन्हें गीरमीटीए मजदूर कहे गए थे, कूली भी कहा जाता था । उन दानवों ने युपी और बिहार के नागरिकों को ज्यादा टार्गेट किया था जब की अन्य भाग से कम लोग गए थे ।

 

युपी-बिहार की जनता की आजीयों और दादीयों की ये आवाज है जो मार खा कर, अपमान सह्न कर गन्ने के खेत में गन्ना काटते हुए गाती थी । आज उनकी पोतियां, परपोतिया गा रही है इस डोक्युमेन्टरी में । मुझे पूरे शब्द समज में नही आए जो समज में आया यहां शब्दों में लिखा है । पूरा गीत इस डोक्युमेन्टरी में है । 

 

Girmit and Girmiteers

http://www.youtube.com/watch?v=bOrmCDZ6bYs

 

ये गन्ने की हरी हरी पत्तियां, जाने हमरी सब बतियां

ये गन्ने की हरी हरी पत्तियां, जाने हमरी सब बतियां

 

बगिया में लहराए आज पवन फिरे मतवारे हो रामा रे रामा !

बहक रही है लहक रही है हरियाली हरियाली हो रामा रे रामा हो……. !

फिर भी मनकी बगिया सुखी कब से उजडी कब से भूकी,

फिर भी मनकी बगिया सुखी ..हो…ओ…..ओ….ओ……….

फिर भी मनकी बगिया सुखी कब से उजडी कब से भूकी

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ये गन्ने की हरी हरी पत्तियां, जाने हमरी सब बतियां

 

छोड छाड घरबार को अपने आए देश पराए हो रामा रे रामा

सारे फिरंगे देखो हम को क्या क्या रंग दिखाए हो रामा हो रामा हो….

जब घर की याद सताए हम से एक पल रहा न जाए

जब घर याद सताए ओ…ओ….ओ..

जब घर की याद सताए हम से एक पल रहा न जाए

????????      अखियां रोए सारी सारी रतियां

ये गन्ने की हरी हरी पत्तियां, जाने हमरी सब बतियां

 

क्या क्या जुलम हम पे ढाए रे कोलंबरा

हमरी कलाई पे मौज उडाए बैरी  

हमरी कलाई पे मौज उडाए बैरी  

हमे ही को अखिंया दिखाए रे कोलंबरा

 

इस लोगगीत में उनकी यातनाएं, उन के साथ हुए दगा का एहसास, उन की वतन के लिए तडप और गोरों के प्रति तिरस्कार साफ जलकता है । 

 

इस दुसरे लोकगीत में जीन को फिजी ले गए थे उन गुलाम गिरमीटीयों की पूरी कहानी बताई गई है ।

 

फरंगिया के राजुआ मां छूटा मोरा देसुआ हो,

गोरी सरकार चली चाल रे बिदेसिया।

भोली हमें देख आरकाटी भरमाया हो,

कलकत्ता पार जाओ पांच साल रे बिदेसिया।

डीपुआ मां लाए पकरायो कागदुआ हो,

अंगूठआ लगाए दीना हार रे बिदेसिया

पाल के जहाजुआ मां रोय धोय बैठी हो,

जीअरा डराय घाट क्यों नहिं आए हो,

बीते दिन कई भये मास रे बिदेसिया।

आई घाट देखा जब फीजी आके टापुआ हो,

भया मन हमरा उदास रे बिदेसिया।

कुदारी कुरवाल दीना हाथुआ मां हमरे हो,

घाम मां पसीनुआ बहाए रे बिदेसिया।

स्वेनुआ मां तास जब देवे कुलम्बरा हो,

मार मार हुकुम चलाये रे बिदेसिया।

काली कोठरिया मां बीते नाहि रतिया हो,

किस के बताई हम पीर रे बिदेसिया।

दिन रात बीती हमरी दुख में उमरिया हो,

सूखा सब नैनुआ के नीर रे बिदेसिया॥

 

इस दो फोटो में क्या कॉमन है क्या अलग है, बताना मुशिल है । व्यक्ति अलग है लेकिन दर्द एक है । उन्हों ने लिखी कहानियों के देश, लोग, समय अलग है लेकिन हकिकत एक ही है । कहानी को जमीन पर उतार ने वाले दानव एक ही है । 

 

एक, एलेक्ष हेली अमरिका में रहते है, दुसरे हैं राजेन्द्र प्रसाद, फिजी में रहते हैं । दोनो अपने अपने मूल खोज रहे हैं । एक के मूल भारत में है एक का जांबिया, आफ्रिका । दोनों के पूरखों को “सिटी ओफ लंडन” के दानवों की कंपनियां “रॉयल आफ्रिका कंपनी” और “इस्ट इंडिया कंपनी” गुलाम बनाकर अपने अपने वतन से पकड कर ले गयी थी । ये दोनो प्रतिनीधि है उन लोगों के जीन के पूरखों को बलपूर्वक गुलाम बनाया था और आज वो अपने अपने मूल वतन को याद करते हैं और अपना मूल ढुंढ रहे हैं । 

 

एलेक्ष हेली को तो अपना पूरखा मिल गया । “कुन्टा कुन्टे” उस का नाम, उनकी बूक “रूट्स” का हिरो । १७वीं सदी में उसे जांबिया से पकड कर अमरिका ले जाया गया था । बूक तो मिलती है पर उस बूक पर से उन्हों ने टीवी सिरिज बनाई है वो अब देखने नही मिलती है । पहले सारे एपिसोड युट्युब पर थे अब हटा लिए गए है । टोरंट में १९.९० जीबी का विडियो मिलता है ।  ( एलेक्ष अब नही रहे, २००७ में उनका निधन होगया है )

 

मैं ने शुरु से लिंकन के समय तक के सारे एपिसोड देखे थे । आदमी में जरा भी संवेदना बची हो तो रोते रोते ही देखेगा, ऐसा था सब । बाद में नही देखे लेकिन बाकी का मुझे डॉ.कार्वर के जीवन पर से मिल गया ।  

 

राजेन्द्र जी से बात करी कि आप हम भारतवासियों के लिए अपनी किताब “टियर्स इन पॅरेडाईज” को हिंदी में अनुवाद करवाईए । उन्हों ने कहा कि वो कोशीश करेंगे ।

 

गूगल में मेरी नजर ‘गिरमीट’ शब्द पर पडी । खोज करते समय राजेन्द्र प्रसाद जी की किताब “टियर्स इन पॅरेडाईज” पर नजर पडी । उनका पिछा करते करते बहुत सी जानकारी मिली । राजेन्द्र जी तिसरी पिढी के फिजी-भारतिय या गिरमिटिए है । उन्हों ने फिजी निवासी भारतियों के संघर्ष के विषय में लिखा है । उन से बात तो नही हुई, मेरी एक कोमेन्ट के जवाब में उनका जवाब जरूर मिला । आज वो मेरे फ्रेन्डलिस्ट में हैं ।  

 

राजेन्द्र प्रसाद-

जब विश्व से गुला्मी प्रथा खतम कर दी गई तब अंग्रेज जीन जीन देशों में गुलामों से काम लेते थे उन गुलामों ने काम करने की मना कर दी । उन संजोगों में उनको गुलाम की तरह काम करने वाले लेकिन उन को गुलाम नहीं कह सकें ऐसे मजदुरों की जरूरत पडी । सब से अच्छे, टिकाउ, मजबूत और बेबस मजदूर भारत के थे । उस समय एक योजना बनाई गई ‘ऍग्रीमेन्ट”, जीस का भारतियों ने “गिरमिट” कर दिया । भारत से मजदूरों को गिरमिट योजना द्वारा विदेश ले जाने के लिए दो प्रमुख बंदरगाह थे । कलकत्ता और मद्रास । कलकत्ता और मद्रास अपनी अपनी प्रॅसिडन्सी के प्रमुख शहर थे । बोंबे प्रॅसिडन्सी में शांत और सुखी प्रजा थी। बोम्बे प्रॅसिडन्सी के अंदर आते भारतिय राजाओं का आभार मानना चाहिए कि उन्हों ने पश्चिम भारत की प्रजा को गिरमिट प्रथा से दूर रख्खा। ग्वालियर के राजा ने उन के खास पोलिस दल को कलकत्ता केन्द्र पर रख्खा था जीस से उनके राज्य के लोगों को कोइ गिरमिट प्रथा में शामिल ना करे । ज्यादातर गिरमिटिए आज के उत्तर प्रदेश और बिहार के थे । इन दो राज्य के बारे में क्या कहें ? यहां से लोगों को बहला फुसला कर या लालच दे कर या जबरदस्ती फिजी, वेस्ट इन्डिज, मोरेशियस, ट्रीनीदाद, आफ्रिकी देश, गुयाना और अन्य देशों में भेजा गया था । पोंडिचेरी में फ्रेन्चों का शासन था इसलिए उन्हों ने आज के आंध्रप्रदेश और तामिलनाडु से लोगों को विश्व के अन्य फ्रेन्च शासित आफ्रिकन और कॅरेबियन देशों में भेजा ।

 

लेखक राजेन्द्र प्रसाद को जब पहलीबार भारत आने का मौका मिला था तो यहां का अनुभव, उन के दादाजी की कही हुई भारत की बातें, गांव का वर्णन और लोगों का प्रेम इत्यादी में से उन को पुस्तक लिखने का हेतु मिल गया था । उन के भारत प्रवास और फिजी के बचपन के दिनों का बहुत अनोखा वर्णन है । लेखक के दादाजी तथा नानाजी के पास से सुनी हुई बातें और भारत से फिजी तक का प्रवास वर्णन अद्भूत है । इस के अलावा फिजी आने के बाद कामकाज की रीत, मुसिबतें और संघर्ष की मनोव्यथा, गिर्मिट प्रथा का अंत और नयी शुरुआत, सांस्कृतिक और राजकिय संघर्ष, ओस्ट्रेलिया की सुगरमील और भारतिय कामकारों का विग्रह जैसे विषयों को बहुत गहराई से बताए हैं । भारत की आजादी की लडाई की तरह ही अंग्रेज और ओस्ट्रेलियन सुगरमील के धनपतियों के विरुध्ध भारतिय कामकारों ने संधर्ष किया था । फिजी में भारतियों की प्रगति में बाधा बनने के लिए अंग्रेजों ने स्थानिक फिजीयन और फिजी-भारतियों के बीच खाई बनाने के लिए गंदा राजकारण खेला था । और इसलिए ही फिजी में जब फिजी-भारतिय प्रधानमंत्री बने तो सशस्त्र आंतर विग्रह हुआ था । और फिजी में हिन्दुओं में भी भेदभाव आ गए हैं, जीस में मुख्य दो भाग है- आर्य समाजवाले और सनातन धर्मवाले ।

 

आगे की बातें खूद गिर्मिट के शिकार लोगों ने या उनकी संतानों ने ही लिखी या कही है ।

 

फिजीद्वीप में मेरे 21 वर्ष

तोतारामजी सनाढ्य–जो खूद फिजी में गिरमिटिए थे ।  

www.facebook.com/notes/siddharth-bharodiya/फिजीद्वीप-में-मेरे-21-वर्ष/368803243272543

 

गायत्रा बहादुर—गुयाना में जन्मी मूल भारतिय लडकी आज अमरिका में पत्रकार है । अपनी नानी के घर को खोजती बिहार आ पहुंची थी । 

www.facebook.com/photo.php?fbid=370413629778171&set=a.111793722306831.20813.100004286112571&type=1&theater

 

सुरिनाम देश का एक भारतिय बेटा, गंगास्नान और अपने वतन बिहार आने का सपना पालते उस के गिरमिटिए बाप को भारत ला नही सका पर उस के मरने के बाद वो खूद भारत आता है और स्वार्थी संबंधियों का सामना होते वापस चला जाता है ।

www.facebook.com/photo.php?fbid=368804266605774&set=a.111793722306831.20813.100004286112571&type=1&theater

 

सुरिनाम की एक “आजी” खूद गिरमिट थी । ससुराल से पिहर आते रास्ते से उसे कैसे आर्कटी उठा ले गए थे वो बात इस विडियो में बताती है बताती है । बलपूर्वक उसे कलकत्ता और वहां से सुरिनाम ले गए थे । वो भी बताती है कि उस ने गोरे को थप्पड भी मारा था । 

The Last Kantraki Part 1

https://www.youtube.com/watch?v=esEn3psdzFM

The Last Kantraki Part 2

https://www.youtube.com/watch?v=bhrPsTfy8X8

 

Fiji Bidesia

फिजी के भारतिय गिरमिटियों का दर्द भरा भोजपूरी गीत ।

http://www.youtube.com/watch?v=0qqnGtNEYHA

 

Legacy of our Ancestors Part 1 से 6- डॉक्युमेन्टरी

https://www.youtube.com/watch?v=wv7myABr6Ak

https://www.youtube.com/watch?v=EtICIfA7NRU

https://www.youtube.com/watch?v=SBSHns8wrWc

https://www.youtube.com/watch?v=ARdhyDPjOnk

https://www.youtube.com/watch?v=PVpKJde2Gd4

https://www.youtube.com/watch?v=104OMNpnwrg

Author:

Buy, sell, exchange old books

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