Posted in छोटी कहानिया - १००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

लालाबाबू नाम के कलकत्ता के एक सेठ 300 पेढ़ी के मालिक थे।


लालाबाबू नाम के कलकत्ता के एक सेठ 300 पेढ़ी के मालिक थे। हस्ताक्षर करते-करते ऊँगलियाँ दुःख जाती थीं तो मालिश करानी पड़ती थी। मुनिमों को पत्र लिखाते-लिखाते उनका दिमाग थक जाता था, इतनी प्रवृत्ति थी। पुराने जमाने की यह बात है। कभी कभी शाम को चार घोड़ेवाली गाड़ी में बैठकर लाला सेठ गंगासागर की ओर हवा खाने जाते। बीच में खाड़ी आती थी और दूसरी ओर बगीचा। नाव में बैठकर खाड़ी पार करते।
एक दिन सेठ शाम को बगीचे में जाकर बैठे। थके हुए थे अतः जरा झपकी लग गयी। बहुत समय बीत गया। नाव वाले ने देखा कि अँधेरा होने लगा है। सभी सैलानी आ चुके हैं पर वे सफेद-सफेद कपड़े वाले सेठ अभी तक नहीं आये। नाव का यह आखिरी चक्कर है। सेठ रोज के ग्राहक थे इसलिए उसने जोर से आवाज लगायीः
“ऐ मुसाफिर ! सूरज डूब गया है। ऐ मुसाफिर ! यह आखिरी चक्कर है। अँधेरा हो रहा है। वक्त हो गया है। समय बीता जा रहा है। चलो, नहीं तो पछताओगे।”
वे सेठ तो थके हुए थे। जरा सो गये थे। इस प्रकार दो-चार बार नाव वाले ने आवाज लगायी। अचेतन मन में आवाज पहुँची इसलिए मन सचेतन हुआ। नींद में भी सुनने की क्षमता अचेतन मन में है। अचेतन मन में ये वाक्य असर कर गये। सेठ एकाएक जागे और आकर नाव में बैठे। नाव से नदी तो पार कर गये पर इस प्रकार पार हुए कि सदा के लिए जन्म मरण से पार हो गये।
नाव में से रास्ते पर आये और जहाँ घोड़ागाड़ी खड़ी रखी थी वहाँ न जाकर दूसरी ओर से हावड़ा स्टेशन जाकर रेलगाड़ी में बैठे और वृन्दावन पहुँचे। किसी महापुरूष की खोज की। उन्होंने सोचा कि इस जीवन का आखिरी चक्कर खाली जाये उसके पहले, जीवन का सूरज डूबे उसके पहले परमात्मा के साथ अपने आपको मिला लूँ।
वृन्दावन में कई साधुओं के सान्निध्य में आये पर कहीं भी उनका हृदय लगा नहीं। एक सप्ताह के बाद जिनके हृदय में ही भगवान हैं ऐसे मस्तराम, आत्मस्वरूप में जगे हुए ब्रह्मवेत्ता संत महापुरूष की खबर उनको मिली। लालाबाबू उनकी शरण में गये।
मस्तराम संत ने उनकी सारी बात सुनने के बाद लाला बाबू से कहाः
तुम घर पर रहकर ही भजन करो।
लालाबाबू ने कहाः “घर पर तो बाबाजी ! रजोगुणी वातावरण है और 300 पेढ़ियाँ हैं इसलिए आज यह तो कल वह। ऐसा करते-करते तो बूढ़ा होने लगा और सिर के बाल सफेद होने लगे। बाबाजी !चाहे जो करो, मेरे पर कृपा करके मुझे उबार लो। मुझे फिर से माया में मत धकेलो।
उनकी तीव्रता देखकर बाबाजी ने कहाः
“दो शर्ते हैं। सुबह शाम ध्यान-भजन करो यह तो ठीक है किन्तु बाकी के समय में किसी के भी साथ गप्पें मत हाँकना। तुम्हारे इस बीते हुए स्वप्न की बातें न कहना। सारी स्मृतियों को छोड़ दो। सारा संसार स्वप्न जैसा ही है। जो भगवान के मार्ग पर चलते हैं उन्हें सहायता मिले ऐसा कार्य करो, सेवा करो, स्मरण करो, आत्मस्मरण करो, आत्मचिंतन करो।”
सारी विधि बाबाजी ने बता दी। लालाबाबू रोज यमुना में स्नान करते, भिक्षा माँगते। इससे अहँकार पिघलने लगा।
इधर कलकत्ता में तो धमाचौकड़ी मच गयी। तार, टेलिफोन खनकने लगे। गाड़ियों की भागदौड़ हो गयी। 300 पेढ़ी के मालिक लालाबाबू लापता हो गये, उन्हें ढूँढने के लिए ईनामों की घोषणा हुई। पर कहीं भी पता न लगा।
लालाबाबू की धर्मपत्नी कभी आँसू बहाती और कभी कल्पना में खो जाती। लड़के सोचते कि लालाबाबू कहाँ गये? कहाँ होंग? ऐसा करते-करते पेढ़ियों द्वारा बात फैली। कोई मुनीम वहाँ वृन्दावन में रहता था। उसने देखा कि ये जो साधुवेश में हैं वे ही हमारे भूतपूर्व लालाबाबू हैं। उसने तो तार करके लालाबाबू की धर्मपत्नी और लड़कों को बुला लिया।
लालाबाबू की धर्मपत्नी लालाबाबू को देखकर आँसू बहाने लगी और समझाने लगी। लालाबाबू ने पूरी बात सुनकर कहाः “यह सब तो ठीक है, परन्तु किस समय वह काल आकर मुझे ले जाएगा इसकी तुम गारन्टी देती हो ?”
लड़के कहने लगेः “पिता जी ! तुम्हारे बिना हमें नहीं चलेगा।”
लालाबाबू कहते हैं- “ठीक है। मैं तुम्हारे साथ रहूँ पर जब काल मुझे लेने आयेगा तब मैं उसे ऐसा कहूँ तो क्या वह सुनेगा भी? मौत सोचेगी कि मेरे बिना तुमको चलेगा या नहीं चलेगा।”
लड़के रोने लगे। पत्नी का आग्रह था, पुत्रों का आग्रह था। अंत में उन्होंने कहाः “हम तुम्हारे गुरू जी से मिलते हैं।”
लालाबाबू ने कहाः “मिलो।”
गुरूजी से बात की। गुरूजी ने उन सबको देखकर लालाबाबू से कहाः “इन सबको दुःख होता है तो तुम जाओ।”
लालाबाबू ने कहाः “पर बाबाजी ! इस प्रकार इस दुनिया में अनेकों लालाबाबू रहते हैं। उन सबके दुःख दूर हुए हों तो मैं जाऊँ। पत्नी के रहने से पति के दुःख दूर हुए हों और पति से रहने से पत्नी के दुःख दूर हुए हों तो मैं जाऊँ। अब तो आप मुझे भवसागर में फिर न धकेलो यही मेरी प्रार्थना है।”
यह बात सुनकर बाबाजी को तो सरौते के बीच सुपारी जैसा हुआ। एक ओर व्यवहार तो दूसरी ओर परमार्थ।
बाबाजी ने कहाः ”हम क्या करें ? तुम आपस में जानो।”
जिसका जोर होता है उसी का सोचा हुआ होता है। मोहमाया का जोर हो तो व्यक्ति संसार की ओर खिंच जाय और विवेक का जोर हो तो उसकी जिंदगी सुधर जाये, साथ ही साथ कुटुम्बियों की जिंदगी भी सुधर जाये। जिसका बल उसका फल।
पुनः एक बार लालाबाबू उनसे मिले और समझायाः
“तुम मुझे यहाँ से ले जाओ और मैं फिर से कागजात में हस्ताक्षर करता-करता मर जाऊँ और भवसागर में भटकूँ। इससे तो मैं यह वैभव तुमको देता हूँ। मैं कुछ नहीं ले जा रहा हूँ और सच्चा धन कमाने जाता हूँ। मैं जितनी तपस्या करूँगा उसका आधा फल तो तुम्हें घर बैठे मिलेगा।”
सुर नर मुनि जन की यह रीति।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति।।
पत्नी को इस प्रकार समझाया तो उसे लगा कि बात तो सच्ची है। वैसे भी यह वैभव और हाईकमाण्ड(उच्चाधिकार) हमारे पास है ही और ये यहाँ तप करेंगे तो वह पुण्य भी मेरे साथ ही है। आखिर वह बोलीः
“अच्छा अब आप तपस्या करो। किसी समय हम आयें तब मिलना अवश्य…… जय श्रीकृष्ण। हम जाते हैं।”
तब लालाबाबू ने कहाः “देवी ! तुम इतनी पवित्र हो, समझदार हो तो मेरी एक बात मानो। इन 300 पेढ़ियों का वैभव तुम खा नहीं सकोगी, लड़के नहीं खा सकेंगे। तो अपनी 21 पीढ़ियाँ तर जायें ऐसा वैभव का सदुपयोग क्यों न करें ? तुम्हारा भी उद्धार हो। यहाँ एक ठाकुर जी का मंदिर बनवाकर उसकी सीढ़ियों पर इस दास का नाम लिखवा दूँ जिससे भक्तों की चरण रज सिर पर लगने से करोड़ों जन्मों के पाप कटें और एक धर्मशाला बनवा दूँ जिससे यहाँ थके हुए लोग विश्राम लें और उसका पुण्य हमें मिले।”
धर्मपत्नी का हृदय पिघला और उनके वैभव का थोड़ा भाग सत्कृत्य में खर्च हुआ। वह मंदिर आज भी वृंदावन में खड़ा है। उसमें सोने का एक खम्भा है अतः “सोने के खम्भे वाला मंदिर… लालाबाबू का मंदिर….’ ऐसा कहा जाता है। मंदिर तो भगवान का है परन्तु लालाबाबू ने बनवाया है इसलिए ऐसा कहा जाता है।
लग गई नाविक की बात। शरीर मरणधर्मी है, नश्वर है, ऐसी समझ आ जाये और किसी नाविक की बात लग जाये तो बेड़ा पार हो जाये।
यह तन विष की बेलरी, गुरू अमृत की खान।
सिर दीजे सत्गुरू मिले, तो भी सस्ता जान।।
यह शरीर विष की बेल है। पर इसमें यदि थोड़ी समझ आ जाये तो खबर मिल जाये कि अमर आत्मा भी उसी के साथ है। जीवनदाता भी उसी के साथ है, विश्वनियंता भी उसी के साथ ही है। अनित्यानि शरीराणि बैभवो नैव शाश्वतः।
नित्यं संन्निहितो मृत्युः कर्त्तव्यो धर्मसंग्रहः।।
शरीर अनित्य है, वैभव शाश्वत नहीं है। शरीर हर रोज मृत्यु के नजदीक जा रहा है। अतः धर्म का संग्रह कर लेना चाहिए।
हम जब जन्मे थे उस समय हमारी जो आयु थी वह आज नहीं है। हम जब यहाँ आये तब जो आयु थी वह अभी नहीं है और अभी जो है वह घर जाते तक उतनी ही नहीं रहेगी। ऐसा अनित्य शरीर, नाशवान वैभव, नित्य मृत्यु की ओर जानेवाला शरीर….. नाविक के दो शब्द कानों में पड़े तो लालाबाबू ने अपना कल्याण कर लिया। पहुँच गया पवित्र पुरूषों के चरणों में। मंदिर बनवाया, धर्मशाला बनवायी और हृदय मंदिर की यात्रा की। पुत्रों और पत्नी के मोहपाश में न पड़े। प्रभुप्रेम में पावन हुए।
लालाबाबू ने तो अपना काम कर लिया। अब हम इस माया से निपटकर किस दिन कल्याण के मार्ग पर चलेंगे?

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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