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संस्कृत से आई ‘नमाज़’, इसी से मिला ‘बग़दाद’


संस्कृत से आई ‘नमाज़’, इसी से मिला ‘बग़दाद’

 शनिवार, 23 अगस्त, 2014 को 15:46 IST तक के समाचार

हाल ही में स्कूलों में संस्कृत सप्ताह मनाने का सीबीएसई का निर्देश अपने साथ प्रतिक्रियाएं लेकर भी लेकर आया. कुछ स्वागत में तो कुछ विरोध में.

हज़ारों साल जनमानस से लेकर साहित्य की भाषा रही संस्कृत कालांतर में क़रीब-क़रीब सुस्ता कर बैठ गई, जिसका एक मुख्य कारण इसे देवत्व का मुकुट पहनाकर पूजाघर में स्थापित कर दिया जाना था.

भाषा को अपने शब्दों की चौकीदारी नहीं सुहाती– यानी भाषा कॉपीराइट में विश्वास नहीं करती, वह तो समाज के आँगन में बसती है.

भाषा तो जिस संस्कृति और परिवेश में जाती है, उसे अपना कुछ न कुछ देकर ही आती है.

पढ़िए राकेश भट्ट का लेख विस्तार से

वैदिक संस्कृत जिस बेलागपन से अपने समाज के क्रिया-कलापों को परिभाषित करती थी उतने ही अपनेपन के साथ दूरदराज़ के समाजों में भी उसका उठाना बैठना था. जिस जगह विचरती उस स्थान का नामकरण कर देती.

संस्कृत दुनिया की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है

दजला और फ़रात के भूभाग से गुज़री तो उस स्थान का नामकरण ही कर दिया. हरे भरे खुशहाल शहर को ‘भगवान प्रदत्त’ कह डाला. संस्कृत का भगः शब्द फ़ारसी अवेस्ता में “बग” हो गया और दत्त हो गया “दाद” और बन गया बग़दाद.

इसी प्रकार संस्कृत का “अश्वक” प्राकृत में बदला “आवगन” और फ़ारसी में पल्टी मारकर “अफ़ग़ान” हो गया और साथ में स्थान का प्रत्यय “स्तान” में बदलकर मिला दिया और बना दिया हिंद का पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान -यानी निपुण घुडसवारों की निवास-स्थली.

स्थान ही नहीं, संस्कृत तो किसी के भी पूजाघरों में जाने से नहीं कतराती क्योंकि वह तो यह मानती है कि ईश्वर का एक नाम अक्षर भी तो है. अ-क्षर यानी जिसका क्षरण न होता हो.

इस्लाम की पूजा पद्धति का नाम यूँ तो कुरान में सलात है लेकिन मुसलमान इसे नमाज़ के नाम से जानते और अदा भी करते हैं. नमाज़ शब्द संस्कृत धातु नमस् से बना है.

इसका पहला उपयोग ऋगवेद में हुआ है और अर्थ होता है– आदर और भक्ति में झुक जाना. गीता के ग्यारहवें अध्याय के इस श्लोक को देखें – नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते.

इस संस्कृत शब्द नमस् की यात्रा भारत से होती हुई ईरान पहुंची जहाँ प्राचीन फ़ारसी अवेस्ता उसे नमाज़ पुकारने लगी और आख़िरकार तुर्की, आज़रबैजान, तुर्कमानिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, बांग्लादेश, बर्मा, इंडोनेशिया और मलेशिया के मुसलामानों के दिलों में घर कर गई.

संस्कृत ने पछुवा हवा बनकर पश्चिम का ही रुख़ नहीं किया बल्कि यह पुरवाई बनकर भी बही. चीनियों को “मौन” शब्द देकर उनके अंतस को भी “छू” गई.

चीनी भाषा में ध्यानमग्न खामोशी को मौन कहा जाता है और स्पर्श को छू कहकर पुकारा जाता है.

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Paryushan is the most important Jain religious observance of the year


PARVA – SPECIAL

Paryushan is the most important Jain religious observance of the year. For both Shvetambars, who observe the festival over a period of eight days, and Digambars, for whom Paryushan Parva lasts ten days, this is a time of intensive study, reflection, and purification.

JEWELS OF BHARATAM ….SERIES[TM]

GLORIOUS MEGHANAGUDI [ MEGUTI ] JINALAYA TEMPLE VALIDATES KALIDASA-2ND @ AIHOLE .

The Meguti or the Meganagudi is a Jinalaya in the Dravidian style enclosed by a stone wall. It has a pillared hall in front, and antarala and the sanctum behind, with pradakshinapatha. On one of the outer walls is found the famous Aihole inscription dated 634 A.D. recording the construction of the Jinendra temple by Ravikeerti, who was a commander and minister of Pulikeshi II.

The record makes a mention of Kalidasa and Bharavi and is composed in an ornate style in Samskrita by Ravikirti himself. To the south-east of Meguti is a small Jaina cave, which has a porch, a wall behind and a sanctum in the back which houses a five-foot tall-Bahubali figure and other Tirthankaras are also engraved in other parts against walls.

Meguti Jain temple stands on a hillock. It is the only dated monument built in 634 , but could be earlier. The temple sits on a raised platform, and a flight of steps leads one to the mukhamantapa. The pillared mukhamantapa is a large one. A flight of stairs leads to another shrine on the roof, directly above the main shrine. From the roof, one can have a panoramic view of the plain with a hundred temples or so.

The temple which was possibly never completed gives important evidence of early development in dravidian style of architecture. The dated inscription found on the outer wall of the temple records the construction of the temple by Ravikeerthi, a scholar in the court of emperor Pulakeshi II. Meganagudi group of temples, there are several ancient temples on Megutigudda, a small hillock to the south-east of the village. A two-storeyed structure here has a natural cavern inside. The first floor includes a pillared hall, and at the wall behind it are three cells. The central room is the shrine cell, the second floor similarly has a verandah and a square cell behind. This is an ordinary structure and is assigned to the 5th century.

PARYUSHAN PARVA - SPECIAL Paryushan is the most important Jain religious observance of the year. For both Shvetambars, who observe the festival over a period of eight days, and Digambars, for whom Paryushan Parva lasts ten days, this is a time of intensive study, reflection, and purification. JEWELS OF BHARATAM ....SERIES[TM] GLORIOUS MEGHANAGUDI [ MEGUTI ] JINALAYA TEMPLE VALIDATES KALIDASA-2ND @ AIHOLE . The Meguti or the Meganagudi is a Jinalaya in the Dravidian style enclosed by a stone wall. It has a pillared hall in front, and antarala and the sanctum behind, with pradakshinapatha. On one of the outer walls is found the famous Aihole inscription dated 634 A.D. recording the construction of the Jinendra temple by Ravikeerti, who was a commander and minister of Pulikeshi II. The record makes a mention of Kalidasa and Bharavi and is composed in an ornate style in Samskrita by Ravikirti himself. To the south-east of Meguti is a small Jaina cave, which has a porch, a wall behind and a sanctum in the back which houses a five-foot tall-Bahubali figure and other Tirthankaras are also engraved in other parts against walls. Meguti Jain temple stands on a hillock. It is the only dated monument built in 634 , but could be earlier. The temple sits on a raised platform, and a flight of steps leads one to the mukhamantapa. The pillared mukhamantapa is a large one. A flight of stairs leads to another shrine on the roof, directly above the main shrine. From the roof, one can have a panoramic view of the plain with a hundred temples or so. The temple which was possibly never completed gives important evidence of early development in dravidian style of architecture. The dated inscription found on the outer wall of the temple records the construction of the temple by Ravikeerthi, a scholar in the court of emperor Pulakeshi II. Meganagudi group of temples, there are several ancient temples on Megutigudda, a small hillock to the south-east of the village. A two-storeyed structure here has a natural cavern inside. The first floor includes a pillared hall, and at the wall behind it are three cells. The central room is the shrine cell, the second floor similarly has a verandah and a square cell behind. This is an ordinary structure and is assigned to the 5th century.
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नेहरुद्दीन का सच – एक ‘रोमिंग जर्नलिस्ट’ द्वारा


नेहरुद्दीन का सच – एक ‘रोमिंग जर्नलिस्ट’ द्वारा

(क्या इंदिरा मैमूना बेगम थीं और फ़िरोज़ घांदी? गांधी उन्हें बाद में बनाया गया? एक ‘रोमिंग जर्नलिस्ट’ ने ऐसा लिखा है. ये भी कि पंडित नेहरु के पूर्वज असल में ब्रह्मण नहीं थे. ये लेख उत्सुकता या बहस से अधिक शोध का विषय है. इसी मकसद से हम उसे यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं.)

 

 

जम्मू-कश्मीर में आए महीनों हो गए थे, एक बात अक्सर दिमाग में खटकती थी कि अभी तक नेहरू के खानदान का कोई क्यों नहीं मिला, जबकि हमने किताबों में पढ़ा था कि वह कश्मीरी पंडित थे। नाते-रिश्तेदार से लेकर दूरदराज तक में से कोई न कोई नेहरू खानदान का तो मिलना ही चाहिए था। नेहरू राजवंश कि खोज में सियासत के पुराने खिलाडिय़ों से मिला लेकिन जानकारी के नाम पर मोतीलाल नेहरू के पिता गंगाधर नेहरू का नाम ही सामने आया।

 

 

 

अमर उजाला दफ्तर के नजदीक बहती तवी के किनारे पहुंचकर एक दिन इसी बारे में सोच रहा था तो ख्याल आया कि जम्मू-कश्मीर वूमेन कमीशन की सचिव हाफीजा मुज्जफर से मिला जाए, शायद वह कुछ मदद कर सके | अगले दिन जब आफिस से हाफीजा के पास पहुंचा तो वह सवाल सुनकर चौंक गई। बोली पंडित जी आप पंडित नेहरू के वंश का पोस्टमार्टम करने आए हैं क्या? हंसकर सवाल टालते हुए कहा कि मैडम ऐसा नहीं है, बस बाल कि खाल निकालने कि आदत है इसलिए मजबूर हूं। यह सवाल काफी समय से खटक रहा था। कश्मीरी चाय का आर्डर देने के बाद वह अपने बुक रैक से एक किताब निकाली, वह थी रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज कि किताब ए लैम्प फार इंडिया- द स्टोरी ऑफ मदाम पंडित। उस किताब मे तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा था। जिसके अनुसार गंगाधर असल में एक सुन्नी मुसलमान थे जिनका असली नाम था गयासुद्दीन गाजी। इस फोटो को दिखाते हुए हाफीजा ने कहा कि इसकी पुष्टि के लिए नेहरू ने जो आत्मकथा लिखी है, उसको पढऩा जरूरी है। नेहरू की आत्मकथा भी अपने रैक से निकालते हुए एक पेज को पढऩे को कहा। इसमें एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे। इसी तरह जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत बहादुरशाह जफर के समय में नगर कोतवाल थे।

 

 

 

अब इतिहासकारो ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफर के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था। और खोजबीन करने पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे। लेकिन किसी गंगा धर नाम के व्यक्ति का कोई रिकार्ड नहीं मिला है। नेहरू राजवंश की खोज में मेहदी हुसैन की पुस्तक बहादुरशाह जफर और 1857 का गदर में खोजबीन करने पर मालूम हुआ। गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर के डर से बदला गया था,असली नाम तो था गयासुद्दीन गाजी। जब अंग्रेजों ने दिल्ली को लगभग जीत लिया था तब मुगलों और मुसलमानों के दोबारा विद्रोह के डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके तम्बुओं में ठहरा दिया था। जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं। अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे जो हिन्दू राजाओं-पृथ्वीराज चौहान ने मुसलमान आक्रान्ताओं को जीवित छोडकर की थी,इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को मारना शुरु किया । लेकिन कुछ मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के इलाको मे चले गये थे। उसी समय यह परिवार भी आगरा की तरफ कुच कर गया। नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोककर पूछताछ की थी लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया बाकी तो इतिहास है ही । यह धर उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है और इसी का अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह दर या डार हो गया जो कि कश्मीर के अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है। लेकिन मोतीलाल ने नेहरू उपनाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे। इतने पीछे से शुरुआत करने का मकसद सिर्फ यही है कि हमें पता चले कि खानदानी लोगों कि असलियत क्या होती है। 

 

 

 

एक कप चाय खत्म हो गयी थी, दूसरी का आर्डर हाफीजा ने देते हुए के एन प्राण कि पुस्तक द नेहरू डायनेस्टी निकालने के बाद एक पन्ने को पढऩे को दिया। उसके अनुसार जवाहरलाल मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर । यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल कि एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू । कमला नेहरू उनकी माता का नाम था। जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी। कमला शुरु से ही इन्दिरा के फिरोज से विवाह के खिलाफ थीं क्यों यह हमें नहीं बताया जाता। लेकिन यह फिरोज गाँधी कौन थे? फिरोज उस व्यापारी के बेटे थे जो आनन्द भवन में घरेलू सामान और शराब पहुँचाने का काम करता था। आनन्द भवन का असली नाम था इशरत मंजिल और उसके मालिक थे मुबारक अली। मोतीलाल नेहरू पहले इन्हीं मुबारक अली के यहाँ काम करते थे।

 

 

 

सभी जानते हैं की राजीव गाँधी के नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के नाना के साथ ही दादा भी तो होते हैं। फिर राजीव गाँधी के दादाजी का नाम क्या था? किसी को मालूम नहीं, क्योंकि राजीव गाँधी के दादा थे नवाब खान। एक मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाई करता था और जिसका मूल निवास था जूनागढ गुजरात में है। नवाब खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया। फिरोज इसी महिला की सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था घांदी (गाँधी नहीं)घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था। विवाह से पहले फिरोज गाँधी ना होकर फिरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था। हमें बताया जाता है कि फिरोज गाँधी पहले पारसी थे यह मात्र एक भ्रम पैदा किया गया है । इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का शिकार थीं । शांति निकेतन में पढ़ते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अनुचित व्यवहार के लिये निकाल बाहर किया था। अब आप खुद ही सोचिये एक तन्हा जवान लडक़ी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पड़ी हुई हों थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी विपरीत लिंग की ओर, इसी बात का फायदा फिरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को बहला-फुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली। नाम रखा मैमूना बेगम। नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए लेकिन अब क्या किया जा सकता था। जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को मिली तो उन्होंने नेहरू को बुलाकर समझाया। राजनैतिक छवि की खातिर फिरोज को मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले, यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये बजाय धर्म बदलने के सिर्फ नाम बदला जाये तो फिरोज खान घांदी बन गये फिरोज गाँधी।

 

 

विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और सत्य के साथ मेरे प्रयोग नामक आत्मकथा लिखने वाले गाँधी ने इस बात का उल्लेख आज तक नहीं नहीं किया। खैर उन दोनों फिरोज और इन्दिरा को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुन: वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया ताकि उनके खानदान की ऊँची नाक का भ्रम बना रहे । इस बारे में नेहरू के सेकेरेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक प्रेमेनिसेन्सेस ऑफ नेहरू एज ;पृष्ट 94 पैरा 2 (अब भारत में प्रतिबंधित है किताब) में लिखते हैं कि पता नहीं क्यों नेहरू ने सन 1942 में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीतिरिवाजों से किये जाने को अनुमति दी जबकि उस समय यह अवैधानिक था का कानूनी रूप से उसे सिविल मैरिज होना चाहिये था । यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फि रोज अलग हो गये थे हालाँकि तलाक नहीं हुआ था । फि रोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान किया करते थे और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे। तंग आकर नेहरू ने फिरोज के तीन मूर्ति भवन मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । मथाई लिखते हैं फिरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बड़ी राहत मिली थी। 1960 में फिरोज गाँधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी जबकी वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे।

 

 

 

संजय गाँधी का असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता । लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था। ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवाया था, इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था । अब संयोग पर संयोग देखिये संजय गाँधी का विवाह मेनका आनन्द से हुआ। कहा जाता है मेनका जो कि एक सिख लडकी थी संजय की रंगरेलियों की वजह से उनके पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी फि र उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर मानेका किया गया क्योंकि इन्दिरा गाँधी को यह नाम पसन्द नहीं था। फिर भी मेनका कोई साधारण लडकी नहीं थीं क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के लिये सिर्फ एक तौलिये में विज्ञापन किया था। आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गाँधी अपनी माँ को ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कामो पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने कि छूट दी । एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ 206 पर लिखते हैं – 1948 में वाराणसी से एक सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक नाम श्रद्धा माता था। वह संस्कत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को बेताब रहते थे । वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृत की अच्छी जानकार थी। नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक हिन्दी का पत्र नेहरू को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक इंटरव्यू देने को राजी हुए । चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था। नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के समय ही दिये ।

 

 

 

मथाई के शब्दों में एक रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा वह बहुत ही जवान खूबसूरत और दिलकश थी। एक बार नेहरू के लखनऊ दौरे के समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक पत्र लेकर नेहरू के पास आये नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया और अचानक एक दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं । नवम्बर 1949 में बेंगलूर के एक कान्वेंट से एक सुदर्शन सा आदमी पत्रों का एक बंडल लेकर आया। उसने कहा कि उत्तर भारत से एक युवती उस कान्वेंट में कुछ महीने पहले आई थी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया । उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को वहाँ छोडकर गायब हो गई थी । उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं पत्रों का वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया । मथाई लिखते हैं . मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफी कोशिश की लेकिन कान्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस जो कि एक विदेशी महिला थी बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक शब्द भी किसी से नहीं कहा। लेकिन मेरी इच्छा थी कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन कथोलिक संस्कारो में बड़ा करूँ चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था।

 

 

नेहरू राजवंश की कुंडली जानने के बाद घड़ी की तरफ देखा तो शाम पांच बज गए थे, हाफीजा से मिली ढेरों प्रमाणिक जानकारी के लिए शुक्रिया अदा करना दोस्ती के वसूल के खिलाफ था, इसलिए फिर मिलते हैं कहकर चल दिए अमर उजाला जम्मू दफ्तर की ओर।

 

 

लेखक : नाम है दिनेश चंद्र मिश्र। यूं तो एक दशक से ज्यादा हो गया देश के इतने हिस्सों में कलम की कमाई से पेट भरने गया कि दोस्त हो या दुश्मन सब रोमिंग जर्नलिस्ट ही कहने लगे। ग्लोबलाइजेशन के इस युग में इस अंग्रेजी नाम से खुद को फीलगुड होने लगा। और आपका यह रोमिंग जर्नलिस्ट काशी से कश्मीर तक, दिल्ली से दार्जिलिंग तक के पत्रकारिता जीवन के दिल, दिमाग में सहेजे अभी तक के ढेरों अनुभव बांटने के लिए मुखातिब है। इसके पीछे का मकसद है अनुभव को किताब की शक्ल दी जा सके। इसे पढक़र आपका दिल कहे तो प्यार दें नहीं तो दिल से गलियाँ दें। यह मेरी जिदंगी के लिए आक्सीजन और कार्बन डाइआक्साइड की तरह है। अगर मेरी बातों को कोई व्यक्तिगत लेता है तो उसकी परवाह मुझे नहीं है। अगर किसी से डरता हूं तो ऊपर वाले से वही रोटी देता है वहीं छीनता भी है।

 

(क्या इंदिरा मैमूना बेगम थीं और फ़िरोज़ घांदी? गांधी उन्हें बाद में बनाया गया? एक 'रोमिंग जर्नलिस्ट' ने ऐसा लिखा है. ये भी कि पंडित नेहरु के पूर्वज असल में ब्रह्मण नहीं थे. ये लेख उत्सुकता या बहस से अधिक शोध का विषय है. इसी मकसद से हम उसे यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं.)(क्या इंदिरा मैमूना बेगम थीं और फ़िरोज़ घांदी? गांधी उन्हें बाद में बनाया गया? एक ‘रोमिंग जर्नलिस्ट’ ने ऐसा लिखा है. ये भी कि पंडित नेहरु के पूर्वज असल में ब्रह्मण नहीं थे. ये लेख उत्सुकता या बहस से अधिक शोध का विषय है. इसी मकसद से हम उसे यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं.)

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

125 types of surgical instruments


125 types of surgical instruments
“The Indians were so advanced in surgery that their instruments could cut a hair longitudinally.” – Mrs Plunket

Shushruta worked with 125 kinds of surgical instruments, which included scalpels, lancets, needles, catheters, rectal speculums, mostly conceived from jaws of animals and birds to obtain the necessary grips. He also defined various methods of stitching the use of horses’ hair, fine thread, fibres of bark, goat’ guts and ants’ heads.

Reconstructive surgery techniques were being carried out in India by 800 BC. Sushruta, the father of Surgery, made important contributions to the field of plastic and cataract surgery in 6th century BC. The medical works of both Sushruta and Charak originally in Sanskrit were translated into Arabic language during the Abbasid Caliphate in 750 AD. The Arabic translations made their way into Europe via intermediaries. In Italy the Branca family of Sicily and Gaspare Tagliacozzi (Bologna) became familiar with the techniques of Sushruta

Posted in छोटी कहानिया - १०,००० से ज्यादा रोचक और प्रेरणात्मक

महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन और कर्ण का युद्ध हो रहा था


महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन और कर्ण का युद्ध हो रहा था, तो एक समय ऐसा आया जब कर्ण के रथ का पहिया कीचड़ में धँस गया..!”
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“वह शस्त्र रथ में ही रखकर नीचे उतरा और उसे निकालने लगा। यह देखकर भगवान कृष्ण ने अर्जुन को संकेत किया और उसने कर्ण पर बाणों की बौछार कर दी..!”
“इससे कर्ण बौखला गया। वह अर्जुन की निन्दा करने लगा- इस समय मैं नि:शस्त्र हूँ। ऐसे में मेरे ऊपर बाण चलाना अधर्म है..!”
“पर श्रीकृष्ण ने उसे मुँहतोड़ उत्तर देते हुए कहा- महाबली कर्ण, आज तुम्हें धर्म याद आ रहा है। पर उस दिन तुम्हारा धर्म कहाँ गया था, जब द्रौपदी की साड़ी को भरी सभा में खींचा जा रहा था। जब अनेक महारथियों ने निहत्थे अभिमन्यु को घेरकर मारा था, तब तुम्हें धर्म की याद क्यों नहीं आयी..?”
“श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी बाण-वर्षा और तेज करने को कहा। परिणाम यह हुआ कि कर्ण ने थोड़ी देर में ही प्राण छोड़ दिये..!”
“यह इतिहास कथा यह बताती है कि धर्म का व्यवहार , सज्जनता का व्यवहार केवल धर्म पर चलने वालों के लिए ही होना चाहिए। गलत व्यक्तियों का साथ देने वालों, असत्य का पक्ष लेने वालों तथा दुष्टों को उनके जैसी दुष्टता से दंड देना बिल्कुल गलत नहीं है..! ये श्री कृष्ण की कथा …..
अतः सज्जनों के प्रति सज्जनता और दुष्टो के प्रति दंड… यही श्रेष्ठ नीति है । ॥ॐ॥ ।जय श्री राम।

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ये धरती है बलिदान की


 ये धरती है बलिदान की (1)
• 21 जून 1576 * स्थान हल्दी घाटी *
• महाराणा प्रताप और अकबर की सेना मे युद्ध हो रहा था
• दोनों तरफ से राजपूत लड़ रहे थे।
• तत्कालीन प्रसिद्ध मुस्लिम इतिहासकार “बदायूनि ” उस युद्ध मे शामिल था।
• बदायूनि अपने युद्ध के संस्मरण मे लिखता है –
• युद्ध की भयंकरता मे जब अपना पराया नहीं सूझ रहा था तो मैंने अपने सेनापति “आसिफखान” जो अकबर का नजदीकी रिश्तेदार था से पूछा कि इतने भंयकर युद्ध मे अपने और पराए राजपूतों को पहचानने मे कठिनाई आ रही है और गोली, तलवार चलाने मे दिक्कत। तो इस पर बिना गर्दन घुमाए आसिफखान ने उत्तर दिया “ऐसे कुफ्र मे अर्थात हिंदूओ के साथ लड़ाई के वक्त शहंशाह अकबर का फरमान सदा याद रखो- राजपूत दोस्त हो या दुश्मन गोली मारते जाओ क्योंकि काफिर किसी भी ओर से मरे, इस्लाम के लिए तो अच्छा ही है।”
• क्या सेक्युलर हिंदूओ को कुछ समझ आया।

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नेहरू से पहले ….नेहरू की पीढ़ी इस प्रकार है …


नेहरू से पहले ….नेहरू की पीढ़ी इस प्रकार है ….
सबसे पहले !
गंगाधर नेहरु
उसका बेटा
राज कुमार नेहरु
उसका बेटा
विद्याधर नेहरु
उसका बेटा
मोतीलाल नेहरु
और अंत
जवाहर लाल नेहरु
गंगाधर नेहरु (Nehru) उर्फ़ GAYAS – UD –
DIN SHAH जिसे GAZI की उपाधि दी गई थी ….
GAZI जिसका मतलब होता है (KAFIR –
KILLER)
इस गयासुद्दीन गाजी ने ही मुसलमानों को खबर
(मुखबिरी ) दी थी की गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड
में आये हुए हैं , इसकी मुखबिरी और पक्की खबर
के कारण ही सिखों के दशम गुरु गोबिंद सिंह
जी के ऊपर हमला बोला गया, जिसमे उन्हें चोट
पहुंची और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई थी.
और आज नांदेड में सिक्खों का बहुत बड़ा तीर्थ-
स्थान बना हुआ है. जब गयासुद्दीन को हिन्दू
और सिक्ख मिलकर चारों और ढूँढने लगे
तो उसने अपना नाम बदल लिया और गंगाधर
राव बन गया, और उसे इससे पहले मुसलमानों ने
पुरस्कार के रूप में अलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में
इशरत मंजिल नामक महल/हवेली दिया,
जिसका नाम आज आनंद भवन है ….आनंद भवन
को आज अलाहाबाद में kangress
का मुख्यालय बनाया हुआ है इशरत मंजिल के
बगल से एक नहर गुजरा करती थी, जिसके
कारण लोग गंगाधर को नहर के पास वाला, नहर
किनारे वाला, नहर वाला, neharua ,
आदि बोलते थे जो बाद में गंगाधर नेहरु
अपना लिखने लगा इस प्रकार से एक
नया उपनाम अस्तित्व में आया नेहरु और आज
समय ऐसा है की एक दिन अरुण नेहरु को छोड़कर
कोई नेहरु नहीं बचा …
अपने आप को कश्मीरी पंडित कह कर रह
रहा था गंगाधर क्यूंकि अफगानी था और लोग
आसानी से विश्वास कर लेते थे
क्यूंकि कश्मीरी पंडित भी ऐसे ही लगते थे.
अपने आप को पंडित साबित करने के लिए सबने
नाम के आगे पंडित लगाना शुरू कर दिया
गंगाधर नेहरु
राज कुमार नेहरु
विद्याधर नेहरु
मोतीलाल नेहरु
जवाहर लाल नेहरु लिखा ..
और यही नाम व्यवहार में लाते गए …
पंडित जवाहर लाल नेहरु अगर कश्मीर
का था तो आज कहाँ गया कश्मीर में वो घर आज
तो वो कश्मीर में कांग्रेस का मुख्यालय
होना चाहिए जिस प्रकार आनंद भवन कांग्रेस
का मुख्यालय बना हुआ है इलाहाबाद में….
ये कहानी इतनी पुरानी भी नहीं है की इसके तथ्य
कश्मीर में मिल न सकें ….
आज हर पुरानी चीज़ मिल रही है ….
चित्रकूट में भगवन श्री राम के पैरों के निशान
मिले,
लंका में रावन की लंका मिली, उसके हवाई अड्डे,
अशोक वाटिका, संजीवनी बूटी वाले पहाड़
आदि बहुत कुछ….
समुद्र में भगवान श्री कृष्ण भगवान्
द्वारा बसाई गई द्वारिका नगरी मिली ,
करोड़ों वर्ष पूर्व की DINOSAUR के अवशेष
मिले तो 150 वर्ष पुराना कश्मीर में नकली नेहरू
का अस्तित्व ढूंढना क्या कठिन है ?????
दुश्मन बहुत होशिआर है हमें आजादी के धोखे में
रखा हुआ है,
इस से उभरने के लिए इनको इन सब से
भी बड़ी चुस्की पिलानी पड़ेगी जो की मेरे विचार
से धर्मान्धता ही हो सकती है जैसे गणेश को दूध
पिलाया था अन्यथा किसी डिक्टेटर
को आना पड़ेगा या सिविल वार अनिवार्य
हो जायेगा
तो क्या सोचा हम नेहरू को कौनसे नाम से
पुकारे ? जवाहरुद्दीन या चाचा नेहरू ?
जो नेहरू नेहरू कहते है उनसे पूछिये की इस
खानदान के अलावा भारत मे और कोई नेहरू क्यूँ
नहीं हुआ ?
अगर यह वास्तव मे ब्राह्मण था तो ब्राह्मनों मे
नेहरू नाम की गोत्र अवश्य होनी चाहिए थी ?
क्यूँ नहीं है
क्यों देश मे और कोई नेहरू नहीं मिलता ?
क्या ये जवाहर लाल के परिवार वाले आसमान से
टपके थे ?
जय भारत जय हो

नेहरू से पहले ....नेहरू की पीढ़ी इस प्रकार है .... सबसे पहले ! गंगाधर नेहरु उसका बेटा राज कुमार नेहरु उसका बेटा विद्याधर नेहरु उसका बेटा मोतीलाल नेहरु और अंत जवाहर लाल नेहरु गंगाधर नेहरु (Nehru) उर्फ़ GAYAS - UD - DIN SHAH जिसे GAZI की उपाधि दी गई थी .... GAZI जिसका मतलब होता है (KAFIR - KILLER) इस गयासुद्दीन गाजी ने ही मुसलमानों को खबर (मुखबिरी ) दी थी की गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड में आये हुए हैं , इसकी मुखबिरी और पक्की खबर के कारण ही सिखों के दशम गुरु गोबिंद सिंह जी के ऊपर हमला बोला गया, जिसमे उन्हें चोट पहुंची और कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो गई थी. और आज नांदेड में सिक्खों का बहुत बड़ा तीर्थ- स्थान बना हुआ है. जब गयासुद्दीन को हिन्दू और सिक्ख मिलकर चारों और ढूँढने लगे तो उसने अपना नाम बदल लिया और गंगाधर राव बन गया, और उसे इससे पहले मुसलमानों ने पुरस्कार के रूप में अलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में इशरत मंजिल नामक महल/हवेली दिया, जिसका नाम आज आनंद भवन है ....आनंद भवन को आज अलाहाबाद में kangress का मुख्यालय बनाया हुआ है इशरत मंजिल के बगल से एक नहर गुजरा करती थी, जिसके कारण लोग गंगाधर को नहर के पास वाला, नहर किनारे वाला, नहर वाला, neharua , आदि बोलते थे जो बाद में गंगाधर नेहरु अपना लिखने लगा इस प्रकार से एक नया उपनाम अस्तित्व में आया नेहरु और आज समय ऐसा है की एक दिन अरुण नेहरु को छोड़कर कोई नेहरु नहीं बचा ... अपने आप को कश्मीरी पंडित कह कर रह रहा था गंगाधर क्यूंकि अफगानी था और लोग आसानी से विश्वास कर लेते थे क्यूंकि कश्मीरी पंडित भी ऐसे ही लगते थे. अपने आप को पंडित साबित करने के लिए सबने नाम के आगे पंडित लगाना शुरू कर दिया गंगाधर नेहरु राज कुमार नेहरु विद्याधर नेहरु मोतीलाल नेहरु जवाहर लाल नेहरु लिखा .. और यही नाम व्यवहार में लाते गए ... पंडित जवाहर लाल नेहरु अगर कश्मीर का था तो आज कहाँ गया कश्मीर में वो घर आज तो वो कश्मीर में कांग्रेस का मुख्यालय होना चाहिए जिस प्रकार आनंद भवन कांग्रेस का मुख्यालय बना हुआ है इलाहाबाद में.... ये कहानी इतनी पुरानी भी नहीं है की इसके तथ्य कश्मीर में मिल न सकें .... आज हर पुरानी चीज़ मिल रही है .... चित्रकूट में भगवन श्री राम के पैरों के निशान मिले, लंका में रावन की लंका मिली, उसके हवाई अड्डे, अशोक वाटिका, संजीवनी बूटी वाले पहाड़ आदि बहुत कुछ.... समुद्र में भगवान श्री कृष्ण भगवान् द्वारा बसाई गई द्वारिका नगरी मिली , करोड़ों वर्ष पूर्व की DINOSAUR के अवशेष मिले तो 150 वर्ष पुराना कश्मीर में नकली नेहरू का अस्तित्व ढूंढना क्या कठिन है ????? दुश्मन बहुत होशिआर है हमें आजादी के धोखे में रखा हुआ है, इस से उभरने के लिए इनको इन सब से भी बड़ी चुस्की पिलानी पड़ेगी जो की मेरे विचार से धर्मान्धता ही हो सकती है जैसे गणेश को दूध पिलाया था अन्यथा किसी डिक्टेटर को आना पड़ेगा या सिविल वार अनिवार्य हो जायेगा तो क्या सोचा हम नेहरू को कौनसे नाम से पुकारे ? जवाहरुद्दीन या चाचा नेहरू ? जो नेहरू नेहरू कहते है उनसे पूछिये की इस खानदान के अलावा भारत मे और कोई नेहरू क्यूँ नहीं हुआ ? अगर यह वास्तव मे ब्राह्मण था तो ब्राह्मनों मे नेहरू नाम की गोत्र अवश्य होनी चाहिए थी ? क्यूँ नहीं है क्यों देश मे और कोई नेहरू नहीं मिलता ? क्या ये जवाहर लाल के परिवार वाले आसमान से टपके थे ? जय भारत जय हो
Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर


स्तंभेश्वर महादेव मंदिर (कावी, गुजरात): आप यह कल्पना नहीं कर सकते लेकिन यह बात सच है कि यह मंदिर पल भर के लिए ओझल हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद अपने उसी जगह वापिस भी जाता है. यह मंदिर अरब सागर के बिल्कुल सामने है और वडोदरा से 40 मील की दूरी पर है. खास बात यह है कि आप इस मंदिर की यात्रा तभी कर सकते हैं जब समुद्र में ज्वार कम हो. ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है.

Posted in हिन्दू पतन

आइये जाने हमारे कुछ शहरों के पुराने नाम …


आइये जाने हमारे कुछ शहरों के पुराने नाम …

कानपुर का नाम कान्हापुर
दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ
हैदराबाद का नाम भाग्यनगर
फैजाबाद का नाम अयोध्या

इलाहाबाद का नाम प्रयाग
औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर
भोपाल का भोजपाल
लखनऊ का लक्ष्मणपूरी

अहमदाबाद का कर्णावती
अलीगढ़ का नाम हरीगढ़
मिराज का नाम शिवप्रदेश
मुजफ्फरनगर का नाम लक्ष्मीनगर
शामली का श्यामली !

आगे आप भी कुछ जोड़ें …

कृपया हिंदुत्व व आध्यात्म के ज्ञान को और अटूट करने के लिए
कृपया शेयर करें … _/\_

आइये जाने हमारे कुछ शहरों के पुराने नाम ...

कानपुर का नाम कान्हापुर
दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ
हैदराबाद का नाम भाग्यनगर
फैजाबाद का नाम अयोध्या

इलाहाबाद का नाम प्रयाग
औरंगाबाद का नाम संभाजी नगर
भोपाल का भोजपाल
लखनऊ का लक्ष्मणपूरी

अहमदाबाद का कर्णावती
अलीगढ़ का नाम हरीगढ़
मिराज का नाम शिवप्रदेश
मुजफ्फरनगर का नाम लक्ष्मीनगर
शामली का श्यामली !

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Posted in श्री कृष्णा

Krishna was born in the darkness of the night


Krishna was born in the darkness of the night, into the locked confines of a jail.
However, at the moment of His birth, all the guards fell asleep, the chains were broken and the barred doors gently opened.

Similarly, as soon as Krishna ( Chetna, Awareness ) takes birth in our hearts, all darkness ( Negativity ) fades.

All chains ( Ego, I, Me, Myself ) are broken.

And all prison doors we keep ourselves in ( Caste, Religion, Profession, Relations etc )  are opened.

And that is the real Message And Essence of Janmashtmi.