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क्या भगवान बुद्ध 1887-1807 ई॰पू॰ में हुए थे ?



क्या भगवान बुद्ध 1887-1807 ई॰पू॰ में हुए थे ?

वर्ष 2009 में प्रयाग से प्रकाशित भारतीय ऐतिहासिक कालक्रम (क्रोनोलॉजी) पर मेरे शोध-ग्रन्थ “भगवान बुद्ध और उनकी इतिहास सम्मत तिथि” का देशभर में स्वागत हुआ था. आज बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर उस पुस्तक का सारांश प्रस्तुत कर रहा हूँ.

भगवान् बुद्ध के काल के संबंध में 60 से अधिक तिथियाँ हैं जो 270 ई॰पू॰ से 2422 ई॰पू॰ तक फैली हुई हैं। इनमें से अधिकांश तिथियाँ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित हैं। और किसी भी मान्यता पर पाश्चात्य विद्वान् एकमत नहीं हैं। तथापि, बुद्ध के निर्वाण की दो भिन्न तिथियों— 544 ई॰पू॰ और 483 ई॰पू॰ की घोषणा कर दी गई है और प्राचीन परम्परावाले बौद्ध-देश भी इन्हीं तिथियों को मानने के लिए बाध्य हो गए हैं। इतिहास की पाठ्य-पुस्तकों में भी यही तिथियाँ पढ़ाई जा रही हैं और इसी आधार पर अन्य तिथियों की भी संयोजना की जा रही है।
भारतीय-इतिहास-परिशोध की दृष्टि से यह एक अत्यन्त भयंकर भूल है, क्योंकि भारतीय-स्रोतों में यह सिद्ध करने के लिए अत्यन्त प्रबल प्रमाण हैं कि भगवान् बुद्ध का जन्म 1887 ई॰पू॰ में और निर्वाण 1807 ई॰पू॰ में हुआ था। इसका अर्थ यह है कि भगवान् बुद्ध के मान्य काल में 1,300 वर्षों से अधिक की भूल है।
भगवान् बुद्ध को 1887-1807 ई॰पू॰ में मानने का सर्वप्रथम आधार पुराणों में प्राप्त राजवंशावलियाँ हैं। भगवान् बुद्ध कोसल के इक्ष्वाकु-वंश में उत्पन्न हुए थे, जिसका श्रीराम के स्वर्गारोहण के पश्चात् कई भागों में विभाजन हुआ। फलस्वरूप श्रीराम के अनुज लक्ष्मण के पुत्रों— अंगद और चन्द्रकेतु को वर्तमान नेपाल का भू-भाग प्राप्त हुआ था। नेपाल पर शासन करनेवाले लक्ष्मण के पुत्रों का वंश ‘लिच्छवि’ कहलाया। भगवान् बुद्ध का जन्म इसी लिच्छवि शाखा में हुआ था। कुशस्थली को राजधानी बनाकर राज्य करनेवाला कुशवंश (मूल इक्ष्वाकु-वंश) का 112वाँ राजा बृहद्बल महाभारत-युद्ध (3039-‘38 ई॰पू॰) में अभिमन्यु के हाथों मारा गया था। युद्ध के पश्चात् बृहद्बल के पुत्र बृहत्क्षत्र कुशस्थली के राजा बने। बृहत्क्षत्र की वंश-परम्परा में 30 राजा हुए, जिन्होंने 1,504 वर्षों तक राज्य किया। 23वें वंशज शाक्य हुए, जो कपिलवस्तु को राजधानी बनाकर नेपाल के सान्निध्य में हिमालय की तराई के उत्तरी-पश्चिमी भाग के राजा बने। 24वें वंशज शुद्धोधन एवं 25वें गौतम बुद्ध थे। 31वें एवं अन्तिम वंशज (30वें राजा) सुमित्र के साथ इक्ष्वाकु-वंश का अन्त हो गया । यह वंश-परम्परा ब्रह्माण्डमहापुराण (उपोद्घात, अध्याय 4), भागवतमहापुराण (स्कन्ध 9, अध्याय 12) एवं विष्णुमहापुराण (अंश 4, अध्याय 22) में दी हुई है । इस प्रकार (3139-’38-1504=) 1634 ई॰पू॰ में सुमित्र पर यह वंश-परम्परा समाप्त हो चुकी थी और 24वें वंशज गौतम बुद्ध का काल 1634 ई॰पू॰ से पूर्व प्रमाणित होता है। प्रायः सभी इतिहासकार एकमत हैं कि गौतम बुद्ध मगध-नरेश बिम्बिसार एवं अजातशत्रु के समकालीन थे और अजातशत्रु के शासनकाल में ही बुद्ध का निर्वाण हुआ था। हम मगध के राजवंशों की कालगणना करते आ रहे हैं। 1994 ई॰पू॰ से प्रारम्भ शिशुनाग-वंश के 5वें राजा बिम्बिसार ने 38 वर्ष (1852-1814 ई॰पू॰) एवं छठे राजा अजातशत्रु ने 27 वर्ष (1814-1787 ई॰पू॰) शासन किया था । श्रीलंका से प्राप्त बौद्ध-ग्रन्थ ‘महावंश’ के अनुसार अजातशत्रु के राज्यारोहण के 8वें वर्ष बुद्ध का निर्वाण हुआ था। अतः 1807 ई॰पू॰ बुद्ध का निर्वाण-काल आता है ।
बुद्ध को 19वीं शती ई॰पू॰ में मानने का दूसरा आधार इस अवधारणा में है कि सर विलियम ज़ोन्स के वक्तव्य को आधार बनाकर डा॰ राधाकुमुद मुखर्जी-जैसे अनेक प्रमुख इतिहासकारों ने सिकन्दर के भारत पर आक्रमण की यूनानी-तिथि को ‘भारतीय-इतिहास का मूलाधार’ मान लिया है। फलस्वरूप सिकन्दर के समकालीन ‘चन्द्रगुप्त’ नामक राजा को मौर्यवंशीय चन्द्रगुप्त मौर्य से जोड़कर भारत के इतिहास को 1,300 वर्ष पीछे ढकेल दिया गया है । वास्तविकता यह है कि सिकन्दर का समकालीन चन्द्रगुप्त, गुप्तवंश से संबंध रखता था जो 327-320 ई॰पू॰ में हुआ।
तीसरा आधार है आद्य शंकराचार्य की तिथि । यह सर्वमान्य तथ्य है कि भगवान् बुद्ध और आद्य शंकराचार्य के मध्य लगभग 1,300 वर्षों का अन्तर था और बुद्ध, शंकराचार्य से पूर्ववर्ती थे । आद्य शंकराचार्य द्वारा स्थापित 5 मठों, विशेषकर काँची-कामकोटि मठ, द्वारका शारदा मठ और पुरी गोवर्द्धन-मठ की आचार्य-परम्परा छठी शताब्दी ई॰पू॰ से प्रारम्भ होती है और स्वयं आद्य शंकराचार्य की तिथि भी 509-477 ई॰पू॰ प्रमाणित है । इससे 1,300 वर्ष पूर्व, अर्थात् 1887-1807 ई॰पू॰ में बुद्ध का काल निश्चित होता है ।
चौथा आधार बुद्ध की परम्परागत जन्म-कुण्डली है। बुद्ध की परम्परागत जन्म-कुण्डली में प्रदर्शित ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करने के उपरान्त गवर्नमेंट आर्ट्स कालेज़, राजमुन्द्रि (चेन्नई) के भूतपूर्व गणित-विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात ज्योतिषाचार्य प्रो. ह्वी. तिरुवेंकटाचार्य ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भगवान् बुद्ध का निर्वाण वैशाख शुक्ल पूर्णिमा, विशाखा नक्षत्र, तदनुसार 27 मार्च, 1807 ई॰पू॰, मंगलवार की ब्राह्मवेला में हुआ था।
ज्योतिषाचार्य शाक्यानन्द ने खगोलीय गणना करके भगवान् बुद्ध का समय कृत्तिका नक्षत्र में, अर्थात् 2621-1661 ई॰पू॰ के बीच निर्धारित किया है । इस दृष्टि से भी भगवान् बुद्ध का समय 19वीं शताब्दी ई॰पू॰ में रखा जा सकता है । भूटान के 16वीं शताब्दी के एक बौद्ध-लामा पद्मकारपो ने भगवान् बुद्ध का निर्वाण-काल 1858 ई॰पू॰ घोषित किया है । प्रो॰ के॰ श्रीनिवासराघवन का मानना है कि भगवान् बुद्ध का समय महाभारत-युद्ध के 1,259 वर्ष बाद आता है । इस दृष्टि से भी भगवान् बुद्ध का समय 1880 ई॰पू॰ सिद्ध होता है । डा॰ देवसहाय त्रिवेद ने पौराणिक-गणना के आधार पर बुद्ध-निर्वाण-काल 1793 ई॰पू॰ में निर्धारित किया है । स्वामी राघवाचार्य ने पौराणिक-गणना के आधार पर घोषित किया है कि भगवान् बुद्ध 1825 ई॰पू॰ के आस-पास जीवित थे । विजयवाड़ा के पं॰ कोटा वेंकटचलम् और उनके पुत्र कोटा नित्यानन्द शास्त्री, पुणे के पुरुषोत्तम नागेश ओक, हैदराबाद के राम साठे, दिल्ली के रघुनन्दन प्रसाद शर्मा, पाण्डिचेरी के देवदत्त तथा वृन पार्कर ने पौराणिक-गणना के आधार पर बुद्ध-निर्वाण-काल 1807 ई॰पू॰ निर्धारित किया है ।
ए॰वी॰ त्यागराज अय्यर ने लिखा है: ‘एथेन्स में अभी हाल ही में मिली एक समाधि में एक अभिलेख है, जिसपर उत्कीर्ण है कि यहाँ बोधगया से आए एक भारतीय-श्रमणाचार्य चिर-निद्रा में लेटे हैं । इन शाक्य मुनि को उनके यूनानी-शिष्यों द्वारा एथेन्स लाया गया था । लगभग 1000 ई॰पू॰ में हुई उनकी मृत्यु के समय यह समाधि बनाई गई थी ।’ इस वर्णन से स्पष्ट है कि जब 1000 ई॰पू॰ में कोई बौद्ध-भिक्षु एथेन्स गए थे, तो बौद्ध-सम्प्रदाय के प्रवर्तक भगवान् बुद्ध तो निश्चित ही उससे पूर्व हुए होंगे । और वह समय 1887-1807 ई॰पू॰ के आस-पास ही होगा, जो कि हमारी खोज है ।
इसी प्रकार दिनांक 07 अक्टूबर, 1966 ई॰ को ‘टाइम्स आफ़ इण्डिया’ सहित भारत के सभी प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रों में अहमदाबाद से प्रेस ट्रस्ट आफ़ इण्डिया द्वारा भेजा गया समाचार प्रकाशित हुआ था जिसमें ‘ईसा से 2,000 वर्ष पूर्व की सात बौद्ध-गुफाओं की उपलब्धि’ की सूचना दी गई थी । प्रमुख हिंदी-दैनिक समाचार-पत्र ‘नवभारत टाइम्स’ ने शनिवार, 08 अक्टूबर, 1966 के अंक में पृ॰ 3 पर अपने ‘विचार-प्रवाह’ स्तम्भ के अंतर्गत इस उपलब्धि की महत्ता का वर्णन करते हुए लिखा था कि भड़ौच जि़ले के भगडि़या तालुका में झाजीपुर गाँव के पास कडि़या पहाडि़यों में एक गुफा की खोज की गयी है, जो ईसा से 2000 वर्ष पूर्व की है । गुजरात के तत्कालीन उप-शिक्षामंत्री डा॰ भानु प्रसाद पाण्डेय के अनुसार इस गुफा में एक सिंहयुक्त स्तम्भ मिला है । गुफा में कई कक्ष, बरामदे आदि भी मिले हैं । यह गुफा और यहाँ मिली वस्तुओं से पता चलता है कि इसे बौद्ध-भिक्षुओं ने अपना स्थल बनाया होगा । कडि़या पहाडि़यों में मिली गुफा की उपलब्धि भी हमारी इस मान्यता को बल प्रदान करती है कि बुद्ध छठी शताब्दी ई॰पू॰ के व्यक्ति नहीं थे । यही नहीं, यह खोज हमारी इस धारणा को पुष्ट करती है कि बुद्ध 2000 ई॰पू॰ जीवित थे; यदि यथार्थ वर्णन किया जाए तो कहा जाएगा कि वे 1887-1807 ई॰पू॰ तक विद्यमान थेI
एम्॰ कृष्णमाचार्य ने भी लिखा है: ‘भारत का अपना भली-भाँति लिखा इतिहास है और पुराण उस इतिहास तथा तिथिक्रम का दिग्दर्शन करते हैं । पुराण पवित्र धोखापट्टी नहीं हैं। पुरुषोत्तम नागेश ओक लिखते हैं: ‘भारतीय-पुराणों को ढोंग की संज्ञा देना या ऐसा समझते हुए एथेन्स, कैण्डी, लन्दन या टोक्यो से प्राचीन भारतीय-ऐतिहासिक कालक्रम को निश्चित करने का यत्न करना, अधिक-से-अधिक भारतीय-इतिहास के प्रति भैंगापन ही कहा जा सकता है ।’ यूरोपीय-इतिहासकार विंसेन्ट आर्थर स्मिथ को भी स्वीकार करना पड़ा है कि ‘पुराणों में दी गई राजवंशावलियों की आधारभूतता को आधुनिक यूरोपीय-लेखकों ने अकारण ही निन्दित किया है; इनके सूक्ष्म अनुशीलन से ज्ञात होता है कि इनमें अत्यधिक मौलिक व मूल्यवान् ऐतिहासिक परम्परा प्राप्त होती है ।’ एडवर्ड पोक़ाक़ ने लिखा है: ‘पुराणों में वर्णित तथ्य, परम्पराएँ और संस्थाएँ क्या किसी दिन स्थापित हो सकती हैं ? अरे भाई, ईसवी सन् से तीन सौ वर्ष पूर्व भी उनका अस्तित्व पाया जाता है, जिससे वह बहुत प्राचीन लगते हैं, इतने प्राचीन कि उनकी बराबरी अन्य कोई भी प्रणाली कर ही नहीं सकती ।’
संसार, इतना नूतन नहीं हो सकता । इतिहासकार के लिए आवश्यक है कि वह भूगर्भ, ज्योर्तिगणना तथा पुरातत्त्व को भी ध्यान में रखकर सभी गुत्थियों को सुलझाने का यत्न करे । विज्ञान का अध्ययन एकांगी नहीं हो सकता । सिकन्दर ने अपने भूतपूर्व सभी ग्रन्थों और अभिलेखों का विनाश उसी प्रकार किया जिस प्रकार चीन के सम्राट् किन शी हुआंगदी (247-210 ई॰पू॰) ने । वह चाहता था कि भविष्य में लोग जानें कि संसार तथा यूनान की सभ्यता पूर्णरूपेण उसी के राज्यकाल में फली और फूली । अतः ग्रीक और रोम का प्राचीन इतिहास पूरी तरह नष्ट हो गया । कालान्तर में लोगों ने स्मरण-मात्र से इतिहास रचने की चेष्टा की अतः वे कदापि विश्वसनीय नहीं हो सकते ।
सोमयाजुलु ने लिखा है: ‘सभी जैन और हिंदू एकमत हैं कि 527 ई॰पू॰ में वर्धमान महावीर की मृत्यु हुई, कुमारिल भट्ट सम्पूर्ण भारत में जैनियों पर प्रबल शास्त्र-प्रहार कर रहे थे और इसका अनुसरण किया शंकराचार्य ने। शंकराचार्य और बुद्ध के मध्य लगभग 1,400 वर्षों का अन्तर था । अतः यह निश्चित है कि बुद्ध छठी शताब्दी ई॰पू॰ के व्यक्ति नहीं थे । श्रीलंका-निवासियों के पास उपलब्ध थोथे वर्णन बुद्ध का काल-निर्धारण करने के लिए किसी भी प्रकार आधिकारिक नहीं हैं । जापानियों ने बौद्ध मत को 7वीं शताब्दी के पश्चात् अंगीकार किया; अतः जापानी-पंचांग भी बुद्ध की तिथि निश्चित करने के लिए कोई आधिकारिक वस्तु नहीं हैं । पाश्चात्य विद्वानों ने अपनी बुद्धि और धुन के अनुसार अटकलें लगाई हैं । भारतीय-विद्यालयों में अब पढ़ाया जा रहा इतिहास ऐसी ग़लत धरणाओं और आधारहीन उहापोहों का बोझा मात्र है ।’
इस संदर्भ में डा॰ देवसहाय त्रिवेद ने ठीक ही लिखा है: ‘यह आश्चर्य और दुर्भाग्य की बात है कि भारतीय-इतिहास की रचना आधुनिक इतिहासकारों ने विदेशी स्रोत के आधार पर की है तथा भारतीय स्रोतों से उसकी पूर्ति करने की चेष्टा की है । किन्तु अच्छा तो यह होता कि स्थानीय स्रोतों के आधार पर इतिहास की रचना की जाती तथा सभी उपलब्ध स्रोतों से उस इतिहास की पूर्ति होती ।’ प्रो॰ शिवशंकर दूबे ने कहा है कि ‘भारतीय-इतिहास को ठीक से लिखने के लिए तथा तिथिक्रम को ठीक करने के लिए पुरानी भित्तियों को गिराना आवश्यक है । वर्तमान प्रचलित धारणाएँ निराधार और निर्मूल हैं तथा हमारी परम्पराएँ बहुत प्राचीन हैं ।’
इस प्रकार भारतीय-इतिहासकारों को अपना बहुप्रचारित कालक्रम ठीक कर लेना चाहिए और भगवान् बुद्ध का जन्म 1887 ई॰पू॰ तथा उनका निर्वाण 1807 ई॰पू॰ रखना चाहिए । बुद्ध पर अनुसन्धान करते समय ठीक की गई प्राचीन भारतीय-इतिहास की अन्य महत्त्वपूर्ण घटनाएँ भी इसी प्रकार भारतीय-इतिहास-ग्रन्थों में शुद्ध कर लेनी चाहिए, क्योंकि वे प्राचीन भारतीय इतिहास के समांग वर्णन से ठीक बैठती हैं ।

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Hello, Harshad Ashodiya I have 12,000 Hindi, Gujarati ebooks

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