बंगाल में किंग्स्फोर्ड नाम का एक जज था जो राजनैतिक अभियुक्तों को कठोरतम दंड देने के लिए कुख्यात था |सैकड़ों देशभक्तों को यह दण्डित कर चुका था | जनता में इससे काफी निराशा फ़ैल रही थी | क्रांतिकारियों ने निश्चय किया कि इस प्रकार के आतंकवाद को सहते जाना अनुचित है | निर्णय लिया गया कि आतंकवाद का प्रत्युत्तर उसी की भाषा में दिया जाये | किंग्सफोर्ड को दंड देने के लिए दो नवयुवकों को नियुक्त किया गया – खुदीराम बोस एवं प्रफुल्लकुमार चाकी | इसी दौरान न्यायाधीश महोदय स्थानांतरित होकर मुजफ्फरपुर (बिहार ) आ गए किन्तु क्रांतिकारी अपने संकल्प के पक्के थे , निर्णय हुआ कि दोनों नवयुवक मुजफ्फरपुर में ही जज साहब को सजा देंगे | अतः दोनों नवयुवक मुजफ्फरपुर आ गए | एक तो ये दोनों नवयुवक आयु में काफी छोटे थे , खुदीराम तो मात्र सत्रह साल के थे , दूसरे ये मुजफ्फरपुर में नए थे , फिर भी इन्होने हिम्मत नही हारी , और एक धर्मशाला में रह कर किंग्सफोर्ड का पता लगाने लगे | कई दिनों के अथक परिश्रम के बाद दोनों यह पता लगाने में सफल हुए कि किंग्सफोर्ड किस रंग की गाडी में और कब घूमने निकलता है तदानुसार उसके वध की योजना बनायीं गयी |
३० अप्रैल १९०८ की रात आठ बजे खुदीराम और प्रफुल्ल योजनानुसार निर्दिष्ट स्थान पर प्रतीक्षा कर रहे थे कि उन्हें उसी रंग की गाडी आती दिखाई पड़ी | दोनों ने सतर्कतापूर्वक अपने बम संभाले और निशाने के अंदर आते ही गाड़ी पर सफल प्रहार किया | किन्तु दुर्भाग्य ! उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नही था बल्कि दो अंग्रेज महिलाएं थीं | क्रांतिकारियों को तुरन्त इसका पता नही चला और वे अपनी सफलता पर मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए वहां से भाग निकले |
खुदीराम बोस की गिरफ़्तारी और बलिदान –
बम फेंकने के पश्चात् खुदीराम रातभर भाग कर मुजफ्फरपुर से पच्चीस मील दूर बेनी पंहुचे | इधर सूचना मिलते ही पुलिस ने सारा शहर घेर लिया और तलाशियों का सिलसिला शुरू हो गया | प्रातः भूख से पीड़ित होकर खुदीराम लाइ चने की तलाश में एक बनिए की दुकान पर गए , वहां लोगों को बात करते हुए सुना कि मुजफ्फरपुर में दो मेमें मारी गयी हैं और मारने वाले भाग निकले हैं | इस बात को सुनकर कि किंग्सफोर्ड नही मारा बल्कि दो मेमें मारी गयीं , खुदीराम को इतना आश्चर्य हुआ की उनके मुंह से चीख निकल गयी | उनका चेहरा उनके, अस्तव्यस्त हो रहे वस्त्रों को देखकर लोगों को संदेह हो गया और उन्हें पकड़ने को दौड़ पड़े | खुदीराम के पास एक भरी हुई पिस्तौल थी लेकिन उन्होंने उसका प्रयोग नही किया और लोगों ने पुरष्कार के लालच में उन्हें पुलिस को सौंप दिया | कितनी बड़ी विडम्बना थी कि जिस जनता को स्वतंत्र करने के लिए खुदीराम ने यह महान व्रत लिया था उसी ने उन्हें जल्लादों के हाथों में सौंप दिया | जिस ज़माने में वन्देमातरम कहने पर कोड़े पड़ते हों उस ज़माने में बम ?? इसका एक ही पुरष्कार था मृत्युदंड | ११ अगस्त १९०८ को खुदीराम को फांसी दे दी गयी |
श्री मन्मथनाथ गुप्त के शब्दों में –
“ आखिर चिता भी जल चुकी,खुदीराम की देह उसमे भस्मीभूत हो चुकी , किन्तु जनता को अपने प्यारे शहीद की स्मृति प्यारी थी , वहा झपटी उसकी राख के लिए | किसी ने उसकी तावीज बनायीं किसी ने उसे सर से मला स्त्रियों ने उसे अपने स्तन पर मला | यह एक स्वर्गिक दृश्य था और यही क्यों हजारों आदमी फूट फूट कर रो रहे थे , कोई आंसू पोछता, कोई गंभीर बन गया था | इस सार्वजानिक शोक को मैं एक दिव्य घटना समझता हूँ | ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका कम महत्व् नही है | यहाँ बात सत्य है की इन सर्वस्व त्यागी अल्मास्तों ने जनता को अपने साथ नहीं लिया था , किन्तु इनके महान त्याग और फांसी को एक खेल समझने की मनोवृत्ति ने जनता को इनकी ओर खींच लिया| लोरियों में कहानियों में किवदंतियों में इन लोहे की रीढ़ वालों का प्रवेश हो गया | सैकड़ों अख़बारों के जरिये एक दल जितना जनता में प्रविष्ट नही हो पाता था , ये अलमस्त एक फांसी से एक दिन के अन्दर उससे कहीं अधिक जनता में दिल में घर कर लेते थे | हिंदुस्तान में सैकड़ों दल वर्षों से काम कर रहे हैं , जिनमे से कुछ का प्रचार कार्य बिलकुल आधुनिक था | फिर भी उनका नाम जनता तक उतना नहीं पंहुचा जितना की खुदीराम बोस का पहुंचा |”
बम फेंकने के पश्चात् खुदीराम और प्रफुल्ल दोनों अलग अलग रास्तों से भागे थे, खुदीराम बेनी पंहुचे और प्रफुल्ल समस्तीपुर | दुर्भाग्यवश जिस डिब्बे में प्रफुल्ल बैठे थे उसमे एक दरोगा भी बैठा था, उसने मुजफ्फरपुर काण्ड के बारे में जान रखा था , प्रफुल्ल को देखा तो उसको संदेह हुआ | पहले तो उसने तार से मुजफ्फरपुर पुलिस को सूचना दी और फिर हुलिया मालूम कर दो तीन स्टेशन बाद प्रफुल्ल को गिरफ्तार करना चाहा | प्रफुल्ल भी इसप्रकार कि परिस्थिति के लिए तैयार थे उन्होंने अपनी पिस्तौल निकाली और जो व्यक्ति उन्हें गिरफ्तार करने आ रहा था उसपर गोली चला दी, वार खाली गया | ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि प्रफुल ने पिस्तौल का रूख मोड़ा और स्वयं को ही गोली मार ली | दरोगा हाथ मलता रह गया |
इस दरोगा का नाम था नंदलाल बनर्जी | सरकार कि ओर से इसको क्या पुरष्कार मिला यह तो नहीं ज्ञात है किन्तु क्रांतिकारियों ने इसे अवश्य पुरष्कृत किया | कुछ दिन पश्चात् कलकत्ते कि एक सड़क पर देशद्रोही नन्दललाल को दिन दहाड़े गोली मार दी गयी और हुतात्मा प्रफुल्ल कुमार चाकी का तर्पण नंदलाल के रक्त से कर दिया गया |
