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खुदीराम


बंगाल में किंग्स्फोर्ड नाम का एक जज था जो राजनैतिक अभियुक्तों को कठोरतम दंड देने के लिए कुख्यात था |सैकड़ों देशभक्तों को यह दण्डित कर चुका था | जनता में इससे काफी निराशा फ़ैल रही थी | क्रांतिकारियों ने निश्चय किया कि इस प्रकार के आतंकवाद को सहते जाना अनुचित है | निर्णय लिया गया कि आतंकवाद का प्रत्युत्तर उसी की भाषा में दिया जाये | किंग्सफोर्ड को दंड देने के लिए दो नवयुवकों को नियुक्त किया गया – खुदीराम बोस एवं प्रफुल्लकुमार चाकी | इसी दौरान न्यायाधीश महोदय स्थानांतरित होकर मुजफ्फरपुर (बिहार ) आ गए किन्तु क्रांतिकारी अपने संकल्प के पक्के थे , निर्णय हुआ कि दोनों नवयुवक मुजफ्फरपुर में ही जज साहब को सजा देंगे | अतः दोनों नवयुवक मुजफ्फरपुर आ गए | एक तो ये दोनों नवयुवक आयु में काफी छोटे थे , खुदीराम तो मात्र सत्रह साल के थे , दूसरे ये मुजफ्फरपुर में नए थे , फिर भी इन्होने हिम्मत नही हारी , और एक धर्मशाला में रह कर किंग्सफोर्ड का पता लगाने लगे | कई दिनों के अथक परिश्रम के बाद दोनों यह पता लगाने में सफल हुए कि किंग्सफोर्ड किस रंग की गाडी में और कब घूमने निकलता है तदानुसार उसके वध की योजना बनायीं गयी |
३० अप्रैल १९०८ की रात आठ बजे खुदीराम और प्रफुल्ल योजनानुसार निर्दिष्ट स्थान पर प्रतीक्षा कर रहे थे कि उन्हें उसी रंग की गाडी आती दिखाई पड़ी | दोनों ने सतर्कतापूर्वक अपने बम संभाले और निशाने के अंदर आते ही गाड़ी पर सफल प्रहार किया | किन्तु दुर्भाग्य ! उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नही था बल्कि दो अंग्रेज महिलाएं थीं | क्रांतिकारियों को तुरन्त इसका पता नही चला और वे अपनी सफलता पर मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए वहां से भाग निकले |
खुदीराम बोस की गिरफ़्तारी और बलिदान –
बम फेंकने के पश्चात् खुदीराम रातभर भाग कर मुजफ्फरपुर से पच्चीस मील दूर बेनी पंहुचे | इधर सूचना मिलते ही पुलिस ने सारा शहर घेर लिया और तलाशियों का सिलसिला शुरू हो गया | प्रातः भूख से पीड़ित होकर खुदीराम लाइ चने की तलाश में एक बनिए की दुकान पर गए , वहां लोगों को बात करते हुए सुना कि मुजफ्फरपुर में दो मेमें मारी गयी हैं और मारने वाले भाग निकले हैं | इस बात को सुनकर कि किंग्सफोर्ड नही मारा बल्कि दो मेमें मारी गयीं , खुदीराम को इतना आश्चर्य हुआ की उनके मुंह से चीख निकल गयी | उनका चेहरा उनके, अस्तव्यस्त हो रहे वस्त्रों को देखकर लोगों को संदेह हो गया और उन्हें पकड़ने को दौड़ पड़े | खुदीराम के पास एक भरी हुई पिस्तौल थी लेकिन उन्होंने उसका प्रयोग नही किया और लोगों ने पुरष्कार के लालच में उन्हें पुलिस को सौंप दिया | कितनी बड़ी विडम्बना थी कि जिस जनता को स्वतंत्र करने के लिए खुदीराम ने यह महान व्रत लिया था उसी ने उन्हें जल्लादों के हाथों में सौंप दिया | जिस ज़माने में वन्देमातरम कहने पर कोड़े पड़ते हों उस ज़माने में बम ?? इसका एक ही पुरष्कार था मृत्युदंड | ११ अगस्त १९०८ को खुदीराम को फांसी दे दी गयी |
श्री मन्मथनाथ गुप्त के शब्दों में –
“ आखिर चिता भी जल चुकी,खुदीराम की देह उसमे भस्मीभूत हो चुकी , किन्तु जनता को अपने प्यारे शहीद की स्मृति प्यारी थी , वहा झपटी उसकी राख के लिए | किसी ने उसकी तावीज बनायीं किसी ने उसे सर से मला स्त्रियों ने उसे अपने स्तन पर मला | यह एक स्वर्गिक दृश्य था और यही क्यों हजारों आदमी फूट फूट कर रो रहे थे , कोई आंसू पोछता, कोई गंभीर बन गया था | इस सार्वजानिक शोक को मैं एक दिव्य घटना समझता हूँ | ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका कम महत्व् नही है | यहाँ बात सत्य है की इन सर्वस्व त्यागी अल्मास्तों ने जनता को अपने साथ नहीं लिया था , किन्तु इनके महान त्याग और फांसी को एक खेल समझने की मनोवृत्ति ने जनता को इनकी ओर खींच लिया| लोरियों में कहानियों में किवदंतियों में इन लोहे की रीढ़ वालों का प्रवेश हो गया | सैकड़ों अख़बारों के जरिये एक दल जितना जनता में प्रविष्ट नही हो पाता था , ये अलमस्त एक फांसी से एक दिन के अन्दर उससे कहीं अधिक जनता में दिल में घर कर लेते थे | हिंदुस्तान में सैकड़ों दल वर्षों से काम कर रहे हैं , जिनमे से कुछ का प्रचार कार्य बिलकुल आधुनिक था | फिर भी उनका नाम जनता तक उतना नहीं पंहुचा जितना की खुदीराम बोस का पहुंचा |”

बम फेंकने के पश्चात् खुदीराम और प्रफुल्ल दोनों अलग अलग रास्तों से भागे थे, खुदीराम बेनी पंहुचे और प्रफुल्ल समस्तीपुर | दुर्भाग्यवश जिस डिब्बे में प्रफुल्ल बैठे थे उसमे एक दरोगा भी बैठा था, उसने मुजफ्फरपुर काण्ड के बारे में जान रखा था , प्रफुल्ल को देखा तो उसको संदेह हुआ | पहले तो उसने तार से मुजफ्फरपुर पुलिस को सूचना दी और फिर हुलिया मालूम कर दो तीन स्टेशन बाद प्रफुल्ल को गिरफ्तार करना चाहा | प्रफुल्ल भी इसप्रकार कि परिस्थिति के लिए तैयार थे उन्होंने अपनी पिस्तौल निकाली और जो व्यक्ति उन्हें गिरफ्तार करने आ रहा था उसपर गोली चला दी, वार खाली गया | ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि प्रफुल ने पिस्तौल का रूख मोड़ा और स्वयं को ही गोली मार ली | दरोगा हाथ मलता रह गया |
इस दरोगा का नाम था नंदलाल बनर्जी | सरकार कि ओर से इसको क्या पुरष्कार मिला यह तो नहीं ज्ञात है किन्तु क्रांतिकारियों ने इसे अवश्य पुरष्कृत किया | कुछ दिन पश्चात् कलकत्ते कि एक सड़क पर देशद्रोही नन्दललाल को दिन दहाड़े गोली मार दी गयी और हुतात्मा प्रफुल्ल कुमार चाकी का तर्पण नंदलाल के रक्त से कर दिया गया |

बंगाल में किंग्स्फोर्ड नाम का एक जज था जो राजनैतिक अभियुक्तों को कठोरतम दंड देने के लिए कुख्यात था |सैकड़ों देशभक्तों को यह दण्डित कर चुका था | जनता में इससे काफी निराशा फ़ैल रही थी | क्रांतिकारियों ने निश्चय किया कि इस प्रकार के आतंकवाद को सहते जाना अनुचित है | निर्णय लिया गया कि आतंकवाद का प्रत्युत्तर उसी की भाषा में दिया जाये | किंग्सफोर्ड को दंड देने के लिए दो नवयुवकों को नियुक्त किया गया – खुदीराम बोस एवं प्रफुल्लकुमार चाकी | इसी दौरान न्यायाधीश महोदय स्थानांतरित होकर मुजफ्फरपुर (बिहार ) आ गए किन्तु क्रांतिकारी अपने संकल्प के पक्के थे , निर्णय हुआ कि दोनों नवयुवक मुजफ्फरपुर में ही जज साहब को सजा देंगे | अतः दोनों नवयुवक मुजफ्फरपुर आ गए | एक तो ये दोनों नवयुवक आयु में काफी छोटे थे , खुदीराम तो मात्र सत्रह साल के थे , दूसरे ये मुजफ्फरपुर में नए थे , फिर भी इन्होने हिम्मत नही हारी , और एक धर्मशाला में रह कर किंग्सफोर्ड का पता लगाने लगे | कई दिनों के अथक परिश्रम के बाद दोनों यह पता लगाने में सफल हुए कि किंग्सफोर्ड किस रंग की गाडी में और कब घूमने निकलता है तदानुसार उसके वध की योजना बनायीं गयी |
३० अप्रैल १९०८ की रात आठ बजे खुदीराम और प्रफुल्ल योजनानुसार निर्दिष्ट स्थान पर प्रतीक्षा कर रहे थे कि उन्हें उसी रंग की गाडी आती दिखाई पड़ी | दोनों ने सतर्कतापूर्वक अपने बम संभाले और निशाने के अंदर आते ही गाड़ी पर सफल प्रहार किया | किन्तु दुर्भाग्य ! उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नही था बल्कि दो अंग्रेज महिलाएं थीं | क्रांतिकारियों को तुरन्त इसका पता नही चला और वे अपनी सफलता पर मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद देते हुए वहां से भाग निकले |
खुदीराम बोस की गिरफ़्तारी और बलिदान –
बम फेंकने के पश्चात् खुदीराम रातभर भाग कर मुजफ्फरपुर से पच्चीस मील दूर बेनी पंहुचे | इधर सूचना मिलते ही पुलिस ने सारा शहर घेर लिया और तलाशियों का सिलसिला शुरू हो गया | प्रातः भूख से पीड़ित होकर खुदीराम लाइ चने की तलाश में एक बनिए की दुकान पर गए , वहां लोगों को बात करते हुए सुना कि मुजफ्फरपुर में दो मेमें मारी गयी हैं और मारने वाले भाग निकले हैं | इस बात को सुनकर कि किंग्सफोर्ड नही मारा बल्कि दो मेमें मारी गयीं , खुदीराम को इतना आश्चर्य हुआ की उनके मुंह से चीख निकल गयी | उनका चेहरा उनके, अस्तव्यस्त हो रहे वस्त्रों को देखकर लोगों को संदेह हो गया और उन्हें पकड़ने को दौड़ पड़े | खुदीराम के पास एक भरी हुई पिस्तौल थी लेकिन उन्होंने उसका प्रयोग नही किया और लोगों ने पुरष्कार के लालच में उन्हें पुलिस को सौंप दिया | कितनी बड़ी विडम्बना थी कि जिस जनता को स्वतंत्र करने के लिए खुदीराम ने यह महान व्रत लिया था उसी ने उन्हें जल्लादों के हाथों में सौंप दिया | जिस ज़माने में वन्देमातरम कहने पर कोड़े पड़ते हों उस ज़माने में बम ?? इसका एक ही पुरष्कार था मृत्युदंड | ११ अगस्त १९०८ को खुदीराम को फांसी दे दी गयी |
श्री मन्मथनाथ गुप्त के शब्दों में –
“ आखिर चिता भी जल चुकी,खुदीराम की देह उसमे भस्मीभूत हो चुकी , किन्तु जनता को अपने प्यारे शहीद की स्मृति प्यारी थी , वहा झपटी उसकी राख के लिए | किसी ने उसकी तावीज बनायीं किसी ने उसे सर से मला स्त्रियों ने उसे अपने स्तन पर मला | यह एक स्वर्गिक दृश्य था और यही क्यों हजारों आदमी फूट फूट कर रो रहे थे , कोई आंसू पोछता, कोई गंभीर बन गया था | इस सार्वजानिक शोक को मैं एक दिव्य घटना समझता हूँ | ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका कम महत्व् नही है | यहाँ बात सत्य है की इन सर्वस्व त्यागी अल्मास्तों ने जनता को अपने साथ नहीं लिया था , किन्तु इनके महान त्याग और फांसी को एक खेल समझने की मनोवृत्ति ने जनता को इनकी ओर खींच लिया| लोरियों में कहानियों में किवदंतियों में इन लोहे की रीढ़ वालों का प्रवेश हो गया | सैकड़ों अख़बारों के जरिये एक दल जितना जनता में प्रविष्ट नही हो पाता था , ये अलमस्त एक फांसी से एक दिन के अन्दर उससे कहीं अधिक जनता में दिल में घर कर लेते थे | हिंदुस्तान में सैकड़ों दल वर्षों से काम कर रहे हैं , जिनमे से कुछ का प्रचार कार्य बिलकुल आधुनिक था | फिर भी उनका नाम जनता तक उतना नहीं पंहुचा जितना की खुदीराम बोस का पहुंचा |"

बम फेंकने के पश्चात् खुदीराम और प्रफुल्ल दोनों अलग अलग रास्तों से भागे थे, खुदीराम बेनी पंहुचे और प्रफुल्ल समस्तीपुर | दुर्भाग्यवश जिस डिब्बे में प्रफुल्ल बैठे थे उसमे एक दरोगा भी बैठा था, उसने मुजफ्फरपुर काण्ड के बारे में जान रखा था , प्रफुल्ल को देखा तो उसको संदेह हुआ | पहले तो उसने तार से मुजफ्फरपुर पुलिस को सूचना दी और फिर हुलिया मालूम कर दो तीन स्टेशन बाद प्रफुल्ल को गिरफ्तार करना चाहा | प्रफुल्ल भी इसप्रकार कि परिस्थिति के लिए तैयार थे उन्होंने अपनी पिस्तौल निकाली और जो व्यक्ति उन्हें गिरफ्तार करने आ रहा था उसपर गोली चला दी, वार खाली गया | ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी कि प्रफुल ने पिस्तौल का रूख मोड़ा और स्वयं को ही गोली मार ली | दरोगा हाथ मलता रह गया |
इस दरोगा का नाम था नंदलाल बनर्जी | सरकार कि ओर से इसको क्या पुरष्कार मिला यह तो नहीं ज्ञात है किन्तु क्रांतिकारियों ने इसे अवश्य पुरष्कृत किया | कुछ दिन पश्चात् कलकत्ते कि एक सड़क पर देशद्रोही नन्दललाल को दिन दहाड़े गोली मार दी गयी और हुतात्मा प्रफुल्ल कुमार चाकी का तर्पण नंदलाल के रक्त से कर दिया गया |
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अभिनव क्रांतिकारी वीर सावरकर


अभिनव क्रांतिकारी वीर सावरकर
नासिक के समीप भगूर नामक ग्राम में 28 मई , सन् 1883 को जन्मे वीर सावरकर आधुनिक भारत के निर्माताओं की अग्रणी पंक्ति के जाज्लयमान नक्षत्र है । वे पहले ऐसे राष्ट्रभक्त विद्यार्थी थे , जिन्होंने अंग्रेजी सरकार का कायदा – कानून भारत में स्वीकार करने से इन्कार किया और लोगों को भी उस बारे में ललकारा । * ” पूर्ण स्वतंत्रता ही भारत का लक्ष्य है ” की उद्घोषणा करने वाले सर्वप्रथम नेता वीर सावरकर ही थे ( लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से भी पहले ) । * वीर सावरकर ने सबसे पहले स्वदेशी की आवाज उठायी थी । वह पहले ऐसे नेता थे , जिन्होंने स्वदेशी की अलख जगाने के लिए पुणे में ( सन् 1906 में ) विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर ( मोहनदास करमचंद गांधी से भी पहले ) लोगों को विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने को कहा था । * वीर सावरकर के सरकार विरोधी भाषणों के लिए उन्हें कालेज से निकाल दिया गया था । राजनीतिक कारणों से किसी कालेज से निकाले जाने वाले वह पहले विद्यार्थी थे । परीक्षा के समय कालेज के अधिकारियों ने उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दे थी । * वीर सावरकर पहले स्नातक थे , जिनसे उनके स्वतंत्रता के लगाव के कारण बम्बई विश्वविद्यालय ने 1911 में डिग्री छीन ली थी ( उसी डिग्री को 1960 में वापस लौटाया ) । * वीर सावरकर पहले भारतीय थे , जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के विरोध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित रूप में बगावत की और दूसरे देशों के क्रांतिकारियों से संबंध प्रस्थापित किया । जिसका लाभ आगे चलकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उन की सेना को भी हुआ । * वीर सावरकर द्वारा लिखित ” 1857 का स्वतंत्रता समर ” विश्व की पहली पुस्तक है , जिस पर उसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंध लगा दिया गया । ( तब तक अंग्रेजों और अंग्रेजों के चमचों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को दुनिया के सामने सैनिक विद्रोह के स्वरूप में ही रखा था । ) उन्होंने लंदन में 1857 के स्वतंत्रता समर का अर्द्ध शताब्दी ( 50 वीं वर्षगाँठ ) समारोह भी धूमधाम से मनाया । * वीर सावरकर पहले देशभक्त थे , जिन्होंने भारत स्वतंत्र होने से चालीस वर्ष पूर्व ही स्वतंत्र भारत का ध्वज बनाकर जर्मनी के स्टुटगार्ट में होने वाली अंतरराष्ट्रीय परिषद् में मादाम भीखाजी कामा के हाथों दुनिया के सामने लहराया । * वीर सावरकर पहले ऐसे विद्यार्थी थे , जिन्हें इंग्लैंड में बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने के बावजूद , ब्रिटिस साम्राज्य के प्रति राजनिष्ठ रहने की शपथ लेने से इन्कार करने के कारण , प्रमाणपत्र नहीं दिया गया । * सन् 1909 में जब वीर सावरकर यूरोप में थे , उनके बड़े भाई श्री गणेश दामोदर सावरकर को आजीवन कालापानी की सजा हुई । भारत में ब्रिटिस सरकार ने उनके परिवार की तमाम संपत्ति भी जब्त कर ली । परिवार के लोग सड़क पर खडे रह गये । * वीर सावरकर विश्व के प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी ( फ्रांस ) भूमि पर बंदी बनाने के कारण जिनका अभियोग हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चला । * वीर सावरकर विश्व इतिहास के प्रथम महापुरूष है , जिनके बंदी विवाद के कारण फ्रांस के प्रधानमंत्री एम. बायन को त्याग – पत्र देना पडा था । * वीर सावरकर विश्व मानवता के इतिहास में प्रथम व्यक्ति थे , जिन्हें दो आजीवन कारावास ( 50 वर्ष ) की लम्बी कालेपानी की कैद की सजा दी गई । * वीर सावरकर विश्व के प्रथम कैदी कवि थे , जिन्होंने कालेपानी की कठोर सजा ( कोल्हू में बैल की जगह जुतना , चुने की चक्की चलाना , रामबांस कूटना , कोड़ों की मार सहना ) के दौरान कागज और कलम से वंचित होते हुए भी अंदमान जेल की कालकोठरी में 11 हजार पंक्तियों की ‘ गोमांतक ‘ ‘ कमला ‘ जैसी काव्य रचनाएँ जेल की दीवारों पर कील और काँटों की लेखनी से लिखकर की । दीवारों को प्रत्येक वर्ष सफेदी की जाती थी , इसलिए उन काव्यों को कंठस्थ करके यह सिद्ध किया कि सृष्टि के आदि काल में आर्यो ने वाणी ( कण्ठ ) द्वारा वेदों को किस प्रकार जीवित रखा । * जहाँ गांधी और नेहरू को जेल में क्लास ए की सुविधाएँ उपलब्ध थीं , वही सावरकर की श्रेणी डी ( खतरनाक ) थी , कैद के दौरान उन्होंने घोर अमानवीय यातनाओं को झेलना पढा , जिसमें कोल्हू में तैल पेरना , रस्सी बटना आदि शामिल था । * अंदमान जेल में भी जोर – जबरदस्ती हिन्दुओं को इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया जाता था , जिसका वीर सावरकर ने प्रबल विरोध किया । * वीर सावरकर ने हिन्दुस्थान में सामाजिक परिवर्तन और एकता लाने के लिए जाति – वर्ण भेद के विरोध में ठोस कार्यवाही की , जैसे पतित – पावन मन्दिर की स्थापना , जहाँ सभी वर्ण के लोगों का प्रवेश था । मन्दिर का पुजारी एक अछूत था । अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों से वेद – शास्त्रों का पठन करवाया । भारतवंशीयों का शुद्धिकरण कर हिन्दू धर्म में वापस लाया गया । समाज को विज्ञाननिष्ठ बनने का आव्हान करते हुए उन्होंने अन्धश्रद्धाओं पर जबरदस्त हमला किया । * भाषाई और सांप्रदायिक एकता के लिए वीर सावरकर का योगदान अमूल्य है । वह मराठी साहित्य परिषद के पहले अध्यक्ष थे । संस्कृतनिष्ट हिंदी के प्रचार का बिगुल बजाया । इसके लिए उन्होंने एक हिन्दी शब्दकोष की भी रचना की । शहीद के स्थान पर हुतात्मा , प्रूप के स्थान पर उपमुद्रित , मोनोपोली के लिए एकत्व , मेयर के लिए महापौर आदि शब्द वीर सावरकर की ही देन है । वह उस समय के प्रथम ऐसे हिन्दू नेता थे जिनका सार्वजनिक सम्मान शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने किया था । * 83 वर्ष की आयु में योग की सवौच्च परंपरा के अनुसार 26 दिन तक खाना व दो दिन तक पानी छोड़कर आत्मसमर्पण करते हुए 26 फरवरी , 1966 को मृत्यु का वरण किया , ऐसे अभिनव क्रांतिकारी थे वीर सावरकर ।

अभिनव क्रांतिकारी वीर सावरकर 
नासिक के समीप भगूर नामक ग्राम में 28 मई , सन् 1883 को जन्मे वीर सावरकर आधुनिक भारत के निर्माताओं की अग्रणी पंक्ति के जाज्लयमान नक्षत्र है । वे पहले ऐसे राष्ट्रभक्त विद्यार्थी थे , जिन्होंने अंग्रेजी सरकार का कायदा - कानून भारत में स्वीकार करने से इन्कार किया और लोगों को भी उस बारे में ललकारा । * " पूर्ण स्वतंत्रता ही भारत का लक्ष्य है " की उद्घोषणा करने वाले सर्वप्रथम नेता वीर सावरकर ही थे ( लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक से भी पहले ) । * वीर सावरकर ने सबसे पहले स्वदेशी की आवाज उठायी थी । वह पहले ऐसे नेता थे , जिन्होंने स्वदेशी की अलख जगाने के लिए पुणे में ( सन् 1906 में ) विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर ( मोहनदास करमचंद गांधी से भी पहले ) लोगों को विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने को कहा था । * वीर सावरकर के सरकार विरोधी भाषणों के लिए उन्हें कालेज से निकाल दिया गया था । राजनीतिक कारणों से किसी कालेज से निकाले जाने वाले वह पहले विद्यार्थी थे । परीक्षा के समय कालेज के अधिकारियों ने उन्हें परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दे थी । * वीर सावरकर पहले स्नातक थे , जिनसे उनके स्वतंत्रता के लगाव के कारण बम्बई विश्वविद्यालय ने 1911 में डिग्री छीन ली थी ( उसी डिग्री को 1960 में वापस लौटाया ) । * वीर सावरकर पहले भारतीय थे , जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता के विरोध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगठित रूप में बगावत की और दूसरे देशों के क्रांतिकारियों से संबंध प्रस्थापित किया । जिसका लाभ आगे चलकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उन की सेना को भी हुआ । * वीर सावरकर द्वारा लिखित " 1857 का स्वतंत्रता समर " विश्व की पहली पुस्तक है , जिस पर उसके प्रकाशन से पूर्व ही प्रतिबंध लगा दिया गया । ( तब तक अंग्रेजों और अंग्रेजों के चमचों ने इस स्वतंत्रता संग्राम को दुनिया के सामने सैनिक विद्रोह के स्वरूप में ही रखा था । ) उन्होंने लंदन में 1857 के स्वतंत्रता समर का अर्द्ध शताब्दी ( 50 वीं वर्षगाँठ ) समारोह भी धूमधाम से मनाया । * वीर सावरकर पहले देशभक्त थे , जिन्होंने भारत स्वतंत्र होने से चालीस वर्ष पूर्व ही स्वतंत्र भारत का ध्वज बनाकर जर्मनी के स्टुटगार्ट में होने वाली अंतरराष्ट्रीय परिषद् में मादाम भीखाजी कामा के हाथों दुनिया के सामने लहराया । * वीर सावरकर पहले ऐसे विद्यार्थी थे , जिन्हें इंग्लैंड में बैरिस्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने के बावजूद , ब्रिटिस साम्राज्य के प्रति राजनिष्ठ रहने की शपथ लेने से इन्कार करने के कारण , प्रमाणपत्र नहीं दिया गया । * सन् 1909 में जब वीर सावरकर यूरोप में थे , उनके बड़े भाई श्री गणेश दामोदर सावरकर को आजीवन कालापानी की सजा हुई । भारत में ब्रिटिस सरकार ने उनके परिवार की तमाम संपत्ति भी जब्त कर ली । परिवार के लोग सड़क पर खडे रह गये । * वीर सावरकर विश्व के प्रथम राजनीतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी ( फ्रांस ) भूमि पर बंदी बनाने के कारण जिनका अभियोग हेग के अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में चला । * वीर सावरकर विश्व इतिहास के प्रथम महापुरूष है , जिनके बंदी विवाद के कारण फ्रांस के प्रधानमंत्री एम. बायन को त्याग - पत्र देना पडा था । * वीर सावरकर विश्व मानवता के इतिहास में प्रथम व्यक्ति थे , जिन्हें दो आजीवन कारावास ( 50 वर्ष ) की लम्बी कालेपानी की कैद की सजा दी गई । * वीर सावरकर विश्व के प्रथम कैदी कवि थे , जिन्होंने कालेपानी की कठोर सजा ( कोल्हू में बैल की जगह जुतना , चुने की चक्की चलाना , रामबांस कूटना , कोड़ों की मार सहना ) के दौरान कागज और कलम से वंचित होते हुए भी अंदमान जेल की कालकोठरी में 11 हजार पंक्तियों की ' गोमांतक ' ' कमला ' जैसी काव्य रचनाएँ जेल की दीवारों पर कील और काँटों की लेखनी से लिखकर की । दीवारों को प्रत्येक वर्ष सफेदी की जाती थी , इसलिए उन काव्यों को कंठस्थ करके यह सिद्ध किया कि सृष्टि के आदि काल में आर्यो ने वाणी ( कण्ठ ) द्वारा वेदों को किस प्रकार जीवित रखा । * जहाँ गांधी और नेहरू को जेल में क्लास ए की सुविधाएँ उपलब्ध थीं , वही सावरकर की श्रेणी डी ( खतरनाक ) थी , कैद के दौरान उन्होंने घोर अमानवीय यातनाओं को झेलना पढा , जिसमें कोल्हू में तैल पेरना , रस्सी बटना आदि शामिल था । * अंदमान जेल में भी जोर - जबरदस्ती हिन्दुओं को इस्लाम धर्म में परिवर्तित किया जाता था , जिसका वीर सावरकर ने प्रबल विरोध किया । * वीर सावरकर ने हिन्दुस्थान में सामाजिक परिवर्तन और एकता लाने के लिए जाति - वर्ण भेद के विरोध में ठोस कार्यवाही की , जैसे पतित - पावन मन्दिर की स्थापना , जहाँ सभी वर्ण के लोगों का प्रवेश था । मन्दिर का पुजारी एक अछूत था । अस्पृश्य कहे जाने वाले लोगों से वेद - शास्त्रों का पठन करवाया । भारतवंशीयों का शुद्धिकरण कर हिन्दू धर्म में वापस लाया गया । समाज को विज्ञाननिष्ठ बनने का आव्हान करते हुए उन्होंने अन्धश्रद्धाओं पर जबरदस्त हमला किया । * भाषाई और सांप्रदायिक एकता के लिए वीर सावरकर का योगदान अमूल्य है । वह मराठी साहित्य परिषद के पहले अध्यक्ष थे । संस्कृतनिष्ट हिंदी के प्रचार का बिगुल बजाया । इसके लिए उन्होंने एक हिन्दी शब्दकोष की भी रचना की । शहीद के स्थान पर हुतात्मा , प्रूप के स्थान पर उपमुद्रित , मोनोपोली के लिए एकत्व , मेयर के लिए महापौर आदि शब्द वीर सावरकर की ही देन है । वह उस समय के प्रथम ऐसे हिन्दू नेता थे जिनका सार्वजनिक सम्मान शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने किया था । * 83 वर्ष की आयु में योग की सवौच्च परंपरा के अनुसार 26 दिन तक खाना व दो दिन तक पानी छोड़कर आत्मसमर्पण करते हुए 26 फरवरी , 1966 को मृत्यु का वरण किया , ऐसे अभिनव क्रांतिकारी थे वीर सावरकर ।
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जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था…..जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था…..जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था…..जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था…..


जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था…..

वहां 2 माह से तोप चला रहा इजरायल : गाजा पट्टी पर कब्जे के लिए दो माह से जंग
छिड़ी है। इसी इलाके में 1918 के प्रथम विश्व युद्ध में मारवाड़ के घुड़सवार शूरवीरों ने
जर्मन सेना की मशीनगनों का मुकाबला करते हुए इजरायल के हैफा शहर पर महज एक
घंटे में कब्जा कर लिया था….

नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर लांसर के मेजर दलपतसिंह शेखावत और कैप्टन अमान सिंह
जोधा। 23 सितंबर को हुए इस युद्ध में मेजर दलपतसिंह समेत सात हिन्दुस्तानी शहीद
हुए। दिल्ली स्थित तीन मूर्ति स्मारक इसी युद्ध के शहीदों को समर्पित है।

खास बात यह है कि एक मूर्ति मेजर दलपत सिंह की है, इजरायल 2018 में इस विजय
दिवस की शताब्दी मनाएगा। गौर करने लायक तथ्य है कि इस विजय गाथा को इजराइली
बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ते हैं। तोपों के गोलों के बीच अमान सिंह ने एक घंटे में
हैफा पर किया था कब्जा प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश व जर्मनी की सेनाएं प्रमुख थीं। जर्मनी
व तुर्की की गठबंधन सेना ने हैफा के दुर्ग पर कब्जा कर लिया। वे तोपों व मशीनगनों से
इजरायल सेना पर हमला कर रहे थे।

भारतीय सेना को इसे मुक्त कराने की जिम्मेदारी मिली। जोधपुर लांसर के मेजर दलपत
सिंह शेखावत अपनी टुकड़ी के साथ निकल पड़े। युद्ध में जर्मन सेना लगातार उन पर तोप
व मशीनगनों से गोले दागती रही। इस दौरान मेजर दलपत सिंह शहीद हो गए। जोधपुर
लांसर के कैप्टन अमान सिंह जोधा ने कमान संभालते हुए जर्मन सेना का मुकाबला किया

एक घंटे के भीतर हैफा शहर उनके कब्जे में था, जर्मन मशीनगनों पर हौसला पड़ा भारी
उस वक्त जोधपुर रियासत के घुड़सवारों के पास हथियार के नाम पर मात्र बंदूकें थी। वहीं,
जर्मन सेना तोपों तथा मशीनगनों से लैस थी। लेकिन राजस्थान के रणबांकुरों के हौसले
के आगे दुश्मन पस्त हो गया। देवली पाबूजी के निवासी थे मेजर दलपत सिंह शहीद हुए
मेजर दलपत सिंह शेखावत पाली जिले के नाडोल के निकट देवली पाबूजी के रहने वाले
थे। यहां के जागीरदार ठाकुर हरि सिंह के इकलौते पुत्र ठाकुर दलपत सिंह को पढ़ाई के लिए जोधपुर के प्रशासक सर प्रताप ने इंग्लैंड भेजा। 18 साल की उम्र में वे जोधपुर लांसर में
बतौर घुड़सवार भर्ती हुए व बाद में मेजर बने। हैफा के युद्ध में ब्रिटिश सेना ने उन्हें कमान
सौंपी। दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस, अमान सिंह को इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट मेजर
दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस जबकि कैप्टन अमान सिंह जोधा को सरदार बहादुर की
उपाधि देते हुए आईओएम (इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट) तथा ओ.बी.ई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश
इंपायर) से सम्मानित किया गया था। 700 सैनिक बंदी बनाए, असलहा कब्जे में किया
23 सितंबर, 1918 को दिन में 2 बजे जोधपुर लांसर व मैसूर लांसर के घुड़सवारों ने हैफा
शहर पर चढ़ाई की और एक घंटे में ही हैफा शहर के दुर्ग पर विजय पताका फहरा दी।
भारतीय शूरवीरों ने जर्मन- तुर्की सेना के 700 सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। इनमें
23 तुर्की तथा 2 जर्मन अफसर भी थे। वहीं, 17 तोपें, 11 मशीनगन व हजारों की संख्या
में जिंदा कारतूस भी जब्त किए गए। घुड़सवार हमले का यह निर्णायक युद्ध था।

मारवाड़ के 6 और सपूत भी हुए शहीद इस युद्ध में मेजर दलपत सिंह के साथ 6 घुड़सवार
शहीद हुए, जबकि टुकड़ी के 60 घोड़े भी मारे गए। जोधपुर लांसर सवार तगतसिंह, सवार शहजादसिंह, मेजर शेरसिंह आईओएम, दफादार धोकल सिंह, सवार गोपालसिंह और सवार सुल्तानसिंह भी इस युद्ध में शहीद हुए थे..

जय राजपुताना…..

जिस शहर को भारतीयों ने 1 घंटे में छीना था.....

वहां 2 माह से तोप चला रहा इजरायल : गाजा पट्टी पर कब्जे के लिए दो माह से जंग
छिड़ी है। इसी इलाके में 1918 के प्रथम विश्व युद्ध में मारवाड़ के घुड़सवार शूरवीरों ने
जर्मन सेना की मशीनगनों का मुकाबला करते हुए इजरायल के हैफा शहर पर महज एक
घंटे में कब्जा कर लिया था....

नेतृत्व कर रहे थे जोधपुर लांसर के मेजर दलपतसिंह शेखावत और कैप्टन अमान सिंह
जोधा। 23 सितंबर को हुए इस युद्ध में मेजर दलपतसिंह समेत सात हिन्दुस्तानी शहीद
हुए। दिल्ली स्थित तीन मूर्ति स्मारक इसी युद्ध के शहीदों को समर्पित है।

खास बात यह है कि एक मूर्ति मेजर दलपत सिंह की है, इजरायल 2018 में इस विजय
दिवस की शताब्दी मनाएगा। गौर करने लायक तथ्य है कि इस विजय गाथा को इजराइली
बच्चे अपने स्कूली पाठ्यक्रम में पढ़ते हैं। तोपों के गोलों के बीच अमान सिंह ने एक घंटे में
हैफा पर किया था कब्जा प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश व जर्मनी की सेनाएं प्रमुख थीं। जर्मनी
व तुर्की की गठबंधन सेना ने हैफा के दुर्ग पर कब्जा कर लिया। वे तोपों व मशीनगनों से
इजरायल सेना पर हमला कर रहे थे।

भारतीय सेना को इसे मुक्त कराने की जिम्मेदारी मिली। जोधपुर लांसर के मेजर दलपत
सिंह शेखावत अपनी टुकड़ी के साथ निकल पड़े। युद्ध में जर्मन सेना लगातार उन पर तोप
व मशीनगनों से गोले दागती रही। इस दौरान मेजर दलपत सिंह शहीद हो गए। जोधपुर
लांसर के कैप्टन अमान सिंह जोधा ने कमान संभालते हुए जर्मन सेना का मुकाबला किया

एक घंटे के भीतर हैफा शहर उनके कब्जे में था, जर्मन मशीनगनों पर हौसला पड़ा भारी
उस वक्त जोधपुर रियासत के घुड़सवारों के पास हथियार के नाम पर मात्र बंदूकें थी। वहीं,
जर्मन सेना तोपों तथा मशीनगनों से लैस थी। लेकिन राजस्थान के रणबांकुरों के हौसले
के आगे दुश्मन पस्त हो गया। देवली पाबूजी के निवासी थे मेजर दलपत सिंह शहीद हुए
मेजर दलपत सिंह शेखावत पाली जिले के नाडोल के निकट देवली पाबूजी के रहने वाले
थे। यहां के जागीरदार ठाकुर हरि सिंह के इकलौते पुत्र ठाकुर दलपत सिंह को पढ़ाई के लिए जोधपुर के प्रशासक सर प्रताप ने इंग्लैंड भेजा। 18 साल की उम्र में वे जोधपुर लांसर में
बतौर घुड़सवार भर्ती हुए व बाद में मेजर बने। हैफा के युद्ध में ब्रिटिश सेना ने उन्हें कमान
सौंपी। दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस, अमान सिंह को इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट मेजर
दलपत सिंह को मिलिट्री क्रॉस जबकि कैप्टन अमान सिंह जोधा को सरदार बहादुर की
उपाधि देते हुए आईओएम (इंडियन आर्डर ऑफ मेरिट) तथा ओ.बी.ई (ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश
इंपायर) से सम्मानित किया गया था। 700 सैनिक बंदी बनाए, असलहा कब्जे में किया
23 सितंबर, 1918 को दिन में 2 बजे जोधपुर लांसर व मैसूर लांसर के घुड़सवारों ने हैफा
शहर पर चढ़ाई की और एक घंटे में ही हैफा शहर के दुर्ग पर विजय पताका फहरा दी।
भारतीय शूरवीरों ने जर्मन- तुर्की सेना के 700 सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। इनमें
23 तुर्की तथा 2 जर्मन अफसर भी थे। वहीं, 17 तोपें, 11 मशीनगन व हजारों की संख्या
में जिंदा कारतूस भी जब्त किए गए। घुड़सवार हमले का यह निर्णायक युद्ध था।

मारवाड़ के 6 और सपूत भी हुए शहीद इस युद्ध में मेजर दलपत सिंह के साथ 6 घुड़सवार
शहीद हुए, जबकि टुकड़ी के 60 घोड़े भी मारे गए। जोधपुर लांसर सवार तगतसिंह, सवार शहजादसिंह, मेजर शेरसिंह आईओएम, दफादार धोकल सिंह, सवार गोपालसिंह और सवार सुल्तानसिंह भी इस युद्ध में शहीद हुए थे..

जय राजपुताना.....
Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

वैसे तो संपूर्ण जम्बूद्वीप पर हिन्दू साम्राज्य


वैसे तो संपूर्ण जम्बूद्वीप पर हिन्दू साम्राज्य
स्थापित था। जम्बूद्वीप के 9 देश थे उसमें से 3 थे-
हरिवर्ष, भद्राश्व और किंपुरुष। उक्त
तीनों देशों को मिलाकर आज इस स्थान को चीन
कहा जाता है। चीन प्राचीनकाल में हिन्दू राष्ट्र था।
1934 में हुई एक खुदाई में चीन के समुद्र के किनारे
बसे एक प्राचीन शहर च्वानजो 1000 वर्ष से
भी ज्यादा प्राचीन हिन्दू मंदिरों के लगभग एक दर्जन
से अधिक खंडहर मिले हैं। यह क्षेत्र प्राचीन काल में
हरिवर्ष कहलाता था, जैसे भारत को भारतवर्ष
कहा जाता है।

Posted in P N Oak, Rajiv Dixit

जानिए क्यूँ तोड़ी हमने हत्यारी विक्टोरिया की मूर्ति —आर्य जितेंद्र


जानिए क्यूँ तोड़ी हमने हत्यारी विक्टोरिया की मूर्ति —आर्य जितेंद्र

1. इसी विक्टोरिया ने भारत मे गौ माँ को काटने के कत्ल कारखाने लगवाए थे ।

2. अंग्रेज़ो ने प्रत्यक्ष रूप से 7लाख 80000 क्रांतिकारियों को मौत के घाट निर्ममता से उतार दिया । किसी को तोप से उड़ा दिया किसी को बंदूक से तो किसी को फांसी पर ,बिठुर जैसे गाँव के तो 24000 लोगो को जिनमे एक दिन का बच्चा भी था और 100 वर्ष का बुजुर्ग भी अंग्रेज़ो ने पेड़ से बांध कर जला दिया ।

3. ऐसे अंग्रेज़ो के नाम पर जब हमारा देश गुलाम था तो हमारे देश के गद्दार राजाओ ने और काले अंग्रेज़ो कुछ पार्क ,कुछ महल ,कुछ नगर बनवाए लेकिन भारत तो 68 वर्ष पहले ही आजाद हो गया फिर इन नगरो ,मूर्तियो ,दरवाजो की भारत को क्या जरूरत ये ही हमारे युवा खून मे उबाल लाती है और हमारे शहीदो की शहादत को मुह चिड़ाती है इसलिए हमने बहुत सोच समझकर इस घटना को अंजाम दिया है

4. जिन लोगो ने जालिया वाला भाग मे शान्तिप्रिय तरीके से आंदोलन कर कर रहे 22000 लोगो पर गोलिया चला दी जिसमे 5000 क्रांतिकारी एक ही साथ मर गए ऐसे कुख्यात हत्यारो के नाम पर आज भी इस देश मे कई सड़को के नाम है क्या ये आज भी मानसिक गुलामी आपको नहीं लगती है यदि हाँ तो आइये हमारे इस आंदोलन का हिस्सा बनिए ।

5. आज भी इस देश मे वास्को डी गामा ,डलहोजी ,मेकलोड आदि कई बार्बर अंग्रेज़ो के नाम पर सड़के है इन्हे जड़ से हटाकर इस देश को पुनः भारत बनाना हमारा उद्देश्य है ।

6. आज भी इस देश मे UPSC की परीक्षा मे हिन्दी या भारतीय भाषी छात्र अपने आप को अपमानित महसूस करता है आज भी इस देश मे अंग्रेज़ो को गौरव की भाषा माना जाता है और हिन्दी की बात करने वाले छात्रो पर अंग्रेज़ो की तरह लठिया चलाई जाती है ।

7. आज भी इस देश मे विदेशी कंपनिया भारतवासियों को लूट रही है उन्हे गौ माँ और सूअर की चर्बी का मांस खिला रही है । आज भी लाखो करोड़ रुपये भारत से बहार जा रहे है ।

8. आज भी इस देश का किसान मरा जा रहा है कर्ज तले दबा जा रहा है । क्या भगत सिंह और उनके साथियो ने इस दिन के लिए फांसी के फंदे को चूमा था । क्या इस लिए झाँसी की रानी अपनी राजसत्ता छोड़कर महलो का वैभव छोड़कर बंजारा बनकर युद्ध मैदान मे उतरी थी

9. हमे अपने भारत को बचना है तो फिर से भारत को भारतीयता के आधार पर खड़ा करना ही होगा और तभी हर भारत वासी सुख चैन और गौरव से अपना जीवन व्यपन कर सकेगा ।

10. भारत मे आज जीतने भी अंग्रेज़ अधिकारियों ,राजाओ के नाम की मूर्तिया है ,नगर है ,सड़के है भारत सरकार उन्हे जल्द से जल्द संवैधानिक रूप से हता दे वरना इस देश मे आज भी भगत सिंह ही जन्म लेते है

!!वंदे मातरम !

साभार :- हिन्दुस्तान मेरी जान

Posted in भारतीय मंदिर - Bharatiya Mandir

कौंसरनाग तीर्थ : इतिहास और परंपरा।


कौंसरनाग तीर्थ : इतिहास और परंपरा।

कौंसरनाग तीर्थ : इतिहास और परंपरा।

कौंसरनाग विष्णुपाद कश्मीर घाटी के दक्षिण में पीर पांचाल पर्वत – श्रंखला के बीच शुपयन में स्थित कपालमोचन तीर्थ से से ३४ की दूरी पर समुद्र तल से १२ हज़ार फ़ीट की ऊचाई पर ५ किलोमीटर लम्बी और ३ किलोमीटर चौड़ी विशाल पाऊ के आकार की एक विलक्षण झील है जिसके साथ मिथकीय आख्यान, इतिहास और लोक विश्वास जुड़े हुए हैं। इस तीर्थ का उल्लेख नीलमत पुराण , कल्हण की राजतरंगिणी जैसे प्राचीन ग्रंथों में तो है ही, इस का उल्लेख कश्मीर के महाराजा रणबीर सिंह के शासन काल में पंडित साहिब राम की पाण्डुलिपि ‘तीर्थ संग्रह’ में भी है जिसमें कश्मीर के प्रसिद्द ३६५ तीर्थों के बारे में जानकारी मिलती है। यह पाण्डुलिपि अभी तक अप्रकाशित है और भंडारकर यूनिवर्सिटी में सुरक्षित है। नीलमतपुराण के अनुसार कौंसरनाग विष्णुपाद झील के इर्द-गिर्द बानिहाल के पश्चिम में तीन ऊंचे -ऊंचे पर्वत शिखर हैं जिन्हे ब्रह्मा, विष्णु और महेश गिरि के नाम से चिन्हित किया गया है। इन तीनों में से पश्चिम की ओर जो सबसे ऊंचा शिखर है उसे ‘नौ बंधन’ कहा जाता है। जल प्रलय के समय मनु की नौका हवा पानी तूफ़ान के थपेड़े खाते खाते यहीं जा लगी थी। नीलमत पूरा के अनुसार वास्तव में यहीं पर कहीं विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर अपनी पीठ से मनुष्यता के बीज लिए मनु की नौका को धकिया कर पर्वत से जा लगाया था और मनु ने इसी शिखर से उसे बांधा था। कौंसरनाग शब्द वास्तव में मूल संस्कृत शब्द ‘ क्रमसर नाग ‘ का अपभ्रंश है और कश्मीर में त्रिक सम्प्रदाय ,भट्टारिका सम्प्रदाय ,कुल सम्प्रदाय आदि की तरह ही क्रम संप्रदाय भी प्रचलन में रहा है। कश्मीर में शिव का एक नाम ‘क्रमेश्वर ‘ भी है। इस विष्णुपाद सर में क्रमेश्वर का वास होने से इस सम्प्रदाय के लोग यहाँ प्रति वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा और नाग पंचमी को आकर पूजा अर्चना करते थे। कौंसर नाग का माहात्म्य भी हुआ करता था। उस माहात्म्य के अनुसार कौंसरनाग विष्णुपाद यात्रा करने वाले यात्री को वही फल मिलते हैं जो अमरेश्वर (स्वामी अमरनाथ) की यात्रा करने वाले को प्राप्त होते हैं। इस तरह कपालमोचन तीर्थ (शुपयन) से होकर या कुल वागेश्वरी (कुलगाम) से होते हुए अहरबल प्रपात जिसका नाम नीलमतपुराण (श्लोक २८२) में ‘अखोरबिल ‘ कहा गया है जिसका अर्थ मूषक – बिल होता है जिस से विशोका नदी ठीक वैसे ही निकली बताई गयी है जैसे भागीरथी गंगा जह्नु ऋषि के मुंह से निकलने पर जाह्नवी कहलाती है। इसके पश्चात कोंगवटन ( कुंकुम वर्तन)की मनोरम उपत्यका में रात गुजारने के बाद सुबह मुंह अँधेरे अहिंनाग और महिनाग को पीछे छोड़ते हुए विष्णुपद तक की चढ़ाई चढ़कर बर्फानी जल से झिलमिल कौंसरनाग के दर्शन करते हैं। शब्दातीत दृश्य। अलौकिक झील। मीलों लम्बी -चौड़ी इस सुरम्य झील के पानी पर छोटे छोटे हिमखंड दूर से राजहंसों की तरह लगते है। विष्णुपाद की पश्चिम दिशा में कौंसरनाग से विशोका नदी निकलती है। किंवदंती है की यहीं पर कश्यप ऋषि ने सतीसर की विशाल जलराशि के निकास के उपरान्त कश्मीर घाटी के लोगों के कल्याण के लिए लक्ष्मी की पूजा की थी। इससे पूर्व कश्यप ऋषि ने श्वेतद्वीप में साधना की। कश्यप ऋषि की प्रार्थना से द्रवित होकर लक्ष्मी विशोका नदी (कश्मीरी में वेशव) रूप में कौंसरनाग से बहार आयीं। उसके साथ अहिनाग और महिनाग भी चल लिए। अर्थात इन दोनों पवत्र कुंडों का जल भी विशोका में जा मिला। विशोका कौण्डिन्य नदी, क्षीर नदी और वितस्ता में जा मिलतीं है। यहीं इसी विष्णुपाद कौंसरनाग के पश्चिमी मुहाने पर सविनय हाथ जोड़कर कश्यप ऋषि देवी विशोका की स्तुति करते हैं -” हे माता लक्ष्मी, तुम इन कश्मीर हो ! तुम्हीं उमा के रूप में प्रतिष्ठित हो! तुम ही सब देवियों में विद्यमान हो! तुम्हारे जल से स्नान आने पर पापी भी मोक्ष पाते हैं।’ नीलमत पुराण का गहन अध्ययन करने पर पता चलता है कि कश्मीर घाटी में प्राचीनकाल से उत्सवों और यात्राओं की साल भर धूम रहती रही है। ऐसी वार्षिक यात्राओं में कौंसरनाग यात्रा भी कोई अपवाद नहीं है। कश्मीर की आदि नेंगी ललद्यद चौदहवीं शताब्दी में अपने एक लालवाख में क्रमसर नाग का उल्लेख करती हैं जिससे इसके माहात्म्य का साहियिक सन्दर्भ सामने आता है। ललद्यद् अपने पूर्जन्मों की स्मृति की बात करते हुए कहती हैं क़ि उसे से तीन बार सरोवर (सतीसर) को जलप्लावित रूप में देखने की याद है। एक बार सरोवर को मैंने गगन से मिले देखा। एक बार हरमुख (शिखर) को क्रमसर ( शिखर) से जुड़ा एक सेतु देखा। सात बात सरोवर को शून्याकार होते देखा।

कौंसरनाग तीर्थ : इतिहास और परंपरा।

कौंसरनाग तीर्थ : इतिहास और परंपरा।

कौंसरनाग विष्णुपाद कश्मीर घाटी के दक्षिण में पीर पांचाल पर्वत - श्रंखला के बीच शुपयन में स्थित कपालमोचन तीर्थ से से ३४ की दूरी पर समुद्र तल से १२ हज़ार फ़ीट की ऊचाई पर ५ किलोमीटर लम्बी और ३ किलोमीटर चौड़ी विशाल पाऊ के आकार की एक विलक्षण झील है जिसके साथ मिथकीय आख्यान, इतिहास और लोक विश्वास जुड़े हुए हैं। इस तीर्थ का उल्लेख नीलमत पुराण , कल्हण की राजतरंगिणी जैसे प्राचीन ग्रंथों में तो है ही, इस का उल्लेख कश्मीर के महाराजा रणबीर सिंह के शासन काल में पंडित साहिब राम की पाण्डुलिपि 'तीर्थ संग्रह' में भी है जिसमें कश्मीर के प्रसिद्द ३६५ तीर्थों के बारे में जानकारी मिलती है। यह पाण्डुलिपि अभी तक अप्रकाशित है और भंडारकर यूनिवर्सिटी में सुरक्षित है। नीलमतपुराण के अनुसार कौंसरनाग विष्णुपाद झील के इर्द-गिर्द बानिहाल के पश्चिम में तीन ऊंचे -ऊंचे पर्वत शिखर हैं जिन्हे ब्रह्मा, विष्णु और महेश गिरि के नाम से चिन्हित किया गया है। इन तीनों में से पश्चिम की ओर जो सबसे ऊंचा शिखर है उसे 'नौ बंधन' कहा जाता है। जल प्रलय के समय मनु की नौका हवा पानी तूफ़ान के थपेड़े खाते खाते यहीं जा लगी थी। नीलमत पूरा के अनुसार वास्तव में यहीं पर कहीं विष्णु ने मत्स्य अवतार धारण कर अपनी पीठ से मनुष्यता के बीज लिए मनु की नौका को धकिया कर पर्वत से जा लगाया था और मनु ने इसी शिखर से उसे बांधा था। कौंसरनाग शब्द वास्तव में मूल संस्कृत शब्द ' क्रमसर नाग ' का अपभ्रंश है और कश्मीर में त्रिक  सम्प्रदाय ,भट्टारिका सम्प्रदाय ,कुल सम्प्रदाय आदि की तरह ही क्रम संप्रदाय भी प्रचलन में रहा है। कश्मीर में  शिव का एक नाम 'क्रमेश्वर ' भी है। इस विष्णुपाद सर में क्रमेश्वर का वास होने से इस सम्प्रदाय के लोग यहाँ प्रति वर्ष  आषाढ़ पूर्णिमा और नाग पंचमी  को आकर पूजा अर्चना करते थे। कौंसर नाग का माहात्म्य भी हुआ करता था। उस माहात्म्य के अनुसार  कौंसरनाग विष्णुपाद यात्रा करने वाले यात्री को वही फल मिलते हैं जो अमरेश्वर (स्वामी अमरनाथ) की यात्रा करने वाले को प्राप्त होते हैं। इस तरह कपालमोचन तीर्थ (शुपयन) से होकर या कुल वागेश्वरी (कुलगाम) से होते हुए अहरबल प्रपात जिसका नाम नीलमतपुराण (श्लोक २८२) में 'अखोरबिल ' कहा गया है जिसका अर्थ मूषक - बिल होता है जिस से विशोका नदी ठीक वैसे ही निकली बताई गयी है जैसे भागीरथी गंगा जह्नु ऋषि के मुंह से निकलने पर जाह्नवी कहलाती है। इसके पश्चात कोंगवटन ( कुंकुम वर्तन)की मनोरम उपत्यका में रात गुजारने के बाद सुबह मुंह अँधेरे अहिंनाग और महिनाग को पीछे छोड़ते हुए विष्णुपद तक की चढ़ाई चढ़कर बर्फानी जल से झिलमिल कौंसरनाग के दर्शन करते हैं। शब्दातीत दृश्य। अलौकिक झील। मीलों लम्बी -चौड़ी इस सुरम्य झील के पानी पर छोटे छोटे हिमखंड दूर से राजहंसों की तरह लगते है। विष्णुपाद की पश्चिम दिशा में कौंसरनाग से विशोका नदी निकलती है। किंवदंती है की यहीं पर कश्यप ऋषि ने सतीसर की विशाल जलराशि के निकास के उपरान्त कश्मीर घाटी के लोगों के कल्याण के लिए लक्ष्मी की पूजा की थी। इससे पूर्व कश्यप ऋषि ने श्वेतद्वीप में साधना की।  कश्यप ऋषि की प्रार्थना से द्रवित होकर लक्ष्मी विशोका नदी (कश्मीरी में वेशव) रूप में कौंसरनाग से बहार आयीं। उसके साथ अहिनाग और  महिनाग भी चल लिए। अर्थात इन दोनों पवत्र कुंडों का जल भी  विशोका में जा मिला। विशोका कौण्डिन्य नदी, क्षीर नदी और वितस्ता में जा मिलतीं है। यहीं इसी विष्णुपाद कौंसरनाग के पश्चिमी मुहाने पर सविनय हाथ जोड़कर कश्यप ऋषि देवी विशोका की स्तुति करते हैं -'' हे माता लक्ष्मी, तुम इन कश्मीर हो ! तुम्हीं उमा के रूप में प्रतिष्ठित हो! तुम ही सब देवियों में विद्यमान हो! तुम्हारे जल से स्नान आने पर पापी भी मोक्ष पाते हैं।' नीलमत पुराण का गहन अध्ययन करने पर पता चलता है कि कश्मीर घाटी में प्राचीनकाल से उत्सवों और यात्राओं की साल भर धूम रहती रही है। ऐसी वार्षिक यात्राओं में कौंसरनाग यात्रा भी कोई अपवाद नहीं है। कश्मीर की आदि नेंगी ललद्यद चौदहवीं  शताब्दी में अपने एक लालवाख में क्रमसर नाग का उल्लेख करती हैं  जिससे इसके माहात्म्य का साहियिक सन्दर्भ सामने आता है। ललद्यद् अपने पूर्जन्मों की स्मृति की बात करते हुए कहती हैं क़ि उसे से तीन बार सरोवर (सतीसर) को जलप्लावित रूप में देखने की याद है। एक बार सरोवर को मैंने गगन से मिले देखा। एक बार हरमुख (शिखर) को  क्रमसर ( शिखर) से जुड़ा एक सेतु देखा।  सात बात सरोवर को शून्याकार होते देखा।
Posted in भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

वामपंथी विचारधारा


वामपंथी विचारधारा किसी ‘राष्‍ट्र-राज्‍य’ की सीमा को नहीं मानती। अर्थात राष्‍ट्रवाद से वामपंथ का पूरी दुनिया में द्रोह रहा है। वह पूरी दुनिया को ‘लाल झंडे’ में लपेटना चाहती है. इसलिए राष्‍ट्रवाद को वह अपने राह मे सबसे बड़ा रोड़ा मानती है। इसके लिए वामपंथियों ने अपने सत्‍ता प्रतिष्‍ठान वाले देशों में उस देश के मूल इतिहास को मिटा कर उनके गर्व को चूर करने का प्रयास किया है। भारत में इंदिरा गांधी-वामपंथी समझौते के तहत इंदिरा ने सत्‍ता संभाला और वामपंथियों को शिक्षण संस्‍थाओं पर कब्‍जा दिया। देश का सारा इतिहास वामपंथी रोमिला थापर, विपिनचंद्रा, सुमित सरकार जैसों ने लिखा है. जिन्‍होंने यह कोशिश की कि भारत के वास्‍तविक इतिहास को छुपाया जाए ताकि भारतीयों में कभी गर्व का उदभव न हो सके। याद रखिएगा, हारी हुई मानसिकता हमेशा किसी नई विचारधारा में राह ढूंढती है और यही वामपंथी विचारधारा की असली खुराक है…..

अब देखिए, बंगाल में दशकों तक शासन करने वाली वामपंथी सरकार और अब उसी सोच को आगे बढ़ाने वाली ममता बनर्जी की सरकार हमारे क्रांतिकारियों को लगातार आतंकवादी कह रही है। पश्चिम बंगाल के सरकारी स्‍कूलों के आठवीं कक्षा की किताब में शहीद खुदीराम बोस और प्रफुल्ला चाकी जैसे क्रांतिकारियों को आतंकी बताया गया है। किताब में ‘रिवोल्यूश्नेरी टेररिज्म’ नामक पाठ में इसका जिक्र है। यह बचपन से हमारे बच्‍चों के दिमाग में क्रांतिकारी और आतंकवादी के बीच के फर्क को मिटाने के लिए किया गया एक कुत्सित सरकारी सुनियोजित प्रयास है। इससे बड़े होकर हमारे बच्‍चे मोओवादी-नक्‍सलवादी-जेहादी आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखने वाले साबित होते हैं। आप देखो न, वामपंथियों के गढ़ जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय से पढ़ा हर तथाकथित बुद्धिजीवी, पत्रकार और नौकरशाह मोओवादी-नक्‍सलवादी-जेहादी के प्रति सहानुभूति रखता है। यह उसी रोमिला थापर, विपिनचंद्रा, सुमित सरकार जैसों के द्वारा पढाए गए इतिहास का परिणाम है…..

एक बात और बता दूं, यूपीएससी की परीक्षा में सफल होने वाले नौकरशाह और असफल होने वाले पत्रकार भी (दोनों वर्ग के अधिकांश, न कि सभी) मोओवादी-नक्‍सलवादी-जेहादी से सहानुभूति रखने वाले ही होते हैं। यूपीएससी की तैयारी के लिए उपरोक्‍त कुत्सित वामपंथियों की लिखित पुस्‍तक पढने की एक तरह से अनिवार्यता है। अंग्रेजों की देन ‘कलक्‍टरी’ की यह परीक्षा आजाद भारत के बाद वामपंथी कैडर तैयार करने की फैक्‍टरी साबित हो रही है। मोदी सरकार से मेरी मांग है कि या तो इसमें बडे पैमाने पर आप सुधार करो या फिर इसे पूरी तरह से बंद कर तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला की तरह वर्तमान विश्‍वविद्यालयों को विशेषज्ञ तैयार करने वाले संस्‍थान के रूप में विकसित करो ताकि स्‍नातक और परास्‍नातक की पढ़ाई फिर से महत्‍व पा सके। सत्‍ताधारी कांग्रेस के साथ पिछले 60 साल से गठबंधन करते आ रहे मोओवादी-नक्‍सलवादी-जेहादी से सहानुभूति रखने वाले सरकारी नौकरों और पत्रकारों के कारण यह देश बहुत कुछ भुगत चुका है……

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Posted in नहेरु परिवार - Nehru Family

Sonia Gandhi


Dr. Swamy is opposed to the Rafale deal and feels that it should be scrapped and re-negotiated.
Here are his prime reasons:
1. Rafale was finalised not through commercial negotiation; it was done by private conversations between Sonia Gandhi, her sisters and Carla Bruni, wife of then French president Nicolas Sarkozy.

2. No country outside France has so far bought the Rafale. Some countries had shortlisted it, but rejected it later. We must find out why they did so

3. the kind of money India has pledged to buy the planes, it can actually buy over the entire company that makes them

4. Reports say that Rafale tried to win the contract by giving a subcontract to an influential Indian industrialist.

5. Its performance in terms of fuel consumption etc.  was much higher and unimpressive during the recent Libyan campaign.

6. We must also know why it is so much more expensive than the other competitors. The acquisition cost is roughly US$100 million (2010) while its operational cost hovers around US$16,500 (2012) for every flight-hour. The Saab JAS 39 Gripen, in comparison, costs only US$4,700 per flight-hour to operate.

What's your take on this deal ?
_______________
http://www.outlookindia.com/article/The-Rafale-Deal-Should-Be-Scrapped-And-Renegotiated/291635

Dr. Swamy is opposed to the Rafale deal and feels that it should be scrapped and re-negotiated.
Here are his prime reasons:
1. Rafale was finalised not through commercial negotiation; it was done by private conversations between Sonia Gandhi, her sisters and Carla Bruni, wife of then French president Nicolas Sarkozy.

2. No country outside France has so far bought the Rafale. Some countries had shortlisted it, but rejected it later. We must find out why they did so

3. the kind of money India has pledged to buy the planes, it can actually buy over the entire company that makes them

4. Reports say that Rafale tried to win the contract by giving a subcontract to an influential Indian industrialist.

5. Its performance in terms of fuel consumption etc. was much higher and unimpressive during the recent Libyan campaign.

6. We must also know why it is so much more expensive than the other competitors. The acquisition cost is roughly US$100 million (2010) while its operational cost hovers around US$16,500 (2012) for every flight-hour. The Saab JAS 39 Gripen, in comparison, costs only US$4,700 per flight-hour to operate.

What’s your take on this deal ?
_______________
http://www.outlookindia.com/article/The-Rafale-Deal-Should-Be-Scrapped-And-Renegotiated/291635

Posted in जीवन चरित्र, भारत का गुप्त इतिहास- Bharat Ka rahasyamay Itihaas

महाराज जसवन्त सिंह जी की हाडी रानी


महाराज जसवन्त सिंह जी की हाडी रानी

दिल्ली की और से शाहजहाँ और औरंगजेब की और से
कई सफल सैनिक अभियानों का नेतृत्व
किया था तथा जब तक वे जीवित रहे तब तक औरंगजेब
को कभी हिन्दू धर्म
विरोधी कार्य नही करने दिया चाहे वह मन्दिर
तोड़ना हो या हिन्दुओं पर जजिया कर लगना हो ,
जसवंत सिंह जी के जीते जी औरंगजेब इन कार्यों में
कभी सफल नही हो सका | २८ नवम्बर १६७८
को काबुल में जसवंत सिंह के निधन का समाचार जब
औरंगजेब ने सुना तब उसने कहा ” आज धर्म विरोध
का द्वार टूट गया है ” |
ये वही जसवंत सिंह थे जिन्होंने एक वीर व निडर
बालक द्वारा जोधपुर सेना के ऊँटों की व उन्हें चराने
वालों की गर्दन काटने पर सजा के बदले उस वीर बालक
की स्पष्टवादिता,वीरता और निडरता देख उसे
सम्मान के साथ अपना अंगरक्षक बनाया और बाद में
अपना सेनापति भी | यह वीर बालक कोई और
नही इतिहास में वीरता के साथ स्वामिभक्ति के रूप
में प्रसिद्ध वीर
शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ था |
महाराज जसवंत सिंह जिस तरह से वीर पुरूष थे ठीक
उसी तरह उनकी हाड़ी रानी जो बूंदी के शासक
शत्रुशाल हाड़ा की पुत्री थी भी अपनी आन-बाण
की पक्की थी |
१६५७ ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके पुत्रों ने
दिल्ली की बादशाहत के लिए विद्रोह कर
दिया अतः उनमे एक
पुत्र औरंगजेब का विद्रोह दबाने हेतु शाजहाँ ने जसवंत
सिंह को मुग़ल सेनापति कासिम खां सहित भेजा |
उज्जेन से १५
मील दूर धनपत के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ लेकिन धूर्त
और कूटनीति में माहिर औरंगजेब की कूटनीति के चलते
मुग़ल
सेना के सेनापति कासिम खां सहित १५ अन्य मुग़ल
अमीर भी औरंगजेब से मिल गए | अतः राजपूत
सरदारों ने शाही सेना के मुस्लिम अफसरों के औरंगजेब
से मिलने व
मराठा सैनिको के भी भाग जाने के मध्य नजर युद्ध
की भयंकरता व परिस्थितियों को देखकर
ज्यादा घायल हो चुके महाराज जसवंत सिंह
जी को न चाहते हुए भी जबरजस्ती घोडे पर
बिठा ६०० राजपूत सैनिकों के साथ जोधपुर
रवाना कर दिया और उनके स्थान पर रतलाम नरेश
रतन सिंह को अपना नायक नियुक्त कर औरंगजेब के
साथ युद्ध कर सभी ने वीर गति प्राप्त की |इस युद्ध में
औरग्जेब
की विजय हुयी |
महाराजा जसवंत सिंह जी के जोधपुर पहुँचने की ख़बर
जब किलेदारों ने महारानी जसवंत दे को दे महाराज
के स्वागत
की तैयारियों का अनुरोध किया लेकिन महारानी ने
किलेदारों को किले के दरवाजे बंद करने के आदेश दे
जसवंत सिंह को कहला भेजा कि युद्ध से हारकर
जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह
नही होती साथ अपनी सास राजमाता से
कहा कि आपके पुत्र ने यदि युद्ध में लड़ते हुए
वीरगति को प्राप्त किया होता तो मुझे गर्व
होता और में अपने आप को धन्य समझती | लेकिन आपके
पुत्र ने तो पुरे राठौड़
वंश के साथ-साथ मेरे हाड़ा वंश को भी कलंकित कर
दिया |
आख़िर महाराजा द्वारा रानी को विश्वास दिलाने
के बाद कि मै युद्ध से कायर की तरह भाग कर
नही आया बल्कि मै
तो सेन्य-संसाधन जुटाने आया हूँ तब रानी ने किले के
दरवाजे खुलवाये | लेकिन तब भी रानी ने
महाराजा को चाँदी के बर्तनों की बजाय लकड़ी के
बर्तनों में खाना परोसा और महाराजा द्वारा कारण
पूछने पर बताया कि कही बर्तनों के टकराने
की आवाज को आप तलवारों की खनखनाहट समझ डर
न जाए इसलिए आपको लकड़ी के बर्तनों में
खाना परोसा गया है | रानी के आन-बान युक्त व्यंग्य
बाण रूपी शब्द सुनकर महाराज को अपनी रानी पर
बड़ा गर्व हुआ |
ज्ञात रहे इसी हाड़ी रानी की भतीजी जो सलुम्बर
के रावत रत्न िसह जी चुण्डावत की रानी थी ने युद्ध
में जाते अपने पति द्वारा निशानी मांगने पर
अपना सिर काट कर निशानी के तौर पर भेज
दिया था |

महाराज जसवन्त सिंह जी की हाडी रानी
े
दिल्ली की और से शाहजहाँ और औरंगजेब की और से
कई सफल सैनिक अभियानों का नेतृत्व
किया था तथा जब तक वे जीवित रहे तब तक औरंगजेब
को कभी हिन्दू धर्म
विरोधी कार्य नही करने दिया चाहे वह मन्दिर
तोड़ना हो या हिन्दुओं पर जजिया कर लगना हो ,
जसवंत सिंह जी के जीते जी औरंगजेब इन कार्यों में
कभी सफल नही हो सका | २८ नवम्बर १६७८
को काबुल में जसवंत सिंह के निधन का समाचार जब
औरंगजेब ने सुना तब उसने कहा " आज धर्म विरोध
का द्वार टूट गया है " |
ये वही जसवंत सिंह थे जिन्होंने एक वीर व निडर
बालक द्वारा जोधपुर सेना के ऊँटों की व उन्हें चराने
वालों की गर्दन काटने पर सजा के बदले उस वीर बालक
की स्पष्टवादिता,वीरता और निडरता देख उसे
सम्मान के साथ अपना अंगरक्षक बनाया और बाद में
अपना सेनापति भी | यह वीर बालक कोई और
नही इतिहास में वीरता के साथ स्वामिभक्ति के रूप
में प्रसिद्ध वीर
शिरोमणि दुर्गादास राठौड़ था |
महाराज जसवंत सिंह जिस तरह से वीर पुरूष थे ठीक
उसी तरह उनकी हाड़ी रानी जो बूंदी के शासक
शत्रुशाल हाड़ा की पुत्री थी भी अपनी आन-बाण
की पक्की थी |
१६५७ ई. में शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके पुत्रों ने
दिल्ली की बादशाहत के लिए विद्रोह कर
दिया अतः उनमे एक
पुत्र औरंगजेब का विद्रोह दबाने हेतु शाजहाँ ने जसवंत
सिंह को मुग़ल सेनापति कासिम खां सहित भेजा |
उज्जेन से १५
मील दूर धनपत के मैदान में भयंकर युद्ध हुआ लेकिन धूर्त
और कूटनीति में माहिर औरंगजेब की कूटनीति के चलते
मुग़ल
सेना के सेनापति कासिम खां सहित १५ अन्य मुग़ल
अमीर भी औरंगजेब से मिल गए | अतः राजपूत
सरदारों ने शाही सेना के मुस्लिम अफसरों के औरंगजेब
से मिलने व
मराठा सैनिको के भी भाग जाने के मध्य नजर युद्ध
की भयंकरता व परिस्थितियों को देखकर
ज्यादा घायल हो चुके महाराज जसवंत सिंह
जी को न चाहते हुए भी जबरजस्ती घोडे पर
बिठा ६०० राजपूत सैनिकों के साथ जोधपुर
रवाना कर दिया और उनके स्थान पर रतलाम नरेश
रतन सिंह को अपना नायक नियुक्त कर औरंगजेब के
साथ युद्ध कर सभी ने वीर गति प्राप्त की |इस युद्ध में
औरग्जेब
की विजय हुयी |
महाराजा जसवंत सिंह जी के जोधपुर पहुँचने की ख़बर
जब किलेदारों ने महारानी जसवंत दे को दे महाराज
के स्वागत
की तैयारियों का अनुरोध किया लेकिन महारानी ने
किलेदारों को किले के दरवाजे बंद करने के आदेश दे
जसवंत सिंह को कहला भेजा कि युद्ध से हारकर
जीवित आए राजा के लिए किले में कोई जगह
नही होती साथ अपनी सास राजमाता से
कहा कि आपके पुत्र ने यदि युद्ध में लड़ते हुए
वीरगति को प्राप्त किया होता तो मुझे गर्व
होता और में अपने आप को धन्य समझती | लेकिन आपके
पुत्र ने तो पुरे राठौड़
वंश के साथ-साथ मेरे हाड़ा वंश को भी कलंकित कर
दिया |
आख़िर महाराजा द्वारा रानी को विश्वास दिलाने
के बाद कि मै युद्ध से कायर की तरह भाग कर
नही आया बल्कि मै
तो सेन्य-संसाधन जुटाने आया हूँ तब रानी ने किले के
दरवाजे खुलवाये | लेकिन तब भी रानी ने
महाराजा को चाँदी के बर्तनों की बजाय लकड़ी के
बर्तनों में खाना परोसा और महाराजा द्वारा कारण
पूछने पर बताया कि कही बर्तनों के टकराने
की आवाज को आप तलवारों की खनखनाहट समझ डर
न जाए इसलिए आपको लकड़ी के बर्तनों में
खाना परोसा गया है | रानी के आन-बान युक्त व्यंग्य
बाण रूपी शब्द सुनकर महाराज को अपनी रानी पर
बड़ा गर्व हुआ |
ज्ञात रहे इसी हाड़ी रानी की भतीजी जो सलुम्बर
के रावत रत्न िसह जी चुण्डावत की रानी थी ने युद्ध
में जाते अपने पति द्वारा निशानी मांगने पर
अपना सिर काट कर निशानी के तौर पर भेज
दिया था |
Posted in जीवन चरित्र

राजपूताना रायफल


एक बार अकबर ने चित्तोडगढ पर आक्रमण करने से पहले
जयमल मेरतिया के पास यह संदेस भेजा की तू चितोरगर
मेरे आदीन कर दे में तेरे
को यहाँ का राजा बना दूंगा उस वक्त चित्तोड़ के
राजा उदय सिंह ने किले की चाबी जयमल को दे कर
चले गए थे ! इस संदश के बदले अकबर को यहे संदश
बेजा की —-
हे गढ़ म्हारो हू धणी , असुर फिर किमआन !
कुंजी गढ़ चितोर री दिवि मुझ दीवान!
ये गढ़ मेरा है मैइसका मालिक हु, तेरी सता मै इस पर
नहीं चलने दूंगा, चितोड़ की चाबी दीवान [राजा] ने
मेरे को दी है !!११

एक बार अकबर ने चित्तोडगढ पर आक्रमण करने से पहले
जयमल मेरतिया के पास यह संदेस भेजा की तू चितोरगर
मेरे आदीन कर दे में तेरे
को यहाँ का राजा बना दूंगा उस वक्त चित्तोड़ के
राजा उदय सिंह ने किले की चाबी जयमल को दे कर
चले गए थे ! इस संदश के बदले अकबर को यहे संदश
बेजा की ----
हे गढ़ म्हारो हू धणी , असुर फिर किमआन !
कुंजी गढ़ चितोर री दिवि मुझ दीवान!
ये गढ़ मेरा है मैइसका मालिक हु, तेरी सता मै इस पर
नहीं चलने दूंगा, चितोड़ की चाबी दीवान [राजा] ने
मेरे को दी है !!११