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Two Shiva One Vishnu Temple One Spot Puthia Bangladesh


Ramani's blog

Two Shiva Temples and one dedicated to Lord Jagannath is in Puthia, Bangladesh.

Puthia Temple Complex consists of a cluster of notable old Hindu temples in Puthia UpazilaRajshahi DivisionBangladesh. Located 23 km to the east of Rajshahi city, it has the largest number of historic temples in Bangladesh.

Shiva Temple,Puhia,Bangladesh.jpgShiva Temple,Puhia,Bangladesh.

Panharatna Govida Temple,Puthia.jpg. Panharatna Govida Temple,Puthia. This grand temple of Puthia, the Govinda Temple was erected in mid-nineteenth century by the queen of Puthia. The temple is dedicated to Lord Krishna, as the Puthia royal family were converted to Vaishnavism by Radhamohana Thakura. The temple has exquisite terracotta ornamentation depicting the divine romance between Krishna and Radha. The temple’s survival is threatened by the newly established college nearby and the lack of conservation efforts

Jagnnath Temple,Puthia.jpg Jagnnath Temple,Puthia.

The temples were built by Hindu Zamindars Rajas of the Puthia Raj family who were noted philanthropists of Rajshahi. The…

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THE COCONUT


THE COCONUT

By Stephen Knapp

The coconut (Nariyala) on top of the kalash is a symbol of the Godhead – the three eyes symbolic of the eyes of Lord Shiva. In India, for success in an important undertaking, the beginning is done with the breaking of a sanctified coconut. All religious functions and rituals start with the worship of the coconut, along with the kalash, since it is regarded as symbolic of Lord Ganesha, the deity who helps in the successful completion of any undertaking.

Sage Vishwamitra is said to have got the first coconut tree grown on this earth by the power of his tapas, or austerities. Its hard shell inspires one to have tolerance and do hard work for attaining success. The coconut is also broken before a deity in the temple, signifying the soul’s breaking out of the shell of the ego. People get strength and improved eyesight by eating its white kernel. The sick and the elderly find its water nourishing and ladies apply its oil for healthy hair. It has glucose, phosphorous, and carbohydrates in good quantity and is also good for diabetes.

Ancient Indian healers used to burn its outer shell to prepare tooth powder, eyebrow creams, and ointments for burns. Every part of the coconut plant is very beneficial to humans. Hence, most Indians consider it a good omen to receive or give coconut fruits as gifts. It is also called shreephal because it denotes prosperity.

THE COCONUT 

By Stephen Knapp 

The coconut (Nariyala) on top of the kalash is a symbol of the Godhead - the three eyes symbolic of the eyes of Lord Shiva. In India, for success in an important undertaking, the beginning is done with the breaking of a sanctified coconut. All religious functions and rituals start with the worship of the coconut, along with the kalash, since it is regarded as symbolic of Lord Ganesha, the deity who helps in the successful completion of any undertaking.

Sage Vishwamitra is said to have got the first coconut tree grown on this earth by the power of his tapas, or austerities. Its hard shell inspires one to have tolerance and do hard work for attaining success. The coconut is also broken before a deity in the temple, signifying the soul's breaking out of the shell of the ego. People get strength and improved eyesight by eating its white kernel. The sick and the elderly find its water nourishing and ladies apply its oil for healthy hair. It has glucose, phosphorous, and carbohydrates in good quantity and is also good for diabetes.

Ancient Indian healers used to burn its outer shell to prepare tooth powder, eyebrow creams, and ointments for burns. Every part of the coconut plant is very beneficial to humans. Hence, most Indians consider it a good omen to receive or give coconut fruits as gifts. It is also called shreephal because it denotes prosperity.
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कर्णवेध संस्कार


कर्णवेध संस्कार

कान में छेद कर देना कर्णवेध संस्कार है। गृह्यसूत्रों के अनुसार यह संस्कार तीसरे या पांचवे वर्ष में कराना योग्य है। आयुवेद के ग्रन्थ सुश्रुत के अनुसार कान के बींधने से अन्त्रवृद्धि (हर्निया) की निवृत्ति होती है। दाईं ओर के अन्त्रवृद्धि को रोकने के लिए दाएं कान को तथा बाईं ओर के अन्त्रवृद्धि को रोकने के लिए बाएं कान को छेदा जाता है।

इस संस्कार में शरीर के संवेदनशील अंगों को अति स्पर्शन या वेधन (नुकीली चीज से दबाव) द्वारा जागृत करके थेलेमस तथा हाइपोथेलेमस ग्रन्थियों को स्वस्थ करते सारे शरीर के अंगों में वह परिपुष्टि भरी जाती है कि वे अंग भद्र ही भद्र ग्रहण हेतु सशक्त होें। बालिकाओं के लिए इसके अतिरिक्त नासिका का भी छेदन किया जाता है।

कर्णवेध संस्कार

 कान में छेद कर देना कर्णवेध संस्कार है। गृह्यसूत्रों के अनुसार यह संस्कार तीसरे या पांचवे वर्ष में कराना योग्य है। आयुवेद के ग्रन्थ सुश्रुत के अनुसार कान के बींधने से अन्त्रवृद्धि (हर्निया) की निवृत्ति होती है। दाईं ओर के अन्त्रवृद्धि को रोकने के लिए दाएं कान को तथा बाईं ओर के अन्त्रवृद्धि को रोकने के लिए बाएं कान को छेदा जाता है।

 इस संस्कार में शरीर के संवेदनशील अंगों को अति स्पर्शन या वेधन (नुकीली चीज से दबाव) द्वारा जागृत करके थेलेमस तथा हाइपोथेलेमस ग्रन्थियों को स्वस्थ करते सारे शरीर के अंगों में वह परिपुष्टि भरी जाती है कि वे अंग भद्र ही भद्र ग्रहण हेतु सशक्त होें। बालिकाओं के लिए इसके अतिरिक्त नासिका का भी छेदन किया जाता है।
 
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उपनयन संस्कार


उपनयन संस्कार

इस संस्कार में यज्ञोपवीत या जनेऊ धारण कराया जाता है। इसके धारण कराने का तात्पर्य यह है कि बालक अब पढ़ने के लायक हो गया है, और उसे आचार्य के पास विद्याध्ययन के लिए व्रत सूत्र में बांधना है। यज्ञोपवीत में तीन सूत्र होते हैं जो तीन ऋणों के सूचक हैं। ब्रह्मचर्य को धारण कर वेदविद्या के अध्ययन से ”ऋषिऋण“ चुकाना है। धर्मपूर्वक गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर सन्तानोत्पत्ति से ”पितृऋण“ और गृहस्थ का त्याग कर देष सेवा के लिए अपने को तैयार करके ”देवऋण“ चुकाना होता है। इन ऋणों को उतारने के लिए ही क्रमषः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आश्रम की योजना वैदिक संस्कृति में की गई है।

बालक-बालिका के पढ़ने योग्य अर्थात् पांचवे से सातवे वर्ष तक यह संस्कार करना उचित है। इस संस्कार के पूर्व बालक को आर्थिक सुविधानुसार तीन दिवस तक दुग्धाहार, श्रीखंडाहार, दलियाहार, खिचड़ी-आहार इन में से किसी एक का चयन कर उसी का सेवन कराना चाहिए।

इस संस्कार में आचार्य की पुरोहितम् भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आचार्य हरहित चाहती सम्भ्रान्त महिलावत अर्थात् जलवत बच्चे की कल्याण की भावना से उसका यज्ञोपवीत कराए। आचार्य की भावना श्रेष्ठ ही श्रेष्ठ बच्चे को बनाने की होनी चाहिए। वह विभिन्न देव भावों से बालक के जीवन को भरने का संकल्प लेते यज्ञोपवीत संस्कार कराता है।

यज्ञोपवीत की महान् शर्त यह है कि आचार्य तथा बच्चा सम-हृदय, सम-चित्त, एकाग्र-मन, सम-अर्थ-सेवी हो। लेकिन इस सब में आचार्य आचार्य हो तथा शिष्य शिष्य हो। आचार्य परिष्कृत बचपन द्वारा बालक के सहज बचपन का परिष्कार करे। यह महत्वपूर्ण शर्त है। आचार्य बच्चे के विकास के विषय में सोचते समय अपनी बचपनी अवस्था का ध्यान अवश्य ही रखे। इस संस्कार के द्वारा आचार्य तथा बालक शिक्षा देने-लेने हेतु एक दूसरे का सम-वरण करते हैं। यह बिल्कुल उसी प्रकार होता है जैसे मां गर्भ में अपने शिशु का और शिशु अपनी मां का वरण करता है।

उपनयन संस्कार

 इस संस्कार में यज्ञोपवीत या जनेऊ धारण कराया जाता है। इसके धारण कराने का तात्पर्य यह है कि बालक अब पढ़ने के लायक हो गया है, और उसे आचार्य के पास विद्याध्ययन के लिए व्रत सूत्र में बांधना है। यज्ञोपवीत में तीन सूत्र होते हैं जो तीन ऋणों के सूचक हैं। ब्रह्मचर्य को धारण कर वेदविद्या के अध्ययन से ”ऋषिऋण“ चुकाना है। धर्मपूर्वक गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर सन्तानोत्पत्ति से ”पितृऋण“ और गृहस्थ का त्याग कर देष सेवा के लिए अपने को तैयार करके ”देवऋण“ चुकाना होता है। इन ऋणों को उतारने के लिए ही क्रमषः ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ आश्रम की योजना वैदिक संस्कृति में की गई है।

 बालक-बालिका के पढ़ने योग्य अर्थात् पांचवे से सातवे वर्ष तक यह संस्कार करना उचित है। इस संस्कार के पूर्व बालक को आर्थिक सुविधानुसार तीन दिवस तक दुग्धाहार, श्रीखंडाहार, दलियाहार, खिचड़ी-आहार इन में से किसी एक का चयन कर उसी का सेवन कराना चाहिए।

 इस संस्कार में आचार्य की पुरोहितम् भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है। आचार्य हरहित चाहती सम्भ्रान्त महिलावत अर्थात् जलवत बच्चे की कल्याण की भावना से उसका यज्ञोपवीत कराए। आचार्य की भावना श्रेष्ठ ही श्रेष्ठ बच्चे को बनाने की होनी चाहिए। वह विभिन्न देव भावों से बालक के जीवन को भरने का संकल्प लेते यज्ञोपवीत संस्कार कराता है।

 यज्ञोपवीत की महान् शर्त यह है कि आचार्य तथा बच्चा सम-हृदय, सम-चित्त, एकाग्र-मन, सम-अर्थ-सेवी हो। लेकिन इस सब में आचार्य आचार्य हो तथा शिष्य शिष्य हो। आचार्य परिष्कृत बचपन द्वारा बालक के सहज बचपन का परिष्कार करे। यह महत्वपूर्ण शर्त है। आचार्य बच्चे के विकास के विषय में सोचते समय अपनी बचपनी अवस्था का ध्यान अवश्य ही रखे। इस संस्कार के द्वारा आचार्य तथा बालक शिक्षा देने-लेने हेतु एक दूसरे का सम-वरण करते हैं। यह बिल्कुल उसी प्रकार होता है जैसे मां गर्भ में अपने शिशु का और शिशु अपनी मां का वरण करता है।
 
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Dinosaur Makara Bhagavatha Purana Sighted


Ramani's blog

There is a charge against me,and people who quote Puaranas and Vedas, that I belong to ‘I told you so’ group.

That is when a scientific theory s unearthed  I write that this is the Vedas or Puranas.

Indra, Hindu God riding Makara Angkor Complex,jpg Indra, Hindu God riding Makara Angkor Complex,Cambodia.

They ask me why did not I say this before the discovery by Science?

My answer is that I wait till Science talks non sense and if it is  so I quote the relevant material from the Vedas/Puranas..

I have articles where I say that there are  more planes of existence than the seven confirmed by physics.

One has to await Science’s(?) confirmation.

The Speed of Light, use of UFOs….

Most of the things said by the Hindu texts looked ridiculous some time back and they are facts.

I have come across an interesting information on Makara.

Makara sighted in Vietnam.jpg Makara sighted in Vietnam.

Makara (Sanskrit:…

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Value Of Pi To 31 Decimal Places In Krishna Stuthi


Ramani's blog

The Mantras of Hinduism were grasped intuitively from the Ether, by the Seers,Rishis.

As such they have mystical properties in them.

Value of Pi in Krishna Stuthi.jpg Value of Pi in Krishna Stuthi.

They deliver results  whether you know tier meaning or not ; for Fire will burn you whether you know it would or not.

It helps to know the meaning for the spiritually inclined.

And for the disbeliever, the mantras are nothing more than gibberish, at most inane statements.

When one reads the meaning of he Gayatri Mantra, it is not profound, but the results it delivers are unimaginable, when intoned properly.

Some Mantras and Stuthis contain scientific facts.

One such is the Krishna  Stuthi, which contains the value of Pi to thirty-one decimal points.

The Krishna Stuthi.

gopi bhagya madhuvrata
srngiso dadhi sandhiga
khala jivita khatava
gala hala rasandara

While this verse is a type of petition to Krishna, when learning it one…

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તુલસીશ્યામ:


તુલસીશ્યામ:
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જુનાગઢ જિલ્લાનાં ઉનાથી શહેરથી આશરે ૨૯ કિલોમીટર દુર જંગલ માર્ગે આવેલું છે. આ સ્થળ કુદરતી સૌદર્યથી ભરપુર છે કે જયાં ઘોડા ખેલાય છે, હરણાં કુદે છે, ભમરા મીઠો ગુંજારવ કરે છે, અને સિંહ ભયાનક ત્રાડો પાડે છે તેવા લીલા જંગલની વનરાઇઓથી સજાયેલ છે. આમ આ સ્થળ મનને શાંતિ આપે અને હરિલે તેવું છે. જયાં પહોચવા માટે ઉનાથી પાકા ડામર માર્ગે ધોકડવા અને જસાધાર થઇને પહોચી શકાય તેમજ જુનાગઢ શહેરથી તુલસીશ્યામ ૧૨૩ કિલોમીટર દુર છે જયાં વિસાવદર, સતાધાર, ધારી થઇને ડામર માર્ગે પહોચી શકાય છે તેમજ જુનાગઢથી કેશોદ, વેરાવળ, કોડીનાર અને ઉના થઇને પણ તુલસીશ્યામ જઇ શકાય છે. આ અંતર ૧૯૬ કિલોમીટર થાય છે. જે માર્ગે વંથલી, સોમનાથ, ગોરખમઢી અને પ્રાચી જેવા તીર્થો આવે છે.
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ઇતિહાસ, અન્ય આકર્ષણો 
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http://www.kathiyawadikhamir.com/tulsishyam/

હજારો વર્ષથી ભારતની પ્રજા ધર્મનાં સ્વાવલંબનથી જીવતી આવી છે. એથી એ ધર્મસ્થાનકોમાં પ્રજાજીવનનાં ઉત્થાન-પતન અને આશ્વાસ-નિશ્વાસ કંડારાયેલા પડયા છે. ભારતના પ્રજા જીવનનાં ઘડતરના પાયા એ ધર્મસ્થાનકોનાં ઇતિહાસ અને પુરાણોમાં પડ્યા છે. તેવુંજ ગિરનું પ્રાચીન અને…
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