Posted in हिन्दू पतन

कत्लेआम


जो इराक देश आज हालात देख रहा हे उससे भयानक दृश्य भारत ने 700 साल पहले देखा था। हम भले ही भूल जाए पर 700 साल पूर्व जो बर्बरता हमारे पूर्वजो से झेली वो कम नहीं थी : 

1. मीर कसिम ने सिंध में रात को धोखे से घुस कर एक रात में 50000 से ज्यादा हिन्दुओ का कत्लेआम कर सिंध पर कब्ज़ा किया।

2. सोमनाथ मंदिर के अन्दर मोजूद 32500 ब्रह्मिनो के खून से मुहम्मद गजनवी ने परिसर को नहला दिया था।

3. सोमनाथ में लगी भगवान् की मूर्तियों को मुहम्मद गजनवी ने अपने दरबार और शोचालय के सीढियों में लगवा दिया था ताकि वो रोज उनके पैर नीचे आती रहे।

4. औरंगजेब के इस्लाम काबुल करवाने के खुले आदेश के बाद सबसे ज्यादा तबाही आई। कुछ को जबरदस्ती से मुस्लिम बनवाया गया जो आज त्यागी, राठोड, चौधरी, जट, राजावत, भाटी, मोह्यल नाम लगाकर घूम रहे हे।

5. औरंगजेब ने ब्रह्मिनो द्वारा इस्लाम कबूल ना करने पर उन्ह्र गर्म पानी में उकाल कर जिन्दा चमड़ी उतरवाने का फरमान जारी किया। ब्रह्मिनो की शिखाए और जनेउ जलाकर औरंगजेब ने अपने नहाने का पानी गर्म किया।

6. मुहम्मद जलालुदीन ने हर हिन्दू राज्य जीतने पर वहा की लडकियों को उठवा दिया और मीना बाजार और हरम में पंहुचा दी जाती हे।

7. अजयमेरु का सोमेश्वर नाथ शिव मंदिर तोड़कर अजमेर दरगाह खड़ी की गयी साथ ही वैष्णव मंदिर तोड़ ढाई दिन का झोपड़ा तयार किया गया। इनका सबूत हे वहा लगी कलाकृतिया जिस पर हिन्दू देवी देवता स्वस्तिक आदि बने हुए हे।

8. अलाउदीन खिलजी की सेना से धरम और कुल की रक्षा करने के लिए चित्तौड़ की रानी पद्मिनी और 26000 राजपूत वीरंगानो ने अग्नि कुंद में कुदकर जोहर प्रथा निभाई।

9. बहादुर शाह जफ़र की चित्तौड़ पर आक्रमण के बाद फिर मुघ्लो से धरम और स्वभिमान की रक्षा के लिए चितौड़ की रानी कर्णावती ने 18000 राजपूत स्त्रियों के साथ अग्निकुंड में कूद जोहर करना चाहा पर लकड़ी कम पड़ने के कारन बारूद के ढेर के साथ वीरांगनाओ ने खुद को उड़ा दिया।

10. मुहम्मद जलालुदीन के आक्रमण पर चित्तौड़ में फिर महारानी जयमल मेड़तिया ने 12000 राजपूत स्त्रियों के साथ अग्निकुंद में कूद जोहर किया।

एक समय था अरब के पर्शिया से लेकर इंडोनेशिया तक हिन्दू धरम अनुयायी थी कितने करोड़ लाखो की लाशे बिछा दी गयी, कितनी ही स्त्रियों ने बलिदान दिए, कितने लाखो मन्दिर टूटे, कितने तरह के जुल्म हए तब कही आज हम हिन्दू हुए हे।

अपने इतिहास को भूलनेवाल एक सफल भविष्य नहीं बना सकते।

Posted in भारत गौरव - Mera Bharat Mahan

Sulvasutra and Algebra


 
Sulvasutra and Algebra

Arya mathematicians were basically number theorists, and their mathematics an appendage to Astronomy. This was because of the need to advice on the right time to sow seeds in farms or for performing of religious rituals. Naturally most of them were priests, and all mathematical principles were enunciated in the form of verse. Being purely functional, no rigorous proofs were given unlike Greek mathematics.

The difference between Hindu and Greek mathematics was also greater in its focus. While Hindu mathematics was more arithmetic oriented, Greek mathematics was geometric centered. This accounts for the refinement of numerical symbols and great advancement in algebra. The flip side was Hindu geometry was devoid of proofs and was mensuration oriented.

The growth of Hindu mathematics falls into two periods:
The SULVASUTRA period starting roughly from 800 BC to 200 AD 
Astronomical and Mathematical period starting from 400 AD to 1200 AD

SULVASUTRAS

SULVASUTRAS, which means "Rules of the Cord" are supplements of KALPASUTRAS which explain the construction of sacrificial alters.

The main SULVASUTRAS were composed by Baudhayana (about 800 BC), Manava (about 750 BC), Apastamba (about 600 BC), and Katyayana (about 200 BC). The aims very mostly religious, but the contents of the manuals were about geometric shapes such as squares, circles, rectangles an example of which is shown below.

The rope which is stretched across the diagonal of a square produces an area double the size of the original square.
The Indian Mathematicians of the ancient era excelled in Diophantine Equations (probably erroneously credited to Diophantus , because the Vedics were adept at it long before Diophantus), algebraic equations in which only solutions in integers are permitted. 

These ancient Indian mathematicians were interested in very practical aspects of mathematics, such as determining the positions of the stars, developing a PANCHANGA (calendar/almanac), and ordinary mathematics for everyday use, like measurements of land and weights etc

http://ramm.hubpages.com/hub/ANCIENT-INDIAN-MATHEMATICS

Sulvasutra and Algebra

Arya mathematicians were basically number theorists, and their mathematics an appendage to Astronomy. This was because of the need to advice on the right time to sow seeds in farms or for performing of religious rituals. Naturally most of them were priests, and all mathematical principles were enunciated in the form of verse. Being purely functional, no rigorous proofs were given unlike Greek mathematics.

The difference between Hindu and Greek mathematics was also greater in its focus. While Hindu mathematics was more arithmetic oriented, Greek mathematics was geometric centered. This accounts for the refinement of numerical symbols and great advancement in algebra. The flip side was Hindu geometry was devoid of proofs and was mensuration oriented.

The growth of Hindu mathematics falls into two periods:
The SULVASUTRA period starting roughly from 800 BC to 200 AD 
Astronomical and Mathematical period starting from 400 AD to 1200 AD

SULVASUTRAS

SULVASUTRAS, which means “Rules of the Cord” are supplements of KALPASUTRAS which explain the construction of sacrificial alters.

The main SULVASUTRAS were composed by Baudhayana (about 800 BC), Manava (about 750 BC), Apastamba (about 600 BC), and Katyayana (about 200 BC). The aims very mostly religious, but the contents of the manuals were about geometric shapes such as squares, circles, rectangles an example of which is shown below.

The rope which is stretched across the diagonal of a square produces an area double the size of the original square.
The Indian Mathematicians of the ancient era excelled in Diophantine Equations (probably erroneously credited to Diophantus , because the Vedics were adept at it long before Diophantus), algebraic equations in which only solutions in integers are permitted.

These ancient Indian mathematicians were interested in very practical aspects of mathematics, such as determining the positions of the stars, developing a PANCHANGA (calendar/almanac), and ordinary mathematics for everyday use, like measurements of land and weights etc

http://ramm.hubpages.com/hub/ANCIENT-INDIAN-MATHEMATICS

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

बर्बरीक


सेक्यूलर और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग..... खुद को सर्वाधिक ज्ञानवान और बुद्धिमान साबित करते हुए..... अक्सर हम हिन्दुओं को ये समझाने का प्रयास करते हैं कि....

रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी..... और, वे बस काल्पनिक महाकाव्य हैं...!

दरअसल... वे ऐसे कर के .... भगवान और कृष्ण के को काल्पनिक बताना चाहते  हैं... और, साथ ही ये भी प्रमाणित करना चाहते हैं कि..... हम हिन्दू काल्पनिक दुनिया में जीते हैं...!

लेकिन.... हम हिन्दू भी हैं कि....

ऐसे सेक्यूलरों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए..... कहीं न कहीं से ..... सबूत जुगाड़ कर ही लाते हैं....!

जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा....!

उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि.....

महाभारत का युद्घ आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्घ में पाण्डवों के साथ थे....... जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी।

ऐसे समय में भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक ने..... अपनी माता को वचन दिया कि... युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा !

इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे।

परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे ...... ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि..... वह तीन वाण से भला क्या युद्घ लड़ेगा...?????

कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि ......उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है ..तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा।

इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि..... हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं... अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि.... तुम एक बाण से युद्घ का परिणाम बदल सकते हो।

इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके......भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया.।

जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया....।

इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा... क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था...।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्घ में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए..... और,  माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी।

इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की....।

जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया... तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया... जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है।

और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा.....और, श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं।

सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है ....तथा, महाभारत युद्घ को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है,,,,।

भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया... जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा।

============

और, ये सारी घटना ........ आधुनिक वीर बरबरान नामक  जगह पर हुई थी.... जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं...!

अब ये .... जाहिर सी बात है कि .... इस जगह का नाम वीर बरबरान........ वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है...!

आश्चर्य तो इस बात का है कि..... अपने महाभारत काल की गवाही देते हुए.....  वो पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है..... जिसे वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर... अपने वाणों से छेदन किया था... और,  आज भी इन पत्तो में छेद है । ( चित्र संलग्न)

साथ ही.....  सबसे बड़ी बात तो ये है कि.......  जब इस पेड़ के  नए पत्ते भी निकलते है ......तो उनमे भी छेद होता है !

सिर्फ इतना ही नहीं.... बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है...!

अब बोलो सेक्यूलरों ... लग गया ना तुम्हारे मुंह पर ढक्कन ...??????

जय महाकाल...!!!

सेक्यूलर और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग….. खुद को सर्वाधिक ज्ञानवान और बुद्धिमान साबित करते हुए….. अक्सर हम हिन्दुओं को ये समझाने का प्रयास करते हैं कि….

रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी….. और, वे बस काल्पनिक महाकाव्य हैं…!

दरअसल… वे ऐसे कर के …. भगवान और कृष्ण के को काल्पनिक बताना चाहते हैं… और, साथ ही ये भी प्रमाणित करना चाहते हैं कि….. हम हिन्दू काल्पनिक दुनिया में जीते हैं…!

लेकिन…. हम हिन्दू भी हैं कि….

ऐसे सेक्यूलरों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए….. कहीं न कहीं से ….. सबूत जुगाड़ कर ही लाते हैं….!

जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा….!

उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि…..

महाभारत का युद्घ आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्घ में पाण्डवों के साथ थे……. जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी।

ऐसे समय में भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक ने….. अपनी माता को वचन दिया कि… युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा !

इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे।

परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे …… ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि….. वह तीन वाण से भला क्या युद्घ लड़ेगा…?????

कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि ……उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है ..तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा।

इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि….. हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं… अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि…. तुम एक बाण से युद्घ का परिणाम बदल सकते हो।

इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके……भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया.।

जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया….।

इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा… क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था…।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्घ में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए….. और, माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी।

इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की….।

जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया… तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया… जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है।

और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा…..और, श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं।

सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है ….तथा, महाभारत युद्घ को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है,,,,।

भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया… जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा।

============

और, ये सारी घटना …….. आधुनिक वीर बरबरान नामक जगह पर हुई थी…. जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं…!

अब ये …. जाहिर सी बात है कि …. इस जगह का नाम वीर बरबरान…….. वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है…!

आश्चर्य तो इस बात का है कि….. अपने महाभारत काल की गवाही देते हुए….. वो पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है….. जिसे वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर… अपने वाणों से छेदन किया था… और, आज भी इन पत्तो में छेद है । ( चित्र संलग्न)

साथ ही….. सबसे बड़ी बात तो ये है कि……. जब इस पेड़ के नए पत्ते भी निकलते है ……तो उनमे भी छेद होता है !

सिर्फ इतना ही नहीं…. बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है…!

अब बोलो सेक्यूलरों … लग गया ना तुम्हारे मुंह पर ढक्कन …??????

जय महाकाल…!!!

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॥अटक॥


॥अटक॥
हमारी स्मृति में अटक आज भी क्यों अटका हुआ है , इसके पीछे हमारी हजारों वर्ष पुरानी परम्परायें ही कारण हैं ।
तीर्थ स्थान की यात्रा व तीर्थ स्नान का विशेष महत्व है । 
भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी ने भी तीर्थाटन किया था , इनका वर्णन महाभारत में विस्तार से है । 
वर्तमान पाकिस्तान के अटक में सिन्धु तथा कुभा नदियों का संगम स्थल है , दोनों ही नदियों के नाम ऋग्वेद में मिलते हैं । 
यह स्थल भी हमारा प्राचीन तीर्थ-स्थल है । 
सिन्धु का जल साफ श्वेत तथा कुभा का जल मटमैला कृष्ण है ।
कुभा नदी को ही काबुल नदी कहते हैं ।

ऋग्वेद १०.७५ के साथ ही एक मन्त्र उच्चरित किया जाता है –

“सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ।।”

त्रिस्थली के मत से यह आश्वलायन शाखा का पूरक श्रुति वचन है ।
तीर्थचिन्तामणि ने इसे ऋग्वेद का मन्त्र माना है ।
स्कन्दपुराण ने इसे श्रुति कहा है ।
काशीखण्ड, ७/५४ – ‘श्रुतिभि: परिपठ्येते सितासिते सरिद्वरे । 
तत्राप्लुतांगा ह्यमृतं भवन्तीति विनिश्चितम्’||
जो लोग श्वेत और कृष्ण दो नदियों के मिलन पर स्नान करते हैं, वे स्वर्ग को उठते हैं; जो धीर लोग वहाँ अपना शरीर त्याग करते हैं,
वे अमृतत्व को पाते हैं ।

॥अटक॥
हमारी स्मृति में  अटक  आज भी क्यों अटका हुआ है , इसके पीछे हमारी हजारों वर्ष पुरानी परम्परायें  ही  कारण  हैं ।
तीर्थ स्थान की यात्रा व तीर्थ स्नान का विशेष महत्व है । 
भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े भाई  बलराम जी ने भी तीर्थाटन किया था  , इनका वर्णन महाभारत में विस्तार से है । 
वर्तमान पाकिस्तान के अटक में  सिन्धु  तथा  कुभा नदियों का संगम स्थल है , दोनों ही नदियों के नाम ऋग्वेद में  मिलते हैं । 
यह स्थल भी हमारा प्राचीन तीर्थ-स्थल  है  । 
सिन्धु का जल  साफ श्वेत  तथा  कुभा का जल मटमैला कृष्ण  है ।
कुभा नदी को ही काबुल नदी कहते हैं ।

 ऋग्वेद १०.७५  के  साथ  ही एक मन्त्र उच्चरित किया जाता है -

"सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं  भजन्ते  ।।"

त्रिस्थली के मत से यह आश्वलायन शाखा का पूरक श्रुति वचन है ।
तीर्थचिन्तामणि ने इसे ऋग्वेद का मन्त्र माना है ।
स्कन्दपुराण ने इसे श्रुति कहा है ।
काशीखण्ड, ७/५४  - 'श्रुतिभि: परिपठ्येते सितासिते सरिद्वरे । 
तत्राप्लुतांगा ह्यमृतं भवन्तीति विनिश्चितम्'||
जो लोग श्वेत और कृष्ण दो नदियों के मिलन पर स्नान करते हैं, वे स्वर्ग को उठते हैं; जो धीर लोग वहाँ अपना शरीर त्याग करते हैं,
वे अमृतत्व को पाते हैं ।
 
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4,000 Year Old Vishnu Statue Discovered in Vietnam


4,000 Year Old Vishnu Statue Discovered in Vietnam

 
 

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A recent news report from Vietnam features an exquisite and very ancient sculpture of Lord Vishnu. According to a press release from the Communist Party of Vietnam’s Central Committee (CPVCC) the Vishnu sculpture is described as “Vishnu stone head from Oc Eo culture, dated back 4,000-3,500 years.” Recently the Government of Vietnam, despite its official Communist doctrine, has developed many programs and projects highlighting Vietnam’s ancient religious heritage. Its scholarly and archeological research and investigations are legitimate and its conclusions are authoritative. This discovery of a 4,000 to 3,500 year old Vishnu sculpture is truly historic and it sheds new light upon our understanding of the history of not only Hinduism but of the entire world.

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Copper form of Vishnu from Oc Eo culture

The fact is there are no other ‘officially’ recognized Vedic artifacts that have been dated back to such an early date. This would make Vietnam home to the world’s most ancient Vedic artifact. While there are indeed many other ancient artifacts that represent the same Deity, they are not presented in the ‘Indic’ tradition and cannot be directly recognized as the Vishnu of the Indic Vaishnava tradition.

The 4000-3500 year old Vietnamese Vishnu sculpture is part of an exhibit featuring some of Vietnam’s most ancient artifacts. It was discovered in the region of Southern Vietnam’s Mekong Delta. The Mekong (Ma Ganga) River is named after the Ganges River of India. The entire region was once the home to several ancient and prosperous Vedic Kingdoms and many intriguing and unique Vedic artifacts have been discovered.

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Vishnu stone head from Oc Eo culture, dated back 4,000-3,500 years.

The Vishnu sculpture was officially presented during the 5th Quang Nam Heritage Festival which opened on June 21, 2013 in Hoi An City. The exhibition highlights many ancient objects dated from the Dong Son – Sa Huynh – Oc Eo eras of Vietnam’s ancient history.

“Entitled “Dong Son – Sa Huynh – Oc Eo cultures”, the exhibition put on display over 1,000 ancient objects which come from across the country and are made from diverse materials, from pottery to copper, including jewelry and farming tools, from the pre-ancient period belonging to the three cultures.

The significance of this discovery cannot be overestimated. The entire history of Hinduism and Vedic culture, as taught is the academic institutions of the world, has been built upon a false construct. According to mainstream academia Vedic ‘religion’ or Hinduism did not exist until the alleged ‘Aryans’ invaded India circa 1500 BC. An even later date is given to Vaishnavism which is speculated to have been derived from animist Sun worship. Yet here we have a highly evolved art form depicting Lord Vishnu in the Far South East region of Asia dated to somewhere between 2000 BC to 1500 BC.

This completely undermines the entire historic timeline developed by mainstream academia in regards to the development of both Vedic/Hindu civilization and Indian history.

The region of modern India has always been the epicenter of High Vedic/Hindu Civilization and culture. No one anywhere has ever suggested the region of modern Vietnam to be the origin of Hindu civilization yet it is in Vietnam that we now have the world’s most ancient example of Indic style Vedic Vaishnava art. Thus it stands to reason that if Vedic Vaishnava art, culture and religion flourished 4000 years ago in prehistoric Vietnam it was undoubtedly flourishing in ancient India as well.

Once again science and archeology have confirmed the Vedic conclusion. As the Vedic literature states 5000 years ago India was home to a highly evolved and advanced civilization. This civilization was centered on its sacred traditions. The worship of the Supreme Lord Vishnu, Lord Shiva, Lakshmi and Durga was widespread and in fact spanned the entire globe.

These traditions presented themselves in diverse manners, as seen in modern India, yet among this diversity was a commonality based upon the authority of the Vedic scriptures and traditions. The recognizably Indic forms of the Vedic traditions spanned the globe from the Philippines to the Middle East and Siberia to Australia. Yet the same Divinities were worshiped and the same traditions were practiced throughout the world.

The many recent Vedic discoveries from Vietnam are providing a new and sensational view into the authentic history of the world. Not only this, it presents a challenge to Modern India and its leadership. India is home to many startling and amazing artifacts yet they sit ignored and crumbling. In many cases looters and vandals have destroyed many priceless examples of India’s ancient heritage. India’s leading academics and governing bodies are silent and if they do speak of India’s ancient Hindu heritage it is only to cast doubts and disparage India’s indigenous Vedic culture and Hindu traditions.

Astounding and marvelous ruins and artifacts that would be the pride of any other nation and people are, in general, ignored and forgotten and left to crumble into oblivion. Often they are threatened by the efforts of the various Governmental bodies in the name of progress such as the National Highways Authority of India’s (NHAI) recent attempts to destroy a 1000 year old Shiva temple in Tamil Nadu.

It is a great irony that the officially atheistic Communist Government of Vietnam exhibits more pride in its ancient Hindu heritage than the ‘Secular’ Democratic Government of India. The entire South Asian and SE Asian region was once home to many thriving Hindu Kingdoms and civilizations. The Encyclopedia Britannica writes regarding the Indian influence upon these regions “In the realm of politics, Indian influence accompanied the rise of new political entities, which, since they do not readily fall under the Western rubric of “states,” have been called mandalas. The mandala was not so much a territorial unit as a fluid field of power that emanated, in concentric circles, from a central court and depended for its continued authority largely on the court’s ability to balance alliances and to influence the flow of trade and human resources.”

Perhaps today, as India itself is reeling under the onslaught of enforced ‘secularism’ and as Hinduism has been relegated to the realm of just one of many religions, (rather than being recognized as the heart and soul of India,) we are fortunate that the former Hindu lands of Indonesia, Vietnam, Thailand, Myanmar, Laos and Kampuchea are leading the way towards the reclamation of our ancient Vedic heritage.

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Deputy Minister of Culture, Sports and Tourism Huynh Vinh Ai and

representatives from Quang Nam provincial People’s Committee and

related agencies cut the ribbon to open the exhibition.

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Dong Son copper drum, dated back some 2,000 years.

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Copper utensils from Dong Son culture, dated back some 2,500-2,000 years.

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Copper and iron ploughshare from Dong Son culture, dated back some 2,000 years.

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Copper axes from Dong Son culture, dated back some 2,700-2,500 years.

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Pottery from Sa Huynh pottery, dated back some 2,300 years.

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A collection of jewelry from Sa Huynh culture, dated back some 2,300 years.

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Pottery vase from Oc Eo culture

 
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सेक्यूलर और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग…


सेक्यूलर और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग….. खुद को सर्वाधिक ज्ञानवान और बुद्धिमान साबित करते हुए….. अक्सर हम हिन्दुओं को ये समझाने का प्रयास करते हैं कि….

रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी….. और, वे बस काल्पनिक महाकाव्य हैं…!

दरअसल… वे ऐसे कर के …. भगवान और कृष्ण के को काल्पनिक बताना चाहते हैं… और, साथ ही ये भी प्रमाणित करना चाहते हैं कि….. हम हिन्दू काल्पनिक दुनिया में जीते हैं…!

लेकिन…. हम हिन्दू भी हैं कि….

ऐसे सेक्यूलरों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए….. कहीं न कहीं से ….. सबूत जुगाड़ कर ही लाते हैं….!

जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा….!

उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि…..

महाभारत का युद्घ आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्घ में पाण्डवों के साथ थे……. जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी।

ऐसे समय में भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक ने….. अपनी माता को वचन दिया कि… युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा !

इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे।

परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे …… ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि….. वह तीन वाण से भला क्या युद्घ लड़ेगा…?????

कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि ……उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है ..तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा।

इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि….. हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं… अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि…. तुम एक बाण से युद्घ का परिणाम बदल सकते हो।

इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके……भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया.।

जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया….।

इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा… क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था…।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्घ में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए….. और, माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी।

इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की….।

जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया… तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया… जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है।

और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा…..और, श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं।

सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है ….तथा, महाभारत युद्घ को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है,,,,।

भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया… जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा।

============

और, ये सारी घटना …….. आधुनिक वीर बरबरान नामक जगह पर हुई थी…. जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं…!

अब ये …. जाहिर सी बात है कि …. इस जगह का नाम वीर बरबरान…….. वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है…!

आश्चर्य तो इस बात का है कि….. अपने महाभारत काल की गवाही देते हुए….. वो पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है….. जिसे वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर… अपने वाणों से छेदन किया था… और, आज भी इन पत्तो में छेद है । ( चित्र संलग्न)

साथ ही….. सबसे बड़ी बात तो ये है कि……. जब इस पेड़ के नए पत्ते भी निकलते है ……तो उनमे भी छेद होता है !

सिर्फ इतना ही नहीं…. बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है…!

अब बोलो सेक्यूलरों … लग गया ना तुम्हारे मुंह पर ढक्कन …??????

जय महाकाल…!!!

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सेक्यूलर और अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े लोग..... खुद को सर्वाधिक ज्ञानवान और बुद्धिमान साबित करते हुए..... अक्सर हम हिन्दुओं को ये समझाने का प्रयास करते हैं कि....

रामायण और महाभारत जैसी घटनाएं कभी हुई ही नहीं थी..... और, वे बस काल्पनिक महाकाव्य हैं...!

दरअसल... वे ऐसे कर के .... भगवान और कृष्ण के को काल्पनिक बताना चाहते हैं... और, साथ ही ये भी प्रमाणित करना चाहते हैं कि..... हम हिन्दू काल्पनिक दुनिया में जीते हैं...!

लेकिन.... हम हिन्दू भी हैं कि....

ऐसे सेक्यूलरों के मुंह पर तमाचा जड़ने के लिए..... कहीं न कहीं से ..... सबूत जुगाड़ कर ही लाते हैं....!

जिन्होंने थोड़ी भी महाभारत पढ़ी होगी उन्हें वीर बर्बरीक वाला प्रसंग जरूर याद होगा....!

उस प्रसंग में हुआ कुछ यूँ था कि.....

महाभारत का युद्घ आरंभ होने वाला था और भगवान श्री कृष्ण युद्घ में पाण्डवों के साथ थे....... जिससे यह निश्चित जान पड़ रहा था कि कौरव सेना भले ही अधिक शक्तिशाली है, लेकिन जीत पाण्डवों की ही होगी।

ऐसे समय में भीम का पौत्र और घटोत्कच का पुत्र बर्बरीक ने..... अपनी माता को वचन दिया कि... युद्घ में जो पक्ष कमज़ोर होगा वह उनकी ओर से लड़ेगा !

इसके लिए, बर्बरीक ने महादेव को प्रसन्न करके उनसे तीन अजेय बाण प्राप्त किये थे।

परन्तु, भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की योजना का पता चला तब वे ...... ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये।

श्री कृष्ण ने बर्बरीक को उत्तेजित करने हेतु उसका मजाक उड़ाया कि..... वह तीन वाण से भला क्या युद्घ लड़ेगा...?????

कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि ......उसके पास अजेय बाण है और, वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है ..तथा, सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा।

इस पर श्री कृष्ण ने कहा कि..... हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं... अगर, अपने बाण से उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि.... तुम एक बाण से युद्घ का परिणाम बदल सकते हो।

इस पर बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके......भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया.।

जिससे, पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया....।

इसके बाद वो दिव्य बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा... क्योंकि, एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था...।

भगवान श्री कृष्ण जानते थे कि धर्मरक्षा के लिए इस युद्घ में विजय पाण्डवों की होनी चाहिए..... और, माता को दिये वचन के अनुसार अगर बर्बरीक कौरवों की ओर से लड़ेगा तो अधर्म की जीत हो जाएगी।

इसलिए, इस अनिष्ट को रोकने के लिए ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की....।

जब बर्बरीक ने दान देने का वचन दिया... तब श्री कृष्ण ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया... जिससे बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है।

और, बर्बरीक ने ब्राह्मण से वास्तविक परिचय माँगा.....और, श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं।

सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है ....तथा, महाभारत युद्घ को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है,,,,।

भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी करते हुए, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया... जहाँ से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा।

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और, ये सारी घटना ........ आधुनिक वीर बरबरान नामक जगह पर हुई थी.... जो हरियाणा के हिसार जिले में हैं...!

अब ये .... जाहिर सी बात है कि .... इस जगह का नाम वीर बरबरान........ वीर बर्बरीक के नाम पर ही पड़ा है...!

आश्चर्य तो इस बात का है कि..... अपने महाभारत काल की गवाही देते हुए..... वो पीपल का पेड़ आज भी मौजूद है..... जिसे वीर बर्बरीक ने श्री कृष्ण भगवान के कहने पर... अपने वाणों से छेदन किया था... और, आज भी इन पत्तो में छेद है । ( चित्र संलग्न)

साथ ही..... सबसे बड़ी बात तो ये है कि....... जब इस पेड़ के नए पत्ते भी निकलते है ......तो उनमे भी छेद होता है !

सिर्फ इतना ही नहीं.... बल्कि, इसके बीज से उत्पन्न नए पेड़ के भी पत्तों में छेद होता है...!

अब बोलो सेक्यूलरों ... लग गया ना तुम्हारे मुंह पर ढक्कन ...??????

जय महाकाल...!!!

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शंकराचार्य के चार मठ


शंकराचार्य के चार मठ

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नवभारत टाइम्स | Jul 6, 2014, 12.18PM IST

द्वारका में स्थित शारदापीठ के जगद् गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती द्वारा हाल ही में साईं बाबाके बारे में की गई टिप्पणी के विवाद के बाद शंकराचार्य का पद चर्चा में है। बहुत से लोग जानना चाहते हैं कि ये शंकराचार्य कौन होते हैं और इनका महत्व क्या है। इनकी नियुक्ति कैसे होती है और ये क्या करते हैं। विस्तार से जानकारी दे रहे हैंअश्विनी शास्त्री :

प्राचीन भारतीय सनातन परम्परा के विकास और हिंदू धर्म के प्रचार व प्रसार में आदि शंकराचार्य का महान योगदान है। उन्होंने भारतीय सनातन परम्परा को पूरे देश में फैलाने के लिए भारत के चारों कोनों में चार शंकराचार्य मठों की स्थापना की थी। ईसा से पूर्व आठवीं शताब्दी में स्थापित किए गए ये चारों मठ आज भी चार शंकराचार्यों के नेतृत्व में सनातन परम्परा का प्रचार व प्रसार कर रहे हैं। आदि शंकराचार्य ने इन चारों मठों के अलावा पूरे देश में बारह ज्योतिर्लिंगों की भी स्थापना की थी। आदि शंकराचार्य को अद्वैत परम्परा का प्रवर्तक माना जाता है। उनका कहना था कि आत्मा और परमात्मा एक ही हैं। हमें अज्ञानता के कारण ही ये दोनों अलग-अलग प्रतीत होते हैं।

ये मठ गुरु-शिष्य परम्परा के निर्वहन का प्रमुख केंद्र हैं। पूरे भारत में सभी संन्यासी अलग-अलग मठ से जुड़े होते हैं। इन मठों में शिष्यों को संन्यास की दीक्षा दी जाती है। संन्यास लेने के बाद दीक्षित नाम के बाद एक विशेषण लगा दिया जाता है जिससे यह संकेत मिलता है कि यह संन्यासी किस मठ से है और वेद की किस परम्परा का वाहक है। सभी मठ अलग-अलग वेद के प्रचारक होते हैं और इनका एक विशेष महावाक्य होता है। मठों को पीठ भी कहा जाता है। आदि शंकराचार्य ने इन चारों मठों में अपने योग्यतम शिष्यों को मठाधीश बनाया था। यह परम्परा आज भी इन मठों में प्रचलित है। हर मठाधीश शंकराचार्य कहलाता है और अपने जीवनकाल में ही सबसे योग्य शिष्य को उत्तराधिकारी बना देता है।

 

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठ
श्रृंगेरी मठ : यह मठ भारत के दक्षिण में रामेश्वरम् में स्थित है। इसके तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद सरस्वती, भारती, पुरी सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य ‘अहं ब्रह्मास्मि’ है, मठ के तहत ‘यजुर्वेद’ को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य सुरेश्वर थे। वर्तमान में स्वामी भारती कृष्णतीर्थ इसके 36वें मठाधीश हैं।

गोवर्द्धन मठ : गोवर्द्धन मठ भारत उड़ीसा के पुरी में है। गोवर्द्धन मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘आरण्य’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ और इस मठ के तहत ‘ऋगवेद’ को रखा गया है। इस मठ के पहले मठाधीश आदि शंकराचार्य के पहले शिष्य पद्मपाद हुए। वर्तमान में निश्चलानंद सरस्वती इस मठ के 145 वें मठाधीश हैं।

शारदा मठ : शारदा (कालिका) मठ गुजरात में द्वारकाधाम में है। इसके तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘तीर्थ’ और ‘आश्रम’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इस मठ का महावाक्य है ‘तत्त्वमसि’ और इसमें ‘सामवेद’ को रखा गया है। शारदा मठ के पहले मठाधीश हस्तामलक (पृथ्वीधर) थे। हस्तामलक आदि शंकराचार्य के प्रमुख चार शिष्यों में से एक थे। वर्तमान में स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती इसके 79 वें मठाधीश हैं।

ज्योतिर्मठ : ज्योतिर्मठ उत्तराखण्ड के बद्रिकाश्रम में है। ज्योतिर्मठ के तहत दीक्षा लेने वाले संन्यासियों के नाम के बाद ‘गिरि’, ‘पर्वत’ और ‘सागर’ सम्प्रदाय नाम विशेषण लगाया जाता है जिससे उन्हें उस संप्रदाय का संन्यासी माना जाता है। इसका महावाक्य ‘अयमात्मा ब्रह्म’ है। मठ के अंतर्गत अथर्ववेद को रखा गया है। इसके पहले मठाधीश आचार्य तोटक थे। वर्तमान में कृष्णबोधाश्रम इसके 44 वें मठाधीश हैं।

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विश्व के महान विद्वानों की नजर में हमारी श्रीमद्भागवद गीता


विश्व के महान विद्वानों की नजर में हमारी श्रीमद्भागवद गीता

चैत्र कृष्ण पक्ष सप्तमी, कलियुग वर्ष ५११५

‘बुद्धि को हमेशा सूक्ष्म करते हुए महाबुद्धि आत्मा में लगाए रखो और संसार के कर्म अपने स्वभाव के अनुसार सरल रूप से करते रहो।’ – गीता सार

 

महाभारत के अनुसार कुरुक्षेत्र युद्ध में श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्‌गीता का सन्देश अर्जुन को सुनाया था। यह महाभारत के भीष्मपर्व के अन्तर्गत दिया गया एक उपनिषद् है। श्री कृष्ण कहते हैं इसे मैंने सबसे पहले सूर्य से कहा था।

सम्पूर्ण गीता का सार है ‘बुद्धि को हमेशा सूक्ष्म करते हुए महाबुद्धि आत्मा में लगाए रखो और संसार के कर्म अपने स्वभाव के अनुसार सरल रूप से करते रहो।’

श्रीमद्भगवद्‌गीता के बारे में हमारे देश में ही नहीं बल्कि विश्व के अनेक विद्वानों ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की है और वह भी गीता के ज्ञान को सर्वोपरि मानते हैं।

१. अल्बर्ट आइन्स्टाइन

‘जब मैंने गीता पढ़ी तब मैनें विचार किया कि कैसे ईश्वर ने इस ब्रह्माण्ड कि रचना की है, तो मुझे बाकी सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हुआ।’

२. अल्बर्ट श्वाइत्जर

‘श्रीमद्भगवद्‌गीता में मानव की आत्मा का गहन प्रभाव है, जो इसके कार्यों में झलकता है।’

३. अल्ड्स हक्सले

‘श्रीमद्भगवद्‌गीता ने सम्रृद्ध आध्यात्मिक विकास का सबसे सुव्यवस्थित बयान दिया है। यह आज तक के शाश्वत दर्शन का सबसे स्पष्ट और बोधगम्य सार है, इसलिए इसका मूल्य केवल भारत के लिए नही, वरन संपूर्ण मानवता के लिए है।’

४. हेनरी डी थोरो

‘हर सुबह मैं अपने ह्रदय और मस्तिष्क को श्रीमद्भगवद्‌गीता के उस अद्भुत और देवी दर्शन से स्नान कराता हूं जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और इसका साहित्य बहुत छोटा और तुच्छ जान पड़ता है।’

५. थॉमस मर्टन

‘श्रीमद्भगवद्‌गीता को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति, भारत की महान धार्मिक सभ्यता के प्रमुख साहित्यिक प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है।’

६. डॉ. गेद्दीज मैकग्रेगर

‘पाश्चात्य जगत में भारतीय साहित्य का कोई भी ग्रन्थ इतना अधिक उदहृत नहीं होता जितना कि श्रीमद्भगवद्‌गीता, क्योंकि यही सर्वाधिक प्रिय ग्रंथ है।’

७. हर्मन हेस

‘भगवत गीता का अनूठापन जीवन के विवेक की उस सचमुच सुंदर अभिव्यक्ति में है, जिससे दर्शन प्रस्फुटित होकर धर्म में बदल जाता है।’

८. रौल्फ वाल्डो इमर्सन

‘मैं श्रीमद्भगवद्‌गीता का आभारी हूं। मेरे लिए यह सभी पुस्तकों में प्रथम थी, जिसमे कुछ भी छोटा या अनुपयुक्त नहीं किंतु विशाल, शांत, सुसंगत, एक प्राचीन मेधा की आवाज जिसने एक-दूसरे युग और वातावरण में विचार किया था और इस प्रकार उन्हीं प्रश्नों को तय किया था, जो हमें उलझाते हैं।’

स्त्रोत : नईदुनिया

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गौमाता का अधिकार


Bheesham Kumar गौमाता का अधिकार
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दोस्तों भारतीय संविधान की धारा 48 में

प्राविधान किया गया है कि हर राज्य विशेष
कर गायों, बछड़ों तथा अन्य दुधारू और
वाहक पशुओं की नस्ल के परिरक्षण
तथा सुधार के लिए उनके वध पर प्रतिबंध
लगाने के लिए कदम उठाएगा। दुर्भाग्य
रहा कि इस देश का कि संविधान का यह
अनुच्छेद केवल ‘शोपीस’ बनकर रह गया।
क्योंकि देश
का जो पहला प्रधानमंत्री बना था वह स्वयं
मांसाहारी था। इसलिए वह
नही चाहता था कि देश में गोहत्या निषेध
जैसी स्थिति उत्पन्न हो।
11 अगस्त सन 2003 को अटल सरकार ने
देश की आत्मा की पुकार को समझते हुए
संसद में पूर्ण गोहत्या निषेध हेतु एक बिल
पेश किया। तत्कालीन कृषि मंत्री राजनाथ
सिंह ने उक्त विधेयक को पेश
ही किया था कि गोहत्या जारी रखने के
समर्थक दलों ने (कम्युनिस्ट सबसे आगे थे)
इस बिल का जोरदार विरोध आरंभ कर दिया।
शोरगुल इतना अधिक रहा था कि भाजपा के
कई सहयोगी दल भी उसी में शामिल हो गये
थे और एक अच्छी पहल की हत्या करने के
लिए सरकार को विवश होना पड़ा। इस प्रकार
आशा की एक किरण जगते-2 रह गयी।
राजनाथ जी
गौमाता ने अपना काम कर दिया अब आप
अपना ही पेश किया बिल पास करवाकर अटल
जी का सपना पूरा करें
गौमाता को उसका अधिकार दिला दें
दोस्तों इतना शेयर करो की राजनाथ जी
को 11 -8 -2003 याद आजाए
जय गौमाता की
संग्रहकर्ता एंव निवेदक
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया
और सुरेश कुमार