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अंकुरित अनाज और पौष्टिक आहार खायें


 

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^ अंकुरित अनाज और पौष्टिक आहार खायें

अंकुरित भोजन के फायदे :-

1- यह सस्ता व बनाने में आसान है।

2-चना, मूंग, गेहूं, सोयाबीन, मेथी अंकुरित किया जा सकता है।

3- ये आहार आसानी से हमारा शरीर ग्रहण करता है।

4- इसमें विटामिन तथा अन्य पोषक तत्वों की क्षमता बढ़ जाती है।

5- स्वादिष्ट बनाने के लिये अनाज को अंकुरित कर उसमें खीरा, ककडी,टमाटर, प्याज, धनिया, मिर्च, नींबू, तथा नमक मिलायें साथ ही काली मिर्च भी डालें।

6- इन्हे खाने के बाद ये आसानी से पचाकर पुनः भूख लगने की क्षमता को बढ़ा देता है।

7- इसे हम अपने सुबह के नाश्ते में शामिल कर सकते हैं।

अब आप सोच रहे होंगे कि हम शहर में इन कैसे उगायें, तो निराश होने की जरूरत नहीं है आप शहर में भी अपने बगीचे में टेरेस के ऊपर गमलों में हरी सब्जियाँ उगा सकते हैं। ताजी हरी सब्जियों का जूस निकाल कर तुरंत पी सकते हैं। मगर हम लोग सुबह ब्रेड, मक्खन, बाजारी जूस का नाश्ता करते हैं जो प्राकृतिक नहीं है। महंगी फल सब्जियों की तुलना में पत्तेदार हरी सब्जियों में विटामिन, लौह तत्व अधिक होते है जो शरीर को विकसित एवं स्वथ्य बनाये रखने में मदद करता है। इसके पीछे कारण यह है कि पौष्टिक तत्वों का स्त्रोत हैं, हरी पत्तेदार सब्जियों में भरपूर लौह (कैरोटीन) की मात्रा होती है, जो आखों की सुरक्षा के साथ-साथ बच्चों के शारीरिक विकास में सहायक है। गुड, चावल, चिवडा, शहद ,साबुदाना, शक्करकंद, आलू, बेल, केला खजूर, गन्ने का रस, जौ, बाजरा, गेहूं आदि में कार्बोहाइट्रेड की मात्रा अधिक पाई जाती है। पालक, हरीमेथी, चौलाई, बथुआ, सरसों का साग, चने का साग, फूलगोभी, पत्तागोभी इसमें सर्वोत्तम पौष्टिक तत्व मिलते हैं। जैसे चौलाई, बथुआ में कैलशियम, विटामिन, ए, बी.एंव लौह तत्व पाये जाते हैं। कई इलाकों में महुआ, सांवा, पाया जाता है जिसमें कैलशियम, फसफोरस, लौह, कार्बोहाइट्रेड, विटामिन सी पाया जाता है जो गर्भावस्था में महिलाओं की जरूरी है। ग्रामीण इलाकों में यह सब आसानी से मिल जाता है। इन चीजों को हम अपने दैनिक आहार में शामिल कर महिलाओं में खून की कमी को दूर कर सकते हैं। हिमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। अजन्मे बच्चों में शारीरिक व मानसिक दुर्बलता व अविकसितता के दूर किया जा सकता है।

अंकुरण की विधि

1-सर्वप्रथम अंकुरित करने वाले बीजों को कई बार अच्छी तरह पानी से धोकर एक शीशे के जार में भर लें शीशे के जार में बीजों की सतह से लगभग चार गुना पानी भरकर भीगने दें अगले दिन प्रातःकाल बीजों को जार से निकाल कर एक बार पुनः धोकर साफ सूती कपडे में बांधकर उपयुक्त स्थान पर रखें |

2-गर्मियों में कपडे के ऊपर दिन में कई बार ताजा पानी छिडकें ताकि इसमें नमी बनी रहे |

3- गर्मियों में सामान्यतः 24 घंटे में बीज अंकुरित हो उठते हैं सर्दियों में अंकुरित होने में कुछ अधिक समय लग सकता है | अंकुरित बीजों को खाने से पूर्व एक बार अच्छी तरह से धो लें तत्पश्चात इसमें स्वादानुसार हरी धनियाँ, हरी मिर्च, टमाटर, खीरा, ककड़ी काटकर मिला सकते हैं | यथासंभव इसमें नमक न मिलाना ही हितकर है |

ध्यान दें –

1- अंकुरित करने से पूर्व बीजों से मिटटी, कंकड़ पुराने रोगग्रस्त बीज निकलकर साफ कर लें | प्रातः नाश्ते के रूप में अंकुरित अन्न का प्रयोग करें | प्रारंभ में कम मात्रा में लेकर धीरे-धीरे इनकी मात्रा बढ़ाएं |

2-अंकुरित अन्न अच्छी तरह चबाकर खाएं |

3- नियमित रूप से इसका प्रयोग करें |

4- वृद्धजन, जो चबाने में असमर्थ हैं वे अंकुरित बीजों को पीसकर इसका पेस्ट बनाकर खा सकते हैं | ध्यान रहे पेस्ट को भी मुख में कुछ देर रखकर चबाएं ताकि इसमें लार अच्छी तरह से मिल जाय |

लाभ-

1-अंकुरित आहार शरीर को नवजीवन देने वाला अमृतमयी आहार है |

2-अंकुरित अन्न विटामिन तथा खनिज पदार्थों को प्राप्त करने का एक उत्कृष्ट स्रोत है |

3-अंकुरित आहार सप्राण होने के कारण शरीर आसानी से आत्मसात कर लेता है जिस से शरीर उर्जावान बनता है |

4-बीजों के अंकुरित होने के पश्चात् इनमें पाया जाने वाला स्टार्च- ग्लूकोज, फ्रक्टोज एवं माल्टोज में बदल जाता है जिससे न सिर्फ इनके स्वाद में वृद्धि होती है बल्कि इनके पाचक एवं पोषक गुणों में भी वृद्धि हो जाती है |

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Posted in हिन्दू पतन

^ क्या उर्दू नामक कोई भाषा संसार में है?


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^ क्या उर्दू नामक कोई भाषा संसार में है? (Is Urdu a Real Language)
इस लेख को पढ़ ने से पहले कृपया ये प्रश्न स्वय से करे की क्या आपने कभी किसीको उर्दू बोलते हुए देखा है? यदी हा तो ये निश्चित है की उर्दू सुनने में हिंदी जैसी ही लगती है केवल कुछ उटपटांग शब्द उर्दू में आते है!

जैसे की

हिंदी उर्दू
नेताजी का ‘देहांत’ हो गया नेताजी का ‘इंतकाल’ हो गया
मै आपकी ‘प्रतीक्षा’ कर रहा था मै आपका ‘इंतजार’ कर रहा था
‘परीक्षा’ कैसी थी? ‘इम्तिहान’ कैसा था?
आपके रहने का ‘प्रबंध’ हो चूका है आप के रहने का ‘इंतजाम’ हो चूका है
ये मेरी ‘पत्नी’ है ये मेरी ‘बीबी’ है
मै ‘प्रतिशोध’ की आग में जल रहा हु मै ‘इंतकाम’ की आग में जल रहा हु

ये उदाहरण देख कर आप समझ गए की उर्दू की रचना का कंकाल (Skeleton) हिंदी से आया है, केवल हिंदी के स्थान पर अरबी शब्दों का उपयोग किया गया है!जब आप अधिक अध्ययन करेंगे तो ये पता चलेगा की उर्दू नामक कोई भाषा ही नही है! वो तो एक बोली है,, हिंगलिश जैसी!भाषा वो होती है जिसे व्याकरण होता है अपना एक शब्दकोष होता है! भाषा लिखने का एक माध्यम हो सकती है, किन्तु कोई बोली, भाषा का स्थान नही ले सकती क्यों की उसे ना तो व्याकरण होता है ना तो शब्द कोष!ठीक वही बात उर्दू और हिंग्लिश के लिए लागु होती है! ये दोनों एक भेल पूरी जैसी बोलिय है जिन्हें अपना कोई शब्द कोष अथवा व्याकरण नही है! उर्दू में ५०% शब्द हिंदी-संस्कृत के है, २५% अरबी, १०% फारसी, ५% चीनी-मंगोल और तुर्की तथा १०% अंग्रेजी है! अब आप ही बताइए एसी खिचडी बोली कभी कोई भाषा का स्थान ले सकती है?उर्दू के विषय में आश्चर्य जनक जानकारी!
इस चित्र में आप मंगोल सैनिक छावनी अर्थात “ओरडू” (उर्दू इसका भ्रष्ट उच्चार है) का दृश्य देख रहे है! प्राचीन तुर्क-मंगोल वैदिक धर्म को मानते थे, इस लिए उनके सैनिक छावनी में आप “शीव का त्रिशूल” शास्त्र के रूप में देख सकते है! दूसरे छाया चित्र में मंगोल विजेता “चेंगिज खान” अपने “ओरडू” में सेना का निरीक्षण करते हुए!

ओरडू google translate पर जा कर देखे, तो आप जान जाएँगे की तुर्की और मंगोल भाषा में इसका अर्थ है सेना अथवा सैनिक छावनी! हमे गाँधीया सॉरी इंडिया की गाँधी-नेहरु छाप सरकार बताती है की उर्दू नामक एक भारतीय मुस्लिमो की भाषा है!क्या कभी सेना या सैनिक छावनी नामक कोई भाषा हो सकती है?

वो इस्लामी भाषा भी एक अमुस्लिम (Non Muslim) शब्द, ओरडू से (उर्दू) जो चीनी-मंगोल भाषी (मंगोल उर्फ मुघल अमुस्लिम (Non Muslim) थे तथा उनकी मंगोल-चीनी भाषा का इस्लाम की अरब परंपरा से कोई संबंध नही हैhttp://www.facebook.com/media/set/?set=a.362525753836545.90016.100002373698075&type=3) है और जिसका इस्लाम से कोई संबंध नही! इस रहस्य का भेद हम आगे देखेंगे!

चेंगिज खान और उसका पोता हलागु खान ये इस्लाम के भारी शत्रु थे! जिन्होंने इस्लामी खिलाफत में घुसकर ५ करोड मुल्ला मुसलमानों की क़त्ल की थी! ये प्रतिशोध था क्यों की ६०० वर्षों से लगातार (९५० से १२५८) अरब मुस्लिमो द्वारा इन तुर्को और मुघलो को मुस्लिम बनाने के लिए उन पर अति भीषण आक्रमण किये जा रहे थे! इस से पीड़ित होकर प्रतिशोध भावना से ये तुर्क-मुघल टोलिया चेंगिज खान उर्फ तिमू जीनी के नेतृत्व में मुस्लिम प्रदेशो पर टूट पड़ी! आज भी इस्लामी जगत में चेंगिज खान को पाजी, लुटेरा, लफंगा इत्यादि नामो से मुस्लिम इतिहासकार विभूषित करते है!

इन तुर्क मंगोलों की भाषा में सैनिक छावनी को “ओरडू” कहा जाता था! आगे चल कर ये सारे तुर्क और मुघल अरब मुस्लिमो द्वारा छल बल से मृत्य की यातनाए देकर मुस्लिम बनाए गए! उन्हें तलवार की धार पर इस्लाम के अरब कारागार में तो लाया गया पर उनके मंगोल नाम बदल कर सब को अरबी नाम देना संभव नही था! क्योकि १ दिन में जब २ लाख या ५ लाख मुघलो को मुस्लिम बनया गया! उसका नियंत्रण रखना उन अरब मुस्लिमो को संभव नही था! इस लिए उन तुर्क-मुघलो में इस्लाम पूर्व कुछ संस्कार वैसे के वैसे रह गए! जैसे की खान उपनाम जो अमुस्लिम है!
जब कोई मुस्लिम बनता है तो उसे अरब आचार अपनाने पड़ते है! जैसे की महमद, अब्दुल, इब्राहीम, अहमद इत्यादि अरब नाम (जिन्हें लोग मुस्लिम नाम समझते है वो वास्तव में अरब नाम है) अपनाने पड़ते है! दिन में ५ बार अरब मातृभूमि की ओर माथा टेकना पड़ता है (फिर चाहे आप अरब नही हो तो भी)! इस प्रकार सारे तुर्क मुघल उनके इस्लामीकरण के उपरांत अरब देशो के उपग्रह से बन गए जिन्हें अपने आप में कोई अस्तित्व नही था!

अगले २०० वर्षों में ये इन मुगलों ने जो (जो २०० वर्ष पहले तलवार की नोक पर मुस्लिम बनाए गए थे) भारत पर आक्रमण किया! आश्चर्य इस बात का है की जिस इस्लामी जिहाद का रक्त रंजित संदेश जीन मुघल और तुर्को ने भारत के हिंदुओ पर थोपा वे स्वय भी उसी रक्त रंजित जिहाद के भक्ष बन चुके थे! किन्तु इस्लाम के मायावी जेल में जाने पर वो अपना सारा अतीत भूलकर अरब देशो के एक निष्ट गुलाम बन चुके थे!

इस तुर्क-मुघल आक्रमण काल में अनेक हिंदुओ को छल-बल से गुलाम बनाकर सैनिक छावनी (जिसे मंगोल भाषा में ओरडू अर्थात उर्दू) में लाया जाता था! उनपर बलात्कार किये जाते थे! उनकी भाषा जो की बृज भाषा, अवधी हिंदी थी पर प्रतिबंध लगाया जाता था! उन्हें अरबी भाषा (जो की इस्लाम की अधिकृत भाषा है) बोलने पर विवश किया जाता था! आप सोचिए यदी आप को कोई मृत्यु का भय दिखा कर चीनी भाषा में बोलने को कल से कहेंगे, तो क्या आप कल से चीनी भाषा बोल सकोगे?
नही!

ठीक यही बात उन हिंदी भाषी हिंदुओ पर लागु होती है! वो अरबी तो बोल न सके किन्तु भय के कारण उनकी अपनी मतृभाषा में अरबी शब्द फिट करने लगे ताकि अपने प्राण बचा सके! इस से एक ऐसे बोली का जन्म हुआ जो ना तो हिंदी थी ना तो अरबी! असकी वाक्य रचना तो हिंदी से थी किन्तु शब्द सारे अरबी, फारसी, तुर्की और चीनी थे! ज्यो की वो बोली उस सैनिक छावनी में भय के कारण उत्पन्न हुई इस लिए उसे ‘ओरडू” का नाम मिला! “ओरडू” का भ्रष्ट रूप है “उर्दू”!

आगे चल कर इस उर्दू नामक बोली मेंबहुत से अंग्रेजी शब्द भी आ गए जैसे की

अफसर = Officer
बिरादर = Brother
बोरियत = Boring
इत्यादि ……..

मुघल और तुर्क इस भेल पूरी उर्दू नामक बोली को गुलामो की भाषा मानते थे, क्योकि वो अशुद्ध थी! मुघल दरबार की भाषा फारसी थी उर्दू नही! आप जानते है उस ओरडू में जो इन मुघलो के गुलाम थे वो कौन है?

वही जो आज अपनी भाषा उर्दू बताते है! वो हिंदु गुलाम ही आज के भारत के मुस्लिम है! गाँधी-नेहरु हमारे इतहास को गाली देते है (http://www.facebook.com/photo.php?fbid=351945808227873&set=a.341893109233143.83563.100002373698075&type=3&theater) की हिंदु इतहास १००० वर्ष गुलामी का इतिहास है! परंतु ये गुलामी का इतहास उन हिंदुओ का है जो आज १००० वर्ष इस्लाम के अरब कारागृह में सड रहे है! ये गुलाम हिंदु ही आज के भारत और पाकिस्तान के मुस्लिम है! जिन्हें अपने आप में कोई अस्तित्व नही है!

तुर्क, मुघलो को अरब मुस्लिमो ने इस्लाम में लाकर अपना गुलाम बनया! जब इन अरब के मुस्लिम गुलामो ने भारत पर आक्रमण किया तब उन्होंने हिंदुओ को अपना गुलाम बनाया, और अपने खान इत्यादि नाम उन पर थोपे, उनपर उर्दू (अर्थात सैनिक छावनी) में बलात्कार किये!

अर्थात स्पष्ट रूप से देखे तो भारत के मुस्लिम “गुलामो के गुलाम” है! वे ना तो अरब है ना तो मंगोल!

उर्दू एक भाषा है ऐसा प्रचार गाँधी ने किया! क्यों की वे “मुस्लिम एक राष्ट्र है” ऐसा मानते थे! इस लिए भारत के मुस्लिमो की एक भाषा हो यह देखकर उन्होंने उर्दू को “हिन्दुस्तानी” के नाम से प्रसिद्ध किया! महात्माजी गांधीजी अपने व्याख्यान में कहते थे, बादशाह राम, बेगम सीता तथा उस्ताद वसिष्ट (१)! इस प्रकार उन्होंने उर्दू को “हिन्दुस्तानी” के नाम से प्रसिद्ध किया! १९३५ तक तो उर्दू नामक कोई भाषा है इस तर्क से कोई परिचित भी नही था!

गाँधी-नेहरु को मानने वाली अल खान्ग्रेस भी उनके जैसी ही कट्टर है! किन्तु उनका ये सिद्धांत सम्पूर्णतहा असत्य सिद्ध हुआ की मुस्लिम एक राष्ट्र है! यदी वे एक राष्ट्र होते तो बंगलादेश पाकिस्तान से अलग नही होता!

कुछ लोग फेस बुक और अन्य स्थानों पर अपने भाषा ज्ञान में उर्दू को भी जोड़ते है! अर्थात Languages Known में आपने उर्दू को जोड़ा है, तो कृपया तुरंत हटाए, क्यों की यदी आप उसे अपने भाषा बताएँगे तो क्या आप उस ओरडू नामक गुलामो के जेल में थे?

Posted in ज्योतिष - Astrology

नेत्र शक्ति के लिये त्राटक साधना


नेत्र शक्ति के लिये त्राटक साधना
त्राटकके द्वारा मन की एकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपनेसंकल्प को पूर्ण कर लेता है। इससे विचारों का संप्रेषण, दूसरे के मनोभावोंको ज्ञात करना, सम्मोहन, आकर्षण, अदृश्य वस्तु को देखना, दूरस्थ दृश्यों कोजाना जा सकता है।

प्रबल इच्छाशक्ति से साधना करने पर सिद्धियाँस्वयमेव आ जाती हैं। तप में मन की एकाग्रता को प्राप्त करने की अनेकानेकपद्धतियाँ योग शास्त्र में निहित हैं। इनमें ‘त्राटक’ उपासना सर्वोपरि है।हठयोग में इसको दिव्य साधना से संबोधित करते हैं। त्राटक के द्वारा मन कीएकाग्रता, वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से उपासक अपने संकल्प को पूर्ण करलेता है।

इससे विचारों का संप्रेषण, दूसरे के मनोभावों को ज्ञातकरना, सम्मोहन, आकर्षण, अदृश्य वस्तु को देखना, दूरस्थ दृश्यों को जाना जासकता है। यह साधना लगातार तीन महीने तक करने के बाद उसके प्रभावों का अनुभवसाधक को मिलने लगता है। इस साधना में उपासक की असीम श्रद्धा, धैर्य केअतिरिक्त उसकी पवित्रता भी आवश्यक है।
तप में मन की एकाग्रता को प्राप्तकरने की अनेकानेक पद्धतियाँ योग शास्त्र में निहित हैं। इनमें ‘त्राटक’ उपासना सर्वोपरि है। हठयोग में इसे दिव्य साधना कहते हैं। त्राटक के द्वारामन की एकाग्रता,वाणी का प्रभाव व दृष्टि मात्र से संकल्प को पूर्ण कर लेताहै।

विधि :यह सिद्धि रात्रि में अथवा किसी अँधेरे वालेस्थान पर करना चाहिए। प्रतिदिन लगभग एक निश्चित समय पर बीस मिनट तक करनाचाहिए। स्थान शांत एकांत ही रहना चाहिए। साधना करते समय किसी प्रकार काव्यवधान नहीं आए, इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए। शारीरिक शुद्धि वस्वच्छ ढीले कपड़े पहनकर किसी आसन पर बैठ जाइए।

अपने आसन से लगभग तीनफुट की दूरी पर मोमबत्ती अथवा दीपक को आप अपनी आँखों अथवा चेहरे की ऊँचाईपर रखिए। अर्थात एक समान दूरी पर दीपक या मोमबत्ती, जो जलती रहे, जिस परउपासना के समय हवा नहीं लगे व वह बुझे भी नहीं, इस प्रकार रखिए। इसके आगेएकाग्र मन से व स्थिर आँखों से उस ज्योति को देखते रहें। जब तक आँखों मेंकोई अधिक कठिनाई नहीं हो तब तक पलक नहीं गिराएँ। यह क्रम प्रतिदिन जारीरखें। धीरे-धीरे आपको ज्योति का तेज बढ़ता हुआ दिखाई देगा। कुछ दिनों उपरांतआपको ज्योति के प्रकाश के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई देगा।

इस स्थितिके पश्चात उस ज्योति में संकल्पित व्यक्ति व कार्य भी प्रकाशवान होनेलगेगा। इस आकृति के अनुरूप ही घटनाएँ जीवन में घटित होने लगेंगी। इस अवस्थाके साथ ही आपकी आँखों में एक विशिष्ट तरह का तेज आ जाएगा। जब आप किसी परनजरें डालेंगे, तो वह आपके मनोनुकूल कार्य करने लगेगा।

इस सिद्धि काउपयोग सकारात्मक तथा निरापद कार्यों में करने से त्राटक शक्ति की वृद्धिहोने लगती है। दृष्टिमात्र से अग्नि उत्पन्न करने वाले योगियों में भीत्राटक सिद्धि रहती है। इस सिद्धि से मन में एकाग्रता, संकल्प शक्ति वकार्य सिद्धि के योग बनते हैं। कमजोर नेत्र ज्योति वालों को इस साधना कोशनैः-शनैः वृद्धिक्रम में करना चाहिए।

Posted in Sai conspiracy

sai


1) साईं बाबा के नाम के साथ साईं राम ही क्यों कहा जाता है साईं अल्ला या साईं ईसामसीह क्यों नहीं कहा जाता है ?
2) साईं आरती ही क्यों ? साईं नमाज या साईं मिसा(धर्म विशेेष की प्रार्थना) आखिर क्यों नहीं ?
3) साईं गायत्री ही क्यों साईं कुछ अन्य धर्मों का क्यों नहीं !
4) (श्री राम चरित्र मानस की नक़ल करते हुए) साईं चरित्र ही क्यों ? साईं कुरान, बाइबिल,गुरुग्रंथ साहब आदि क्यों नहीं ?
5) साईं पादुका पूजन ही क्यों ? ये केवल सनातन धर्मियों की परंपरा में है !
6) अधिकाँश साईं मंदिरों में ब्राह्मण पुजारी ही क्यों किसी अन्य धर्म का क्यों नहीं ?
7) देवी जागरण की ही तरह साईं जागरण ही क्यों ? किसी अन्य धर्म का अनुगमन क्यों नहीं !
8) सनातन धर्मियों की ही पूजा की नक़ल करते हुए प्रसाद या लड्डुओं का भोग आखिर क्यों किसी अन्य धर्म में भी ऐसा देखा गया है क्या ?

इस प्रकार से सनातन धर्मियों की पूजा पद्धति की सारी नक़ल करते हुए भोले भाले सनातन धर्मियों को समझाया गया है कि साईं बाबा भी भगवान ही हैं, उन्होंने वहाँ जाकर देखा तो सारी नक़ल अपने ही धर्म की थी, इसलिए भक्तों को इस धार्मिक छल का संशय नहीं हो सका ! ये उनके साथ छल हुआ है इसीलिए सनातन धर्मियों का साईं बाबा की ओर ध्यान डाइवर्ट हो जाना स्वाभाविक था!

आज भी वो चाँद मियाँ उर्फ साईं बाबा को अपने सनातन धर्म का देवी देवता मानकर ही पूजते हैं न कि सर्व धर्म समभाव के कारण ! चाँद मियाँ को भगवान मानने को लेकर जो हिन्दू भ्रमित किए गए हैं उन्हें आज भी सच्चाई से दूर रखा जा रहा है ! ये अत्यंत चिंतनीय है !

1) साईं बाबा के नाम के साथ साईं राम ही क्यों कहा जाता है साईं अल्ला या साईं ईसामसीह क्यों नहीं कहा जाता है ?
2) साईं आरती ही क्यों ? साईं नमाज या साईं मिसा(धर्म विशेेष की प्रार्थना) आखिर क्यों नहीं ?
3) साईं गायत्री ही क्यों साईं कुछ अन्य धर्मों का क्यों नहीं !
4) (श्री राम चरित्र मानस की नक़ल करते हुए) साईं चरित्र ही क्यों ? साईं कुरान, बाइबिल,गुरुग्रंथ साहब आदि क्यों नहीं ?
5) साईं पादुका पूजन ही क्यों ? ये केवल सनातन धर्मियों की परंपरा में है !
6) अधिकाँश साईं मंदिरों में ब्राह्मण पुजारी ही क्यों किसी अन्य धर्म का क्यों नहीं ?
7) देवी जागरण की ही तरह साईं जागरण ही क्यों ? किसी अन्य धर्म का अनुगमन क्यों नहीं !
8) सनातन धर्मियों की ही पूजा की नक़ल करते हुए प्रसाद या लड्डुओं का भोग आखिर क्यों किसी अन्य धर्म में भी ऐसा देखा गया है क्या ?

इस प्रकार से सनातन धर्मियों की पूजा पद्धति की सारी नक़ल करते हुए भोले भाले सनातन धर्मियों को समझाया गया है कि साईं बाबा भी भगवान ही हैं, उन्होंने वहाँ जाकर देखा तो सारी नक़ल अपने ही धर्म की थी, इसलिए भक्तों को इस धार्मिक छल का संशय नहीं हो सका ! ये उनके साथ छल हुआ है इसीलिए सनातन धर्मियों का साईं बाबा की ओर ध्यान डाइवर्ट हो जाना स्वाभाविक था!

आज भी वो चाँद मियाँ उर्फ साईं बाबा को अपने सनातन धर्म का देवी देवता मानकर ही पूजते हैं न कि सर्व धर्म समभाव के कारण ! चाँद मियाँ को भगवान मानने को लेकर जो हिन्दू भ्रमित किए गए हैं उन्हें आज भी सच्चाई से दूर रखा जा रहा है ! ये अत्यंत चिंतनीय है !
 
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Posted in Sai conspiracy

क्या वक्फ बोर्ड शिरडीसाई की संपत्ति पर अपना हक जता सकता है?


क्या वक्फ बोर्ड शिरडीसाई की संपत्ति पर अपना हक जता सकता है?

मित्रो….राजनैतिक दुराग्रहवश अथवा अल्पज्ञतावश अथवा एक म्लेक्षसाई की भक्ति के वश होकर कुछ हिन्दुओ के पास , अब साई के विरोध में चल रही लहर के प्रतिरोध में कोई तर्क या तथ्य नहीं है , तो ये लोग व्यर्थ के निराधार, कपोलकल्पित तथ्यो को प्रस्तुत करके हिन्दू युवको को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे है । ऐसा ही एक प्रयास है इन “डेढ़बुद्धियो द्वारा ये कहा जाना कि — ” साई अगर मुस्लिम सिद्ध हो गया तो उसकी संपत्ति वक्फ बोर्ड ले लेगा ” या “वक्फ बोर्ड ने ही साई की संपत्ति को हड़पने के लिए ये साजिश रची है” ।

देखो….भारत में मुसलमानो के जो फ़ौजदारी आदि के विवाद होते है वो इंडियन पैनल के अंतर्गत आते है और इस्लाम से संबन्धित जो सिविल मुकदमे होते है , वो शरीयत के अनुसार चलते है… तो यह साई वाला मामला सिविल का है अतः कानूनी तौर पर ये स्वतः ही शरीयत के अंतर्गत आ जाता है । अतः वक्फ बोर्ड कानूनी तौर पर कितना भी प्रयास कर लेगा किन्तु शरीयत के आधार पर वो शिरडी की संपत्ति में से एक रुपया भी प्राप्त नहीं कर सकता ।

दूसरा — क्या शिरडी मे साई का जो पाखंडसाम्राज्य खड़ा कर रखा है , वहा मुस्लिम नमाज पढ़ते है ? क्या वो मुसलमानो का धार्मिक स्थल रहा है ? क्या साई , शिरडी की संपत्ति को वक्फ बोर्ड को देकर गए थे ?? ऐसे ही अनेक तथ्य है जिनसे प्रत्यक्ष सिद्ध है कि वक्फ बोर्ड किसी भी आधार पर , किसी भी प्रकार से , शिरडी की संपत्ति को प्राप्त नहीं कर सकता।

वक्फ बोर्ड की संपत्ति का स्वामित्व भी संपत्ति अधिनियम के अंतर्गत ही होता है , यानि अगर खुद वक्फ बोर्ड की जमीन पर कोई चर्च या गुरुद्वारा भी बना हो तो उससे अर्जित धन पर अधिकार वक्फ बोर्ड का ही होगा। इसी तरह भारत में कई पीर-फकीरो की मजार है जो मुस्लिम ही सिद्ध है लेकिन उन मजारों पर स्वामित्व हिन्दुओ का ही है और उस मजार पर आने वाले सारे चढ़ावे को ये हिन्दू ही खा जाते है । अगर आप भी किसी पीर की कब्र पर अपना स्वामित्व स्थापित कर ले तो जो भी मूर्ख आकर उस पर चढ़ावा फेंकेंगे उस पर पूर्णतः आपका ही अधिकार होगा। कोई भी वक्फ बोर्ड उस पर अपना दावा नहीं ठोक सकता ।

इन औंधे खोपड़ियों ने कभी संपत्ति अधिनियम देखा भी है ? स्वामित्व का अधिकार क्या है ये जानते भी है ? तुम अगर अपनी हिन्दू प्रेमिका को बुर्का पहनाकर घुमाने ले जाओ तो क्या उस पर वक्फ बोर्ड का अधिकार हो जाएगा? तुम अपने हाथ पर अल्लाह हु अकबर का टेटयू गुदवा लो तो तुम पर वक्फ बोर्ड का अधिकार हो जाएगा? या तुम अपनी गाड़ी पर 786 लिखवाकर उसमे गगनभेदी अल्लाह हु अकबर के नातें चीखते चिल्लाते जाओगे तो क्या वो गाड़ी अहमद बुखारी की हो जाएगी ??

उनका जो अल्लाह है न , तुम्हारे जैसे एक करोड़ साई भी मुसलमानो को अल्लाह से दूर नहीं हटा सकते … ऐसे कर्महींन कुलकलंक निकृष्ट जन्तु केवल हिन्दुओ मे ही जन्म ले रहे है जो एक मुसलमान ईसाई कुत्ते गधे सूअर किसी को भी पूज लेंगे कि कुछ फाइदा हो जाए। अतः इन व्यर्थ की मूर्खतापूर्ण बातौ पर बिलकुल ध्यान न दे…. यह विवाद नहीं बल्कि हिन्दू धर्म के, हिन्दुओ के शुद्धिकरण का पहला शंखनाद है । इससे दूर न भागकर धर्म के भगवान के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कीजिये … इस पुण्यकार्य मे सहभागी बने ..और जो अब वक्फ बोर्ड की बात करे उसके मुख पर इसे चिपकादे । ..

॥ओम्॥ । जय श्री राम ।

‪#‎exposeshirdisai‬
‪#‎bhaktijihad‬

क्या वक्फ बोर्ड शिरडीसाई की संपत्ति पर अपना हक जता सकता है?

मित्रो....राजनैतिक दुराग्रहवश अथवा अल्पज्ञतावश अथवा एक म्लेक्षसाई की भक्ति के वश होकर कुछ हिन्दुओ के पास , अब साई के विरोध में चल रही लहर के प्रतिरोध में कोई तर्क या तथ्य नहीं है , तो ये लोग व्यर्थ के निराधार, कपोलकल्पित तथ्यो को प्रस्तुत करके हिन्दू युवको को भ्रमित करने का प्रयास कर रहे है । ऐसा ही एक प्रयास है इन "डेढ़बुद्धियो द्वारा ये कहा जाना कि --- " साई अगर मुस्लिम सिद्ध हो गया तो उसकी संपत्ति वक्फ बोर्ड ले लेगा " या "वक्फ बोर्ड ने ही साई की संपत्ति को हड़पने के लिए ये साजिश रची है" ।

देखो....भारत में मुसलमानो के जो फ़ौजदारी आदि के विवाद होते है वो इंडियन पैनल के अंतर्गत आते है और इस्लाम से संबन्धित जो सिविल मुकदमे होते है , वो शरीयत के अनुसार चलते है... तो यह साई वाला मामला सिविल का है अतः कानूनी तौर पर ये स्वतः ही शरीयत के अंतर्गत आ जाता है । अतः वक्फ बोर्ड कानूनी तौर पर कितना भी प्रयास कर लेगा किन्तु शरीयत के आधार पर वो शिरडी की संपत्ति में से एक रुपया भी प्राप्त नहीं कर सकता ।

दूसरा -- क्या शिरडी मे साई का जो पाखंडसाम्राज्य खड़ा कर रखा है , वहा मुस्लिम नमाज पढ़ते है ? क्या वो मुसलमानो का धार्मिक स्थल रहा है ? क्या साई , शिरडी की संपत्ति को वक्फ बोर्ड को देकर गए थे ?? ऐसे ही अनेक तथ्य है जिनसे प्रत्यक्ष सिद्ध है कि वक्फ बोर्ड किसी भी आधार पर , किसी भी प्रकार से , शिरडी की संपत्ति को प्राप्त नहीं कर सकता।

वक्फ बोर्ड की संपत्ति का स्वामित्व भी संपत्ति अधिनियम के अंतर्गत ही होता है , यानि अगर खुद वक्फ बोर्ड की जमीन पर कोई चर्च या गुरुद्वारा भी बना हो तो उससे अर्जित धन पर अधिकार वक्फ बोर्ड का ही होगा। इसी तरह भारत में कई पीर-फकीरो की मजार है जो मुस्लिम ही सिद्ध है लेकिन उन मजारों पर स्वामित्व हिन्दुओ का ही है और उस मजार पर आने वाले सारे चढ़ावे को ये हिन्दू ही खा जाते है । अगर आप भी किसी पीर की कब्र पर अपना स्वामित्व स्थापित कर ले तो जो भी मूर्ख आकर उस पर चढ़ावा फेंकेंगे उस पर पूर्णतः आपका ही अधिकार होगा। कोई भी वक्फ बोर्ड उस पर अपना दावा नहीं ठोक सकता ।

इन औंधे खोपड़ियों ने कभी संपत्ति अधिनियम देखा भी है ? स्वामित्व का अधिकार क्या है ये जानते भी है ? तुम अगर अपनी हिन्दू प्रेमिका को बुर्का पहनाकर घुमाने ले जाओ तो क्या उस पर वक्फ बोर्ड का अधिकार हो जाएगा? तुम अपने हाथ पर अल्लाह हु अकबर का टेटयू गुदवा लो तो तुम पर वक्फ बोर्ड का अधिकार हो जाएगा? या तुम अपनी गाड़ी पर 786 लिखवाकर उसमे गगनभेदी अल्लाह हु अकबर के नातें चीखते चिल्लाते जाओगे तो क्या वो गाड़ी अहमद बुखारी की हो जाएगी ??

उनका जो अल्लाह है न , तुम्हारे जैसे एक करोड़ साई भी मुसलमानो को अल्लाह से दूर नहीं हटा सकते ... ऐसे कर्महींन कुलकलंक निकृष्ट जन्तु केवल हिन्दुओ मे ही जन्म ले रहे है जो एक मुसलमान ईसाई कुत्ते गधे सूअर किसी को भी पूज लेंगे कि कुछ फाइदा हो जाए। अतः इन व्यर्थ की मूर्खतापूर्ण बातौ पर बिलकुल ध्यान न दे.... यह विवाद नहीं बल्कि हिन्दू धर्म के, हिन्दुओ के शुद्धिकरण का पहला शंखनाद है । इससे दूर न भागकर धर्म के भगवान के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन कीजिये ... इस पुण्यकार्य मे सहभागी बने ..और जो अब वक्फ बोर्ड की बात करे उसके मुख पर इसे चिपकादे । ..

॥ओम्॥ । जय श्री राम ।

#exposeshirdisai
#bhaktijihad
Posted in हिन्दू पतन

बुध्द


क्या बुध्द मत को महात्मा बुध्द ने जैन मुनियो या तीर्थंकरो से चुराया था-
दिंगम्बर जैन के एक ग्रंथ धर्म परीक्षा अमितगत (जैन हितेषी पुस्तकालय कर्नाटक द्वारा प्रसारित) के पेज नं २५९ की पंत्ति नं २४ पर आया है-
६रूष्ठश्रावारनाथस्य तपस्वीमोगलायन:|
शिष्य:श्रीपार्श्वनाथस्य विदधेबुध्ददर्शनम्||
अर्थात् पार्श्वनाथ के तपस्वी चैले वीरनाथ ने रूष्ट हो कर बुध्द मत प्रकट किया…
इस बात से कुछ संदेह उत्पन्न होते है कि क्या बुध्द मत जैनियो से बौध्दो ने चुराया है ?
क्या महात्मा बुध्द काल्पनिक पात्र है..
क्युकि जैनियो ओर बुध्द की कुछ बाते समान है-
जैसे बुध्द ने खीर खा कर समाधी पाई इसी तरह महावीर ने भी..
महावीर के शरीर मे चक्रवर्ती के चिन्ह थे गौतम के शरीर मे भी यही बताया जाता है|
महावीर को सांप ने काटा तो दुध निकला गौतम को सांप ने काटा तो दूध निकला..
गौतम बिम्बसार के बाग मे ठहरा महावीर भी बिम्बसार के बाग मे ठहरा…
महावीर का सबसे बडा चैला अग्निहोत्र ब्राह्मण था गौत्तम का भी यही बतलाया है..
चंदन वाली नामी स्त्री ने मंगावती साध्वी को इसलिए बूरा कहा कि वो महावीर के साथ अकेली सारी रात रही…
बुध्द ग्रंथ ललितविस्तार मे भी ऐसी ही कहानी है नामी ने मंगावती को इसलिए डाटा कि वो बुध्द के साथ सारी रात रही..इसलिए यहा कहा जा सकता है बुध्द धम्म नकल मात्र है..

Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

महाभारत


 
जाने "महाभारत" को घर में रखने की मनाही क्यूँ???

पहले समय में हर रोज रात को लोग महाभारत के श्लोक को पढ़ उस पर विचार करके ही सोते थे। जिससे घर परिवार में संस्कार बने रहते थे लेकिन जब अंग्रेजों को महाभारत की इस उपयोगिता का पता लगा तो उन्होंने कुछ पाखंडी पंडितों को खरीद कर महाभारत के खिलाफ ये कह कर प्रचार करवाया की महाभारत घर में रखने से घर में ही महाभारत (कलेश) हो जाती है।।

इस तरह की बाते सारे हिन्दू समाज को ''हिजड़ा'' बनाने के लिये कही जाती है ताकि विदेशी अपने ''मनोरथ'' में सफल हो सके ! वास्तव में , महाभारत में वो सब कुछ है जिसकी जरूरत आज 'कलयुग' में है चाहे वो भाई से भाई का ''धोका'' हो या या ''छल'' से सत्य/असत्य को जितना !

अगर यह माना जाये कि ''महाभारत'' रखने से भाइयो में बैर बढ़ता है तो ''पांडवो और कौरव'' में लड़ाई कैसे हो गयी तब तो महाभारत नही लिखी गयी थी ?
बेशक महाभारत कोई धार्मिक ग्रंथ नही है और पुराणो में ''पाखंड'' है और 95% पुजारी वर्ग इनको ही आदर्श मानते है जिसके कारण सारा देश पथ भ्रमित हो गया है !

महाभारत धार्मिक ग्रंथ नही है लेकिन वो ''सत्य'' के साथ खड़े होने की सीख देता है और धर्म गुरु सिखाते है की इनको घर में ''मत'' रखो ! इनका बस चले तो सबके हाथो में एक ''ढोलक'' पकड़ा दे और सबको ''भक्ति रस'', ''विरह रस'' और ''श्रंगार रस'' में डुबो डुबो कर ''नचाये''' चाहे, विदेशी कितने ही घर में घुस जाये लेकिन इनकी ''भक्ति'' ना टूटने पाये !
हमारे यहा कितने ''धर्म गुरुओ'' ने श्री कृष्ण जी के ''योगी स्वरूप'' को सामने लाने के लिये कार्य किया है ? हमारे यहा गीता को अगरबत्ती दिखते है , दीपक जलाते है , ओर पूजा घर में उसको रखते है ,उसके श्लोको को ''रटते और रटाते'' है , जबकि हमको चाहिये था, गीता को खुद समझे और दूसरो को समझाये चाहे उसकी पूजा ना करे लेकिन उसका स्मरण् सदैव करे , चाहे उसको पूजा घर में ना रखे लेकिन उसको पवित्र मन से पड़े और जब शत्रुओ का सामना हो तब जन जन तक इसको पहुचाये !
पर अफसोस यह कार्य हमारे धर्म गुरुओ ने नही बल्कि विदेशियो ने किया और राज किया !कोन कोन से धर्म ग्रंथ ? यही तो समस्या है की कोई भी भगवान के नाम पर कुछ भी लिख देता है और हम पूजना शुरु कर देते है !

वैसे और भी धारणाये प्रचलन में है जैसे , शिव जी की ''नटराज'' वाली मूर्ति भी घर में ना रखे ! इन पाखंडियो से पूछो की इनमे क्या ''भगवानो'' से भी ज्यादा 'बुद्धि' है या फिर यह कही भगवान का ''असली स्वरूप'' छिपाना चाहते है ? जब भगवान लड़ते है या गुस्सा करते है तो यह बात लोग क्यू छिपा कर रखना चाहते है ? क्या इनको भगवान पर ''भरोसा'' नही है??

जाने “महाभारत” को घर में रखने की मनाही क्यूँ???

पहले समय में हर रोज रात को लोग महाभारत के श्लोक को पढ़ उस पर विचार करके ही सोते थे। जिससे घर परिवार में संस्कार बने रहते थे लेकिन जब अंग्रेजों को महाभारत की इस उपयोगिता का पता लगा तो उन्होंने कुछ पाखंडी पंडितों को खरीद कर महाभारत के खिलाफ ये कह कर प्रचार करवाया की महाभारत घर में रखने से घर में ही महाभारत (कलेश) हो जाती है।।

इस तरह की बाते सारे हिन्दू समाज को ”हिजड़ा” बनाने के लिये कही जाती है ताकि विदेशी अपने ”मनोरथ” में सफल हो सके ! वास्तव में , महाभारत में वो सब कुछ है जिसकी जरूरत आज ‘कलयुग’ में है चाहे वो भाई से भाई का ”धोका” हो या या ”छल” से सत्य/असत्य को जितना !

अगर यह माना जाये कि ”महाभारत” रखने से भाइयो में बैर बढ़ता है तो ”पांडवो और कौरव” में लड़ाई कैसे हो गयी तब तो महाभारत नही लिखी गयी थी ?
बेशक महाभारत कोई धार्मिक ग्रंथ नही है और पुराणो में ”पाखंड” है और 95% पुजारी वर्ग इनको ही आदर्श मानते है जिसके कारण सारा देश पथ भ्रमित हो गया है !

महाभारत धार्मिक ग्रंथ नही है लेकिन वो ”सत्य” के साथ खड़े होने की सीख देता है और धर्म गुरु सिखाते है की इनको घर में ”मत” रखो ! इनका बस चले तो सबके हाथो में एक ”ढोलक” पकड़ा दे और सबको ”भक्ति रस”, ”विरह रस” और ”श्रंगार रस” में डुबो डुबो कर ”नचाये”’ चाहे, विदेशी कितने ही घर में घुस जाये लेकिन इनकी ”भक्ति” ना टूटने पाये !
हमारे यहा कितने ”धर्म गुरुओ” ने श्री कृष्ण जी के ”योगी स्वरूप” को सामने लाने के लिये कार्य किया है ? हमारे यहा गीता को अगरबत्ती दिखते है , दीपक जलाते है , ओर पूजा घर में उसको रखते है ,उसके श्लोको को ”रटते और रटाते” है , जबकि हमको चाहिये था, गीता को खुद समझे और दूसरो को समझाये चाहे उसकी पूजा ना करे लेकिन उसका स्मरण् सदैव करे , चाहे उसको पूजा घर में ना रखे लेकिन उसको पवित्र मन से पड़े और जब शत्रुओ का सामना हो तब जन जन तक इसको पहुचाये !
पर अफसोस यह कार्य हमारे धर्म गुरुओ ने नही बल्कि विदेशियो ने किया और राज किया !कोन कोन से धर्म ग्रंथ ? यही तो समस्या है की कोई भी भगवान के नाम पर कुछ भी लिख देता है और हम पूजना शुरु कर देते है !

वैसे और भी धारणाये प्रचलन में है जैसे , शिव जी की ”नटराज” वाली मूर्ति भी घर में ना रखे ! इन पाखंडियो से पूछो की इनमे क्या ”भगवानो” से भी ज्यादा ‘बुद्धि’ है या फिर यह कही भगवान का ”असली स्वरूप” छिपाना चाहते है ? जब भगवान लड़ते है या गुस्सा करते है तो यह बात लोग क्यू छिपा कर रखना चाहते है ? क्या इनको भगवान पर ”भरोसा” नही है??

 
Posted in श्रीमद्‍भगवद्‍गीता

Geeta


मुसलमान अपने धर्मग्रन्थ ‘कुरान’ में कही बातों को मानते है
ईसाई अपने धर्मग्रन्थ ‘बाइबिल’ में कही बातों को मानते है
सिख अपने धर्मग्रन्थ ‘गुरुग्रंथ साहिब’ में कही बातों को मानते है
और एक सनातनी हिन्दू होने के नाते मेरा भी ये फर्ज बनता है कि
मैं अपने धर्मग्रन्थ ‘गीता’ को मानू और मेरे धर्मग्रन्थ ‘गीता’ में लिखा है-

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते है:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

अर्थात, हे भारत, जब जब धर्म का लोप होता है, और अधर्म बढता है तब तब धर्म की रक्षा तथा साधु पुरुषो के कल्याण के लिए मैं अवतार लेकर पापियों और दुष्टो का विनाश करता हूँ ..

साईं को अवतार मानने वाले कृपया बताने का कष्ट करे कि ‘ये चाँद मियां आखिर किन पापियों और दुष्टो का विनाश करके धर्म की रक्षा किया है जो तुमलोग इस मुल्ले को अवतार मान रहे हो’ ???

अंधभक्त हिन्दुओं अगर तुम्हारे अंदर किसी सनातनी हिन्दू का खून होगा तो शायद तुम श्रीमद्भागवत गीता में कही गयी बातों का प्रतिकार नहीं करोगे।।

मुसलमान अपने धर्मग्रन्थ 'कुरान' में कही बातों को मानते है
ईसाई अपने धर्मग्रन्थ 'बाइबिल' में कही बातों को मानते है
सिख अपने धर्मग्रन्थ 'गुरुग्रंथ साहिब' में कही बातों को मानते है
और एक सनातनी हिन्दू होने के नाते मेरा भी ये फर्ज बनता है कि
मैं अपने धर्मग्रन्थ 'गीता' को मानू और मेरे धर्मग्रन्थ 'गीता' में लिखा है-

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कहते है:

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

अर्थात, हे भारत, जब जब धर्म का लोप होता है, और अधर्म बढता है तब तब धर्म की रक्षा तथा साधु पुरुषो के कल्याण के लिए मैं अवतार लेकर पापियों और दुष्टो का विनाश करता हूँ ..

साईं को अवतार मानने वाले कृपया बताने का कष्ट करे कि 'ये चाँद मियां आखिर किन पापियों और दुष्टो का विनाश करके धर्म की रक्षा किया है जो तुमलोग इस मुल्ले को अवतार मान रहे हो' ???

अंधभक्त हिन्दुओं अगर तुम्हारे अंदर किसी सनातनी हिन्दू का खून होगा तो शायद तुम श्रीमद्भागवत गीता में कही गयी बातों का प्रतिकार नहीं करोगे।।