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“शैशवेsभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम्। वार्धके मुनिवृत्तिनां योगेनान्ते तनुत्यजाम्।।” (रघुवंशम्–1.6)


जीवन कैसा हो…..?
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“शैशवेsभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धके मुनिवृत्तिनां योगेनान्ते तनुत्यजाम्।।”
(रघुवंशम्–1.6)

अर्थः—-शैशवकाल में हमें विद्या का अभ्यास करना चाहिए। यौवनकाल में विधिपूर्वक धर्मानुसार सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए। वृद्धावस्था में मुनि की वृत्ति धारण कर लेनी चाहिए और जीवन के अन्तिम काल में योग के द्वारा शरीर का त्याग कर देना चाहिए।

हमारा जीवन व्यवस्थित होना चाहिए। वैदिक संस्कृति, सभ्यता में पूरे मानव-जीवन को व्यवस्थित किया गया है। मानव-जीवन की औसत आयु 100 वर्ष मानकर इसे चार भागों में बाँटा गया हैः—ब्रह्मचर्य-आश्रम, गृहस्थ-आश्रम, वानप्रस्थ-आश्रम और संन्यास-आश्रम। ऐसा व्यवस्थित जीवन किसी अन्य सभ्यता में कहीं नहीं मिलता। इन चारों आश्रमों के कर्त्तव्य-कर्म निर्धारित किए गए। इनकी पृथक्-पृथक् व्याख्या भी की गई।

(1.) जीवन के प्रारम्भिक काल में 1 वर्ष से लेकर 25 वर्ष तक (सामान्य रूप से, आगे-पीछे भी हो सकता है, अपनी व्यवस्था के अनुसार) हमें विद्या का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। जो व्यक्ति इस समय विद्या का अभ्यास नहीं करता, उसका सम्पूर्ण जीवन अस्त-व्यस्त रहता है। वह दीन-हीन बना रहता है, क्योंकि विद्या के बिना इस भूमण्डल में कुछ होता ही नहीं। आचार्य शंकर ने “प्रश्नोत्तररत्नमालिका” में कहा भी है कि मरण क्या है ? इसका उत्तर दिया है कि “मरण मूर्खता है।” विद्या न पढना मूर्खता है और मूर्खता ही मृत्यु है। मूर्ख व्यक्ति को कोई भी नहीं पसन्द करता, इसलिए विद्या का अभ्यास अवश्य करें। विद्याहीन व्यक्ति ही शूद्र हो जाता है।

(2.) जीवन के द्वतीय पडाव पर धर्मानुसार सन्तानोत्पत्ति और धनार्जन करना चाहिए। यह गृहस्थ का काल होता है। आजकल लोग गृहस्थ को मुख्य रूप से स्त्री को भोग की वस्तु समझने लग गए हैं। जबकि गृहस्थ में रहते हुए भी ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है। यदि आप धर्मानुसार सन्तानोत्पत्ति करते हैं तो यह ब्रह्मचर्य का ही रूप है। वैसे भी हमारे शरीर का सबसे अमूल्य वस्तु तो वीर्य ही है। इसकी रक्षा अवश्य करनी चाहिए। दुर्भाग्य से आजकल के डॉक्टर कहने लगे हैं कि वीर्य को निकालने से हानि नहीं होती। यह बहुत बडी मूर्खता है। यदि समाज चरित्रवान् होगा तभी समाज, राष्ट्र आगे बढ पाएगा। नहीं तो बलात्कार जैसी घटनाएँ होती रहेंगी। आज इसके लिए नैतिक-शिक्षा की आवश्यकता है।

(3.) जीवन के तीसरे चरण में अपने जीवन को मुनि की वृत्ति जैसी बना लेना चाहिए। आप जहाँ भी रहे, निर्लेप, निर्द्वन्द्व भाव से रहें। वन में तो जाने से रहे। घर में भी रहते हैं तो घर के कामों में अधिक टोका-टाकी न करें, सलाह अवश्य दें, किन्तु ये विचार अपने मन में रखें कि मेरी बात मान ली ही जानी चाहिए। ऐसी वृत्ति रखेंगे तो पछताने के सिवा और कुछ नहीं मिलेगा। आपके पुत्र-पुत्रवधू, पौत्र अब सभी योग्य हो गए हैं, उन्हें अपना काम स्वतन्त्रतापूर्वक करने दीजिए। हमारा जीवन ऐसा हो कि जैसे तालाब में कमल होता है, निर्लेप। उसके ऊपर कीचड और पानी का कोई प्रभाव नहीं पडता। ऐसा हमारा जीवन होना चाहिए। घर-संसार में रहते हुए भी घर-संसार से पृथक् रहें, वैरागी की तरह। अभिप्राय यह है कि घर में, घर की वस्तुओं में, पुत्र-पौत्रों में रिश्ते-सम्बन्धों में मोह न करें, अनुराग न रखें, प्यार सबसे करें, व्यवहार सबसे करें, बातें करें, किन्तु चिपक न जाएँ । अपना जीवन ऐसा बना लें कि उनके बिना भी आप जी सकें। उनके ऊपर सर्वथा निर्भर न हो जाएँ, ऐसा न कर लें कि उनके बिना जिया न जा सके। कोशिश करें कि अपना काम स्वयं कर लें। इस समय शरीर कमजोर होता है, इसलिए जिह्वा पर नियन्त्रण रखें और सक्रिय (Active) रहें।

(4.) जीवन के अन्तिम पडाव पर 75 वर्ष से ऊपर होने पर आप संन्यासियों की तरह रहें। वैसे नियम तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को संन्यास लेना चाहिए, क्योंकि आपने संन्यास जैसा जीवन बनाया नहीं, तो कम-से-कम घर में भी त्यागपूर्वक रहें। जहाँ जाएँ दूसरों को सही सलाह दें, विद्यालयों में जाकर बच्चों को निश्शुल्क पढाएँ। हो सके तो धार्मिक संस्थाओं में जाकर सेवा करें, योग करें, ध्यान करें, प्राणायाम करें। यदि दान कर सकते हैं तो निर्धन बालकों को पढने की व्यवस्था करें, गुरुकुलों में जाएँ और विद्यादान करें, वहाँ से स्वयं भी कुछ सीखें। यह अन्तिम आश्रम बहुत कठिन है।

“आद्ये वयसि नाधीतं, द्वितीये नार्जितं धनम्।
तृतीये न तपस्तप्तं, चतुर्थे किं करिष्यति ।।”

अर्थः—यह श्लोक भी वही बात कह रहा है, जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। जीवन के प्रथम वय में जिसने विद्या का अध्ययन नहीं किया, द्वितीय अर्थात् गृहस्थ में जिसने धन नहीं कमाया, तृतीय अर्थात् वानप्रस्थ में जिसने अपने शरीर को नहीं तपाया, मुनियों जैसा नहीं बनाया, तो वह चतुर्थ वय में 75 वर्ष के बाद क्या करेगा। दुःखी होगा और क्या करेगा। घर परिवार से कोई सहयोग नहीं मिलेगा। ऐसे लोगों को ही उसके अपने बच्चे सताते हैं।

आइए, हम सब अपना-अपना जीवन वैदिक बनाए, वेदानुकूल जिएँ और जीवन को सार्थक करें। प्रभु करे आप सबके जीवन में खुशियाँ आएँ, धन-सम्पदा से आपका परिवार पूर्ण हों। सुखा सन्तान मिलें, ऐसी हमारी कामना है। धन्यवाद।

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"शैशवेsभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम्।
वार्धके मुनिवृत्तिनां योगेनान्ते तनुत्यजाम्।।"
(रघुवंशम्--1.6)

अर्थः----शैशवकाल में हमें विद्या का अभ्यास करना चाहिए। यौवनकाल में विधिपूर्वक धर्मानुसार सन्तानोत्पत्ति करनी चाहिए। वृद्धावस्था में मुनि की वृत्ति धारण कर लेनी चाहिए और जीवन के अन्तिम काल में योग के द्वारा शरीर का त्याग कर देना चाहिए।

हमारा जीवन व्यवस्थित होना चाहिए। वैदिक संस्कृति, सभ्यता में पूरे मानव-जीवन को व्यवस्थित किया गया है। मानव-जीवन की औसत आयु 100 वर्ष मानकर इसे चार भागों में बाँटा गया हैः---ब्रह्मचर्य-आश्रम, गृहस्थ-आश्रम, वानप्रस्थ-आश्रम और संन्यास-आश्रम। ऐसा व्यवस्थित जीवन किसी अन्य सभ्यता में कहीं नहीं मिलता। इन चारों आश्रमों के कर्त्तव्य-कर्म निर्धारित किए गए। इनकी पृथक्-पृथक् व्याख्या भी की गई।

(1.) जीवन के प्रारम्भिक काल में 1 वर्ष से लेकर 25 वर्ष तक (सामान्य रूप से, आगे-पीछे भी हो सकता है, अपनी व्यवस्था के अनुसार) हमें विद्या का अभ्यास अवश्य करना चाहिए। जो व्यक्ति इस समय विद्या का अभ्यास नहीं करता, उसका सम्पूर्ण जीवन अस्त-व्यस्त रहता है। वह दीन-हीन बना रहता है, क्योंकि विद्या के बिना इस भूमण्डल में कुछ होता ही नहीं। आचार्य शंकर ने "प्रश्नोत्तररत्नमालिका" में कहा भी है कि मरण क्या है ? इसका उत्तर दिया है कि "मरण मूर्खता है।" विद्या न पढना मूर्खता है और मूर्खता ही मृत्यु है। मूर्ख व्यक्ति को कोई भी नहीं पसन्द करता, इसलिए विद्या का अभ्यास अवश्य करें।  विद्याहीन व्यक्ति ही शूद्र हो जाता है।

(2.) जीवन के द्वतीय पडाव पर धर्मानुसार सन्तानोत्पत्ति और धनार्जन करना चाहिए। यह गृहस्थ का काल होता है। आजकल लोग गृहस्थ को मुख्य रूप से स्त्री को भोग की वस्तु समझने लग गए हैं। जबकि गृहस्थ में रहते हुए भी ब्रह्मचर्य का पालन किया जा सकता है। यदि आप धर्मानुसार सन्तानोत्पत्ति करते हैं तो यह ब्रह्मचर्य का ही रूप है। वैसे भी हमारे शरीर का सबसे अमूल्य वस्तु तो वीर्य ही है। इसकी रक्षा अवश्य करनी चाहिए। दुर्भाग्य से आजकल के डॉक्टर कहने लगे हैं कि वीर्य को निकालने से हानि नहीं होती। यह बहुत बडी मूर्खता है। यदि समाज चरित्रवान् होगा तभी समाज, राष्ट्र आगे बढ पाएगा। नहीं तो बलात्कार जैसी घटनाएँ होती रहेंगी। आज इसके लिए नैतिक-शिक्षा की आवश्यकता है।

(3.) जीवन के तीसरे चरण में अपने जीवन को मुनि की वृत्ति जैसी बना लेना चाहिए। आप जहाँ भी रहे, निर्लेप, निर्द्वन्द्व भाव से रहें। वन में तो जाने से रहे। घर में भी रहते हैं तो घर के कामों में अधिक टोका-टाकी न करें, सलाह अवश्य दें, किन्तु ये विचार अपने मन में रखें कि मेरी बात मान ली ही जानी चाहिए। ऐसी वृत्ति रखेंगे तो पछताने के सिवा और कुछ नहीं मिलेगा। आपके पुत्र-पुत्रवधू, पौत्र अब सभी योग्य हो गए हैं, उन्हें अपना काम स्वतन्त्रतापूर्वक करने दीजिए।  हमारा जीवन ऐसा हो कि जैसे तालाब में कमल होता है, निर्लेप। उसके ऊपर कीचड और पानी का कोई प्रभाव नहीं पडता। ऐसा हमारा जीवन होना चाहिए। घर-संसार में रहते हुए भी घर-संसार से पृथक् रहें, वैरागी की तरह। अभिप्राय यह है कि घर में, घर की वस्तुओं में, पुत्र-पौत्रों में रिश्ते-सम्बन्धों में मोह न करें, अनुराग न रखें, प्यार सबसे करें, व्यवहार सबसे करें, बातें करें, किन्तु चिपक न जाएँ । अपना जीवन ऐसा बना लें कि उनके बिना भी आप जी सकें। उनके ऊपर सर्वथा निर्भर न हो जाएँ, ऐसा न कर लें कि उनके बिना जिया न जा सके। कोशिश करें कि अपना काम स्वयं कर लें। इस समय शरीर कमजोर होता है, इसलिए जिह्वा पर नियन्त्रण रखें और सक्रिय (Active) रहें।

(4.) जीवन के अन्तिम पडाव पर 75 वर्ष से ऊपर होने पर आप संन्यासियों की तरह रहें। वैसे नियम तो यह है कि प्रत्येक व्यक्ति को संन्यास लेना चाहिए, क्योंकि आपने संन्यास जैसा जीवन बनाया नहीं, तो कम-से-कम घर में भी त्यागपूर्वक रहें। जहाँ जाएँ दूसरों को सही सलाह दें, विद्यालयों में जाकर बच्चों को निश्शुल्क पढाएँ। हो सके तो धार्मिक संस्थाओं में जाकर सेवा करें, योग करें, ध्यान करें, प्राणायाम करें। यदि दान कर सकते हैं तो निर्धन बालकों को पढने की व्यवस्था करें, गुरुकुलों में जाएँ और विद्यादान करें, वहाँ से स्वयं भी कुछ सीखें। यह अन्तिम आश्रम बहुत कठिन है।

"आद्ये वयसि नाधीतं, द्वितीये नार्जितं धनम्।
तृतीये न तपस्तप्तं, चतुर्थे किं करिष्यति ।।"

अर्थः---यह श्लोक भी वही बात कह रहा है, जिसका वर्णन ऊपर किया गया है। जीवन के प्रथम वय में जिसने विद्या का अध्ययन नहीं किया, द्वितीय अर्थात् गृहस्थ में जिसने धन नहीं कमाया, तृतीय अर्थात् वानप्रस्थ में जिसने अपने शरीर को नहीं तपाया, मुनियों जैसा नहीं बनाया, तो वह चतुर्थ वय में  75 वर्ष के बाद क्या करेगा। दुःखी होगा और क्या करेगा। घर परिवार से कोई सहयोग नहीं मिलेगा। ऐसे लोगों को ही उसके अपने बच्चे सताते हैं।

आइए, हम सब अपना-अपना जीवन वैदिक बनाए, वेदानुकूल जिएँ और जीवन को सार्थक करें। प्रभु करे आप सबके जीवन में खुशियाँ आएँ, धन-सम्पदा से आपका परिवार पूर्ण हों। सुखा सन्तान मिलें, ऐसी हमारी कामना है। धन्यवाद।

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