Posted in जीवन चरित्र

महारानी लक्ष्मीबाई


Maharani Lakshmi Bai (महारानी लक्ष्मीबाई)

महारानी लक्ष्मीबाई

(९ नवम्बर १८२८ – ७ जून१८५८)

महारानी लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम मणि मलिका (मनु) था | लक्ष्मीबाई जब तीन चार साल की थी तब उनके माता- पिता सपरिवार सहित बिठुर पहुच गये और बाजीराव के दरबार मे आने जाने लगे | लक्ष्मीबाई को पेशवा बाजीराव ने इतना पसंद किया की उनका पालन पोषण बाजी राव के दतक पुत्र कुमार नाना साहब के साथ भाई बहन की तरह होने लगा |

खेल हे खेल मे लक्ष्मीबाई घुड़सवारी से ले कर तलवार बाजी तक मे पूर्ड रूप से दक्ष हो गयी सात साल की उम्र मे ही झासी के महाराजा गगाधर राव बाबा साहेब से लक्ष्मीबाई का विवाह हो गया ओर लक्ष्मीबाई महारानी लक्ष्मीबाई हो गयी गगाधर राव सन १८५३ तक जीवित रहे परन्तु उनकी मृतु के बाद उनके दतक पुत्र को ब्रिटिश सर्कार ने राज्य का उत्रदिकारी माने से इनकार कर दिया |

सात ही ये उछल दिया की झाँसी की जनता ब्रिटिश सरकार के शासन मे रहना चाहेगी या गगाधर राव के दतक पुत्र के शासन मे | मार्च १८५४ मे ब्रिटिशसरकार ने झाँसी को अपने कब्जे मे ली लिया | सरकार ने लक्ष्मीबाई को सात्वना के रूप मे एक मोटी पेंशन और लम्बी चोडी सुविधायो का प्रलोभन जरुर दिया | लक्ष्मीबाई का विद्रोह भरा स्वर निकला “मै अपनी झासी नहीं दुगी ” अंग्रेज चाहते थे की उनका भारत पर हर तरह से पूरा-पूरा अधिकार हो जाये इस लिये ब्रिटिश सरकार ने सरहतु रोज नामक कुशल सेनापति के नैत्रय्वा मे झासी पर जोर दार हमला करवाया | लोगो ने आक्रमण का सामना करने मे अस्मर्था व्यक्त की मगर महारानी ने कुशलता के साथ मोर्चा बंदी की |

खैया कोडी गयी और उस समय युद्ध मे जितने अछे प्रबंध हो सकते थे किये गये २२ मार्च को झाँसी का विद्ह्रो शुरू हुआ | २५ मार्च को दाहिने तरफ के तोफ-खाने मे जबरदस्त गोलावारी की तथा २६ मार्च को गढ़ पर की | दोनों ओर से जोरदार लड़ाई हुई | महारानी शाम के वक़्त अपने सभी सैनिको को प्रोत्सहान देती हुई घुमती रहती थी | लोगो मे बड़ा जोश था और महारानी को भी यही उम्मीद थी कि और फ़ौज आयेगी हुआ भी यही ३१ मार्च को तात्याटोपे अपने २० हजार सैनिको के साथ आ गया | सरहद पर भारी विपति आ पड़ी मगर दुर्भाग्यवंश तात्या पराजित होकर लौट गया | ३ अप्रैल को फिर से आक्रमण हुआ एक एक इंच के लिये घमासान लड़ाई हो रही थी |

 

परन्तु कुछ देशद्रोही भारतीय राजा अंग्रेजो की सहायता कर रहे थे फलता लक्ष्मी बाई को फिर पराजय स्वीकारनी पड़ी महारानी भाग निकली | ब्रिटिश सेना के कई योग्य कर्मचारी उनका पिछा करने को भेजे गये | महारानी को खतरे मे देखकर उनके चालीस साथी भी लौट पडे सभी लडते लडते मारे गये | महारानी भागते- भागते कालपी पहुच गयी |

जहा सब विद्रोही एकत्रित थे यहाँ पर एक बार फिर से लड़ाई हुई और २३ मई को यहाँ पर भी लक्ष्मी बाई की पराजय हुई | १७ जून को लक्ष्मी बाई जब अपने घोडै से उतर के पानी पी रही थी, इसी समय खबर मिली कि अंग्रेज सेना आ रही है, महारानी के विद्रोही साथी भाग खडे हुई केवल १५ साथी रह गये महारानी १५ सैनिको कि इस टुकड़ी के साथ ही लड़ाई मे कूद पड़ी मगर महारानी का घोडा कुछ अड़ियल था उसने एक नहर पार नही की महारानी की बाजू मे एक गोली लगी और सिर पर तलवार का एक वार हुआ |

अंतिम साँस टेक लडते हुई वेह शहीदों की श्रिंखला मे अपना नाम जोड़ गयी | झासी के युद्ध मे मिलने वाली पराजय भी विजय से कम नही थी उस माहौल मे महत्व हार जीत का नही था लोगो मे असंतोष की जो आग लगी हुई थी लक्ष्मी बाई ने उस आग मे घी का काम किया था |

अपनी मात्र भूमि की रक्षा के लिये अपने प्राणों की आहुति देने वाली वीरागना रानी लक्ष्मी बाई के लिये सुभद्रा कुमारी चौहान की श्रदाजली इस कविता के रूप मे है |

‘खूब लड़ी मर्दानी वेह तो झाँसी वाली रानी थी ,

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,

बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,

गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,

दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।

चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

English translation:

The thrones shook and royalties scowled Old India was re-invigorated with new youth People realised the value of lost freedom Everybody was determined to throw the foreigners out The old sword glistened again in 1857 This story we heard from the mouths of Bundel bards Like a man she fought, she was the Queen of Jhansi

कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,

लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,

नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,

बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी। वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार, देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,

नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार, सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।

महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में, ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,

राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में, चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई, किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,

तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई, रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।

निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया, राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,

फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया, लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।

अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया, व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,

डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया, राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया। रानी दासी बनी,

बनी यह दासी अब महरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात, कैद पेशवा था बिठुर में,

हुआ नागपुर का भी घात, उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात? जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।

बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार, उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,

सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार, ‘नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार’।

यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,

वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान, नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,

बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान। हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी, यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,

झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी, मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी, जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,

नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम, अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,

भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम। लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में, जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,

लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में, रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में। ज़ख्मी होकर वाकर भागा,

उसे अजब हैरानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार, घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,

यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार, विजयी रानी आगे चल दी,

किया ग्वालियर पर अधिकार। अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,

अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी, काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,

युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी। पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी, मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,

अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी, हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी, दिखा गई पथ,

सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी

, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।

तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,

खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।

 

श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान ने स्वंत्रता आन्दोलन मे अपने पति के साथ बडचढ़ कर भाग लिया और कई बार जेल गयी | इनकी कवितायों मे देश प्रेम कई साथ साथ मर्म सथ्ल को छूने वाले भाव मिलती है | लक्ष्मी बाई की समाधी कई प्रति अपने समाधी कविता मे श्रधा अर्पित की है | यह समाधी भारतवासियों कई लिये तीर्थ स्थल कई रूप मे पूजनीय है | —

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