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સુર્ય મંદિર, પ્રભાસ પાટણ વેરાવળ


~~~ સુર્ય મંદિર, પ્રભાસ પાટણ વેરાવળ ~~~

14મી સદીમાં બંધાયેલા આ અદભૂત મંદિરને સ્થાનિક લોકોની મદદથી શોધવામાં તમને સુખદ આશ્ચર્ય થશે. શીતળા માતાના મંદિરની નજીક આવેલું આ મંદિરનું પ્રાંગણ પ્રભાવશાળી છે. તેમાં સૂર્ય દેવ અને તેમના બે અનુચરોની પ્રતિમાઓ છે.

ઈ.સ. 1350 આસપાસના આ મંદિરની પક્ષ્ચિમાભિમુખ પરસાળ, ઉપર કિર્તિમિખો અને શંખના પ્રતીકોથી સુશોભિત ઊંબરા સુધી ને પછી અષ્ટકોણીય બંધ મંડપ,અંતરાલ, ગર્ભગ્રૂહ અને પ્રદક્ષિણા-પથ સુધી લંબાય છે.

~~~ સુર્ય મંદિર, પ્રભાસ પાટણ વેરાવળ ~~~

14મી સદીમાં બંધાયેલા આ અદભૂત મંદિરને સ્થાનિક લોકોની મદદથી શોધવામાં તમને સુખદ આશ્ચર્ય થશે. શીતળા માતાના મંદિરની નજીક આવેલું આ મંદિરનું પ્રાંગણ પ્રભાવશાળી છે. તેમાં સૂર્ય દેવ અને તેમના બે અનુચરોની પ્રતિમાઓ છે.

ઈ.સ. 1350 આસપાસના આ મંદિરની પક્ષ્ચિમાભિમુખ પરસાળ, ઉપર કિર્તિમિખો અને શંખના પ્રતીકોથી સુશોભિત ઊંબરા સુધી ને પછી અષ્ટકોણીય બંધ મંડપ,અંતરાલ, ગર્ભગ્રૂહ અને પ્રદક્ષિણા-પથ સુધી લંબાય છે.

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Des bhakta


1 hr · Edited · 
शहीद-ए-आजम भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद उन्हें बेगुनाह साबित करने को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है। </p>
<p>1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर में पुलिस को शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम नहीं मिला है। भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद इस महान स्वतंत्रता सेनानी की बेगुनाही को साबित करने के लिए यह बड़ा खुलासा है।</p>
<p>शहीद भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज राशिद कुरैशी ने याचिका दायर की थी। इसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ तत्कालीन एसएसपी जॉन पी. सैंडर्स की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर की सत्यापित कॉपी मांगी गई थी।</p>
<p>लाहौर पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर अनारकली थाने के रिकॉर्ड की गहन छानबीन की और सैंडर्स हत्याकांड की एफआईआर ढूंढ़ने में कामयाब रहे। उर्दू में लिखी यह एफआईआर अनारकली थाने में 17 दिसंबर 1928 को शाम 04:30 बजे दो अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई थी।</p>
<p>कुरैशी ने लाहौर हाई कोर्ट में भी याचिका दायर की है, जिसमें शहीद भगत सिंह मामले को दोबारा खोलने की मांग की गई है। उन्होंने कहा, 'मैं सैंडर्स मामले में शहीद भगत सिंह की बेगुनाही को स्थापित करना चाहता हूं। लाहौर उच्च न्यायालय ने मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा है, ताकि सुनवाई के लिए बड़ी बेंच गठित की जा सके।'</p>
<p>गौरतलब है कि शहीद भगत सिंह को सैंडर्स की हत्या के लिए फांसी की सजा सुनाई गई थी और महज 23 साल की उम्र में 1931 में उन्हें लाहौर के शादमान चौक पर फांसी दी गई थी।</p>
<p>★ सबसे पहले शहीद भगत सिंह को शहीद का दर्ज़ा तो दिलवाओ, आज तक सरकार उन्हे आतन्कवादी कहती है !!! ★

शहीद-ए-आजम भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद उन्हें बेगुनाह साबित करने को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ है।

1928 में लाहौर में एक ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर में पुलिस को शहीद-ए-आजम भगत सिंह का नाम नहीं मिला है। भगत सिंह को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद इस महान स्वतंत्रता सेनानी की बेगुनाही को साबित करने के लिए यह बड़ा खुलासा है।

शहीद भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज राशिद कुरैशी ने याचिका दायर की थी। इसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के खिलाफ तत्कालीन एसएसपी जॉन पी. सैंडर्स की हत्या के मामले में दर्ज एफआईआर की सत्यापित कॉपी मांगी गई थी।

लाहौर पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर अनारकली थाने के रिकॉर्ड की गहन छानबीन की और सैंडर्स हत्याकांड की एफआईआर ढूंढ़ने में कामयाब रहे। उर्दू में लिखी यह एफआईआर अनारकली थाने में 17 दिसंबर 1928 को शाम 04:30 बजे दो अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज की गई थी।

कुरैशी ने लाहौर हाई कोर्ट में भी याचिका दायर की है, जिसमें शहीद भगत सिंह मामले को दोबारा खोलने की मांग की गई है। उन्होंने कहा, ‘मैं सैंडर्स मामले में शहीद भगत सिंह की बेगुनाही को स्थापित करना चाहता हूं। लाहौर उच्च न्यायालय ने मामले को मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा है, ताकि सुनवाई के लिए बड़ी बेंच गठित की जा सके।’

गौरतलब है कि शहीद भगत सिंह को सैंडर्स की हत्या के लिए फांसी की सजा सुनाई गई थी और महज 23 साल की उम्र में 1931 में उन्हें लाहौर के शादमान चौक पर फांसी दी गई थी।

★ सबसे पहले शहीद भगत सिंह को शहीद का दर्ज़ा तो दिलवाओ, आज तक सरकार उन्हे आतन्कवादी कहती है !!! ★

 

लाहौर में 1928 मे ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या में भगत सिंह का नाम प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में दर्ज नहीं था। भगत को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद यह बात सामने आई है, जिससे उनकी बेगुनाही साबित करने के लिए यह एक बहुत बड़ा सबूत है।

भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज रशीद कुरेशी ने याचिका दायर कर तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जॉन पी सौंडर्स की हत्या करने के आरोप में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के खिलाफ दर्ज एफआईआर की सत्यापित कॉपी मांगी थी।

भगत सिंह को सौंडर्स की हत्या करने के आरोप में फांसी की सजा दी गई थी और 1931 में लाहौर के शदनाम चौक में उन्हें फांसी दे दी गई थी। उस वक्त उनकी उम्र महज 23 साल थी।

उन्हें फांसी दिए जाने के आठ दशक से ज्यादा समय के बाद लाहौर पुलिस को कोर्ट ने भगत सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर ढूंढने का आदेश दिया था। आदेश के बाद अनारकली पुलिस स्टेशन का रिकॉर्ड खंगालने के बाद पुलिस को एफआईआर की कॉपी मिल ही गई।

उर्दू में लिखी एफआईआर 17 दिसंबर 1928 को शाम 4.30 बजे अनारकली पुलिस स्टेशन मे दो गुमनाम बंदूकधारियों के खिलाफ दर्ज की गई थी। थाने का ही एक पुलिस अधिकारी इस मामले में शिकायत कर्ता था।

शिकायतकर्ता पुलिस अधिकारी हत्या के मामले का प्रत्यक्षदर्शी भी था। अपनी रिपोर्ट में उसने कहा था कि जिस व्यक्ति का उसने पीछा किया था वह पांच फुट पांच इंच लंबा था, हिंदू चेहरा था, मूंछे थीं, दूबला पतला था और मजबूत काया था। उसने सफेद रंग का पायजामा और ग्रे शर्ट पहन रखा था। सिर पर टोपी भी पहनी हुई थी। मामला भारतीय दंड संहित (आईपीसी) 302, 1201 और 109 के तहत दर्ज किया गया था।

लाहौर पुलिस के विधि शाखा के इंसपेक्टर ने शनिवार को एफआईआर की सत्यापित कॉपी बंद लिफाफे में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (लाहौर) महमूद जारगम को सौंपी, जिसके बाद अदालत ने याचिकर्ता को भी एक कॉपी सौंपी।

कुरेशी ने बताया कि भगत सिंह मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश ने 450 प्रत्यक्षदर्शियों के बयान सुने बिना ही उन्हें (भगत) को फांसी की सजा दे दी। भगत के वकीलों को उनसे पूछताछ करने का मौका ही नहीं दिया गया।

कुरेशी ने लाहौर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर भगत सिंह मामले को पुन: खोलने की मांग की है। उन्होंने कहा, इस मामले में मैं भगत सिंह को निर्दोष साबित करना चाहता हूं। मामले की सुनवाई के लिए हाई कोर्ट ने मामला पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा है ताकि मामले की सुनवाई के लिए वृहत पीठ का गठन किया जा सके।

लाहौर में 1928 मे ब्रिटिश पुलिस अधिकारी की हत्या में भगत सिंह का नाम प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में दर्ज नहीं था। भगत को फांसी दिए जाने के 83 साल बाद यह बात सामने आई है, जिससे उनकी बेगुनाही साबित करने के लिए यह एक बहुत बड़ा सबूत है।

भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज रशीद कुरेशी ने याचिका दायर कर तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक जॉन पी सौंडर्स की हत्या करने के आरोप में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव के खिलाफ दर्ज एफआईआर की सत्यापित कॉपी मांगी थी।

भगत सिंह को सौंडर्स की हत्या करने के आरोप में फांसी की सजा दी गई थी और 1931 में लाहौर के शदनाम चौक में उन्हें फांसी दे दी गई थी। उस वक्त उनकी उम्र महज 23 साल थी।

उन्हें फांसी दिए जाने के आठ दशक से ज्यादा समय के बाद लाहौर पुलिस को कोर्ट ने भगत सिंह के खिलाफ दर्ज एफआईआर ढूंढने का आदेश दिया था। आदेश के बाद अनारकली पुलिस स्टेशन का रिकॉर्ड खंगालने के बाद पुलिस को एफआईआर की कॉपी मिल ही गई।

उर्दू में लिखी एफआईआर 17 दिसंबर 1928 को शाम 4.30 बजे अनारकली पुलिस स्टेशन मे दो गुमनाम बंदूकधारियों के खिलाफ दर्ज की गई थी। थाने का ही एक पुलिस अधिकारी इस मामले में शिकायत कर्ता था।

शिकायतकर्ता पुलिस अधिकारी हत्या के मामले का प्रत्यक्षदर्शी भी था। अपनी रिपोर्ट में उसने कहा था कि जिस व्यक्ति का उसने पीछा किया था वह पांच फुट पांच इंच लंबा था, हिंदू चेहरा था, मूंछे थीं, दूबला पतला था और मजबूत काया था। उसने सफेद रंग का पायजामा और ग्रे शर्ट पहन रखा था। सिर पर टोपी भी पहनी हुई थी। मामला भारतीय दंड संहित (आईपीसी) 302, 1201 और 109 के तहत दर्ज किया गया था।

लाहौर पुलिस के विधि शाखा के इंसपेक्टर ने शनिवार को एफआईआर की सत्यापित कॉपी बंद लिफाफे में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (लाहौर) महमूद जारगम को सौंपी, जिसके बाद अदालत ने याचिकर्ता को भी एक कॉपी सौंपी।

कुरेशी ने बताया कि भगत सिंह मामले की सुनवाई कर रहे विशेष न्यायाधीश ने 450 प्रत्यक्षदर्शियों के बयान सुने बिना ही उन्हें (भगत) को फांसी की सजा दे दी। भगत के वकीलों को उनसे पूछताछ करने का मौका ही नहीं दिया गया।

कुरेशी ने लाहौर हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर भगत सिंह मामले को पुन: खोलने की मांग की है। उन्होंने कहा, इस मामले में मैं भगत सिंह को निर्दोष साबित करना चाहता हूं। मामले की सुनवाई के लिए हाई कोर्ट ने मामला पाकिस्तान के मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा है ताकि मामले की सुनवाई के लिए वृहत पीठ का गठन किया जा सके।
Unlike ·  · 
Posted in रामायण - Ramayan

Ramsetu


Ramsethu is NOT Adam’s Bridge
01:42

The chronological orders of Indian History were changed and distorted in order to be mapped on to the Biblical framework. According to which, nothing can be originated before the date of birth of Adam, hence, every incident must have had happened after Adam.

But, Now due to the scientific advancements, it can be proved in several ways, that the Ramsethu is much much older than the Biblical chronological order. It has also been substantiated that, the bridge was indeed there and have all the construction architecture as described in the Ramayana.

So, this notion of Ramsethu as something Adam’s Bridge or mythical is absolutely Rubbish, it is a Western narrative, which is now being told to Hindus by Indian‪#‎Secular‬ ‪#‎Marxist‬ (Leftists) historians.

Hindus should strive hard to reclaim all historical places, which are related to their Identity and ancient civilizations.

Tags : ‪#‎Ramsetu‬ ‪#‎Ayodhya‬ ‪#‎Communist‬ ‪#‎Leftist‬